Author Topic: हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता के जनक ,मनोहरश्याम जोशी  (Read 19604 times)

पंकज सिंह महर

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'क्याप' का मूली फसक

बाहर वालों को हमारी उस किस्म की गप्पें भी पसंद आयीं,जिनमें हम ऐसा जताते थे मानों गिनिस बुक आफ रिकार्ड में जा सकने योग्य सभी अद्भुत घटनायें और चीजें हमारे इलाके में होती हों । फर्ज़ कीजिये किसी ने जौनपुर की मूली का जिक्र किया कि वह बहुत ही बड़ी और भारी होती है. इस पर हमारी तरफ वाला बड़े विनम्र स्वर में कहता- 'महाराज, मैंने आपकी वो जौनपुर वाली मूली तो देखी नहीं ठहरी. अपने नाना जी के बाड़े में जो मूली होने वाली हुई उसके बारे में जरूर जानता हूं. एक दिन क्या हुआ मामी ने कहा-जा रे बाड़े में से एक मूली उखाड़ ला. साग के लिये और कुछ तो है नहीं आज . -अरे मामी - मैंने कहा- एक मूली का क्या होने वाला हुआ इतने बड़े परिवार में! मामी ने कहा- 'तू पहले जा के देख तो सही ! वहां जाकर देखा महाराज तो बाप रे बाप ! एक-एक हाथ तो जमीन के ऊपर निकली ठहरी मूलियां ! जमीन के भीतर का किसे पता ! और मोटाई पूछते हो तो मैनें अंगवाल डाली तो हाथ छोटे पड़ गए कहा .हिलाता हूं तो हिली ही नहीं. कुदाल से खोदना शुरू किया तो मेरी कबर-जसी बन गई, लेकिन मूली फिर भी नहीं निकली. तो मैंने अंगवाल डाल कर खूब जोर से हिलाया. थोड़ी हिलती-सी देखी तो पीछे को झुक कर जोर लगाकर खींचा. मूली तो निकल गई महाराज, लेकिन मैं उसके अंगवाल डाले-डाले ही ढिणमिणाते-ढिणमिणाते सीधा तल्ला गांव जा पहुंचा. अब मेरे को कितनी चोट लगी क्या बताऊं, लेकिन महाराज ,उस मूली को कुछ नहीं हुआ. फिर तल्ला गांव वालों ने मेरी दवा-पानी की और कुल्हाड़ी से मूली के चार टुकड़े किए एक-एक टुकड़े को दो-दो आदमी उठाकर ऊपर ले गये मल्ला गांव.


साभार-http://kabaadkhaana.blogspot.com

पंकज सिंह महर

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कुमाऊँनी में कसप का अर्थ है ‘क्या जाने’। मनोहर श्यामजोशी का कुरु-कुरु स्वाहा ‘एनो मीनिंग सूँ ?’ का सवाल लेकर आया था, वहाँ कसप जवाब के तौर पर ‘क्या जाने’ की स्वीकृति लेकर प्रस्तुत हुआ। किशोर प्रेम की नितांत सुपरिचित और सुमधुर कहानी को कसप में एक वृद्ध प्रध्यापक किसी अन्य (कदाचित नायिका संस्कृतज्ञ पिता) की संस्कृति कादम्बरी के आधार पर प्रस्तुत कर रहा है। मध्यवर्गीय जीवन की टीस को अपने पंडिताऊ परिहास में ढालकर प्राध्यापक मानवीय प्रेम को स्वप्न और स्मृत्याभास के बीचों-बीच ‘फ्रीज’ कर देता है।

कसप लिखते हुए मनोहर श्याम जोशी के आंचलिक कथाकारों वाला तेवर अपनाते हुए कुमाऊँनी हिन्दी में कुमाऊँनी जीवन का जीवन्त चित्र आँका है। यह प्रेमकथा दलिद्दर से लेकर दिव्य तक का हर स्वर छोड़ती है लेकिन वह ठहरती हर बार उस मध्यम पर है जिसका नाम मध्यवर्ग है। एक प्रकार से मध्यवर्ग ही इस उपन्यास का मुख्य पात्र है। जिन सुधी समीक्षकों ने कसप को हिन्दी के प्रेमाख्यानों में नदी के द्वीप के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि ठहराया है, उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि जहाँ नदी के द्वीप का तेवर बौद्धिक और उच्चवर्गीय है, वहाँ कसप का दार्शनिक ढाँचा मध्यवर्गीय यथार्थ की नींव पर खड़ा है। इसी वजह से कसप में कथावाचक की पंडिताऊ शैली के बावजूद एक अन्य ख्यात परवर्ती हिन्दी प्रेमाख्यान गुनाहों का देवता जैसी सरसता, भावुकता और गजब की पठनीयता भी है। पाठक को बहा ले जाने वाले उसके कथा प्रवाह का रहस्य लेखक के अनुसार यह है कि उसने इसे ‘‘चालीस दिन की लगातार शूटिंग में पूरा किया है।’’ कसप के संदर्भ में सिने शब्दावली का प्रयोग सार्थक है क्योंकि न केवल इसका नायक सिनेमा से जुड़ा हुआ है बल्कि कथा निरूपण में सिनेमावत् शैली प्रयोग की गई है।

1910 को काशी से लेकर 1980 तक के हालीवुड तक की अनुगूँजों से भरा, गँवई गाँव के एक अनाथ, भावुक, साहित्य-सिनेमा अनुरागी लड़के और काशी के समृद्ध शास्त्रियों की सिरचढ़ी, दबंग लड़की के संक्षिप्त प्रेम की विस्तृत कहानी सुनाने वाला यह उपन्यास एक विचित्र-सा उदास-उदास, मीठा-मीठा सा प्रभाव मन पर छोड़ता है। ऐसा प्रभाव जो ठीक कैसा है, यह पूछे जाने पर एक ही उत्तर सूझता है-कसप।

पंकज सिंह महर

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कुमाऊँनी हिन्दी

उपन्यास में जहाँ भी कुमाऊँनी शब्दों का प्रयोग हुआ है उनका अर्थ वहीं दे दिया गया है। इसके कुछ संवादों में जो कुमाऊँनी हिन्दी प्रयुक्त हुई है वह पाठक को थोड़े अभ्यास से स्वयं समझ आ जायेगी। यह हिन्दी, कुमाऊँनी का ज्यों-का-त्यों अनुवाद करते चलने से बनती है और कुमाऊँ में इसी का आम तौर से व्यवहार होता है। इस कुमाऊँनी हिन्दी के कुछ विशिष्ट प्रयोग समझ लेना आवश्यक है।

‘कहा’, ‘बल’: वाक्य के अन्त में आया है ‘कहा’ अतिरिक्त आग्रह का सूचक है- ‘बहुत सुन्दर दिखती है, कहा’ का मतलब है, ‘मैं कह रही हूँ वह बहुत सुन्दर दिखती है।’ वाक्य के अन्त में आया ‘बल’ (बोला) इंगित करता है कि ऐसा किसी और ने कहा, ऐसा हमने किसी और से सुना। ‘बड़ी सुन्दर दिखती है, बल।’ का मतलब है ‘सुना, बहुत सुन्दर दिखती है।’ ‘मैं नहीं खाता, बल।’ का मतलब है ‘उसने कहा कि मैं नहीं खाऊँगा।’

ठहरा : हिन्दी में ‘आप तो अमीर ठहरे’ जैसे प्रयोग हो सकते हैं। कुमाऊँनी हिन्दी में होते ही नहीं, धड़ल्ले से होते हैं। कुमाऊँनी में ‘भया’ और ‘छ’ दोनों से क्रिया-पद बनते हैं लेकिन ‘भया’ को अधिक पसन्द किया जाता है और कुमाऊँनी हिन्दी में उसे ‘ठहरा’ अथवा ‘हुआ’ का रूप दिया जाता है। ‘तू तो दीदी पढ़ी-लिखी हुई’, ‘आप तो महात्मा ठहरे।’ जैसे प्रयोग कुमाऊँनी हिन्दी को विशिष्ट रंग देते हैं।

वाला ठहरा : कुमाऊँनी और कुमाऊँनी हिन्दी में ‘करता था’ कहा जा सकता है किन्तु इस तरह का ‘अतीत’ भयंकर रूप से अतीत सुनायी पड़ता है। अतएव ‘छी’ की जगह ‘भयो’ का सहारा लिया जाता है और ‘भयो’ का ‘वाला ठहरा’ अथवा ‘वाला हुआ’ के रूप में अनुवाद किया जाता है। यथा कुमाऊँनी हिन्दीं में ‘वह हमसे मिलने आता था’ या ‘मिलने आया करता था’ को ‘वह हमसे मिलने आनेवाला ठहरा’ ‘वह हमसे मिलने आनेवाला हुआ’ कहा जायेगा। स्वाभाविक ही है कि इस आग्रह के चलते कुमाऊँनी हिन्दीं में ‘वाला’ और ‘ठहरा’ की भरमार है। मूल कुमाऊँनी में क्रिया के साथ ‘एर’ जोड़ देने से ‘वाला’ का भाव पैदा करने की प्रीतिकर परम्परा है यथा ‘करणेर’ माने ‘करनेवाला’, ‘जाणेर’ माने ‘जानेवाला’।
‘जो’: इस हिन्ही शब्द का कुमाऊँनी हिन्दी में कई तरह से उपयोग किया जाता है : ‘अगर’ के अर्थ-‘जो तो तुझे जल्दी हो, चला जा’। ‘मैं तो नहीं’ के अर्थ में -‘जो करेगा तेरी खुशामद !’ ‘पता नहीं कौन’ के अर्थ में ‘जो कर जाता होगा यह तोड़-फोड़।’ ‘थोड़े ही’ और उसके कुमाऊँनी समानार्थी ‘क्या’ को अतिरिक्त बल देने के लिए- ‘मैं जो थोड़ी हूँ तेरा यार।’ ‘ऐसा जो क्या।’ ‘तो’ के अर्थ में- ‘क्या जो कह रहा था वह ?’
हैं, है, हूँ आदि का लोप : ‘रुक, मैं भी आ रही।’ अर्थात्, ‘रुक, मैं भी आ रही हूँ।’

प्रश्नवाचक में क्रियापद ‘रहा है’ का ‘हुआ है’ की तरह उपयोग : ‘सच्ची, तुम्हारे वहाँ वह मूँछवाला कौन आ रहा है ?’ अर्थात् ‘सच, तुम्हारे वहाँ मूँछवाला’ कौन आया हुआ है ?’
प्रश्नवाचक में वर्तमान के क्रियापद से तुरन्त भविष्य का बोध : ‘यह लड्डू खाता है ?’ अर्थात् ‘यह लड्डू खायेगा ?’ अर्थात् ‘क्या करने का इरादा है ?’
प्रश्नवाचक में भविष्य के क्रियापद से वर्तमान के विस्मय का बोध : ‘इतनी रात गये कौन आ रहा होगा ?’ अर्थात् ‘इतनी रात गये कौन आया है ?’
‘फिर’: ‘तब’, ‘क्या’ और ‘तो’ के अर्थ में भी ‘फिर’ का उपयोग किया जाता है। यथा ‘फिर क्या करती मैं !’ ‘मैंने दिये उसे पैसे, फिर !’ ‘क्या खाता है फिर ?’

‘देना’: कर देना, बता देना जैसे प्रयोग हिन्दी में भी होते हैं किन्तु कुमाऊँनी हिन्दी में यह ‘देना’ कभी पूरी गंभीरता से, कभी परिहास में हर क्रिया के साथ भिड़ाया जा सकता है- ‘मेरे साथ आ देता है?’ अर्थात् ‘मेरे साथ चले चलोगे ?’ ‘मेरा सिर खा देता है ?’ अर्थात् ‘मेरा सिर खाने की कृपा तो करोगे ?’
भाववाचक संज्ञाएँ : कुमाऊँनी में ‘ओल’ , ‘एट’, ‘एन’ प्रत्यय लगाकर संज्ञाओं और क्रियाओं में भाववाचक संज्ञाएँ धड़ल्ले से बनायी जाती हैं। ‘कुकुर’ में ‘ओल’ मिलाकर ‘कुकर्योल’ बनेगा जिसका अर्थ होगा ‘कुत्तागर्दी’। ‘पागल’ में ‘एट’ मिलाकर ‘पगलेट’ बनेगा जिसका अर्थ होगा ‘पागलपन’। जलने और भुनने में ‘एन’ मिलाने से ‘जलैन’ और ‘भुनैन’ बनेंगे जिसका अर्थ होगा जलने की गन्ध, भुनने की गन्ध।
‘और ही’ : इसका प्रयोग ‘बहुत ज्यादा’, ‘विशिष्ट प्रकार की’ का बोध कराने के लिए होता है- ‘और ही बास आ रही थी, कहा !’ अर्थात् ‘भयंकर’ बदबू आ रही थी।’

आप ही : जब कुमाऊँनी हिन्दी में कहा जाता है ‘आप ही रहा’ तो उसके मतलब होते हैं इसे ‘अपने आप रहने दो’ यानी ‘रहने दो’। यथा ‘आप ही जाता है।’ का अर्थ है ‘जाने दो उसे !’
घरेलू नाम : स्त्रियों के नाम के संक्षिप्त रूप में ‘उली’ और पुरूषों के संक्षिप्त नाम में ‘इया’ या ‘उवा’ लगाकर लाड़-भरे घरेलू नाम बनते हैं। ‘सुबली’ माने सावित्री, ‘सरुली’ माने सरोज, ‘परुली’ माने पार्वती, ‘रधुली’ माने राधा आदि। देवीदत्त से ‘देबिया’, हरिश्चन्द्र से ‘हरिया’ प्रेमवल्लभ से ‘पिरिया’ रघुवर से ‘रघुवा’ आदि। नामों के आगे ‘औ’ लगा देने से भी प्यार-भरे संबोधन का आभास मिलता है- ‘पुरनौ’ माने ‘रे पूरन !’
इस कथा के जो भी सूझे मुझे शीर्षक विचित्र सूझे। कदाचित इसलिए कि इसे सीधी-सादी कहानी के पात्र सीधा-सपाट सोचने में असमर्थ रहे। या इसलिए कि यहाँ अपने एकाकीपन में न रम पाता हुआ मैं, द्वितीय की इच्छा करते हुए, किसी अन्य की भी पहले की गयी ऐसी ही इच्छा का अनुसरण करते हुए, स्वयं सीधी-सपाट सोचने में असमर्थ हो चला हूँ। तो विचित्र ही सूझे हैं शीर्षक, विचित्र ही रख भी दिया है शीर्षक। किंतु मात्र आपको चौंकाने के लिए नहीं। आपकी तरह मैं भी मात्र चौंकानेवाले साहित्य का विरोधी हूँ। बल्कि मुझे तो समस्त ऐसे साहित्य से आपत्ति है जो मात्र यही या वही करने की कसम खाये हुए हो।

किसी के रचे पर मैं जो रच रहा हूँ, यहाँ एडवर्डयुगीन बँगलों के इस शांत, सुन्दर पहाड़ी कस्बे बिनसर में, वह एक प्रेम-कहानी है। इस विचित्र शीर्षक की विशिष्ट अर्थवत्ता है उसमें। विचित्र ही है यहां सब क्योंकि मूल कथा संस्कृत में लिखी बेढ़ब-सी कादम्बरी है।
यों अगर आप इस शीर्षक से चौंके हों तो भी कोई हर्ज नहीं। चौंका होना प्रेम की लाक्षणिक स्थिति जो है। जिन्दगी की घास खोजने में जुटे हुए हम जब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं, तभी प्यार का जन्म होता है। या शायद इसे यों कहना चाहिए कि वह प्यार ही है जिसकी पीछे से आकर हमारी आँखें गदोलियों से ढक देना हमें चौंकाकर बाध्य करता है कि घड़ी-दो घड़ी घास, घाम और खुरपा भूल जायें। चौंककर जो होता है उस प्यार को समझने में आपका स्वयं थोड़ा चौंका हुआ होना कदाचित सहायक ही हो। अस्तु !
प्रेम का पर्दापण किसी सुरमय स्थल में होता दिखाया जाय-ऐसा शास्त्रीय विधान है। आज के लेखक भी बहुधा किसी हिल-स्टेशन के सुन्दर-शान्त-एकान्त डाक-बँगले में ही प्रेम का प्रस्फुटन होता दिखाते हैं। वहीं पिछले किसी प्रेम से आहत व्यक्ति, नूतन प्रेम, नवीन आशा से आँख मिलाता है उनकी कहानियों में।

यह कहानी भी हिल-स्टेशन नैनीताल में शुरू हो रही है। नायक-नायिका, डाक-बँगले में तो नहीं, बँगले में जरूर हैं। बँगला न नायिका का है, न नायक का। वह एक खाली बिकाऊ बँगला है, जो इन दिनों नायिका के मौसा ने, जो नायक के बहुत दूर-दराज के चाचा भी हैं, अपनी बेटी के विवाह के निमित्त चार दिन के लिए ले रखा है। नगरवासी इसे वर्त्तमान मालकिन के रूप-स्वभाव को लक्ष्य-कर भिसूँणी (फूहड़) रानी की कोठी कहते हैं, लेकिन अगर आप, नायक की तरह, कभी बँगले की ओर फूटनेवाली पगडण्डी की शुरुआत पर पाँगर1 के पेड़-तले स्थापित पत्थर की काई हटायें, तो इस बँगले का वह नाम पढ़ सकेंगे जो इस कथा के अधिक अनुकूल है- ‘राँदे वू’ –संकेत-स्थल।
नायक-नायिका में से कोई भी किसी पिछले प्रेम से आहत नहीं है। लेकिन आहत होंगे अब, ऐसी आशा की जा सकती है क्योंकि एक उम्र होती है आहत होने की और वे इस उम्र में पहुँच चुके हैं। उस उम्र के बाद और उस चोट के बावजूद तमाम और जिन्दगी होती है, इसीलिए लेखक होते हैं, कहानियाँ होती हैं।

नायक का नाम देवादत्त तिवारी है। बहुत गैर-रूमानी मालूम होता है उसे अपना यह नाम। यों साहित्यिक प्राणी होने के नाते वह जानता है कि देवदास, ऐसे ही निकम्मे नाम के बावजूद, अमर प्रेमी का पद प्राप्त कर सका। इससे आशा बँधती है। फिर भी निरापद यही है कि वह अपने को डी.डी. कहना-कहलाना पसन्द करे। इस पसन्द को कुछ मसखरे मित्रों ने उसे ‘डी.डी. द मूड़ी’ भी कहते हैं पर इससे उसे कोई आपत्ति नहीं क्योंकि मूड का इस छोर से उस छोर पर झटके से पहुँचते रहना उसे अपनी संवेदनशीलता का लक्षण मालूम होता है। घरवाले उसे इसी मूड के मारे ‘सुरिया’ (जब जो स्वर साधा तब उसी में अटका रह जानेवाला धती) कहते हैं। घरवालों के नाम पर दूर के चचिया-ममिया-फुफिया-मौसिया रिश्तेदार ही बचे हैं। माँ-बाप दोनों अपने इस इकलौते को दुधमुँहा ही छोड़ गये थे। नायक बाईस साल का है। ढाई वर्ष पहले उसने इलाहाबाद से बी.ए. पास किया। एक चाचाजी ने कह-कहलाकर उसे वहीं ए.जी. दफ्तर में क्लर्की दिलवा दी और आई.ए.एस. – पी.सी.एस. के लिए तैयारी करने को कहा मेधावी बालक से। लेकिन साहित्यिक डी.डी. को यह सब रास नहीं आया। वह दो ही महीने में बम्बई भाग गया। किसी व्यावसायिक दिग्दर्शक का सहायक है। कलात्मक फिल्में बनाने का इरादा रखता है। इस बीच उसके एकांकियों, कविताओं और कहानियों के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। विवाह के छोड़ अन्य सभी क्षेत्रों में उदीयमान श्रेणी की सितारा माना जा सकता है। विवाह के लिए, मध्यवर्गीय मानकों के अनुसार, वह सर्वथा अयोग्य वर है।

प्रेम के बारे में हमारे नायक ने पढ़ा-सुना बहुत कुछ है, सोची भी बहुत विस्तार से है, लेकिन प्रेम कभी किया नहीं है। हलफिया बयान देते हुए अलबत्ता उसे तीन प्रसंगों का उल्लेख करना होगा कि इनमें प्रेम ठहराने की जिद न की जाये। पहला यह कि कक्का के बीचवाले लड़के ‘मझिल दा’ की पत्नी के लिए, जिन्हें अपनी सास के शब्दों में चिथड़े (किताबें) पढ़ने का श़ौक था, वह उपन्यास-कहानी संग्रह लाया करता। बोज्यू (भाभी) इन उपन्यास-कहानियों के बारे में विस्तार से उससे चर्चा किया करतीं।
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1.चेस्टनट।

कबी-कभी बोज्यू उसे वे सपाट-से पत्र पढ़वा देतीं जो दिल्ली से यू.डी.सी. मझिल’ दा उन्हें भेजते। और अक्सर वह मझिल’ दा के नाम पर पत्र लिखते हुए उससे साहित्यिक परामर्श कर लिया करतीं- ‘डी.डी लल्ला, वह लक्या है दो नैना मत खाइयो ?’ बोज्यू के समक्ष लल्ला अपना दुखड़ा रोता और बोज्यू कहतीं, ‘‘शिबौ-शिब’’ (शिव-शिव, बेचारा) ! एक शाम बोज्यू ने अपना दुखड़ा भी रोया और दुखिया सब संसारवाली मनःस्थिति में लल्ला के कन्धे पर सिर रख दिया। रख दिया और हटाया नहीं। इसके कुछ दिन बाद ही बोज्यू के आग्रह पर मझिल’ दा ने दिल्ली में कमरा-रसोई की व्यवस्था करके पत्नी को सास-ससुर की यौवन-हन्ता सेवा से मुक्ति दिला दी। इति प्रथम प्रसंग।

दूसरा यह कि डी.डी के एकांकी ‘साँझ’ के मंचन में सुषमा नामक जिस दुबली-पतली उदास-सी छात्रा ने छोटी-सी भूमिका की, वह उसके लिए रिहर्सल में रोजाना कुछ टिफिन बनाकर लाती। स्वेटर बुन देने का प्रस्ताव किया उसने, पर डी.डी ऊन के लिए पैसे नहीं जुटा पाया। एक खूबसूरत नोट-बुक उसने डी.डी. को प्रजेण्ट की-नया नाटक लिखने के लिए। लेकिन दुर्भाग्य की रक्षा-बंधन के दिन उसने डी.डी. को राखी बाँध दी। डी.डी. ने अपना इकलौता टूटा-सा पैन इस राखी के एवज में दे डाला कि देने को कुछ और नहीं था और उसकी आँखें छलक आयीं- कुछ अपनी निर्धनता पर और कुछ सुषमा से यह न कह सकने की कायरता पर कि मैं तुमसे राखी सम्प्रति नहीं बँधवाना चाहता। इति द्वितीय प्रसंग।

तीसरा यह कि मौसेरी दीदी की एक सहेली की बहन कमनिली पिछले साल किसी इंटरव्यू के सिलसिले में बंबई आयीं और डी.डी. पर उन्हें शहर दिखाने की जिम्मेदारी पड़ी। कमलिनीजी हर जगह को देखकर ‘हाउ स्वीट, हाउ नाइस’ कहती थीं। जब बंबई से विदा होते हुए उन्होंने प्लेटफार्म पर फरमाइश की कि ‘हमें कोई मैगजीन ला दीजिए ना प्लीज’ तब वह ‘फिल्म फेयर’ खरीद लाया और उसने उस रूपसी से पैसे लेने से इनकार कर दिया। इस पर रूपसी ने कहा, ‘‘हाउ स्वीट यू आर डी.डी, प्लीज राइट टू मी, कभी लखनऊ आओ न।’’ डी.डी. ने उसे पत्र भेजा लेकिन उत्तर नहीं आया। इति तृतीय प्रसंग।
नायक ने न केवल प्रेम नहीं किया है बल्कि अक्सर अश्रु-प्रवाह करते हुए यह तय पाया है कि मैं उन अभागों में से हूँ जिन्हें कभी प्यार नहीं मिलेगा। विधाता ने मुझे इस योग्य बनाया ही नहीं है कि कोई मुझसे प्यार करे। छह फुट पौने तीन इंच और एक सौ पैंतीस पौंड की इस सींकिया काया से कौन आकर्षित हो सकता है भला ? तिस पर निर्धन। विफल। अव्यवहारकुशल। सर्वथा-सर्वथा उपेक्षणीय !

यो कुछ क्षण ऐसे भी आते रहे हैं जब नायक को नायक कुल मिलाकर ऐसा खास बुरा नहीं मालूम हुआ है। इन एकान्त क्षणों में वह विलायती फिल्म तारिका जीन सिम्मंस की अपनी प्रेमिका के रूप में गरम-गीली कल्पनाएँ करता आया है।
नायिका ने न प्रेम किया है, न प्रेम के बारे में फुर्सत से कुछ सोचा ही है। इधर यह अलबत्ता वह कभी-कभी सोचती रही है कि अब प्रेम के बारे में भी कुछ सोचना चाहिए। उसे सत्रहवाँ लगा है पिछले महीने। इण्टर के प्रथम वर्ष में है। पढ़ने में उसका जरा भी मन नहीं लगता और आगे पढ़ने की उसे कतई इच्छा नहीं है। अल्मोड़ा में रहती है वह, जहाँ उसके पिता बनारस विश्वविद्यालय से जल्दी सेवानिवृत्त होकर आ बसे चौदह वर्ष पहले। पाँच बच्चों में सबसे छोटी है, चार भाइयों की इकलौती बैणा (बहनिया)। संस्कृतज्ञ पिता ने इसका नाम मैत्रेयी रखा था। हाईस्कूल सर्टिफिकेट और जन्म-कुन्डली में वही नाम सुशोभित है-मैत्रेयी शास्त्री। जिस समय पैदा हुई थी पिताश्री एक मलेच्छ कन्या को देवभाषा ही नहीं वेद भी पढ़ा देने का दुस्साहस कर रहे थे, मालवीयजी के ‘नरो-वा-कुंजरों-वा’ आदेश पर, और वह मलेच्छ कन्या इस बच्ची को बेबी कहती थी। यह नाम उनके बड़े बेटे को, जो सेना में भरती होना चाह रहा था, पूरा अंग्रेज था, पसन्द आया था। उसके आग्रह से यही नाम चल भी गया।

बेबी अपना नाम सार्थक करने में यकीन रखती है। खिलन्दड़ है। लडकैंधी है। पेड़ पर चढ़ना हो, गुल्ली-डण्डा खेलना हो, कुश्ती लड़ना हो, कबड्डी खेलनी हो, बेबी हमेशा हाजिर है। उसके बायें हाथ की छोटी अँगुली क्रिकेट खेलने में टूटी है और अब थोड़ी-सी मुड़ी हुई रहती है। बेबी बैडमिण्टन में जिला-स्तर की चैम्पियन है, यह बात अलग है कि इस जिले में बैडमिण्टन स्तरीय नहीं !

बेबी को इधर बार-बार समझाया जा रहा है कि वह अब बच्ची नहीं रह गयी है। उसे सिलाई-कढ़ाई सीखने और चूल्हे-चौके से दिलचस्पी रखने की सलाह दी जा रही है। इस तरह की हर सलाह बेबी पूरी गंभीरता से सुनती और फिर बहुत उत्साह से घरेलू कामों में अपने सर्वथा अकुशल होने का इतना भीषण प्रदर्शन करती है कि इजा (माताजी) माथा पीट लेती हैं, नौकर-चाकर मुस्कुराते हैं और बेबी पहले थोड़ा खीझ लेने के बाद स्वयं जी खोलकर हँसती है। बेबी का घरेलू काम करने का एक और भी तेवर है जो कम हैरान-परेशान करनेवाला नहीं। बेबी कोई काम अपने जिम्मे लेती है और चूँकि उस काम का कोई भी हिस्सा उससे ठीक से नहीं हो पाता है लिहाजा हर कदम पर वह नौकरों की या इजा की सहायता माँगती है। ‘सब्जी छौंकनी हो तो घी कितना डालूँ-इतना ? यह घी गर्म हो गया देख दो। छौंकू किससे- हींग से या जीरे से ? हींग का यह अन्दाजा ठीक है ? हल्दी कितनी ? इतना नमक ठाक है ?’ इजा कहती हैं, ‘‘छी हो, इससे तो तू हमें ही बनाने दिया कर।’’ बेबी कहती है, ‘‘चौबीस घण्टे कहते हैं घर का काम नहीं करती, करने बैठो तो कहते हैं, मत किया करो। हुँह !’’
इधर बेबी से यह भी कहा जा रहा है कि यह अल्मोड़ा है अल्मोड़ा। यहाँ बदनाम कर देते हैं लोग। सलवार-कमीज, फ्राक या हाफ-पैण्ट मत पहना करो। ऊधम मत मचाया करो। लोगों के सामने फीं-फीं मत हँसा कर। साड़ी का पल्लू गिरने मत दिया कर। ‘चौड़-चापड़’ रहा कर, सौम्य-सुशील। बेबी कुमाऊँनी शब्द ‘चौड़-चापड़’ की हिंदी में व्याख्या करके अपने शरीर को फैलाती है और पूछती है-इस तरह ? और फिर फीं-फीं हँस देती है।

बेबी पर अच्छा असर पड़े इस इरादे से शास्त्रीजी ने अपनी एक गरीब सीधी-सादी मेधावी भांजी दया को घर में रख लिया है। वह उसे बी.ए. करा रहे हैं। लेकिन बेबी दया के नहीं, दया बेबी के प्रवाह में हो तो हो।
इधर कभी-कभी बेबी के विवाह की भी चर्चा की जा रही है। पिताजी चारों बेटों का विवाह कर चुके हैं और अब कन्यादान की ही जिम्मेदारी उन पर बची है। बेबी के लिए कुछ योग्य वर प्रस्तावित किये जा चुके हैं, किन्तु उसे शादी का नाम सुनते ही हँसी आती है। हर प्रस्तावित वर का वह ऐसा खाका खींचती है, इतनी नकलें उतारती है कि इजा आँखें भी तरेरती हैं और मुस्कुराती भी हैं। ‘‘हाँ, अब तेरे लिए तो किशन भगवान ढूढ़ँने पड़ेंगे।’’, वह कहती हैं। बेबी टिप्पणी करती है, ‘‘किशन भगवान रिजेक्ट ! काले हैं। और सोल1 सौ पहले से ही रख रखी उन्होंने।’’ 

बेबी को दर्पण के लिए कम ही फुर्सत मिलती है। सजती-सँवरती नहीं। कपड़े ठीक से पहनती नहीं। लेकिन जमाने-भर में उड़ती यह खबर उसके कानों तक पहुँच चुकी है कि बेबी बहुत सुन्दर है। जब वह अल्मोड़ा में स्थानिक रिवाज के वशीभूत सड़क के एक कोने में पर्वत-पार्श्व में लगभग धँसती-सी चलती है, तब स्थानिक छैला लक्षणा का सहारा लेकर उससे बहुत कुछ कहते हैं और पुलियाओं पर बैठे अवकाश-प्राप्त वृद्ध जिज्ञासा करते हैं कि यह किसकी चेली (बेटी) है और प्राप्त सूचना अपने परिवार के किसी सुयोग्य चिरंजीव के सम्दर्भ में नोट कर लेते हैं।

तो ऐसे हैं हमारे नायक-नायिका सन् 1954 में जब यह कहानी शुरू होती है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि वे ऐसे नहीं जिन्हें आज की विज्ञापन शब्दावली में ‘मेड फॉर ईच अदर’ कहा जा सके,  किन्तु आवश्यक नहीं कि परस्पर पात्रता के इस आभाव से हम निराश हो उठें। प्रेम किन्हीं सयानों द्वारा बहुत समझदारी से ठहरायी जानेवाली चीज नहीं। वह तो विवाह है जो इस तरह ठहराया जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान मौन ही रहा है प्रेम के विषय में, किन्तु कभी कुछ उससे कहलवा लिया गया है तो वह भी इस लोक-विश्वास से सहमत होता प्रतीत हुआ है कि ‘असम्भव’ के आयामों में ही होता है प्रेम-रूपी व्यायाम। जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं वे लौकिक अर्थ में एक-दूजे के लिए बने हुए होते नहीं। यदि आप प्रेम को काल-सापेक्ष मानते तो मैं सन् 1954 का उल्लेख करने के लिए क्षमा-याचना करना चाहूँगा। यदि कहीं आप उसे काल-सापेक्ष मानते हैं तो मुझे इतना और जोड़ने की अनुमति दें कि यह वह वर्ष था जब स्वाधीन, प्रभुता-सम्पन्न भारत ने अपने विकास का प्रथम पंचवर्षीय आयोजन आरम्भ किया था। जो काम राष्ट्र कर रहा था वही तब राष्ट्र के विकास-सजग नागरिक भी व्यक्तिगत स्तर पर करते रहे हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
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1.सोलह।

जिन कक्का की सुधा नाम्नी आयुष्मती सौभाग्यकांक्षिणी का विवाह हो रहा है भिसूँण रानी की कोठी में उनसे डी.डी. का रिश्ता स्थानिक शब्दावली में ‘लगड़ता पगड़ता’ है अर्थात् खींच-तान कर जोड़ा जा सकता है। किन्तु एक रिश्ता स्नेह का भी तो होता है ना। यह परिवार भी डी.डी. से बहुत सहानुभूति करता है। सहानुभूति के अतिरिक्त उसे इस अनाथ को कुछ देना नहीं पड़ा है कभी क्योंकि रिश्तेदारी ऐसी नही थीं कि इस संबंधी से उस संबंधी के घर फुटबाल की तरह लतियाकर पहुँचाये जाते बालक को उन्हें कभी अपने घर में शरण देने के लिए बाध्य होना पड़ता। अतएव बालक को लतियोनेवालों को लानत भेजने को और उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त करने का सुख इस परिवार ने निर्बाध लूटा है। ‘मानने-बरतने’ के अन्तर्गत इस परिवार की लड़कियाँ – बबली’ दी सुधा और गुड़िया- तीज – त्यौहार पर प्रत्यक्ष अथवा डाक से उसका स्मरण करती आयी हैं। इस परिवार ने यदा-कदा एक अनाथ बालक को कोई उपहार देकर भी धन्य किया है।

कक्का का छोटा लड़का है बब्बन, हाकी खेलने और चलानेवाला छैला, जिसे गाने-बजाने और अभिनय करने का शौक है और जिसकी कृपा से डी.डी. मौजमस्ती की आकर्षक किन्तु आतंकप्रद दुनिया का दर्शन कर सका कभी-कभी अपने छात्र- जीवन में। बब्बन ने ही उसे आग्रहपूर्वक आमन्त्रित किया है इस विवाह पर, और सोद्देश्य। बब्बन फिल्मों में नायक-गायक बनने के सपने देखता था। एक तरह से बब्बन की ‘बंबई जाहुँजु’ ही डी.डी. को साहित्य से सिनेमा में ले गयी है। बब्बन को मलाल है कि वह लड़कियों – जैसा डी.डी. तो बंबई भाग गया और मैं नैनीताल का दादा और हीरो पारिवारिक आर्थिक संकट के कारण यहाँ क्लर्की में अपनी ऐसी-तैसी करा रहा हूँ। जंग लगा रही है यह क्लर्की मेरी धींगामस्ती पर।

तो रात जब डी.डी. भिसूँण रानी की कोठी में पहुँचा, बब्बन उस पर एकाधिकार बनाये रहा। डी.डी. को यह अवसर नहीं मिला कि वह उस कमरे में जा सके जिसमें लड़कियाँ ढोलक-मजीरा-तबला-हारमोनियम लेकर धमाचौकड़ी मचा रही थीं। ‘शकूना दे, काजे ए’ शकुनाखर और ‘साँझ पड़ी संझा देवी पाया चढ़ी एनो’ सँझवाती गाने के बाद अब सिनेमा के गीत चल रहे थे। कोई लड़की ‘सुनो गजल क्या गाये, समय गुजरता जाये’ पर शायद धृष्ट-सा कैबरे कर रही थी क्योंकि गाती हुई लड़कियों के हँसने की आवाज आ रही थी। वे चिल्ला रहीं थीं- ‘बेबी, बेसरम !’ अच्छा होता कि डी.डी. तब उस कमरे में चला जाता। नायक-नायिका का प्रथम साक्षात् सामान्य और सुखद परिस्थितियों में हो सकता था तब। किंतु डी.डी. तब बब्बन के इस प्रश्न से उलझा था: ‘अबे डी.डीयन वाँ, बंबई में बब्बन के लिए चानस भिड़ा रिया है कि नहीं ?’
डी.डी. और बब्बन में अक्सर तराईवालों की हिन्दी में नोक-झोक और बातचीत चलती है।

डी.डी. इसी भाषा में बब्बन को यह समझाता रहा कि ‘अभी तो खुद मैं पाव-उस्सल खा के इमली के पत्ते पर दण्ड पेल रिया हूँ लल्लू।’ तराईवाली बोली में भी उसे बंबई में अपनी नगण्यता का वर्णन उदास करनेवाला मालूम हुआ।
रात देर तक बब्बन और डी.डी. बतियाते रहे कोनेवाले कमरे में। वे सोये तभी जब कर्नल भुवनचन्द्र शास्त्री, जो नायिका के ठुल’ दा यानी सबसे बड़े भाई हैं, उन्हें फटकार सुनाने और ‘अर्ली टू बेड’ की फौजी सलाह देने आये।
डी.डी. सुबह देर से उठा। बँगले के सभी ‘बाथरूम’ उसने घिरे पाये। पिछवारे चाचाजी ने ऐसे ही अवसर के लिए टाट और बाँस से एक अस्थायी टट्टी बनवा दी थी। डी.डी. ने वहीं शरण ली।

अब नायक-नायिका के प्रथम-साक्षात्कार का वर्णन करना है मुझे और किंचित संकोच में पड़ गया हूँ मैं। भदेस से सुधी समीक्षकों को बहुत विरक्ति है। मुझे भी है थोड़ी-बहुत। यद्यपि मैं ऐसा भी देखता हूँ कि भदेस से परहेज हमें भीरू बनाता है और अन्ततः हम जीवन के सार्वाधिक भदेस तथ्य मृत्यु से आँखें चुराना चाहते हैं। जो हो, यहाँ सत्य का आग्रह दुर्निवार है। यदि प्रथम साक्षात् की बोली में कथानायक अस्थायी टट्टी में बैठा है तो मैं किसी भी साहित्यिक चमत्कार से उसे ताल पर तैरती किसी नाव में बैठा नही सकता। अस्तु।
दायें से, जहाँ बँगले से अलग बनी हुई किन्तु ढके हुए गलियारे से जुड़ी हुई रसोई है, नायक को चाय के लिए अपनी बुलाइट सुनायी दे रही है। बब्बन चीखकर कह रहा है, ‘‘अबे ओय डी.डी.टी. के ! क्या कर रिया है वाँ बिलायत में मल्का बिट्टोरिया के धोरे ?’’

नायक को अपनी हाजिरजवाबी पर नाज है। वह शौच करके उठता है यह जवाब देते हुए कि ‘तेरी तरियों के मच्छड़ मार रिया हूँ।’ बहुत विलम्ब से वह यह खोज करता है कि टट्टी बनवानेवाले के लिए यह कल्पना असंभव थी कि इसे छह फुट या उससे ज्यादा कदवाला कोई इस्तेमाल करेगा। तो नायक अब कुर्त्ता ठोड़ी के नीचे दबाये, इजारबन्द के छोर सम्हाले उठंग है, रसोई के बाहर रिश्तेदारों का मजमा है और बब्बन चिल्ला रहा है, ‘ओय उजबक, सुबु-सुबु दरसन क्यों करा रिया है ?’ और हाँ, कोई हँस रही है, सोच-सोचकर, क्रमशः बढ़ते हुए आवेग से। यह हँसी रसोई और बँगले को जोड़नेवाले गलियारे से फूट रही है। टट्टी के ऐन पास से। तो नायक, जो इजारबन्द बाँध चुका है, दृष्टि घुमाता है और नायिका से उसकी दृष्टि पहली बार मिलती है।

उसका मुँह खुला रह जाता है। जीन सिम्संन-नुमा एक अपरिचित लड़की। गोरी चिट्टी। गालों में ललाई। नाक थोड़ी-सी घूमी हुई। बाल सुनहरे। आँखें बड़ी-बड़ी और चपल। लड़की के हाथ में ट्रे है। ट्रे में चाय का कुल जमा एक गिलास, जो शायद डी.डी. के लिए है। गिलास हिल रहा है इस हास्यकम्प में। कोई फौजी इस जीन सिम्संन को झिड़क रहा है और नायक धप-से फिर बैठ गया है। और जब बैठ ही गया है तब बाकायदा इजारबन्द खोलकर ही क्यों न बैठे ? वह इजारबन्द का एक सिरा खींचता है, लेकिन अफसोस यह गलत सिरा है। गाँठ खुलने की वजाय दोहरी हो जाती है। इस तरह गाँठ पर लगी गाँठ के लिए हिन्दी में कोई शब्द नहीं। कुमाऊँनी में है- मालगाँठ किंवा मारगाँठ। नायक सुपरिचित है इस शब्द से क्योंकि फीता हो या नाड़ा, खोलते हुए उससे अक्सर मारगाँठ पड़ती आयी है। इस मामले में उसका बचपन, जवानी में भी बरकरारा है। बस इतना ही कि अब बुआ को आवाज नहीं दे सकता कि मारगाँठ पड़ गयी, खोल दो। गाँठ नहीं खुलती तो जूता या पायजामा खींच-तानकर उतारता है।

नायक कुछ इस भाव से टट्टी में बैठा हुआ है मानो अपनी जीन सिम्संन का गलत परिस्थितियों में दर्शन करने के अभियोग में उसे यहीं आजीवन कारावास काटना होगा। वह इस सारे प्रसंग में जितना लज्जित है उतना ही उत्तेजित इस खोज से है कि जीन सिम्संन ने खास उसके लिए अपना एक कुमाऊँनी संस्करण प्रस्तुत किया है।
अब बाहर चाय पीकर क्यू में लगे लोगों की चिल्लाहट प्रबल हो गयी है। नायक सिर झुकाये बाहर आ गया है। हाथ धोकर वह चाय लेने रसोई-घर नहीं जा रहा है। पिछवारे-पिछवारे वह बँगले का चक्कक काटकर दूसरी ओर कोई शरण-स्थली ढूँढ़ने निकला है। इस यात्रा में उसे सिसूँण (बिच्छूघास) चुभ रही हैं।
वह एक ऐसे स्थान पर जा पहुँचा है जहाँ से नीचे मुफसिल हो चुके टेनिस कोर्ट की ओर सीढ़ियाँ उतरी हैं। इसी मैदान में बब्बन शामियाना लगाये जाने की देख-रेख कर रहा है। कुछ बच्चे रिसेप्शन के लिए आयी कुर्सियों-सोफों पर कूद रहे हैं।


साभार-http://vedantijeevan.com/bs/home.php?bookid=3124

पंकज सिंह महर

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प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

क्याप मायने कुछ अजीब अनगढ़ अनदेखा सा और अप्रत्याशित। जोशी-जी के विलक्षण गद्य में कही गई ‘फसक’ (गप) उस अनदेखे को अप्रत्याशित ढंग से दिखाती है, जिसे देखते रहने के आदी बन गए हम जिसका मतलब पूछना और बूझना भूल चले हैं...

अपने समाज की आधी अधूरी आधुनिकता और बौद्धिकों की अधकचरी उत्तर-आधुनिकता से जानलेवा ढंग से टकराती प्रेम कथा की यह क्याप बदलाव में सपनों की दारुण परिणति को कुछ ऐसे ढंग से पाठक तक पहुँचाती है कि पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते रहने वाला पाठक एकाएक खुद से पूछ बैठे कि अरे ये पलकें क्यों भीग गईं।

यथार्थ चित्रण के नाम पर सपाटे से सपाटबयानी और फार्मूलेबाजी करने वाले उपन्यासों-कहानियों से भरे इस वक्त में कुछ लोगों को शायद लगे कि मैं और उत्तरा के प्रेम की यह कहानी और कुछ नहीं बस ‘ख़लल है दिमाग़ का’, लेकिन प्रवचन या रिपोर्ट की बजाय सर्जनात्मक स्वर सुनने को उत्सुक पाठक इस अद्भुत ‘फसक’ में अपने समय की डरावनी सचाइयों को ऐन अपने प्रेमानुभाव में एकतान होते सुन सकता है। बेहद आत्मीय और प्रमाणिक ढंग से। गहरे आत्ममंथन, सघन समग्रता बोध और अपूर्व बतरस से भरपूर क्याप पर हिन्दी समाज निश्चय ही गर्व कर सकता है।

क्यापअफ़सोस कि यह कहानी पहले लिखी जा चुकी है। यह अफ़सोस उस सैद्धान्तिक स्तर पर ज़ाहिर किया गया न समझा जाय कि हर कहानी ही एक तरह से पहले लिखी जा चुकी होती है क्योंकि कहानी में जो तीन तत्व होते हैं-घटनाएँ, पात्रों के चरित्र एवं उनकी भूमिकाएँ और देशकाल-उनमें से पहले दो के अन्तर्गत कुछ मौलिक कर दिखाने की सम्भावना शायद गुणाढ्य के बृहत्कथा लिख डालने के साथ ही चुक गयी थी। और देश-काल का भी ऐसा है कि लेखक की कल्पना उसकी तमाम सीमाओं को लाँघने में सक्षम है।

 प्रस्तुत कथा के एक पात्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेधातिथि जोशी के पिता और हमारे गाँव के विद्वान केदारदत्तज्यू अक्सर कहा करते थे-‘बताओ तो तुम्हारी मॉर्डन साइंस में ऐसा क्या है जो महाभारत युग में हमारे यहाँ नहीं था ?’ मेरा मॉर्डन साइंटिफ़िक माइण्ड भले ही यह मानने को तैयार न हुआ हो कि महाभारत युग में तो हम सब कुछ जानते थे पर बाद में भूल गये, लेकिन महर्षि व्यास की देशकालजित कल्पना की दाद देने को अवश्य मजबूर हुआ था। ख़ैर ! तो मैं कह रहा था कि मेरा अफ़सोस उस सौद्धांतिक स्तर पर नहीं, सर्वथा स्थूल पर है। यह कहानी सचमुच लिखी जा चुकी है। छह माह पूर्व यह हमारे मीडिया की सुर्ख़ियों में छाई रही और अब कूर्मांचली ने, जो एक ज़माने में मेरा शिष्य रह चुका है, ‘हंस’ के ताजा अंक में उसे रचनात्मक साहित्य का अंग बनाते हुए छपवा डाला है।

समाचारों का वाचन या श्रवण किये बग़ैर अपने को प्रातः कालीन निवृत्ति में असमर्थ पाने वाले समस्त महानुभाव समझ ही गये होंगे कि मेरा इशारा तथाकथित ‘रहस्यमय ढिणमिणाण भैरव काण्ड’ की स्टोरी की ओर है। अगर आप उन चन्द लोगों में से हैं, जिन्होंने मास-मीडिया की ओर से सिद्धान्ततः मुँह मोड़ लिया है। या अगर आप उन अनेक लोगों में से हैं, जिनके लिए मास-मीडिया की परोसी हुई हर महत्त्वपूर्ण ‘स्टोरी’ इस अर्थ में बेवफ़ा साबित होती है कि दिमाग़ से सफ़ा हो जाती है, तो शायद आपके हित में इस काण्ड का तथाकथित रहस्य संक्षेप में दोहरा देना अनुचित न होगा।

ज़िले बना कर बोट जीतने की राजनीति के अन्तर्गत बनाये गये नये मध्य हिमालयवर्ती ज़िले वाल्मीकि नगर में, जो कभी कस्तूरीकोट कहलाता था और अगर राजनेताओं ने चाहा तो आगे चलकर उत्तरा कहलाने लगेगा, फस्कियाधार नामक चोटी के रास्ते में स्थित ढिणमिणाण यानी लुढ़कते भैरव के मन्दिर के पास एक-दूसरे की जान के प्यासे पुलिस डी.आई.जी. के मेधातिथि जोशी और माफ़िया सरगना हरध्यानु बाटलागी की लाशे पड़ी मिलीं। दोनों के ही सीने में उल्टियों के अवशेष थे। पहला रहस्य यह कि वे दोनों वहाँ क्या कर रहे थे ?

यह सही है कि मन्दिर से कुछ ही ऊपर उन दोनों का पुश्तैनी गाँव फस्कियाधार है लेकिन यह घटना 1999 के नवम्बर में घटी और इस इलाक़े के ज़्यादातर भेड़-बकरीपालक अक्टूबर में ही नीचे वादियों की ओर निकल जाते हैं। दूसरा रहस्य यह है कि वे मरे कैसे ? जब उनकी लाशें काफ़ी बिगड़ी हालत में ज़िला मुख्यालय के सरकारी अस्पताल में पहुँचीं, वहाँ का नौसिखिया डॉक्टर चीर-फाड़ के बावजूद ऐसा कुछ भी पता नहीं कर सका जिससे अस्वाभाविक मृत्यु के संकेत मिलते हों। उल्टियों के अवशेष और आँतों में पड़े भोजन के विश्लेषण से भी किसी विष की उपस्थिति के संकेत नहीं मिले। कोई शराब को ही विष कहता हो तो अलग बात है।

और सबसे बड़ा रहस्य यह कि ये दो जानी दुश्मन, जो एक अरसे से एक-दूसरे को मारने की कोशिश में लगे हुए थे, इकट्ठा कैसे मर गये ? अगर सिर्फ़ पुलिसिये की लाश मिली होती तो समझ लिया जाता कि माफ़िया सरगना की करतूत है। अगर सिर्फ़ सरगना की लाश मिलती तो कहा जाता कि पुलिसिये की करतूत है। वे दोनों निर्मम हत्यारे थे इसलिए यह भी कल्पनातीत है कि उनमें से एक ने पहले दूसरे की हत्या की और फिर पश्चाताप में आत्महत्या कर डाली। या यह कि दोनों ने ही सैकड़ों बेकसूरों की जानें अपने आपसी झगड़े में ले डालने के पाप का प्रायश्चित करने के लिए आत्महत्या कर ली।

या यह कि दोनों ही एक-दूसरे को मारने की तैयारी करके गये और उन्होंने एक-दूसरे की शराब में ज़हर मिला दिया यानी एक-दूसरे को मारने की कोशिश में दोनों ही मारे गये ! और अगर यह दोहरी हत्या का मामला था तो मारने वाला वह तीसरा था कौन ? और उसने चोर और सिपाही दोनों को ही क्यों मारा और कैसे मारा ? और सवा लाख टके का एक सवाल किया अगर उन्हें किसी ने नहीं मारा तो वे दोनों कुदरती तौर पर एक साथ और एक जगह कैसे मर गये ? यह सही है कि तथाकथित रचियता परमपिता परमेश्वर की कलम से निकलीं कहानियाँ अक्सर संयोग-प्रधान होती हैं तथापि इतने ज्यादा संयोग से तो वह घटिया लेखक भी परहेज करता ही होगा।

इसी के चलते मास-मीडिया में ‘रहस्यमय तीसरे’ की चर्चा होती रही जिसने किसी रहस्यमय विधि से यह दोहरा हत्याकाण्ड किया। दो एक समझदार और वैज्ञानिक दृष्टिवाले लोग कहते रहे कि कुछ ऐसे भी विष होते हैं। जिनके प्रभाव से हुई मृत्यु स्वाभाविक लगती है और जिनकी उपस्थिति का पता लगाना बहुत कठिन होता है, इसलिए रहस्यमय विधि या विधाता की बातें न की जायें लेकिन मीडिया, में कहीं घुमा-फिराकर और कहीं साफ़-साफ़ यह कहा गया कि वह ‘रहस्यमय तीसरा’ स्वयं विधाता था।

‘परवरदिगार के आलम में तमाम ऐसी चीज़ें है, जो इन्सान की समझ से परे हैं’-नुमा ये बातें जब तक ‘मासेज़’ को सैक्स-सनसनी-रहस्य रोमांस का नशेड़ी बनाने वाला पूँजीवादी मास-मीडिया परोस रहा था तब तक मैं चुप रहा लेकिन अब अपने को ‘मासवादी’ नहीं, मार्क्सवादी’ कहने वाला कूर्मांचली अपनी उत्तरआधुनिकता के अन्तर्गत वही राग अलाप रहा है, तब मुझे भी कुछ कहने को बाध्य होना पड़ रहा है। ख़ासकर इसलिए कि कूर्मांचली की यह कहानी उन दोनों मृतकों का ही नहीं, मुझ जीवित का भी अपमान करती है। सो ऐसे कि यह कहानी उसने एक तरह से मुझसे सुनी हुई बातों के आधार पर लिखी है।

कोई दो-ढाई महीने पहले वह मेरे प्रिय पेय ‘घोड़ी’ यानी सस्ती फ़ौजी रम की बोतल को लेकर मेरी सेवा में हाज़िर हुआ था और यद्यपि मैं सिद्धान्ततः उन लोगों की सोहबत नहीं करना चाहता जो आधुनिक से उत्तरआधुनिक हो गये हैं, तथापि मैंने उसे इस एहसान को याद करते हुए पास बैठा लिया कि मुझे पागलख़ाने से मुक्ति दिलाने के अभियान में वही सबसे आगे रहा था। अपने हर पैग पर मुझे दो पिलाते हुए कूर्मांचली ने ढिणमिणाण भैरवकाण्ड और उससे जुड़े हुए दोनों पात्रों के बारे में मुझसे बातचीत की। कुछ इस अन्दाज़ से मानो उसने बातचीत का यह विषय महज़ वक्त काटने के इरादे से चुना हो और सो भी इसलिए कि यह घटना मेरे पुश्तैनी गाँव के पास घटी थी और उससे जुड़े हुए दोनों पात्र मेरी ही शागिर्दी में जीवन में आगे बढ़े थे। उसने साफ़-साफ़ यह नहीं कहा कि इस काण्ड पर मैं कहानी लिखना चाहता हूँ, कृपया लिखवा दीजिए। कहता तो मैं लिखवा देता। इस ख़तरे को मोल लेते हुए लिखा देता कि वह मुझे सचमुच पागल समझ बैठेगा।

मैं ठोस यथार्थवादी हूँ लिहाज़ा हर क़िस्म के रहस्यवाद से मुझे सख़्त कोफ़्त होती रही है। इसलिए मेरी लिखवाई हुई कहानी में कोई ‘रहस्यमय तीसरा’ न होता। ‘जादुई यथार्थवाद’ की पैरवी करने वाले कूर्मांचली को मैं याद दिला देता कि यथार्थ घिनौना है, इसीलिए तो कभी मेरी तरह उसने भी यथार्थ को जादुई बनाने के लिए क्रान्ति कराने की क़सम खायी थी।

शीर्षक से लेकर अन्तिम वाक्य तक कूर्मांचली की इस कहानी की हर बात मेरा क्रोध उत्तरोत्तर बढ़ाती रही। तबीअत हुई कि एक और ‘रहस्यमय काण्ड’ कर डालूँ जिसके बादे दो लाशें मिलें-एक उसकी, एक मेरी। कहानी के शीर्षक को ही लें-‘मौत की जुगलबन्दी’। इससे दो बातें प्रमाणित होती हैं-पहली यह कि भले ही कूर्मांचली हिन्दी का लब्धप्रतिष्ठ लेखक हो उसे हिन्दी नहीं आती, इसीलिए ‘घातक जुगलबन्दी’ को ‘मौत की जुगलबन्दी’ बना डाला है उसने। दूसरी यह कि अपनी कॉन्वेंटिया बिरादरी के अन्य लेखकों की तरह वह भी लिखता भले ही हिन्दी में हो, पर सोचता अंग्रेज़ी  में है। निश्चय ही उसके मन में कहानी के लिए शीर्षक उभरा होगा-‘अ डैलली डुएट’। अगर कविमना कूर्मांचली को वह अंग्रेज़ी शीर्षक लुभा रहा था तो मुझसे सलाह करता, मैं उसी टक्कर का यह हिन्दी शीर्षक सुझा देता-‘सम पर यम’।

अगर कहानी के शीर्षक से मुझे खीज हुई तो उसकी शैली से मैं तिलमिला उठा। अरे आप मुझे दारू पिलाकर जो कुछ सुन ले गये हैं उसे सीधे-सीधे ढंग से और साफ़-साफ़ शब्दों में लिखिए न। मगर नहीं। कूर्मांचली तो उत्तराधुनिक है ! तो उसके यहाँ होता क्या है कि कथा के दो मुख्य पात्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेधातिथि जोशी और क्षेत्रीय वन, खनन तखा भू माफ़िया के सरगना हरध्यानु बाटलागी ढिणमिणाण भैरव मंदिर के प्रांगण में आमने-सामने चुपचाप बैठे दारू की घूँट भरते रहते हैं और मन ही मन एक-दूसरे से बातें करते रहते हैं।

रोब में आइए कि यहाँ सारा संवाद आन्तरिक एकालाप के माध्यम से कराया गया है। रोब में आइए कि किस कुशलता से इन आन्तरिक एकालापों को परस्पर गूँथ कर संगीत में होने वाली जुगलबन्दी का आभास दिया गया है-एकालापों की अवधि कभी बहुत छोटी, कभी बहुत बड़ी, और कभी बीच-की-सी करते रहकर। रोब में आइए कि इसमें इस जुगलबन्दी के चलते दोनों मुख्य पात्रों की दोस्ती-दुश्मनी की कहानी उनके अपने-अपने नज़रिये से पेश कर दी गयी है। सिनेमाई भाषा में यह कि उन दोनों के सत्यों को ‘परस्पर इन्टरकट’ कर दिया गया है कि साहब सच सच से टकरा रहा है और सच यह है कि टक्कर में सच कहीं नज़र नहीं आ रहा है ! जबकि सच यह है कि लेखक ख़ुद सच का सामना करने से कतरा रहा है और पाठक को भी कायरता की यह सुविधाजनक राह अपनाने के लिए उकसा रहा है।

लुत्फ़ की बात यह है कि कूर्मांचली कहीं भी यह बताने की कोशिश नहीं करता कि उसके कथापात्र दारू की घूँट भरते-भरते मर कैसे गये ? अपने-अपने एकालाप में एक-दूसरे की मृत्यु अपने-अपने कारणों से चाहते हैं और कूर्मांचली ऐसा जताता है मानो उनके ऐसा चाहने-भर से दोहरी मौत की यह घटना घटी।

उत्तरआधुनिक कूर्मांचली यह कहते हुए तो नहीं शरमाता कि सच राम जाने क्या था लेकिन यह कहने में वह संकोच कर जाता है कि यह घटना राम जी की रहस्यमय लीला का ही एक नमूना थी, बावजूद इसके कि वह इधर राम का नाम जपने वाली पार्टी का भी कृपांकाक्षी बन चला है। अभी पिछले ही महीने उसने राम का नाम जपने वाले एक मन्त्री की पत्नी के काव्य-संग्रह का प्रधानमन्त्री द्वारा विमोचन किये जाने के समारोह की अध्यक्षता की थी। बहरहाल इस दोहरी मौत का कोई युक्तियुक्त कारण न बताकर वह अपने पाठक को यही मानने के लिए मजबूर करता है कि इन दो गुनाहगारों को परमपिता परमेश्वर ही आकर मौत के घाट उतार गये।

कूर्मांचली की कहानी की अन्तिम पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-‘दारू ख़त्म हो चुकी थी। उनकी अपनी-अपनी कहानियाँ भी विलीन हो चुकी थीं उस अथाह और स्याह सागर में, जिसमें पहुँचकर हर किसी की कथा समाप्त हो जाती है और जिज्ञासु की जिज्ञासा ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। अपराधी जीवन की उपल्बधियाँ और निशानी के रूप में केवल उनके वमन के अवशेष ही रह गये थे जिनमें उनका अपराधबोध ढूँढे नहीं मिल सका।’ इस तरह के शब्दजाल पर ख़ुद ही निहाल होते लेखकों को मैं लानत भेजता हूँ। क्या कूर्मांचली को इतना भी नहीं पता है कि जब तक दुनिया में हम इन्सान मौजूद हैं, अच्छी या बुरी कैसी भी लीला के लिए किसी काल्पनिक भगवान को ज़िम्मेदार ठहराना सरासर बैईमानी है ? मैं ‘हंस’ के प्रगतिशील समपादक पर भी हैरान हूँ। जिस दौर में साहित्यिक मोर्चा मेरे हाथ में था, कोई प्रगतिशील साहित्यकार इस तरह की कहानी न लिख सकता था, न छाप सकता था।

कूर्मांचली की लिखी कथा भ्रामक है और उसमें सुधार अपेक्षित है। वैसे सुधार किसमें अपेक्षित नहीं है आज ? हमारे उपवन में यहाँ से वहाँ तक भूल के ही फूल खिले हैं। अफ़सोस कि भले ही एक ज़माने में मैंने कूर्मांचली-जैसे अनेक लेखकों का मार्गदर्शन किया था, मैं स्वयं लेखक नहीं हूँ। मैं तो बस इस काण्ड की भौगोलिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करके कूर्मांचली के लिए भूल-सुधार का मार्ग प्रशस्त कर सकता हूँ और करूँगा भी, क्योंकि वह मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी हो जाती है। बात भूगोल से शुरू करूँगा। हमारे प्रान्त की उत्तरी सीमा से थोड़ा इधर को एक अत्यन्त दुर्गम क्षेत्र स्थित है, जो कभी रियासत कस्तूरीकोट के नाम से जाना जाता था और आज ज़िला वाल्मीकि नगर के नाम से पुकारा जाता है। कस्तूरीकोट इसलिए पुकारा जाता था कि यहाँ कभी कस्तूरी मृगों की भरमार थी। वाल्मीकि नगर इसलिए कहलाता है कि यहाँ ऐसे लोगों की भी भरमार है जिन्हें बाहर से आये विजेताओं ने डूम यानी अछूत माना। उनसे थोड़े बेहतर दर्जे के लोगों को उन्होंने खसिया का दर्ज़ा दिया।

डूम, जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा थी, भोजन-पानी तो दूर सवर्ण की छाया भी नहीं छू सकते थे। अगर किसी काम से डूम को बुलाया जाता था तो घर के बाहर जिस भी जगह वह बैठता था उस जगह को सोने का स्पर्श पाये पानी से धोना और फिर गोबर से लीपना ज़रूरी होता था। फिर उस जगह पर और घर वालों पर गोमूत्र छिड़कना आवश्यक समझा जाता था। अगर कोई कमज़ोर नजर वाला सवर्ण दूर से आते डूम को अपना कोई बिरादर समझ कर नमस्कार कर देता था तो यह डूम के लिए भयंकर अपशकुन वाली बात मानी जाती थी और भयभीत डूम फ़ौरन अपने फटेहाल कपड़ों का एक हिस्सा फाड़कर आग में जला कर श्राप-मुक्ति पाता था। खसिया, जो कभी इस इलाक़ें के स्वामी रहे होंगे, सवर्णों का पानी छू सकते थे, खाना नहीं। खसियाओं के लिए हम डूम अछूत थे। जहाँ तक बाहर से आये विजेताओं का सवाल है, उनके लिए यहाँ के ब्राह्मण भी एक तरह से अछूत ही हैं और वे उनसे सम्बन्ध नहीं करते।

 सच तो यह है कि वे हमें अन्य इलाकों में प्रचलित संज्ञाओं-बामण, खसिया और डूम-से सम्बोधित न करके हामण, हसिया और डूम-हूम कहना पसन्द करते।
सच तो यह है कि वे हमें अन्य इलाकों में प्रचलित संज्ञाओं-बामण, खसिया और डूम-से सम्बोधित न करके हामण, हसिया और हूम कहना पसन्द करते थे। इसका औचित्त यह था कि उनकी बोली में ‘बामण-वामण’ या डूम-वूम’ न कहकर ‘बामण-हामण’ और डूम-हूम’ कहने का रिवाज था। विचित्र किन्तु सत्य कि विजेताओं के दिये हुए इस हिकारत-भरे ‘हकार’ से मुक्ति पाने के लिए हम लोगों को बाक़ायदा राजदरबार में गुहार लगानी पड़ी थी। तब जाकर हम बामण, खसिया और डूम समझे जा सके सरकारी तौर पर। व्यवहार में बाहर वाले हमें हामण, हसिया और हूम ही पुकारते रहे।

तो कस्तूरीकोट का नाम वाल्मीकि नगर कर देने का औचित्य यह है कि यह अनुसूचितों का इलाक़ा है। किसी ज़िले को नगर कहने का क्या औचित्य है, यह बताने में असमर्थ हूँ, कभी रियासत की राजधानी और अब नये ज़िले के मुख्यालय कस्तूरीकोट के, जिसे अब वाल्मीकि नगर पुकारा जाता है, एक उजड़े उद्यान में लगी महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति से आप आकर कभी इस रहस्य का उद्धाटन करवा लें। चेतावनी देना आवश्यक समझता हूँ कि कस्तूरीकोट दुर्गम था और वाल्मीकि नगर भी दुर्गम है। चीनी आक्रमण के बाद इस इलाक़े में कुछ मोटर-मार्ग बना ज़रूर दिये गये हैं मगर वे कुल मिलाकर मुसाफ़िरों से ज़्यादा ठेकेदारों पर मेहरबान हैं। चट्टानें खिसकाने से टूटती ही रहती हैं सदा। स्थानिक कन्याओं की परम्परागत पोशाक झगुली के, जिसे आप देहाती नाइटी कह सकते हैं, तंग फेरों-जैसे लपेटे खाती यह सड़क भयानक खड्डु का दर्शन कराती इतनी तेज़ी से चढ़ती है मानो आपको स्वर्ग पहुँचाने की जल्दी में हो।

इस दुर्गम ज़िले का दुर्गमतम क्षेत्र है फस्किया़धार, जहाँ यह काण्ड हुआ। इस काण्ड को ढिणमिणाण रहस्य काण्ड पुकारने वाले मीडिया को पता ही नहीं है कि ढिणमिणाण भैरव मेरे जन्म स्थान फस्कियाधार की देवी का द्वारपाल है। दोनों मृत व्यक्ति फस्कियाधार ही के थे। यह मान सकना मुश्किल है कि वह तथाकथित रहस्यमय तीसरा भी कहीं और का रहा हो। जिन्हें उस तीसरे को भगवान मानने की ही ज़िद हो वे भी इस इलाके को देखने के बाद यही कहेंगे कि लुढ़कते भैरव के मन्दिर में चोर और सिपाही दोनों को मारने वाला या तो भैरव ही रहा होगा यह फिर उसकी मालकिन देवी रही होगी या फिर दोनों ने मिलकर यह दोहरा हत्याकाण्ड किया होगा।

फस्कियाधार तो इतना दुर्गम है और नवम्बर में वहाँ इतनी ठण्ठ पड़ती है कि कोई बाहर का भगवान भी वहाँ नहीं आना चाहता। ज़िला मुख्यालय से फस्कियाधार की ओर एक और भी ज़्यादा ख़तरनाक मोटर मार्ग ह्यपानी-यानी बर्फीले घाट तक ज़रुर बना दिया गया है लेकिन इस मोटर मार्ग से आते हुए आप डर के मारे पसीना-पसीना हो जायेंगे और अगर उसके बाद ह्यूपानी घाट के पानी से अपने अंग भी पोंछेंगे तो मारे ठण्ड के वहीं परचेत पड़ जायेंगे यानी बेहोश हो जायेंगे।
होने को ह्यूपानी घाट से फस्कियाधार की लगभग 11 हज़ार की ऊँची चोटी के नाक के नीचे बहती ढुंग्याली गाड़ तक भी जंगलात वालों ने एक कामचलाऊ मार्ग बना दिया है लेकिन उनमें कोई सवारी गाड़ी नहीं चलती। और अगर चलती भी होती तो मैं आपको यही सलाह देता कि उसमें चढ़ने की बजाय आप आत्महत्या का कोई बेहतर तरीक़ा खोज लीजिए।

मारे डर के मरना भी क्या मरना ! ढुंग्याली गाड़ से फस्कियाधार तक एक तीख़ी चढ़ाई और इस चढ़ाई के लगभग बीचों-बीच स्थित है ढिणमिणाण भैरव का छोटा-सा मन्दिर, जिसके चारों ओर थके यात्रियों के विश्राम करने के लिए काफ़ी जगह समतल बना दी गयी है। फस्कियाधार और उसके आस-पास का इलाक़ा पथरीला और बर्फ़ीला है। यहाँ की छोटी-सी वेगवती नदी ढुंग्याली गाड़ में पानी से ज़्यादा बड़े-बड़े पत्थर हैं, इसीलिए उसे ढुंग्याली गाड़ यानी पथरीली नदी कहा गया है। नवम्बर ख़त्म होते-होते यह सारा इलाक़ा बर्फ़ से ढक जाता है और यहाँ के पानी के तमाम स्रोत भी जम जाते हैं।

चोटी के ऊपर पत्थरों से बना हुआ एक मन्दिर है, जिसमें, ज़मीन से बाहर की ओर थोड़ी-सी उभरी एक चट्टान ही देवी के रूप में प्रतिष्ठित है। इस छोटे-से मन्दिर के पास ही एक बड़ा-सा गाँव है। गाँव के लोगों को मुख्य पेशा भेड़-बकरी पालना और ऊन कातना है। इलाक़ा खेती के योग्य नहीं है लेकिन गर्मियों में बर्फ़ पिघल जाने के बाद यहाँ मवेशियों के लिए अच्छी घास उग आती है। जाड़ा शुरू होते ही घास और आजीविका की तलाश में यहाँ के लोग  निचले इलाकों की ओर निकल जाते हैं। ढुंग्याली गाड़ की तरफ़ पड़ने वाला पर्वत का हिस्सा निचले इलाक़ों की ओर निकल जाते हैं। ढुंग्याली गाड़ की तरफ पड़ने वाला पर्वत का हिस्सा लगभग वृक्षहीन है। उसमें झाड़ियाँ और जड़ी-बूटियाँ ही उगती हैं। लेकिन अगर दूसरी तरफ़ हिमबंग्गा उर्फ़ हिमगंगा नदी की ओर उतरने लगें काफ़ी हरियाली नज़र आती है। सामने वादी में देवदार के पुराने पेड़ों के ठूँठ और नये पेड़ों का एक पूरा वन नज़र आता है।

आमतौर से सारे कस्तूरीकोट के और ख़ासतौर से फस्कियाधार के लोग अपने सौन्दर्य के लिए विख्यात हैं-ख़ासकर स्त्रियाँ। उनमें भी ख़ासकर बाटलगी यानी राहलगी कहलाने वाली जाति की स्त्रियाँ। जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इस जाति के लोग राह से ही लगे रहते थे और यहाँ-वहाँ घूम-घाम कर लोगों का अपने नाच-गाने से और अपने क़िस्से-कहानियों से मनोरंजन किया करते थे। देवी के मन्दिर में मेले-ठेले पर उन्हें ही श्रद्धालुओं का मनोरंजन करने का काम मिलता था और शादी-ब्याह में उन्हें बारात के आगे-आगे चलाया जाता था। वे और तमाम मामलों में अछूत समझे जाते थे, लेकिन मन और तन का रंजन करने के मामले में नहीं। संकेत दे चुका हूँ कि 14 वीं शताब्दी में बाहर से आये विजेताओं का दावा है कि इस क्षेत्र के सभी लोग अछूत हैं। उनका अहंकार से भरा निर्मम दावा है कि हमारे आने से पहले यहाँ एक ही जाति थी, जिसे किसी बदतर शब्द के अभाव में भड़ुवा-पतुरिया जाति कहा जा सकता था। यहाँ के कुछ लोग अपने को सवर्ण मान सके हैं तो इसीलिए कि हमारे बुजुर्गों में से कुछ ने भयंकर वितृष्णा पर उत्कट कामेच्छा से विजय पाते हुए उनकी आद्या जननी से सम्भोग कर लिया था।

भयंकर वितृष्णा का सन्दर्भ यह है कि यहाँ की अन्यतम रूप से कामोत्तेजक स्त्रियों के आकर्षणरूपी चन्द्र पर अनेकानेक कलंक उनकी ग़रीबी लगाये रहती है। जैसे एक कलंक उनके फटे हुए चीकट वस्त्रों का, जिन्हें एक-एक बार पहन लेने के बाद वे तभी उतार पाती हैं जब कहीं से नये वस्त्र का जुगाड़ हो या पुराना वस्त्र उन्हें ढक सकने में सर्वथा असमर्थ हो चला हो। जल के अभाव और शीत के प्रभाव में स्नान से अनजान रह गयी उनकी देह पर पड़ी मैल की मोटी-मोटी रेखाएँ और उनकी शरीर से उठती दुर्गन्ध भी उनकी कामोत्तेजक रूपराशि पर दूसरे कलंक के समान हैं। कहना न होगा कि स्थानिक सवर्णों को इस तरह की बातों पर घोर आपत्ति होती आयी है। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं यह मानने को तैयार हूँ कि बाहर वालों के अपवित्र चरण पड़ने से पहले इस इलाक़े में एक ही जाति थी, जिसे किसी बेहतर शब्द के अभाव में निर्धन-नादान पुकारा जा सकता था। बहरहाल मेरे अछूत बुजुर्ग भी बाहर वालों के इस दावे को निरी फसक यानी गप्प ठहराते थे कि हमारे सवर्ण भी अछूत है। लुत्फ़ यह है कि बाहर वाले हमें फस्किया यानी गप्पी मानते आये, इसीलिए उन्होंने हमारे क्षेत्र का नाम फस्कियाधार रखा।

मेरे बुजुर्ग बताते थे कि उन्होंने अपने बुज़ुर्गों से सुना था कि इस जगह का नाम पहले कुछ और था-शायद जीबीजौल। जीबीजौल का कुछ अच्छा-सा मतलब था-शायद जाँबाज़ों का जमघट। यह ‘शायद’ वाली स्थिति इसलिए कि सदियों से चला आ रहा बाहरी विजेताओं का वर्चस्व मेरे बुज़ुर्गों के बुज़ुर्गों के मस्तिष्क तक से अपने इतिहास और भाषा की स्मृतियाँ मिटा चुका था। वे विजेताओं की मानसिक औलादें तो निश्चय ही बन चुके थे। देख रहा हूँ कि भूगोल सुनाते-सुनाते मैं इतिहास में फिसल आया हूँ।

जिन महानुभावों के धैर्य को किसी ताज़ातरीन रहस्यमय काण्ड से जुड़े हुए भूगोल पर प्रकाश डाला जाना स्वीकार्य हो भी गया हो वे भी शायद उससे जुड़े पिछले इतिहास, का ज़िक्र किये जाने पर आपत्ति कर उठें। उनसे मेरा नम्र निवेदन है कि हर कहानी के पीछे कई-कई और कहानियाँ रहती हैं और उनका सन्दर्भ सामने न होने पर पाठक के लिए हर कहानी एक पहले बनायी जा सकती है। इसी के चलते कूर्मांचली जैसे लेखक अपना जादुई यथार्थवाद बड़े मजे से चला ले जाते हैं। यथार्थ में विस्मयकारी के अर्थ में जादुई-वादुई कुछ होता है तो यही कि वह आगे-पीछे की तमाम अन्य कहानियों से जुड़ा हुआ होता है और उन सबकी एक साथ जानकारी किसी को भी नहीं हो पाती।


साभार-http://vedantijeevan.com/bs/home.php?bookid=2047

पंकज सिंह महर

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मेरे कथा गुरु मनोहर श्याम जोशी

मनोहर श्याम जोशी शीर्षस्थ लेखकों में से एक थे परन्तु अपनी विलक्षण बहुआयामी प्रतिभा के कारण वह मात्र साहित्य केन्द्रित नहीं रह सके। उनके द्वारा लिखे गए साक्षात्कार अपने में एक मानक हैं तो हिन्दी उपन्यास विधा को शिल्प और भाषा के स्तर पर नया फार्म देने में उनका अवदान अतुलनीय है। कथालेखन में जो नए प्रयोग उन्होंने किए उससे कथ्य और वर्णना की जडता टूटी है। उनकी रचनाओं को पढते हुए कभी-कभी लगता रहा कि वे अपने समय से आगे बढ कर लिख रहे हैं। हिन्दी गद्य में एक अद्भुत आकर्षण और प्रवाह उत्पन्न करके उन्होंने समकालीन लेखन और पत्रकारिता को काफी प्रभावित किया। अगर अपने विकास को व्यग्र टेलीविजन उन्हें साहित्य और पत्रकारिता से छीन कर यूँ न ले जाता तो... लेकिन क्यों न ले जाता। भारत के और हिन्दी के पहले सोप ओपेरा हमलोग का जन्म कैसे होता और कैसे तैयार होती भूमिका, छा जाने वाले धारावाहिकों की। अब तो यह इतिहास का हिस्सा बन चुका है।

   जोशी जी ने जाने कितने युवा लेखकों और पत्रकारों को प्रोत्साहन और प्रश्रय दिया। उन्हें बराबर आधुनिकता बोध से जोडने और पाठकों की नब्ज पहचानने का गुरुमंत्र देते रहे। संपादक के रूप में उन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा में रचनात्मक हस्तक्षेप किया। वे चाहते थे कि युवा लेखक केवल कहानी और कविता लिखने तक ही अपना रचनाकर्म सीमित न रखें। रिपोर्ताज, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण और कवर स्टोरीज पर भी हाथ आजमाएं। ऐसा हुआ भी। उनके संपादन काल में साप्ताहिक हिन्दुस्तान को अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली और यह घर-घर में देखा जाने लगा।

   जोशी जी से मेरा परिचय एक नवोदित कथाकार के रूप में हुआ। मेरी प्रथम प्रकाशित कहानी सुनहरी मछली को किसने मारा उन्होंने ही छापी। यह 1971 की बात है, मैंने कहानी लिखी और उन्हें भेज दी। कोई खास उम्मीद नहीं थी परन्तु आश्चर्य! हफ्ते भर बाद ही उनके पत्र के साथ कहानी लौट आई। उन्होंने लिखा, आपकी कहानी मुझे खासी दिलचस्प मालूम हुई और आपकी थ्रो-अवे शैली से मैं बहुत प्रभावित हुआ। लेकिन इसके अंत की सांकेतिकता आवश्यकता से अधिक अमू‌र्त्त हो गई है। अगर आप कहानी में थोडा सा परिवर्तन कर सकें तो इसे छापने में मुझे खुशी होगी। पत्र पढकर मैं उत्साह से भर गया। रात भर कहानी का पुनर्लेखन करके सुबह भेज दी। इसके बाद कहानी, सारिका, नई कहानियां, धर्मयुग आदि पत्रिकाओं में एक के बाद एक कई कहानियां छपीं। जोशी जी ने मुझे कहानी के अतिरिक्त कुछ रिपोर्ताज लिखने को कहा। मैंने बंगला जात्रा, क्रिकेट टेस्ट मैच, कोलकाता के फुटबाल मैच और उद्योग जगत पर अनेक रिपोर्ताज लिखे।

   एक बार दिल्ली में जोशी जी से मिलने गया तो उन्होंने कुछ इन डैप्थ स्टोरीज लिखने के लिए प्रेरित किया और सुझाव दिया कि मैं विलियम रौस की किताब रिपोर्टिग पढ डालूँ। मैंने पढी और कुछ लेख लिखे। 1973 में मैं प्रशिक्षण के लिए 3 महीने के लिए कोलकाता गया तो जोशी जी ने मुझे लिखा कि कोलकाता के वेश्याजीवन पर एक अंतरंग रिपोर्ट या रिपोर्ताज पर काम करूं। यह था तो जोखिम भरा अटपटा काम मगर हिम्मत जुटाकर मैं वेश्याओं की दुनिया में गया और गहराई से उनकी त्रासदी और पीडा को महसूस करने की कोशिश की। नतीजतन हाटे बाजारे एक लम्बे धारावाहिक रिपोर्ताज के रूप में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ।

   कानपुर आना होता था जोशी जी का। उनके रिश्तेदार यहाँ आजाद नगर में रहते थे। एक बार मैं मिलने गया तो उन्होंने कुछ नया और लंबा काम करने को कहा। इसी बैठक में असफल प्रेम कथाओं की श्रृंखला सूली ऊपर सेज पिया की की योजना बनी। दिल्ली पहुँचते ही साप्ताहिक हिन्दुस्तान के तार पर तार आने लगे कि जल्दी लिखकर भेजो। उस जमाने में मोबाइल फोन तो थे नहीं तार से ही काम चलता था। इससे पहले कहानियां या रिपोर्ताज लिखे थे लेकिन धारावाहिक कथा श्रृंखला लिखने के लिए हिचकिचाहट थी। यकायक जोशी जी का अंतिमेत्थम एक पत्र के रूप में आया कि इसे हम अपने स्वाधीनता अंक से शुरू करने जा रहे हैं। कम से कम तीन किस्तें तुरंत भेज दो जिससे कि विज्ञापन दिया जा सके। इसके बाद मैंने फिर पीछे मुडकर नहीं देखा।

   सूली ऊपर सेज पिया की कथा श्रृंखला को पाठकों ने बहुत पसंद किया। सैंकडों पत्र मेरे पास और जोशी जी के पास आए। इसके समाप्त होने पर जोशी जी ने अपने पत्र में लिखा, तुम्हारी लेखमाला बहुत जोरदार रही। उसने हमारे सैंकडों बुजुर्ग ग्राहक तोडे तो हजारों नौजवान ग्राहक नए बनाए। साप्ताहिक हिन्दुस्तान में शायद ही कभी कोई इतनी, पाठकों की दृष्टि से प्रभावशाली, उत्तेजक और विवादास्पद चीज छपी हो।

   उसके बाद धर्मयुग में सर्कस जीवन की कहानियां हम विष पाई जनम के और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में कोयला भई न राख धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। यह जोशी जी के प्रोत्साहन और उनकी प्रेरणा का ही असर था कि दिन में 8 घंटे की फैक्ट्री की नौकरी करते हुए भी मैं रात-रात जाग कर महीनों लिखता रहा।

   जोशी जी साप्ताहिक हिन्दुस्तान से हटे या हटाए गए और एक अच्छी खासी पत्रिका बैठ गई। हम सब हैरान थे कि वे टेलीविजन पर अपना जादू दिखाने चले गए। हम लोग और बुनियाद के चरित्रों और जीवन स्थितियों पर दर्शक फिदा हुए ही थे कि जोशी जी का उपन्यास आ गया कुरु-कुरु स्वाहा। इसे पढकर पाठकों को लगा कि सितारों के आगे जहाँ और भी है। किसी जमाने में उन्होंने प्रख्यात फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी पर एक रेखाचित्रनुमा साक्षात्कार लिखा था जो कि सरल था। उपन्यास में उन्होंने मुम्बई की जिंदगी को जो पर्त-दर-पर्त उधेडा तो आलोचक हतप्रभ रह गए। फिर कसप में उन्होंने एक अनोखी प्रेम कथा लिखी। टा टा प्रोफेसर षष्टिवल्लभ में उनका एक नया ही रूप देखने को मिला, उनकी पुरानी और चर्चित कहानी एक दुर्लभ व्यक्तित्व से बहुत आगे बढता कथाशिल्प। हरिया हरक्यूलिस के बाद सबको अहसास हो गया कि जोशी जी के पास वैचि˜य की कमी नहीं है। साधारण चरित्रों का अद्भुतिकरण और अद्भुत चरित्रों का सामान्य विश्लेषण उनके उपन्यासों की एक दुर्लभ विशेषता है।

   भव्य और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी जोशी जी की विनोदप्रियता और खुलापन देखते ही बनते थे। स्वयं अपने पर हंसने और व्यंग्य करने की अपूर्व क्षमता के चलते ही लखनऊ मेरा लखनऊ जैसी श्रेष्ठ आत्मकथात्मक कृति सामने आई। भाषाओं पर उनकी अद्भुत पकड थी चाहे हिन्दी हो, अंग्रेजी या उर्दू। मुहावरे और कहावतों के साथ उलटबासियों वाले संवाद उनकी पहचान बन गए थे। आंचलिक बोलियों पर भी उनका अधिकार था। नेताजी कहिन और कसप इसके उदाहरण हैं। दरअसल वे शब्दों की दुनिया के बादशाह थे। जब वे कुछ कहने लगते तो लोग रुककर उन्हें सुनते। उनके पास कहने को अभी बहुत कुछ था। मुंबई और लखनऊ पर ही तो अभी लिखा था, आगे शायद दिल्ली पर लिखते... लेकिन अचानक वे भरी महफिल से उठकर चले गए।


बडे शौक से सुन रहा था जमाना तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते।



राजेन्द्र राव
साभार-http://in.jagran.yahoo.com/sahitya/article/index.php?page=article&category=5&articleid=626

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Manohar Shyam Joshi was a multi-skilled personality. We feel proud that he born in Dev Bhoomi Uttarakhand.

Meena Pandey

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Pankaj ji kaise thanks kahu apko.......apne vo jikar cheda hai jise padte vakt me thik se palak b nahi jhapak pyai kabi.

Dr. Manohar shyam joshi ki me bahut badi prasansak hu. "KASAP, TA TA Professer, Hariya Harculise ki Hairani or Hamjad" upnyas maine pade.........or padte padte jiya.Dr. joshi ko me apne hardik shradhanjali arpit karti hu.

Uttarakhand Admin

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This is what I had written in the K-G Group when Joshi ji died.

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It was really sad news for me that “Manohar Shyam Joshi” is no longer with us. I am one of the biggest fan of Mr. Joshi and read nearly all the work he has published.

I did not meet him but what I know him through his writing I am trying to pour here.

Joshi ji was the writer of the masses. His vast experience of “Film Nagari” and his knowledge about various aspects of life was amazing. He took his time before publishing his major work but in that time he really explored the life and world. His first story/poem was published when he was of 18 yrs of age and his next work “Kuru Kuru Swaha” came when he got 47. His novels reflect his knowledge about different culture, different language and different aspect of life. His characters are various common persons of Pahad and through his characters Joshi ji shows various common events of Pahadi life. There are various common Pahadi words comes in his novels. The name of his two famous novels “Kasap” and “Kyap” are infect pahadi words. Joshi ji is a very good story writer. I remember reading his book “Mandir ke Ghat ki Paudhian” where there are very heart touching stories.

There is a story "Silver Wedding," in this 1990 collection “Mandir ke Ghat ki Paudhian” (Delhi: Saroj Prakashan, pp.22-40.) The "hero" of the story is Yasodhar Pant . He is the head of a small section in the Home Ministry. He is a typical Pahari man. He does not like any change in his daily routine. He is a man of set habits; his life is based on the old-fashioned beliefs. This is reflected through various events in his life. He does not like the life at home. He feels that he is being cornered. His eldest son works in an advertising agency and earns a salary so high that Yasodhar feels it "somehow improper." His second son is aspiring for the Civil Services. His third son is in the U.S. on a scholarship .His grown-up daughter who wears jeans and sleeveless tops  is refusing all marriage proposals and threatening to scoot to the U.S. Yasodhar feels very disturbed as no one will listen to him. Even his long-wedded wife . She has suddenly started wearing sleeveless blouses, high heels and eating outside - all three of which Yasodhar finds "somehow improper." His wife and children strongly disapprove of his recently acquired habit of stopping by the Birla temple on his way home from office while he feels that this is the only way of finding happiness -much in the manner of his now dead mentor. When his colleagues at the office request a treat on the occasion of his 25th wedding anniversary, he refuses because he finds it (in his English phrase) "somehow improper". He was forced to throw a party on his anniversary in which his children's friends have also been invited. Yasodhar feels ill while returning particularly with the cake and whisky which, again, Yasodhar finds "somehow improper."

He goes to his room in middle of the party and carries on an imaginary conversation with his dead mentor. He remembers his mentor telling him the truth of life, quoting Yuddhistra in the Mahabharata, says: "In the beginning and at the end you are all alone. You cannot call anyone in this world your own." Party ends and  now the guests are leaving and the presents must be opened. He finds one of the presents is a woollen dressing gown from the eldest son. His son says this to be worn "when you go to fetch milk in the morning". Yasodhar's eyes moisten with tears. Is it because his son has not offered to get the milk himself or is it that Yasodhar is reminded of his mentor who, too, used to wear a dressing gown on his morning walks?

This story unfolds many psychological aspects of human nature. This also gives the glimpses of contemporary social observation. Yasodhar's wife who has become with age increasingly self-willed and independent and writer finds a reason of this bahaviour. She not only defends her daughter's lifestyle on the grounds that she herself "did all that covering of my head with my sari on your say-so" but also brings up old resentments.She has many complaints .She often complains that when she came into his extended family as a bride there were many restrictions placed on her behaviour by his mother and sister-in-law and that Yasodhar never stood up for her:  She says "I was young but lived the life of an old woman. She want to show Yasodhar the meaning of life which she feels is correct. She feels the children are quite right in not following old fashioned ways .She says ... Why have you become so serious? You saw two movies a week when you were young, cooked meat on Sundays and sang ghazals and film songs so why cant children do the same.


When the Doordarshan was in nascent stage then his stories given the first hit serial of Indian TV history . “Hum log” and “Buniyad” those famous serials.His other famous TV work is “Kakaji Kahin”, “Mungeri Lal ke Haseen Sapne”, ”  Hamrahi   “ , “Zameen Aasman   “  and  “Gatha “ . He himself says that he is a good “Kissago” a slang word for story teller.

I like his “Kuru Kuru Swaha” very much where he shows the triple personality of a person through three different charater “Manohar” , “Shyam” and “Main” ( I ) which one of the unique concept.

May the departed soul rest in peace.

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Hem Bahuguna

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पंकज जी धन्यवाद ,
आपने मनोहरश्याम जोशी जी के बारे में वो सब कुछ समेत कर सुधि समाज के सामने रखा है,जिसकी जरुरत महसूस की जा रही है.मरणोपरांत उनका 'मैं कौन हूँ?'उपन्यास भी प्रकाशित हुवा है.आशा है आप अध्यतन जानकारी देते रहेंगे ... 

Mohan Bisht -Thet Pahadi/मोहन बिष्ट-ठेठ पहाडी

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pankaj bhai sachi mai aapne to kamal kar diya..

maire khud ki jigyasha bandne lagi hai ab unki rachano ko padne ke liye...

hem guru to kasap to aap dange hi hame padne ke liye ya phir aap batayenge ya kaha meel sakti hai kyon ki last time aapne bola tha ye dukano mai meelna muskil hai yaha.. so jaha meelti ho jarur bataye...

 

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