Author Topic: Uttarakhand got 6800 Cr Annual Plan Frm Planning Commission-But where it goes ?  (Read 5073 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Charu Da. has made a very good report on this and given facts..

Special Report by Charu Tiwari Ji

धन्य हैं निशंकजी! इस बार ज्यादा ठग लाये


योजना   आयोग ने उत्तराखण्ड की वर्ष 2010-11 के लिये 6800 करोड़ की मंजूरी दी है।   यह राशि पिछले वर्ष की तुलना में 1225.50 करोड़ रुपये अधिक है। इस परिव्यय   का 33.18 प्रतिशत भाग सामाजिक सेवाओं एवं समाज कल्याण के लिये, 29.16   प्रतिशत भौतिक संरचना, 23.12 प्रतिशत सामान्य सेवाओं, 7.5 प्रतिशत कृषि एवं   संबद्ध क्षेत्रों और 7.33 प्रतिशत गzामीण विकास के लिये रखा गया है। योजना   आयोग राज्यों के लिये प्रतिवर्ष इन परिव्ययों की घोषणा करता है। राज्य के   मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने इस योजना के लिये 360 करोड़ रुपये की अतिरिक्त   सहायता की मांग की थी। उन्होंने केन्दzीय सहायता प्राप्त योजनाओं के लिये   90 और 10 के अनुपात में केन्दzीय सहायता का आगzह किया। मुख्यमंत्री ने   राज्य को गzीन बोनस के तौर पर पांच हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त देने की मांग   भी की। इसके अलावा विशेष औद्योगिक पैकेज को 2020 तक बढ़ाने की जरूरत और   पेयजल पंपिंंग योजनाओं के लिये 500 करोड़ रुपये की विशेष केन्दzीय सहायता   अलग से दिये जाने का अनुरोध किया। फिलहाल योजना आयोग ने इस वर्ष के परिव्यय   के लिये 1225.50 करोड़ की स्वीकृति दे दी। लगे हाथ भाजपा के नेताओं ने हवाई   अड~डे पर ज्यादा पैसा लाने पर अपने मुख्यमंत्री का स्वागत भी कर डाला। यह   हमेशा होता आया है, क्योंकि पार्टी के लोगों को न योजना के आकार के बढ़ने के   बारे में कोई तकनीकी जानकारी होती है और न विकास पर खर्च होने पैसे के   बारे में समझ। वे प्रतिवर्ष बढ़ने वाले योजना परिव्यय को अपने नेताओं की   उपलब्धि मान लेते हैंं। राज्य बनने बाद योजनागत परिव्यय का आकार बढ़ता रहा   है। अविभाजित उत्तर प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्रों के लिये यह 650 करोड़   रुपये था। राज्य बनने के बाद यह राशि 1000 करोड़ से लेकर 6800 करोड़ तक बढ़   चुकी है।
 प्रतिवर्ष योजनाओं के आंकड़ों का खेल उत्तराखण्ड सरकार के लिये   सुरक्षा कवच का काम करते हैं, इससे सरकार को अपनी विफलताओं को आंकड़ों में   उलझाने का मौका मिल जाता है। यह जनविरोधी सरकारों के लिये बहुत जरूरी होता   है। राज्यों के लिये योजना आयोग से मंजूर की जाने वाली योजना राशि सरकारी   व्यवस्था की एक सामान्य प्रकिzया है। राज्य के विकास एव मूलभूत जरूरतों के   लिये दी जाने वाली इस राशि में थोड़ा ‘बाग्zिनिंग’ और राजनीतिक ‘एप्रोज से   बढ़ाया जा सकता है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्राी नारायण दत्त तिवारी को महारथ   हासिल था। वे उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्राी, केन्दz में मंत्राी और   योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके थे। जब तक वे मुख्यमंत्राी रहे योजना का   आकार बढ़ता गया। इसी घौंस के चलते कई बार उनके समर्थक उन्हें योग्य और बड़ा   नेता मानने की गलतफहमियां पालते रहे। ऐसा ही अक मौजूदा मुख्यमंखी निशंक के   समर्थक समझ रहे हैं। दरअसल ऐसा होता नहीं है कि किसी तिवारी या निशंक की   चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर केन्दz अपनी थैली का मुह खोल दे, लेकिन जब योजना   राशि मंजूरी का समय आता है तो सत्तारूढ़ सरकारें और उनकी पार्टी इसे अपन   उपलब्ध्यिों के रूप में शामिल कर लेती हैं।
 राज्य के पक्ष और विपक्ष के   नेता राज्य बनने के बाद लगातार विशेष पैकेज की बात करते रहे हैं। उनकी इस   मांग से लगता है कि पैकेज मिलते ही पहाड़ के विकास का नक्शा बदल जायेगा और   यहां की सारी समस्यायें खुद-ब-खुद हल हो जायेंगी। इन नौ सालों में   भाजपा-कांगेस की बारी-बारी से सरकारें आया हैं। अब तो भाजपा के साथ वह   क्षेत्राीय राजनीतिक पार्टी उकzांद भी है जो अपने संसाधनों से ही राज्य का   नक्शा बदलने का दम भरती थी। कई योग्य मुख्यमंत्राी आये। विशेषकर नारायण   दत्त तिवारी और निशंक को तो प्रचार भी खूब मिलता है कि अगर वे नहीं हाते तो   पहाड़ भी नहीं होता। इन दोनों के समय में योजना के आकार में भारी वृद्धि   हुयी है, लेकिन विकास का पहिया वहीं रुका है जहां से बात शुरू हुयी थी।   योजना आयोग से अधिक पैसा मिलना विकास की गारंटी नहीं होती। विकास   प्राथमिकतायें और संसाधनों के सही उपयोग पर निर्भर करता है। दुर्भाग्य से   उत्तराखण्ड में विकास की प्राथमिकतायें पहले तो तय नहीं है, यदि हैं भी तो   उसके सही उपयोग और कार्य संस्कृति के अभाव में वह एक वर्ग विशेष की पोषक बन   गयी हैं।
 इस योजना पर व्यय होने वाली राशि का भी वही होना है जो पिछली   योजना राशियों का हुआ। इस याजना में भी वही घिसी-पिटी और थका देने वाली   योजनाओं पर जोर दिया गया है, जिससे न तो जनता को प्रत्यक्ष रूप से कोई लाभ   मिल पाता है और न विकास का कोई चमत्कार।  हां यह योजनायें सरकारी आंकड़ों मे   वृद्धि अवश्य करते हैं। इन योजनाओं के नाम पर जो बंदरबांट और विकास का   दिवास्वप्न जनता को दिखाया जाता रहा है, उससे जनता पहले ही त्रस्त है।   राज्य बनने के बाद से उर्जा प्रदेश का राग अलापने वाली सरकारें अभी तक   गांवों में बिजली नहीं पहुंचा पायी है। जहां पहुंची भी है तो वहां घंटों की   कटौती ने परेशान किया है। असल में जिस तरह स्वयंसेवी संस्थायें समस्याओं   का हैव्वा खड़ा कर पैसा र्ऐठती हैं वही चरित्र सरकारों का भी है। विकास के   नाम पर ठगी और जनता को गुमराह कर पैसे का अपव्यय।
 राज्य में जहां तक   जनता की मूलभूत समस्याओं के समाधान का सवाल है, इस एक दशक में सरकारों ने   इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी है। सरकारी अस्पतालों की हालत   दिन-प्रति-दिन बिगड़ती जा रही है। उसकी जगह पर एनजीओं को लाभ पहुंचाने के   लिये 108 सेवा शुरू कर स्वास्थ्य के ढ़ाचागत स्वरूप को खत्म कर इसे निजी   हाथो में सौंपने की जमीन तैयार की जा रही है। सरकार निजी चिकित्सालयों और   मेडिकल कालेजों को प्रात्ेत्साहन दे रही है। सुना है कि अब शिक्षा भी   मोबाइल स्कूलों के माध्यम से दी जायेगी। इसका सीधा अर्थ है सरकारी   व्यवस्थाओं को नकारा साबित कर निजी क्षेत्र के लिये रास्ता खोलना।   कल्याणकारी योजनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च इसलिये दिखाया जाता है ताकि एनजीओ   को पोषित किया जाय। राष्टीय समाचार पत्राों में हर वर्ष मुख्यमंत्राी का   योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ भेट और उन्हें गुलदस्ता भेट करना सत्तारूढ़   पार्टियों को भले ही सकून देता हो, लेकिन राज्य में पसरी वित्तीय   अनियमिततायें जनता को मुंह चिढ़ा रही हैं। योजना मदों की प्राथमिकताओं की   बात इसलिये जरूरी है क्योंकि राज्य बनने स पहले भी यहां पर्वतीय विकास मद   से मिलने वाली राशि पर नहीं उसके खर्च करने के तरीके पर असंतोष था। पर्वतीय   विकास मद में मिलने वाले 650 करोड रुपये की जो बंदरबांट होती थी, उससे   पहाड़ का विकास तो नहीं हो पाया नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों की जेबें मजबूत   हुयी। कमोवेश राज्य बनने के इन सालों में भी स्थिति वही है। शुरुआत में   भाजपा की नौसिखया और पूर्वागzही अंतरिम सरकार ने शिशु मंदिरों के पोषण को   विकास मान लिया और बाद में कांगzेस ने विकास का जो नया चरित्र ईजाद किया वह   सबके सामने आया। सुविधाभोगी राजनीति को आगे बढ़ाते हुये राज्य में संसाधनों   की लूट जारी है। निशंक जी धन्य हैं, इस ज्यादा ठग लाये।

सत्यदेव सिंह नेगी

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आधे गांव को बना दिया गरीब
गोपेश्वर (चमोली)। सरकारी मुलाजिम चाहें तो किसी भी नियम-कानून को ताक पर रखा जा सकता है। इसके लिए थोड़ी पहुंच चाहिए। कागजों में ही सही कोई भी व्यक्ति अमीर आसानी से गरीब और गरीब और भी आसानी से अमीर बन सकता है। यदि बीपीएल सुविधाओं को हासिल करने की बात हो तो गांव का गांव बीपीएल बन जाए तो भी हैरानी की बात नहीं। ऐसा ही सनसनीखेज मामला देवाल विकास खण्ड की बानूड़ी ग्राम पंचायत का है यहां गांव के के आधे से अधिक परिवार बीपीएल श्रेणी में दर्ज हैं। हैरानी की बात है कि इन परिवारों के मुखिया अथवा सदस्य या तो सरकारी नौकरी पर हैं या फिर पेंशन पा रहे हैं। इतना ही नहीं अव्वल दर्जे के ठेकेदार भी इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।

ग्राम पंचायत बानूड़ी अन्तर्गत देवस्थली, मल्ला व बसरा तीन तोक स्थित हैं। पूरे गांव में 127 परिवार निवास करते हैं। इस गांव के ग्रामीणों को बीपीएल श्रेणी का लाभ देने के वास्ते सरकार के नियम कानूनों को ताक पर रखा गया है। इसी का नतीजा है कि गांव के परिवारों में से 64 बीपीएल श्रेणी में दर्ज हैं। इन परिवारों में से अधिकांश के मुखिया अथवा सदस्य सरकारी नौकरी में है अथवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सूची में दर्ज मोतीमा देवी के पति कांति बल्लभ दिल्ली नगर निगम में नौकरी करते हैं तो दिनेश चन्द्र पुत्र गोपाल दत्त भी सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। जिला सहकारी समिति मुन्दोली मिनी बैंक के सचिव भोला दत्त पुत्र जयदत्त भी बीपीएल सूची में शामिल हैं। इसी तरह मोहनानन्द पुत्र मंगलानन्द, उर्वी दत्त पुत्र जयदत्त, नारायण दत्त पुत्र दत्तराम और नारायण दत्त पुत्र परशुराम समेत कई पेंशनरों को भी बीपीएल सुविधा का लाभ दिया जा रहा है। आर्मी के सेवानिवृत्त कैप्टन तारादत्त के पुत्र हरीश चन्द्र का अपना वाहन और व्यवसाय है, बावजूद इसके उसका नाम भी सूची में दर्ज है। एक और सेवानिवृत्त कैप्टन केदार दत्त का पुत्र जगदीश प्रसाद दुकान चलाता है। उसे भी बीपीएल श्रेणी में रखा गया है।

Raje Singh Karakoti

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प्रिय मित्रो,
    हमारे राज्य के भ्रष्ट नेताओ को पैसे खाने के लिए पुन: एक अवसर प्राप्त हुआ है I   एक बार फिर से वे अपनी जेबों को देश की जनता की गाड़ी कमाई से भरेंगे !  उनसे इससे अधिक की अपेक्षा रखना मुर्खता होगी  !   
आधे गांव को बना दिया गरीब
गोपेश्वर (चमोली)। सरकारी मुलाजिम चाहें तो किसी भी नियम-कानून को ताक पर रखा जा सकता है। इसके लिए थोड़ी पहुंच चाहिए। कागजों में ही सही कोई भी व्यक्ति अमीर आसानी से गरीब और गरीब और भी आसानी से अमीर बन सकता है। यदि बीपीएल सुविधाओं को हासिल करने की बात हो तो गांव का गांव बीपीएल बन जाए तो भी हैरानी की बात नहीं। ऐसा ही सनसनीखेज मामला देवाल विकास खण्ड की बानूड़ी ग्राम पंचायत का है यहां गांव के के आधे से अधिक परिवार बीपीएल श्रेणी में दर्ज हैं। हैरानी की बात है कि इन परिवारों के मुखिया अथवा सदस्य या तो सरकारी नौकरी पर हैं या फिर पेंशन पा रहे हैं। इतना ही नहीं अव्वल दर्जे के ठेकेदार भी इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।

ग्राम पंचायत बानूड़ी अन्तर्गत देवस्थली, मल्ला व बसरा तीन तोक स्थित हैं। पूरे गांव में 127 परिवार निवास करते हैं। इस गांव के ग्रामीणों को बीपीएल श्रेणी का लाभ देने के वास्ते सरकार के नियम कानूनों को ताक पर रखा गया है। इसी का नतीजा है कि गांव के परिवारों में से 64 बीपीएल श्रेणी में दर्ज हैं। इन परिवारों में से अधिकांश के मुखिया अथवा सदस्य सरकारी नौकरी में है अथवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सूची में दर्ज मोतीमा देवी के पति कांति बल्लभ दिल्ली नगर निगम में नौकरी करते हैं तो दिनेश चन्द्र पुत्र गोपाल दत्त भी सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। जिला सहकारी समिति मुन्दोली मिनी बैंक के सचिव भोला दत्त पुत्र जयदत्त भी बीपीएल सूची में शामिल हैं। इसी तरह मोहनानन्द पुत्र मंगलानन्द, उर्वी दत्त पुत्र जयदत्त, नारायण दत्त पुत्र दत्तराम और नारायण दत्त पुत्र परशुराम समेत कई पेंशनरों को भी बीपीएल सुविधा का लाभ दिया जा रहा है। आर्मी के सेवानिवृत्त कैप्टन तारादत्त के पुत्र हरीश चन्द्र का अपना वाहन और व्यवसाय है, बावजूद इसके उसका नाम भी सूची में दर्ज है। एक और सेवानिवृत्त कैप्टन केदार दत्त का पुत्र जगदीश प्रसाद दुकान चलाता है। उसे भी बीपीएल श्रेणी में रखा गया है।

सत्यदेव सिंह नेगी

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              हस्तांतरित होने से पूर्व ही उड़ी महाविद्यालय की छत          जैंती (अल्मोड़ा): राम सिंह धौनी राजकीय महाविद्यालय का नवनिर्मित भवन विभाग को हस्तांतरित होने से पूर्व ही क्षतिग्रस्त हो गया। इसके प्रशासनिक भवन के दरवाजे टूट गए हैं। साथ ही वाणिज्य संकाय की छत उखड़ गई है। इसके साथ ही इसके चारदीवारी के पीलर धराशायी हो गए हैं। जिसकी शिकायत महाविद्यालय की प्राचार्या डा.कमला चन्याल ने शिक्षा निदेशक व जिलाधिकारी को पत्र प्रेषित कर की है।
14 वर्ष पूर्व खुला राम सिंह धौनी राजकीय महाविद्यालय अभी तक सर्वोदय इंटर कालेज के किराए के भवन में चल रहा है। दो कमरों के इस भवन में बीए, बीकॉम की तीनों कक्षाओं के अलावा प्रधानाचार्य का कार्यालय व प्रशासनिक कार्य बमुश्किल संचालित हो रहा है। यहां अध्ययनरत सैकड़ों छात्र बारी-बारी से एकमात्र कक्ष में पढ़ने को मजबूर हैं। इधर वर्षो पूर्व महाविद्यालय के भवन निर्माण हेतु 2 करोड़ 47 लाख रुपया स्वीकृत हुआ। जिसका निर्माण धामदेव नामक स्थान पर शुरू किया गया। इसका ठेका उत्तर प्रदेश निर्माण निगम को दिया गया। लेकिन विगत 5 वर्षो से निगम जहां आज तक महाविद्यालय में बिजली, पानी की व्यवस्था नहीं करा पाया, वहीं करोड़ों की लागत से भवन घटिया निर्माण के चलते हस्तांतरित होने से पूर्व ही क्षतिग्रस्त हो गया है।
क्षेत्र के अभिभावकों ने शासन-प्रशासन से अतिशीघ्र भवन को ठीक करने की मांग की है। इधर छात्रसंघ अध्यक्ष कृष्णानंद पांडे ने धमकी दी है कि 25 अगस्त से पूर्व यदि महाविद्यालय में बिजली, पानी सहित सभी कमियों, खामियों को दूरस्थ कर भवन को महाविद्यालय को हस्तांतरित नहीं किया गया तो इसके खिलाफ आंदोलन किया जाएगा।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6582345.html

 

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