Author Topic: THE UTTARAKHAND LOKAYUKTA BILL, 2011 [UTTARAKHAND BILL NO. OF 2011]  (Read 4890 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: THE UTTARAKHAND LOKAYUKTA BILL, 2011 [UTTARAKHAND BILL NO. OF 2011]
« Reply #10 on: November 18, 2011, 01:06:33 PM »
पाठको की राय
टीम अन्ना से चूकीं खामियां
1
M S Mehta(एम एस मेहता (मेरापहाड़ फोरम नेट वर्क)),Noida,का कहना है:मैने इस बिल को काई बार पड़ा! मेरे भी समझ मे न आयी आया आँखिर टीम अन्ना ने बिना बिल को पडे इसकी तारीफ करना शुरू क्यू कर दी!  अगर मुख्यमंत्री ही इस कमेटी का मुख्या होगा और लोकायुक्त के सदस्य उन्ही के अनुमति से बनाए जयांगे तो हो गया भ्रष्टाचार ख्तम!  मेरे पास देहरादून से कुछ पत्रकारो मित्रो के फ़ोन आए थे उन्होने सीधे इस बकवास और आँखो मे धूल झोकने वाला कहा था! इसका विरोध होना ज़रूरी है इसीसे पहले यह लागू हो! एम एस मेहता (मेरापहाड़ फोरम नेट वर्क) 
18 Nov 2011, 1055 hrs IST

AMIT KUMAR,DELHI,का कहना है:anna ji par rajneetee bhaut ho rahi hai apni sarkar ko kuch kam to hai nahi kuch acccha ho raa hai to sarkaar ko hajm nahi ho  raha
18 Nov 2011, 1031 hrs IST

kamal chouhan,uttarakhand,का कहना है:ये अन्ना और उनकी टीम पूरी तरह फर्जी टीम है और अब धीरे-धीरे भाजपा की बी टीम बन रही है।
17 Nov 2011, 1707 hrs IST

sincere citizen,mumbai,का कहना है:क़ानून बनाकर भ्रष्टाचार पर रोक लगाना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन है. यह बात धीरे धीरे स्पष्ट होती जा रही है. क़ानून के जानकारों के  लिए  क़ानून का तोड़ निकाल लेना कोई बड़ी बात नहीं. nullnull nullnull null null null nullnull.
17 Nov 2011, 1255 hrs IST

YOGENDRA,VAISHALI,का कहना है:स्पस्ट है की टीम अन्ना को सिर्फ़ कांग्रेस  का विरोध करना है. भाजपा के लोकपाल में तो कोईगालत बात हो ही नहीं सकती अन्ना हज़ारे जिंदाबाद.
17 Nov 2011, 1237 hrs IST

sunil,new delhi,का कहना है:टीम अन्ना को इसके बारे मे सोचना होगा की उत्तराखंड का लोकायुक्ात बिल सही है या नही
17 Nov 2011, 1227 hrs IST

http://navbharattimes.indiatimes.com/usrmailcomment.cms?msid=10756510&usrmail=msmehta@merapahad.com&mailon_commented=1

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: THE UTTARAKHAND LOKAYUKTA BILL, 2011 [UTTARAKHAND BILL NO. OF 2011]
« Reply #11 on: November 30, 2011, 01:02:57 PM »

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Praveen Kumar Bhatt दैनिक नई दुनिया के ३० नवम्बर के अंक में संपादकीय पेज पर छपा है यह अग्रलेख.......... संभव हो तो पढिये और प्रतिक्रिया भी दीजिये ..


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम का भविष्य अधर में

देहरादून।। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम को मंजूरी दे दिए जाने के बावजूद उसका भविष्य अधर में लटकता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड में पिछले वर्ष मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के बाद से ही लोकायुक्त अधिनियम के कई प्रावधानों पर अपनी आपत्ति जताते रहे, विजय बहुगुणा ने इस बात के साफ संकेत दिए हैं कि पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ यह अधिनियम शायद ही अपने मूल रूप में लागू हो पाए।

बहुगुणा ने हालांकि इसके बारे में अंतिम फैसला राज्य कैबिनेट की सात नवंबर की प्रस्तावित बैठक में होने की बात कही है लेकिन साथ ही यह भी कहा कि सरकार के पास इस संबंध में सभी विकल्प खुले हैं। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम में संशोधन किया जा सकता है या उसे निरस्त कर नया विधेयक भी लाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस अधिनियम में कई प्रावधान असंवैधानिक है जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता। इस बाबत उन्होंने कहा कि निचली न्यायपालिका को लोकायुक्त के दायरे में लाना असंवैधानिक है। सरकार के इस रुख से सकते में आई मुख्य विपक्षी बीजेपी ने अधिनियम को उसी रूप में लागू करने पर जोर देते हुए प्रदेश की कांग्रेस सरकार को लोकायुक्त पर राष्ट्रपति से मंजूरी मिल जाने की बात जनता से छुपाने का दोषी ठहराया है और मामले की जांच की मांग की है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति ने इस विधेयक पर गत चार सितंबर को ही अपने हस्ताक्षर कर दिए थे और नौ सितंबर को यह उत्तराखंड के विधायी विभाग को मिल भी गया था। यह सूचना,हालांकि,विधायी विभाग के सामने अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में ही आ पायी।

अपनी सरकार के कार्यकाल में लोकायुक्त विधेयक लाने और उसे पारित कराने वाले पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने इस संबंध में कहा कि भ्रष्टाचार जैसे दानव पर काबू पाने के लिए इतना सशक्त कानून किसी और राज्य में नहीं बना है और यह पूरे देश के लिए एक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि इसके कड़े प्रावधानों की वजह से लोग भ्रष्टाचार करने से डरेंगे और इनमें कुछ भी संशोधन करना उचित नहीं होगा। खंडूरी ने राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने संबंधी सूचना को छिपाने को काफी गंभीर बात बताया और कहा कि मामले की जांच की जानी चाहिए। गौरतलब है कि करीब दो साल पहले मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी शुरू करते ही वरिष्ठ बीजेपी नेता खंडूरी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त लोकायुक्त लाने का वायदा किया था और उसी के तहत राज्य विधानसभा में उस समय यह विधेयक पेश किया था। एक नवंबर, 2011 को विधानसभा में पारित इस विधेयक को तत्कालीन राज्यपाल माग्रेट आल्वा ने तुरंत सहमति देते हुए उसे राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी के भेज दिया था क्योंकि यह विषय समवर्ती सूची में आता है। सशक्त लोकायुक्त विधेयक पारित कराने के लिए तत्कालीन खंडूरी सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे से भी खासी तारीफ बटोरी थी।

इस लोकायुक्त अधिनियम में सभी सरकारी और अर्ध सरकारी अधिकारियों तथा निचली न्यायपालिका के अलावा मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और लोकसेवकों को भी लोकायुक्त के दायरे में रखा गया है। भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए लोकायुक्त को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा गया है। भ्रष्ट व्यक्तियों को पद से बर्खास्त किए जाने या उन्हें पदावनत किए जाने जैसी लोकायुक्त की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी। इस अधिनियम में भ्रष्टाचार के मामलों की जल्द जांच के लिए विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान है जहां जांच पूरी होने के बाद मामला दायर किया जाएगा। जांच के लिए 12 महीने की समयावधि निश्चित की गई है।

भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में दोषी पाए जाने पर छह माह से कम के सश्रम कारावास की सजा नहीं होगी जबकि यह अवधि 10 वर्ष की कैद तक हो सकती है। भ्रष्टाचार के दुर्लभ श्रेणी के मामलों में यह सजा उम्रकैद भी हो सकती है। इस लोकायुक्त अधिनियम में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा का भी प्रावधान है और इस संबंध में लोकायुक्त को सरकारी तंत्र के अंदर या बाहर रहकर भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायतें देने और सबूत लाने वाले व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने के लिए उचित इनाम योजना तैयार करने की भी शक्ति दी गयी है।
(Navbharat times).

 

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