Author Topic: SUMITRA NANDAN PANT POET - सुमित्रानंदन पंत - प्रसिद्ध कवि - कौसानी उत्तराखंड  (Read 125939 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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विजय

'उत्तरा' से

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई
वह साध बनी प्रिय परिचय में,
मैं भक्ति हृदय में भर लाई,
वह प्रीति बनी उर परिणय में।

      जिज्ञासा से था आकुल मन
      वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,
      विश्वास माँगती थी प्रतिक्षण
      आधार पा गई निश्चय मैं !

           प्राणों की तृष्णा हुई लीन
           स्वप्नों के गोपन संचय में
           संशय भय मोह विषाद हीन
           लज्जा करुणा में निर्भय मैं !

                 लज्जा जाने कब बनी मान,
                 अधिकार मिला कब अनुनय में
                 पूजन आराधन बने गान
                 कैसे, कब? करती विस्मय मैं !

उर करुणा के हित था कातर
सम्मान पा गई अक्षय मैं,
पापों अभिशापों की थी घर
वरदान बनी मंगलमय मैं !

           बाधा-विरोध अनुकूल बने
           अंतर्चेतन अरुणोदय में,
           पथ भूल विहँस मृदु फूल बने
           मैं विजयी प्रिय, तेरी जय में।



- सुमित्रानंदन पंत


 


विजय

'उत्तरा' से

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई
वह साध बनी प्रिय परिचय में,
मैं भक्ति हृदय में भर लाई,
वह प्रीति बनी उर परिणय में।

      जिज्ञासा से था आकुल मन
      वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,
      विश्वास माँगती थी प्रतिक्षण
      आधार पा गई निश्चय मैं !

           प्राणों की तृष्णा हुई लीन
           स्वप्नों के गोपन संचय में
           संशय भय मोह विषाद हीन
           लज्जा करुणा में निर्भय मैं !

                 लज्जा जाने कब बनी मान,
                 अधिकार मिला कब अनुनय में
                 पूजन आराधन बने गान
                 कैसे, कब? करती विस्मय मैं !

उर करुणा के हित था कातर
सम्मान पा गई अक्षय मैं,
पापों अभिशापों की थी घर
वरदान बनी मंगलमय मैं !

           बाधा-विरोध अनुकूल बने
           अंतर्चेतन अरुणोदय में,
           पथ भूल विहँस मृदु फूल बने
           मैं विजयी प्रिय, तेरी जय में।



- सुमित्रानंदन पंत


 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Enjoy the poem of Sumitra Nandan Pant Ji.

वर्षा महोत्सव


पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति देश।

मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्त्र दृग सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,

जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!

गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों-से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!

गिरिवर के उर से उठ-उठ कर!
उच्चाकांक्षाओं-से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर,
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर!

उड़ गया, अचानक, लो भूधर
फड़का अपार पारद के पर!
रव शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!

धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुआँ, जल गया ताल!
यों जलद यान में विचर, विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल!

(वह सरला उस गिरि को कहती थी बादलघर)

इस तरह मेरे चितेरे हृदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी,
सरल शैशव की सुखद सुधि-सी वही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी!

- सुमित्रानंदन पंत
21 अगस्त 2001

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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One more poem of Pant JI.

मेह क्या बरसा

मेह क्या बरसा
घरों को लौट आए
नेह वाले दिन

हाट से लौटे कमेरे
मुश्किलों से मन बचा कर
लौट आए छंद में कवि
शब्द की भेड़ें चरा कर

मेह क्या बरसा
भले लगने लगे हैं
स्याह काले दिन

कोप घर से लौट
धरती ने हरी मेहँदी रचाई
वीतरागी पंछियों ने
गीतरागी धुन बनाई

मेह क्या बरसा
लगे मुरली बजाने
गोप ग्वाले दिन

कुरकुरे रिश्ते बने
कड़वे कसैले पान थूके
उमंगें छत पर चढ़ीं
मैदान में निकले बिजूके

मेह क्या बरसा
सभी ने हाथ में लेकर
उछाले दिन

-महेश अनघ

16 अगस्त 2005

 

मेघ घटा घनघोर

अश्व वेग-सी दौड़ गई है
मेघ घटा घनघोर
बूँदों की पायल को पहने
नाच रहा मन मोर
यमुना के तट वंशी बजाए
गोपियों संग चितचोर
धरती पर झमझम ये बूँदें
खूब मचाए शोर

-प्रत्यक्षा
16 अगस्त 2005

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Pant Ji also composed song for Bollyhood Moives..

Here is the information.


Song : Behti jaa behti jaa sarite praanon ki vyaakul dhaara si


Film :  Kalpana

Singer  : Vishnudas Shirali

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Wah Mehta ji Hindi Sahitya ki in anmol kritiyon ko yahan post karne ke liye dhanyavad.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Some more information about Pant JI.

Sumitranandan Pant was born in Kausani (Almora district of Uttarakhand ) on 20 May 1900. He died on 28th December, 1977. He started writing in 1975 and composed a huge number of poems, songs, plays, essays and short stories. He was a writer of the Chhayavaad style. He gave a flowery and melodious colour to his poems. He was awarded the Jnanpith award for his famous collection of poems ‘Chidambara’.
His wrote in Khadi Boli. His famous works are:
1. Poems – Paalav, Veena, Gunjan, Granthi, Veena
2. Stories – Paanch Kahaniyaan
3. Plays – Jyotsna, Rajatshikhar, Shilpi
 
The book ‘Rashmibandh’ is a compilation of 99 poems by Pant. The revised addition with some new poems was published in 1971. It has poems like Pratham Rashmi, Taaj, Baapu, Himadri, Yathatathya and Yatharth aur Adarsh. A few lines from Pratham Rashmi:

        प्रथम रश्मि का आना रंगिणि, तूने कैसे पहचाना ?
        कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि ! पाया, तूने यह गाना ?
         सोई थी तू स्वप्न नीड़ में पंखों के मुख में छिपकर,
         झूम रहे थे, घूम द्वार पर, प्रहरी-से जुगुनू नाना !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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A photo of Panti with Hari Bansh Bachachan ..

Pant Ji in centre

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Wah Mehta ji Wah chhaa gaye yaar aap. Dil ko chhoo lene wali kavitaen hain yeh.

पंकज सिंह महर

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उनकी याद को अमर रखने के लिये कौसानी में उनके पैत्रक घर में "सुमित्रानंदन पंत वीथिका"  नाम से एक संग्रहालय बनाया गया है, जिसमें उनकी लिखी कई पुस्तकें हैं.