Author Topic: Satire on various Social Issues - सामाजिक एवं विकास के मुद्दे और हास्य व्यंग्य  (Read 144964 times)

Bhishma Kukreti

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घपरोळ       

                                        प्रवास्युं द्वी ब्यौ आवश्यक ह्वावन !

 

(यह लेख 'पराज' मासिक पत्रिका ,  मुंबई के जनवरी १९९१ अंक में प्रकाशित हुआ था. इस लेख ने मुंबई के प्रवासियों के मध्य एक बहस शुरू कर दी थी. गढवाली भाषा में प्रकशित लेख यदि प्रवासियों के मध्य बहस खड़ा कर दे तो यह  बडी बात मानी जाती है. मुंबई कई सामाजिक संस्थाओं कि बैठकों में इस विषय पर खूब चर्चा हुई.शैलसुमन संस्था की एक बैठक में मै शामिल भी था  )

 

                                                   भीष्म कुकरेती

 

                  जी हाँ ! हाँ जी ! तुमन बि बुलण बल यु  ढांगूवळो क्या क्या टुटब्याग सिखाणु च बल प्रवासी द्वी ब्यौ कौरन .  भौतुन बुलण बल ये गंगा सलण्या तै असंवैधानिक बात करद शरम ल्याज बि नि औणि. कै कै न त बोलि दीण  बल ये कुटबक्या, कुबोलिक कुकरेती तै कुकराण  (सभा में कही गयी असंगत या भद्दी बात)  करद अपण संविधान की याद कतै  बि नि रौंदी- कुजाण ! कुजाण ! यू कुकरेती किलै कुजाति  होणु च धौं! कत्युंन बुल न बल यू कुमत्या ह्व़े गे.कत्युंन कुमणाण (असंतोष) करद, करद बुलण बल ये कुमनखि कुकरेती  क हुक्का पाणि बन्द कारो. कुज्याण  कथगा इ लोक मै देखिक इ  अपणा कमरा क किवाड़ इ बन्द करी देला धौं- कुकरेती की कुसुवाणि (असुंदर) सूरत इ नि दिखे जाओ  ! कत्युन न भगार लगै दीण बल जरूर भीष्म कुमौ (दुष्ट परिवार ) मा पैदा ह्व़े. कति ब्वालाल बल ये पर खबेश लगी गे जो खटरागी ह्व़े गे . तबी त जब कि हम इक्कसवीं सदी मा पौंछण  वळा  छंवां अर यू थ्वर्दन्या हम तै खबेशजुग (मध्ययुग) मा लिजाणो च अर एका बतुं मा ख़ास खुगसाण (पुराणी वस्तु की गंध)  आणि च .  कुकरकाटा  (जसपुर गाँव का पुराना नाम) का सबि लोक खुसफुस कारल बल जै भीषमौ  पड़ ददा, बूडददा, ददा, बुबा, बाडा न रिवाज होंदा बि  द्वी ब्यौ नि कौरिन  वो बुलणो च बल प्रवास्युं द्वी ब्यौ आवश्यक ह्वावन. 

 

            पण मी या राय नि दीणु छौं.  ना इ म्यरो मकसद या च बल  तुम छौंद कज्याणि क अबि दौडिक दुसर ड्वाला ल्हें आओ.

          असल मा द्वी ब्यौ  करणै राय त मै तै म्यरा गाँव बिटेन अयाँ डक्खु  भैजी  न देई.

             ह्वाई क्या च बल मी वैदिन  डक्खु दा तै छोड़णो मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन जयुं छौ. गांवक हौरी बि लोक डक्खु दा तै छोड़णो उख स्टेशन मा अयाँ छ्या. इनी स्टेशन मा इ  प्रवास्युं  की गढवाल विकास  मा भूमिका, भागीदारी, हिस्सेदारी, मिळवाक  पर छ्वीं लगण बिसे गेन. अर बहस करदा करदा ट्रेन सरकण  बिसे गे त डक्खु दा न सब्युं तै सुणान्द सुणान्द जोर से ब्वाल," हरेक प्रवासी जब तलक द्वी ब्यौ नि कारल तब तलक क्वी बि प्रवासी गढवाल विकास मा क्वी भूमिका, हिस्सेदारी नि निभै सकुद.एक ब्यौ इख अर हैंको उख ."

 इना डक्खु दा न इन बोली अर उना ट्रेन रवाना ह्व़े.

  मी घंगतोळ मा पोड़ी गेऊं बल यू डक्खु दा बोलि त गेयी पण क्या बली गे . मि रंगताणु रौं , उपयड़ मा गेऊं ( परेशान होणु रौं ), उधेड़बुन मा रौं, कि डक्खु दा न इन उदभरि,उपड़ण्गी, उपदरि,  उफंदरि, उपरच्यळो,  उत्पाती बात कनै करि  दे.

         द्वी ब्यौ को मतबल च, अर्थ च , मीनिंग च बल प्रवासी को एक ब्यौ प्रवास मा अर हैंको ब्यौ गढवाल मा. एक दै मेरो समज मा आई बल डक्खु दा बुलणो मतलब च बल जब क्वी बि प्रवासी उन्ना- देसन (परदेस) अपण ड़्यार आलु  त गाँ मा मुंडो ठुन्ग मारणो बान एक भली कज्याणि क कुंगळ-   कुंगळ हथ राला अर ठुन्ग मारणो कठोर  नंग राला. जब प्रवासी ड़्यार जालो त उख बि कज्याणि क नरम नरम खुकली राली, अर  प्रवासी वीं खुकलिम मुंड धौरिक द्वी घड़ी झपांक  निंद गाडी द्यालों. अहा उख गाँ मा प्रेम रस कि गंगा बौगली.

       पण मी जाणदो छौं बल डक्खु दा कबि बि   रंगमतो, रमकण्या, रसीली, रंगीली,सेक्सीली छ्वीं लगान्दु इ नी च . सिंगार या प्रेम रस से डक्खु दा इनी भाजदो जन आंसू गैस से हड़ताली, पेस्ट कंट्रोल से कीड़-मक्वड़, बी.जे.पी से मुस्लिम लीग.

  पण  डक्खु दा क्वी बि बात सुदि कबि नि बोल्दो. फिर मीन घड्याई  जु मै सरीका प्रवासी क   एक ब्यौ ड्यारम  बि ह्वाओ त क्या क्या परिवर्तन गढवाळ का गौं मा ऐ जाला. जु हरेक प्रवासी क द्वी ब्यौ होला त उख क्या क्या बदलाव आई जाला. कुछ ना कुछ भलो त होलू इ.

          ह्वाल क्या? जौं पुंगड्यू मा मेरी बूड ददि , मेरी ददि, मेरी ब्व़े खेती करदी छे, धाण करदी छे अर खार्युंक खारी क्वाद , झन्ग्वर,, ग्युं , सट्टी, तोर, उड़द, गैथ उप्जान्दा छ्या ऊ पुंगड़ आज बांज पड्या छन.ऊं नजीला पुंगड़ो मा आज मळसु फुळणु च या लैंटीना क बुट्या पैदा हूणा छन.  जौं डाँडो  पुंड्यू मा ग्युं, गैथ होंदा छा अज उख कुळै या कांडो झाड उग्याँ छन. जख झंगवर कोदो होंदो छौ उख हिसर -किनग्वड़ जम्याँ  छन. हाँ, हाँ जु म्यार एक ब्यौ ड्यारम गां मा बि होलू याने हरेक प्रवासी क एक ब्यौ ड्यारम होलू  य़ी बांज पड्या गिंवड़, लवड़, लयड़,  तुर्यड़, कुदड़, झंगर्यड़, सट्यड़, मुंगर्यड़, गथ्वड़ अवाद ह्व़े जाला.

                   कबि मै सरीखा प्रवासीक बड़ा बड़ा तिबारिदार, जंगलादार , तिभितर्या, तिमंजिल्या कूड़ा होंदा छ्या जौं कूड़ो तै पक्को ढंग से चिणणो बान हमारा बूड बुड्यो न उड़द , गैथों मस्यटु माटु मा मिलै छौ आज वो कूड कांडो क कूड बण्या छन.  जौं कुड़ो तै  लाल माटोन लिपे जांद छौ आज वूं दिवल्यूं पर बौड़, पिपुळ,कंडाळी क बुट्या जम्याँ छन. जौं चौकूं मा  संग्रांदि दिन औजी नौबत बजाणो आंदा छया आज ऊं चौकूं मा कुकुर बि नि आन्द .आज चौक-कूड़  आर्कियोलौजिकल सर्वे लैक धरोहर बणण वाळ छन.आज गाँ हडप्पा संस्कृति का अवशेष जन बौणि गेन.

    हाँ जु सबि प्रवास्युं दु दु ब्यौ (एक परदेस मा अर एक गाँ मा)  होला त य़ी कूड खन्द्वार  होण से बची जाला. कूड कूड राला जख मनिखों बास ह्वाल ना कि उळकाणो (उल्लु)  बास . आज यि हाल छन बल जख घोड़ी ब्योला तै लिजांदी छे अब वै घोड़ी मुर्दों तै मड़घट   लिजौणौ   काम आणि च . सैत  च प्रवास्यूं  द्वि ब्यौ हूण  से फिर से घोड़ी ब्यौलों तै लिजाणो काम आली अर मुर्दा फिर से मनिखों कंधौं मा मड़घट जावन !  सैत च प्रवास्यूं द्वि ब्यौ हूण से या भयावह स्तिथि ख़तम ह्व़े जाली !

             पण यक्ष प्रश्न त या च बल विकास अर गढवाल तै आवाद रखणो बान  क्या यो अमानवीय, असंवैधानिक, टुटब्यग्या, कुबगत्या एक मात्र रस्ता, बाटु बच्यूं च?  या गढ़वाल़ो  यू दुर्भाग्य च बल पलायन की आंधी त रुके नि सक्यांदी पण गौंऊँ  तै आवाद करणो बान द्वी ब्यौ एक लाचारी समणि च. प्रवास्युं लाचारी च बल प्रवास अर गढवाल की  लाचारी च विकासो बान  प्रवास्यूं शारीरिक भागीदारी. गढ़वालौ  विकासो बान प्रवास्यूं शारीरिक भागीदारीउथगा इ जरोरी च जथगा गढवाल तै हिमाला कि जरोरात. त क्या शारीरिक भागीदारी, हिस्सेदारी या विकासौ मिळवाको बान प्रवास्यूं मा द्वी  ब्यु इ विकल्प बच्यूं च ? क्या गढवाल तै दुबारो  आवाद करणो बान फिर खबेसी जुग मा जाण पोड़ल ?

          मीन खूब घड़याई , स्वाच त पाई कि अरे डक्खु दा को मतलब कुछ हौरि छौ.

      ओहो ! डक्खु दा न मै सरीका प्रवासी पर व्यंग का बाण , तून का भाला, ताना का बरछा, गूढ़ व्यंजना को बसूला चलाई, आक्षेप की कुलाड़ी नपाई . आक्षेप की या कुलाड़ी वूं प्रवास्युं पर चलये गे जो समोदर का छाल पर बैठिक गढ़वाल का बारा मा मगरमच्छी  अंस्दारी बगाणा  रौंदन. डक्खु दा न व्यंग का बरछा वूं पर्वास्यूं पर मार जो इख सेमिनारो मा गढ़वाल  का विकास का बारा मा खूब भुकदन पण असल मा गढवाळो बाटो बिसरी इ गेन। गूढ़ व्यंजना को बसूला डक्खु दा न वूं मुंबई का प्रवास्युं पर  चलाई जौं तै सिक्षा क बारा मा क्वी ज्ञान इ नी च पण गढवाल विश्व विद्यालय का सिलेबस पर बडी बडी बहस करदन. डक्खु दा न वूं प्रवास्युं पर तून का भाला चुलाई  जु तीस साल से गढवाल नि गेन पण इख लम्बा लम्बा भाषण दीणा रौंदन कि गढवाल मा टूरिज्म /पर्यटन उद्योग कनो होण चयेंद. 

                 असल मा डक्खु दा न प्रवास्युं क द्वी ब्यौ को शब्दों से प्रवास्युं  तै एक रैबार दे बल इख मुंबई मा गढ़वाल विकासौ छ्वीं नि लगावदी अर साल तीन साल मा अपण गाँ जैका विकास मा शारीरिक भागीदारी निभाओ. समोदर का छाल पर गढ़वाल  विकास का बारा मा  फ़ोकट मा नि र्वाओ बल्कण मा साल द्वी साल मा उख जाओ अर थ्वडा इ सै कुछ करो. टूरिस्ट को तरां उख गढवाल नि जाओ बल्कण मा इन जाओ जन बुल्यां तुमारो उख भरो पूरो परिवार च.इखम बैठिक 'गढवाल के विकास में प्रवासियों की भूमिका' पर निख्त्ती भाषण से कुछ नि होण .बल्कण मा जब तलक उख शारीरिक भागीदारी नि निभैला त कुछ नि ह्व़े सकदो.डक्खु दा को द्वी ब्यौ को असली मन्तव्य त या छौ बल प्रवास्युं शारीरिक भागीदारी.

                                   ब्वालो तुम क्या बुलणा छंवां?


Copyright@ Bhishma Kukreti 31/5/2012

Bhishma Kukreti

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मि चांदु

कविता- पूरण पन्त पथिक

मि चांदु ,

मेरा पहाडौ /हर गंगल्वड़ो 

तोपौ गोळा बणि जावा

नथर!

पौ को मजबूत  ढूंगो बणि जावा

Bhishma Kukreti

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हमारि नजर : एक विचारोत्तेजक गढ़वाली कविता

हमारि नजर

 

कवि -देवेन्द्र जोशो, देहरादून



हमारि नजर

ब्वग्दा

ग्द्नो

छ्वायों

छिंछड़ो

अर माटा पर गै

हमारी नजर ..

झड़दा पटु

अट लमडदा ल्वाड़ो पर गै i

पर हमारि नजर

तूणि अर दिवारा

टकटका डाळो पर नि गै .

घाम बरखा -ह्यूं से निश्चंत

मुंड उठे कि खड़ा

उच्चा उच्चा डाँडो पर नि गै I

Copyright@ Devendra Joshi

Bhishma Kukreti

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स्व. पार्थ सारथी डबराल की चर्चरी- बर्बरी कवितायें



स्व. पार्थ सारथी डबराल हिंदी के जाने माने व्यंग कार थे उनकी पुस्तक 'नानी मरी दादी युग की' एक युगीन कृति है
 
गढवाली में भी पार्थ सारथी डबराल ने चर्चरी-बर्बरी कविताएँ लिखीं थीं .

उनकी शब्द सामर्थ्य और कवित्व की एक झलक देखिये --

              ----कुछ्ना---
 
 

ब्वारी नौ च रुणक्या, अर ब्वारिक नौ च बिछना

सरा रात भर भडडू  बाजे, खाण पीण को कुछ्ना

 

                 ---निरपट्ट----

 

दुकानी मा /धण्या जीरो लीणा का बाद,

मीन दुकानदार तै पूछ - अर लौंग क्या भाव छ

वैन बोले पांच सौ रूप्या कीलो

पांच सौ रूप्या सुणिक मी घंघणे ग्यों

फिर मीन निरास ह्वैकी ब्वाल -

'हे राम दा, अब ट लौंग

कज्याण्यु की ही नाक पर दिखेली

मसालूं की लौंग कखन द्यखणै

वीं दुकानिम इ एक चबोड्या बुडड़ी बैठी छे ,

वा क्या ब्वाद- भुला ई नै फैशन मा ट

कज्याण्यु की नाक पर बी लौंग नि दिखेंदी


Copyright@ Parth Sarthee Dabral

Bhishma Kukreti

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चबोड़ -चखन्यौ

                      बीमारी से शख्सियत को पता चलद

 

                                     भीष्म कुकरेती





                        दुन्या मा तीन चीज सास्वत छन -जनम, बीमार पड़ण अर मिरत्यु. चौथी बिथ्या च ज्वा एक जरूरी बिथ्या च अर वीं बिथ्या-बीमारी क नाम च बीमारूं पूछ ताछ करण वाळु से बीमारौ हैसियत, शख्सियत पता चलण   . अब जब बीमार पड़ी गे त पुछण वाळु संख्या से पता चल्द बल तुमारो हितचिन्तक कथगा छन अर पूछण वाळु संख्या से इन बि पता चलद कि ये मनिखौ गां -गौळ -समाज मा कथगा पूछ छ.



          म्यरा गाँ मा  नरेंदर  ददा  छ्या त जब बीमार पोड़दा छा त कै तै बि वैद मा नि पठान्दा छ्या बल्कण मा पैल सरा गाँ मा रैबार जी पौन्छादा छ्या बल नरेंदर जी बीमार पोड़ी गेन. जरा स्याम तक क्वी नि आई त समजी ल्याओ वैको दगड कुट्टी अर कबि कबि त पैणो बरजणो नौबत बि आई जांद छे. इलै गाँ मा आम बात छे कि नरेंदर ददा बीमार ह्वाओ त झाड़ा तब जाओ पैल नरेंदर ददा का इख हाजिरी लगै द्याओ.  एक दै रातो टैम छौ  खाणो बगत  छौ अर नरेंदर ददा तै खताखती छींक ऐ  गेन. बिचारो जोगी काका अपण ग्वाठंम जाणो तैयारी करणा छया अर चूँकि इकुलास बि छे अर ग्वाठ गां से जरा नजीक इ छौ त भगळव्ट मा क्वी नि छौ पण जोगी काका तै नरेंदर ददा की खबर लीणि  जरोरी छे निथर  नरेंदर ददा कि गाळी कु सूणल ! पण खाली हाजिरी से काम नि चलदो ठौ . हरेक पुछण वाळ तै  पुछण जरोरी छौ कि छींक कै हिसाब से ऐन. छींक दै नाक सी आई कि बै  नाक से आई. छेंकी आई कि सीम्प/सिंगाणा  बि आई. अर फिर नरेंदर ददा जब तक पूरी कथा नि लगै द्याओ  त पुछण वाळ जै बि नि सकद. जोगी काका तै छींको  बारा मा पुछण अर फिर नरेंदर ददा बिटे  छींक रामयण सूणण मा देर ह्व़े ग्याई. मनिखों क्वी  अनुशासन  नि होंद पण रिक बागुं अपण कुछ प्राकृतिक नियम-धियम होन्दन. जथगा देर मा जोगी काका नरेंदर ददा कि छींक-छूंक कि  रामायण सुणणु राई  उथगा देर मा बाग़ गोठ म मेमान  बौ णिक ऐक  जोगी काकाक द्वी गौड़ अपण दगड ली गे. जोगी काका अर  काकी तै गौड़ीयूँ दुःख त छौ पण एक बड़ो सुख छौ कि टैम पर नरेंदर ददा क बीमारी -बिथ्या क पूछ ताछ त कौरी याळी. उन सि दिन होंद त गांव  वाळु न जोगी काका क ग्वाठम   जाण छौ  अर फिर बाग़ की खोज करण छौ. पण सरा गाँ त नरेंदर काका क पूछ ताच मा व्यस्त छौ त कैन बि जोगी काका कि खबर नी ले. नरेंदर ददा क सुचण छौ बल बीमारी मा पूच-  ताच करण वाळु क गणत से अहमियत कु पता चलद. नरेंदर ददा क अपण सबी नौन अर नौनियूँ ब्यौ उनि जगा कार जख समदी तै बीमारी मा पुछणो  जादा से जादा लोक आंदा छ्या.



           अब सूणो ना ! सि हमारी अडगै (इलाका) मा गजे जी छया. त ऊंको बि इनी बुलण छौ बल आदिमों महत्व बीमारी मा पुछण वाळु संख्या से इ हुंद . मातबरी  अर गरीबी  से आदिमक पछ्याणक नि होंद बल्कण मा बीमारी मा पूच -ताच से हुंद कि कथगा लोक पुछणो-जाचणो ऐन.  इलै जनि गजे जी बीमार हूंदा छ्या त अपण आबत मिन्त्रों इख हलकारा भिजदा छ्या कि जां से उंक इख खूब भीड़ ह्व़े जाओ. बीमारौ इख लोखुं भीड़-  पिपड़करो बिटे पता चलदो कि ये मनिखौ क्या पुन्यात च, क्या व्यक्तित्व च.
 
                आज बि बीमारी अर लोगूँ पुछण अहमियत को एक प्रतीक च , स्टेटस सिम्बल च. मेरी कम्पनी मा म्यार एक दगड्या च नाम? चलो मिस्टर खोबरगड़े  सै . वो दुःख सुख तै अपण प्रमोसन अर अफु तैं अंक्याणो ( मूल्याँकन) साधन माणदन. जब बि जरा थ्वडा सि जादा बीमार ह्वाई ना कि बड़ो से बड़ो अस्पताल मा भर्ती ह्व़े जान्दन. अर सेक्रेटरी तै काम दे दीन्दन कि सरा दुन्या मा खबर जाण चयेंद. सेक्रेटरी सब जगा खबर फैलांदी त 'गेट वेल सून  ' क एस.एम्.एस या मेल आण बिसे जान्दन.    फिर मुंबई का सेल्स मैनु तै काम पर लगाये   कि सौब दुकानदारों तै अस्पताल ल्ये जाओ. जु जथगा दुकानदार (डीलर या डिस्ट्रीब्यूटर ) लांद वैको प्रमोसन वै हिसाब से हूंद. मिस्टर . खोबरगड़े  इन पता लगै दीन्दन कि एम 'डी कख छन अर कबारी कबारी अफिक एम.डी क तरफान बड़ो फुलुं गुलदस्ता अपण  कमरा मा धौरी  दीन्दन कि लोग द्याखन . फिर यांकी पूरी सूचना मिस्टर . खोबरगड़े  अपण एम. डी तै दीन्दन कि कथगा दुकानदार दिखणो ऐन जाण से एम.डी तै पता चली जाओ कि  मिस्टर खोबरगड़े  डीलरूं मध्य कथगा प्रसिद्ध छन. बीमारी से फैदा उठाण सिखण ह्वाओ त मिस्टर खोबरगड़े से सिखण चयेंद.  मिस्टर खोबरगड़े  बीमारी तै स्टेट्स सिम्बल मा बदली दीन्दन.



                 राजनीति मा बि बीमारी स्टेट्स सिम्बल होंद पण इन पता इ नि  चलद कि नेतौं बीमारी -बिथ्या असल च कि नकली. कबि कबि डिप्लोमेटिकल बीमारी बि होंद . अर अच्काल त नेतौ पर एक नई बीमारी बि लगीं च जनि कोर्ट को समन आन्द यूँ नेतौं पर हज्या से बि बडी बीमारी लग जांद अर यि इ .सी.यू पौंची जान्दन. फिर कोर्ट का मुताबिक यूँ पर भंयकर बीमारी होंद अर जमानत मिल जांद पण जनि यि अस्पताल बिटे भैर हुन्दन कुतकण बिसे जान्दन. अब सि अपणा अमर सिंग जी तै देखी ल्याओ. जब तलक जमानत नि मिलि इन लगणु छौ अबि अर तबी पण अब त कुतकणा ही रौंदन!



  खैर नेतौं क बीमारी मा बि राजनीती चलद . कै नेता क दगड घचपच करण  हो त अस्पताल या ड्याराम  पौंची जाओ अर बैर दिखाण होऊ त क्वी खबर नि लीण .



            उन हमर इतियास मा बीमारी क पूछ ताच या भगवान से सुख्यर हूणो दिली प्रार्थना जथगा अमिताभ बच्चन कि ह्व़े उथगा कैकी नि ह्व़े. हाँ अच्काल लोक क्रिकेटर युवराज कि बीमारी क बार मा बि पुछणा रौंदन.



  गितांग  कल्पना चौहान जब अस्पताल मा छे त इंटरनेट मा खूब पूछ ह्व़े



अब जब कि लोक गाइका   कबूतरी देवी की खबर आई पुछणा सबि छन पण इमदाद क्वी क्वी इ दीणा छन. इख तलक कि मी बि मुक लुकाणु छौं.



  अच्काल फेस बुक या इन्टरनेट से पूछ ताच सौंग ह्व़े गे. जब मुंबई का साहित्यकार-सामाजिक कार्यकर्ता डा.राजेश्वर उनियाल बीमार ह्वेन अर अस्पताल मा भर्ती ह्वेन त एस.एम.एस अर मेल इथगा ऐन कि ऊं तै डौरन खबर भिजण पोड़ कि अस्पताल आणो जरूरत नी च. 

गढ़वाली का प्रसिद्ध  कवि पूरण पन्त  बडी बीमारी से लड़णा छन पण उख देहरा दून  का इ साहित्यकार बौं हौड़ पड्या छन एकाध तै छोड़िक  क्वी साहित्यकार दगड्या पुछणो ग्याई इ नी छन.



  खैर भगवान चाओ बल कै तै बि बीमारी नि द्याओ.

 

 Copyright@ Bhishma Kukreti, 10/6/2012

Bhishma Kukreti

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चबोड़ -चखन्यौ

                               अहा !  हमारो विद्यार्थी जीवन ! 
 
 

                             भीष्म कुकरेती

 
 
    जब हम कॉलेज मा छ्या त हम असल मा कुछ सोचदा इ नि छ्या कि हम क्या क्या करणा छंवां, बुलणा छ्या. अब जब बुड्यान्द होश आई त कौलेज जोग नि छंवां.   

   अब जन कि क्लास हमकुणि धार्मिक अनुष्ठान जन कर्मकांड को क्वी गोरख-धंदा छयो बस विश्वास क बल पर कि क्लास से कुछ फैदा हूंद  हम क्लास मा जांदा छ्या.

  क्लास,  हमकुण डिग्री पाणै प्रोडक्सन फैक्ट्री छे बस. 


टेक्स्ट बुक या सन्दर्भ किताब की अहमियत तब पता चल्दी छे जब हम कै दगड्या मुंड पर खैड़ा क कटांग  जगा पर सन्दर्भ किताब से चोट मारदा छया कि किताब मा दम च. जै  किताब की चोट जथगा जादा होंदी छे वा किताब उथगा इ महत्वपूर्ण होंदी छे. उन  जादातर दगड्या बुल्दा छ्या कि टेक्स्ट बुक झौड़ा संगुळ या माख मारणो काम बि ठीक ढंग से करी लीन्दन . अर यार दोस्त बुल्दा छ्या कि कबि कबि मेज की क्वी टांग छ्वटि ह्व़े जाओ त द्वी चार टेक्स्ट बुक टिक्वा क काम बि ऐ सकदन


  टेक्स्ट बुक कतियूँक आदि बगत पर काम आँदी छे. जब बि सिनेमा दिखणो बान पैसा कि कमी होंद छे त बिचारा टेक्स्ट बुक ही बली क बुग्ठ्या  बणदा छ्या अर बुक सेलरूं  नफा बढान्द  छ्या. मी घुण्ड ठोकिक बोली सकुद वो सच्चो छात्र नि रै होलू  जैन सिनेमा क बान कबि अपणि   क्वी किताब नि बेचीं ह्वेली. अब का छात्र दारु पार्टी क बान अपण कम्प्यूटर बिचदन अर बुले जांद उ असली मोडर्न स्टुडेंट नी च जु दारु पार्टी क बान अपण बुबा क दियुं कम्प्यूटर नि ब्याचो. ऐथरै मुछ्यळि पैथर सरकदि इ च। टेक्स्ट  बुक अर शर्तिया पास हूणो  गाईडु  मा एकी फरक हुंद छौ कि टेक्स्ट बुक का कागज बढिया क्वालिटी क हूंदा छया अर किताब से जादा भार पुट्ठा क हूंद  छौ.


जब हम डिग्री कौलेज मा छ्या त हम रसायन शास्त्र या वनस्पति विज्ञान की खोजूं से जादा  शब्दकोश पर ध्यान दीन्दा छया किलैकि अंगरेजी मा लिखीं किताबु  मा अस्सी टका लिख्युं समज मा इ आन्द थौ,अर हरेक शब्द क बान अंगरेजी -हिंदी शब्दकोश  की मदद लीण पोड़द उन मार्केटिंग क डिप्लोमा लींद दै बि इनी ह्व़े मार्केटिंग की किताबुं से जादा अंगरेजी -हिंदी शब्दकोश  पर नजर होंदी छे अर यांक बान दुबर  पौकेट डिक्सनरी से लेकी  बडी बडी डिक्सनरी खरीदेन.

 
     कबि कबि क्या जादा तर हम एक प्रोफ़ेसर का लेकचर मा सीन्दा छया त दुसर प्रोफ़ेसर का लेकचर मा इलै बिजदा छया बल इंटरबल मा चाय-समोसा जि खाण छौ. संयुक्त परिवार मा जन हरेक व्यक्ति की पूछ नि होंदी उनि द्वी सौ छात्रों क्लास मा प्रोफ़ेसर तै पता इ नि चलदो छौ कि गुणी पढ़नेर छात्र सीणा छन कि पढाई का आनंद लीणा छन.

 
    मी तै नि पता छौ कि मी झूट  बुलण मा बि उस्ताद ह्व़े सकुद. प्रोफ़ेसर जब बि क्वी सवाल पुछ्दो छौ त मी क्वी ना क्वी झुटो बहाना बणै दीन्दो छौ अर बहाना बि इथगा तागतबर हुन्दो थौ कि  प्रोफ़ेसर बि सच मानि लीन्दो थौ. 

 मास्टर अर विश्व विद्यालय खुण स्टूडेंट की जरुरात से जादा महत्वपूर्ण सिलेबस हूंद छौ अर आज बि या इ संस्कृति विद्यमान च.


    एक साल मेरी सीट खिड़की क बगल मा छे त मीन वै साल गिलहरियूँ जीवन  पर पूरी रिसर्च करी दे. किलैकि सरा साल म्यार ध्यान प्रोफ़ेसर का लेकचरूं र से जादा भैरो  डाळु क  गिलहरियूँ जीवन चक्र  समजण मा गे.


 
       पास हूणो बान हम सरस्वती देवी से जादा नकल शास्त्र देवी क चरणो मा विश्वास करदा छ्या. हमर मानण छौ बल सरस्वती देवी हमारो ज्ञान जरुर बढाई सकद पण ज्ञान पास हूणो क्वी गारेंटी ना वैबरी दींदु छौ अर ना ही आज दीन्दो, भारत मा ज्ञान से जादा परीक्षा पास करण जरुरी हूंद त हम पढ़न्देर या स्टुडेंट सरस्वती देवी क मन्दिर छोड़िक नकल देवी क मन्दिर पूजा करणो  या मास कौपिंग चर्च मा मॉस  मा  भाग  लीन्दा  छ्या.   



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चबोड़ -चखन्यौ


                              इतियास अर भूगोल का बदौलत मी साइंस को विद्यार्थी बौण

 

                                               भीष्म कुकरेती

 

                   जनि मर्फी रेडिओ मा सेल्स विभाग मा मेरी नौकरी लग अर भैर घुमण मिस्योंउ त मर्फी रेडिओ बिचणेर (मर्फी डीलर)  मी तै पूछ्दा छ्या बल 'कुकरेती जी आपन बोटनी मा एम्.एस.सी कार त आप सेल्स लाइन मा किलै आवा?" या म्यरा जाण पछ्याणक वळा बी खौंळेक  पुछदा छा क्या अबि बि पुछ्दन ," अरे जब सेल्स मा इ आण थौ त कोलेजुं मा  किलै उथगा टेस्ट ट्यूब फ़ोडिन अर किलै बौण  बौण भटकि भटकिक  काई /सिंवळ (मीन एल्गी मा थीसिस लेखी छौ) कट्ठा कौरिक इथगा मेनत कार?' यूँ सब्यू मनण  च या छौ बल सेल्स मा केवल आर्ट या कौमर्स फैकल्टी का लोग ऐ सकदन विज्ञान वळु तै कै कौलेज या लैबोटरी रिसर्च मा इ दिन बिताण चयेंद.ह्व़े सकुद च इ लोग सही ह्वावन .पण इन नी च विज्ञान का विद्यार्थी सेल्स /विक्री विभाग मा ऐ जांद त वो सेल्स मा बि ऐनालिटीकल या विश्लेषणात्मक सोच त लान्दो इ च. अर हमर बगत पर फिलिप्स रेडिओ , ब्लू स्टार ए.सी वळा इंजिनयरूं तै सेल्स विभाग मा लीन्दा छ्या.


                     अर सबसे जादा सवाल त अब हून्दन कि मीन जब साहित्य मा इ आण छौ साइंस /विज्ञान किलै पौड़  ? या फिर मार्केटिंग मा ह्वेक मी गढवळी मा कनकै लेखी सकदु . सैत च मी अपण समौ पैलो साइंस ग्रेजुएट होलू जैन गढवळी जनि भाषा मा कथा लेखी हो! अब त कवि डा. नरेंद्र गौनियल, सुंदरियाल , गितांग  ओम बधानी जी, नाट्य शिल्पी सुरेन्द्र बलोदी आदि बि गढवळी साहित्य मा ऐ गेन पण  म्यरो समौ मा लोगूँ तै अचर्ज हुन्दो छौ बल साइंस वळ साहित्य लिखणु च. उन आज बि एक सास्वत सवाल लोक पूछी लीन्दन ,"कि मीन जब साहित्य मा इ आण छौ साइंस /विज्ञान किलै पौड़ ?".

 
                असल मा म्यरो साइंस या विज्ञानों विद्यार्थी हूणो पैथर इतिहास, भूगोल अर अंग्रेजी साहित्यों हात छ. जी हाँ आपन बि खौळयाण बल मी क्या बुलणु छौं? पण हमर बगत मा हमर गाँ मा जो  कौंसेलिंग सिस्टम छौ वैको हिसाब से मी साइंस को विद्यार्थी बौण.

 
                     मी तै इतिहास अर भूगोल पढ़ण  मा बड़ो मजा आन्द  छौ . अर अंग्रेजी सिखणो बड़ो उलार छौ. मी सेक्सपियर या जु बि कवि रै होला ऊंको जीवन चरित्र अर कविता  को अर्थ हगद-मुतद अर नयान्द  दै बि रटणो रौंद छौ. इतिहास-भूगोल मा रूचि अर अंगरेजी मा मेनत से म्यार दर्जा सात परीक्षा मा इथगा  नम्बर ऐन कि सरा गाँ मा   हल्ला ह्व़े गे अरे परीक्षा मा डिस्टिंक्सन  आओ त गाँ  मा हाम होणि छौ. अंग्रेजी अर इतियास-भूगोल मा नब्बे प्रतिशत से जादा नम्बर हूण से मी दर्जा सात मा  डिस्टिंक्सन  मा पास होऊ. हाँ साइंस मा म्यरा नम्बर चालीस या पैंतीस छ्या. हाँ गणित मा पचास से जादा नम्बर छ्या .अब जब मेरी ब्व़े न गाँ मा पास हुणै खुसी मा भिल्ली बंटवै  त हमारि ल्वारण बोडि याने मंगळेरि सुबदा बोडि दौडि दौडि आई अर गीतुं भौण मा मेरी बडै  करण मिसे गे. सुबदा बोडि मैत बिटेन मंगळेर छे त इख ल्वार खानदान मा आण पर बि सुबदा बोडि न मांगळ लगाण नि छोडि अर पूरी अडगै (क्षेत्र) मा मांगळ लगाणो जांदी छे अर दगड मा छूटी मुटि   चीज बि बेचीं लीन्दी छे जन कि काण्ड गडणो चिमटी आदि. त बीस पचीस गाँ वा बोडि घुमणि रौंदी छे. वीं सुबदा बोडिक एक  हौबी छे कि जु बि भैर नौकरी करदो ह्वाऊ वै तै पुछदी छे कि तुमन कथगा पौढ़? कख पौढ़? अर कनकै नौकरी लग/ अर जु भैर पढ़णा रौंदा छ्या वूं तै पुछदी छे कि तुम कख पढ़दा फीस  कथगा च , फीस माफ़ कन कै हुंदी/ आदि आदि . याँ से वा सुबदा बोडि एजुकेसन सिस्टम कि जणगरि या एक्सपर्ट ह्व़े ग्याई. ल्वारण या मंगळेर  हुणों बाद बि गाँ मा पढे  मामला म  वीं बोडिक पूछ छे। 

 
               जब वीं बोडिन  भिल्ली गुड़ कि एक डळि खाई अर चार डळि खुखलिउन्द धार त वीं बोडिंन एजुकेसन कौंसेलर कि भौण मा ब्वाल," ए भूलि ए भीसम तै ड्यारा डूण भिजण चयेंद. अब  द्यूरम पैसा त छें छन त यू भीसम ठाकुर सोळा तक त पौड़ल इ . जब येन मास्टर नि बणण त  दुगड किलै भिजण ? बस ड्यारा डूण भिजण अर सैंस पड़ाण.' फिर वा बोडि सरा गाँ मा घुमण मिस्याई कि हैंक साल भीसम  तै सैंस पढ़ाणो ड्यारा डूण इ भिजण ठीक रालो.  अर सात दर्जा कि परीक्षाफल आण  से लेकी म्यार आठ की परीक्षा तक वीं बोडिन गाँ का सयाणो अर जणगरों  तै कनविंस करी याल छौ या बिंगाई आल छौ बल  भीसम एक महान वैज्ञानिक बणण  लैक च अर वै तै ड्यारा डूण इ भिजण चयेंद.
 
  हमर इख गाँ मा  एक परिपाटी छे जु त दस पास कौरिक मास्टर बणण त सिलोगी इ ठीक छौ अर जु बारा पास कौरिक मास्टर बणण त वै तै दुगड्ड भिजे जांद छौ अर उख हमर गाँ का  हिरदेराम ददा जीक होटल छौ अर होटल मालिक से जादा वूको नाम गार्जियन का रूप मा छौ. त दुगड्ड जाण हो त हिरदै ददा जीक होटल मा रौण बाकी परेशानी हिरदै दादा जीक छे.


  जख तलक ड्यारा डूण को सवाल छौ त उख का बारा मा द्वी बात छे. या त डी.ए.ए वी. कौलेज या महंत जीक लक्ष्मण विद्यालय . अब चूँकि महंत जी हमर क्षेत्र का इ छ्या अर लक्ष्मण विद्यालय मा भौत सा मास्टर लोग बि हमर ज़िना का छ्या त हमर जिना का जादातर छात्र लक्ष्मण विद्यालय मा भर्ती हूंदा था.

   अब चूंकि  आठम बि इतियास, भूगोल अर अंग्रेजी मा नब्बे प्रतिशत से जादा नम्बर ऐ छ्या त मेरो महान वैज्ञानिक बणणो पूरा अवसर छ्या त मी तै ड्यारा डूण लक्ष्मण विद्यालय मा भर्ती करे गे. हाँ जब लक्ष्मण विद्यालय का प्रिंसिपल भग्यान रण जीत सिंग नेगी जी (यि बणवस उदयपुर  का छ्या ) न म्यरो दर्जा आठ की  मार्क शीट द्याख त  ब्वाल  बल ," तुमे तो आर्ट में भर्ती होंना चाहिए. साइंस में तो  तुम कमजोर लगते हो"

 पण चूंकि म्यार गाँ वळु इच्छा , गाणि , स्याणि मी तै महान वैज्ञानिक बणाणै  छौ 
 
  त मी तै साइन्स फैकल्टी   मा इ दाखिल करे गे।

 

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घपरोळ
                                                          च छ थौ

 

                                   भीष्म कुकरेती



[यह लेख गढ़ ऐना १३ अप्रैल १९८९ व धाद, जुलाई १९९० में प्रकाशित हुआ था. इस लेख ने कई चर्चाओं को जन्म दे दियाथा )



छ--- हाँ ! त !

थौ---हाँ -हाँ त

च----हाँ ! हाँ भै हाँ !

छ- त ठीक ?

थौ- बिलकुल ठीक !

च-- भै अब रयुं बि क्या ?

छ- लगै द्यूं पवाण (शुरुवात करना ) ?

थौ--- हाँ आपी पवाण लगावा .

च--- भै आप लगैल या आप लगैल क्या फरक पड़दु ?

छ- हाँ त मै सणि ब्वाळि गढवळि का खांमांखां मिलि छौ .

थौ-- छौ ना थौ ब्वालो

च-- अर मै तै थौ से छौं च '

छ गौ मांस समान च .

छ- अर मै पर च से दमळ उपड़ी जान्दन.

थौ से मेरी द्वी कुली खाण बिसे जान्दन

थौ --अर मी च दिखुद त चक्कर आन्दन .

अर छौ सूणीक छरका लगि जान्दन

च- म्यार चुसणा  से .मीन त च इ बुलण

छ- चुसणा त तुम दुयूं तै चुसण पोडल. जब मी तर्क अर वितर्क से बतौल कि असली गढवळि 'छ' छ.

सिरीनग्र्या छ , अर गढवाळ को केंद्र श्रीनगर छौ.

थौ -तुम द्वी कुवा मिंढक छवां . गढ़वाळै आख़री राजधानी टिहरी थै.

च- अरे रै होल्या राजधानी श्रीनगर या टीरी . हमर अडगै (इलाका) से त फार (दूर ) इ छया.हम फर कैकु बि रौब दाब नि छयो. हमकुण त नामो क राजधानी ...

छ- अबै प्रभाव की बात जाणि दे . राजधानी त राजधानी होंद.

थौ- टीरी थै राजधानी.

च- कखि बि छे हम से त फार इ छे राजधानी .

छ- निर्भागी ! हमारो क्या दोष कि तुमर इलाका से दूर छै राजधानी?

थौ- दुर्जनों ! मै बि त ई इ बखणु थौ अबि तलक .

च-- ये दांत तोड़ी द्योलू हाँ मि

छ- आँख फोड़ी द्योलू हाँ मि

थौ- नकद्वड़ फोड़ी द्योलू हाँ मि .

गढवळि-- ए दगड्यो ! किलै लड़णा छंवां ? किलै बौळयाणा छवां ?

च- गढवळि भाषौ माणापाथिकरण मतबल मानकीकरण की मीटिंग च आज

छ- हाँ ! जब तलक माणापाथिकरण नि होलू बात अगनै कनै बढ़लि !

थौ- हाँ याँ पर मी बि सहमत छौं बगैर स्टैंडर्डा इजेसन क गढवाली लिखे इ नि जाण चयेंद. बगैर मानकीकरण से बडी परेशानी होलि

च- हाँ हाँ बगैर माणापाथिकरण कु गढवळि भाषौ विकास हूँ मुश्किल च

छ- सै बात छ.

थौ- एक दम सै

गढवळि-- अच्छा च कु मतलब ?

छ- सलाणि छ जगा फर च लगांदन कबि कबि, कखि क खि

थौ- च माने छ

गढवळि-- थौ माने ?

च- थौ माने छौ

छ- छ कु भूतकाल थौ ...

गढवळि--त लडै किलै?

सब्बि - अर लडै ? माणापथिकरण नि होलू त भाषा कन कैक होलि ? पैल मानकीकरण हूण चयेंद. तब गढवाली मा लिखेण चयेंद.

गढवळि-- ठीक ! त इन बतावा बल तुमन अब तलक कथगा ल्याख अर क्या ल्याख ?

च- अरे ! लिखणा क मी तै जरुरत इ क्या च? लेखिक हूंद क्या च ?

छ : जु हम लिखदा इ त बहस किलै करण छौ? बहसौ कुणि टैम कख हूण छौ ?अर लेखिक क्वी मै तै तगमा थुका मीलल ?

थौ- लेखिक मीन अपण टाईमो बर्बादी करण ? अर लिखन कख ? क्वी ना त अखबार, ना क्वी माध्यम अर ना इ क्वी बंचनेरुं क्वी ढब अर ना पाठ्कुं क्वी बिज्वाड़!

गढवळि-- औ ! त जरा इन बथावदी कि तुम करदा क्या क्या छवां ?

च- मि लगीँ पौद तै उपाड़िक फुंड भेळ चुलांदु

छ- मि , क्वी सीदो बाटो जाणो ह्वाऊ त मि वै तै भेळ उन्द धकल्याणो काम करदु.

थौ- लोगूँ कि पकीं फसल देखिक म्यरा अंदड़ म्वाट ह्व़े जान्दन . मि पकीं फसल पर बणांक लगान्दु .

गढवळि-- औ त गाडौ हाल इ छन. जावा पैल अपण अपण इलाका क बोल्युं मा खूब ल्याखो तब माणापथिकरण/मानकीकरण /स्टैंडर्डाइजेसन की छ्वीं लगाओ. भैंस गैबण ह्वाई नी च अर छ्वीं लगणा छन बल प्यूंस कै भद्वल पर बौणल!





                                                  -नोट-

१-इस लेख के विरुद्ध में श्री भगवती प्रसाद नौटियाल जी ने धाद , ओक्टोबर १९९० में 'पुरु दिदा ' नाम से व्यंग्य किया था बकौल डा अनिल डबराल," भगवती प्रसाद नौटियाल का व्यंग्य 'पुरु दिदा' प्रकाशित हुआ जिसमे पुरू नामक पत्र के माध्यम से भीष्म कुकरेती का उपहास किया गया-- जै कु नौ त भीसम जन बुल्यो भीसम पितामह को ओउतार हो पर काम देखा दों - कुल लड्योण्या छ्वीं ! अरे छोरा पैलि खै त ळी तब बाँध कुटरि. लेख्दी दां त बौंहड़ पडया रौंदन अर छ्वीं हो नी छन मानकीकरण की...

डा. अनिल लिखते हैं कि भगवती प्रसाद ने भीष्म कुकरेती को इस तरह नोचा लेकिन भीष्म कुकरेती ने 'घपरोळ' स्तम्भ के 'च छ थौ' शीर्षक में यह बात यूँ कही थी"

च - मि लगीँ पौद तै उपाड़िक फुंड भेळ चुलांदु
छ- मि , क्वी सीदो बाटो जाणो ह्वाऊ त मि वै तै भेळ उन्द धकल्याणो काम करदु.

थौ- लोगूँ कि पकीं फसल देखिक म्यरा अंदड़ म्वाट ह्व़े जान्दन . मि पकीं फसल पर बणांक लगान्दु .

२- धाद में फिर इस विषय पर अबोध जी, बाबुलकर, देवेन्द्र जोशी जी व लोकेश जी कि लम्बी बहसे हुईं अंत में लोकेश जी ने खा - बन्द क्रा मानकीकरण कि छ्वीं .

३- गढ़ ऐना में श्री अबोध बहुगुणा , श्री राजेन्द्र जुयाल व डा. भगवती प्रसाद जी कि बहस हुयी थी.

सन्दर्भ - डा अनिल डबराल - गढ़वाली गद्य परम्परा , २००७


Copyright@ Bhishma Kukreti 28/6/2012

Bhishma Kukreti

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                    I and my village were lucky: a satire

                                    Bhishma Kukreti
(Satirical articles on rural development works; satirical articles on agriculture development; satirical articles on education system, satirical articles on government program for animal husbandry; satirical articles on village development hills of Garhwal ; satirical articles on development of  hills of Salan; satirical articles on development of Gangasalan; satirical articles on development of hills of Uttarakhand; satirical articles on development of Dhangu block; satirical articles on development of Dhangu Patti; satirical articles on development of Malla Dhangu)
                 My wife asked me to write about positive things around me and not to bark as television journalists and editors who are showing only negative happenings in India. As faithful husband (my friends say I am Bibi ka Gulam) I obeyed her.
              Now I am writing that I am lucky. I and my basic school were lucky that education department posted tens of children books in English language. On that time my village was not lucky having English knowing villagers including our teachers. Our school was lucky for having such intelligent headmaster. As soon as English books reached to school, my headmaster observed that no villager including a he and another teacher could read these English books he decided to sell these books to a tea stall wala. In return, tea stall wala sent Pakodas twice a day for seven days to the houses of our two teachers. The family members of teachers were lucky having Pakodas on daily basis for seven days. I was lucky too. I stole two story books in English while taking from school to tea stall wala. For many years, those books were lucky to be my properties as I was unable to understand those stories in English language. Later on my younger brother was lucky to get tea and Pakoda by selling those books to tea stall wala. 
    Our hilly village was lucky that we had a kind hearted Gram sevak. Our hilly village was lucky that Gram Sevak fought for our hilly village and got sanction from village development department two iron Western Ploughs weighing more than half a ton each for our hilly village. It was bad luck of poor Sudama farmer who tried to plough hilly field by one of western ploughs. His one of old bulls died pulling the iron plough that was stuck deep in a rocky area of field. Our villagers are not ungrateful to any government. The same plough is still there stuck in the field of Sudama farmer and is witness that Lucknow government was taking interest about agricultural development in rural hills of Garhwal. Since, Gram pradhans are changing every five years and no Gram Pradhan was ready to keep heavy iron western plough at their courtyards therefore, another heavy western plough is kept on the road of village entry to show our thanksgiving attitude that Uttar Pradesh government was conscious for agriculture development of rural hills of Garhwal.
     When Chaudhari Charan Singh Ji was chief minister of Uttar Pradesh our village was again lucky. Chaudhri ji was very much concern about animal husbandry development in hills of Garhwal. He dispatched male buffalos from Merut area to villages of Garhwal. People of Meerut were lucky that they got money be selling their unwanted male buffalos to Uttar Pradesh government. Villages of hills of Garhwal were lucky that they got free the giant male buffalo for breeding purpose that the coming buffalo generation would be Haryana buffalo generation. 
            The female buffalos were not lucky to have such giant male buffalo fellow as their companion. The female buffalos were scared of such big buffalo and they used to run away just seeing the big buffalo. Therefore, no body including village chief was ready to keep the buffalo in village. The Haryanvi buffalo was not lucky or competent enough to walk a centimeter on the hilly path of forest. Therefore, the gifted buffalo died after three four months. Our villagers are always grateful for others who help them. We call Bhains ko Pathar/Buffalo stone where the great buffalo died and that place is reminder that Uttar Pradesh government was conscious about developing agriculture, horticulture and animal husbandry in hills of Garhwal.  Uttar Pradesh government was lucky to have such villages those still regard the works of government. 
 There were other purposeful development works in my village and I shall be posting you about such great works by Uttar Pradesh and Uttarakhand governments for our lucky village.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 1/7/2012
Satirical articles on rural development works; satirical articles on agriculture development; satirical articles on education system, satirical articles on government program for animal husbandry; satirical articles on village development in hills of Garhwal ; satirical articles on development of  hills of Salan; satirical articles on development of Gangasalan; satirical articles on development of hills of Uttarakhand; satirical articles on development of Dhangu block; satirical articles on development of Dhangu Patti; satirical articles on development of Malla Dhangu to be continued….

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चबोड़ इ चबोड़ मा                    

                  मानसूनअ दगड मुखसौड़


                       भीष्म कुकरेती


            ब्याळि गौं मा छौ. अब अबि मि कैमरा सैवी नि ह्व़े सौकु जब कि अच्काल जु बि गाँ जांद वु गढवाळ बिटेन पैलाक तरां तोर, चून, गैहथ त कुछ लांद नी च पण कुछ फोटो लै आन्दन जन कि मेरा पहाड़ का मेहता जी बागेश्वर कि फोटो लैन अर फेस बुक मा इन दिखाणा छन जन बुल्यां ड़्यार बिटेन मेखुण चूडा, जख्या, भंगुल लयां ह्वावन धौं !

      सुचणु छौ कि फेस बुक मा क्या दिखौलू ? गाँ जाओ अर कुछ नि दिखाओ त फेस बुक मा फेस दिखाण लैक नि रै सक्यांद . भलु ह्वाई जु उख मै तै एक कतर मानसूनौ मिलि गे.फेस बोक मा फेस दिखांण लैक त कुछ ना कुछ मीली गे छौ.

         मीन मानसून तै पूछ- हे मानसून कख छयाई रै तु ?'

मानसून न ब्वाल," मि पत्रकारूं मुख नि लगण चांदु. टीवी मा द्याख च क्या क्या बखणा रौंदन - हत्यारा-मानसून , बेरहम मानसून , मानसून की मार ... सूखा .. जन बुल्यां मि यूँ पत्रकारूं नौकर छौं धौं या क्वी नेता हों धौं कि यूं पत्रकारूं बुल्यु मानि ल्यों.पैलक पत्रकार मनुष्य धर्मी छ्या अब त टी. आर. पी. बढ़ाओ , सरकुलेसन बढ़ाओ धर्मी ह्व़े गेन इ पत्रकार '

मीन ब्वाल," मि पत्रकार नि छौं. अर उन बि गढ़वाली लिख्वार जब मुलायम सिंग तै हत्यारा नि बथान्दन त मानसून तै क्या गाळि द्याला!"

" ओ तु गढवाळि लिख्वार छेई ? फिर क्वी फिकर नी च। तीन इ लिखण अर तीन इ बंचण . चल सवाल पूछ. म्यार थ्वडा टैम पास ह्व़े जालु" मानसून कु बुलण छौ.

बुरु त भौत लग पण अब त इन कटाक्ष का शब्द सुणणो ढब पोडि गे.

मीन पूछ," अब तक कख छौ भै ?"

मानसूनो बुलण छौ," कनो कख छौ. इन बोदी कख नि छौ ! जरा सि मीन केरल मा पाणी बुरक , फिर थ्वडा थ्वडा महाराष्ट्र, गुजरात, अर थ्वडा सि बंगाल ज़िना पाणि बुरकाणु छौ.'

मीन मानसून तै बताई ,"अरे इना उना खूब घुमणु रै अर इख गढ़वाल मा किलै नि ऐ .इख गढवाल का गां मा लोक तेरी कथगा जग्वाळ करणा छन. "

मानसून न रुसेक ब्वाल,"' देख हाँ त्वे तै इन पुछणो क्वी अधिकार नी च हाँ. तू त इन पुछणु छे जन बुल्यां तू क्वी बी.बी.सी क रिपोर्टर ह्वेलि ."

मीन सुरक सुरक ब्वाल,' भै इख गढ़वाळ मा गढवळी बि त त्यार प्रेमी छन कि ना ?"

. "अर फिर गढवाळ का गाऊं तै मेरी क्या जरुरत ? अब जब इ लोग ना त मुंगरी बूंदन, ना कोदा-झंगवर बूंदन ना इ क्वी दाळ कि खेती करदन त यूँ गढ़वाळयूँ ले मेरी क्या जरुरात भै?" मानसून को रूखो उत्तर छौ

मीन ब्वाल,' भै पिछ्ला पांच हजार साल से तू ये बगत तलक गढ़वाळ मा खूब पाणि बरखै दीन्दो छौ . ठीक च गढ़वाळयूँ तै खेती क बान पाणि क जरुरात नी होली. पण त्वे तै भेमाता/भगवानो बणयाँ नियम धियम कु त ख़याल करण चयांद कि ना ?"

मानसून क बादल जोर से गड़गडैन ,' तुम मनिख बि ना ! बडी चालु चीज छंवां. अफु त तुम मनिख भगवानो बणयाँ सौब नियम धियम तोड़णा छंवां अर में मानसून से उम्मीद करदवां कि मि भेमाता बणयाँ नियमु पालन कौरु. हौरू तै अड़ाण पण अफु कुछ नि करण . वाह! "

मीन करूण रसीली भौण मा ब्वाल,'' ह्यां इख बि त पीणो पाणि जरुरात च अर फिर रूडि क गरमी से कथगा बुरा हाल छन."

' अरे इखमा क्या च . मि नि बर्खलु त तुमर गाँ वळु मजा ऐ जाला।" मानसून न इन भौणम ब्वाल जन क्वी जासूस क्वी रहस्य क सूत भेद खुलणु ह्वाउ

मीन पूछ, ' क्या बुनू छे भै तु? अरे अबरखौ मा इख गाँव वळु आफत ऐ जाली . तिसा मोरी जाला म्यार गाँ वळ अर तु बुलणि छे बल गाँ वळु मजा ऐ जाला"

मानसून को बथाण छौ," अब क्वी तिसा नि मोरी सकुद. इख अबरखौ क्षेत्र घोषित ह्वाई ना कि उना मुख्यमंत्री सहयोग , प्रधान मंत्री योगदान अर यूनेस्को कि इमदाद का पैंसा ऐ जाला . कथ्युंक त जन ठेकेदार,मंत्री , संत्र्यु सब्युंक घौर रुप्यौनं दबल-चंगेरी भोरे जाला"

मीन ब्वाल," ह्यां इथगा बि निर्दयी नि बणण चएंद हाँ ! "

मानसूनो उत्तर छौ," अरे इख बरखदु त उख शहरू नजीक तालाब खाली रै जाला ."

मीन बताई," पण मुंबई अर पूना मीन फोन लगाई त लोग बुलणा छन बल उख बि तु पाणी नि बरखाणि छे ."

मानसून रूण बिस्याई," अरे उख कन कैकी बरखूं ? वातावरण इथगा गरम च कि म्यार बादल कंडेंस इ नि ह्व़े सकणा छन. बदळ सळाणा इ नि छन . मी उना बरखणो इ जान्दो छौं अर अपण सि मुक लेकी इना उना रिटण बिसे जांदू ."

मिन बोली," त फिर इना गढवाळ मा इ ल़े बरखी जादी !"

मानसून हौर जोर से बगैर अंसदर्युं रुण बिसे ग्याई ," इख बि त बिजोग पड्यु च. अबि रुड्यु मा ज्वा बणाक लगी वां से वातवरण गरम च अर बादलूं तै सळाणो मौका इख बि नि मिलणो च."

मीन पूछ," त अब क्या होलू ?"

मानसून को फड़कुल/कैड़ो /करारा जबाब छौ," जन बुतिल्या तन इ काटिल्या."

 



Copyright@ Bhishma Kukreti 2/7/2012

 

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