Author Topic: Poet Gumani - लोककवि गुमानी : साहित्य का विलक्षण लेकिन गुमनाम व्यक्तित्व  (Read 28920 times)

हेम पन्त

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आकाश में चमकते लाखों सितारों के बीच कुछ सितारे अचानक तेज रोशनी के साथ चमक कर गायब हो जाते हैं.. उसके बाद उनके अस्तित्व के बारे में गौर करने वाला कोई नहीं होता.. ऐसा ही कुछ हुआ गुमानी जी के साथ..

उनकी मृत्यु के लगभग १०० साल बाद लोगो को उनके साहित्य की सुध आयी.. जो कुछ साहित्य भारी मशक्कत के बाद उपलब्ध हो सका उस से ही इस महान प्रतिभा के बारे में जानकर गर्व की अनुभूति होती है... साथ ही एक असंतोष का भाव भी जगता है कि गुमानी जी को साहित्य के क्षेत्र में वो स्थान दिलाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है.. जिसके वह हकदार है..       

हेम पन्त

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मूल रूप से गंगोलीहाट जनपद पिथौरागढ के उपराड़ा गाँव के निवासी गुमानी जी का वास्तविक नाम लोकरत्न पन्त था. उनके पिता का नाम पं. देवनिधि पन्त था. गुमानी जी का जन्म 10 मार्च सन् 1790 को काशीपुर में हुआ था. अपने मूल स्थान उपराड़ा से उन्हें विशेष लगाव था. यही जगह उनकी मुख्य कर्मस्थली भी रही. अपने इलाके के प्रति उनका अगाध प्रेम इस पंक्तियों से स्पष्ट हो जाता है. जिसमें उन्होने इस गांव की समृद्धि का वर्णन किया है..

वनै-वनै काफल किलमड़ो छ
वाड़ा मुड़ि कोमल काकड़ो छ
गोठन में गोरु लैण बाखड़ो छ
थातिन में है उत्तम उपरड़ो छ

हेम पन्त

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गुमानी जी कुमाऊँनी तथा नेपाली के प्रथम कवि तो थे ही, साथ ही हिन्दी तथा संस्कृत भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी. यह छन्द देखिये. चार पंक्तियों के छन्द की प्रत्येक पंक्ति में अलग भाषा का प्रयोग है.

बाजे लोक त्रिलोक नाथ शिव की पूजा करें तो करें (हिन्दी)
क्वे-क्वे भक्त गणेश का में बाजा हुनी तो हुनी (कुमाऊँनी)
राम्रो ध्यान भवानी का चरण मा गर्दन कसैले गरन् (नेपाली)
धन्यात्मातुलधाम्नीह रमते रामे गुमानी कवि (संस्कृत)

हेम पन्त

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खड़ी बोली का उद्भव भारतेन्दु युग में माना जाता है, जोकि 1850 के आस-पास शुरू होता है. लेकिन निम्न पद गुमानी जी द्वारा 1816 में रचित है, इसमें खड़ी बोली का प्रयोग स्पष्ट है. इस तरह गुमानी जी को खड़ी बोली का प्रथम कवि माना जाना चाहिये.
 
विष्णु देवाल उखाड़ा ऊपर बंगला बना खरा
महराज का महल ढहाया बेड़ी खाना वहाँ धरा
मल्ले महल उड़ाई नन्दा बंगलों से वहाँ भरा
अंग्रेजों ने अल्मोड़े का नक्शा औरी और करा

पंकज सिंह महर

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अति सुन्दर हेम दा,
गुमानी जी वास्तव में हमारे गौरव हैं, मैंने कहीं पढा़ है कि वह बाद में काशीपुर आकर बस गये थे और उन्होंने काशीपुर के बारे में भी काफी लिखा है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Hem Da,

You have brought a good information about this Poet. Thanx ( + 1 Karma to u ). I am sure you must have some more information about him. Kindly do post.

गुमानी जी कुमाऊँनी तथा नेपाली के प्रथम कवि तो थे ही, साथ ही हिन्दी तथा संस्कृत भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी. यह छन्द देखिये. चार पंक्तियों के छन्द की प्रत्येक पंक्ति में अलग भाषा का प्रयोग है.

बाजे लोक त्रिलोक नाथ शिव की पूजा करें तो करें (हिन्दी)
क्वे-क्वे भक्त गणेश का में बाजा हुनी तो हुनी (कुमाऊँनी)
राम्रो ध्यान भवानी का चरण मा गर्दन कसैले गरन् (नेपाली)
धन्यात्मातुलधाम्नीह रमते रामे गुमानी कवि (संस्कृत)

हेम पन्त

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इस पद में भी गुमानी जी ने अल्मोड़ा में अंग्रेजों के कारनामों का वर्णन किया है. इस विषय पर गुमानी जी ने खड़ी बोली में 20 पद लिखे हैं.

दूर विलायत जल का रास्ता करा जहाज सवारी है
सारे हिन्दुस्तान भरे की धरती वश कर डारी है
और बड़े  शाहों में सबमें धाक बड़ी कुछ भारी है
कहे गुमानी धन्य फिरंगी तेरी किस्मत न्यारी है 


खड़ी बोली का उद्भव भारतेन्दु युग में माना जाता है, जोकि 1850 के आस-पास शुरू होता है. लेकिन निम्न पद गुमानी जी द्वारा 1816 में रचित है, इसमें खड़ी बोली का प्रयोग स्पष्ट है. इस तरह गुमानी जी को खड़ी बोली का प्रथम कवि माना जाना चाहिये.
 
विष्णु देवाल उखाड़ा ऊपर बंगला बना खरा
महराज का महल ढहाया बेड़ी खाना वहाँ धरा
मल्ले महल उड़ाई नन्दा बंगलों से वहाँ भरा
अंग्रेजों ने अल्मोड़े का नक्शा औरी और करा


हेम पन्त

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एक महान आदमी का गुण यह है कि वह अपने मूल से हमेशा लगाव महसूस करता है. अपने पैतृक गांव उपराडा का सुन्दर वर्णन गुमानी जी ने इन शब्दों में किया है.

उत्तर दिशि में वन उपवन हिसालू काफल किल्मोड़ा.
दक्षिण में छन गाड़ गधेरा बैदी बगाड़ नाम पड़ा.
पूरब में छौ ब्रह्म मंडली पश्चिम हाट बाजार बड़ा.
तैका तलि बटि काली मंदिर जगदम्बा को नाम बड़ा.
धन्वन्तरि का सेवक सब छन भेषज कर्म प्रचार बड़ा.
धन्य धन्य यो ग्राम बड़ो छौ थातिन में उत्तम उप्राड़ा.

हेम पन्त

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गुमानी जी का जन्म काशीपुर में हुआ और वह काशीपुर के तत्कालीन राजा गुमान सिंह देव के दरबार में कवि रहे. गुमानी जी द्वारा काशीपुर के बारे में लिखे गये अनेक पदों मे से एक यह है

यहाँ ढेला नद्दी उत बहत गंगा निकट में
यहाँ भोला मोटेश्वर रहत विश्वेश्वर वहाँ
यहाँ सण्डे दण्डे कर धर फिरें शाँडउत ही
फरक क्या है काशीपुर शहर काशी नगर में?

अति सुन्दर हेम दा,
गुमानी जी वास्तव में हमारे गौरव हैं, मैंने कहीं पढा़ है कि वह बाद में काशीपुर आकर बस गये थे और उन्होंने काशीपुर के बारे में भी काफी लिखा है।


हेम पन्त

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गुमानी जी के जीवन काल में लोगों को क्रूर गोरखा शासन से मुक्ति मिली. अंग्रेजों के नये शासन का पहले तो लोगों ने एक प्रकार से स्वागत ही किया. लेकिन जल्द ही उनकी व्यापारिक मानसिकता के दर्शन होने लगे.1857 के पहले स्वतंत्रा संग्राम से लगभग 50 साल पहले ही गुमानी ने अपनी कविताओं के द्वारा लोगों में राष्ट्रीय चेतना उभारने की और उसे एक आक्रोश का रूप देने की कोशिश की.

हटो फिरंगी हटो यहाँ से
छोडो भारत की ममता
संभव क्या यह हो सकता है
होगी हम तुममें समता?

 

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