Author Topic: शेर दा अनपढ -उत्तराखंड के प्रसिद्ध कवि-SHER DA ANPAD-FAMOUS POET OF UTTARAKHAND  (Read 65841 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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[justify]
Dosto,

You must have heard about this great poet of Uttarakhand. He is popularly known as "Sher Da Anpad".

He is a famous Kavi and has even released some Humurous Poems. Like "Hashana Bahar", Panch Myav etc.

We are producing an excluisve Interview of Sher Da which he had given to Mr Charu Tiwari Ji.. our Member.

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‘मन में हो लगन, मुट्ठी में हो गगन’

कुमाऊनी भाषा के जाने-माने कवि शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ का जीवन सफर इतना रोचक रहा है कि उस पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। वह कभी स्कूल नहीं गये, पर स्कूल जाने वाले बड़े-बड़े बुद्धिजीवी भी उनकी कविता मेें निहित सादगी, गांभीर्य और हास्य को देखकर हतप्रभ रह जाते हैं। शेर दा के स्वभाव में बचपन से एक मस्ती है और इसी मस्ती में उन्होंने पहाड़ को लेकर जो रचनाकर्म किया है उसमें इतना वैविध्य और चुटीलापन है कि कोई भी उनकी कविता सुनकर उन्हें दाद दिये बगैर नहीं रह सकता। अपनी इसी मस्ती में वह अस्सी पार कर चुके हैं और अभी भी उनका रचनाकर्म जारी है। हल्द्वानी में उनके श्याम विहार स्थित आवास पर उनके जीवन और रचनाकर्म पर जब वरिष्ठ पत्रकार दीप भट्ट की उनसे विस्तार से बातचीत हुई तो उनकी यादों का सिलसिला उमड़ पड़ा। फिर शेरदा को जानने के लिए जगह कम पड़ गयी, इसलिए हमें अपने इस स्तम्भ की सीमायें तोडऩी पड़ीं। शेरदा हैं तो फलक भी बड़ा होगा। हमने इस साक्षात्कार को तीन पृष्ठों में प्रकाशित किया है। उन्हें जानने-समझने के लिए यह बहुत जरूरी है। पेश है उनसे हुई बातचीत के चुनिन्दा अंश :-
 
आपके बचपन की यादें किस तरह की हैं?

अपनी इस कविता- ‘गुच्ची खेलनै बचपन बीतौ/ अल्माड़ गौं माल में/ बुढ़ापा हल्द्वानी कटौ/ जवानी नैनीताल में/ अब शरीर पंचर हैगौ/ चिमड़ पड़ गयी गाल में/ शेर दा सवा सेर ही/ फंस गौ बडऩा जाल में।’ में मैंने अपने बचपन को व्यक्त करने की कोशिश की है। मुझे अपनी पैदाइश का दिन ठीक-ठीक याद नहीं है। उस जमाने में ऐसा चलन भी नहीं था। बाद में रचनाकर्म शुरू हुआ तो मित्रों ने तीन अक्टूबर १९३३ जन्मतिथि घोषित कर दी। मेरी पैदाइश अल्मोड़ा बाजार से दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित माल गांव की है। मेरा गांव हरा-भरा था। खूब साग-सब्जी होती थी। दूध और साग-सब्जी शहर में बेचते थे। हां, अनाज नहीं बेचा जाता था। मैं चार साल का था तो पिताजी चल बसे। माली हालत खराब हो गयी। जमीन, मां का जर-जेवर सब गिरवी रखना पड़ा। होश आया तो मुझे इतना याद है कि हम लोग गांव के ही किसी व्यक्ति के मकान में रहते थे। हम दो भाई थे। मुझसे बड़े भाई भीम सिंह और मैं। बड़े भाई तो अब गुजर गये।
 
इन हालात में तो काफी संघर्ष करना पड़ा होगा?
गांव में किसी की गाय-भैंस चराने निकल गया तो किसी के बच्चे को खिलाने का काम कर दिया। बच्चे को झूला झुलाने का काम करता था तो बाद में अपने इसी अनुभव को इस कविता में व्यक्त किया-
‘पांच सालैकि उमर/गौं में नौकरि करण फैटूं/ काम छी नान भौक/ डाल हलकूण/ उलै डाड़ नि मारछी/ द्विनौका है रौछि/मन बहलुण।’
इस काम के बदले मुझे आठ आने मिलते थे।
 

आप स्कूल तो कभी गये नहीं, फिर अक्षर ज्ञान कैसे हुआ?
 

आठ साल की उम्र हुई तो शहर आ गया। बचुली मास्टरनी के यहां काम करने लगा। घर में नौकर रखने से पहले हर कोई अता-पता पूछता है तो उसने भी पूछा। मैंने बताया मां है, पर पिताजी गुजर गये। उसने भी सोचा कि बिना बाप का लडक़ा है। गरीब है, इसको पढ़ा देते हैं, तो उसने मुझे अक्षर ज्ञान कराया। फिर कुछ दिन वहीं गुजरे। बारह साल की उम्र में आगरा चला गया।

आगरा के अनुभव कैसे रहे?

आगरा में छोटी-मोटी नौकरियां कीं। वहां रहने का साधन था। दाज्यू इंप्लायमेंट दफ्तर में चतुर्थ श्रेणी कर्मी थे। एक साल घूमता रहा। एक दिन सौभाग्यवश आर्मी के भर्ती दफ्तर में पहुंच गया। वहां बच्चा कंपनी की भर्ती हो रही थी। मैं भी लाइन मेें लग गया। अफसर ने पूछा कुछ पढ़े-लिखे हो तो अखबार पढऩे को दिया तो थोड़ा-थोड़ा पढ़ दिया। क्योंकि मुझे बचपन से पढऩे का बहुत शौक था। मास्टरनी जितना सिखाती थी उससे आगे पढऩे लगता था। शहर जाता था तो जो शब्द समझ में नहीं आते उन्हें पढ़े-लिखे लोगों से समझ लेता। तो इस तरह आगरा पहुंचने तक पढऩे-लिखने का अच्छा अनुभव हो गया। मुझे कविता करने का बहुत शौक था। उन्होंने मुझे बच्चा कंपनी में छांट लिया। मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है, ३१ अगस्त १९५०।

बच्चा कंपनी में भर्ती होने के बाद के अनुभव कैसे रहे?
बच्चा कंपनी में भर्ती करके मुझे मेरठ भेज दिया। बड़ा अच्छा लगा। सभी अच्छे लोग थे। मैं बहुत खुश था। उसी खुशी के माहौल में कविता फूटी- ‘म्यर ग्वल-गंगनाथ/ मैहूं दैण है पड़ी/ भान मांजणि हाथ/ रैफल ऐ पड़ी।’
हंसी-खुशी के माहौल में आनंद आने लगा। वहां पढ़े-लिखे लोग थे और मैं अनपढ़। मेरठ में ही तीन-चार साल बच्चा कंपनी में गुजारे। उसके बाद १७-१८ साल की उम्र में फौज का सिपाही बन गया। सिपाही बनने के बाद मोटर ड्राइविंग मेरा ट्रेड था। गाड़ी चलाना सिखाया। वहां से पासआउट हुए तो पोस्टिंग में चला गया जालंधर भेज दिया गया। जालंधर के बाद झांसी चला गया। झांसी के बाद जम्मू-कश्मीर चला गया। वहां पूरे इलाके में घूमा। नारियां, राजौरी, पूंछ, नौशेरा में ड्यूटी की। बारह साल यहां गुजारे। तेरहवें साल पूना चला गया।
 

आपने कहीं लिखा है कि पूना से ही असल में आपके काव्य कर्म की शुरुआत हुई, पूना में उस वक्त किस तरह का माहौल था?

पूना में मैं १९६२ में गया। चीन की लड़ाई चल रही थी। युद्ध में जो लोग घायल हो गये, उनके साथ संगत रहने लगी। उनसे लड़ाई के बारे में जिक्र सुना तो मेरे दिल में ऐसा हुआ कि एक किताब लिखूं इस वाकये पर। तो मेरी पहली किताब हिन्दी में ‘ये कहानी है नेफा और लद्दाख की’ शीर्षक से प्रकाशित होकर आयी। इस किताब को मैंने जवानों के बीच बांटा। पूना में एक अनुभव और हुआ। पूना में पहाड़ की कुमाऊं-गढ़वाल और नेपाल की औरतें कोठों में देखीं। मुझे मेरे साथी जवानों ने बताया तो मुझे बेहद दुख हुआ। मेरे मन में आया कि इन पर किताब लिखूं। किताब ‘दीदी-बैंणि’ लिखी।
 
क्या कुमाऊनी में लिखने की शुरुआत पूना से ही हुई?
कुमाऊनी में किताब लिखने की शुरुआत पूना से ही हुई। मैं कोठों में गया नहीं था। मैंने कल्पना की। सोचा पहाड़ के जो लोग नौकरी के लिए प्लेन्स आ जाते हैं, जब घर वापस जाते हैं तो औरतों को बहला-फुसलाकर कोठों पर ले आते हैं। तो मैंने उनकी कहानी बनायी। उनके दुख-दर्द को समेटा। साथ ही जमाने को टोका। लिखा- ‘गरीबी त्यर कारण/ दिन रात नि देखी/ गुल्ली डंडा देखौ/ शेर दा कलम-दवात नि देखी।’
फिर लिखता चला गया। ‘दीदी-बैंणि’ काव्य संग्रह की ही ये कविता है-
‘सुण लिया भला मैसो/ पहाड़ रूनैरो/ नान-ठुल सब सुणो/ यौ म्यरौ कुरेदो/ दीदी-बैंणि सुण लिया/ अरज करुंनू/ चार बाता पहाड़ा का/ तुम संग कुनूं/ चार बात लिख दिनूं/ जो म्यरा दिलै में/ आजकल पहाड़ में/ हैरौ छौ जुलम/ नान ठुला दीदी-बैंणि/ भाजण फै गई/ कतुक पहाडक़ बैंणि/ देश में एै गयी/ भाल घर कतुक/ हैगी आज बदनाम/ जाग-जाग सुणि/ नई एक नई काम।’
फिर कुछ ऐसा हुआ कि मुझे कवितायें लिखने का सुर लग गया।

पूना से पहाड़ वापसी कब हुई?
सन १९६३ की बात रही होगी शायद। वहां मेरे पेट में अल्सर हो गया और मैं मेडिकल ग्राउंड में रिटायर होकर घर आ गया। उम्र यही कोई रही होगी २४-२५ साल की। घर पहुंचा तो उसे कविता में इस तरह व्यक्त किया- ‘पुज गयों अल्माड़ गौं माल/ तब चाखि मैन अल्माड़कि/ चमड़ी बाल।’
तो कविता का रोग लग गया था।

तब गांव का माहौल कितना बदल गया था?
गांव में ऐसा कोई नहीं था जिससे कोई बातचीत कर सकूं। मैंने गांव वालों से पूछा कि आप किसी टीचर-मास्टर को या फिर ऐसी जगह जानते हैं, जहां कोई पढ़ा-लिखा आदमी मिल जाये। किसी ने पता बताया, वहां चला गया। मैंने अपना परिचय दिया। दो किताबें दिखायीं, तो उन्होंने कहा हमारे कॉलेज में एक चारु चंद्र पांडे हैं। वो कविता भी करते हैं, विशेषकर पहाड़ी में। उनसे मिला। वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा मैं आपको ब्रजेंद्र लाल शाह से मिलाता हूं। वह कविता के बड़े जानकार हैं। पहाड़ में सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए एक सेंटर खुलने जा रहा है। वह उसके डायरेक्टर बनने वाले हैं।

कैसे रहे ब्रजेंद्र लाल शाह से मिलने के अनुभव?
बहुत अच्छे। उन्होंने मेरा परिचय जाना। कहा आज तो मैं कहीं जा रहा हूं, संडे के दिन आना। आपने जो लिखा है संडे को सुनेंगे। मैं इंतजार करता रहा संडे का। मैं वहां चला गया। उनके साथ दो-चार लोग और थे। किताबें दिखायीं। मैंने उनको एक कविता सुनायी। अपने जीवन की पहली कविता थी। कविता थी- ‘नै घाघरि/ नै सुरपाल/ कसि काटीं ह्यून हिंगाव।’
यह सिर्फ मुखड़ा था। कविता लंबी-चौड़ी थी। सुनकर वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तपाक से कहा- ‘शेर सिंह का शब्द चयन बहुत अच्छा है।’ हो सकता है जिंदगी में पहली मर्तबा सुना ये शब्द। शब्द चयन। उन्होंने कहा यहां पर होली आने वाली है। हम रैम्जे हाल में होली मनाते हैं। उस दिन सब कुछ-न-कुछ सुनाते हैं। कविता लाना, तुम्हें भी मौका देंगे। पंद्रह-बीस दिन के बाद होली आयी। टाइम पर चला गया। उन्होंने मुझे देखते ही कहा पोयट (श्चशद्गह्ल) आ गया।
मैंने कविता सुनायी - ‘होई धमकी रै चैत में/ सैंणि लटक रै मैत में।’
लंबी-चौड़ी कविता थी। रिस्पांस भी अच्छा मिला। लोग खुश हुए। मैं भी खुश हुआ। तब से मेरा चस्का बढ़ा ही गया। उन्होंने कहा नैनीताल में सेंटर खुल गया है। तुम वहां एप्लाई कर दो। तुम्हारे जैसे कवि-कलाकार की जरूरत है। मेरा हौंसला बढ़ा। कॉल लैटर आ गया। मैं नैनीताल इंटरव्यू के लिए गया। इंटरव्यू लेने कुछ लोग दिल्ली से आये थे, कुछ गढ़वाल-कुमाऊं के लोग थे। कुल पचास लोग छांटे गये। सेंटर का नाम था ‘गीत एवं नाट्य प्रभाग।’

गीत एवं नाट्य प्रभाग में काम के अनुभव कैसे रहे?
बस नया सफर शुरू हो गया। अयारपाटा में दफ्तर खुला। हमने काम शुरू कर दिया। गीत बनने लगे। कंपोज होने लगे। इस तरह बहुत सी कवितायें लिखीं। इन्हें लोगों ने काफी पसंद किया। मुझसे मेरे अधिकारी कहते थे ये पहाड़ का रवीन्द्रनाथ टैगोर है। जब यह सुनता तो मुझे लगता मेरे अंदर कुछ न कुछ तो है। कुछ कवितायें मंच के लिए लिखीं तो कुछ साहित्य के लिए। मंच से कोई मतलब नहीं था। खास महफिलों में तब भी सुनाता था, अब भी सुनाता हूं।

उन दिनों जो गीत लिखे उनमें से कुछ याद हैं क्या?

एक गीत है जो हर जगह सुनाता था-
‘म्यर हंसी हुड़कि बजाला बमाबम/ कुरकाती बिणाई मैंलैकि लगूंल/ मेरी सुआ हंसिया नाचली छमाछम/ अलग्वाजा बांसुई मैंलैकि बजूंला।’
इस तरह बहुत गीत लिखे। हम अपने प्रोग्रामों में गाते थे। यहीं से मेरा संपर्क आकाशवाणी लखनऊ से हो गया। उन्होंने मुझे कवि सम्मेलन में बुलाया। मेरी कविता सुनकर सब बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा-अनपढ़ ये नहीं, हम लोग हैं। इतनी अच्छी कविता कर रहे हैं। हौंसला बढ़ता गया। फिर मेरी किताबें निकलती गयीं।

अब तक आपकी कुल कितनी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं?
‘दीदी-बैंणि’, ‘हसणैं बहार’, ‘हमार मै-बाप’, ‘मेरी लटि-पटि’, ‘जांठिक घुंघुर’, ‘फचैक’ और ‘शेरदा समग्र।’ फिलहाल कुमाऊं विश्वविद्यालय में मुझ पर पांच शोध कर रहे हैं। कुमाऊं विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता हूं। ‘हंसणैं बहार’ और ‘पंच म्याव’ टाइटल से दो कैसेट बाजार में आ चुके हैं।

 
आज के नौजवानों को कोई संदेश देना चाहते हैं?
यही कहना चाहता हूं नवयुवकों से और अपने पहाड़ के बच्चों से -
मन में हो लगन,
मुट्ठी में हो गगन।

जीवन में कोई आदर्श भी रहा आपका?
मुझे बड़े लोगों से बड़ी प्रेरणा मिली। गांधी जी, नेहरू जी, सुभाष जी, ये सभी मेरे प्रेरणा स्रोत रहे। आकाशवाणी लखनऊ में इन पर खूब कवितायें कीं। बापू पर कुमाऊनी में एक कविता लिखी जो मुझे आज भी बहुत पसंद है- ‘हुलर आओ बापू तुम माठू माठ/ आशा लागि रयूं मैं बाट-बाट/ मैंकणि तुम्हारि नराई लागिरै/ चरख मैं ऐल कताई लागि रै/ खद्दर ऊण की बुणाई लागि रै/ गांधी टोपिनै की सिणाई लागि रै/ मैंके लागिं प्यारा तैरी ख्वारै चानि/ मैंकणि खैदेली तेरी नाखैकी डानि/ मुख-मुख चैरूं छै तू गिज ताणि/ कि भली छाजिछं धोती नानि-नान/ हुलर चड़ कसि जाना छन मार-मार/ हुलर आओ बापू तुम माठू-माठ।’

जीवन में इस आखिरी पड़ाव पर कैसा महसूस करते हैं?

अपने मन की जिंदगी जी। मैं तो अनपढ़ था, पर लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया, हौंसला दिया। मुझे प्रोत्साहित किया, तो कहां से कहां पहुंच गये।
आज भी इज्जत देते हैं, मान करते हैं। मैं लोगों का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया।


M S Mehta
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Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #1 on: October 25, 2007, 02:03:08 PM »
Bahut badhiya information di hai aapne Mehta ji. Thoda bahut jo main jaanta hun is famous writer ke baare main woh yeh hai ki yeh 1 bahut hi achhe Vyangya lekhak hain.

कमल

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #2 on: October 25, 2007, 02:13:13 PM »
यो फोटो कां बाटी ल्याछा हो. भल छन.

उनकी कोई रिकॉर्डिंग भी लाइये..


पंकज सिंह महर

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #3 on: October 25, 2007, 02:26:12 PM »
Primarily a poet, Sherda is very popular in the entire Kumaon region. Humour & Satire are his forte. Apart from participating in live poetry sessions he released some of his poems and songs in the form of a cassette which was very successful.
Here he sings one of the most popular songs he has written.

शेर दा का पता

SHERDA 'ANPADH'
Hurton Cottage, Ayaar Paata, Barah Patthar,
Manu Marg, Arwind Ashram
Road, Nainital, Uttaranchal, India
Ph: 91-5942-39823
उनके गाने सुनें
http://www.beatofindia.com/arists/sa.htm

पंकज सिंह महर

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #4 on: October 25, 2007, 02:35:08 PM »
शेर दा की एक कविता याद आ रही है:
शादी के बाद जब पहली होली के लिये पत्नी मायके जाती है तो पति की विरह वेदना को शेर दा ऎसे बताते हैं-
"होली फटक रै, चैत में,
स्यैणी लटक रै, मैत में,
कै कि करूं मुखडी लाल,
कै के लगुं रंग गुलाल."

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #5 on: October 25, 2007, 02:36:50 PM »
शेर दा कुछ हास्य कविता सुनो... ..उन्होनो आपनी हास्य कविताओ को कैसेट मे रेकॉर्ड किया है जिसका नाम है " हसन बाहर".

कुछ अंश .... पहाडो मे फैशन के बारे मे.

"  जमाना तेरी बैला,
चेला लटी, ब्वारी बुल्बुली

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #6 on: October 25, 2007, 02:37:38 PM »

Wah Pankaj da wah... sahi yaad dilya..


शेर दा की एक कविता याद आ रही है:
शादी के बाद जब पहली होली के लिये पत्नी मायके जाती है तो पति की विरह वेदना को शेर दा ऎसे बताते हैं-
"होली फटक रै, चैत में,
स्यैणी लटक रै, मैत में,
कै कि करूं मुखडी लाल,
कै के लगुं रंग गुलाल."

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #7 on: October 25, 2007, 02:40:36 PM »
एक और...

धान पेटुन बूश बूश !
बिराओ पेटुन मुश सा मुश !!!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #8 on: October 25, 2007, 02:43:07 PM »
शेर दा का एक और हास्य कैसेट है जिसका नाम है - पांच मियाओ जिसमे उनकी बहुत सी हास्य कविताओं का संग्रह है ?

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: SHER DA ANPAD - FAMOUS POET OF UTTARAKHAND
« Reply #9 on: October 25, 2007, 02:44:35 PM »
Wah Dajyu wah +1 karma aapko.

शेर दा की एक कविता याद आ रही है:
शादी के बाद जब पहली होली के लिये पत्नी मायके जाती है तो पति की विरह वेदना को शेर दा ऎसे बताते हैं-
"होली फटक रै, चैत में,
स्यैणी लटक रै, मैत में,
कै कि करूं मुखडी लाल,
कै के लगुं रंग गुलाल."