Author Topic: Satire on various Social Issues - सामाजिक एवं विकास के मुद्दे और हास्य व्यंग्य  (Read 149048 times)

Bhishma Kukreti

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Humour/Satire
चबोड़ इ चबोड़ मा भैरों!

 



                                चबोड्या, चखन्योर्याघन्ना भाई जब एम्.एल.ए . बौणळ

 

                                  भीष्म कुकरेती



                अब जब नामी गिरामी हंसोड्या, चबोड्या, चखन्योरा घन्ना भाई तैं बीजेपी वाळउन् कमलऔ फूल पकड़ऐ इ द्याई त ठीकि कार भै ! अब याँ पर छ्वीं बि लगी सकदन बल चुनौ प्रचार मा लोक घन्ना भाई क आश्वासन का हिसर-काफळ, किनग्वड़ डंफू, खाणो आला या हौंसदर्या , चबोड़, चखन्यौ सुणणो आला . मै लगद जनता सौब जाणदी च, पछ्याणदी च अर जनता द्वी इ बातुं मजा ल्याली. चुनौ मीटिंगों मा जनता पैल त घन्ना भाई क जोक्स, हंसोड्या गीत सुणली अर साफ़ तौर पर घन्ना भाई अपण चुनावी जोक्सुं मा कौंग्रेसऔ मजाक उड़ाला एकाद जोक्स सोनिया पर ह्वाला , राहुल गांधी पर बि एक आध फबती होली, चोबोड़ की खुंकरि सतपाल महाराज पर बि जरोर चौलली. ना ना मनमोहन सिंग को नाम घन्ना भाई न कतै नि लीण किलैकी मनमोहन सिंगऔ नाम से मंहगाई की प्याजौ पिपराण, गरीबी की सिलाण जी ऐ जाण. अब जब जोक्स , चबोड़ ख़तम ह्व़े जाला. त घन्ना भाई नेता गिरी कर्तब्य निभाणो खातिर अश्वासनुं नौ पूळ, निपट अश्वासनूँ बिरल़ो औंरु, तिमल बेडु जन अश्वासनुं फूल जांद दै की दक्षिणा जनता तैं पकडै द्याला. हाँ जु चुनौ मीटिंगों मा नरेंद्र सिंग नेगी गिताड़ राल त भै फिर क्या बुन भै . उन एक बात होली ही जै सभा मा घन्ना भाई ह्वाला वीं सभा मा कैन बि लाल कृष्ण अडवानी क्या सुषमा स्वराज का भाषण कतै नि सुणण. वोटर रूपी श्रोताओं न ,सब्युं न बुलण " घन्ना भै वन्स मोर , घन्ना भै वन्स मोर .." अब अडवाणी या सुषमा स्वराज बेवकूफ त नि छन उलटा ऊन बि बुलण " घन्ना भाई ! जोक्स हिंदी में सुनाओ " घन्ना भाइ हिंदी मा सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी की चबोड़ कारला अर तुमर इ सौं दां जु झूट सुचणो ह्वालू ; अडवाणी अर सुषमा स्वराज घन्ना भाई का जोकुं तैं यू.पी. क चुनावी सभा मा सुणाला अर तब जैक क्वी क्वी ,\अडवाणी अर सुषमा तैं सुणनो आला. पैलाक सी बात त रइं नी च की लोक घर्र अडवाणी या सुषमा स्वराज तैं सुणला आला . अब त यू.पी. क चुनावी पोस्टरूं या अखब़ारूं मा इन इबारत होली, " घन्ना भाई के ताजे ताजे जोक्स अडवानी और सुषमा स्वराज के मुंह से आज की चुनावी सभा में सुनिए . ' त यू.पी. का लोक बि अब घन्ना भाई का जोक्स सूणल. घन्ना भाई यू.पी. मा बि मशहूर ह्व़े जाला अर कनी कौरिक बि अडवानी अर सुषमा तैं सूणदेर/श्रोता मिलि जाला . घन्ना भाई का जोक्स की हाम/प्रसिधी सोनिया गांधी मा बि पौंचलि अर जनतौ प्रेस्सर से सोनिया घन्ना भाई तैं फोन कारली , " गन्ना बाई ! एकाद , जोक्स अमे , अमारी कोंग्रेस को बी दो ना ! '.. अब इखम मी कुछ नि बोल सकदु बल घन्ना भाई अपण कलाकारी कर्तव्य निभाला या राजकरण्या/ राजनैतिक ड्यूटी बजाला धौं !



                     मी क्या सौब कोंग्रेसी चौंर्या स्याळ बि बुलणा छन बल पौड़ी बिटेन त घन्ना भाई न इ जितण त यांको मतबल च घन्ना भाई मार्च बिटेन ड्याराडूण चलि जाला. अर फिर घन्ना भाई क मैत पौड़ी ना ड्याराडूण ह्व़े जालो. अर कोठी त फिर ड्याराडूण मा इ बौणली. फिर घन्ना भाई क सुक्युं, पिचक्युं, पेट अर पीठ एक हुयाँ पुटक गैबण भैंस्व लद्वड़ जन ह्व़े जालो अर जन दु दु नौनी नारायण दत्त तिवाड़ी तैं सरकाणा रौंदन उनि घन्ना भाई तैं दु दु जनानी ठसकाणा राला, जनक्याणा राला. अब इखमा घन्ना भाई क क्वी दोष नि होलू कुज्याण यू लोक सभा अर विधान सभा क खाणकै तासीर इ इन च कि या विधान सभा /लोकसभा कि आबो हवा इन च कि अच्छो खासो नेतौं पुटुक गैबण भैसों जन ह्व़े जांद . मी तैं पूरी उम्मीद च घन्ना भाई बि ये मामला मा पैथर नि राला अर ड्याराडूण जन्दो जांद राजनैतिक हिसाब से आशाबंद /गैबण/गर्भवती पुटुक वाळ ह्व़े जाला.



            अब जब घन्ना भाई पैल दिन शपथ ल़ीणो विधान सभा जनां जाला त माहौल इ कुछ हौरी ह्व़े जालो. विधान सभा क चौक मा घाम तपण दें सौबसे पैलि त कोंग्रेसी खबेशि (राजपूत, ब्राह्मण अर शिल्पकार ) च्वाल़ा अर राजकरण्या लारा छोड़ीक घन्ना भाई से जोक्स कि मांग कारल. घन्ना भाई जोक्स सुणेक सौब तैं खुश कारल. घन्ना भाई न तैबरी तलक कलाकार इ रौण जैबर तक राजनीति का कळच्वण्या पाणी क ढंढी मा डुबकि नि लगाला.

            अब जब घन्ना भाई क सौं/शपथ घटणो टैम आलो त राष्ट्रीय स्वयं संघ का च्याला होणो प्रमाण त द्याला ही अर घन्ना भाई पुट्ठ्याजोर/कोशिश लागला कि कै बि तरां से संस्कृत मा सौं/शपथ घटे जाओ त भन्ना भाई न बुलण-

 श्रृंगारो विष्णुदैवत्यो हास्य: प्रथमदैवत:

अत:मैं घन्ना भाई मेरे कलाकारी देवता , हास्य देवता प्रथम की शपथ लेता हूं........... और

विपरीतालंकारैर्विकृताचारभिधानवैषेश्च

विकृतैरर्थ विशेषिर्हर्सतीति रस स्मृतो राजनीतिस्य हास्य
: :

अर्थात मै घन्ना भाइ विपरीत वेश भूषा से अपने को सज्जित करने से, उल्टे सीधे आचरण करने से , उल्टी सीधी बात बोलने से , अनर्गल अर्थ वाले, नाहंसी में भी हंसी लाकर राजनैतिक हास्य रस पैदा करूँगा.

             सौं/शपथ का श्ब्दुं से पीठासीन अध्यक्ष न बि क्या बुलण अब    जब जादातर सब्बी राजकरण्या खिलाड़ी 'उल्टे सीधे आचरण', 'उल्टी सीधी बात बोलने' 'अनर्गल अर्थ वाले' वाळ इ छन त घन्ना भाई तैं रोकिक क्या फैदा! फिर बि पीठासन अध्यक्ष ब्वालल बल " कोई भी बात रिकोर्ड में रखने से पहले हम घन्ना भाई की शपथ की जांच करेंगे की कोई असंवैधानिक शब्द ना आ जायं ."

                      अब जु घन्ना भाई की बी.जे.पी. बहुमत मा आली त घन्ना भाई को कलाकारी पकृति वै दिन से इ मड़गट जोग ह्व़े जाली याने की घन्ना भाई की कला वै दिन इ मोरी जाली. अब ए भै ! घन्ना भाई अफुकुणि मिन्स्टरै खुर्ची बान पुट्ठ्या जोर लागला की तुम तैं जोक्स सुणाला हैं ? मिनिस्टर नि बौण साकल त घन्ना भाई कै सरकारी खाऊ-प्याऊ संस्थान की चेयरमैनशिप क बान जुगाड़ भिड़ाला या लोकुं तैं हंसाला ? बी.जे.पी तैं बहुमत मीलल त सोळ आना एक गढ़वाळी कलाकारों कला की तेरवीं /बरखी न जरोर हूण. पण एक शांति त राली की अपण घन्ना भाई क पुटुक आशाबंद/गैबण त ह्व़े इ जालो ! कुछ पाणो बान कुछ खूण बि पोड़द. हम एक कलाकार की कला की मौत दिखला त घन्ना भाई की ड्याराडूण मा कोठी त बौणली की ना ? हिसाब बरोबर. हाँ एक बात च बी.जे.पी वाळऊँ खुणि एक फैदा जरोर ह्व़े जालो . जब बि कोंग्रेसी विधान सभा मा दंगळयाट करणो स्वचाल वै दिन बी जे. पी. वल़ा घन्ना भाई तैं बुलणो बोली द्याला अर घन्ना भाई अपणा स्टाइल मा हौंसदारि भाषण द्याला त विधान सभा का सदस्य हौंस हौंसिक पुटुक पकड़ना राला. अर इन मा कोंग्रेस की दंगळयाटऔ मनसा कौंग्रेस मा इ रै जाली.

                 जु कोंग्रेस तैं बहुमत मीलल त तब बि गढ़वाळयूँ तैं पुळयाणो/खुश होणऐ जरोरात नी च. एक कलाकार की कला की मौत त तब बि अवश्यम्भावी च किलैकि बी.जे.पी वालुं बाण/प्रक्रति त विधान सभा मा हो हल्ला की ह्व़े गे. अर इन मा घन्ना भाई तैं हौंस, चबोड़ छोड़िक रौद्र रूपी हो हल्ला, भंगळयाट, भिभड़ाट सिखण पोडल अर रौद्र रस अर हास्य रस की त जनम जाती दुश्मनी च.

अच्काल जै बि पौड़ी वाळ तैं द्याखो स्यू इ घन्ना भाई घन्ना भाई करणो च. जब घन्ना भाई चुनौ जीति जाला तब बि पौड़ी वाल़ू न घन्ना भाई की रट लगाण किलैकी घन्ना भाई न ड्याराडूण जान्दो जांद पौड़ी वालुं तै बिसरी जाण अर पौड़ी वाळ घन्ना भाई तैं खुज्याणो विज्ञापन ' खबर सार' मा द्याला " जै तैं घन्ना भाई पौड़ी मा दिखे जालो वै तैं इनाम मिललो .." ना त भाई न हूण ना त भाई बांठे भत्ति खयाण. ना त घन्ना भाई ल चुनौ जितणो परांत पौड़ी मा दिख्याण ना ही कै तैं इनाम मिलण. अब जन कवि लोक कविता गंठयान्दन बल " हे प्रवासी ! अपण पितर कूड़ी तैं किलै बिसरी तू ! " उनि वीरेंद्र पंवार कविता गंठयाल अर नरेंद्र सिंग नेगी जी गाणा गाला, ' हे घन्ना भाई ! अपण करम कूड़ी पौड़ी तैं किलै बिसरी तू !"

                  पण इखमा घन्ना भाई को क्वी दोष नी होलू किलैकि राजनीति क बाण/प्रकृति इ इन होंदी बल खुर्ची क बान राजधानी मा जंकजोड़ करण पोडद अर पितर कूड़ी , करम कूड़ी सौब बिसरण पोडद.



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चबोड़ इ चबोड़ मा भैरों!

                                                           मुन्ना भाई क क्षेत्र मा  ओपिनियन  पोल की पोल  

                                              भीष्म कुकरेती

                       अच्काल चुनौ मौसम नी च असल मा अच्काल त एक्जिट पोल को मौसम च . चुनौ प्रत्यास्युं से बिंडी त  एक्जिट पोल का सर्वेयरूं टेंट/तम्बू लग्याँ  छन.  इनां  एक्जिट पोल, उना एक्जिट पोल, इख एक्जिट पोल, उख एक्जिट पोल, तौळ एक्जिट पोल त मैल (मथिन) एक्जिट पोल  जख जाओ तख़ एक्जिट पोल.   १८२४ हेनिसबर्ग पेनिसिल्वेनीयन  ओपिनियन पोल की पवाण लगै छे अर अब या बीमारी  आन्द आन्द सरा गढ़वाळ मा लेँटीना  खौड जन सौरी गे. जैदिन बिटेन मुन्ना भाई चुनौ मा खड़ो ह्व़े अर मुन्ना  भाई न चुनौ  पर्चा क्या भौर कि में  कुण मुसीबत ह्व़े गे .

                 अब हर चार घडी मा  मेरापहाड़डोट कौम  का एम्.एस मेहता जी क फोन आन्दु बल भीसम जी आप मुन्ना भाई  क एरिया क छन त मुन्ना भाई क एरिया क  एक्जिट पोल मा हर घड़ी हिस्सा ल़ीणा राव अर  व्व्युअर्स तैं बतान्दा रावा बल मुन्ना भाई  क एरिया बिटेन कु जीतल, मेहता जी फोन नि धरदन कि यंग उत्तराखंड का विपिन पंवार जी को फोन ऐ जांद बल कुकरेती जी यू क्या च ? आप मेरापहाड़ मा एक्जिट पोल मा हिस्सा लीणा छ्न्वां अर यंग उत्तराखंड तैं छ्वारा छपार समजिक तिराणा छ्न्वां, ज़रा हमर यंग उत्तराखंड का एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल मा बि जोगध्यान/गहरी रूचि  लगैक  हिस्सा ल्याओ . उख ड्याराडुण  बिटेन    दून दर्पण, गढ़वाळ पोस्ट, दैनिक हिंदुस्तान, अमर उजाला, , दैनिक जागरण का दगड्या संवाददातों क फोन त ठीक च पण जब मेरी पट्टी क कथगाई अखब़ारूं   संवाददाता नंदा दत्त बड़थ्वाळ जी क फोन आई बल ए भीषम जरा अपण गाँ जसपुर,  म्यार गां  बडेथ का, न्याड़  ध्वारो सब्बी गाँऊँ अर त्यार रिश्तेदारूं  सब्बी गाऊँ मा  ओपिनियन पोल या एक्जिट पोल  कौर अर रिजल्ट श्याम दें तलक मै तैं बथा . त मी झसके ग्यों

मीन आजौ पत्रकार पण ब्याल़ो रिटायर्ड मास्टरजी तैं  पूछ , " मास्टर जी ! कनो ? मी रौंद मुंबई मा अर आप रौंदा बडेथ  मा  त मीन जि ओपिनियन /एक्जिट पोल करण छौ कि उख रैका तुमन ? "

मास्टर जी उर्फ़ पत्रकार जीन बिंगाई/समजाई, " अरे भीसम ! इख क्या च ! अच्काल लोक क्या अपणि   कज्याण बि पत्रकारूं देखिक इन बितकदन जन इकुळया सन्नी /छन्नी /गौसाला क इकुळया गोर उपरि गोरुं   देखिक बितकदन. क्वी बि ओपिनियन पोल या एक्जिट पोल मा हिस्सा इ नि ल़ीणो च अर जु बथाणा भी छन ओ सौब झूट बुलणा छन. मीन चार दिन पैल कनै  कौरिक बि लोकुं तैं पुल़े पुसेकि ओपिनियन ब्वालो कि एक्जिट पोल कार त पायी कि यमकेश्वर ब्लौक बटें परिवर्तन पार्टी जितणि च अर इख बिटेन परिवर्तन पार्टी क क्वी उम्मेदवार इ नी च . वोटर अब पत्रकारूं से इनी खार खाणा छन जन दिग्विजय सिंग आर एस. एस से खार खांद . भीसम अब त त्यारो इ  सार च.  जरा मुंबई मा बैठिक  म्यार अर दुसर गाँव कि खबर दे भै कि कु जितणु च."
 
   भुर्त्या बौणिक , अपुण बाड़ी पळयो  खैक, अपण  मोबाइल का बिल बढैक मुंबई मा बैठिक ढाञगु पट्टी क नामी गिरामी पत्रकार जी खुणि ढाञगु  पट्टी याने मुन्ना भाई क चुनौ क्षेत्र मा ओइपिनियन पोल कार अर ओपिनियन पोल को रिजल्ट या च

   अब जन कि जसपुर ग्राम सभा मा जसपुर गाँ का वोटरूं संख्या हौरू गाँ से भौत जादा च पण जसपुर वाळ अपण गाँ वाळ पर कतै बि विश्वास नि करदन अर जादातर जसपुर ग्राम सभा क   प्रधान दुसर गौं  को ही चुने जांद. जु जसपुर का लोक सद्यनो तरां

 अपण गां वालूं पर विश्वास नि कारल त जसपुर वालूंन ग्वील , बडेथ  का ऐजेंटूं कि इ सुणन.  जसपुर का कुकरेत्युं  न ग्वील का जाती भाई कुकरेती एजेंट कि नि सुणनअर बडेथ का बड़थ्वालूं बात जरुर मानी जाण   अर जसपुर का जखमोला अर बहुगुणोन ग्वील वालूं बात त मानी ल़ीण पण बडेथ वालूं  क नि सुणनि अर फिर जसपुर का शिल्पकारुं न ना त जसपुर , ना बडेथ  अर ना ही  ग्वील वलूं क  बात मनण (बात बि सै च  जब जसपुर का शिल्पकार तिनी गावूं हौळ लगांदन त अच्काल जब हल्योंकमी ह्वाओ त किलै शिल्पकारूं ण कैकी बि सुणन !) . ग्वील वालुं बात बि अजीब छ सरा  अडगें मा इखाक  कुकरेती कै बि कुकरेती कि इख तलक कि अपनों गां का कुकरेत्युं कि बात नि माणदन अर बडेथ वालूं बात बि ग्वील़ो कुकरेती नि सुणदन. इन मा जसपुर का शिल्पकार इ ग्वील वालूं पर दबाब बणे सकदन कि ग्वील वाळ कै तैं वोट दयावान . पण सबसे बड़ो सवाल च जसपुर का शिल्पकारों तै कु पटालो. जसपुर का शिल्पकार अपणि  अडगें  (क्षेत्र)  का कै बि बामण, राजपूत अर  शिल्पकारूं बात नि मणदन . जसपुर का शिल्पकारूं बुलण च बल हम त यीं पट्टी का पुराणा बासिन्दा छंवां जु कुकरेत्युं दगड इ जसपुर मा बसी छ्या, हम जसपुरौ शिल्पकारूं क हुक्का श्रीनगर अर टीरी क माराज बि पसंद करदा था त  हमन कैकी बात किलै सुणन. इन मा जसपुर का शिल्पकारूं  तैं पटाणो डबरालस्यूं, उदैपुर,  अजमेर, लंगूर का ऐजेंटूं तैं लाण पोड़ल . अब जब यीं अडगें /क्षेत्र मा दुसर अडगें का   एजेंट ऐ जाला त तबी पता चौलल कि गौल या ऊँट कै हौड़ फरकल.

 अर इ हाल म्यार सौब रिश्तेदारूं  गाऊँ हाल छन . सबि जगा भैराक एजेंट जाला त पता चौलल बल ऊँट कें हौड़ बैठल .

           या त ह्व़े माइक्रो लेवल कि बात अब ज़रा माइक्रो लेवल कि बात बि जणन जरुरी च .

         हाँ जु बि आश्वासन का औडळ बीडळ खाली लाला इ ना बल्कण मा  लोकुं तैं लगण बि चएंद  बल नेता जी आश्वासन  पूरा कौरल त सैत च वो नेता जीति जालो जो आश्वासन का औडळ -बीडळऊँ दगड विश्वास का ढांड बि बरखे साकल वैका जितणो असार जादा राला. चुनौ  माया  ( परसेप्सन  )  को खेल जु  च . अर जखम जाती गणत कि गोटी फिट करण उखम गोटी फिट करणी पोडल .

        अब जब कै तैं जग्गी मा खाणक खलये जाओ अर दक्षिणा नी लगए जावू  , पाणि पिठे नी ह्वाऊ त वा जग्गी सुफल नि होंद . जग्य/ यग्य  मा जु होम सामग्री नि फुके  जाओ त वो यग्य सुफल नि मणे जांद त जु जथगा  रूप्या चुनावी यग्य मा

फूकल वैको जितणो असार जादा होला.

   अब को जमाना छ्वायों/छोयों क नी च अच्काल त गाड -गदनो क जमानो च . त जु बि गाड- गदनो मा पाणी जगा गाड- गदनो मा  शराब , दारु बौगालो वो इ जितलो .

        अब सौब कुछ ह्व़े बि जालो अर चुनाऊ दिन बिदू नि रालो , ह्यूं पोड़ी जालो  त समजी ल्याओ पकीं पकयीं  खीर मा कवा न बीटी द्याई. त जू बि प्रत्यासी  वोटरूं  तैं रगोंड़ी -रगोंडिक, ल्ह्सोरि- ल्ह्सोरिक , जनकै-जनकैक, खेंचि-खेंचिक पोलिंग बूथ ल्ही जालो वैका जितणों  असार  बिंडी राला.

  मी यू लेख लिखणु इ छयो कि  चुनौ प्रत्यासी मुन्ना भाई क फोन आई , " यार भीसम!  , ज़रा अपण ओपिनियन पोल कु हिसाब से मी तैं बतादी  कि मी जितणु छौं कि ना. इख कुछ पता इ नि चलणु कि मी जितणु छौं कि ना  ?"

 (Its just a fiction and satire )

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                   Khanai Dain Saub Ek: One of the Remarkable Satirical Garhwali Poems 
             
             (Satirical Garhwali Literature, Satirical literature of Uttarakhandi Language, Himalayan Satirical Literature)

                                                    Bhishm Kukreti            
               Vimal Negi is an editor of a Garhwali fortnightly  ‘Uttarakhand Khabar Sar and he  does not mince words in attacking administration or society for not paying attention on the issues of local languages as Kumauni, Garhwali and Nepali through his prose.  However, Vimal Negi is a regular poet too and his poetries are varied in nature and texts.
        Garhwali language is fortunate language that there are poets  late Abodh bandhu Bahuguna, Kanhayaa lal Dandriyal,  lait Keshwan,Pooran Pant Pathik,  Harish Juyal , great Indian singer Narendr Singh Negi ,  Chhipadu dada and many more who  had been creating  satirical poems on the subject of society and on the contemporary subjects as election and deeds (misdeeds) of politicians.
   Vimal Negi published his fresh poem ‘Khan Dain Saub Ek’ on the contemporary issue of election in recent Khabar Sar issue (15th 31st December 2011). This author terms this poem as one of the remarkable Garhwali satirical poems and my readers will agree too.
 

           खाणै दैञ सौब् एक

कवि : विमल नेगी (संपादक उत्तराखंड खबर सार, पौड़ी )

मयर मन क मीत तुमि , तुमी से छौं भयभीत
मन का मंज मिल्दो नि , हार ह्वेली या जीत I
चनौ मा तुमि भगवान् छन, तुमी से छ फ़रियाद
उच्यणु धौरी औलू फिर, टुप्प पाँच साल बाद I
बिना मतलब को आंदो नी , यूँको कखी बि छंद
मतलब हल ह्व़े जांद जख , वख रैंदा निर्द्वंद I
राजनीतिमा त्प्क्यान छन भेश्धारी अनेक
मंचो पर गाळी देणा , खाणै दैञ सौब् एक I
पांच साल बां हौड़ पुड़याँ जनता छै लाचार
गरुड़ जन रिटणि लग्यां छोडि क घरबार I
राजनीति की देळी मा , बैठ्याँ छन कति घाघ
बिन मतलब बिन कर्याँ -बोल्यां , चमकनी यूँका भाग I
नजर भोट पर हाथ मा तौंका , धरयां ह्हन नोट
कैको भरवस कन यख , कख मरदन चोट I
बोल अपड़ी कीमत बतौ, ऐजा हमारा साथ
राजनीति मा बणदि नी बिना नोट की बात I
बोतळ जै जैकार छ , बोतळ को नमस्कार
बिन बोतळ इथैं होंदी नी चुनौ बैतरणी पार I

Contact to Mr Vimal Negi through
khabarsaar1@gmail.com
Copyright @ Vimal Negi for poem

                 Milton commented upon Hall, expressed clearly that satire should bite   and stated by title ‘ Tooth-lessee Satyrs  and  Byting Satyrs ‘ as “ if it bite neither the persons nor the vices , how is it a Sytr , an if it bites either , how is it toothless . ..”  . The said poem is very much with sharp teeth and bites the decisive nature of current politicians with their Chamches (vices).
              A famous poet john Dryden was strong believer that a successful satire writer should be a man of virtue, intelligence and a candor or generosity. Yes1 it is a fact of life that a satirist can’t be cruel and rough in handling the subject and attacking the culprits of any kind. Vimal Negi attacked the selfish politicians and their associates or the political system with sharpened words but Vimal never seems for leaving   the dignity of a poet and Vimal is aware that the duty of a satirist is to follow Gandhi ji too that attack the dirt and not the dirty men.
 Vimal Negi has been successful in Khanai Dain Saub Ek   in reducing the ranks of politicians and their subordinates.   Vimal uses various techniques in the poem as reduction, invective but with respect, caricature and even the last stanza is in as good as burlesque style.
 The poem is in monologue style that the poet speaks from behind and endeavors his point of views.
   Any critic will vouch that Vimal has been successful in creating political satire as Maurice Joly, Santayana, Nietzsche, Marvel Andrew, George Russel, Castillejo
   The poem Khanai Dain Saub Ek   by Vimal Negi is definitely a shining gem of Garhwali poetry.   

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Satire only

चबोड़ इ चबोड़ मा

                               भावी विधायक मुन्ना भाई की पौलिटिकल ट्रेनिंग 
 
                      (Garhwali satire, Satire in Uttarakhandi Language, Himalayan Wits)
 

                                                                    भीष्म कुकरेती

                  बी.जे.पी वलुं न  गढवाळीs  महान कलाकार घन्ना भाई तैं  पौड़ी विधान सभा सीट का  टिकेट दे त हमर अडगें (क्षेत्र)  मा बि सलाण का अति महान गढवाळी कलाकार  मुन्ना भाई तैं बि राष्ट्रीय पार्टी न टिकट  दे द्याई. अब राष्ट्रीय पार्टी क टिकेट मिलण  अलग बात च , मशहूर हूण एक बात च, चुनौ लड़ण, अर चुनौ बान तिकड़म से काम करण अलहदा छ्वीं  छन   

             ड्याराडूण मा पार्टी हेड क्वाटर मा मुन्ना भाई अपण राजनैतिक गुरु जी अर पार्टी रणनीति कारौ  समणि बैठयाञ छया . 

 गुरुजी  (एक लिस्ट तैं समणि करदन ) - मुन्ना भाई !  जब बि जरोरात ह्वाऊ त धन्ना सेठ तै बोली दे धन्ना सेठ त्यार एरिया मा पैसा पौंछे द्याला . 
 
मुन्ना भाई (इन उछिंडेन जन बुल्यां जुंडळऔ दाण भुजदें उछंड्यांद ) - घन्ना भाई ...?

रणनीति कार -  मुन्ना भाई ! राजनीति मा  भुजद दै जूंड़लूं  तरां उछण्डण बन्द   कौर. संत गौड़ी तरां योगी तरां आचरण कौर .  हर समौ लटमुंड्याळ  लुट्या तरां रौण कि अधार तैं बि पता नि चौल सौक  बल यू लुट्या कै हौडु  फरक्यालू .

मुन्ना भाई - पण रणनीति कार जी ! यू धन्ना सेठ त हमारो एरिया को बड़ो आळी जाळी , गलादर सौकार च. धन्ना सेठन पूरा एरिया क जंगळ काटी कूटिक   जंगलोँ रगड़/जाजर कौरी आल. घन्ना सेठ  से कत्ति दें मेरी लडै  बि हुंईं  च 

गुरु जी - मुन्ना भाई ! हम रामलीला नि खिलणा छंवां  कि जु बगैर आळी जाळयूँ मौ मदत से चुनौ  जीत जौँवां. चुनौ मा बगैर आळी-जाळयूँ   मदद से  तुम एक बि सौ सभा  नि कौरी सकदा .

रणनीति कार -  सुण मुन्ना भाई ! घन्ना सौकार न अपण गेडियूँ पैसों से सर्वे करै अर पाई बल तू जितणे छे त  त्यार सरा चुनौ खर्चा उठाणो तैयार ह्वाई .

गुरु जी - मतबल या च , हमन या सरा टेरिटरी घन्ना सेठ तैं बेचीं याल.

मुन्ना भाई - मतलब ...!

गुरु जी - हाँ ! घन्ना गलादार क दगड हमारि सकड पकड़ (चुपके से समझौता या कौनस्प्रेसी )  ह्व़े ग्याई बल तू जीति गे अर हमारी सरकार बौणि गे त पांच साल तलक तू, हमारि  सरकार या क्वी ऑफिसर  यीं अडगें/क्षेत्र क  जंगळऊँ तर्फां सुपिन मा बि नि ह्यारल .

रणनीति कार  - जब बि तू अपण एरिया मा मीटिंग सीटिंग करणै  जैली  त द्वी दिन अग्वाड़ी अर द्वी दिन पैथराँ  लोकुं खुणि अर चुनौ से  पाँच दिन पैलि सौब पोलिंग बूथुं क न्याड़ गौं मा   शराबौ इंतजाम दरौड्या सेठ कॉरल. त्वे तैं कुछ नि करण . हमारा एजेंट अफिक दरौड्या सेठ क दगड रन्त रैबार  ( कम्युनिकेसन  )  करणा राला , टैम पर सौब जगा शराब पौंछणि राली .
 
मुन्ना भाई - पण ..

गुरूजी - पण क्या ! हम तैं पता च   तीन दरौड्या  सेठ क विरोध मा गीत गै गै क अपण नाम कमाई अर कबि बि  दरौड्या  सठ न चूं चां बि नि कार . जणदि छे ना उमेश डोभालौ क्या हाल ह्व़े छौ !

मुन्ना भाई - पण ..दरौड्या सेठ क कच्ची दारु पेकि कथगा लोक मोरिन ?

रणनीति कार  - हाँ ! दरौड्या  सेठ क दगड बि बड़ो कामयाब समझौता ह्व़े गे बल हमारी  सरकार अगला पांच सालुं तलक ये एरिया मा दरोड्या सेठ क दारु पेकि लोक मोरन  या गूणी बांदर मोंरन हमारी सरकार इनां झळकाँ बि नि द्याखलि. 

 रणनीति कार - अर हाँ जु त्यार च्याला चांठी ऊँ तैं ज़रा भाषण-भीषण  अर भलो वातवरण बणाण तक इ सीमित रखी . चुनौ का  असली ब्यूँतूं/तकनीकौ ऐजेंटों   बान हमन  पुळमास्टर तैं बडी मुस्किल से पटै  याल.

मुन्ना भाई फिर से उछिंड
 
गुरूजी - राजनीति को पैलो पाठ कबि बि , कखिम बि , कनि पति मा उछिंडेण  नि चयेंद   

मुन्ना भाई - पण मीन इ त पुळ-मास्टर ठेकेदार क मनरेगा ,  ग्राम विकास , रोड कनस्टरकसनो  घोटालों पर्दाफास कौर ..

रणनीति कार -   हाँ तबी त त्यार नाम अडगैञ मा ह्व़े अर तबी त हमारी पार्टी न त्वे तैं टिकट दे. अब जोगध्यान  लगैक सूण, ध्यान से समज  ! पोलिटिकल इलेक्सन मसिनरी अर नाम कमाण मा भौत फरक होंद. पुळ-मास्टर चुनौ मसिनरी कु भौत बड़ो सल्ली /विशेषग्य च , जणगरु  च. त्यार सरा चुनौ इंतजाम या इलेक्सन  मनेजमेंट  पुळ-ठेकेदार  इ द्याख्ल अए हेरेक गौं मा एजेंट भर्ती कारल . हरेक गां मा कनो पोलिटिकल मन्युवेरिंग करण  वो सौब काम -काज पुळ-ठेकेदार इ द्याखाल.

मुना भाई - मतबल अगला पांच सालों तलक हमारी सरकार इन बि नि द्याख्ली की पुळ-ठेकेदार  क्या-क्या टुटब्याग करणों च

गुरु जी अर रणनीतिकार इक दगड़ी  - अरे मुन्ना भाई त असली राजनीतिग्य  ह्व़े गे !  हाँ भै,  चुन्ना भाई ऐ जा अब ..!
 
चुन्ना भाई तैं देखिक मुन्ना भाई न  ऐडैक  डुन्करताळि मार - स्साले चुन्ना भाइ तुझे तो  मैं देख लूंगा. तुझे तो ऐसी जगह मारूंगा जहां पानी बि ना मिले !

गुरु जी - मुन्ना भाइ ! अबि बि त्वेमा राजनीतीज्ञ बणण मा कमी च . जब बि कै दुस्मन की जुत्तों से पिटे कौरिक बेज्जती करण ह्वाऊ त जूतों तैं रेशम का खोळ पैराण जरुरी च

रणनीति कार - अर कैको बि खून करण ह्वाऊ त चक्कू , खुंकरि या  गन कि गोळी तैं पैल फ्रिज मा ठनडो कारो अर फिर जु चावो  स्यू कारो. राजनीती मा मार-काट  हमेशा मुसक्या मार इ होंद.  . 

मुन्ना भाइ - मतबल ! म्यार  सबसे बड़ो दुस्मन चुन्ना भाइ म्यार चुनौ मा काम कारल .
 
गुरूजी - हाँ ! अर वांको एवज मा चुन्ना भाइ तैं जिला परिसदो   अध्यक्ष बणये जालो.

रणनीतिकार  - इन पोलिटिक्स,  देयर इज नो परमानेंट फ्रेंड एंड नो परमानेंट  ऐनिमी  ..   

इति चुनावस्य अभियानस्य प्रथम चरण संपन्नति  .....

Garhwali Satire, Satire in Uttarakhandi Language, Himalayan Wits to be continued......
 
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Just a Satire
                                   Ghanna Bhai in Uttarakhand Assembly
           (Satire from Garhwal, Satire from Uttarakhand, Himalayan Satire)

                                    Bhishm Kukreti    

                  My all family members and relatives of my Lakad dada, fakad dada (far relatives) are confident that great Garhwali stage performer Ghannaa Bhai will win Pauri Assembly seat from BJP ticket.
           I was thinking about the technique Ghanna Bhai would apply in Uttarakhand assembly as a MLA.
  Definitely, Ghanna Bhai will use ‘Adviser’ humor while addressing assembly. His advisory humor would be, “All politicians should hear people’s grievances   barring   present MLAs.”
   However, my sister’s grandson states that it would be better that Ghanna Bhai uses anecdotes more often to prove that Ghanna Bhai does not believe in bluffing his colleagues. Though, as a politician, Ghanna Bhai would bring water through sieves (matyanl bhaurik pani lan) , nobody  would  believe on him.
 Then, my elder cousin advices Ghanna Bhai through me for using use of aside humor very little.
My ‘Door-Ki- Bhabhi’ (in between me and the eldest brother,  there are six other brothers) plainly says that banter humor would be sufficient  for Ghanna Bhai because definitely there would be witty  remarks from congressmen in UK assembly  and  wit for wit is the best remedy in any war as political war.
My fufa’s grand daughter is of opinion that without fail Ghanna Bhai will use blend word hilarity in assembly as Ghannaa Bhai is most capable of cocktailing Garhwali, Nepali and Hindi words for making new word for ridiculing his opponents in his own party. 
My wife’s third mausi is worried about Ghanna Bhai using blue humor to teas his bodily weak opponents. However, ‘mausi’s  kakya saas is confident that Ghanna Bhai would be ignorant of word blue humor and we should post a pocket English-Hindi dictionary that reminds Ghanna Bhai that blue humor is very useful to teas own wife but very bad for  irritating   other’s wives or husbands as  blue humor is based on easily offensive subjects like making love, body parts or body functions. 
All my relatives are agreeing that Ghanna Bhai does not need mistake based humor because Congress as strong opposition party will make attacks on blunders of BJP and not Ghanna Bhai embarrassing his party by his blunder based jokes.
My all relatives are of agreement that Ghanna Bhai will always use now and there bull based absurdity like the sentence, “The honest people never enter in politics and crooks infrequently get chance to win election”.  Or Ghanna Bhai may say participating on Garhwali as in 8th schedule discussion, “Garhwali is one of the oldest Indian languages, a great language spoken by a very few Garhwalis in Garhwal and evry migrated Garhwali loves her/his mother tongue but don’t want to talk in Garhwali.”
 There is no disagreement among my relatives that Ghanna Bhai will often use parody for ridiculing Congress and definitely the parody would be based on the songs of Narendra Singh Negi. However, Ghanna Bhai will never use ‘kathga Khailya’ song because definitely Nishank would be angry on Ghanna Bhai.  Ghanna Bhai will never create parody of songs sung by Gajendra Rana as political speech because even insensible person does not make parody of songs which are already parodies.  Each of my relatives is positive that Ghanna Bhai will not be insensible even after entering politics and that too joining BJP.
  Definitely, Ghanna Bhai will use caricature as base for his speech and would speak in assembly, “ in congress, you will not find a single ‘chamcha’ of Soniya Gandhi and Rahul Gandhi because every Congressman loves Maneka Gandhi and Varun Gandhi.”
There are hundred percent chances that when Ghanna Bhai will use ‘The Catch Tale’ humor base for his speech, there would be walk outs from the house by Congress as due to uproar, nobody would have heard the concluding sentence of Ghanna Bhai.
If by any chance, Ghanna Bhai would use conundrum the listeners would not be puzzled but Ghanna Bhai would be more puzzled for his sentences as,” Why did politicians stop putting on caps?  Because Khadi is costlier than hair dressers.”
  Ghanna Bhai will use exaggeration and hyperbole   in his humorous speeches and his opponents would might mind or would not mind and laughed when Ghanna Bhai informed, “  In my area,  the elephant  size  wild boar are busy destroying  the potato fields and congress is busy building Ram Temple in Aodhya.”
  The most problem for Congress members would be on  Ghanna Bhai’s ironical  comments  as when Ghanna Bhai will comment of a Congress leader  , “ Tai din tyar bwe bab bhatt bujna raund na t..” Tthe literal translation of the comment is “If your parents would be roasting Soybeans!”  However, the real hidden meaning of the sentence is “It was wrong on parts of your parents conceiving you.”
 Many times by habit as a satirist, Ghanna Bhai would do error by criticizing BJP instead of Congress and  later on would corrected it by using recovery humor.
 Definitely, the Congress members would be always afraid of ability of using wisecracks, situational humor, repartee, switching humor etc   by Ghanna Bhai.
 When my relatives came to know that I shall publish their comments, everybody advised me for not publishing the above lines. In their opinion, if BJP comes in power I shall never get Uttarakhand government recognition for my service in Garhwali literature as Ghanna Bhai and his vices will accuse me for ridiculing him. If Congress comes in power I shall not get recognition for my service for the dying language because every Congress man would criticize me that I did publicity for Ghanna Bhai and not for any congress candidate through ridiculing.

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                             आवा ! जरा गढ़वाळी मा  चबोड़, चखन्यौ मा , कैको  ठट्टा  लगैक,  हौंसी लीन्द्वां   

 

                                            भीष्म कुकरेती
 

     बोलिक,  स्वांग कौरिक या लेखिक  कै तैं हंसाण हंसणो काम नी च. हंसाण  बड़ो गम्भीर काम च अर जणगरा , हुस्यार, तंत जबाब्या (प्रत्युतपमति), नि- डरख्वा,शंद्बों खिलंदेर नि -शर्माणवाळ   इ कै तैं हंसे सकुद/सकदी. हंसाण गम्भीर लोगूँ काम च.

हंसी वी सकुद जु ज़िंदा दिल ह्वाओ. वी लोकुं तैं हंसी सकुद जु अफु पर बि हौंस सकदो अर अपण बि ठट्टा लगै साको . मुर्दार बाणो  मनिख  कबि बि  नि हंसै सकदो. जब भीष्म कुकरेती मा लिखणो हिकमत ह्वाओ  बल कुकरेत्युं खुणि कुकुर बि बुल्दन या बुलणो त नाम  भीषम च अर अपण बात पर एक घड़ी बि नि ठैर  सकदो त समजी ल्याओ बल  भीष्म कुकरेती हंसै सकुद च .

    हंसांद दैञ या हंसद बगत  हमारि संस्कृति का मूल्य बि बदली जान्दन. 

   सबसे निश्छल हंसी बच्चों की इ होंदी जु अवांछित, अप्रसांगिक, ट्याड़ो- बांगा, ध्वाका, छगटण (ठ्ग्याण), चचगण (अचाणचक खौल़ेण) जन स्तिथि मा बि निश्छल हंसी हौंस सकदन.
 
डा जारविस क हिसाब से व्यंग्य पुटुक फाड़दो त हंसी चित्र बणान्दी .

            बैक लोक बिंडी हुस्यार होन्दन जो जगा, समौ, संस्कृति , बरग (वर्ग) ,  जाती देखिक  इ हंसदन.

हौंस कथगा इ तरां क होंद जखमा व्यंग्य बि आंदो .

१- सिखंदेर  फब्ती /ठट्टा - जब  क्वी मजाकिया/चबोड्या चबोड़ इ  चबोड़ मा क्वी सीख बि डे द्युंदो त वा चबोड़ सिखंदेर चबोड़ मा आली. जन कि - लोखुं तैं शराब नि पीणै सल्ला-मशवरा दीण चयेंद . ना!  ना !  कत्तै ना, लोक फोकट मा बितकी जान्दन .   

२- उपाख्यानी या बिरतांति  ठट्टा /चबोड़ -   कें जणि मणि घटना या मनिख/मनिखेण को उदारण दिए जाव त वै ठट्टा लगाण तैं बिर्तान्ति चबोड़ बुले जांद जन की 'अरे ओ साम्बा ! ड्याराडूण मा   अडवाणी क जन सभा मा कथगा आदिम छया ? पाँच सौ या द्वी सौ?' या   ' अरे ओ साम्भा ! बाबा रामदेव,  डौरन इ जन्यान्यूँ साड़ी -बिलौज  पैरदन  या योग सिखांद दें बि ..' या " अरे ओ साम्भा ! जैबरी बाबा राम देव भगणा छ्या त वूंन  जनान्युं साड़ी-बिलोज इ पैर्युं छौ की पुटुक जनानी ब्रा वगैरा बि ?"

३- बुलण बेटी तैं सुणौण ब्वारी तैं -  या कौंळ स्वांगुं  मा दिखे सक्यांद जब क्वी चरित्र दिखंदेरुं तैं देखिक बोल्दो अर दगड़ो चरित्रुं से क्वी मतबल नि होंद. कें सभा मा बुलंदेर बि इनी करद कैं  बात पर बुल्दो अरे मि बिसरी गे छौ जन की " हाँ त मि बुलणु छौं बल 

कोंग्रेस का राज मा भौत सा भ्रस्टाचारी घपला ह्वेन जन की ए.राजा, कलमाड़ी . हाँ ! हाँ !  निशंक राज की  बात मि बिसरण इ चांदो , अब ओ क्या च कि ...अपण गोरो पैना सिंग ....अर निशंक जी रिश्तेदार बि छन त अपण बिराणो ख़याल रखण इ पोडद . ."

४- सवाल्या -जबाब्या चबोड़ -- इखम द्वी मनिख एक हैंकाक दगड / आपस मा चबोड़ इ चबोड़  मा जबाब दीन्दन. जन कि एक दिन मि तैं साहित्यकार चबोड्या धनेश कोठारी , पूरण पंत दगड़ी मीली गेन. मीन धनेश कोठारी तैं सुणैक ब्वाल, " हाँ ! जी कोठारी जी ! अच्काल त तुम  पूरण पंत जन बड़ा व्यंग्यकार पर बि खेडा मारणा छंवां ( व्यंग्य कसणा छ्न्वां ) ?"

धनेश न झट से म्यार खुटुन्द झुक्दा झुक्दा ब्वाल, " ह्व़े ! गुरु जी ! मि त आपको इ च्याला छौं , मिन  आप मांगन इ सीख बल अपण बुबाजी उम्रौ,  सयाणो  साहित्यकार बी.पी. नौटियालौ  बीच बजार मा कन बेज्जती करण ."

५-  पुराण व्याख्यान से उप्ज्युं चबोड़ - जब कै नामी मनिखो/ मनिख्याणि उदारण देकी  क्वी नै परिभाषा गंठे जावु. जन की , " भग्यान कवि कन्हया लाल डंडरियाल संसारौ सुखी मनिखों मा एक मनिख छया किलैकि डंडरियाल जी जूत्त नि पैरदा छया ." या " पूरन पंत : एक निहायती भलो मनिख छन , जौंक  दुनया मा क्वी बि  दुश्मन नी च  अर एक बि दगडया इन नी च जु पूरन पंत तैं पसंद करदो ह्वाऊ !"

६- विरोधी शब्दों से हौंस या चबोड़ करण; जब द्वी या बिंडी एक हैंकाक विरोधी शब्द या आणु /मूवावरों  से चबोड़ करे जावू. जन कि ' जब हम कैक बारा मा जादा इ सुचदवां त हम वैका  बारा मा  मा कम इ सुचदवां".

बच्युं निर्भागी, मर्युं भग्यान

७- शब्दुं मिळवाक---जब द्वी शब्दों तै मिलैक नै शब्द गंठये जाओ अर वां से चबोड़ करे जाओ त चबोड़औ मजा इ कुछ हौर हुंद . जन बल -

मसूरी मा नामी साहित्यकार रस्किन बोंड सुबेर बिटेन डाक्टर मा जयां छ्या अर इख ऊंका दगड्या अंग्रेजी क  साहित्यकार गणेश शैली ततलाट  (डौर ) मा छ्या बल कुज्याण बुड्या तैं क्या ह्व़े धौं.

दुफरा परांत रस्किन बोंड ड़्यार आई  अर गणेश शैली न पूछ, " बोंड साब ! क्या ब्वाल डाक्टर न ?"

रस्किन बोंड को जबाब छौ, " कुज्याण भै गणेश , क्वी नै बीमारी च  . बिलफौर्गेट्याण.. "

गणेश शैली न डाक्टर तैं फोन मा पूछ, डाकटरो  जबाब छौ, " गणेश ! डोंट वरी  . रस्किन हैज  स्टार्टेड हैबिट  ऑफ़ फौरगेटिंग बिल्स ड्यू  फॉर पेमेंट. बाई दिस वीक एंड ही विल बि  ओ.के . "

अब गणेशै  हंसणै   बारी छे  . असल मा रस्किन बोंड न बिल अर फौरगेटिंग द्वी  शब्दुं  तैं जोडिक एक नयो गढ़वाळी शब्द  गंठयाइ - बिलफौर्गेट्याण.

८- बिचकीं  विषयूँ   चबोड़  : जब रती, सम्भोग, ,  सरैल़ो क्वी अंग; या कै पर जबरदस्त आक्षेप का शब्दों से चबोड़ करे जाऊ. सभ्य कछेड्यु मा इन चबोड़ करण नि चयेंद. हाँ जब जरोरी ह्वाऊ त बड़ो  तजबिजन   चबोड़ करण चयेंद . दुन्या का बड़ा चबोड्या कवियूँ मादे एक कवि, गढ़वाळी क  नामी गिरामी साहित्यकार ललित केशवान की एक कविता ' घूंड  बि हिले' कुछ कुछ इनी च पण साफ़ सुथरी च   . एक झण .संतान प्राप्ति बान मातमा क ध्वार गे. . मातमा न पुडिया खाणो दे अर दगड मा यो बि ब्वाल

ल़े या पुडिया च

सुबेर श्याम

पाणी मा घोळी  , पिलै   

पर हाँ

कखी तू

याँकै भरोसां नि रै

ज़रा

अपणा घुण्ड बि हिलै

अब यीं कविता मा अपणा घुण्ड बि हिलै कति बिम्ब पैदा करदी पण हौंस अर चबोड त भौत च हैं!

जण्या मण्या चबोड्या  कवि पूरण पंत  की या कविता ...

अपणि ब्व़े का मैस/

होला वो/

जो,

हमारी जिकुड़ी मा

घैन्टणा रैन

 घैन्टणा छन .....

जन कविता बि अलग अलग बिम्ब पैदा करदी

             अर मधु सुदन थपलियाल की वीं गजल  न त गढ़वाळी समालोचना मा घपरोळ इ मचै  दे जैन मा मधुसुदन जी न ल्याख बल " दुद्लों कील ....."

            अर हाँ ! गढ़वाळी लोक गीतुं सरताजी गीत क्या बुल्दो , जरा दिखला धौं !

मोती ढान्गु , हळस्यूं देखिक  लमसट ल्म्सत ह्वेई जान्दो

अर नौली नौली  कलोडि देखिक वो चम्म  खड़ो ह्व़े इ जान्दो

९- अजाक्या हिसाब - कबि कबि नासमझी मा बि कुछ ह्व़े जांद अर चबोड़ -हौंस ह्व़े जांद

एक अजाण मनिख घर की गुसैणि खुण बुलद- ये दीदी में से भारी गलती ह्व़े गे. मीन चार पांच लुखों  कुण बोली दे बल ये ड़्यारम क्वी डरख्वा  रौंद  .

वा जनानी - ऊँ ! त इखम अणमणो (बेचैन) होणे जरोरात क्या च. लोक इनी त समजल बल म्यार ह्ज्बेंड डरख्वा च.

               या इन बि त ह्व़े जान्द बल -

एक मनिख कोटद्वार मा पौड़ी बस पकड़णो बान जगता- सगति मा एक बस का पैथर अटकिक  बस पकड़दो, बस पकड़द दीं वैक घुण्ड फूटी जान्दन  . बस मा बैठणो बाद पता चलदो बल बस त षौड़ी (ऋषिकेश ज़िना ) जाणि च अर साइन पट्टिका मा  षौ असल मा पौ दिखयाणो छयो .

१०- मंद बुध्युं छ्वीं  - जब  क्वी  सवाल कारो अर मंद बुधि का अजीब जबाब ह्वाओ त हौंस आई जांद

नौंनु   - ए ब्व़े म्यार मुंड फूटी गे .

ब्व़े- ह्यां ! कनकैक फुट त्यार मुंड ?

नौनु - वो क्या च म्यार बैरी सूनु गोर उज्याड़ नि खावन का बान लोडि चुलाणो छौ.

ब्व़े- त वै निर्भागी सूनु न त्वे पर बि लोड़ी घुरै ?

नौनु - ना ना , सूनु बुबाक तागत बि च जु में फर लोडि घुरावो !

ब्व़े - त ?

नौनु - त क्या!  मी चांदो छौ  बल सूनु क गोर उज्याड़  खाणा इ रावन अर ऊन फर लोडि नि  लग .

ब्व़े - ह्यां पर इन मा त्यार मुंड कनकैक फुटु ?

नौनु- मीन लोड़ीयूँ  अर गोरुं बीच अपुण मुंड कौरी  दे 

११- अजीब मुंडळी/ शीर्षक  -  अच्काल क्या भरत मुनि क बगत पर बि अजीब अजीब शिर्श्कुं रिवाज ठौ जन से पैलि हौंस ऐ जाओ. गढवाळ मा बादी त ठाकुर तैं मिल्दा इ बुल्दा छया, ' समनैन   ठकुरो ! तुमर मुंड मा बखरो "

या अच्काल मैं  जन लिख्वार अपुण लेखौ मुंडळी इन बि त धौरि  सकद -

आज खबर सार अख्बारौ तत्वाधान मा पौड़ी मा  मुर्ग्युं अंडा दीणो प्रतियोगिता ह्व़े . पल्ली मुल्को हिजड़ा क मुर्गी न प्रतियोगिता जीत .

पौड़ी जच्चा-बच्चा हस्पतालों मा बच्चों बाढ़ अर पौड़ी मा तीन दिन बिटेन पाणी नि आई

श्रीनगरौ  कन्क्लेश्वर मंदिरौ पास सुंगरूं बच्चों  बाढ़ पण अलकनंदा को पाणी घटी गे

१२- स्कुल्या छ्वारों जबाब- कबि कबि स्कुल्या छ्वारा सवालूं जबाब गलत दीन्दन जु  अरथौ कुनर्थ  बि कौरी दीन्दन.

सवाल छोऊ- पृथ्वी किलै गोळ  च ?

ठुपरी बि गोळ च

थकुल   बि गोळ च

पर्र्या बि गोळ च

जंदुर बि  गोळ च

इलै पृथ्वी गोळ च 

मास्टर जी क जबाब छौ बल -

हाँ ! ब्य्टा .

जब सौब चीज गोळ छन  त ..

त्यार  नम्बर बि गोळ च

13-  छ्वटा-छ्वटा शब्द या वाक्य  - कबि कबि भौत सा छ्वटा छ्वटा  शब्द हंसी बि सकदन. जन कि अच्काल  चुनौ टैम पर बूट पौलिस कि भारी अकाळ पोड़ी गे . हरेक छ्वटु-बडु नेता हर घड़ी अपण इमेज चमकाण मा  लग्यां  छन .

 १४-  ढस्का  लगाण वाळ वाक्य - हाँ कबि कबि जब इन लिखे जौ बल " मेरी गाणि च, स्याणि च की मी अपण दाह संकार मा शामिल ह्व़े सौकूं " " जिन्दगी मा वी मनिख  सुखी च जु अबि तलक जन्मी नी च "..

 १५- उळज्यां शब्दुं से व्यंग्य : जब कबि वकालाती भाषा मा या डॉक्टरी भाषा में रच-पच  ह्व़े जाओ त कबि कबि व्यंग्य त ह्वेई सकदो

एक गैरेज  मालिकौ काम करद दें अंगुळी कटि गे वो डाक्टर मा गे . डाक्टर न गैरेज मालकौ जाँच कार अर ब्वाल, "  ओह ! इं अंगुळी पर एक्सटरनल प्रेसुर से जोर पोड़, हड्डी वै भार तैं नी सै सकीन अर दगड मा भैर  बिटेन बैक्टेरिया, वाइरस को भौत बड़ो हमला बि ह्व़े ....." फिर डाक्टर न बडी फीस मांगि दे.

तीसर दिन डाक्टर अपण कारौ  एक फटयूँ   टायर लेकी गैरेज गे, गैरेजो मालिकन टायर द्याख अर ब्वाल," वो हो ! रबर का मौल्युक्युलूं पर फौरेन मैटर  अर इन्टरनल मैटर  से भारी बहार से टायर खराब ह्व़े दगड मा ग्लू का केमिकल बैलेंस  भौति बिगड़ी गे, एक चिपकण्या  ऐटम  हैंक चिपकण्या कम्पौंड  से दूर इ रौण इ चाणु  च  .."

डाक्टर बींगी गे कि गैरेज मालक वैकी नकल करणों च .

१६- बढ़याँ-चढ़याँ शब्दुं / अतिशयोक्ति से उपज्याँ हौंस- व्यंग्य- बढ़याँ-चढ़याँ शब्दुं से हंसाणो ब्यूँत /तरीका  हौंस/व्यंग्य  करणो आम ब्यूँत ब्युंत च .

गढ़वाळी लोक गीतुं अर आणो मा त आतिशयोक्ति की भरमार च 

सबसे म्यार मोती ढाण्ग

सौ रुप्यौ क सींग अर नौ रुप्यौ  मोती ढाण्ग 

 

या अबोध बंधु की या कविता तैं इ बांची  ल्याओ

छै मुखौ त एक नौनो

हैंको हाथी , पंचमुखी खुद

अन्नपूर्णा भलौ रै गे

तुमारि घरवाळी , निथर -

भीष्म कुकरेती, पूरण पंत, धनेश कोठारी जन  चबोड्या गद्यकारों न अपुण चबोड्या  गद्य मा बढ़याँ चढ़याँ शब्दुं से चाबोड़ कार अर हंसाई बि च

भीष्म कुकरेती क एक लेख को  उदारण

ओहो ! मंत्री जी  खुटो ढाल इथगा टैट ह्व़े गयो बल सरकार तैं टेंडर  छपाण पोड़. ढाल खदानो ठेका मंत्री जी क स्याल़ू तैं इ मील इ छौ अर तीन सौ मजदुरूं  मदद से अर गैंती , कूटी अर सब्बलूँ  से ढालो पौ खतये गे, बिल्चा, फाल़ू से मवाद भैर गाडे गे...

१७- जंजीर जन वाक्य - .कबि कबि व्यंग्यकार कै लेख मा एक खास विषय का शब्दुं  भरमार से अपण  काम निकाल्दो . जन कि

 

     पोलिटिकल स्टेडियम मा राजकरण्या  खेलौ कमेंटरी 

                 अररर.. अररर.... सी उत्तराखंड कोंगेस का अनुभवी बौलर हरीश रावत न भ्रस्टाचारौ भगारौ /लांछनौ बौल भाजापा का छ्का-पंजाबाज रमेश  निशंक ज़िना चुलाइ. बौल इथगा घातक च कि निशंक  न शर्तिया आउट होण . पण नै ... नै  डा निशंक को छक्का -पंजा अनुभव काम आई   अर निशंकन पी.चिदरम अर शीला दीक्षित की आळी - जाळी,  जफ्फी वळी  स्टाइल मा हरीश  रावत की भ्रष्टाचारी भगार से भरीं  बौल तैं लीगल बौंडरि से भैर कौरी दे. हड़क सिंग , सतपाल  महाराज जन पौंच्याँ  फील्डर दिखदा इ रै गेन.  सबी लोक कोंगेस की सेलेक्सन कमेटी तैं गाळी दीण बिसे गेन..भाजापा की तिकड़मी बौलिंग  का समणि अब अमृता रावत ऐ गेन जु . अमृता रावत का पैड, चेस्ट प्रोटेक्टर  अर एल्बो प्रोटेक्टिंग  पैड  सतपाल महाराज न अफिक सिलेन अर अमृता का वास्ता कवच -कुंडल का काम करदन. (भीष्म कुकरेती क पोलिटिकल स्टेडियम मा राजकरण्या खेलौ कमेंटरी लेख से बगैर इजाजत का लियुं )

१८- कै बड़ो अदिमौ प्रसिद्ध  वाक्यों की पैरोडी -  भौत सा टैम पर व्यंग्यकार या हंसाण वाळ कै बड़ा अदिमौ बुल्यां क पैरोडी से व्यंग्य पैदा करदन जन कि-

अब जन कि  उन त तुर्कयड्यो  कठगी गुस्सैल अर भम्म भड़कदी , कुंळै पिळउ जन या ब्वालो  अग्यो जन गाळी दीन्दी, तिड़कद दें इन उना चिनगारी फैलांदी अर हर घड़ी  कैक बि दगड लडै  करणों तैयार रौंदी. पण वै दिन जब  स्यूण जन बरीक तुर्कयड्यो कठगी क बांज का ग्व़ाळ से चुल्लो  रूपी  कुस्ती अखाड़ा मा मुखाभेंट ह्व़े त तुर्कयड्यो कठगी न हाथ जोड़ी ब्वाल," मी त मात्मा गाँधी क भक्त्याण छौं . मेरो सिद्धांत च - अहिंसा परमो धर्मो "

हरीश जुयाल न कथगा इ  संस्कृत  सूत्रों की पैरोडी भौत इ बढिया दंग से करीं छन

      --------विद्यार्थी --------

मैच चेष्ठा ब्वगठ्या ध्यानम, सुंगर निंद्रा तथैव च

डिग्ची हारी , किताबी त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणम

१९-  आण /भैणा जन पहेलीदाररिंगाण वाळ वाक्य   - कबि कबि लछेदार /रिंगाण वाळ सवालूं जबाब बि रिंगाण वाळ, भरमाण वाळ वाक्यों से दिए जांद अर हास्य पैदा करी लीन्दन . जन कि

 बल्दों  गौळउन्द घांडी किलै बंधदन ?

 

 द,  ल़े लगा बल सुंगरूं दगड मांगळ , अरे बल्दों सींग बाच नि गाडी सकदन ना !

२० जंजीरी कथा - इन कथा जादातर भौति पुराणि लोक कथों मा पाए जांद जखमा एक वाक्य हैंको वाकया से जुड्यु   रौंद . जन कि

राजकुमारी क घवाड़ो नाळऔ कीलौ   बान घवाड़ो नाळ हाथ  से ग्याई. घवाड़ो नाल़ो  बान घवाड़ो हथ से गे .घवाडा बान घुडसवार हाथ से गे. घुडसवारो बान लड़ाई हारे  गे . लडै बान राजपाठ अर राजकुमारी हाथ से गे .अर यू सौब ह्व़े राजकुमारी क घ्वाड़औ

नाळऔ कीलौ   बान. (एक अंग्रेजी कथा से )

२१- आपस का अनुभवुं  कथा - कबि कबि कुछ वाकया इन होन्दन जु अपण इ समाज , अपणा मुन्डीत , अपणा गाँव या अपणा इ ग्रुप मा बोले जान्दन किलैकि हौरुं समज मा वो हास्य पैदा कौरन या हौंस पैदा नि कारला की क्वी गारेंटी नि  होंदी जन कि

एक दिन मी अर म्यार खास दगड्या  कोलेज ज़िना आणा छ्या कि समणि बिटेन एक रूंड , कर्करो अर दाण्या प्रोफ़ेसर दिखें , मया दगड्या न हाथ जुड़दा जुड़दा ब्वाल, ' क्या बै अपण ब्व़े क मैसु, क्या बै रीठै दाणि, क्या बौ रुंड -गुंड  ...". प्रोफ़ेसर पुळयाणु छौ बल च्याला चांठी सिवा लगाणा छन अर हम पुळयाणा छया बल हम मास्टर तैं गाळी दीणा छया.

२२- क्वी लोक कथन लोक,  मुहावरा हौंस, व्यंग्य  का रूप मा प्रयोग होन्दन-  कबि कबि लोक मुवावारा चबोड़ पैदा करणो बान लिखे जान्दन या बुले जान्दन. जन कि कन्हयालाल डंडरियालै छ्वटि कविता

बच्युं निर्भागी अर मर्युं भग्यान

या

मनिख  दुन्या से सद्यानो बान जुद्ध  ख़तम करणो बान  रोज युद्ध करणा रौंदन

२३- मुहावरों तैं तोड़ मरोड़ण से हौंस-व्यंग्य - कबि कबि पुराणा मुवावारों तैं मरोड़ीक बि हौंस या व्यंग्य पैदा करे जांद . जन कि

रोज एक सेब डाक्टर तैं दूर रखदो अर रोज एक मुळी  या प्याज सब्युं  तैं दूर रखद 

२४- दुसरो मुख बन्द करणो वाक्य-   कबि क्या हमर जिंदगी मा लोक इन सवाल पुछ्दन जो अजीब क्या बेतुकी होन्दन अरहम ऊंका सवाल बड़ा तजबिज से दींदवां  पन कबि कबि मजाक मा इन बि होंद -

अच्हा ! त तू ऐ गे ?

ना, अबि त म्यार छैलु आई , मि त थ्वडा देर मा औंलू 

२५- बेढंगा तुक - अपण अपण प्रोफेसन मा कुछ वाक्य बौणि जान्दन अर वो वाक्य शब्दों हिसाब से बेढंगा होन्दन पण वै प्रोफेसन मा वो शब्द या वाकया बड़ा काम का होन्दन . जन कि

एक फिलम डाइरेक्टर कलाकार से - ज़रा मोरणे एक्टिंग मा  जोर से जान डाळ या ए मुर्दा मा इथगा जान  डाल़ो कि दर्शक मुर्दा तैं इ दिखणा रावन   

 

२६- अलंकारों से हौंस- व्यंग्य- उन हरेक वाक्य मा अलंकार होंदी छन पण च्बोड्या/चखन्यो/ मजक्या व्यंग्यकार जाणि बुझिक कथगा इ अलंकार से वाक्य लिखदन . जन कि

 २६ अ- पूर्णोपमा

१- मेरी घरवाळी धुंवा जनि धुपेळी , धुंवा  जन आंसू लांदी

२- हौरुं समणि मेरी स्याळी मारदी माछी सी उफाट

मेरी समणि ह्व़े जांद तालौ सी सान्त सपाट

२६ब- लुप्तोपमा

वा, मेरी कज्याण ,बणांग जनि गुस्सैल 

अर या  मेरी सेक्रेटरी , अहा नौणि जनि चिपळी 

२६स- अनुप्रास अलंकार

कज्याण क्या च , करैं जन करकसी आवाज,कुकर जन छकछ्याट,कवा जनि काळी, कुमति कि कोठड़ी, कुटुंब मा इन जन ग्युं दगड  कुरफळा ..

 २६द- अन्त्यानुप्रास

हरीश जुयाल की कविता -

नि थाम चोर गुंडों का नोट

सही आदिम तैं डे ल़े वोट

पास होणो मंतर सीख

मिक्सी मा ना सिल्वट मा घोट

२६ फ- वृत्यानुप्रास

हरीश जुयालै कविता -

दाळ भात त्यारु

माथ हाथ म्यारू

भूख तीस त्वे खुणि

अन्न पाणी म्यारू

२६जि - पुनरुक्तिप्रकास 

हरीश जुयालौ  कविता

  वाइफ वन्दना

त्वमेव वाइफ लाइफ त्वमेव

फ्यूंळी बुरांस सी टाइप त्वमेव

त्वमेव मेरी नारंगी की दाणि

त्वमेव बांजा की जलड्यू क पाणी 

२७- प्रतीकुं से हौंस-चबोड़ - प्रतीकुं से हौंस-चबोड़ त पुराणो जमानो से हूणो च . जानवर  या कै बस्तु को  मानवीकरण करण से  बि हौंस या व्यंग्य रचे जांद . गढ़वाळी मा जैपाल सिंग रावतक  प्रतीकुं से व्यंग्य कविता गंठयाणो बान प्रसिद्ध च. छिपडु ददा रावत को प्यट   चरित्र च .

२८- मुसक्या मार -  उन त जादातर व्यंग्य मुसक्या मार इ छन पण कबि कबि कैकी साफ़ सुथरा ढंग  से बेज्जती करण मा  ख़ास जोगध्यान दिए जांद

जन कि क्वी मनिख सभा सोसाइटी मा देर से इ आवो ता वैकी बड़ें इन बि ह्व़े सकदी

हाँ जी  ! हम स्वागत करदां अपण प्रभु दयाल जी की जु टैम का पक्का पाबंद छन . हमेशा खाश सभाओं मा वो तीन घंटा देर से आन्दन अर आज बि प्रभु दयाल जी न अपण समय पाबंदी का सबूत दे अर प्रभु जी ठीक तीन घंटा लेट ऐन. 

२९- भौणै नकल : मिमिक्री मा मिमिक्री आर्टिस्ट कै की भौण, स्टाइल की नकल करद अर लोगूँ तैं हंसाद. घन्ना भै मिमिक्री का बान इ प्रसिद्ध छन.

३० - राजनैतिक अर सामाजिक व्यंग्य- उन यूँ व्यंग्योंक विधान अळगो हिसाब से हुंद पण  हुंद यि द्वी अलग अलग अर  कबि दुई दगड़ी बि ह्व़े जान्दन. रान्ज्नैतिक व्यंग्य मा नरेंद्र सिंग एगी जी क ' अब कथगा खिल्य रे' या विमल नेगी का ' सबि मिलीक खौला' तीखा राजनैतिक व्यंग्य छन

३२ -जोक्स-  जोक्स से त हौंस आँदी च .

एक मंगत्या - ठकुर्याण!  कुछ खाणो बण्यु हो त दे दे .

ठकुर्याणि - अरे कख बौण खाणक . सुबेर बिटेन ग्विरमिलाक तलक दगड्याण्यु  दगड फेस  बुक मा छ्वीं लगैन  अर अब फेस  बुक का छ्वारा-दगड्या  छुड़णा नी छन . अब पकौलू ..

मंगत्या- ठीक च . जब खाणा पकी जालो त मैं तैं फेस बुक मा रैबार दे दियां . फेस बुक मा म्यरो नाम जवान छ्वारा च.

 

३३ - आखरूं खेल- शब्दुं मेल - असला मा चबोड़, शब्दुं अर आखरूं खेल च जन कि हरीश जुयाल कि या कविता च -

दोस्त था वो मेरा बरमण्ड  कच्या गया

ज़रा ज़रा लछ्या के सर्या लछ्य गया

दमल़े उपड़  रहे ठे मैं खुज्या रहा था घ्यू

वो सुरक घ्यू कि माणी में कंड़ळी कुच्या गया

३४ - व्यंग्य बाणु प्रकार - व्यंग्य बाण भौं भौं किस्मौ  होन्दन जन कि -

- चमकतळया व्यंग्य

- चुनगेरी व्यंग्य

- बाळ झिंझोडु व्यंग्य

- झीस पुड़ान्दा  व्यंग्य

-कांसो जन दुखदाई व्यंग्य

-बांसों कीस जन दुखदाई व्यंग्य

- तम्मखो जन खिखराणि व्यंग्य

-कंडाळी जन  झमझ्याट  लागौन्दा व्यंग्य

-किस्वळी  लगान्दा व्यंग्य

-ब्युंछी लगौन्द्या व्यंग्य 

-हिसर जन ट्याड़ा काण्ड पुड़ान्दा व्यंग्य

-किनग्वड़ो काण्ड पुड़ान्दा व्यंग्य

- खुब्ब्या जन काण्ड पुड़ान्दा व्यंग्य

- राम बांसों जन काण्ड पुड़ान्दा व्यंग्य

- किरम्वळ जन तड़काणो व्यंग्य

-सिपड़ी जन रैणी दीण वल़ा व्यंग्य

- चिमल्ठुं जन तड़का दीण वाळ व्यंग्य

-म्वार जन  तड़का दीण वाळ व्यंग्य

- रिंगाळ जन  तड़का दीण वाळ व्यंग्य

- बेज्जती करंदेरी व्यंग्य

-थ्वडा  भौत सैण लैक व्यंग्य

-मुक  नि दिखाण लैक व्यंग्य

 ३५- हौंस मा भाव

भारत मुनि ण नाट्य शाश्त्र मा हास्य रास का बान यि भाव (इमोसन्स) बथैन

१ हास (मुल मुल हंसण, खित-खित  हंसण, जोर से हंसण   )

२- ग्लानी

३-  शंका

४-असूया

५- श्रम

 ६- आलस्य

७- चपलता

८- निद्रा

९--सुप्त

१०- विबोध/ बिजण

११- अवहित्थ 

३६- हौंस कु दिवता 'प्रथम ' च

 

 हौंस अर व्यंग्य पर जथगा बि लिखे  जाव उ कम इ च

पण म्यारो मनण च  जु बु लिख्युं च वो काम को होलू .

जै प्रथम दिवता की !

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(Satire from Garhwal, Satire from Kumaun, Satire from Himalaya)
 From Here and There

                                               God! Release the High Pressure of Finance Minister
                                                   

                                                                                        Bhishm Kukreti
             

           Common people think that the election contenders are under tremendous pressure. However, it is Finance Minister of ruling party who is in reality under terrific pressure than others at the time of present election season.
           Finance minister being an active politician has to handle many crises than national financial crises as crisis of his own party‘s hourly infightings, his own moment to moment family crisis, crisis created by high command, crises created by main allies in collision government, catastrophe created by alternate allies reserve for in case main allies leave the alliance, cataclysm of allies on hold back as alternate for main alternative allies.
      In election season, the finance minister has to manage the election resource management of the party and keep inflation at lowest possible level too.  Therefore, today’s finance minister is always away from his financial laboratory set side rooms of finance minister cabin where the actual action is for solving all crises.
               Yesterday, I happened to visit the financial laboratory of finance minister who was as usual, away for resolving other crises than the state financial crisis.  His aides were busy in the revenue lab.
              The chief aide was before election funding furnace. Suddenly, there was cry of third aide of chief aide from recession blocking device vassal, “Instead, recession is amplifying.”  Chief aide rushed at the site and examined the transparent reasoning pots surrounding recession blocking vessel. Chief aide ordered to his third aide, “Order to RBI to print more currency notes by evening to lower down recession. Ruling party bosses can’t bear the recession till election results are declared.” 
 There was shrill whimper from the consumer durable inflation check block where a newly recruited aide of chief aide was sobbing,” The unwanted currency notes are increasing inflation for consumer durables.”
The chief aide shouted back, “You probationary officers! Instead of recognizing real facts learning, you guys always provide your views. Inflation hike in consumer durables is not because of excess currency notes availability but because of Chinese effects. Give order to reduce import duty on consumer durables but with any publicity and no opposition party should know the fact.”
 The chief heard a laud siren from perishable goods price inflating container and he dashed there. The aide in charge o perishable goods price inflating container said, “Due to sudden high fund pumping in MANREGA, Pradhan Mantri  Gareeb Hit Yojna, Health scheme;  there is inflation in perishable goods prices and if we don’t check the fund pumping there all possibilities of bursting of perishable goods  price inflation vessel. “
 The chief aide happily asked,” You seems be transferred from telecom ministry under temporary punishment therapy. What do you suggest for checking of perishable goods price inflation?”
The officer under temporary punishment therapy quickly answered, “We should block all MANREGA, Prime Minister ‘social cause based funding immediately.”
The chief aide said pleasingly, “But it will result for ruling party loosing election.” 
The officer suggested, “Then we should apply ‘Income Tax Threat Fast Moving Spray’ on traders of vegetables and other food items.”
Gladly the chief aide signaled for using ‘Income Tax Threat Fast Moving Spray’ on traders of vegetables and other food items at very high speed.
 At one corner, there was a big non-transparent vessel labeled as ‘Industry Development Fund’. However, everybody including opposition leader who was finance minister of last government and CBI officials  that this vessel is in reality the election funding reservoir for the ruling party. The said vessel started shrinking at very high speed, a big harsh noise started coming from the vessel and everybody in the lab was worried as if there is collation government fall. The chief aide banged at the site. He studied all the input and output canals, channels and tubes. 
 The chief aide asked the in charge of ‘election funding reservoir for the ruling party ‘for the reasons of sudden steep fall in the funding from the industrialists.
The officer in charge answered,” No industrialist is confident of any political parties winning election by full majority including ruling party winning the election and every industrialist has been funding for every political party including independents and newest parties. We injected over dozes of fresh benefits to all industries as catalytic objectives   but due to strong confusion principle, the over dozes are also not working”
The chief aide instructed,” Beam the highly condensed warning signals at atomic speed for ‘Enforcement raid, Foreign Money Laundering raids’ into the selected industrial beakers and vessels.”
The assisting aide pushed the instructed signal button and initially at slow momentum but soon the ‘election funding reservoir for the ruling party’ started swelling.
 The chief aide said to his immediate aide, “I have to attend a meeting about settling the quarrelsome chemical and ultra physical reactions from ally’s parties ruling in various states. You look after the lab. In case of emergency and confusion, you read the old history. You will find every remedy for every hazard as fundamentally, nothing has changed bureaucratically and political maneuvering   since 1952 election scene.”

 Satire from Garhwal, Satire from Kumaun, Satire from Himalaya will be continued……

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               Why Harish Juyal is called Great Poet of Contemporary Satirical Poetry World?

(Satire in Garhwali language, Humors Literature in Kumauni, Wits in Uttarakhandi Poetries, Himalayan Literature and Satire)

                                                  Bhishm Kukreti
   
                 Using animals as symbol for telling story or preaching lesion is an old way oldest form of expression in literature without words or with words.
  As far as animal symbols in Sanskrit classic are concerned, animals have been used in all types of literature as Mahabharata, Ramayana, Upanishads, Hitopadesh,Jataka or Panchtantra. The great poet and Dramatist Kalidas used animals as symbols in his classic literature.
 From modern satirical literature point of view ‘Animal Farm’ a great novel by Indian born British citizen (who worked in Burma and India as British officer too) George Orwell (1903-1950) is the best example of using animal as symbols for creating satire, humor and preaching too. Animal Farm is best example of symbolism and allusion in prose. As per a critic Michael J.Cummings 92003)  , there are following major themes in ‘Animal Farm’-
1-Maintaining an Ironclad on power, ruthless dictator
2-‘Power tends to corrupt and absolute power corrupts absolutely.
3- Lies can be dressed up in clothing of truth.
4- Absolute loyalty to authority invites abuse of power. 
  Chaucer used animals in his many poetic tales. 
             Great symbolic poet, Nobel laurite William B. Yeats used animals in his poetries including his attempting to turn himself into a Landor Style social ironist (Bloom Harold 1972)
 Lewis Carroll is famous for creating animals as his characters for humor creation.
 Kipling’s ‘The Jungle Book’ is the best example of r using animals for humorous literature. American president Theodor Roosevelt was fan of the novel ‘The wind in the Willows’ (1908) by Kenneth Grahame because animals as symbols of human characters and creating humor (Gale Cengage, 2003).
         Great satirical Spanish poet and novel writer   Mitchell Vazquez ( 1547-1616) also used animals for symbolic purpose .
                  C.J. Heinrich Hein (1797-1856) a German poet is famous for creating symbolic poems using animals for symbolic purposes. Another German poet Rainer Maria Rike (1875-1926) used animals as symbol in his famous poems ‘Ding-Gedischte 9Things Poems).
 French literature creators have been always doing evolution for art from borrowed from other area. The French poets used haiku for creating symbolic poems too as Jules Renald , Couchoud, Fernand  Gregh, Gilbert, jean Paulhan, Francis Jammes , Paul Claudel etc . Bertrand Agostini  mentions  Many French Haiku creators used animals as symbol for satire and humor in his brilliant article ‘The Development of French Haiku in first half of 20th century’(1998).
           In all languages and society, using animals as symbol for creating humor and satire is very common.
            A poetry critic and language professor of Mumbai University  Dr Manju Dhoundiyal after studying ‘Khigtat’ and ‘Uktat’ poetry collections by Harish Juyal mentions to this author that Harish Juyal ‘Kutz’  is one of the great satirical poets of contemporary humorous and satirical world poetry.
 The following poem is proof that remarks of Dr Manju Dhoundiyal that Harish is one of the great poets of contemporary satirical and humorous world poetry.
 
  स्याळ : The Cunning Fox

कवि - हरीश जुयाल 'कुटज'


डंड्वाक पाणी चरणा छन
माछा तीसन मोरणा छन I
बिरळयों कि ह्वेगे खलगड्डी
मुसा चुलखंदु क्वरणा छन I
दिन  घुघत्यों जादा रैनी
ढंगरयों गरुड़ घुरणा छन i
स्यू बाघ ह्वेगिन लुंज
स्याळयूँ क ठाट चलणा I
जैनि हैंको जलड़ी उगटऐन
आज वी औंगरणा छन I

(ग्राम टसिला , पट्टी मल्ला बदलपुर )

Harish Juyal uses animals in such a way that the readers smile but feel sharp pain on the changing social and political scenario.
The literal meaning of poem is
Bear are watering (or taking water from the pond)
Thirsty, fish are dying
Cats are without skin
Rats are biting earthen stove
Gone are the days of Ghughti’s melodious warbling? 
The vultures are warbling
Brave Tigers are now, crippled
Cunning Foxes are now, leaders 
Those who are de-rooting jungles 
They are now, prosperous 
 Harish is winner in using common animal symbols and creating an image of horrible changes in the present society. The ‘Syal’ poetry speaks that changes are just opposite of what should have been for the benefiting present and excellent future.
The poem is complete and competitive enough for establishing statement of Dr. Manju Dhoundiyal that at present Hairish Juyal is one of the great satirical poets of world literature.

Satire in Garhwali language ,Humors Literature in  Kumauni, Wits in Uttarakhandi Poetries, Himalayan Literature and Satire  to be continued ……

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     From Here and There                           
                   
                                                       Election Candidates Are Under Anxiety Attack
                                                 
                                                            Bhishm Kukreti          
                       
                    Election process is now completed in Uttarakhand. You will be feeling that the candidates and their agents would be taking rest as you take rest after marriage of daughters or granddaughter. However, the case is just opposite of your perception. I am getting calls every moment from the candidates who fought election from Uttarakhand and from their election agents too. Everybody is under anxiety and mental agony attack. Since, doctors are making scientific statements they are asking help from me as if I were a Tantrik as Bhisham Baba or Bhisham Pitamah.
              It is understandable that would be winners and runners would be facing anxiety and agony. Even the independents who did not vote for their self are also under sever attack for knowing the numbers of ignorant devotees are behind them.
         A couple of ministers and chairmen of various government organizations are under separation anxiety disorder (SAD-1). One minster told me that if he loses election he can’t bear the separation from the most beloved thing of the world- ministerial chair. For the ministerial post, poor fellow left his two wives and children from them and took third woman as illegal wife.   I could not suggest him remedies for SAD -1 because the remedies lie in his past when he could do something for people’s trouble when thousands of families were separated due to compulsive migration from hills. The same is the case for all ministers and chairmen of government organizations.
              A very powerful politician’s wife as candidate is facing social anxiety disorder (SAD-2). Just after election was over, she is sweating, blushing and finding difficulty in speaking.  Neither Bhisham Baba nor doctor can suggest any remedy for her SAD. As an assembly member she was afraid of meeting common people, poor people, and non-chamcha type of people. Whether she wins or loses, her SAD remedies lie on learning to meet common people and forget about armies of elites and Chamchas.
  By the last evening, a female minister developed Post-Traumatic Stress Disorder (PTSD) a disorder that is developed after terrifying event or events.  Now, whenever she feels toileting she starts crying that there is no toilet in her 100’x100’ toilet. Since, she got ticket from ruling party again; she had to go her constituency after five years of gap. Whenever, wherever she visited in her election campaign   (of course all rural ones), she had to go under spiky bushes (Kandun Butya), under the tendrils of Byunchhi ghas, on Knadali ka Butya for both types of toileting. Now those traumatic experiences are making her life miserable. Her mind telling her that there is no toilet in her gigantic house.  Her latest memories of bristles of Knadali or spikes of Kingwad or Hisar at the timing of toileting in villages are making her think that there is no single toilet for females in this galaxy and her Tatti-Peshab is closed. Again, remedies for her PTSD lie in her tenure of minister ship. In those days, as a woman minister she never thought that now, women required toilets and bathrooms in villages too. As a  minister, she never thought that if politicians are ‘sayana’ (clever) now, voters have became more ‘sayana’ too and purposely, this time people of her constituency made sure that the minister had experiencing of  toileting under physically awkward conditions.
   A ‘bindikhava’-‘afukhava (very selfish and does not distributes the common fruits) minister has developed rapid breathing, loose motions, and dry mouth symptoms of Generalized Anxiety Disorder (GAD) .He is afraid for not afraid of losing election at all. He is worried about his party winning election or opposition winning majority, that in both cases, the enquiries against him is inevitable.
  A minster is experiencing severe dry mouth symptoms and every time the minister is demanding water but his thirst is increasing instead of reducing by taking water. His constituency is at the bank of river Ganga. In his tenure as minster , he was busy in negotiating royalty for Ganga, Yamuna, Kali, Gomati, Ghaghra rivers from other neighboring states and could not get time to think that he had face the people of his constituency. In this election campaign, all Ganges valley voters demanded drinking water facilities in their village. Here too, remedies lie in the past deeds of minster that was busy in selling water to other states but never thought that in the land of Goriganga, Dhauliganga, Ganga, Yamuna, Kali, Nayar , Hinwal, Saryu , a, Kali, people are  deprived of drinking and irrigation water.   
   Like, a sitting MLA developed fruit phobia after election is over. He requires fruit juices for his health. However, he is afraid of looking at fruits that he would die if he sees fruits. The MLA was chairman of Horticulture of hill area. In this election campaign many brave voters cursed him in Garhwali, “teen hamr ikh Bagwani develop ni kar t Ja twe tain fal fruit ras ni ain . Since, you never developed horticulture in our area; you will never like to see fruits.” I am afraid that remedies for his s fruit phobia lies in his past.
   Like that, I am getting calls from other candidates after election for their anxiety and I am sorry, even deities do not have remedies for anxieties of politicians of Uttarakhand because Bhoots (past) are not ready to leave their bodies.
(a Fiction)

Copyright@ Bhishm Kukreti


 

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