Author Topic: Poet Gumani - लोककवि गुमानी : साहित्य का विलक्षण लेकिन गुमनाम व्यक्तित्व  (Read 32556 times)

मोहन जोशी

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Bhot Bhal Hem Daaju,

Saachi main Gumani Juek baar main jo lekh tumile likho week liji aafu ke koti koti dhanyabad chu.  Bhuli bisari hastiyo k baar main hagil ke le likh la yasi aas karnu.

हेम पन्त

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गुमानी जी के समय में लोग गंगा नहाने के पुण्य को अन्य सभी चीजों से कितना अधिक महत्व देते थे, इस पर गुमानी जी ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है-

अरिमण परिमाण, कब जानु गंगनाणI
कैकि घर कुङि मुसनुं को दीछो रिण-दानI
दस बिरादर हमारा छिया, ल्है गई चीनखानI
यस नकाटा निगुरा राना, अब जानि मांग खाणII
   

पंकज सिंह महर

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हिंदी के पहले कवि गुमानी पंत
लेखक-श्रीकौस्तुभानंद पांडेय


हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में कुमाऊँ के साहित्यकारों का विशेष योगदान रहा है। भारतेंदु काल से सौ वर्ष पूर्व रची गई महाकवि गुमानी पंत की खड़ी बोली की रचनाएँ आज भी अपना ऐतिहासिक महत्व रखती हैं। गुमानी पंत कुर्मांचल में खड़ी बोली को काव्य रूप देने वाले प्रथम कवि हैं। सर ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक ''लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया'' में गुमानी जी को कुर्मांचल प्राचीन कवि माना है।
डॉ. भगत सिंह के अनुसार कुमाँऊनी में लिखित साहित्य की परंपरा १९वीं शताब्दी से मिलती हैं और यह परंपरा प्रथम कवि गुमानी पंत से लेकर आज तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है। इन दो दृष्टांतों से यह सिद्ध हो जाता है कि गुमानी जी ही प्राचीनतम कवि थे।

गुमानी का जन्म विक्रत संवत् १८४७, कुमांर्क गते २७, बुधवार, फरवरी १७९० में नैनीताल जिले के काशीपुर में हुआ था। इनके पिता देवनिधि पंत उप्रड़ा ग्राम (पिथौरागढ़) के निवासी थे। इनकी माता का नाम देवमंजरी था। इनका बाल्यकाल पितामह पं, पुरुषोत्तम पंत जी के सान्निध्य में बीता। इनका जन्म का नाम लोकरत्न पंत था। इनके पिता प्रेमवश इन्हें गुमानी कहते थे और कालांतर में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। इनकी शिक्षा-दीक्षा मुरादाबाद के पंडित राधाकृष्ण वैद्यराज तथा मालौंज निवासी पंडित हरिदत्त ज्योतिर्विद की देखरेख में हुई। २४ वर्ष की उम्र तक विद्याध्ययन के पश्चात इनका विवाह हुआ। गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने भी न पाए थे कि बारह वर्ष तक के लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने की ठान बैठे और तीर्थाटन को निकल गए। चार वर्ष तक प्रयाग में रह वहाँ एक लाख गायत्री मंत्र का जप किया। एक बार भोजन बनाते समय इनका यज्ञोपवीत जल गया। प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने व्रत समाप्ति तक पका अन्न न खाने की प्रतिज्ञा कर ली। उनके प्रपौत्र गोवर्धन पंत जी के अनुसार गुमानी जी ने प्रयाग के बाद कुछ वर्षों तक बदरीनाथ के समीप दूर्वारस पीकर तपस्या की थी। व्रत समाप्ति के बाद माता के आग्रह पर इन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया।

राजकवि के रूप में गुमानी जी सर्वप्रथम काशीपुर नरेश गुमान सिंह देव की राजसभा में नियुक्त हुए। राजसभा के अन्य कवि इनकी प्रतिभा से ईर्ष्या करने लगे। एक बार काशीपुर के ही पंडित सुखानंद पंत ने इन पर व्यंग्य कसा। पर्याप्त शास्त्रार्थ हुआ। जब महाराज गुमान सिंह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके तो मध्यस्थ की आवश्यकता हुई। उन्होंने मुरादाबाद के पंडित टीकाराम शर्मा को मध्यस्थ बनाया। टीकाराम जी भी गुमानी जी की प्रतिभा से ईर्ष्या करते थे। अतः उन्होंने सुखानंद संत का ही साथ दिया, गुमानी जी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और वे तत्काल निम्नलिखित श्लोक लिखकर सभा से बाहर चले गए- 

चंदन कर्दम कलहे भेको मध्यस्थतापन्नः।
ब्रूते पंक निमग्नः कर्दम साम्यं च चंदन लभते।।


अर्थात चंदन और कीचड़ में विवाद हुआ और मेंढक को मध्यस्थ बनाया गया। चूँकि मेंढक कीचड़ में ही रहता है, वह चंदन का साथ भला कैसे दे सकता है?

गुमानी जी टिहरी नरेश सुदर्शन शाह की सभा के मुख्य कवि रहे। एक बार दरबार में एक विद्वान आए और उन्होंने गुमानी से शास्त्रार्थ करना चाहा। सुदर्शन शाह के संकेत पर गुमानी जी शास्त्रार्थ के लिए उतर पड़े। कोई निर्णय न होता देख महाराज ने एक समस्या रख दी और कहा कि जो इसका समाधान निकाल लेगा वही विजयी माना जाएगा। समस्या थी-
टिहरी केहि कारन नाम गह्यो। गुमानी जी ने फौरन यह पद बनाकर प्रस्तुत कर दिया-

सुरंगतटी रसखानमही धनकोशभरी यहु नाम रह्यो।
पद तीन बनाय रच्यौ बहु विस्तार वेगु नहीं जात कह्यो।
इन तीन पदों के बखान बस्यो अक्षर एक ही एक लह्यो।
धनराज सुदर्शन शाहपुरी टिहिरी यदि कारन नाम गह्यो।।


गुमानी जी अपनी समस्यापूर्तियों के लिए विख्यात थे। उनकी रचनाएँ हिंदी मिश्रित संस्कृत, कुमाँउनी, नेपाली, खड़ी बोली, संस्कृत और ब्रज भाषा में है। एक बानगी देखिए-

बाजे लोग त्रिलोकनाथ शिव की पूजा करें तो करें (हिंदी)
क्वे-क्वे भक्त गणेश का जगत में बाजा हुनी त हुन्।। (कुमाँउनी)
राम्रो ध्यान भवानि का चरण माँ गर्छन कसैले गरन्।। (नेपाली)
धन्यात्मातुल धामनीह रमते रामे गुमानी कविः।। (संस्कृत)


एक और रचना देखिए-

शिरसि जटाजूटं विभ्रत् कौपीनंघृतवान्।
भस्माशेषै वपुषिदधानों हरिचयर्रांबरवान्।।
तृष्णामुक्तः स्वैर बिहारी योगकला विद्वान।
अलख निरंजन जपता योगी ओन्नमोनारान्।।

गुमानी जी की रचनाओं में ललकार के साथ ही उन कारणों और कमज़ोरियों का भी वर्णन है जिनके कारण भारत गुलाम हुआ। एक बानगी देखिए जो खड़ी बोली का स्पष्ट दृष्टांत है-

विद्या की जो बढ़ती होती, फूट न होती राजन में।
हिंदुस्तान असंभव होता बस करना लख बरसन में।
कहे गुमानी अंग्रेजन से कर लो चाहो जो मन में।
धरती में नहीं वीर, वीरता दिखाता तुम्हें जो रण में।

गुमानी जी की और भी कई रचनाएँ हैं जो उन्हें खड़ी बोली का पहला कवि साबित करने के लिए पर्याप्त है। अंग्रेज़ों ने इस देश की दौलत को लूटा-खसोटा, कला को नष्ट किया और देश की आर्थिक दशा को दयनीय स्थिति में पहुँचा दिया। उदाहरण देखिए-
छोटे पे पोशाक बड़े पे ना धोती ना टोपी है,
कहै गुमानी सुन ले बानी होनी है सो होती है।
अंग्रेज़ के राज भरे में लोहा महंगा सोने से।
दौलत खींची दुनिया की सो पानी पीवे दोने से।

तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति का चित्रण कवि के काशीपुर वर्णन में मिलता है। गोरखाली राज्य के भय से आतंकित कुमाऊँ की अधिकांश जनता तराई की और आ गई। वहाँ जनसंख्या विस्फोट से जनता में अनेक दुर्गुणों का समावेश हुआ। ब्राह्मणों और पंडितों की नकल कर अन्य लोग भी अपनी जीविका चलाने लगे। कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में उस समय की स्थिति का सजीव वर्णन किया है-

इसमें प्रथम तीन पंक्तियाँ बृज में और अंतिम पंक्ति हिंदी में है।

कथा वाले सस्ते फिरत धर पोथी बगल में
लई थैली गोली घर-घर हकीमी सब करें।
रंगीला-सा पत्रा कर धरत जोशी सब बनें।
अजब देखा काशीपुर सारे शहर में।।


अंग्रेज़ों के ज़माने में कुमाऊँ की समृद्धि नष्ट हो गई। कवि का भावुक ह्रदय कुमाऊँ की दुर्दशा पर कराह उठा-
आई रहा कलि भूतल में छाई रहा सब पाप निशानी।
हेरत हैं पहरा कछु और ही हेरत है कवि विप्र गुमानी।

गुमानी जी के जीवन में घटित एक रोचक घटना का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। अपने प्रवासकाल में एक बार गुमानी जी एटा जिले के शूकर (सोरों) में भागिरथी के किनारे एक गुफा में साधनारत थे। एक दिन दोपहर को वे विश्राम कर रहे थे। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि कोई उनके सिर पर हाथ फेर रहा है। आँखें बंद किए हुए ही उन्होंने पूछा, ''कोस्त्वं? अर्थात तुम कौन हो? उत्तर मिला ''कपिरहं कविस्त्वं'' अर्थात मैं कबि (बंदर) हूँ और तुम कवि हो। इतना सुनते ही उनका आँख खुल गई। उन्होंने अपने सिरहाने एक विशालकाय बंदर को देखा। इनके उठते ही वह बंदर गुफा की दीवार में प्रविष्ट हो गया। गुमानी जी ने हनुमान का आशीर्वाद मान दीवार में उसी स्थान पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की। यह प्रतिमा आज भी मौजूद है और वह गुफा गुमानी गुफा के नाम से जानी जाती है। हालाँकि स्थानीय लोगों ने इसे मंदिर का स्वरूप प्रदान कर दिया।

गुमानी जी चूँकि अपने विद्यार्थी जीवन से ही कविताएँ करते थे। अतः उनका रचनाकाल १८१० के लगभग माना जा सकता है। डॉ. भगत सिंह ने भी 'हिंदी साहित्य को कूर्मांचल की देन' नामक पुस्तक में गुमानी जी का रचनाकाल यही माना है। हिंदी साहित्य के इतिहासकार इस तथ्य को भूल गए कि भारतेंदु के प्रादुर्भाव से बहुत पहले गुमानी खड़ी बोली को काव्य का रूप दे चुके थे। श्रीधर पाठक का रचनाकाल कवि गुमानी जी के रचनाकाल से एक शताब्दी बाद का है। उनकी खड़ी बोली की रचनाएँ काव्य शास्त्र की कसौटी पर खरी उतरी है। उनकी रचनाओं में काव्य के सभी गुण विद्यमान हैं। अतः यह निर्विवाद सत्य है कि गुमानी जी ही खड़ी बोली के प्रथम कवि हैं। एक रचना इस प्रकार है-

अपने घर से चला फिरंगी पहुँचा पहले कलकत्ते
अजब टोप बन्नाती कुर्ती ना कपड़े ना लत्ते।
सारा हिंदुस्तान किया सर बिना लड़ाई कर फत्ते।
कहे गुमानी कलियुग ने यों सुब्बा भेजा अलबत्ते।।


गुमानी जी की निम्नलिखित रचनाएँ उपलब्ध हैं-
१. रामनाम पंचासिका, २. राम महिमा वर्णन, ३. गंगाशतक, ४. जगन्नाथाष्टक, ५. कृष्णाष्टक, ६. राम सहस्रगणदंडक, ७. चित्र पदावली, ८. राम महिमा, ९. रामाष्टक, १०. कालिकाष्टक, ११. राम विषय भक्ति विज्ञप्तिसार, १२. तत्व बोधिनी पंच पंचाशिका, १३. नीतिशतक शतोपदेश, १४. ज्ञान भेषज्य मंजरी। इनके अतिरिक्त गुमानी जी की अनेक भाषाओं में लिखी रचनाएँ गुमानी नीति में संग्रहीत है। सर जार्ज ग्रियर्सन ने 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में गुमानी जी की दो रचनाओं- गुमानी नीति और गुमानी काव्य-संग्रह का उल्लेख किया है। गुमानी नीति का संपादन देवीदत्त उप्रेती ने १८९४ में किया है। गुमानी काव्य-संग्रह का संकलन और संपादन देवीदत्त शर्मा ने १८३७ में किया। इसके अलावा उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हो सका। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उनके बारे में लेख अवश्य प्रकाशित हुए। पंडित देवीदत्त शर्मा के अनुसार यदि इनके लिखे हुए खर्रे भी मिल जाते तो इनकी समस्त रचना एक लाख से अधिक पदों में होती। उन्होंने तत्कालीन नरेशों के बारे में भी कई रचनाएँ कीं। हिंदी साहित्य के आधुनिक पितामहों को गुमानी जी को खड़ी बोली का पहला कवि मान लेना चाहिए।

 

साभार- www.abhivyakti-hindi.org

हेम पन्त

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अंग्रेजों के शासन में भी न्यायव्यवस्था में भ्रष्टावार का बोलबाला था. लोगों पर झूटे मुकदमे चलाये जाते थे. झूठी गवाही देने वालों की कमी नहीं थी. गुमानी जी ने इस भ्रष्टाचार को निकट से देखा और अपनी धार्मिक सोच के आधार पर ऐसे अनीतिपूर्वक काम करने वालों को खूब कोसा है.

रिश्वत खाए गवाह बिरानी वजह सबूती भरते हैं, गंगा जल हरवंश हलक की, राह हाथ पर धरते हैं॥

पैसे खातिर धर्म गंवाया मौत पराई मरते हैं, कहैं गुमानी अब ये पापी कैसे पार उतरते हैं॥

पंकज सिंह महर

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कवि गुमानी का जन्म काशीपुर में हुआ था, इनका पैतृक निवास स्थान ग्राम-उपराड़ा, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ था। इनका मूल नाम लोकनाथ पन्त था। कहते हैं कि काशीपुर के महाराजा गुमान सिंह की सभा में राजकवि रहने के कारण इनका नाम लोकरत्न "गुमानी" पड़ा और कालान्तर में ये इसी नाम से प्रसिद्ध हुये। गुमानी जी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने चाचा श्री राधाकृष्ण पन्त तथा बाद में कल्यूं(धौलछीना) अल्मोड़ा के सुप्रसिद्ध ज्योतिषी पण्डित हरिदत्त पन्त से शिक्षा ग्रहण की, इसके अतिरिक्त आपने चार वर्ष तक प्रयाग में शिक्षा ग्रहण की। ग्यान की खोज में आप वर्षों तक देवप्रयाग और हरिद्वार सहित हिमालयी क्षेत्रों में भ्रमण करते रहे, इस दौरान आपने साधु वेश में गुफाओं में वास किया। कहा जाता है कि देवप्रयाग क्षेत्र में किसी गुफा में साधनारत गुमानी जी को भगवान राम के दर्शन हो गये और भगवान श्री राम ने गुमानी जी से प्रसन्न होकर सात पीढियों तक का आध्यात्मिक ग्यान और विद्या का वरदान दिया। अपने जीवनकाल में गुमानी जी कोई महाकाव्य तो नहीं लिखा, किन्तु समकालीन परिस्थितियों पर बहुत कुछ लिखा। गुमानी जी मुख्यतः संस्कृत के कवि और रचनाकार थे। किन्तु खड़ी बोली और कुमाऊंनी में भी आपने बहुत कुछ लिखा है। संस्कृत में श्लोक और भावपूर्ण कविता रचने में इन्हें विलक्षण प्रतिभा प्राप्त थी।
        गुमानी जी को खड़ी बोली का पहला कवि कहा जाता है (यद्यपि हिन्दी साहित्य में ऐसा कहीं उल्लेख प्राप्त नहीं है), ऐसा संभवतः इसलिये कि प्रख्याल हिन्दी नाटककार और कवि काशी के भारतेन्दु हरिशचन्द्र, जिन्हें हिन्दी साहित्य जगत में खडी बोली का पहला कवि होने का सम्मान प्राप्त है, का जन्म गुमानी जी के निधन (१८४६) के चार वर्ष बाद हुआ था।
         काशीपुर के राजा गुमान सिंह के दरबार में इनका बड़ा मान-सम्मान था, कुछ समय तक गुमानी जी टिहरी नरेश सुदर्शन शाह के दरबार में भी रहे। इनकी विद्वता की ख्याति पड़ोसी रियासतों- कांगड़ा, अलवर, नाहन, सिरमौर, ग्वालियर, पटियाला, टिहरी और नेपाल तक फ़ैली थी।

गुमानी विरचित साहित्यिक कृतियां-

रामनामपंचपंचाशिका, राम महिमा, गंगा शतक, जगन्नाथश्टक, कृष्णाष्टक, रामसहस्त्रगणदण्डक, चित्रपछावली, कालिकाष्टक, तत्वविछोतिनी-पंचपंचाशिका, रामविनय, विग्यपतिसार, नीतिशतक, शतोपदेश, ग्यानभैषज्यमंजरी।
       उच्च कोटि की उक्त कृतियों के अलावा हिन्दी, कुमाऊंनी और नेपाली में कवि गुमानी की कई और कवितायें है- दुर्जन दूषण, संद्रजाष्टकम, गंजझाक्रीड़ा पद्धति, समस्यापूर्ति, लोकोक्ति अवधूत वर्णनम, अंग्रेजी राज्य वर्णनम, राजांगरेजस्य राज्य वर्णनम, रामाष्टपदी, देवतास्तोत्राणि।
       हिमालय के इस महान सपूत व कूर्मांचल गौरव की साहित्य साधना पर अपेक्षाकृत बहुत कम लिखा ग्या है। 1897 में चन्ना गांव, अल्मोड़ा के देवीदत्त पाण्डे जी ने "कुमानी कवि विरचित संस्कृत एवं भाषा काव्य" लिखा है और रेवादत्त उप्रेती ने "गुमानी नीति" नामक पुस्तकों में कवि का साहित्यिक परिचय दिया है। उपराड़ा में गुमामानी शोध केन्द्र इन पर व्यापक शोध कर रहा है।


उत्तराखण्ड की विभूतियां से साभार टंकित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गुमानी जी की यह कविता
   
" केला, निम्बू अखोड दाडिम रिखू नारिंग आदों दही
खासो भात जमलियो कलकलो गडेरी गवा
चियूडा सद उत्योल दूध , वाकलो ध्यू गाय को दानोदार
खानी सुंदर मौरिंया धाव दवा गंगावाली रानिया

Bhishma Kukreti

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Hindi critics of easter UP and other parts of India did not include Gumani Pant in Hindi language creative .
At least we should do something that Gumani Pant gets its due

Dinesh Bijalwan

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He has been the pioneer of  khariboli  in uttrakhand .  If some body does not include his  name  in the list of Hindi language that does not mean that he was not there.  The  Garhwal University, & Kumau University Hindi Departments should  take a note  and  take appropriate  action at their level to give  him  his  due share.

Bhishma Kukreti

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Garhwali prose maker-1
             Mohan Lal Negi :Great Garhwali Language Story teller
                                                          Bhishma Kukreti
              It is not possible to describe the history of Garhwali language story writing without mentioning the name of   Mohan Lal Negi. His contribution in Garhwali language modern story writing is remembered for accelerating the pace in Garhwali prose creation.
Born in 1930, Mohan lal Negi belongs to village Belgaon, Patti Athur of Tihri Garhwal. After graduation he completed L.L.b and started his practice as advocate in Tihri . He started to write in Hindi and published stories like ‘Tihri ke Ghataghar’ and ‘Naukar’ but after the influence of dr Mahaveer Gairola , he started to write in Garhwali .
      Mohan Lal Negi assisted Dr Mahaveer Gairola in editing, writing articles, publishing and distribution of ‘Naitiki’ magazine a quarterly magazine from Tihri.
  He published his first collection of modern Garhwali language stories in 1967. Critics appreciated his work and called his work as mile stone in modern Garhwali language story world.  He published his second modern story collection ‘ Burans ki Peed’. no doubt his stories are more of preaching and happy ending but there we find wit, reality and can see the historical happenings in Garhwal in his stories. ‘Dola Palaki’ is one example wherein he takes us the resistance shown by upper class against the Harijan using Dola Palki in their marriage procession. This story shows his capability to use reality and at the same time to hook the readers by his language, story telling style, creating tension because of conflicting situation or self interests of two individuals or classes , uses of common proverb for providing speed to story and common dialogues of his area.
His main specialty is to retain the dialects of Tihri area in his writing . He also wrote a novel ‘Jaumala’. He was influenced by Dr Mahaveer Gairola, therefore, the stories are having touch for dreaming  equality in the human society and at the same time shows the importance of spirituality too. Dr Mahaveer Gairola  is firm believer that if Communism should be deeply rooted in India communism should aquire Indian spirituality in its principles.
  He was awarded for his writing by Jaishree Samman’ by Garhwali Bhasha Parishad , Dehradun. Jay Shri Samman and Navani Puruskar provided by private organizations but these two awards are equal to  Padma  award in Garhwali li literature.
  He also carved the pictures of Gandhi, Lenin, Radhakrishnan, Meerabai on copper plates an d was appreciated by art collectors and art lovers.
 Mohan Lal Negi will be remembered for his stories publication when there was a strong wave of creating poetries in Garhwali language specially in Delhi (in sixties to nineties Delhi was also capital of Garhwali language creativity) and for insisting regional dialects in Garhwali literature.
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, India, 2009


राजेश जोशी/rajesh.joshee

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लोकवि गुमानी जी पर एक पुस्तक अंग्रेजी में श्री चारू चन्द्र पाण्डे जी की भी है, जिसका शीर्षक है "Echoes From The Hills - Poems of Gaurda"। इसके अतिरिक्त भी श्री पाण्डे जी द्वारा गुमानी कवि के बारे में अन्य पुस्तकें भी लिख गयी हैं।  श्री चारु चन्द्र पाण्डे जी हमारे विद्यालय में प्रधानाचार्य भी रहे यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है, उसी समय उनको अध्यापन में योगदान के लिये राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला था।  साहित्य में उनका मुख्य विषय गुमानी पंत की कृतियो के विष्लेषण से सम्बन्धित ही रहा।

 

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