Author Topic: Satire on various Social Issues - सामाजिक एवं विकास के मुद्दे और हास्य व्यंग्य  (Read 144824 times)

Bhishma Kukreti

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चबोड़ इ चबोड़ मा

 

                                     घुघती दगड मुखाभेंट
 
 
                                           भीष्म कुकरेती

 

                मि ड़्यार गाँ जाणु छौ त मेरा पाहड डौट  कौम का मेहता जीन बोली बल - भीषम जी तुम गाँ जाणा छंवां त जरा घुघती क इंटरव्यू लेक  ऐ जैन . घुघती इज इन डेंजर..
 
मीन पूछ - घुघती दगड  इंटरव्यू ? कै छौंद  सात बेटों इखुली बुड्या या पांच लड़क्वळि इखुली बुडड़ी इंटरव्यू क बात ह्वाओ त क्वी बांचल बि !
 
मेहता जीन ब्वाल, "ना ! ना ! अच्काल कै उत्तराखंडी नेट सर्चर तै  इकुलास कटद बूड बुड्यों मा क्वी इंटरेस्ट नी च. ऐना मा अपण बदसूरत अर भौंडी  सूरत देखिक अब सौब तै डौर लगद . अच्काल त उत्तराखंडी नेट सर्चर नेट मा "लुप्त होती गौरया, लुप्त होते हल, लुप्त होते निसुड़ी, लुप्त होते ओखली  "  जन शीर्षकक  लुफ्त उठान्दन .
 
मीन ब्वाल," त मि लुप्त होती संस्कृति पर इ  कुछ माल मसाला लयांदु !"

           मेहता जीन सूत भेद  ख्वाल," न्है ! न्है  ! भै लुप्त होती संस्कृति बि त  हमारो आइना च अर अब मै तैं बि अपण कनफणि सि  सूरत ऐना मा दिखण मा शरम लगद   ......"
 
त  मेहता  जीक  बुल्युं मानणो वजै  से मि अपण ड़्यारम   तीन दिन तलक  घुघती क बाटो जग्वाळणु  रौं. जब  मि छ्वटु थौ  त  घाम आई ना कि घुघती चौक अर सग्वड़ मा घुरण मिसे जांदी छे. पण तीन दिन तलक घुघती नि दिखे. आज सुबेर त ना पण घाम आणों कुछ देर बाद म्यार चौक मा घुघती घूर .
 
मीन घुघती तै पूछ, ए घुघती ! कख जयीं छे  तू ? पैल त हमर चौक मा घुघत्यूँ पिपड़कारो रौंद छौ . तीन दिन बिटेन जग्वाळणु छौ कि तू ऐली "

घुघती न पूछ ," वाह !  तुम त चालीस साल बाद ड़्यार आवो अर हम इख तुमर बान भुकी मोरी जवां है? निठुर मनिख !'
 
मीन ब्वाल," भुकि  किलै? इख दिखदि हमर चौक मा , सग्वड़ मा  कथगा घास च जम्युं . घासौ बीज अर कीड मक्वड़  कम  छन इख? "

" हम घासौ  बीज नि खांदा.  हम घुघती छंवां ना कि मनिख कि जु हमकुण नि बणयू ह्वाओ वै तै बि खै जवां !" घुघती न करकरो ह्वेक जबाब दे
 
मीन पूछ," जन कि  ?"

" जन कि क्या! भेमाता ब्वालो भगवान ब्वालो न मनिखों  कु न मांस मछी, ग्यूं  , चौंळ,  जौ इ ना तमाखू बि न बणयूँ छौ पण तुम मनिख इ सौब खाणा छंवां. हम घुघती तुम मनिखों तरां नि छंवां .हम केवल पहाडो मा जख मनिख रौंदन उखम का बीज या उखाक कीड़ा खांदवां " घुघती न बिंगाई

मीन ब्वाल, "ओ त या बात च !"

" ह्यां तू मेरी जगवाळ किलै छै करणु ? वु त मि पली गौं मा छयाई अर कुज्याण कथगा सालों  मा ए  गां बिटेन  मनिखों गंध आई त मी इनै ऐ ग्यों. बोल में से क्या काम  च ?  "घुघती न पूछ

मीन पूछ," ह्यां मीन सूण बल तुम घुघत्यूँ  जात अब लुप्त होणि च. सै च या बात?"

," मी इथगा त नि जाणदो कि हम घुघती लुप्त होणा छंवां कि ना पण मी इथगा जरुर जाणदो कि गढवाळ का गौं खाली ह्व़े गेन, मनिख नि छन इख,  अर याँ से हम खुणि खाणक नि रै गे."घुघती न समजाई
 
मीन बताई," पण पर्यावरणवादी  जन कि हेमंत ध्यानी, देवेन्द्र कैंथोला , अमरनाथ कान्त, जे.पी. डबराल  जन विद्वान त इनी  लिखणा छन कि घुघती क जात लुप्त होणि च."

" अच्छा !  पर्यावरणवादी बुलणा छन त जरोर हमारि जात खतम होणि इ होली." घुघती न बोलि.
 
मीन बताई," हाँ ! हाँ ! यि सौब लिखणा छन बल घुघती जात खात्मा के कगार पर है . यूँ विद्वानु  लेख अमेरिका क समाचार पत्र अर लाइफ , टाइम, नेचर  जन बडी मैगजीनू  मा छपद."

" हाँ उन त कानो कान मीन बि सूण छौ बल डिल्ली, मुंबई अर कानाडा का कुछ पहाड़ी ''घुघती को लुप्त होने से बचाओ'' क बारा मा भौत फिकरबंद छन अर उख परदेस मा भौत सा काम करणा छन.इन बि सुण्याण मा आइ कि मुंबई मा 'घुघती बचाओ' नामो एक एन.जी.ओ बि खुल्युं च  "
 
मीन उत्साह मा ब्वाल," देखी लि घुघती त्यारा बाना  इ प्रवासी विद्वान् कथगा परशान छना"

" तुम मनुष्य कहीं के ! बड़े चालु हो . खुद इ आग लगाते हो और खुद इ आग की परेशानी  पर भाषण भी पेलते  हो . मनुष्य कहीं के "   घुघती करैंक भौण मा किराई 
 
मीन घंगतोळ मा ब्वाल," मतबल!"

' पैल तुम पहाड़ी गाँव छुड़दां  अर फिर रूणा छंवां  कि घुघती लुप्त होणि च. अरे मेरी इथगा इ जादा चिंता छे त तुमन गाँव छोडि किलै च भै ? प्रवासी पहाड़ी कहीं के " अर घुघती फुर्र  से उड़ी गे

 

 Copyright@ Bhishma Kukreti , 3/7/2012

Bhishma Kukreti

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चबोड़ इ चबोड़ मा

 

                               पौड़ी म पाणि टापि टापि

                                          भीष्म कुकरेती

 

           मै पता नि लग बल पौड़ी मा पाणि अ इथगा टापि हुईं  च. सुबेर बिटेन अपण पाँच रिसेतेदारू पौण बणिक  बि पता नि चौल कि  पौड़ी निपाणि  डाँडो ह्व़े ग्याई.
 
सुबेर जब बस अड्डा बिटेन उकाळ चौढ़ी पस्बोला जी इ ड़्यार ग्यों त ऊन म्यार स्वागत  डब्बा बन्द मौसम्बी रस से कार इनी भुला प्रेम सिंग क इख मेरो स्वागत मिल्क डेयरी चोकलेट से ह्व़े.  यार पन्ना क इख आदिर खातिर मा बि डब्बा बन्द नारंगी रस थौ. मीन बि सोची याल छौ कि मुंबई जैक अपण स्टैण्डर्ड  बढाण  पोडल  अर पौणु  स्वागत पाणि से ना  फ्रूट जूस से करण पोडल. मीन लंच अपण स्याळो स्याळअ  स्याळ (त रिश्ता मा स्याळ इ ह्व़े कि ना !) क इख खाई अर मी पौड़ी क स्टैण्डर्ड मा इथगा परिवर्तन देखिक चकरे ग्यों.प्रथम स्वागत बि बियर से अर आन्द दै बि बियर !  इख मुंबई मा बि म्यार दगड्या  छन पण इथगा बियर पिलंदर  क्वी नी च . खाणो मा भुन्यु मटन अर बिरयानी , दही अर पाणि जगा बियर अर हथ धूणो केवल बनि बनि क नेपकिन अर तौलिया. मी तै शरम लग कि मी मुंबई मा रैक अबि तलक गढ़वळि इ रै ग्यों अर म्यार स्याळो स्याळअ स्याळ गढवाळ क पौड़ी मा बि जर्मनी से अग्वाड़ी बढ़ी गे. हमर इख उ उथगा बड़ो  मौडर्न माने जांद  जु जथगा खुले आम शराब परोसद. इख त म्यार म्यार स्याळो स्याळअ स्याळ क बेटी बियर बोतल खोलिक मै तै सर्व करणि छे. या इ त अल्ट्रा मौडर्न  कल्चरो  निसाणि च.
 
  उ त स्याम दै पता चौल कि फ्रूट जूस दीण या पाणि जगा बियर सर्व करण क्वी हौर कारणो से छौ. मौडर्निटी से दूरौ सम्बन्ध नि छौ.

स्याम दै वीरेन्द्र पंवारौ किताब 'बीं' प्रकाशन क खुसि मा एक पार्टी छे त उख पता चौल कि अचाणचक पौड़ी वाल इथगा अल्ट्रा मॉडर्न ह्व़े गेन.हिन्दुस्तान मा पार्टी माने दारु  -सारु , शराब -उराब. बगैर शराबौ खाणक पीणक तै पार्टी ना जीमण बोले जांद . चूंकि इख शराब उराब बि छे त या पार्टी छे.

स्वागत भाषण नरेंद्र कठैत जीक का जिम्मा छौ त ऊन स्वागत भाषण कि जगा पौड़ी म्युनिस्पल कोर्पोरेसन कमिसनरो  SMS पौड़ीक सुणाइ कि मानसूनौ देर से आण से पौड़ी मा अगला दस दिन  तलक पाणि नि आलो.  एक व्यंगकार जैन पाणी पर खंडकाव्य लेखी हो त वैक मुखन याँ से बढिया स्वागत भाषण ह्वेई नि सकद.
 
मीन पूछ बल वीरेंद्र जी कख छन त बताये गे कि बस आण इ वाळ छन .

दारु क टेबल मा दारु अर बियर बोतल अर गिलास धर्याँ छा.

मिन बार टेंडर कुणि ब्वाल," रम विद वाटर !"
 
बार टेंडर न अळग छत जिना नजर घुमै दे.

मीन दुबर ब्वाल," चलो रम नि ह्वाओ त व्हिस्की विद वाटर"

बार टेंडर अब तौळ दिखण मिसे गे.मीन ब्वाल," चलो व्हिस्की नी च त जिन पाणि दगड "
 
बार टेंडर भ्युं बैठी गे अर इथगा मा बी. मोहन नेगी जी दौड़ी दौड़ी क सि ऐन , बियर गिलासुन्द भौर अर फिर पीण दै ऊन ब्वाल,," कुकरेती जी ! यार क्या करणा छंवां. शराब कु मजा त कोकटेल मा इ हूंद."

 मि घंघणे ग्यों बस बेसुध हूण बाकी थौ.जु बी. मोहन नेगी जी शराब त छ्वाड़ो कोक पेप्सी बि नि चखदन वो बियर पीणा छन !

म्यार पुछण से पैलि नेगी जीन बोली," कुकरेती जी आप व्हिस्की, रम , जिन जु ब्वालो ओ पी सकदन पण आप तै व्हिस्की मा पाणी जगा बियर मिलाण  पोडल. आप नीट बि पे सकदन . बट नो वाटर प्लीज! इख पाणि अकाळ पड्यु च "
 
औ म्यार भुभरड़ ! त या बात च . पौड़ी मा पाणि टापि टापि च अर मी समजणो छौ कि पौड़ी वळा अल्ट्रा मौडर्न  ह्व़े गेन .

मीन ब्वाल,' व्हिस्की विद स्टोंग बियर" अर म्यार  इन बुलण छौ कि बैरा क मुख पर पाणी ऐ गे. वैन व्हिस्की विद स्ट्रौंग बियर तैयार कार.
 
मीन बी.मोहन  जी तै पूछ, "भै !भुला वीरेंद्र कख च"

नेगी जीन उत्तर दे, " बस आण इ वाळ छन '

मी गिलास लेकी पौणु खबर सार पुछणो हौल मा घुमण मिसे ग्यों .

उख एक एक्स-मिलिटरी क कप्तान साब बि छ्या ऊन बोली," भै ! यू पौड़ी त जैसलमेर अर बाड़मेर से बि फंड ह्व़े गे. वन्स अपौन ए टाइम आइ वज पोस्टेड इन जैसलमेर ...."  मै तै बळु से क्वी लगाव नी च त मि दुसर पौणो ध्वार् चलि ग्यों ।
 
गणेश गणी जी बुलणा छ्या," मी त रोज सुबेर उठिक मोटर साइकल से श्रीनगर जान्दो उख अलकनंदा मा नयान्दो अर अपण परिवारों बान एक कन्टर पाणी लेक ऐ जान्दो . काम चली जान्दो"

गणेश जी से इ पता चौल बल पौड़ी मा वाटर टैंकर लाण पर बैन (मनाही)  लग्युं च. वाटर टैंकर आन्द अर लोग बाग़  तलवार, कुलाड़ी, दाथड़ी  लेकी पाणी लुठणो ऐ जान्दन. जैमा जथगा बड़ा हथियार वी पाणी लूठिक ली जांद

मीन गणेश गणी जी तै पूछ बल वीरेंद्र जी कख छन त ऊंको बि उत्तर छौ बल --पंवार जी बस आण इ वाळ छन

एल.एम् कोठियाल जी त्रिभुवन उनियाल जी तै  पौड़ी क इतिहास सुणाणा छ्या बल पौड़ी कि स्थापना सन १८४० क करीब ह्व़े अर तै दिन बिटेन इ पौड़ी मा पाणि  कमी महसूस ह्व़े गे छौ

पौड़ी  इतिहास सुणण वाळ गढ़वाली व्यंग्यकार त्रिभुवन उनियाल जीन   कोठियाल जी मा अपण दुखड़ा सुणाइ,"  यार आप त जाणदा छन.  हम बगैर नौकरों रै इ नि सकदां  अर नौकर पाणि चोरी गीजि गेन. बस अब हमन नौकर रखण बन्द कौरी आलिन.ड़्यार बिटेन बौ तै बि भटे सकदा छा पण एक मनिखौ  कुण एक्स्ट्रा पाणि  इंतजाम कु कारो . बस अच्काल मै तै इ रसोई, बणाण पड़द"

खबर सार का विमल नेगी जीन जोरै धाई लगाई," अबि अबि पौड़ी क डी.एम को SMS आइ कि क्वी बि अखबार पौड़ी इ ना गढ़वाल मा पाणि कमी बारा मा क्वी खबर नि छपी सकदो . अर मीन आजि 'खबर सार ' को ताजा अंक  छपाई अर पौड़ी मा पाणि त्राहिमाम पर इ सरा अखबार केन्द्रित छौ." अर फिर विमल नेगी जी अखाबार इ पड़ण  लगी गेन

सौब विमल जी छोडि बार टेबलों तरफ आइ गेन.

मीन उखम डा. विनय डबराल जी तै पूछ , यार जैकी पार्टी छे उ घराती कख च भै?"

विनय डबराल जीन त जबाब नि दे किलैकी  ऊंक मूक पुटुक टंगड़ी  कबाब छौ

त इतिहासकार डा. यशवंत कटोच जीन  मी तै चखणा (मंचिंग)  ब्वालो या डिन्नर टेबलों तरफ लिजांद लिजांद बताई बल बस वीरेन्द्र जी आण इ वाळ छन.

डिन्नर टेबल की जुमेवारी श्रीनगर बटे अयाँ संदीप रावत जी की छे. डिनर टेबल मा सौब खाणा  सूखो छौ जन कि बनि बनि क वेज-नोन वेज तंदूरी कबाब, तंदूरी मुर्गा, भुनी मुंगरी आदि  आदि.एक बि रसा वळो साग नि छौ. सौब सूखो चखणा  या  खाणो मजा लीणा छ्या अर पाणी जगा बियर घटकाणा छ्या. हथ पुंजणो खूब नेपकिन छ्या.

पौड़ी नगर का इतिहासकार कोठियाल जी  न  सांख्यकी क  पोथी से बताई बल आज  नेपकिन की खपत या  'पर कैपिटा कंजम्पसन' का मामला मा दुनिया मा पौड़ी शहर सबसे अळग च.  अमेरीकी कम्पनी देहरादून या उधम सिंग नगर मा फक्ट्री डाळण वाळ च .

घन्ना भाई जी न बथाई  बल यि नेपकिन कम्पनी वळा पाइलेट बाबा से यग्य कराणा छन कि इना मानसून नि आओ.

इथगा मा घ्याळ ह्वाई कि वीरेन्द्र जी ऐ गेन ! वीरेन्द्र जी ऐ गेन !

मीन द्वार ज़िना  द्याख कि वीरेन्द्र पंवार जी अर अर नरेंद्र सिंग नेगी जी भितर आणा छ्या.

वीरेन्द्र जीक हथुं  मा एक द्वी लीटर की परोठी छे. नरेंद्र सिंग नेगी जीक हथ मा एक प्लास्टिकौ थैला छौ.

वीरेन्द्र जीन परोठी वाइन  टेबल मा धार , नेगी जीन प्लास्टिकऐ  थैली बिटेन द्वी औंस का कप गाडिक टेबल मा धार . फिर वीरेन्द्र जीन  सबी पौणु तैं जुगराज रयाँ ब्वाल याने थैंक्स ब्वाल.
 
अब विमल नेगी जी न ब्वाल बल वीरेन्द्र जी तै आण मा अबेर इलै ह्वाई कि पंवार जी पौड़ी शहर से तौळ पौड़ी गाँ मा नेगी जीक दगड पाणी मांगणो जयां छ्या. सरा गाँ से  पाणीक एकी परोठी जमा ह्व़े

कार्यकर्म मा 'बीं' पर क्वी बि बात नि ह्व़े हाँ पौड़ी मा पाणी टापि टापि पर इ बात ह्वेन 
 
आन्द दै डा. यशवंत कटोच जी न हरेक तैं 'बीं' किताब पकड़ाई अर नरेंद्र सिंग नेगी जी  परोठी से दु दु चमच पाणि गाडिक कप मा डाळणा छ्या अर पंवार जी हरेक तै पाणि क कप पकड़ाणा छ्या. सौब खुसी से पाणी तै चरणामृत जन पीणा छ्या.

दुसर दिन दैनिक जागरण की हेड लाइन छे ---  जहां पानी की इतनी किल्लत है वहां वीरेन्द्र पंवार जी द्वारा सार्वजनिक स्थान में पानी बाँटना एक अपराधिक  कार्य माना जाएगा  और शासन  को वीरेन्द्र पंवार के विरुद्ध कठोर कदम उठाने चाहिए.


नॉट- लिख्वार दगड्यो नाम नामो कुणि दियुं च निथर यि  लोग इथगा दारु पिलै सकदन क्या?


Copyright@ Bhishma Kukreti 5/7/2012

Bhishma Kukreti

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इनै उनै बिटेन

 

                                 जिंदगी



                           भीष्म कुकरेती



जिन्दगी क मजा अर परिभाषा सब्यूँ कुणि बिगळि बिगळि हूंद। अब द्याखो ना डंडरियाल जी क बोल छन बल हम सब्यूँ क राजी खुसी चाँदवां पण अफु से कम. भाग जरूर होंद, निथर म्यार विरोधी कन कैक बड़ो साब बौण? भाग क इ बात छे कि इंद्र कुमार गुजराल जी अर देविगौड़ा जी भारतौ प्रधान मंत्री बौणिन . अब उन त हड़क सिंग जी बि यी बुलणा छन म्यार विरोधी कन कैक मुख्य मंत्री बणणा छन?. अफार स्यू मेहरबान सब्यु मा बुलणु रौंद बल ब्यौ बाद मी त भौत सुखी छौं वा अलग बात च कि वैकी कज्याणि रोज फोन पर अपण ब्व़े मा बुलण नि बिसरदि बल- ए ब्व़े ! ऊ इंजिनियर इ भलो छौ. अब सि कबि ना कबि विजय बहुगुणा जी न हरीश रावत जी खुण बुलणि च," म्यार मुख्यमंत्री पद तुमारा सहकार बगैर नि चौल सकुद बस आप इना पहाड़ आण बन्द करी द्याओ जु तुमारि हाथ मा छें च "
 
हम पड़ोसी से जादा भाग्यशाली होंदा पण फिर बि पडोसी से जळणा रौंदा.

 

जापानी कहावत च बल हरेक कुत्ता क दिन फिरदन . पण मीन कै बि लिंडर्या कुता तै मानेका गांधी क ड्रवाइंग रूम मा नि द्याख.

प्रेम चंद जी क बुलण छौ बल मेरी कथा पर आधारित फिलम देखिक मेरी वीं कथा क सही अंदाज नि लगि सकुद. त गुलशन नंदा जी बुल्दा छा कि मेरो उपन्यास से यि अंदाज नि लगाण चयेंद कि मेरी कथों पर शर्तिया बेकार फिल्म बौणलि. वैज्ञानिक बह्ग्वानो खुज त कौरि इ ल्याल पण इ खोज कबि नि कौर सकदन कि टेलीविजन सिरीयलुं कुण विज्ञापन जरूरी छन कि विग्यापनुं कुण सीरियल जरूरी छन.

 

 

तबै बात च जब वीरेंद्र पंवार सुखी छ्या याने कि अणव्यवा छ्या या ब्वालो अनमैर्रिड छ्या. वु एक नौनी दिखणा गेन नौनी क ब्व़ेन ना बोली दे कि वीरेंद्र पंवार भरीं जवानी मा दारु पींद. वीरेन्द्र पंवार न बि रैबार भेजि इ दे कि कै दिन मि दारु छोडि द्योलू पण तेरी बेटिक पक्वड़ सि नाक त उनि रालु क ना !



जैन बि ब्वाल ठीकि ब्वाल संस्कृति क्वी कम्यड़ नी च कि लाल रंग मिलाओ अर दिवाल लाल ह्व़े जालि. जैन बि ब्वाल सच इ ब्वाल बल हम लिविंग ऑफ़ स्टैण्डर्ड की लागत कीमत से परेशान रौंदवां पण फिर बि स्टैण्डर्ड बढ़ाणो कोशिश मा इ रौन्दां.

एक नेता न न्यायालय मा एक मेडिकल कम्पनी पर दावा कार अर ब्वाल बल जज साब बल मीन एंटी करप्सन कि कथगा इ गोळी खैन पण फिर बि म्यार रिशवत लीणो ढब ख़तम नि ह्व़े. मेडिकल कम्पनी क मालक जेल मा च.

आज बि बहस चलणि च कि मनोवैज्ञानिक बि भौत सा सवाल पुछ्दो अर सवाल पुछणो पैसा लींद अर अपण घरवळी बि सवाल पुछदि त वा पैसा किलै नि लींदि .

 

मनोविज्ञान पर बात आई त मर्फी नियम याद औंद बल क्वी ब्वालो कि अस्मान मा घणा खरबों गैणा छन अर हम मानि लीन्दा पण क्वी बवालों बल इन खुर्सी क रंग भूरिण च त हम दस दें खुर्सी तै दिखदा बल या बात सै च कि ना !.
 
इनाम या प्रसिद्धि वै तै नि मिलदि जु काम करद . अब द्याखो ना हौळ बल्द लगान्दन पण बुले जांद बल 'ये फलण न अन्क्वैक बाई'.

 

स्कूलम वैबरी भौत गुस्सा आन्द जब तुम तै मास्टर जी उ सवाल नि पुछदन जौंक उत्तर तुम जाणदा छंवां .मास्टर जी वी सवाल पुछदन जौंक जबाब तुम तै नि आंदो.

क्वी हर्चीं चीज जन कि चक्कू चौड़ तबी मिल्दि जब तुम बजार से हैंकि चीज याने कि हैंक चक्कू लै आओ.

 

सबि चान्दन कि म्यार गांवक भौत प्रगति ह्वाऊ पण क्वी नि चांदो कि या प्रगति म्यार पैसा या श्रमदान से ह्वाऊ बल्कण मा दुसरों पैसा या श्रमदान से ह्वाऊ.

जब क्वी तुम से धीरे हौळ लगान्द त उ सिमसुम या लाटो , कालु या मूर्ख होंद पण क्वी तुम से जरा बि तेज हौळ लगाओ त ओ बौळया होंद.

 

चबोड्या चखन्योरा लेख कण्डाळिअ झपांग जन हुन्दन दुयूं क मार से खून नि आन्द, बगैर ल्वैखतरी क ल्वैखतरी जन डाउ.
 


योग सिखाण वळु गुरु अर अच्कालो नेता मा यो फरक च बल योग गुरु आप तै चिंतामुक्त सिवाल्दु च.अच्कालो नेता चिंतामुक्त सियूँ आदिम तै बिजाळिक चिन्तायुक्त कौरी दींदु.   

Bhishma Kukreti

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                                              व्यंग्य/चबोड्या साहित्य अर व्यंग्यकारों /चबोड्यौं मा हरीश जुयालै भूमिका अर जगा
                                                         
                                   
                                      भीष्म कुकरेती



जब मीन हरीश जुयालै चबोड्या/व्यंग्य कविता पोथी 'उकताट' की समीक्षा इन्टरनेट मा प्रकाशित कार त मि बी खौंळे ग्यों बल गूगल सर्च मा ये लेख तैं पैलो पन्ना अर पैलो जगा मील. अर अब तक नि बि होला त दस बारा हजार से बिंडी बंचनेरूं न या समीक्षा बांच.अन्तराष्ट्रीय बंचनेरूं ई- -रैबार आणा रौंदन बल हरीश जुयाल की कवितौं अनुबाद अंग्रेजी मा हूण चएंद जां से अंतरास्ट्रीय बंचनेर हरीश की कवितौं रौंस ल्यावन. मीन इन्टरनेट मा पांच सौ से बिंडी किताबुं समीक्षा छपै होली पण प्रतिक्रिया अर बंचनेरूं रौंस को हिसाब से 'उकताट' कविता खौळ कि समीक्षा उच्ची जगा मा च. समीक्षक समीक्षा तबि सवादी अर सही लेखी सकुद जब समीक्षीत साहित्य मा दम ह्वाऊ. कुसवोर्या, हीण, साधारण साहित्य की समीक्षा भली ह्वेई नि सकद. हरीश कि कवितौं मा दम छौ त मेरी समीक्षा मा बि दम आई. उच्चो साहित्य की समीक्षा करण मा बि रौंस आन्द. याच हरीश जुयाल की साहित्यिक तागत को एक नमूना.

 

                                        गढवाळी गद्य व्यंग्यकारूं सूत भेद अर हरीश जुयाल

 

यो एक संजोग नी च बल गढवाली गद्य की पवाण मा चाबोड्या ब्यूंत / व्यंगात्मक शैली को बड़ो हात च. गढवळि क पैलो स्वांग (भवानी दत्त थपलियालै -भक्त प्रहलाद, १९१३ ई. ) अर कथा (सदानंद कुकरेती क गढ़वाली ठाट, १९१३ई. ) द्वी चाबोड्या श्रेणी को साहित्य च.

निखालिस चबोड्या निबंध साहित्य की असली पवाण या पछ्याणक 'धाद ' हिलांस,' पराज' पत्रिकाओं अर पैथर 'गढ़ ऐना 'दैनिक से ही माने जालो. याने की गढवाली गद्यात्मक व्यंग्य साहित्य को उदय १९८७ को परांत इ माने जालो. यां से पैल गढवाली गद्यात्मक व्यंग्य साहित्य मा छिट-पुट इ काम ह्व़े . १९८७ से सन १९९९ तक भीष्म कुकरेती (गढ़ ऐना अर धाद), नवीन चन्द्र नौटियाल, नाथी चन्द्र, जगदीश बडोला, भगवती प्रसाद नौटियाल, पूरण पंत को नाम आन्द. ये समौ मा भीष्म कुकरेती क सात आठ सौ जादा व्यंग्य छपेन.नाथी चन्द्र क बारा मा नामी-गिरामी समीक्षक डा. अनिल डबराल बुल्दन बल नाथी चन्द्र की रचना साधारण अखबारी रचना छन; जगदीश बडोला क व्यंग्य एकाद गम्भीर व्यंग्य को नमूना च त एक रचना स्तरीय बि नी च. भीष्म कुकरेती क व्यंग्य रचना " च, छ, थौ " (धाद , जुलाई १९९०) क विरोध मा भ.प्र. नौटियाल न एक व्यंग्य ' पुरू दिदा ' (धाद , ओक्टोबर १९९०) छप पण विरोध की जगा नैतियाल को लेख भीष्म की इ तरफदारी इ लग (डा.अनिल डबराल, 2007).

सन २००० ई.से चिट्ठी पत्री पत्रिका, रंत रैबार सतवार्या (साप्ताहिक), खबर सार अखबार अर इन्टरनेट माध्यम आण से चबोड्या अडगै ( क्षेत्र) मा पूरन पन्त, पाराशर गौड, नरेन्द्र कठैत, त्रिभुवन उनियाल्, चकडैत (उत्तराखंड लाइव वळा), चकडैत(रन्त रैबार वळा-प्रकाश धष्माना ), प्रीतम अपछ्याण, प्रीतम सिंग नेगी, शैलेन्द्र भंडारी, लीला नन्द जोशी, हे.न. भट्ट, शशि भट्ट, संजय सुंदरियाल, आशीष सुंदरियाल आदि गद्य- चबोड्या ऐ गेन . या एक भली बात च.

                  जख तलक गढ़वळी क ख़ास चाबोड्या लिख्वारूं मा भीष्म कुकरेती क चबोड़ विषय अर ब्यूंत क हिसाब से चौतार्फ्या व विवध च. पण समीक्षकुं बुलण च बल भीष्म कुकरेती की एक खासियत च बल भीष्म कुकरेती का व्यंग्य /चबोड़ बणाण्क लगान्दन याने भीष्म कुकरेती का चाबोड्या लेख चर्चा पैदा करी ई दीन्दन ( डा. अनिल डबराल, २००७). अबोध बंधु बहुगुणा (कौंळी किरण २००० ई.) भीष्म कुकरेती तै सरोळया,खरोळया, खचान्ग लगौण्या, ठुणो उठोण्या, खीर मा लूण धुलोण्या, घपरोळया व्यंग्यकार माणदो अर हाँ अर हाँ मार्गदर्शक बि बथान्दो . जख तलक भीष्म कुकरेती को अपण बारा मा बुलण च बल हाँ " म्यरा चबोड्या लेख छ्वीं- चर्चा पैदा नि कौरन त मि तै मजा इ नि आन्द ). वीरेंद्र पंवार भीष्म कुकरेती तै गढ़वाळी व्यंग्य को भीष्म पितामह बुल्दो (बीं 2012) . औसतन भीष्म कु व्यंग्य मा हौंस उथगा नी च जथगा हरीश का व्यंग्यों मा मिलदी

 

पाराशर गौड़ की जथगा तारीफ़ करे जाओ ओ कम इ होलू. कनाडा मा रैक कुछ समौ पैल पाराशर गौड़ रोजाना या हर दुसर दिन एक गढवळि व्यंग्य इन्टरनेट मा छापान्दो छौ. संख्या मा पाराशर गौड़ का व्यंग्य तीन सौ से जादा छन. पाराशर गौड़ का द्वी किस्मौ व्यंग्य छन. एक छन जो गढ़वाल मा बचपन कि समळौण अर आज को गढ़वाळ मा जन्मी नवाड़ी संस्कृति क तुलनात्मक स्तरौ व्यंग्य. दुसर किसम च आज की घटनाओं से उपज्यां सरासरी मा लिख्यां व्यंग्य. पाराशर का पैलो किस्मो व्यंग्युं मा टीस/खुद जादा च.त दुसर किस्मौ व्यंग्य सौम्य बि छन त कटाण्ग बि लगान्दन. भासा मा असवाळस्यूं की बोलचाल कि भासा अबि बि च. जादातर व्यंग्य छ्वटा अर सौम्य छन.हरीश अर पाराशर की व्यंग्य शैली अर भाषा अलग अलग छन त तुलना करण ठीक नी च. नरेंद्र कठैत क बारा मा भगवती प्रसाद नौटियाल को ख्याल च बल नरेंद्र कठैत 'आदर्शवादी' व्यंग्यकार च त शिव सिंग निषंग को बुलण च बल कथित 'व्यास शैली' को लिख्वार च (कठैत की किताबुं भूमिका मा ). हरीश जुयाल का व्यंग्यों मा कठैत से हौंस भौति जादा च अर हरीश का व्यंग्यों मा कविताई बहाव च .

              पूरण पंत न भौत पैल गद्य व्यंग्य लिखण शुरू कौरी छौ पण कविता अर संपादन मा जादा व्यस्त होण से वैक यीं विधा मा ध्यान कम राई पण अबि अबि प्रकाशित व्यंग्य पोथी 'स्वस्ति श्री' बथान्दी बल पूरण पंत को ज़िकर कर्याँ बगैर गढ़वळी गद्य व्यंग्य साहित्य को ज़िकर ह्वेई नि सकद, पूरण पंत का व्यंग्य इनी छन - जन क्वी बुल्यां मर्खुड्या बल्द फ्वींफाट करदो, जन बुल्यां यी व्यंग्य /चबोड़ - उड़द डै अर बैठद दै गरुडों फड़फडाट करणा ह्वावन धौ, अर कखी कखी त करैं पंछी जन शाराप बि लगदन. पंत का व्यंग्य भिभरट्या छन, सिपड़ी तड़काँणो डा दीन्दन यि व्यंग्य. पूरण पंत अर हरीश जुयाल द्वी व्यंग्य काव्य का सूर्य छन पण जख तलक गद्यात्मक व्यंग्य सवाल च पंत का गद्य व्यंगों मा हरीश जुयाल से कम हौंस पाए गे. व्यंग्य का मामला मा पंत असला मा अबोध बंधु बहुगुणावादी व्यंग्यकार च जो विद्वता या इंटेकचुवलिटी पर विश्वास करदो त हरीश जुयाल व्यंग्य का मामला मा कन्हयालाल डंडरियालवादी च याने कि गद्यात्मक व्यंग्य मा इमोसन या भावनाओं को बहाव . पंत का गद्यात्मक व्यंग्य गद्य का जादा नजीक छन त हरीश जुयाल का गद्य व्यंग्य -कविता का छैल तौळ आणा आतुर रौंदन.पंत बुद्धि से व्यंग्य रचद दिख्यांद त हरीश जुयाल गद्य व्यंग्य बि जिकुड़ी /हृदय से रचद दिख्यांद. ब्यूंत अर व्यंग्य करणो ढौळ का मामला मा पूरण पंत अर हरीश जुयाल बिलकुल अलग अलग चंखों मा चढ़याँ लगदन. दुयुंक विशेषता या च दुयुंक साम्यता ह्वेई इ नि सकदी. या बात गढवळी व्यंग्य का वास्ता एक सकारात्मक  सैन/ संकेत च



                दुई 'चकडैत' सतवार्या अखब़ारूं कुणि लिखदन त यूँ दुयूं क व्यंग्युं मा निपट वर्तमान की घटनों विषय हूण  लाजमी च. प्रकाश मणि धष्माना (रंत रैबार को चकडैत ) क व्यंगों मा तर्कशाश्त्र को पूरो ध्यान रौंद अर याँ से यूँ व्यंग्युं मा हौंस कम होंद. हाँ विषय मा प्रकाश मणि धष्माना अग्वाड़ी ह्व़े जांद. प्रकाश मणि धष्माना क व्यंग्युं मा संपादकीय गंध बि मिल्दी. याने कि पाराशर गौड़ , प्रकाश धष्माना अर 'चंडीगढ़ का चकडैत का व्यंग्युं मा एक खासियत च की यी व्यंग्य सरासरी मा लिख्यां रौंदन.

                  त्रिभुवन उनियाल को खबर सारौ खाम (कौलम ) की छ्वीं समीक्षक कम इ लगांदन   यो त्रिभुवन उनियाल को दगड एक नाइंसाफी च. त्रिभुवन उनियाल न गढवळी व्यंग्य मा एक अलग शैली अपणायि.अर या शैली च द्वी मनिखुं मा बचळयातौ ब्यूंत . त्रिभुवन उनियाल क "हेलो! हेलो! परधानी बौ" ' कॉलम 'खबर सार' पन्द्रावारो अखबारों एक महत्वपूर्ण अर अभिन्न कॉलम च. डाईलौग /बचळयात  शैली मा त्रिभुवन उनियाल का व्यंग्य भौत इ सामयिक छन पण ऊं मा सरासरी मा रच्यां कमजोरी नि दिख्यांदी.

त्रिभुवन उनियाल अर हरीश जुयाल मा एक खासियत च अर वा खासियत च दुयुंक व्यंग्यों मा हौंस हौर व्यंग्यकारूं से जादा रौंद. पण इखम बि हरीश अर त्रिभुवन कि तुलना नि ह्व़े सकदी किलैकि दुयुंक शैली मा अपणी इ ख़ास विशेषता च. त्रिभुवन का व्यंग्य शैली बचळयातौ ब्यूंत च त हरीश को अलग ढौळ च.

एक सबसे बडी खासियत या विभिन्नता या च बल हरीश जुयाल ठेट गाँव मा रौंद अर असलियत का भौत इ नजीक च जब कि बकै व्यंग्यकार या त कस्बों मा रौंदन या मेट्रो मा. फिर चाहे कविता ह्वाओ या गद्य हरीश जुयालौ कवितों या गद्य मा लोक काव्य की ज्वा लौंस च वा हैंको कै बि व्यंग्यकार मा नी च.

                                                हरीश जुयालौ गद्य व्यग्य संसार

 

                     'ओम मही खाणम्' लेख मनिखों अफखवा प्रवृति अर प्रशासन, शिक्षा, अर प्रजातंतरौ पौ ( मास्टर , पटवार्युं, गर्म प्रधान ) क स्वार्थी भ्रष्ट तंत्र पर चमकताळ लगान्द.

 'पर' लेख मनिखों भगार लगाणै आर चरित्र हनन करणो आधारभूत प्रकृति पर खैडौं कटाण्ग लगाण सफल च.

'बल' लेख बथान्द बल कविता सुंणदेर हरीश जुयाल तै किलै कवि समेलनो बादशाह बुल्दन. 'बल' मा हरीश न शब्दुं तै गुलाम बणैक बचनेरूं हंसाई बि च अर दगड मा हमारि पर्विर्ती पर चुनगी बि दे.अनुप्रास (अतिशयोक्ति, वृत्य, अन्त्यानुप्रश, पुनरूक्ति , पुनुर्क्ति आदि) अलंकार, उपमा अलंकार, मालोपमा, उत्प्रेक्षा, अर हौरी अलंकार दिखणो, अनुभव करणो अद्भुत नमूना च 'बल' लेख.

'अतिरिक्त योजना' गढवळयूँ पर मुठक्यूँ मार च. , समाज की ' भैर वळौ खुणि हम गौ अर भितर वळौ खुण खौ" जन प्रवृति तैं हरीश न चबोड्या थान्तो न इनी थंत्यायि /थींच जन बुल्यां उड़द-गैथ थंत्याणो ह्वाओ. ये लेख मा बि अनुप्रास अलंकार का कथगा उदहारण मिल्दन. इन लगद जन बुल्यां शब्द हरीश का ड़्यार नौकरी करणा ह्वावन धौं.

'कट्वरि सिस्टम' इन बथान्द बल राज क्वी बि ह्वाओ घूसखोरी होंदी च बस घूसखोरी अर घूस को रूप बदले जांद. संसार को गद्य मा उपमा अलंकार को विशिष्ठ नमूना च ''कट्वरि सिस्टम' अर दगड मा खिकताटि हंसी मोफत मा सुप्प भोरिक मिलदी .असलियत तै अलंकृत करण सिखण ह्वाओ त 'कट्वरि सिस्टम' बंचण जरूरी च.

'जुत्त' लेख समाज मा अंधविश्वास, एक हैको पर अविश्वास , प्रशासन, राजनीति तै जुत्तुंन खुले आम , बीच बाटो मा सब्युं समणि जुत्यांद. अर मजा क बात या च कि लोक सभा क घूसखोर सदस्य अर सज्जन सदस्य हरीश जुयाल को कुछ नि कौर सकदन किलैकि चबोड़ी जुत पर हौंस को पौलिश जि लगीं च. 'जुत्त' लेख व्यंग्य, चबोड़ , चखन्यौ रुपी हिसर का कांडों बीच हौंस रुपी हिसर का दाण जन छ .

आज 'पाणी' मनिखों बान एक गंभीर मुद्दा च अर इख पर हरीश जुयाल न गम्भीर चर्चा 'पाणी' लेख मा हंसी हंसी मा करी या च हरीश कि खूबी.

'मनख्यात' लेख प्रतीकात्मक ब्यूंत को एक बढिया उदाहरण च अर दगड मा कथनी (नेम प्लेट की लेखनी ) , सामजिक कामों मा बि सरकार पर निर्भरता , समाज मा अपणी भासौ प्रति उदासीनता , मनिख की निर्दयिपन पर घमकताळ च, लत्ती च, नंगो करणो एक नमूना च. अर लेख मा हौंस त व्यंग्य की असली दगड्याणि च

'कुकुर' असला मा नवाडी सौकारूं की पोल खुलद अर दगड मा हौंस का भूड़ा बि खलांद.

'जिलगंड भाई जिंदाबाद' आजौ अजू समाज अर आजै राजकरणि क दोगलापन पर मुंगरौ मार अर मजा या च बंचनेरूं क आंख्युं मा हौन्सन अन्सदरी बगणा रौंदन पण भितर जिकुड़ी मा दौन्कार पड़णि रौंद कि ये सड़यूँ समाज अर सड़ी राजकरणि को क्या करण ?

'घुती दा कि चिट्ठी रामप्यारी बौ खुणि ' अर 'रामप्यारी बौ कि घुती दा खुणि ' एक भाषाई प्रयोग च पण गढवळी साहित्य मा इन प्रयोग क्या करण्याइ जब गढ़वाली उनि बि गढवळी गद्यकार अपण गढवळी गद्य मा बीं बरोबर गढवळी प्रयोग करदन.

'ब्वाडा अर झुमैलो' लेख अन्तराष्ट्रीय राजनीति तै दर्शाण मा सफल हौंसण्या चबोड़ च अर सोटी/ चाबुक बि च .

'थकुला चोर ब्वारी को महात्म्य ' लेख मा हौंस व्यंग्य पर भारी च पर व्यंग्य मा कमी नि आँदी या इ त खूबी हरीश तैं हौर गढवळी व्यंग्यकारूं से विशिष्ठ बणान्द. ये लेख मा भौं भौं किस्मौ अलंकार दिखणो मिल्दन. गद्यकार को शब्द सामर्थ्य को एक नमूना च 'थकुला चोर ब्वारी को महात्म्य' लेख .

'गढवळी साहित्य पर ब्वाडा को इंटरव्यू ' साहित्यकारों खलड़ खैन्चद .

'ब्वाडा क सुपिन' , 'ब्वाडा क सामाजिक चिंतन', 'ब्वाडा क चिंतन' ब्वाडा क पुरुष दर्शन' अर ब्वाडा का लोकल रत्न ' लेखुं मा प्रयोग बि च, शब्दों जादूगिरी बि च अर व्यंग्य कि मार बि च. यूँ लेखुं मा हिंदी, अंगरेजी अर गढ़वळी शब्दुं क

बैठाव बिठाण मा हरीश जुयालन कथगा इ प्रयोग करीन .

                        भाषा पर पकड़ मा त हरीश जुयाल 'कुटज' दुनिया का कन कन व्यंग्यकारूं से अगनै च. शब्दुं से मारण, पिटण थिंचण अर हंसाण मा हरीश कि जथगा बि बडै करे जाव कमी इ च.

                      चबोड़ इ चबोड़ मा पाप अर पाप्युं तैं थप्पड़याण; निकज्ज, निर्लज्ज, मौकापरस्त , बिलंच अर भ्रष्ट राजकरणि वळु तै खुले आम जुत्याण; बेकार मा सरकारी खजाना से कमै करण वाळ नौकरशाही या मास्टर, अर ठेकेदारू तै बीच बजार मा नंगी करण; अळगसी , डरख्वा समाज पर फड्याण; धुर्यापन कि खिल्ली उड़ाण, सौज-सौज मा अड़ाण अर दगड मा हौंस कि छळाबळि करण वाळ हरीश जुयाल जौनाथान स्विफ्ट (१६६७-१७४५), मार्क ट्वैन (१८३५-१९१०), अरिस्तोफेंस (446- 386 B.C. ), हेनरी फील्डिंग (१७०७-१७५४) , डब्ल्यू. एस. गिल्बर्ट (१८३६-१९०१) , रे ब्रेडबरी, रोजर अबोट, जफर अब्बास, स्टीव बेल जन नामी गिरामी व्यंग्यकारूं दगड बैठण लैक च.

                     इख्मा क्वी द्वी राय नी च बल 'खुबसाट' चबोड्या खौळ (व्यंग्य संग्रह ) सरा व्यंग्य संसार को बान एक ख़ूबसूरत जेवर च. अर आस च बल अग्वाड़ी बि हरीश जुयाल 'कुटज' इनी चबोड्या खौळ दुनिया तै दीणु रालू

भीष्म कुकरेती
मुंबई ,

मई २०१२,





सूत भेद अधार (सन्दर्भ) -१- Bhishma Kukreti, Uktat: Satirical Poems by Harish Juyal, http://www.apnauttarakhand.com/uktat-poems-of-harish-juyal-book-review/

२-डा, अनिल डबराल , २००७, गढ़वाली गद्य परम्परा , इतिहास से वर्तमान, (पृ.४२१-४२६)

३- धाद, गढ़वाली ऐना , चिट्ठी पत्री, रंत रैबार , खबर सार, उत्तराखंड रिव्यू का अंक

Bhishma Kukreti

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चबोड़ इ चबोड़ मा  गंभीर छ्वीं

                                    गढ़वळि संस्कृति क  खोज मा
 

                                                 खुजनेर - भीष्म कुकरेती

 

   पता नि किलै  धौं  अच्काल जै पर बि द्याखो संस्कृति  खुज्याणो खजि लगीं च. मि खामखाँ इ अपण ड़्यार आ णु  थौ कि इ-उत्तराखंड पत्रिका क विपिन पंवार जीक फोन आई बल,"भैजी आप गाँ जाणा  छंवां  त जरा गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू लेक ऐ जैन, अच्काल  गढ़वळि संस्कृति कि बड़ी भारी मांग च."

                जब बिटेन मीडिया वाळु न सूण कि मार्केटिंग कु  नियम च कि अपण ग्राहकुं तै वो इ द्याओ जु ऊं तै चयाणु ह्वाऊ त मीडिया वळा अपण बन्चनेरूं   भौत खयाल करण मिसे गेन। वो अलग बात च कि भारत वासी हिंसा ,  अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार से निजात चाणा छन अर अखबार या  टी.वी वळा यूँइ  खबरों ता जादा महत्व दीन्दन. 

        ग्राहक की मांग देखिक इ विपिन पंवार जीन बोली होलु कि गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू ल्हेकी ऐ जयां. मीन बि स्वाच कि उनि बि मि खांमाखां गाँ जाणु   छौ त यीं बौ मा कुछ काम नी त स्या कलोड़ी  काँध  मलासणि च वळ हिसाब से मीन स्वाच कुछ ना से बढिया बेकार को इ सै कुछ त काम मील. चलो ए बाना गढ़वळि संस्कृति से बि मुलाकात ह्व़े जालि अर   म्यार टैम बि पास ह्व़े जालो.   

                      पण सबसे बड़ो सवाल यू छौ कि या गढ़वळि संस्कृति कख रौंदी अर या  होंदी कन च अर यींक रंग रूप क्या च !   

     जब मि छ्वटु थौ या जवानी मा गाँ मा रौऊ त में तै कबि बि खयाल नि आई कि मै तै गढ़वळि संस्कृति दगड मेलमुलाकत रखण चयांद कि कुज्याण  कब काम ऐ जाओ धौं !  ना ही हमन किताबु मा बांच कि गढ़वळि संस्कृति बि क्वी चीज  होंद. हम न त यू. पी बोर्ड क स्कूलूं  मा यि पौड़ कि हमारि संस्कृति माने अयोध्या या मथुरा अर बची ग्याई त इलाहाबाद अर वाराणसी. जब मुंबई मा औं त चालीस साल तलक नौकरी संस्कृति या मार्केटिंग संस्कृति दगड़  पलाबंद कार अर अब तक यूँ द्वी संस्कृत्यूँ छोड़िक कैं  हैकि दगड आँख उठै क बि नि द्याख. कबि इन बि  नि सूझि  कि एकाद चिट्ठी गढ़वळि संस्कृति कुणि भेजि द्यूं जां से कबि गाँ जाण ह्वाओ त गढ़वळि संस्कृति तै पछ्याणण मा दिक्कत नि ह्व्वाऊ. गढ़वळि संस्कृति कुणि चिट्ठी भेजणु रौंद त आज औसंद नि आणि छे. पण अब त संस्कृति  तै अफिक खुज्याण इ च .
 
        मि ब्यणस्यरिक मा बिजि  ग्यों बल सुबेर सुबेर संस्कृति दिखे जालि.   मि अन्ध्यर मा इ गाँ ज़िना ग्यों .  यू बगत जन्दुर पिसणो च त जनानी जंदुर पिसणा होला त सैत च गढ़वळि संस्कृति जंदरो ध्वार  मिल जालि. मि अपण दगड्या  सूनु  काक क  चौक मा ग्यों कि मै तैं ठोकर लगि  गे.  एक अवाज आई ,' हाँ ! हाँ ! लगा रै बुडडि तै ठोकर ! " हैं , इन आवाज त सूनु काक जंदरो छौ." मी टौर्च जळाइ देखिक खौंळे ग्यों सीडी क बगल मा तौळ एक जंदरौ तौळक  पाट भ्युं पड्यू  छौ. मीन पूछ,' हे जंदुर इखम क्या करणि छे?"
 
जंदर क तौळक पाटन कळकळि भौण  म जबाब दे ,"बुड्यान्द  दैक  दिन कटणु छौं"

"हैं ! पण यू बगत त चून-आटो पिसणो च?" मीन पूछ   

जंदरौ न जबाब दे, ' अरे लाटु अब नाज क्वी नि पिसद. अब त फ्लोर मिल या पिस्युं आटो जमानो च ." 
 
मीन दुखी ह्वेक अफु कुण ब्वाल," अब संस्कृति कख मीललि !"

जंदरौ तौळक पाट न बोलि," वींक ले क्या,  बदखोर ह्वेली डीजल  चक्यूँ ध्वार."

मि जाण बिस्यों त जंदरौ  पाट न बोलि, ' ह्यां जरा एक काम करि दे. म्यार बुड्या उख गुज्यर भेळुन्द पड्यू च . भौत बुरी हालत मा च. कथगा दै बुड्याक रैबार  ऐ ग्याई बल  आखिरैं मुख जातरा देखि ले.केदिन ले हम कन एक हैंकाक मीरि  बुकान्दा छ्या (मीरि  बुकाण- किस/चुम्मा  का प्रतीतात्मक शब्द है )." मै समज ग्यों कि जंदरौ तौळक पाट  मथ्यौ पाट तै मिलणो जाण चाणो च . लव, प्यार, माया सब्यूँ मा  जगा इकसनी होंद, चाहे जीव हो या निर्जीव!  मी तौळ क पाट तै कंधा मा उठैक  गुज्यर जिना ग्यों . बाट मा जंदरौ तौळक पाट न भौत सी कथा सुणैन.  गुज्यरो हालात पैलाक जनि इ  छे. हाँ ! पैल लोग रंगुड़ डाल्दा छ्या अब क्वी रंगुड़ नि डालदो. एक जुम्मेवार प्रवासी की असली भूमिका निभांद निभांद मीन वै जंदरौ तौळक पाट तै गुज्यर क भेळउन्द लमडै द्याई अर अब यि द्वी प्रेमी मीलि जाला अर एक हैंकाक मीरि त नि बुकाला पण एक हैंक तै दिखणा राला.  . अब यि जंदुर बि प्रागैतिहासिक काल की वस्तु ह्व़े जाला.

       अब मीन स्वाच की सुबेर हूण इ वाळ च  जनानी पींडौ तौल लेकि संन्यूँ  /छन्यूँ मा आणि ह्वेली . मै लग बल उख सन्यूँ मा गढ़वळि संस्कृति  क दर्शन ह्व़े इ जाला अर मि गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू उखी छन्यूँ मा ले ल्योलु. अब चूंकि मेरो त सरा मुन्डीत  इ प्रवाशी ह्व़े ग्याई त हमारि गौशाला, सन्नी या छन्न्युं मा गढ़वळि संस्कृति त मिलण से राई. अर उन्नी बि गढ़वळि संस्कृति तै अपनाणो  काम हम प्रवास्युं थुका च गढ़वळि संस्कृति तै अपनाणों जुमेवारी  गढ़वाळ का बासिन्दौ कि ही हूण चयांद कि ना ? अरे हम प्रवासी गढ़वळि संस्कृति अपणावां कि भैर देसूं संस्कृति  अपणावां ! जख रौला उखाक इ संस्कृति अपनाण इ ठीक च कि ना?

  त मि दुसरो छन्न्युं मा  ग्यो. मि जब छ्वटु छौ त  ये बगत (घाम आणौ  टैम पर) गाँ से जादा चहल पहल सन्न्युं ज़िना होंद छौ. गोर भैर गाडो, मोंळ भैर गाडो, दुधाळ गौड्यू  तै पींड खलाओ, घास खलाओ . ये बगत संन्युं मा  भौत काम हूंद थौ.

मि एकाक सनि/छनि/गौसाला   मा ग्यों त उख सुंताळ लग्यु छौ. सन्नी चौक मा तछिल, कण्डाळि  अर लेंटीना  जम्यु छौ. सन्नि क नाम नि छौ  बस जंगळ इ जंगळ. फिर मी स्ब्युं सन्न्युं मा ग्यों  त सबि जगा इ हाल छौ. सब जगा जंगळ को माहौल. मी अपण सन्नि म ग्यों त मी बेसुध ह्व़े ग्यों .सन्नि गायब छे बस घास अर घास अर द्वी तीन गीन्ठी डाळ बि जम्याँ छ्या. जब सनी  इ जंगळ मा तब्दील ह्व़े गेन त उख संस्कृति ह्वेली ना. मि निरसे ग्यों.
 
इथगा मा म्यार बाडा क सनि  बिटेन धै आई., ह्यां जरा इना आवदी  "

मी अपण बाडा क छनि क चौक ज़िना ग्यों त उख भैंस बाँधणो कील मी तै भट्याणु छौ.  कील मा अब जान  त नि छे पण मीन पछ्याणि दे कि यू बड़ो प्रसिद्ध कील छौ. म्यार बूड दिदा न यि सालौ कील घौट  होलु पर अब भसभसो ह्व़े ग्या छौ.
 
मीन ब्वाल , 'कन छे  ये भैंसों कील ?"

कीलन जबाब दे, ' बस दिन बिताणो छौं. आज ना त भोळ . बस एक इ लाळसा बचीं च कि अपण ठाकूरो   (म्यार  बाडा क नौनु) क दर्शन कुरु द्यूं . पोर ऐ बि छ्या नागर्जा पुजणो पण इना नि ऐन . जरा रैबार दे देन कि जब तक उ नि आला मीन नि मरण. मोरी बि ग्याई त इखी रिटणु रौण. कखि हंत्या रूप मा ऐ ग्याई  त फिर तुम लोगुन हंत्या बि पुजण अर दगड मा  गाळि बि दीण" मी कीलो दगड भौत देर तक छ्वीं  लगाणु रौं. मीन कील तै भर्वस दिलाई कि दादा जरुर त्वे तै दिखणो आलु  .

मी तै संन्युं हालत से उथगा दुःख, निरासा नि ह्व़े जथगा दुःख यू ह्वाई कि मै तै गढ़वळि संस्कृति इख नि मील अर मी वींको इंटरव्यू नि ले साको.

अब घाम ऐ गये छ्याओ .

हैं ए म्यारो भूभरड़! तौळ संन्युं से एक रस्ता च . मीन द्याख कि गाँ वाळ परोठी, बोतल लेकी दौड़णा सि छ्या. झाड़ा फिराग जाणो बगत बि च. झाड़ा जाणो गुज्यर त हैकि दिसा मा च त फिर यि गौं का लोग इन किलै इक दगड़ी दौड़णा छन ? अर झाड़ा जाण दै परोठी त क्वी नि लिजांद भै !

मीन स्वाच कि जख यि गाँ वाळ जाणा छन वख जरुर गढ़वळि संस्कृति से भेंट ह्व़े जाली.

 

(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग )
 
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चबोड़ इ चबोड़ मा गंभीर छ्वीं                                   

                  गढ़वळि संस्कृति क खोज मा -२



                                                  खुजनेर - भीष्म कुकरेती

 

 (ब्याळि आपन बांच बल लिख्वार गढ़वळि संस्कृति दगड मुखाभेंट करणो अपण गाँ गे अर उख वैक भेंट एक जंदरौ तौळअ  पाट से ह्व़े. फिर लिख्वार संन्युं ज़िना गे )

 

             मीन तौळ नजर मारी त  सनै सनै   लोगुक तादात बडणि छे . सैत च दुसर गाँव क लोग बि परोठी-बोतल लेकी ये बाटो बिटेन कखि जाणा छया.

मीन कील तै पूछ," ये म्यार बाडा जी बांठौ  कील यि लोग परोठी-बोतल लेकि  कख जाणा छन ?"

 

कील न मेरो जाबाब क जगा पर ब्वाल,' ओ त अबि बि तुमारि टक मै तै हथियाणो नि ग्याई? तबी त म्यार बाडा जी बांठौ कील क नाम से मि तै भट्याणि छे."

मीन ब्वाल," हाँ या बात सै च बल बिगळयाणो परांत  बि म्यार बुबा जी अर बाडा जी मा प्यार मा कमी नि ऐ पण म्यार बुबा जी ये कील तै कील ना अपण ददा जी क समळौण  माणदा छया."

 

कील न बोली," जन त्यार बाडा जी अपण ददा क लगायुं गदनौ आमौ   डाळ तै बुल्दा छा, 'भाई क बांठौ   आम '  "

मीन ब्वाल," हाँ ! उन त  हम वै आम क एकेक हड्यल  तै द्वी हिस्सों मा बंटद छ्या.पण फिर बि बुले जांद छौ कि म्यार बुबा जीक बांठौ आम. यू आम बल म्यार दादा जीक ददा जी न लगै छौ .अर म्यार बडा जी बिगळयाणो बाद बि ये आम की देख भाळ बच्चो जां करदा छा." मि अब भावुक हूण बिसे गौं.



कील न पूछ," त क्या तेरी या त्यार बुबा क टक मोरद मोरद तक ड़्यारम म त्यार  बूड ददा क बणयूँ  चौंतरा पर  नि छे."

मीन हुन्गरी पूज ,"  हाँ बाबा जी तै वै  चौंतरा से बड़ो प्यार छौ. बडा जी अर म्यार बुबा जी जडु मा दगड़ी घाम तापदा छया अर रुड्यू  रात वेई चौंतरा मा सीन्दा छया . बिगळयाण से बि दुयुंक प्यार मा फ़रक नि पोड़."

 

कील न ब्वाल,' हाँ जब बि त्यार बुबा उन्ना देसन (परदेस न ) ड़्यार आन्द छयो त मि तै प्यार से मलासदो छौ. "

मीन ब्वाल," अर जब बुबा जी उन्ना देसन ड़्यार आन्द छ्या त एक राति खुणि अपण भैजी याने म्यार बडा जी क दगड डाँडो कूड़ मा सीणो जरूरर जांदा छा."

 

कील न बोली," अच्छा अच्छा तू भद्वाड़ो डांडौ बात करणि छे. जख त्यार बडा अर बुबा न द्वी कुठड्यू  कूड़ लगै छौ."

मीन उलार मा ब्वाल,"  हाँ. उख पांच दूणो भद्वाड़ छौ त उख रात दिन काम करण पोड़द छौ त दुयूं न साजो कूड़ चीण बल  खेती टैम पर हम कामगती उखी से जंवां. बुबा जी जब बि उन्ना देस बिटेन आन्द छया त म्यार बडा खुण अलग से मिठाई लांदा छया अर फिर एक दिन उख डांडो कूड़ म दगड़ी खाणक  बणान्दा छ्या, उखी एक रात बितान्दा छया  . बुबा जी क लईं चीजुं मजा लीन्दा छया. सारा  अडगै  (इलाका ) मा म्यार बडा जी अर म्यार बुबा जी खुणि  लोकर राम लक्ष्मण बुल्दा छया."

 

कील न पूछ," ये त्यार कथगा भै भुला छन ?"

मीन जबाब दे," तीन इ छन भै."

"औ ! त दगड़ी इ रौंदा ह्वेला नी ?" कील अ सवाल छौ.

मीन अणमण ह्वेक जबाब दे,; ना '

 

कील न ब्वाल,ना अ ?"

"ना हम दगड़ी नि रौन्दां ."  मेरो खड़खड़ो  जबाब छौ

कील न फिर पूछ," क्या हाल छन हौरी भायुं क ?"

'कुज्याण ठीकि होला " म्यरो उदासीन जबाब छौ.

 

कील न खौंळे  क ब्वाल," कुज्याण मतबल ?"

' कुज्याण मतलब मै पता नी च कि ऊंका क्या हाल छन .' मीन बोल

" हैं ! क्या बुनी छे ?" कील न पूछ

मीन  अणमणो ह्वेक जबाब दे,' हाँ सैत च हम चारेक साल बिटेन नि मील होलां "

 

' पण तुम लोग त एकी शहर मा छन वां ना ?" कीलो सवाल छौ

मीन ब्वाल," हाँ. पण हम तिन्यु मा कथगा सालुं से बातचीत  नी च ."

कील न ब्वाल," ये झूट  नि बोल हाँ !"

मीन ब्वाल," हाँ हम क्वी बि एक हैंक से नि बचळयान्दवां ."

 

कील क सवाल छौ  ," क्यांक बान  झगड़ा  ह्व़े ?"

" पैल त भौत सालू तक बुबा जीक कमायिं  जायजादो बान झगड़ा राई  फिर हमार बूड खूडू क  एक भगवती क भाग्यशाली खुन्करी छे. वींक बान त इथगा झगड़ा ह्व़े कि आज तक हम एक हैंकाक मुख बि नि दिखण चाँदवां " मीन भेद ख्वाल



कील न ब्वाल,' त ...?"

मीन मुंड हलाई.

कील न पूछ , त जग्गी जुग्गी मा ?"

मीन बताई ," ना .हम एक तै देखिक मुख फरकै दीन्दा "

कील न ब्वाल,' बड़ो खराब ह्व़े भै,"

 

अब मीन बात घुमाणो बान पूछ , " ह्यां ! सी लोग परोठी-बोतल लेक कख जाणा छ्या ?"

इथगा मा एक अवाज आई," ये ठाकुर जरा इना आदि ."

मी चचरै ग्यों कि या अवाज  कैकी च

कील न बताई,' तुमर सनि पैथर  ज्वा सनि च वा भट्याणि च ."

 

फिर से अवाज आई," ह्यां जरा देरो खुणि इना ऐन जरा."

कील न बोल, "जा जयादी . जब तू छ्वटो छौ त वीन सनी म जान्दो इ छौ "

मीन ब्वाल, " हाँ पण यि लोक परोठी-बोतल लेक कख जाणा छन ?"

 

कील न ब्वाल" वीं तै इ पूछी लेन ."

मी अपण सनी पैथरा  सनि क तरफ जाण लगी ग्यों

 

 

(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? वीं सनि ण क्या ब्वाल? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग..३  )

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                  गढ़वळि संस्कृति क खोज मा -२



                                                  खुजनेर - भीष्म कुकरेती

 

 (ब्याळि आपन बांच बल लिख्वार गढ़वळि संस्कृति दगड मुखाभेंट करणो अपण गाँ गे अर उख वैक भेंट एक जंदरौ तौळअ  पाट से ह्व़े. फिर लिख्वार संन्युं ज़िना गे )
 


             मीन तौळ नजर मारी त  सनै सनै   लोगुक तादात बडणि छे . सैत च दुसर गाँव क लोग बि परोठी-बोतल लेकी ये बाटो बिटेन कखि जाणा छया.

मीन कील तै पूछ," ये म्यार बाडा जी बांठौ  कील यि लोग परोठी-बोतल लेकि  कख जाणा छन ?"
 


कील न मेरो जाबाब क जगा पर ब्वाल,' ओ त अबि बि तुमारि टक मै तै हथियाणो नि ग्याई? तबी त म्यार बाडा जी बांठौ कील क नाम से मि तै भट्याणि छे."

मीन ब्वाल," हाँ या बात सै च बल बिगळयाणो परांत  बि म्यार बुबा जी अर बाडा जी मा प्यार मा कमी नि ऐ पण म्यार बुबा जी ये कील तै कील ना अपण ददा जी क समळौण  माणदा छया."
 


कील न बोली," जन त्यार बाडा जी अपण ददा क लगायुं गदनौ आमौ   डाळ तै बुल्दा छा, 'भाई क बांठौ   आम '  "

मीन ब्वाल," हाँ ! उन त  हम वै आम क एकेक हड्यल  तै द्वी हिस्सों मा बंटद छ्या.पण फिर बि बुले जांद छौ कि म्यार बुबा जीक बांठौ आम. यू आम बल म्यार दादा जीक ददा जी न लगै छौ .अर म्यार बडा जी बिगळयाणो बाद बि ये आम की देख भाळ बच्चो जां करदा छा." मि अब भावुक हूण बिसे गौं.



कील न पूछ," त क्या तेरी या त्यार बुबा क टक मोरद मोरद तक ड़्यारम म त्यार  बूड ददा क बणयूँ  चौंतरा पर  नि छे."

मीन हुन्गरी पूज ,"  हाँ बाबा जी तै वै  चौंतरा से बड़ो प्यार छौ. बडा जी अर म्यार बुबा जी जडु मा दगड़ी घाम तापदा छया अर रुड्यू  रात वेई चौंतरा मा सीन्दा छया . बिगळयाण से बि दुयुंक प्यार मा फ़रक नि पोड़."
 


कील न ब्वाल,' हाँ जब बि त्यार बुबा उन्ना देसन (परदेस न ) ड़्यार आन्द छयो त मि तै प्यार से मलासदो छौ. "

मीन ब्वाल," अर जब बुबा जी उन्ना देसन ड़्यार आन्द छ्या त एक राति खुणि अपण भैजी याने म्यार बडा जी क दगड डाँडो कूड़ मा सीणो जरूरर जांदा छा."
 


कील न बोली," अच्छा अच्छा तू भद्वाड़ो डांडौ बात करणि छे. जख त्यार बडा अर बुबा न द्वी कुठड्यू  कूड़ लगै छौ."

मीन उलार मा ब्वाल,"  हाँ. उख पांच दूणो भद्वाड़ छौ त उख रात दिन काम करण पोड़द छौ त दुयूं न साजो कूड़ चीण बल  खेती टैम पर हम कामगती उखी से जंवां. बुबा जी जब बि उन्ना देस बिटेन आन्द छया त म्यार बडा खुण अलग से मिठाई लांदा छया अर फिर एक दिन उख डांडो कूड़ म दगड़ी खाणक  बणान्दा छ्या, उखी एक रात बितान्दा छया  . बुबा जी क लईं चीजुं मजा लीन्दा छया. सारा  अडगै  (इलाका ) मा म्यार बडा जी अर म्यार बुबा जी खुणि  लोकर राम लक्ष्मण बुल्दा छया."
 


कील न पूछ," ये त्यार कथगा भै भुला छन ?"

मीन जबाब दे," तीन इ छन भै."

"औ ! त दगड़ी इ रौंदा ह्वेला नी ?" कील अ सवाल छौ.

मीन अणमण ह्वेक जबाब दे,; ना '
 


कील न ब्वाल,ना अ ?"

"ना हम दगड़ी नि रौन्दां ."  मेरो खड़खड़ो  जबाब छौ

कील न फिर पूछ," क्या हाल छन हौरी भायुं क ?"

'कुज्याण ठीकि होला " म्यरो उदासीन जबाब छौ.
 


कील न खौंळे  क ब्वाल," कुज्याण मतबल ?"

' कुज्याण मतलब मै पता नी च कि ऊंका क्या हाल छन .' मीन बोल

" हैं ! क्या बुनी छे ?" कील न पूछ

मीन  अणमणो ह्वेक जबाब दे,' हाँ सैत च हम चारेक साल बिटेन नि मील होलां "
 


' पण तुम लोग त एकी शहर मा छन वां ना ?" कीलो सवाल छौ

मीन ब्वाल," हाँ. पण हम तिन्यु मा कथगा सालुं से बातचीत  नी च ."

कील न ब्वाल," ये झूट  नि बोल हाँ !"

 मीन ब्वाल," हाँ हम क्वी बि एक हैंक से नि बचळयान्दवां ."

 

कील क सवाल छौ  ," क्यांक बान  झगड़ा  ह्व़े ?"

" पैल त भौत सालू तक बुबा जीक कमायिं  जायजादो बान झगड़ा राई  फिर हमार बूड खूडू क  एक भगवती क भाग्यशाली खुन्करी छे. वींक बान त इथगा झगड़ा ह्व़े कि आज तक हम एक हैंकाक मुख बि नि दिखण चाँदवां " मीन भेद ख्वाल



कील न ब्वाल,' त ...?"

मीन मुंड हलाई.

कील न पूछ , त जग्गी जुग्गी मा ?"

मीन बताई ," ना .हम एक तै देखिक मुख फरकै दीन्दा "

कील न ब्वाल,' बड़ो खराब ह्व़े भै,"
 


अब मीन बात घुमाणो बान पूछ , " ह्यां ! सी लोग परोठी-बोतल लेक कख जाणा छ्या ?"

इथगा मा एक अवाज आई," ये ठाकुर जरा इना आदि ."

मी चचरै ग्यों कि या अवाज  कैकी च

कील न बताई,' तुमर सनि पैथर  ज्वा सनि च वा भट्याणि च ."
 


फिर से अवाज आई," ह्यां जरा देरो खुणि इना ऐन जरा."

कील न बोल, "जा जयादी . जब तू छ्वटो छौ त वीन सनी म जान्दो इ छौ "

मीन ब्वाल, " हाँ पण यि लोक परोठी-बोतल लेक कख जाणा छन ?"
 


कील न ब्वाल" वीं तै इ पूछी लेन ."

मी अपण सनी पैथरा  सनि क तरफ जाण लगी ग्यों

 

 

(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? वीं सनि ण क्या ब्वाल? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग..३  )

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चबोड़ इ चबोड़ मा           


                                          दुमुख्या गुरा 


                                           भीष्म कुकरेती



                अब सि द्याखदी ब्याळि भैर देस या उन्ना देस अ एक पत्रिका (टाईम्स  ) म अपण प्रधान मंत्री मनमोहन सिंग जी क काट करे गे त बी.जे. पी. क प्रवक्ता रवि शंकर जी  इन नाचणा, गाणा छया जां बुल्यां  यू मनिख पुळेक , खुसी मा प्रसन्नता से  बौळे गे होलू . रवि शंकर जी क बुल ण से गंध आणि छे कि  कि टाइम्स मग्जीन जु बि लिखद सै इ  लिखद. पण जब पूछे गे बल कुछ साल पैल यीं पत्रिका न अटल विहारी  वाजपई जी कु न लेखी छौ ट आप लोग बुलणा छ्या कि टाइम्स वाळ कबि सै लिखदा इ नि छन. रवि शंकर प्रसाद जीन जो बि जबाब दे उ बौगाणो बहाना  छयो.  कोंग्रेस वळु तै पूछे ग्याई बल यू क्या च त कोंग्रेसी बुलणा बल इनी अटल विहारी वाजपई जी क बारा मा बि छौ . अपण बारा मा जबाब नि दीण दुसरो पूठो गू बथाण.  क्या डबल स्टैण्डर्ड यांकुणि बुल्द होला? .

             अपणा उत्तराखंडअ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणाबुलणा छन बल  बहुगुणा बंगाली छ्या. पण बहुगुणा वंशावली मा याँ पर बहस हुंई च कि जु बहुगुणा लोक बंगाली छया त बहुगुणौ कुलदेवी काली देवी ना गौरा देवी किलै च ?  अर जरूर श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी लखनौ चुनाव मा बुल्दी होली कि ब्व़े त हमारी त्रिपाठी च . जरुरत बगत उळकाणु (उल्लू) तै बुबा बुलण यांकी बुल्दा होला?

    इन सुण्याण मा आई कि उत्तराखंड क्रान्ति दल का ऐरी जी कोंग्रेस का एजेंट ह्व़े गेन , अर भौत सा लोक ऐरी जी पर भगार (लांछन) लगाणा छन. अब बिचारा कब ऐरी जी तलक भूका तीसा राला अरे कुछ त खाणि द्याओ ऊं तैं.

          एकन  पूछ बल हमर पहाडो मा कृषि क्रान्ति किलै नि आणि च , सरकार किलै कुछ नि करणि च ? मीन ब्वाल बल जब नब्बे टका पुंगड़ो मालिक उन्नादेस ( परदेस ) मा ह्वाला त कृषि क्रान्ति क बात सुचण बेमानी इ होली.

 कति रूणा छन बल पहाड़ो मा सिक्षा अर बतेरी चीज ठीक नि छन. मि बुल्दो बल ये भै पहाडो बात इ किलै हौरी जगा बि इनी जख्या- भंगुल जम्युं च

भंगुल  पर याद आई बल पैल जख्या क क्वी पूछ नि छे अब कुज्याण  जख्या क स्टेट्स किलै बढ़ धौं ?

मीन जब मंत्र तंत्र पर लेख लेखिन त कथगा इ लोग मै पर रुसेन कि मि अंध विश्वास तै बढ़ावा दीणु छौं. अर यि सौब तिसाला  गाँ जैक घड्यळ , टूण टण मण, गाड-गड्याळ  सौब पूजिक आन्दन.

            कुछ दिन पैलि एक उत्तराखंडी सामाजिक कार्यकर्ता मीम ऐक रूणा छया कि उत्तराखंडी संस्कृति ख़तम हूणि च अर हमारा लोग समजणा नि छन . अर यूंक वैलेंटाइन डे, फादर डे, मदर डे, क्रिस्चियन न्यू ईयर कुणि मेकुणि ग्रीटिंग कार्ड आन्दन पण गौ बुरी चीज च कि मकरैणि, बसंत पंचमी अर बिखोती क्वी ग्रीटिंग कार्ड आन्द ह्व़ावन  धौं .

   हमारा गढ़वळि लिख्वार सरकार तै गाळि दीन्दन बल सरकार गढ़वळि भासा बचाणो कुछ नि करणि च अर अपण बच्चों ब्यौवक न्योतो हिंदी मा छपवान्दन. सरकार तै एक नियल बणाण चएंद बल जु बि गढ़वळि लिख्वार सरकार तै गढ़वळि भाषा क अवहेलना बान गाळि द्याओ वै तै शादिक कार्ड गढ़वळि मा छपाण आवश्यक ह्वाओ निथर इन लिख्वार तै जेल मा बन्द करे जाओ.

  फेस बुक आज एक सच्चाई च अर इख मा लोक अपण अपण विचार धरदन. जादातर लोग पलायन तै गाळि दीणा रौंदन अर अपण बच्चों  तै अमेरिका या भैर देस भिजणो इंतजाम मा लग्यां रौंदन.. दुमुख्या गुरौ सैत इनी हूंद होला जु एक मुखान अहिंसा क गीत गांदा होला  अर हैंक मुखा न मूस-मिंड क घळकांदा होला. 

  एक मास्टर जी परेशान छ्या बल यार इ पटवरि घूस खांद अर उत्तराखंड मा भ्रष्टाचार बढ़ी गे अर अफु घीयक घंटी लेकी फेल नौनु तै पास बि करद.

   अमेरिका क अर्थ शास्त्री भारत अर ग्रीस (यूनान) क बारा मा परेशान छन बल इखाक राजनीतिग्य कामक नी छन अर यूं देसक  अर्थ व्यवस्था ठीक नी च. ये भै यि अपण अर्थव्यवस्था किलै नि दिखणा होला? गूणि अपण पूछ नि दिखदु अर बांदरौ बुलद बल तैकू पूँछ लम्बो च.


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                                          दुमुख्या गुरा 


                                           भीष्म कुकरेती



                अब सि द्याखदी ब्याळि भैर देस या उन्ना देस अ एक पत्रिका (टाईम्स  ) म अपण प्रधान मंत्री मनमोहन सिंग जी क काट करे गे त बी.जे. पी. क प्रवक्ता रवि शंकर जी  इन नाचणा, गाणा छया जां बुल्यां  यू मनिख पुळेक , खुसी मा प्रसन्नता से  बौळे गे होलू . रवि शंकर जी क बुल ण से गंध आणि छे कि  कि टाइम्स मग्जीन जु बि लिखद सै इ  लिखद. पण जब पूछे गे बल कुछ साल पैल यीं पत्रिका न अटल विहारी  वाजपई जी कु न लेखी छौ ट आप लोग बुलणा छ्या कि टाइम्स वाळ कबि सै लिखदा इ नि छन. रवि शंकर प्रसाद जीन जो बि जबाब दे उ बौगाणो बहाना  छयो.  कोंग्रेस वळु तै पूछे ग्याई बल यू क्या च त कोंग्रेसी बुलणा बल इनी अटल विहारी वाजपई जी क बारा मा बि छौ . अपण बारा मा जबाब नि दीण दुसरो पूठो गू बथाण.  क्या डबल स्टैण्डर्ड यांकुणि बुल्द होला? .

             अपणा उत्तराखंडअ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणाबुलणा छन बल  बहुगुणा बंगाली छ्या. पण बहुगुणा वंशावली मा याँ पर बहस हुंई च कि जु बहुगुणा लोक बंगाली छया त बहुगुणौ कुलदेवी काली देवी ना गौरा देवी किलै च ?  अर जरूर श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी लखनौ चुनाव मा बुल्दी होली कि ब्व़े त हमारी त्रिपाठी च . जरुरत बगत उळकाणु (उल्लू) तै बुबा बुलण यांकी बुल्दा होला?

    इन सुण्याण मा आई कि उत्तराखंड क्रान्ति दल का ऐरी जी कोंग्रेस का एजेंट ह्व़े गेन , अर भौत सा लोक ऐरी जी पर भगार (लांछन) लगाणा छन. अब बिचारा कब ऐरी जी तलक भूका तीसा राला अरे कुछ त खाणि द्याओ ऊं तैं.

          एकन  पूछ बल हमर पहाडो मा कृषि क्रान्ति किलै नि आणि च , सरकार किलै कुछ नि करणि च ? मीन ब्वाल बल जब नब्बे टका पुंगड़ो मालिक उन्नादेस ( परदेस ) मा ह्वाला त कृषि क्रान्ति क बात सुचण बेमानी इ होली.

 कति रूणा छन बल पहाड़ो मा सिक्षा अर बतेरी चीज ठीक नि छन. मि बुल्दो बल ये भै पहाडो बात इ किलै हौरी जगा बि इनी जख्या- भंगुल जम्युं च

भंगुल  पर याद आई बल पैल जख्या क क्वी पूछ नि छे अब कुज्याण  जख्या क स्टेट्स किलै बढ़ धौं ?

मीन जब मंत्र तंत्र पर लेख लेखिन त कथगा इ लोग मै पर रुसेन कि मि अंध विश्वास तै बढ़ावा दीणु छौं. अर यि सौब तिसाला  गाँ जैक घड्यळ , टूण टण मण, गाड-गड्याळ  सौब पूजिक आन्दन.

            कुछ दिन पैलि एक उत्तराखंडी सामाजिक कार्यकर्ता मीम ऐक रूणा छया कि उत्तराखंडी संस्कृति ख़तम हूणि च अर हमारा लोग समजणा नि छन . अर यूंक वैलेंटाइन डे, फादर डे, मदर डे, क्रिस्चियन न्यू ईयर कुणि मेकुणि ग्रीटिंग कार्ड आन्दन पण गौ बुरी चीज च कि मकरैणि, बसंत पंचमी अर बिखोती क्वी ग्रीटिंग कार्ड आन्द ह्व़ावन  धौं .

   हमारा गढ़वळि लिख्वार सरकार तै गाळि दीन्दन बल सरकार गढ़वळि भासा बचाणो कुछ नि करणि च अर अपण बच्चों ब्यौवक न्योतो हिंदी मा छपवान्दन. सरकार तै एक नियल बणाण चएंद बल जु बि गढ़वळि लिख्वार सरकार तै गढ़वळि भाषा क अवहेलना बान गाळि द्याओ वै तै शादिक कार्ड गढ़वळि मा छपाण आवश्यक ह्वाओ निथर इन लिख्वार तै जेल मा बन्द करे जाओ.

  फेस बुक आज एक सच्चाई च अर इख मा लोक अपण अपण विचार धरदन. जादातर लोग पलायन तै गाळि दीणा रौंदन अर अपण बच्चों  तै अमेरिका या भैर देस भिजणो इंतजाम मा लग्यां रौंदन.. दुमुख्या गुरौ सैत इनी हूंद होला जु एक मुखान अहिंसा क गीत गांदा होला  अर हैंक मुखा न मूस-मिंड क घळकांदा होला. 

  एक मास्टर जी परेशान छ्या बल यार इ पटवरि घूस खांद अर उत्तराखंड मा भ्रष्टाचार बढ़ी गे अर अफु घीयक घंटी लेकी फेल नौनु तै पास बि करद.

   अमेरिका क अर्थ शास्त्री भारत अर ग्रीस (यूनान) क बारा मा परेशान छन बल इखाक राजनीतिग्य कामक नी छन अर यूं देसक  अर्थ व्यवस्था ठीक नी च. ये भै यि अपण अर्थव्यवस्था किलै नि दिखणा होला? गूणि अपण पूछ नि दिखदु अर बांदरौ बुलद बल तैकू पूँछ लम्बो च.


Copyright@ Bhishma kukreti , 10/7/2012

Bhishma Kukreti

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व्यंग्य क्या क्या करदो -भाग -१

                 भीष्म कुकरेती

[व्यंग्य, व्यंग्य परिभाषा , व्यंग्यकार के कर्तव्य , व्यंग्य व्याख्या ]

   व्यंग्य असल मा कुछ नी च एक बात बुलणो बिगळयूँ  ब्यूंत च. जन कि छ त बडी गितांग पण क्या करण जनम बिटेन जुकाम रौंद त  स्या गीत उन्नी भौण मा गन्दी.

मीन घड्याइ /स्वाच  बल व्यंग्य क्या कौरी सकुद

चबोड्या साहित्यकार अजम (नि हिलण वाळ ) राजनैतिक व्यवस्था तै हलकै  सकुद- द्याख च आपन देखी ह्वाल बल एन.सी.आर. क किताब का शंकर को चखन्यौर्या रिखडौ   न आंबेडकर वादी  अर नेहरु बाद्युं कि निंद हराम कै.
 
चबोड्या साहित्य अजाण तै   सजाण /सुजाण, अजाक तै समजदार अडबंग तै  ढंगौ बणै दीन्दो.

जै पर व्यंग्य करे ग्याई वो अजाप (श्राप) दीणो तैयार रौंदू. 

मसखरी मसखरी मा साहित्य अटकण तै सटकण मा बदली दीन्दो

असली चखन्यौर्या  लिखाड़ वी च जो अटाक (रस्ते से हटकर) साहित्य द्याओ .

मजाकिया ब्यूंत मा लिख्युं साहित्य भ्रष्टाचारियूँ  तै इन अटेरदों  जन हम धुयाँ   झुल्ला  अटेरदां

अनाचार्युं की खोज व्यंग्यकार इनी करद जन बुल्यां कै चिंचुड़ या अट्टा कि  खोज ह्वाओ

व्यंगकार अजब्याळि पर नजर डाळणु रौंद अर दगड मा अग्वाड़ी बि देखणु रौंद याने अडिन्ठा तै दिखवळ बणान्दू

व्यंग्यकार अदखिचरी बातुं   मजाक उड़ान्द .

अदलती जनता क बात लोगूँ तक व्यंग्यकार पौन्चान्दो अर अदानो तै रस्ता दिखांदु

अनमनि भौण का व्यंग्य जादा असरकारी होन्दन.

जो देस, समाज का अन्याड़ (नुकसान) करदन वुंकी बेज्जती बि व्यंग्युं मा हूंद.

सीदा लोगूँ दगड असली व्यंग्यकार की अपड़ीयूंत होंद.

अपत्यारु/ अणभर्वस्या  अर अपरज्जी/अराजक  नेता या अप्सरों पर चिरोड़ा मार्दन.

देस का, समाज का  आंकियूँ (दुश्मन) या देस-समाज का आंखुर्यौं (वैर की भावना)  का पर्दाफास  बि व्यंग्यकार करदो

अळगस्युं पर चबोड़ से खूब मार पद्दी

व्यंगकार समाज मा औ-बटाउ (बेघरबार ) वळु हकौ छ्वीं करदो

चबोड्या  साहित्य अबिंड़ो/ अणबुल्या, असूर   लोगु तै अड़ान्द च

बकै अगवा ड़ी अंकुं मा ....

 

copyright@ Bhishma Kukreti 12/72012
व्यंग्य, व्यंग्य परिभाषा , व्यंग्यकार के कर्तव्य , व्यंग्य व्याख्या जारी...

 

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