Author Topic: Mega Corruptions cases in Uttrakhand - उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दे  (Read 16090 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मुझे लगता उत्तराखंड राज्य में जबर्दश्त लूट मची हुयी है हर जगह पर बड़े बड़े घोटाले सामने आ रहे है!  जोकि बहुत ही दुःख की बात है!

उत्तराखंड राज्य घोटाले करने के नहीं नहीं बनाया गया था! इस राज्य के बनाने के पीछे केवल पहाड़ी हिस्सों का विकास जल्दी हो !

बड़ी शर्म की बात है .. राज्य करने वाले लोग भी पहाड़ के ही जो .. पहाड़ को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है !


Devbhoomi,Uttarakhand

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उत्तराखंड की पुलिस के कारनामे
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                               बिना टिकट पकड़े छह दारोगा समेत 35 पुलिसकर्मी
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रेलवे अधिकारियों की ओर से बिना टिकट यात्रा करने वाले यात्रियों के खिलाफ चलाया जा रहा विशेष अभियान दूसरे दिन भी जारी रहा। दूसरे दिन भी छह दारोगा समेत 35 पुलिसकर्मियों का चालान किया जिसमें उत्तराखंड पुलिस के भी दो पुलिसकर्मी शामिल हैं। रेल अधिकारियों के अनुसार सभी का बिना टिकट यात्रा में चालान कर दिया गया। अधिकारियों का कहना है र कअभियान आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा।
गौरतलब है कि सहायक वाणिज्य प्रबंधक एसयू सिददकी के नेतृत्व में रेलवे टीम अभियान चला रही है। जिसके तहत दूसरे दिन भी सघन जांच पड़ताल की गयी। जांच पड़ताल के दौरान सचल दस्ते ने छह दारोगा समेत 35 पुलिसकर्मियों के बिना टिकट यात्रा करते पकड़ लिया। तमाम पुलिसकर्मियों का चालान किया गया। हालांकि पुलिसकर्मियों ने वर्दी का हवाला देकर अधिकारियों से छोड़ने की गुजारिश की। लेकिन रेलवे अधिकारियों ने एक्ट का हवाला देकर उन्हें किसी तरह की मोहलत नहीं दी। दिलचस्प पहलू यह रहा कि पकड़े गए तमाम पुलिसकर्मी बावर्दी थे। जिमसें उत्तराखंड पुलिस के भी दो पुलिसकर्मी शामिल थे। अध्राकारियों ने जनशताब्दी, अहमदाबाद मेल, बांद्रा व दून एक्सप्रेस समेत कई गाडियों में अभियान चलाया। इसे लेकर यात्रियों में अफरा तफरी का भी माहौल रहा। कई बेटिकट यात्री तो ट्रेनों के लक्सर व रुड़की रेलवे स्टेशन पर पहुंचने से पहले ही चलती ट्रेन से उतरकर फरार हो गए।

http://www.amarujala.com/state/Uttrakhand/25010-2.html

Devbhoomi,Uttarakhand

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ऊर्जा निगम 2100 करोड़ के घाटे में
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उत्तराखंड में बिजली वितरण के लिए जिम्मेदार ऊर्जा निगम 2100 करोड़ से भी अधिक के घाटे में पहुंच गया है। निगम की हालत पतली करने में सबसे बड़ी भूमिका सरकारी विभागों की है। इन विभागों पर निगम का सात सौ करोड़ से भी अधिक का बकाया चल रहा है।

राज्य में विद्युत वितरण के लिए जिम्मेदार ऊर्जा निगम का घाटा साल दर साल बढ़ता ही जा रही है। वर्ष 2009-10 में यह 1800 करोड़ के करीब था। अब यह 2100 करोड़ से अधिक हो गया है। ऊर्जा निगम का घाटा बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरकारी विभागों की है। इन विभागों के पास इस समय ऊर्जा निगम का सात सौ करोड़ से भी अधिक बकाया है। ये विभाग हैं नगर निकाय, जल निगम तथा जल संस्थान, सिंचाई विभाग और विभिन्न तरह की विश्व बैंक और एडीबी की योजनाएं जिनमें बिजली के जरिये पानी लिफ्ट किया जाता है। इन सरकारी विभागों पर सालों से बकाया चढ़ता जा रहा है।

ऊर्जा निगम के एमडी एके जैन इसे घाटे में जोड़ने के पक्षधर नहीं हैं। श्री जैन कहते हैं कि इसकी वसूली के लिए वह विभागों को पत्र लिख रहे हैं, उनसे भुगतान का अनुरोध कर रहे हैं। उन्हें आस है कि बिजली बिलों की यह बकाया राशि शीघ्र ही निगम को मिल जाएगी। यह बात अलग है कि वर्षो से इन विभागों पर भुगतान का भार बढ़ता ही जा रहा है।

ऊर्जा निगम का गठन विशुद्ध रूप से एक व्यावसायिक संस्था के रूप में हुआ था लेकिन निगम पर सरकार के दबाव में सामाजिक जिम्मेदारियों का बोझ लगातार बढ़ाया जा रहा है। निगम की जरूरत के अनुसार टैरिफ रेट नहीं बढ़ाए जा रहे हैं। यहां तक कि जल विद्युत निगम तथा पावर ट्रांसमिशन कारपोरेश (पिटकुल) के बढ़े टैरिफ रेट का भार भी ऊर्जा निगम के सिर पर डाल दिया जाता है। ऊर्जा निगम पर सामाजिक जिम्मेदारियों का भार तो लगातार बढ़ाया जा रहा है, लेकिन घाटे से बाहर निकालने के लिए कोई सरकारी प्रयास भी अभी तक होते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि ऊर्जा निगम घाटे की गर्त में फंसता ही चला जा रहा है।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7971650.html

Devbhoomi,Uttarakhand

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मित्र पुलिस का चेहरा फिर हुआ दागदार
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रुद्रप्रयाग,  : उम्र: 58 वर्ष, पद: वरिष्ठ इंस्पेक्टर, जिम्मेदारी: जिले की रिजर्व पुलिस के रूप में समाज की रक्षा करना। लेकिन इसने ऐसा काम किया है, जिससे मानवता भी शर्मसार हो जाएं। इसने पुलिस की गाड़ी में ही महिला की आबरू लूट ली। यह कोई पहेली नहीं, बल्कि अपने को मित्र पुलिस कहने वाली उत्तराखंड पुलिस का एक चेहरा है।

सोमवार रात को जिम्मेदार पद पर तैनात वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर ने एक ऐसी घटना को अंजाम दिया है, जिससे रुद्रप्रयाग जिले में ही नहीं, अपितु पूरे राज्य में पुलिस के नाम पर बट्टा लग गया है। घटना से पूरा पुलिस महकमा शर्मशार है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने एक महिला की आबरू पुलिस की ही गाड़ी में लूट ली।

जिले में अब तक पुलिस द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार करने के दो मामले प्रकाश में आए हैं, जिसमें एक तिलबाड़ा में ट्रैफिक व्यवस्था के लिए तैनात पुलिस कांस्टेबल विनोद सहारनपुर निवासी का नाम आया था। दूसरा मामला मंगलवार को जिले में प्रकाश में आया है।

 हालांकि दोनो मामलों में पुलिस अधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जरूर आरोपी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई कर जेल भेजा है, लेकिन सवाल इस बात का है कि जिन पुलिस वालों पर कानून व्यवस्था का जिम्मा है, यदि वह ही ऐसे घृणित कार्यो को अंजाम देंगे, तो जनता में मित्र पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने लाजमी हैं। जिले में पुलिस अपने चेहरे पर लगे इन दाग को धोने का जितना भी प्रयास करे, लेकिन यह आसानी से मिटने वाले नहीं हैं।

पुलिस की ओर से हुई बलात्कार की घटनाएं

वर्ष 2005, आरोपी पुलिस कांटेबल

वर्ष 2011, आरोपी, पुलिस इंस्पेक्टर

पिछले दस वर्षो में बलात्कार के कुल मामले-पांच

महिला उत्पीड़न के प्रति वर्ष दर्ज मामले-लगभग दो दर्जन

क्या कहते हैं अधिकारी

पुलिस पर लगा यह दाग काफी गहरा है, इससे पूरा पुलिस विभाग शर्मिदा है। यदि पुलिस ही बलात्कार जैसे घृणित कार्य करेगी, जो जनता के बीच पुलिस का विश्वास ही उठ जाएगा।

अनंतराम चौहान

एसपी, रुद्रप्रयाग।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_8076300.html

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उत्तराखंड में करोड़ों की वन भूमि की हेराफेरी!
 
 
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटेे ऋषिकेश में वन भूमि से जुड़ा एक बड़ा कथित घोटाला उजागर हुआ है। इसकी उच्चस्तरीय जांच की सिफारिश की गई है। अनुमान है कि इस मामले में करोड़ों रुपये की जमीन की हेराफेरी की गई है।

राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने राज्य सरकार को दिए एक अहम निर्देश में कहा है कि ऋषिकेश क्षेत्र के दुधुपानी गुमानीवाला से सटी वन गुर्जरों को पशुपालन के लिए दी गई वन भूमि को बाहर के लोगों को अवैध रूप से स्थानांतरित कर दिया गया। प्राधिकरण के अनुसार राज्य के कुछ पुलिसकर्मियों, वनकर्मियों और भूमाफियाओं की मिलीभगत से अवैध तरीके से कब्जा कर लिया गया और वहां बडे़-बडे़ भवन भी बना लिए गए। इसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश शंभूनाथ श्रीवास्तव ने पिछले दिनों दिए अपने निर्देश में कहा कि इस सिलसिले में लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाही, तो उनकी शिकायत दर्ज नहीं की गई और उल्टे शिकायतकर्ताओं को ही प्रताडि़त किया गया। उन्होंने कहा है कि वन भूमि को अवैध रूप से खरीदने वाले भू माफियाओं, बिल्डर्स और वन भूमि को बेचने वालों के खिलाफ न तो प्राथमिक सूचना दर्ज की गई और न ही कोई कार्रवाई की गई। प्राधिकरण ने ऋषिकेश निवासी सत्य प्रसाद नौटियाल बनाम पुलिस अधिकारी चंद्र सिंह नेगी मामले की जांच करने के बाद अपने महत्वपूर्ण निर्देश में कहा कि शिकायतकर्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों से यह साबित होता है कि वन विभाग और पुलिस अधिकारियों को जंगल की जमीन की सुरक्षा के लिए कई आवेदन दिए गए थे, लेकिन उन आवेदनों की अनदेखी कर दी गई।

श्रीवास्तव ने कहा कि गुमानीवाला क्षेत्र से कोई भी सड़क जंगल को नहीं जाती थी और वहां एक पगडंडी थी जो जंगल के पास जाकर पूरी तरह से बंद हो जाती थी, लेकिन पुलिस ने दबंगई से उस बंद पगडंडी को न सिर्फ खुलवा दिया, बल्कि भूमाफियाओं को दस फीट चौड़ा रास्ता भी दिलवा दिया, ताकि जंगल की जमीन पर अवैध रूप से काबिज भूमाफियाओं को सहूलियत से शहर की ओर आने जाने का रास्ता मिल जाए।

 
Source - Navbharattimes.
 
 

Devbhoomi,Uttarakhand

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एक दीवार ही खा गई डेढ़ करोड़
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  पौड़ी गढ़वाल, : जहां अब तक तय समयावधि के अनुसार बस अड्डे का निर्माण कार्य पूरा हो जाना चाहिए था, वहां अब तक नींव भी नहीं पड़ी है। निर्माण के नाम पर सिर्फ एक दीवार ही खड़ी हो पाई है और वह भी लगभग डेढ़ करोड़ में। उससे भी बड़ा सवाल जो उठ रहा है वह यह है कि जब डिजाइन में दीवार शामिल ही नहीं थी तो बगैर डिजाइन के लोनिवि ने 1 करोड़ 44 लाख रुपए खर्च कैसे किए। लोनिवि ने अब अपनी खीझ मिटाने को ठेकेदार को नोटिस जारी किया है।

टेंडर आमंत्रण के बाद लोक निर्माण विभाग ने गत सितंबर माह में बस अड्डे का जिम्मा एक ठेकेदार को सौंपा। अनुबंध के अनुसार अगस्त में तीन मंजिला बस अड्डे का निर्माण पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन अभी तक कार्यदायी संस्था सिर्फ एक आरसीसी दीवार ही खड़ी कर पाई है और वह भी 1 करोड़ 44 लाख में।


दीवार पर मोटी धनराशि खर्च करने के बाद अब लोनिवि के पास स्वीकृत धनराशि में से 56 लाख रुपए शेष हैं शेष धनराशि भी अभी शासन से पालिका को उपलब्ध नहीं करवाई गई। विभाग ने ठेकेदार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि समयावधि समाप्त होने के बाद भी बस अड्डे की अभी तक नींव भी नहीं पड़ी है। ठेकेदार के खिलाफ विभाग ने कार्यवाही शुरू कर दी है।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6262474.html

Sandeepnhpc

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सतर्कता विभाग को kayviat के निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई करने से कौन रोक रहा है.

जब सारी भुगतान कंपनी के अकाउंट में गयी. कंपनी के निर्देशकों के क्यों नहीं पकड़ा जा रहा . क्योंकि उनके बड़े राजनितिक नेताओं से संपर्क हैं या उनके पास पैसे देने की ज्यादा पॉवर है .

अनिमेष सिन्हा जो nhpc (कर्मचारी संख्या 102275k) में रहते हुए कंपनी चला रहा था, सतर्कता विभाग की नजर में बिलकुल बेक़सूर है और कंपनी के कर्मचारी गुनाहगार है .

एक इमानदार आदमी को पकड़ कर बंद कर दो और गुनाहगार को आराम से रहने के लिए छोड़ दो, यह कहाँ का न्याय है .

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड में करोड़ों की वन भूमि की हेराफेरी

भाषा ॥ देहरादून

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटेे ऋषिकेश में वन भूमि से जुड़ा एक बड़ा कथित घोटाला उजागर हुआ है। इसकी उच्चस्तरीय जांच की सिफारिश की गई है। अनुमान है कि इस मामले में करोड़ों रुपये की जमीन की हेराफेरी की गई है।

राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने राज्य सरकार को दिए एक अहम निर्देश में कहा है कि ऋषिकेश क्षेत्र के दुधुपानी गुमानीवाला से सटी वन गुर्जरों को पशुपालन के लिए दी गई वन भूमि को बाहर के लोगों को अवैध रूप से स्थानांतरित कर दिया गया। प्राधिकरण के अनुसार राज्य के कुछ पुलिसकर्मियों, वनकर्मियों और भूमाफियाओं की मिलीभगत से अवैध तरीके से कब्जा कर लिया गया और वहां बडे़-बडे़ भवन भी बना लिए गए। इसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश शंभूनाथ श्रीवास्तव ने पिछले दिनों दिए अपने निर्देश में कहा कि इस सिलसिले में लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाही, तो उनकी शिकायत दर्ज नहीं की गई और उल्टे शिकायतकर्ताओं को ही प्रताडि़त किया गया। उन्होंने कहा है कि वन भूमि को अवैध रूप से खरीदने वाले भू माफियाओं, बिल्डर्स और वन भूमि को बेचने वालों के खिलाफ न तो प्राथमिक सूचना दर्ज की गई और न ही कोई कार्रवाई की गई। प्राधिकरण ने ऋषिकेश निवासी सत्य प्रसाद नौटियाल बनाम पुलिस अधिकारी चंद्र सिंह नेगी मामले की जांच करने के बाद अपने महत्वपूर्ण निर्देश में कहा कि शिकायतकर्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों से यह साबित होता है कि वन विभाग और पुलिस अधिकारियों को जंगल की जमीन की सुरक्षा के लिए कई आवेदन दिए गए थे, लेकिन उन आवेदनों की अनदेखी कर दी गई।

श्रीवास्तव ने कहा कि गुमानीवाला क्षेत्र से कोई भी सड़क जंगल को नहीं जाती थी और वहां एक पगडंडी थी जो जंगल के पास जाकर पूरी तरह से बंद हो जाती थी, लेकिन पुलिस ने दबंगई से उस बंद पगडंडी को न सिर्फ खुलवा दिया, बल्कि भूमाफियाओं को दस फीट चौड़ा रास्ता भी दिलवा दिया, ताकि जंगल की जमीन पर अवैध रूप से काबिज भूमाफियाओं को सहूलियत से शहर की ओर आने जाने का रास्ता मिल जाए।

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9520155.cms#write

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240 में से खर्च हुये मात्र 67 लाख

पिथौरागढ़: जिले का विकास विभाग विधायक निधि के तहत मिली धनराशि को खर्च करने में ढीला साबित हो रहा है। जिले को विधायक निधि के तहत मिले 240 लाख रुपये में से मात्र 67 लाख रुपये की धनराशि ही खर्च हो सकी है। ग्राम्य विकास विभाग के प्रमुख सचिव ने धनराशि खर्च करने में तेजी लाने के निर्देश दिये हैं। प्रमुख सचिव राजीव गुप्ता ने शुक्रवार को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये विकास कार्यो की समीक्षा की। समीक्षा में विधायक निधि के धन को खर्च करने में ढीला रवैया अपनाने की बात सामने आई। प्रमुख सचिव ने मार्च  2012 तक हर हाल में शत-प्रतिशत धनराशि खर्च करने के निर्देश अधिकारियों को दिये। बैठक में प्रमुख सचिव ने 15 अक्टूबर तक सभी किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड वितरित करने के निर्देश देते हुए कहा कि इसके लिए 19 सितम्बर से विशेष अभियान चलाया जाये। इसके लिए विशेष टीमें गठित की जाएं और बैंकों में विशेष शिविर लगाए जाएं। उन्होंने कहा कि इस अभियान के बाद कोई भी किसान क्रेडिट कार्ड से वंचित नहीं रहना चाहिए। जिलाधिकारी डा. एमसी जोशी ने बताया कि जिले में 46000 किसान क्रेडिट कार्ड बनाये जाने हैं। इसके लिए आठ टीमों का गठन किया जा रहा है।



http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_8221525.html

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उत्तराखंड पावर कारपोरेशन का एक और घोटाला, मीटर के बाद ट्रांसफार्मर खरीद का खेल !
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देहरादून. मीटर घोटाले में पहले से ही कठघरे में खड़े उत्तराखंड पावर कारपोरेशन पर अब ट्रांसफार्मरों की खरीद को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि ऊर्जा निगम ने करीब डेढ़ वर्ष पहले जिन चार कंपनियों से 25 केवी के 2200 ट्रांसफार्मर खरीदे, उनमें से तीन के ट्रांसफार्मरों के सैंपल इलेक्ट्रॉनिक रिसर्च एंड डेवलपमेंट एजेंसी (ईआरडीए) बड़ौदा की जांच में फेल हो गए।
 
हालांकि निगम अधिकारी सैंपल फेल होने की पुष्टि करने से बच रहे हैं, लेकिन निगम के प्रबंध निदेशक का कहना है कि ईआरडीए की रिपोर्ट स्पष्ट नहीं है। गौरतलब है कि ट्रांसफार्मरों की किल्लत से जूझ रहे ऊर्जा निगम ने करीब डेढ़ साल पहले चार कंपनियों से 25 केवी क्षमता के 2200 ट्रांसफार्मरों की खरीद की। खरीद के बाद चारों कंपनियों के ट्रांसफार्मरों के सैंपल जांच के लिए राष्ट्रीयकृत टेस्टिंग एजेंसी ईआरडीए बड़ौदा भेजे गये। ईआरडीए अपनी जांच रिपोर्ट मंगलवार को ऊर्जा निगम को भेज चुका है, जिसके बाद से निगम अफसरों में खलबली मची है।

सूत्रों बताते हैं कि ईआरडीए की जांच में तीन कंपनियों के सैंपल निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरे। खास बात यह है कि 2200 में से 1700 ट्रांसफार्मर अकेले इन्हीं तीनों कंपनियों से खरीद गए हैं। साथ ही, इन तीन कंपनियों से हुई खरीद के जिस लॉट से सैंपल के रूप में ट्रांसफार्मर टेस्ट के लिए बड़ौदा भेजे गए, उस लॉट के बाकी ट्रांसफार्मर (सौ से ज्यादा) निगम विद्युत लाइनों पर स्थापित कर चुका है।

यानी, पहले तो बगैर टेस्टिंग के बड़ी मात्रा में ट्रांसफार्मरों की खरीद की गई। खरीद के बाद सैंपल जांच के लिए भेजे, तो नियमों को ताक पर रख जांच रिपोर्ट आने से पहले ही ट्रांसफार्मर इंस्टॉल भी कर दिए गए। बहरहाल, इस मामले में ऊर्जा निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है।

सूत्रों की मानें, तो 1700 ट्रांसफार्मरों की इस खरीद में करोड़ों रुपये का घोटाला सामने आ सकता है। 35 हजार रुपये प्रति ट्रांसफार्मर के हिसाब से इसमें करीब पांच पांच करोड़ के हेरफेर की आशंका जताई जा रही है।




http://bhadas4uttarakhand.com/news/1002-2011-09-15-09-46-46.html

 

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