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लोक संस्कृति व साहित्य के प्रति बेमन है सरकार: शेरदाNov 23, 02:22 amअल्मोड़ा। मौजूदा दौर में कुमाऊँनी व गढ़वाली साहित्य सृजन की बयार तो अच्छी चल ही रही है, उसके अंदर खुशबू भी कम अच्छी नहीं है। जिस प्रकार युवा पीढ़ी का रचना संसार व्यापकता लिए हुए चल रहा है, निश्चित ही यह भविष्य के अच्छे संकेत दिखाई देते है। यह कहना आधुनिक कुमाऊँनी कविता के युगपुरुष कहे जाने वाले शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' का। श्री अनपढ़ यहां जागरण से एक विशेष वार्ता में बात कर रहे थे। उनका कहना था उत्तराखण्ड के कुमाऊँनी व गढ़वाली साहित्य का भविष्य इसलिए उज्ज्वल दिखाई देता है कि आज विद्वान लोग लिख रहे है और सोच रहे है। उन्होंने अपने दौर का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय अनपढ़ कवि हुआ करते थे। मौजूदा दौर में बुद्धिजीवियों की भागीदारी से लोक संस्कृति व साहित्य में चार-चांद लगेंगे, यही उम्मीद हमें करनी चाहिए। शेरदा से यह पूछने पर कि आप उम्र के कितने बसंत पार कर चुके है। सहज भाव से शेरदा ने कहा, 'ठीक से याद नहीं, 80 के चक्कर में फंस गया लगता हूं।' सरकार द्वारा लोक साहित्य व संस्कृति के लिए कोई रुझान न होने की पीड़ा शेरदा की बातों में दिखाई दी। उन्होंने कहा न तो नेता और न ही सरकार कुमाऊँनी व गढ़वाली के रचना संसार की ओर देख रही है। उनका कहना था कि इसका दु:ख केवल मुझे ही नहीं सारे सृजनकार इनकी उपेक्षा से आहत है। नई पीढ़ी को संदेश देते हुए उन्होंने कहा किसी भी रूप में वह कर्मठता व लगनशीलता के साथ आगे बढ़ने की उनमें ललक हो यह कल के लिए जरूरी है। अंत में अपनी दो पंक्तियां कुछ इस प्रकार सुनाई- 'गुणों में सौ गुण भरिया, म्यार पहाड़ाक् नानतिनो। य दूनि में गुणें चैनी, म्यार पहाड़ाक् नानतिनो'।http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_3927944.html
महाराज, शेरदा ने एक बार कुछ सुनाया था.. ठीक-२ तो याद नहीं पर कुछ इस तरह था..."शेरदा-२ हैगै, भ्यार भितेरनानि भुलि ले बोल्यूं फ़ैगे, शेरदा कै भेर..स्यानि त बोलुनां छि,अनहोति तब ह्वेगै जब,चेलो ले कै बोलुन फ़ैगो, शेरदा कै भेर.."पूरे कुमाऊं में हास्यरस में शेरदा जैसा और कौन ठैरा?
मेहता ज्यू, यो शायद शेरदा क कैसेट "पंचम्याऊं" में छु. भलि कै याद नि छ. मेरा पास धरीं छ्न शेरदा का कुछ कैसेट.
शेरदा की एक कविता के अंश: पार्भति को मैतुडा देश:, मेरो मुलुक कतुक प्यारा, डान काना में जुन हंसछ:, पर्वतों में चरनि तारा. हौसिया छ्न डाना पर्वत हौसिया छ्न भरौ क भाडा मन में बसौ मेरो मुलुक, आंख में रिटौ "मेरो पहाड." ख्वरा मुकुट ह्यूं चमकौ, खुट चमकौ गंगा धारा पार्भति को मैतुडा देश:, मेरो मुलुक कतुक प्यारा . धुरा जंगल, बांज पतेलि, फ़ल काफ़ल क्या झुलि रूनि. धन हिसालू, धन किल्मोडी, फ़ूल बुरांज फ़ुली रूनि. हरिया स्यारि मन खै जाछ: हौस लगुनी स्यर सिन्गारा पार्भति को मैतुडा देश:, मेरो मुलुक कतुक प्यारा .
(1 karma to you) Waise Shera Da ka pura name. Sher Singh Bisht hai.
dajyu logo,sherdaki ek kavita chhi " bhekvaki sikaur jaisi chyapandi ko chhai tu"agar aap logon ke paas hai to please upload kar dena.
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