Author Topic: VOCABULARY OF KUMAONI-GARHWALI WORDS-कुमाऊंनी-गढ़वाली शब्द भण्डार  (Read 92330 times)

Bhishma Kukreti

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गढ़वाली में मानव स्वभाव बोधक शब्दावली

नीचे गढ़वाली में मानव स्वभाव की शब्दावली दी गई है। यह समाज विज्ञानियों के लिए शोध का विषय है कि 125 शब्दों में 110 शब्द नकारात्मक भाव के हैं।
-------रामकांत बेंजवाल व बीन बेंजवाल ---


अकड़ु (घमंडी)
अजाक (नासमझ)
अड़ौर (हठी, निडर)
अणमणो (उदासीन, बेचैन)
अदलटो (मंदबुद्धि)
अरंच (असंतोषी)
असति (जो सहिष्णु न हो)
असूर (निर्दयी, कठोर)
आतुरु (आतुर, उतावला)
आलकसि (आलसी)
उछ्यादि (उपद्रवी)
उतड़िंग (बिगड़ा हुआ)
उतौळ (अधीर)
उरफुर्या (शौकीन मिजाज)
उरंड (अनाड़ी)
उळकु (ओछा)
कंजड़ (कृपण, कंजूस)
किनखोड़ी (कंजूस)
किसाण (श्रमशील)
कुड़बक्या (अशुभ वाणी बोलने वाला)
कुनेथ्या (बुरी नीयत वाला)
कुमत्यो (दुर्बुद्धि वाला)
कुसग्वरि (जिसको काम करने का सलीका न हो)
कौब्यौर (मजाकिया)
क्वांसु (नाजुक)
खंकळ (गैर जिम्मेदार)
खचरोड़्या (बात-बात पर अड़चन पैदा करने वाला)
खड़खड़ो (स्पष्टवादी)
खरु (सच्चा, ईमानदार)
खिलपत (प्रसन्न)
खौंकार (खूंखार)
खेद्दि (ईर्ष्यालु)
गमगमो (धैर्यवान)
गळक्या (गप्पें हाँकने वाला)
गर्रि (अभिमानी)
गरगरु (रुष्ट)
निगुरो (निर्दयी, कठोर हृदय)
गळसट्या (डींगें हाँकने वाला)
गुणत्याळो (गुणवान, कृतज्ञ)
गुसाड़ (गुस्सैल)
गूड़ि (अंतर्मुखी)
गौड़िया (स्त्रियोचित प्रकृति वाला)
घरगुदड़्या (अकर्मण्य होकर घर में ही पड़ा रहने वाला)
घुन्ना (मन की बात किसी से न कहने वाला)
घुस्यड़ (बार-बार गुस्सा करने वाला)
घुस्याट्या (बार-बार धीमी आवाज में गुस्सा करने वाला)
चंट (चतुर)
चंडाळ (चंडाल)
चकड़ैत (अपने हित के लिए चालाकी करने वाला)
चकन्दर (दुश्चरित्र)
चटपट्याळो (फुर्तीला)
चटोर्या (जिह्वालोलुप)
चड़्यूं (उद्दंड)
चड़गट्यूं (बदमिजाज़)
चिढ़ंग्या (शीघ्र नाराज होने वाला)
चिरड़्या (तनिक-सी बात पर नाराज होने वाला)
छरक्या (बातूनी, गप्प हाँकने वाला)
छीतु (मुँहफट)
छुंयाळ (चुगलखोर, बातूनी)
छुदर (क्षुद्र, बुरा व्यक्ति)
जक्खड़ (मंदबुद्धि, अनाड़ी)
जट्ट (मोटी बुद्धि वाला)
जरजरकार (रूखा, क्रोधित)
जुगाड़ि (कार्य संपादन में दक्ष)
जुल्मी (जुल्म करने वाला)
झंजटि (झगड़ालु)
जिद्यारु (जिद्दी)
जुमजुम्या (बात को स्पष्ट न बताने वाला)
जुळक्या (चंचल, अस्थिर व्यक्ति)
झगड़ैल (झगड़ालू)
झक्कि (सनकी)
झल्या (सनकी)
टंडी (बहानेबाज, दिखावा करने वाला)
टिप्वड़्यूं (घमंडी, अकड़ैल)
ठंगठंगो (स्पष्टवादी, ईमानदार)
ठग्वा (ठगने वाला)
ठुसक्या/छुसक्या (चुगली करने वाला)
डरख्वा (डरपोक, भीरु)
ढंट (बदमाश)
ढीट (दुस्साहसी)
तितड़िंग (शरारती)
तैलु (तेज स्वभाव वाला)
थड़बड़ो (नाराज)
दयावन्त (दयालु, उदार)
दियाळ (दानी)
दुत्ती (बेहया, बेशर्म)
धत्ती (जिद्दी)
नखर्याळु (नखरे करने वाला)
निकाजु (अकर्मण्य)
निझर्को (निडर)
निठूर (निष्ठुर, निर्मम, कठोर)
निद्यो (अनुदार, कृपण)
निमाणो (सीधा-सादा)
परजामा (अन्यमनस्क)
परपंची (कपटी)
पिरेमी (प्रेमी)
फरजण्ट (चतुर, कार्यकुशल)
फसक्या (बढ़ा-चढ़ाकर बात करने वाला)
फेतना (मुँहफट)
बांठु (वाचाल)
बौरंगी (खुशमिजाज)
बौळ्या (सनकी)
मजाक्या (परिहास प्रिय)
मयाळु (अपनापन दिखाने वाला)
मसकर्या (मजाकिया)
मायादार (प्रेमपूरित)
रंगमतु (मतवाला)
रंगळ्या (गप्प हाँकने वाला)
रगठग (मक्कार)
रणसूर (योद्धा)
रिसाड़ (ईर्ष्यालु, डाह करने वाला)
रुंदाड़ (बात-बात पर रोने वाला)
लमडाळ (कामचोर)
लाटो (भोला-भाला, गूँगा)
लिच्चड़ (बेशर्म)
लुच्चो (बदमाश, चरित्रहीन)
सक्यावान (शक्तिशाली)
सनक्या (सनकी)
सरमाळु (शर्मीले स्वभाव का)
सळक्या (गप्प हाँकने वाला)
सीलु (सुस्त)

(साभार- हिंदी-गढ़वाली-अंग्रेजी शब्दकोश - रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल)
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाली में जल से सम्बन्धित शब्दावली

कुंड/ढंडी-  (मिट्टी से बना पानी का तालाब)

कुंवा/नौलो-   (कुआँ)

कूल-  (गूल)

खाळ-  (प्राकृतिक रूप से बना पशुओं के लिए पानी पीने का तालाब)

चौंर-  (पशुओं को पानी पीने के लिए बनाया गया  कृत्रिम तालाब।

छुबडळा- (छोटा गड्ढा जिसमें पानी एकत्रित हुआ हो)

गंगाळ-   नदी  (गंगा तथा उसकी शाखाओं के लिए प्रयुक्त)

गदेरा/गदना-  (पहाड़ी नाला)

गाड-  (नदी)

चोबडळा-  (ज़मीन से रिसते पानी से बने छोटे-छोटे गड्ढे)

छोया-  (बरसाती पानी का स्रोत)

छौड़ो /छिंचड़ो-  (झरना, पानी की तीव्र मोटी धार)

डिग्गी-  (पानी के कृत्रिम स्रोत से बनाया गया बड़ा टैंक)

तलौ/ढबोटु-  (तालाब)

नवाळो-  (पानी का कुंड जिसमें नीचे से पानी आता है)

नैर-  (नहर)

पंद्यारो-  (पनघट)

पनाळ-  (गूल से घराट चलाने के लिए लगा लकड़ी आदि का बना वाहक)

पणधारि-  (पानी की धार जो बारिश में मकान से टपकती है)

प्वौंण-  (हिमालय के उच्च स्थलों में लगी हल्की वर्षा)

बत्वाणी-  (वर्षा की बौछार)

बौलु-  (कच्ची गूल में पानी का बहाव)

मंगरा-  (पानी का प्राकृतिक स्रोत, पनघट)

रौ/औत-  (भंवर, नदी में वह स्थान जहाँ पानी गोल- गोल घूमे)

हौज-  (सिंचाई के लिए बनाया गया पानी का बड़ा टैंक)

(साभार- हिंदी-गढ़वाली-अंग्रेज़ी शब्दकोश - रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल)

Bhishma Kukreti

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गढ़वाली में पत्थर से सम्बन्धित शब्दावली
-
Ramkant Benjwal and beena benjwal
उरख्याळो/वखळो- (ओखल)   
-
ऐरण- (पत्थर का बड़ा-सा टुकड़ा जिस पर लोहार काम करता है)
ओड्यार/वड्यार- (गुफा)
ओडो/वोडो- (खेतों के बीच में गाड़ा गया विभाजक पत्थर)
कोंडाळी- (पत्थर का बना कटोरानुमा पात्र)
खरड़- (मसाले या दवाई पीसने का पात्र)
गबलु /गाब- (पत्थर के मकानों के निर्माण में दीवार के बीच भरा जाने वाला गारा)
गारा- (बारीक पत्थर)
घट- (घराट)
घय्या- (पत्थर का छोटा टुकड़ा 'गुत्थी' खेलते समय निशाना साधने के काम आता है)
घुत्तु- (पत्थर को काटकर बनाई गई बड़ी ओखली)
चौंतरो/चौंथरो- (छोटा-सा गोल या समतल पत्थर जो प्रायः चंदन घिसने के काम आता है)
चौंरि- (चबूतरा, पत्थरों की चिनाई करके बनाया गया बैठने का स्थान)
छाजा- (मकान का छज्जा)
छापला- (पतले पत्थर जो बारीक चिनाई के काम आते हैं)
जंदरी- (हाथ से घुमाई जाने वाली अनाज पीसने की चक्की)
जाड़- (बडा पत्थर)
डंग्याण- (पथरीला स्थान)
डांग- (बडा पत्थर)
ढंगार- (सीधा खड़ा पथरीला पहाड़)
ढुंगो- (पत्थर)
ढुंग्याण- (पत्थरों वाला स्थान)
दांदा- (खलिहान के चारों ओर लगे खड़े पत्थर)
पठाळ/छपाल- (आंगन में बिछे बड़े टाइलनुमा पत्थर)
पणकट्टा- (पत्थरों की छत पर दो पत्थरों के जोड़ पर रखा गया पतला लंबा पत्थर जो जोड़ पर से पानी को अंदर आने से रोकता है)
पळेंथरो/पळ्योण्या- (जिस पत्थर पर दराँती की धार तेज की जाती है)
फल्सो- (पत्थरों का बना गेट जिसके छेदों में लकड़ी फंसाई जाती है)
मुंडकिला- (भैंस बांधने के लिए प्रयुक्त आंगन में गढ़े पत्थर)
ल्वेड़ी - (सिल पर जिस पत्थर से मसाला आदि पीसा जाता है)
संगाड़- (पत्थर की चौखट)
सिलोटो- (सिलबट्टा, सिल, मसाला आदि पीसने का पत्थर)
हुळतरा- (चिनाई में जोड़ मारने वाले बड़े पत्थर)
(साभार- हिंदी-गढ़वाली-अंग्रेजी शब्दकोश - रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल)


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गढ़वाली में संख्यावाची शब्द

अधैळ- (आधा भाग)
ढैपुरु- (मकान के ऊपरी मंजिल के ऊपर ढाई भाग पर बना स्थान)
त्याढ़- (एक तिहाई)
पैल्वाण/पैलपैण- (पहली बार बच्चा देने वाला पशु)
यकानि-  (एक आने का सिक्का)
यकहड़्या- (तवे में एक ही ओर पकाई गई रोटी)
इकनाड़्या-  (एक डगर वाला)
इकसौंडाळ-  (एक समान)
इकतिर्या-  (एक तरफ को, एक ओर को)
इखारो-  (इकहरा)
एकमुखी-  (एक मुख वाला)
यकहत्या-  (एक ऐसी चीज जो एक ही व्यक्ति से संचालित हो)
यकसासि-  (एक सांस आना)
यखुट्या-  (एक पांव वाला)
इखरौंण-  (ओखल में धान एक बार कूटना)
दुरौंण-   (ओखल में धान दूसरी बार कूटना)
यकुळा- (दिन में एक बार, आधा दिन)
दुकुळा-  (दोनों समय)
दुखंडो-  (दो खण्ड वाला मकान)
दुघर्या-  (पूर्व पति का घर छोड़कर दूसरे पति के घर रहने वाली स्त्री)
दुफंग्याळो/दुफांग्या-  (दो शाखाओं वाला)
दुगड्डा-  (दो गाडों के मिलने वाला स्थान)
दुणगोड-  (दूसरी बार की गुड़ाई)
दुण्यौंण-  (अनाज बोने से पहले दूसरी बार खेत जोतना)
दुतरफु-   (दोनों तरफ)
दुधड़ो-   (दो भागों में बंटा हुआ)
दुनाळ्या-  (दो नाल वाली)
दुबाटो-   (दोराहा)
दुपाया-   (दो पैरों वाला)
दुपाळ्या-  (दो तरफ वाला)
दुफाड़-  (दो टुकडों में  बंटा)
दुबाळो-  (नदी का वह स्थान जहां पर धारा दो भागों में बंट जाए और बीच में छोटा-सा टापू बन जाए)
दुमाग-   (दो मार्ग)
दुरंगि-  (दो रंग की)
दुलय्या-  (एक बार काटने के बाद दुबारा बढ़ी हुई घास)
दुसांद-  (सरहद, दो गांवों की सीमा का मिलन स्थान)
दुहत्या-  (दोनो हाथों से)
दुसारण/द्वी पैणा-   (दूसरी बार बच्चा देने वाला पशु)
दोण-   (दो 'डलोणे' का एक मात्रक, द्रोण)
द्वग्गा-   (दो एक साथ जुड़े हुए)
द्वारो-   (दुहरा)
तिकोण्या-  (तीन कोने वाला)
तिपुरो-  (तीन मंजिला मकान)
तिमाण्याँ-  (सोने के तीन मनकों वाला गले का आभूषण)
तिमुंड्या-  (तीन सिर वाला)
तिरपुंड-  (तीन आड़ी रेखाओं का तिलक)
तिरसूळ-  (त्रिशूल)
तिलड़्या-  (तीन लड़ियों वाला)
तिसराण/तिपैंणा-  (तीसरी बार बच्चा देने वाला पशु)
त्याऽरु-  (तिहरा)
चवन्नी-  (चार आने)
चौदिसि-  (चार दिशाएँ)
चौखंबा-  (चार शिखरों वाला पर्वत)
चौखुंट-  (चारों किनारे)
चौखुंटू-  (चौकोर जिसके चारों किनारे बराबर हों)
चौथ-  (चतुर्थी तिथि)
चौथो-  (हर चौथे दिन आने वाला बुखार)
चौपल-  (जिसके चारों फलक ठीक आयताकार या वर्गाकार हों)
चौपायो-  (चार पैरों वाला)
चौपुर्तु-  (चार तह वाला, चौहरा)
चौबाट्टा-  (चौराहा)
चौमास-  (वर्षा ऋतु के चार माह)
चौमुख्या-  (चार मुख वाला)
चौसिंग्या-  (चार सींगों वाला)
चौसेरो- (चार सेर का पात्र, पाथो)
चौहड़्या-   (चारों ओर से)
पंच-  (पंचायत के पांच सदस्य)
पंचगब-  (पंचगव्य, दूध, दही, घी, गौमूत्र एवं शहद का अभिमंत्रित मिश्रण)
पंचदेव-  (पांच देव, शिव, गणेश, विष्णु, सूर्य, दुर्गा)
पंचप्रयाग-  (पांच प्रयाग- विष्णु प्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग)
पंचकेदार-  (पांच केदार, केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पनाथ, मद्महेश्वर)
पंचबदरी-  पांच बदरी, बदरीनाथ, आदिबदरी,
योगध्यान बदरी, भविष्यबदरी, वृद्धबदरी)
पंचपथरी-  (पांच पत्थरों का एक खेल)
पंचपात्र-  (पांच पात्र)
पंचमि- (पंचमी तिथि)
पंचकुंड- (पांच कुंड)
पंचगै- (पांच गांवों का समूह)
पंचाळु/पंचौळो-  (प्रसूता स्त्री का प्रसव के बाद पांचवा दिन)
पंचैत-  (पंचायत)
छट-   (बच्चे के जन्म का छठे दिन का पूजन)
सतनाजो-  (सात अनाजों का मिश्रण)
सत्वांसो-  (वह बच्चा जो सातवें महीने में ही पैदा हो जाए)
सप्ताह-  (सात दिन तक चलने वाली भागवत की कथा)
सत्वाळा-  (प्रसूता का सातवां दिन)
अठान्नि-  (आठ आने)
अठ्वाड़-  (चैत्र मास की आठवीं तिथि, आठ दिनों का अनुष्ठान जिसके अंत में आठ बलियाँ दी जाती हैं)
अठ्वांसो-  (समय से पूर्व आठवें मास में उत्पन्न होने वाला बच्चा)
नवग्रह-  (नौ ग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु)
नवरातरा-  (नवरात्र)
नौघर्या-  (नौ खण्डों का बना पूजा का पात्र)
नौछमी-  (नौ लीलाओं वाला)
नौमी-  (नवमी, नवमी तिथि)
नौलड़़्या-  (नौ लड़ियों वाला हार)
नौसेरु-   (नौ शिराओं वाला)
नौलो-  (नवें दिन की जाने वाली पूजा)
नौसुर्या-  (नौ सुरों वाला)
इकास/यगास-  (एकादशी तिथि)
यकासु-  (ग्यारहवीं, मृतक की ग्यारहवें दिन की जाने वाली क्रिया)
बारमस्या-  (बारह महीनों लगने वाले फल)
बारामासा-  (बारह महीनों)
तिरिसु-  (मृतक का तीसवें दिन किया जाने वाला श्राद्ध)
बावनी-  (संवत 1852 का दुर्भिक्ष)
चौरासि-  (चारों ओर विपत्ति आना, चौरासी योनियों के दुख एक साथ आना)

(साभार-  हिंदी गढ़वाली अंग्रेज़ी शब्दकोश - रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल, संरक्षण आधार- अरविंद पुरोहित)

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गढ़वाली में संख्यावाची शब्द

अधैळ- (आधा भाग)
ढैपुरु- (मकान के ऊपरी मंजिल के ऊपर ढाई भाग पर बना स्थान)
त्याढ़- (एक तिहाई)
पैल्वाण/पैलपैण- (पहली बार बच्चा देने वाला पशु)
यकानि-  (एक आने का सिक्का)
यकहड़्या- (तवे में एक ही ओर पकाई गई रोटी)
इकनाड़्या-  (एक डगर वाला)
इकसौंडाळ-  (एक समान)
इकतिर्या-  (एक तरफ को, एक ओर को)
इखारो-  (इकहरा)
एकमुखी-  (एक मुख वाला)
यकहत्या-  (एक ऐसी चीज जो एक ही व्यक्ति से संचालित हो)
यकसासि-  (एक सांस आना)
यखुट्या-  (एक पांव वाला)
इखरौंण-  (ओखल में धान एक बार कूटना)
दुरौंण-   (ओखल में धान दूसरी बार कूटना)
यकुळा- (दिन में एक बार, आधा दिन)
दुकुळा-  (दोनों समय)
दुखंडो-  (दो खण्ड वाला मकान)
दुघर्या-  (पूर्व पति का घर छोड़कर दूसरे पति के घर रहने वाली स्त्री)
दुफंग्याळो/दुफांग्या-  (दो शाखाओं वाला)
दुगड्डा-  (दो गाडों के मिलने वाला स्थान)
दुणगोड-  (दूसरी बार की गुड़ाई)
दुण्यौंण-  (अनाज बोने से पहले दूसरी बार खेत जोतना)
दुतरफु-   (दोनों तरफ)
दुधड़ो-   (दो भागों में बंटा हुआ)
दुनाळ्या-  (दो नाल वाली)
दुबाटो-   (दोराहा)
दुपाया-   (दो पैरों वाला)
दुपाळ्या-  (दो तरफ वाला)
दुफाड़-  (दो टुकडों में  बंटा)
दुबाळो-  (नदी का वह स्थान जहां पर धारा दो भागों में बंट जाए और बीच में छोटा-सा टापू बन जाए)
दुमाग-   (दो मार्ग)
दुरंगि-  (दो रंग की)
दुलय्या-  (एक बार काटने के बाद दुबारा बढ़ी हुई घास)
दुसांद-  (सरहद, दो गांवों की सीमा का मिलन स्थान)
दुहत्या-  (दोनो हाथों से)
दुसारण/द्वी पैणा-   (दूसरी बार बच्चा देने वाला पशु)
दोण-   (दो 'डलोणे' का एक मात्रक, द्रोण)
द्वग्गा-   (दो एक साथ जुड़े हुए)
द्वारो-   (दुहरा)
तिकोण्या-  (तीन कोने वाला)
तिपुरो-  (तीन मंजिला मकान)
तिमाण्याँ-  (सोने के तीन मनकों वाला गले का आभूषण)
तिमुंड्या-  (तीन सिर वाला)
तिरपुंड-  (तीन आड़ी रेखाओं का तिलक)
तिरसूळ-  (त्रिशूल)
तिलड़्या-  (तीन लड़ियों वाला)
तिसराण/तिपैंणा-  (तीसरी बार बच्चा देने वाला पशु)
त्याऽरु-  (तिहरा)
चवन्नी-  (चार आने)
चौदिसि-  (चार दिशाएँ)
चौखंबा-  (चार शिखरों वाला पर्वत)
चौखुंट-  (चारों किनारे)
चौखुंटू-  (चौकोर जिसके चारों किनारे बराबर हों)
चौथ-  (चतुर्थी तिथि)
चौथो-  (हर चौथे दिन आने वाला बुखार)
चौपल-  (जिसके चारों फलक ठीक आयताकार या वर्गाकार हों)
चौपायो-  (चार पैरों वाला)
चौपुर्तु-  (चार तह वाला, चौहरा)
चौबाट्टा-  (चौराहा)
चौमास-  (वर्षा ऋतु के चार माह)
चौमुख्या-  (चार मुख वाला)
चौसिंग्या-  (चार सींगों वाला)
चौसेरो- (चार सेर का पात्र, पाथो)
चौहड़्या-   (चारों ओर से)
पंच-  (पंचायत के पांच सदस्य)
पंचगब-  (पंचगव्य, दूध, दही, घी, गौमूत्र एवं शहद का अभिमंत्रित मिश्रण)
पंचदेव-  (पांच देव, शिव, गणेश, विष्णु, सूर्य, दुर्गा)
पंचप्रयाग-  (पांच प्रयाग- विष्णु प्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग)
पंचकेदार-  (पांच केदार, केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पनाथ, मद्महेश्वर)
पंचबदरी-  पांच बदरी, बदरीनाथ, आदिबदरी,
योगध्यान बदरी, भविष्यबदरी, वृद्धबदरी)
पंचपथरी-  (पांच पत्थरों का एक खेल)
पंचपात्र-  (पांच पात्र)
पंचमि- (पंचमी तिथि)
पंचकुंड- (पांच कुंड)
पंचगै- (पांच गांवों का समूह)
पंचाळु/पंचौळो-  (प्रसूता स्त्री का प्रसव के बाद पांचवा दिन)
पंचैत-  (पंचायत)
छट-   (बच्चे के जन्म का छठे दिन का पूजन)
सतनाजो-  (सात अनाजों का मिश्रण)
सत्वांसो-  (वह बच्चा जो सातवें महीने में ही पैदा हो जाए)
सप्ताह-  (सात दिन तक चलने वाली भागवत की कथा)
सत्वाळा-  (प्रसूता का सातवां दिन)
अठान्नि-  (आठ आने)
अठ्वाड़-  (चैत्र मास की आठवीं तिथि, आठ दिनों का अनुष्ठान जिसके अंत में आठ बलियाँ दी जाती हैं)
अठ्वांसो-  (समय से पूर्व आठवें मास में उत्पन्न होने वाला बच्चा)
नवग्रह-  (नौ ग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु)
नवरातरा-  (नवरात्र)
नौघर्या-  (नौ खण्डों का बना पूजा का पात्र)
नौछमी-  (नौ लीलाओं वाला)
नौमी-  (नवमी, नवमी तिथि)
नौलड़़्या-  (नौ लड़ियों वाला हार)
नौसेरु-   (नौ शिराओं वाला)
नौलो-  (नवें दिन की जाने वाली पूजा)
नौसुर्या-  (नौ सुरों वाला)
इकास/यगास-  (एकादशी तिथि)
यकासु-  (ग्यारहवीं, मृतक की ग्यारहवें दिन की जाने वाली क्रिया)
बारमस्या-  (बारह महीनों लगने वाले फल)
बारामासा-  (बारह महीनों)
तिरिसु-  (मृतक का तीसवें दिन किया जाने वाला श्राद्ध)
बावनी-  (संवत 1852 का दुर्भिक्ष)
चौरासि-  (चारों ओर विपत्ति आना, चौरासी योनियों के दुख एक साथ आना)

(साभार-  हिंदी गढ़वाली अंग्रेज़ी शब्दकोश - रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल, संरक्षण आधार- अरविंद पुरोहित)

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सीमांत उत्तराखंड में जाड़ संस्कृति व भाषा

The Culture and language of Jad region, Uttarkashi, Uttarakhand 
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Posted By: Girish Lohanion: December 09, 2019
सीमांत उत्तराखंड में जाड़ संस्कृति व भाषा
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जाड़ गंगा भागीरथी नदी की सबसे बड़ी उपनदी है. ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर भैरोंघाटी में भागीरथी और जाड़ गंगा का संगम होता है. भैरोंघाटी में पच्चीस किलोमीटर भीतर माणा गाड़ माणा दर्रे के पश्चिम में फैले हिमनद से निकलती है. यह निलांग से लगभग 6 किलोमीटर ऊपर जाड़ गंगा से जा मिलती है.
भैरों घाटी से तिब्बत जाने वाले थाग्ला दर्रे तक उच्च पर्वत हिम प्रदेश की पूरी घाटी निलांग नाम से जानी जाती है. निलांग 11310 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, भैरों घाटी से तिब्बत की ओर जाने वाले थाग्ला दर्रे तक की पूरी घाटी इसी नाम से जानी जाती है. यहां के मुख्य गांव निलङ और इससे ऊपर जादोंग है. यहां के निवासियों को जाड़ कहा जाता है. इनका मुख्य व्यवसाय तिब्बत जिसे ‘हूंण देश भी कहा गया, के साथ होता रहा . जाड़ व्यापारी अनाज, देशी कपड़ा या खङूवा, गुड़, चीनी, तम्बाकू, तिलहन, सूती कपड़े, धातु के बर्तन, लकड़ी के बने बर्तन या कनसिन, माला इत्यादि वस्तुओं का निर्यात तथा स्वर्ण चूर्ण व सोना, सुहागा,पश्मीना, नमक, चंवर, घोड़े, याक वा कुत्तों का आयात करते रहे. जाड़ व्यापारी तोलिंग या थोलिंग, तसपरंग व गरहोत के इलाकों में ही व्यापार करते थे तो बुशाहरी खामपा व्यापारी पूरे तिब्बत में व्यापार करने का अधिकार पाए थे. गढ़वाली व्यापारी केवल डोकपा ऑड़ तक ही जा पाते थे, जहां तिब्बत के गांव थांग, गंडोह, सरंग, करवक़ व डोकपा बसे हैं. इन्हीं गांवों से वस्तु और जिंसों का लेनदेन होता था. जाड़ व्यापारी जाड़ों के मौसम में निलांग से आगे दक्षिण की ओर हफ्ता – दस दिन पैदल चलने के बाद उत्तरकाशी में भागीरथी के किनारे डूंडा तथा भटवाड़ी में आ जाते थे. यह उनका शीतकालीन प्रवास रहता. Jad Culture and Language Uttarakhand
Jad Culture and Language Uttarakhand
जाड़ गंगा नदी.
निलांग घाटी में आदिम काल से निवास कर रही जाड़ जनजाति में जाड़ भाषा बहुतायत से बोली जाती रही है. जाड़ जनजाति के समृद्ध ऐतिहासिक अतीत का वर्णन करते हुए प्रो.डी.डी.शर्मा ने अपनी पुस्तक, तिब्बती हिमालयन लेंग्वेजिज ऑफ उत्तराखंड (1990) में लिखा है कि जाड़ समुदाय का मूल संबंध हिमाचल प्रदेश के बुशाहर राज्य के पहाड़ी इलाकों से रहा जिसे अब किन्नौर कहा जाता है. एच. एस. फकलियाल के अनुसार उत्तरकाशी के जाड़ मुख्यतः नेपाल के करनाली इलाके के जाड़ों के वंशज रहे. ये नाग वंश के राजा पृथ्वी मल्ला के समय चौदहवीं शताब्दी में इस इलाके में बस गए थे. एटकिंसन ने गढ़वाली व बुशाहरी हुणिया की मिश्रित नस्ल को जाड़ समुदाय कहा. नारी के हुणिया खुद को नारीपा तथा उच्च हिमालय इलाकों में रहने वाले को मोनपा कहते हैं. खस स्वयं को खस देश से अभिहित करते हुए उच्च पर्वत क्षेत्र में निवास करने वालों को जो तिब्बत से व्यापार करते थे, के आवास स्थलों को भोट तथा तिब्बत को हूणदेश कहते थे. वहीं तिब्बत के निवासी निलांग घाटी को चोंग्सा कहते थे.
2011 की जनगणना में जाड़ भाषा बोलने वालों की संख्या चार हजार बताई गई. जाड़ भाषा सीमांत हिमालय की तिब्बत-बर्मी भाषा समूह की उपबोलियों से सम्बंधित रही भले ही एक सीमित समुदाय में यह प्रचलित रही. 1962 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया. जादोंग, सुमदु, निलांग, बगोरी और हर्षिल में जाड़ भाषा का खूब प्रचलन था. 1962 से पहले निलांग घाटी में जाड़ भाषा ही सबसे अधिक बोली जाती रही. तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद तिब्बत की सीमा से लगे निवासियों को डुंडा, लंका व उत्तरकाशी के इलाकों में बसाया गया और इन इलाकों को भारतीय सेना की निगरानी में रखा गया. अब जाड़ भाषा मुख्य रूप से उत्तरकाशी, भटवाड़ी, डुंडा, बगोरी, व हर्षिल जैसे भागीरथी नदी के तटीय क्षेत्रों में बोली जाती है. ये मात्र भाषा अथवा बोली न हो कर समूचे जाड़ समुदाय की जीवन पद्धति है.
जाड़ समुदाय की जीवन पद्धति अभी भी कमोबेश परंपरागत जीवनक्रम का अनुसरण कर रही है. ये साल में छह महीने सीमांत के हिमाच्छादित इलाकों में रहते व विचरण करते हैं. जाड़ों के मौसम में ये उत्तरकाशी शहर के भटवाड़ी वा डूंडा में निवास करते हैं. सामान्यतः अभी भी ये अपने परंपरागत व्यवसाय एवं पुश्तैनी शिल्प से जुड़े हैं.
उत्तरकाशी में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश चंद्र ममगई पिछले दस सालों से जाड़ संस्कृति व जाड़ भाषा पर जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं. वह यायावर प्रकृति के हैं. कई भाषाएं जानते हैं. पहाड़ की लोकथात पर बहुत काम कर चुके हैं. इस सीमांत इनर लाइन इलाके की उन्होंने खूब पदयात्राएं की हैं. वर्षों तक स्थानीय समाज से घुलने मिलने तथा उनके द्वारा बोली जाने वाली जाड़ भाषा व शब्दावली के संकलन के साथ ही स्थानीय संस्कृति व थात पर लम्बे अनुसन्धान के नतीजे में उनका जाड़ भाषा का शब्दकोष छप चुका है. जाड़ समुदाय के सामाजिक आर्थिक स्वरुप के साथ यहाँ की परंपरागत संस्कृति पर अलग से भी उन्होंने किताब लिखी है.
सीमित व संकुचित इलाके में सिमटी पर लोकथात से समृद्ध जाड़ संस्कृति पर वह बताते हैं कि जाड़ गंगा के तटीय इलाकों के निवासियों को उत्तराखंड की स्थानीय बोलियों में पहले हुणियाँ कहा जाता था. हुणियाँ शब्द ह्यूं का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है – हिम. इस प्रकार हुणियाँ से आशय है, उच्च हिमालय-हिम आच्छादित इलाकों में रहने वाले निवासी. उत्तराखंड एवं भोट (तिब्बत )के मध्यवर्ती इलाकों के निवासी होने के कारण स्थानीय निवासियों के द्वारा इन्हें भोटिया नाम से भी पुकारा जाता रहा पर ये रोंग्पा कहलाया जाना पसंद करते हैं. जिससे आशय है पर्वत-घाटियों में रहने वाले लोग. तिब्बत से व्यापार सम्बन्ध होने के कारण जाड़ समाज को तिब्बत निवासी चोंग्सा कहते रहे. जाड़ समुदाय स्वयं को किरातों का वंशज मानते हैं. गढ़वाल में किरात जाति के प्रसार का एक प्रमाण भागीरथी का एक नाम किराती भी माना गया. कश्यप संहिता में यह उल्लेख है कि यमुना घाटी में किरातों का गढ़ था.
कुमारसम्भव (1-17 एवं 1/8) में उल्लेख है कि विक्रम की पांचवी शताब्दी में उत्तराखंड में गंगाजी के उदगम प्रदेश में किरात और किन्नर जाति निवास करती थी :
भागीरथी निर्झरसीकराणां वोढा मुहू कम्पित देवदारु:
यद् वायुर्नविष्ट मृगैः किरातैरा सेव्यते भिन्न शिखण्डिवहर
चंद किन्नर जातक (खंड 4, पृष्ठ 490-91)के सूत्रों से ज्ञात होता है कि उत्तराखंड में गंधमादन के समीप के क्षेत्र अर्थात आज के उत्तरकाशी व चमोली जनपदों में किन्नर निवास रहा. सभापर्व (52/2-3) से भी स्पष्ट होता है कि किरात जाति के वह लोग जो गढ़वाल के उच्चांश में रहते थे व हूण देश तिब्बत से सुहागा या टंकण, स्वर्ण चूर्ण, कस्तूरी का व्यापार करते थे. इन्हें तंगण या टंकण के नाम से भी जाना गया. यही टंकण वंशज उत्तरकाशी के जाड़ भी रहे.
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उत्तराखंड की जाड़ जनजाति में प्रयुक्त जाड़ भाषा-बोली उत्तरकाशी जनपद सीमांत पर्वत उपत्यकाओं में प्रयुक्त होती है. प्रोफेसर सुरेश चंद्र ममगई बताते हैं कि इस भाषा में प्राचीन समय से मौखिक रूपों में संस्कृति तथा समाज की विषेशताओं का तानाबाना रचित होते आया है. जिसमें कृषि, व्यापार , पशुचारण तथा अध्यात्म से सम्बंधित शब्दावली के अतिरिक्त गीत, लोककथाएं , मुहावरे, लोकोक्तियाँ तथा लोकगाथाएँ भी अंतर्भूत हैं.जाड़ भाषा की ध्वन्यात्मक संरचना, उच्चारण -प्रक्रिया, स्वनिम विश्लेषण, शब्द भंडार रूपात्मक संरचना (संज्ञा, लिंग, वचन, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, काल-रचना) तथा व्याकरण का सम्बन्ध तिब्बती भाषा से जुड़ा रहा है. यद्यपि जाड़ भाषा में अनेक ऐसी भी विशेषताएं भी हैं जो तिब्बती भाषा से अलग हैं. मुंडा, खस तथा दरद परिवार की भाषा-बोली बोलने वालों से जाड़ समुदाय के व्यापारिक रिश्ते रहे हैं. इसलिए इन भाषा परिवारों का प्रभाव भी जाड़ भाषा पर देखा जा सकता है. पश्चिमी गढ़वाली की अनेक उपबोलियों जैसे टिरियाली, रमोली, रंवाल्टी, बुढेरा की शब्दावली को भी जाड़ भाषा ने अपनाया है.
हिन्दू धर्म से सम्बंधित होने के कारण जाड़ समुदाय अनेक स्थानीय लोक देवी देवताओं के प्रति आस्थावान रहा. संभवतः इसी कारण यहाँ संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता भी दिखाई देती है. हिन्दू धर्म से जुड़ी आस्थाओं के अनुकूल वार्षिक महीनों के नाम (चैत, बैशाख, जेठ, अषाढ़, सौंण, भादों, असूज, कार्तिक, मंगशीर, पूस, माघ तथा फागुन) इस समुदाय ने अक्षरशः ग्रहण कर लिए हैं. यही प्रवृति सप्ताह के नामों के साथ भी देखी जाती है बाकी अन्य प्रयोक्तियों में तिब्बती भाषा का अल्प प्रभाव भी दिखाई देता है.
जाड़ गीतों में जाड़ संस्कृति व लोक थात की स्पष्ट छाप है :
थोन्मो, थोन्मो गांगा, मऊ, मऊ पांगा
लाखू -लाखू थांगा गाशिंग -गाशिंग थोगो.
पिगा याला छोमजा -छोमजा तोगा माला छोमजा
लम -ला लम -ला दोजे, गाशिंग -गाशिंग थोगो.
तला खुरु कलशा, पिरियाँ बुली टाशा
नमते, नमते छोमजा, गाशिंग -गाशिंग थोगो.
थोन्मो , थोन्मो गांगा...
इस लोकगीत में जाड़ प्रदेश का वर्णन व दिनचर्या है :
ऊँचे ऊँचे पर्वत शिखर, हरे भरे घास के मैदान, सुन्दर-सुंदर पर्वतों पर बुग्याल कितने मनमोहक प्रतीत होते हैं. वसंत ऋतु का वह समय जब हम सभी अपने पूरे परिवार और पालतू पशुओं के साथ अपने मूल घरों (निलांग तथा जादोंग )की ओर चल पड़ते हैं. शीत ऋतु के आरम्भ होते ही इसी प्रकार अपने शीतकालीन आवासों की ओर आना और रास्ते में रुक-रुक करपड़ाव डालते हुए रुकना, ठहरना और वह घुमक्कड़पन कितना प्यारा लगता है. पूरा सामान घोड़ों पे लाद के चलना, छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं को पीठ पर बांध कर झुटपुटे में ही चल देना कितना प्यारा लगता है.
अपने गाँव छोड़ कर आने की पीड़ा का लोक स्वर :
सांग (जादोंग )छोंगसा ( निलांग)नियी युल
ईन बिजे टांजी टाग
ची बेजे बिजे काहू ला शुंग
दी युल युवी सूं...
छोंगसा शी चा सै थुँग्जे
बिजे शिमु छौरी टाग
दी युल दु...
सांग छांग सा न्यी युल ईन
बिजे टाँजी टाग
ची बेचे बिजे काहू ला शुंग
दी युल युवी सुं...
जाड़ उपत्यका की याद भरी हैं इस गीत में. तब बोल फूट पड़ते हैं कि :
जादोंग और निलांग हमारे इन दोनों गांवों की याद हमें बहुत सताती है गाँव छोड़ते समय बड़ा ही कारुणिक और दुखदायी समय होता है. वो दिन याद आते हेंजब हम सभी एक साथ बैठ कर खाते-पीते थे और प्रसन्न होते थे. गाँव की स्मृतियाँ भी हमें सताती रहती हैं.
दुर्गम सीमांत प्रदेश के जाड़ पर्वत पुत्र जानते हैं कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों में उनकी रक्षा यही प्रकृति करती है. उनकी आस्था के बोल उभर उठते हैं समवेत स्वरों में :
कोंजोंग दो टांगबो लुग्बा
यें कोंजोंग शी लुग ईन
होनमु होनमु पांगा बला न्येला
नी थ्वी टाग वो
लुग्मा गांगा ला न्येला खुड़ी टाग
हाँ हाँ...
कांबला सानी पोदु दुगो
हां थे...
कोंजोंग दो टांगबो लुग्बा
न्ये कोंजोंग शी लुग ईन
होनमु होनमु पांगा बला न्येला
नी थ्वी टागचा...
जाड़ निवासी गा रहे हैं कि भगवान बकरी चराने वाला चरवाहा है और हम सभी उसकी बकरियां हैं. हरे भरे घास के मैदान में वो हमें मिलते हैं. वो चरवाहा हम सभी भेड़ बकरियों को हरे भरे बुग्यालों में चराने के लिए ले जाता है. चरवाहा हमारा भगवान है और हम उसकी भेड़ बकरियां हैं.
Copyright Girish Lohanion, 2019
   
सीमांत उत्तराखंड में जाड़ संस्कृति व भाषा; सीमांत उत्तरकाशी में जाड़ संस्कृति व भाषा; श्रृंखला जारी रहेगी
The Culture and language of Jad region, Uttarkashi, Uttarakhand series will continue

 

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