Author Topic: Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख  (Read 543038 times)

Bhishma Kukreti

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 उत्तराखंड में जीव , जंतु पक्षी मांस आदि आधारित चिकित्सा
Animal based Medicines in Uttarakhand
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -89

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -   89               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--192)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -192

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

     यद्यपि आयुर्वेद वनस्पति आधारित विज्ञानं माना जाता है किन्तु  आयुर्वेद में जैसे चरक संहिता में जीव जंतु आधारित औषधियों का उल्लेख है।  उत्तराखंड में भी जीव -जंतु व पक्षियों के अंगों से औषधि निर्मित होती थीं या कुछ समय पहले तक प्रयोग होती  थीं। वैकल्पिक पारम्परिक औषधि में जीव -जंतु व पक्षियों के कई अंग उपयोग होते हैं
मांश -पालतू या  वनैले जंतुओं का मांश आहार शक्ति वृद्धि व नर शक्ति वृद्धि हेतु प्रयोग होता था /है।  बकरी -भेड़ , सूअर , खरगोश , शाही , सौलु , मुर्गे , हिरण काखड़ जाति , चकोर , तीतर बटेर व अन्य पक्षियों का मांश ताकत बढ़ाने हेतु उपयोग होता है।  मुर्गी के अंडे स्वास्थ्य व विशेष बीमारियों में उपयोग होते हैं।
शहद - मधुमखियों से निकला शहद  का विशेष अवयव है। 
 चिड़ियों  का बीट - कई औषधियों में चिड़िया बीट प्रयोग होता है /था
सींग -हिरण के सींग कई औषधियों में उपयोग होता था अन्य जंतुओं के सींग , खुर व हड्डियां भी औषधि निर्माण में उपयोग होती थीं।
 हड्डी का रस - बूढ़ों को बकरी की हड्डियों के रस पीने की हिदायत तो वैद्य  आज भी देते हैं।
हिरण की नाभि से भी औषधि तैयार की जाती थी।
नर हाथी के नर जननांग भी नर शक्ति वृद्धि हेतु उपयोग होते थे। कई जन्तुओं की वसा से तेल घाव आदि में उपयोग होते थे .
गौ मूत्र का भी उपयोग औषधि में होता है।
मस्वड़ पक्षी के रक्त  उपयोग बयळ (कान से पानी या पीप बहना ) ठीक करने में उपयोग होता था।
टीका तो घोड़ों में इंजेक्शन से निर्मित होता है
जोहार पिथौरागढ़ के भोटिया समाज में निम्न जीव जंतुओं का उपयोग कई बीमारियों में होता था**) -
जंतु -------अंग या विधि ----------------- व्याधि  उपचार में उपयोग
खरगोश ----रक्त ------ -------------------स्वास
मेंढक - ---सम्पूर्ण ---तेल में पके पदार्थ का जले घाव
बिच्छू ------सम्पूर्ण को तेल में पकाकर ------बबासीर
बिच्छू भष्म ----------------------  -------   घाव
घरेलू छिपकली ------तिल तेल में उबालकर ---एक्जिमा
जंगली छिपकली ---तेल में उबालना ------उस तेल से मवेशियों के घाव
मछली ------------रक्त ----------- घाव
कनखजूरा ------जलाकर धुंवा --------बबासीर
खटमल -----तुलसी रस में कूटकर  ----संयुक्त रस रिंगवर्म कृमिनाश
सांप -------मांश -------------- आँख , नजर वृद्धि , मूत्र व्याधि आदि
भराल -------सींग घोटकर --------पेस्ट ---पेट दर्द या बुखार
 बाग़ ---------------- मांश -----------     शक्ति
बाग़ बाल ----------  जलाकर  भूसी ------- पैर व मुंह व्याधि , तेल के साथ मालिस
गधे /घोड़े -------मांश ---------------- शक्ति , नर शक्ति
हिरण ----------- मांश -------------- उपरोक्त
 सूअर ---------  मांश  -------------     उपरोक्त
चूहा -----------    मांश --------          वीर्य वृद्धि व शक्ति
चीर व उल्लू --------- मांश ------------- शक्ति वीर्य वृद्धि
केकड़ा ------------   मांश ---------------   शक्ति , ऊर्जा व रक्त व्याधि
काला कबूतर -------- मांश -----------     लकवा
खरगोश -----------     मांश  ---------------माहवारी सुधार
   

सियार --------मांश ( लकवा , गठिया ) (रक्त स्वास व्याधि )

शाही ------- अंतड़ी मांश (बच्चों को पेट व्याधि व स्वास रोग )

बिल्ली ----------- बगैर चमड़ी के उबालते हैं व रस्से से गठिया व्याधि उपचार

मार्टेन चिड़िया ---------------हड्डी लुगदी -----------घाव भरान

कस्तुरी मृग की कस्तुरी के कई औषधीय उपयोग

कई पक्षियों के पीले जर्दे को सर आदि पर मला जाता है जो कई व्याधियों के उपचार में पयोग होता है
(** चंद्र सिंह नेगी और वीरेंद्र सिंह पयाल के 2007 में  प्रकाशित खोजपूर्ण लेख से साभार )
   
 

Copyright @ Bhishma Kukreti  /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - **   ** चंद्र सिंह नेगी और वीरेंद्र सिंह पयाल के 2007 , Traditional uses of Animal Products in medicines by Shoka Tribes Pithoragarh, Uttarakhand , India , Ethno Medicines, 1 (1), 47-53 
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  Animal Based Medicines& Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;  Animal Based Medicines&  Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;    Animal Based Medicines& Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Animal Based Medicines&  Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;  Animal Based Medicines&  Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia; Animal Based Medicines&  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;  Animal Based Medicines&  Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;  Animal Based Medicines&  Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; Animal Based Medicines&  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; Animal Based Medicines&    Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड में पारम्परिक अभ्यंग /मालिश  चिकित्सा
   
 Massage Therapy in Uttarakhand (History Aspects)

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- ) 89

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  89

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  89           

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--192)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -192

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

 
  मालिश  प्रयोग मानव सभ्यता में बहुत प्राचीन युग से होता आया है।  मिश्र में प्रागैतिहासिक अवशेषों में मालिश चिकित्सा के 2500 BCE  के अवशेष मिले हैं। चीन में भी मालिश चिकित्सा प्रयोग का उल्लेख 2700  वर्ष पुरानी  पुस्तक 'आंतरिक या वैकल्पिक चिकत्सा /औषधि ' (1949 में अंग्रेजी में प्रकाशित ) मिलता है। किन्तु मालिश से वैज्ञानिक  ढंग से चिकित्सा प्रयोग का श्रेय हिन्दुओं के आयुर्वेद को ही जाता है मालिश चिकित्सा में इसे अभ्यंग  कहते हैं चरक संहिता में सर्वांग अभ्यंग  का उल्लेख हुआ है। वाग्भट्ट के अष्टांग हृदयम  में उल्लेख है कि यदि सर्वांग अभ्यंग  संभव न हो तो सिर  व पैरों की मालिश करनी चाहिए। भारत से ही अभ्यंग चिकित्सा मिश्र व चीन में प्रचलित हुयी।
    उत्तराखंड में मालिश चिकत्सा हर गाँव में प्रचलित थी और आज भी मालिश चिकित्सा प्रचलित है - मालिश बिना किसी द्रव या द्रव (घी , सरसों , टिल के तेल व औषधि ) की सहायता  से की जाती है या द्रव की सहायता से की जाती है।
   थकावट शान्ति हेतु सर्वांग अभ्यंग या मालिश चिकित्सा - थकावट या अन्य दुःख में सर्वांग या पुरे वदन की मालिश की जाती है।
   शिरो अभ्यंग अथवा सर मालिश - सरदर्द या अन्य स्थिति में सर की तेल मालिश या शुष्क की जाती है। 
  पाद अभ्यंग अथवा पैर मालिश - अति ठंड लगने या बेहोशी की स्थिति में पाद अभ्यंग साधारण बात है।
 मर्मांग अभ्यंग अथवा अंगों की मालिश - गम चोट या चोट लगने की स्थिति में विशेष अंग की मालिश की जाती है।
वात विरोशी अभ्यंग /मातृ अभ्यंग - नई माओं की सर्वांग मालिश की जाती है. कम से कम छह महीनों तक नवी माओं की मालिश की जाती है।
नवजात या शिशु बाल अभ्यंग या नवजात शिशु मालिश - नवजात शिशुओं की लगातार नौ दस महीनों तक या अधिक काल तक मालिश तो हर घर में प्रचलित है।
  हस्त घर्षण अभ्यंग अथवा हाथ रगड़ना - अति ठंड, शरीर अंग सुन्न पड़ने या अन्य दर्द में हाथों को रगड़ा जाता है।
  मुख घर्षण , मुंह की मालिश भी विशेष स्थितियों में की जाती है।
  अंग मर्दन , , अंग विशेष उमेठन या कान -नाक उमेठना - बहुत सी परिस्थितियों में नाक , कान या विशेष अंग को उमेठा जाता है।
    अंग दबाब - बहुत सी स्थितियों में अंगों को दबाया जाता है जैसे अँगुलियों को खींचना या तड़काना।
     कुरचना या दबाना - कईयों को जब खाई बाण होती है तो बच्चों की सहायता से पैरों से शरीर , पैर दबाना (कुरचना )या हाथों से शरीर  पटकाया /दबाया जाता है।
   मोच , नस चढ़ने या लछम्वड़ होने पर मालिश की जाती है।
  लकवा या अन्य स्थिति में मालिश चिकित्सा प्राचीन काल से चली आ रही है।
  उदर अभ्यंग - पेट में मरोड़ या नाळ पड़ने की स्थिति में उदर अभ्यंग किया जाता है। 
 हड्डियों की मालिश या अँगुलियों से  ठक टाना भी आम चिकित्सा प्रचलित है।
 चिकुटी काटना या चुनगी देना भी  का अभ्यंग का अंग माना जा सकता है।  आँखों की मालिश भी एक चिकित्सा ही है
 

       पर्यटकों हेतु अभ्यंग चिकत्सा
    उत्तराखंड में पर्यटकों हेतु उपरोक्त सभी अभ्यंग चिकित्सा सुलभ होती थीं।



Copyright @ Bhishma Kukreti  16 /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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  Massage therapy &Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;  Massage therapy &  Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;    Massage therapy & Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Massage therapy &  Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia; Massage therapy &  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;  Massage therapy &  Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;   Massage therapy & Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;  Massage therapy &  Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;    Massage therapy & Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; Massage therapy &  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; Massage therapy &  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Massage therapy &  Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Massage therapy &  Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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    उत्तराखंड में पारम्परिक उपवास /व्रत चिकित्सा

 Fasting Therapy in Uttarakhand (History aspects)

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -90

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -   90               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--193)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -193

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञCopyright @ Bhishma Kukreti  17 /4 //2018
    व्रत का अर्थ है कसम या सौं।  किसी वस्तु के उपभोग  त्याग को व्रत/उपवास  कहते हैं। उपवास चिकित्सा वास्तव में उत्तराखंड या भारत में सैकड़ों साल से प्रचलित है।  उपवास की सलाह आयुर्वेद व अस्टांग में भी मिलता है उपवास कई प्रकार का होता है। मुख्य उपवास /व्रत भोजन व वाणी व्रत व संसर्ग व्रत होते हैं। उपवास रखने का प्रचलन लगभग सभी धर्मों में प्रचलित है।  यहां  नास्तिक भी उपवास चिकित्सा का अनुमोदन करते हैं।
                   लंगड़ी लेना
  पेट चलने /पेचिस/कब्ज , भूख न लगने आदि स्थिति में वैद लंगड़ी लेने या उपवास रखने की सलाह देते थे।

         विशेष भोजन का उपवास
 
 कई बार चिकित्सक या ज्योतिषी जजमान या बीमार को किसी विशेष भोजन त्याग की सलाह देते हैं जैसे अणभुटा  या तेल विहीन, नमक रहित , मिर्च रहित, दूध रहित आदि भोजन त्यागने की सलाह देते हैं और मरीज अल्प  समय या लम्बे समय तक विशेष भोजन अवयव नहीं खाता है। कई रोगों में दही उपभोग वर्जित है।
   निर्जला व्रत
अधिकतर उपवास में लोग ठोस भोजन की तिलांजलि देकर जल , चाय , दूध , द्रव युक्र भोजन , चीनी गुड़ व कंद मूल , व्रत भोज्य पदार्थ भक्षण कर  लेते हैं किन्तु बहुत से अवसरों पर चिकित्सक व ज्योतिषी निर्जला व बिलकुल पूर्ण व्रत /उपवास की भी सलाह देते हैं। बहुत से लोग विश्वास तहत अथवा किसी भोज्य पदार्थ या धूम्रपान को किसी धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत उपभोग छोड़ देते हैं जैसे बद्रीनाथ यात्रा के बाद किसी भोज्य या पेय /धूम्रपान उपभोग छोड़ देते हैं या माता मृत्यु में दूध सवन छोड़ना , पितृ शोक में नमक सेवन छोड़ना आदि। किसी विशेष वस्तु प्राप्ति हेतु भी कई लोग कोई भोज्य पदार्थ उपभोग बंद कर देते हैं।
   शर्करा बीमार/ रक्त चाप/ स्वास रोग रोगी को कई भोज्य पदार्थ छोड़ने की सलाह चिकित्स्क देते हैं

       पत्नी संसर्ग उपवास
  कई बार पत्नी संसर्ग से दूर रहने का भी प्रचलन था और आज भी है। महाभारत में पाण्डु को पत्नी संसर्ग की सलाह दी गयी थी।
   मौन व्रत
 कई बार धार्मिक या शरीर चिकित्स्क मौन व्रत की भी सलाह देते हैं।  मैं बचपन से ही बहुत बोलता था।  मेरे ताऊ जी मुझे मौन रहने को वाध्य  करते थे।  योग में तो मौन व्रत ही नहीं  अंगों द्वारा संवाद न करने की सलाह है।

        अल्प उपवास
अल्प उपवास एक दिन या दो दिन का रखा जाता है। ऐसे उपवास कुछ अंतराल में रखे जाते हैं जैसे पूर्णमासी व्रत या सप्ताह में एक बार। बेटी की शादी में माता पिता द्वारा उपवास रखना इसी वर्ग में आता है।

    दीर्घ उपवास
 जैन , मुस्लिम धर्मी लम्बे उपवास रखते हैं।  बहुत बार कई उत्तराखंडी  अपने  विशेष कार्य सिद्धि हेतु लम्बे उपवास भी रखते हैं
    विशेष कार्य त्याग

 विशेष स्थिति में रोगी को कोई विशेष कार्य त्याग की भी सलाह दी जाती है। कमर दर्द में बोझ न उठाना इसी वर्ग का उपवास है।
     किसी दअन्य  के घर भोजन न करना
        बहुत बार धार्मिक अनुष्ठान या विश्वास तहत बहुत से लोग अन्य घरों में भोजन नहीं करते हैं या स्वयं भोजन पकाकर ही भोजन उपभोग करते हैं।
  मृत्यु हेतु उपवास
बहुत से वृद्ध मृत्यु हेतु  लम्बा उपवास रखते थे।  यह पद्धति जैन धर्मियों से ली गयी पद्धति है।

  पर्यटकों हेतु उपवास चिकित्सा
समय , स्थान व व्यक्ति अनुसार पर्यटकों हेतु उपवास चिकित्सा उपलब्ध थी।

Copyright @ Bhishma Kukreti 17  /4 //2018
संदर्भ :
1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी

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  Fasting Therapy & Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;    Fasting Therapy &  Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;    Fasting Therapy &  Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;    Fasting Therapy &  Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;     Fasting Therapy & Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;    Fasting Therapy &  Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;      Fasting Therapy & Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;    Fasting Therapy &  Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;     Fasting Therapy & Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Fasting Therapy &  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Fasting Therapy &    Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Fasting Therapy &    Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; पौड़ी गढ़वाल में उत्तराखंड में व्रत चिकित्सा : पारम्परिक चिकित्स; चमोली गढ़वाल में  उत्तराखंड में व्रत चिकित्सा : पारम्परिक चिकित्सा;रुद्रप्रयाग; टिहरी व्रत चिकित्सा।  उत्तरकाशी  गढ़वाल में व्रत चिकित्सा ; देहरादून गढ़वाल में व्रत चिकित्सा , हरिद्वार गढ़वाल में व्रत चिकित्सा , उधम सिंह नगर कुमाऊं में व्रत चिकित्सा , नैनीताल कुमाऊं में व्रत चिकित्सा ; अल्मोड़ा कुमाऊं में व्रत चिकित्सा , पिथौरागढ़ में व्रत चिकित्सा   ,


Bhishma Kukreti

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        पुरुगुप्त और उत्तराधिकारी काल में हरिद्वार  ,  बिजनौर  और  सहारनपुर   इतिहास
Ancient  Purugupta of Gupta Era History of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur
                   
                         
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -214                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

  स्कंदगुप्त के पश्चात पुरुगुप्त वृद्धावस्था में शासन पर बैठा ततपश्चात पुत्र नृसिंह गुप्त व पौत्र कुमारगुप्त शासन पर बैठे. इन सबने लगभग सात आठ वर्ष ही शासन किया।  पुरुगुप्त से कुमारगुप्त काल में गुप्त राज्य का तीब्रतापूर्बक ह्रास हुआ।
 कमजोर शासन में गुप्त परिवार के कई क्षेत्रीय शासक क्षेत्र पर पृथक शासन चलाने लगे।  कई क्षेत्रीय शासकों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर डाला।  स्कंदगुप्त की मृत्यु पश्चात कुछ आश्रित शासकों ने हेफ्ताल नरेश तोरण मल की अधीनता स्वीकार कर ली।
    गुप्त वंश का अंतिम नरेश बुद्धगुप्त ने किसी न किसी प्रकार मगध , मध्यदेश व मालवा पर अधिपत्य जमाने का प्रयत्न  किया।
          सौराष्ट्र , पंचनद व मध्यदेश में संभवतया पुरुगुप्त काल में गुप्त साम्राज्य का अधिपत्य नाममात्र हेतु रह गया था।  बुधगुप्त का साम्राज्य बंगाल व ऐरण मध्यप्रदेश तक सीमित रह गया था। बुधगुप्त की कमजोरी से पुष्यभूति वमुखर वंशजों हेतु मार्ग प्रशस्त हो गया (वासुदेव उपाध्याय , गुप्त साम्राज्य का इतिहास ).
       





Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient  History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;   seohara , Bijnor History Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार  इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  इतिहास ;ससेवहारा  बिजनौर , बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर इतिहास , बेहत सहारनपुर इतिहास , नकुर सहरानपुर इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas


Bhishma Kukreti

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   उत्तराखंड में धूम्रपान चिकित्सा व धूम्र दत्त रक्षा उपाय
 Smoking Therapy in Uttarakhand

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -91

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  - 91               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--194)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -194

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

    उत्तराखंड समेत भारत में धूम्रपान का इतिहास 2000 वर्ष से भी प्राचीन है। धूम्रपान औषधि व व्यसन रूप में उत्तराखंड में अशोक काल से भी पहले प्रचलित था। बाढ़ साहित्य में उल्लेख है कि  हरिद्वार व कोटद्वार भाभर में आये बौद्ध भिक्षु  धूम्रपान हेतु पहाड़ी गाँवों में लालायित रहते थ.
    अष्टांग हृदयम  में बागवभट्ट ने धूमप्रापण चिकित्सा का उल्लेख किया है। 
धूम्रपान के निम्न प्रकार हैं -
१- औषधि रूप  धूम्रपान
२-व्यसन रूप में धूम्रपान
३- धार्मिक   अनुष्ठानों  धूम्रपान
४- शरीर रक्षा हेतु निर्माण
५- कीटाणु भगाने व रक्षा हेतु जीव हत्त्या हेतु  धूम्र निर्माण
        औषधि रूप में धूम्रपान
उत्तराखंड में सत्रहवीं अठारवीं  सदी में  तम्बाकू ने प्रवेश किया और अंग्रेजी शासन में तम्बाकू व  अन्य व्यसनी धूम्रपान   का उपयोग बढ़ा।
    तम्बाकू धूम्रपान से पहले उत्तराखंड में व्यसन रूप में धूम्रपान का चलन ब्रिटिश शासन  सर्वाधिक हुआ और स्वतंत्रता के पश्चात तो बहुत ही अधिक प्रचलन बढ़ा।

    औषधि रूप में कई तरह के पौधों का उपयोग धूम्रपान हेतु होता रहता था व कई क्षेत्रों में आज भी है।
      औषधि धूम्रपान मनोरोग , भ्रान्तिमान स्थिति , अति भौतिक दर्द , उत्तेजना विसर्जन व प्राप्ति , तनाव आदि में प्रयोग होता था जैसे भांग , अफीम , धतूरा व कई अन्य वनस्पतियां।  वैद्य कई स्थानीय वनस्पतियों को जानते थे व वनस्पति के अंगों को पीसकर दुखियारे को धूम्रपान करवाते थे . चूँकि परम्परा थी कि गूढ़ विद्या सामन्य जन को नहीं बतलानी चाहिए तो हमारे पास उन बहुत सी वनस्पतियों का ज्ञान ही नहीं रह गया है जिन्हे वैद्य धूम्रपान चिकित्सा में प्रयोग करते थे। प्र्स्सन्न्ता है कि वनस्पति शास्त्री अब अन्वेषण में लगे हैं
 भट्ट जैसे बीजों  को जलाकर , भूनकर  उसके धूम्र से कफ , सर्दी जुकाम  आदि उपचार होता था।
    बागभट्ट अष्टांग हृदयम  के 21 वे अध्याय में धूम्रपान के निम्न रोगों में लाभ उल्लेख है -
   अ -कफ
ब - डिस्पोनइया सुनवैकल्य या  बोलने में कठिनाई
स - सूंघने, सुनने में कठिनाई
सी -, अश्रु दोष व्  - हिचकी
ध -खुजली या एलर्जी
न - पेट , सरदर्द , अधकपाली , शूल पीड़ा , ठंड से  दर्द , निद्रा , अनिद्रा , ऊर्जाहीनता , पीड़ा आदि आदि

             धूम्रपान यंत्र
मिटटी या धातु की बनी चिलम 

       धूम्रपान बत्ती
अष्टांग हृदयम में धूम्रपान बत्ती निर्माण की कला वर्णन मिलता है। यही विधियां  उत्तराखंड में धूम्रपान औषधि में उपयोग होती आती हैं (श्री स्व किसन दत्त कंडवाल  वैद्यराज , ग्राम ठंठोली, मल्ला ढांगू ,  पौड़ी गढ़वाल के भतीजे से प्राप्त जानकारी अनुसार अष्टांग आधारित वैदकी ठंठोली में प्रचलित थी )

     अंगार
 धूम्रपान हेतु किन किन अंगारों का उपयोग होना चाहिए का वर्णन अष्टांग में है।

  अस्टांग में तीन प्रकार -मृदु ,  मध्य , तीक्ष्ण आदि के प्रकार , कब धूम्रपान वर्जित है , धूम्रपान विधि आदि का सम्पूर्ण उल्लेख है।
   उपरोक्त सभी धूम्रपान औषधि उपयोग  उत्तराखंड में चिकत्सा रूप में उपयोग होते थे व वर्तमान में भी होते हैं।

   मृदु धूम्रपान हेतु वनस्पति व जंतु औषधि
अगरुरु , गुगलु , मुस्ता , स्थानेय , नालदा , शैलेय , उशिरा , वाल्का , वरंगा , काउंटी , ध्यामका , कुमकुम ,माशा , विल्वमज्जा , कुंदूका , पल्लव , इलावलुका आदि।
इसके अतिरिक्त तिल  का तेल व की जीवों के चर्बी या हड्डी मज्जा से बने तेल व घी भी धूम्रपान औषधि निर्माण  द्रवणी (मिश्रति करण ) हेतु उपयोग होते थे। 

     मध्य धूम्रपान वनस्पति औषधि
 जटामासी , नीली कमल ककड़ी भाग, शालकी , पृथ्वीका , उदंबरा ,अश्वथा , प्लाक्ष , यस्थिमधु, न्याग्रोधा , पद्मका आदि ।

    तीक्ष्ण धूम्रपान वनस्पति औषधि
  ज्योतिष्मती , हल्दी , दशमूल , लक्ष , श्वेता , त्रिफला आदि
    (श्री स्व किसन दत्त कंडवाल  वैद्यराज , ग्राम ठंठोली, मल्ला ढांगू ,  पौड़ी गढ़वाल के भतीजे से प्राप्त जानकारी )

      २- धार्मिक अनुष्ठानों में धूम्रपान 
   धार्मिक अनुष्ठानों जैसे होम , यज्ञ , आहुति , व घडेळा आदि में धुपण देना आदि धार्मिक धूम्रपान के उदाहरण हैं।

     ३- शरीर व कृषि रक्षा हेतु धूम्र उपयोग
   कीटों व अन्य सूक्ष्म सूक्ष्म  जीवों व मच्छरों को भगाने हेतु उपले व गंधेला / कड़ी पत्ता आदि जलाया जाता है।  टिड्डी आदि कीड़ों को भगाने हेतु भी धूम्र निर्माण किया जाता था।  मधु मक्खी/चिमल्ठ भगाने हेतु भी धूम्र निर्माण किया जाता है।
 
   ४- जीव  हत्त्या हेतु धूम्र निर्माण

   बाघ , शाही , सियार , रीछ आदि मारने हेतु इन जानवरों के बिलों /घरों में धूम्र निर्माण कर इन्हे बिल /घरों से बाहर लाया जाता था व मारा जाता था।  बहुत बार बंदरों , बाघों के आतंक कम करने हेतु बणांक लगाने की पुरानी परम्परा भी थी।
         नशे हेतु धूम्रपान

भांग , धतूरा , तम्बाकू का उपयोग बहुप्रचलित है।
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   वैसे धूम्र ने मनुष्य को नुक्सान अधिक पंहुचाया है लाभ कम दिया है जैसे रसोई में धुंवें ने कितनी जाने लीं हैं पता नहीं और अब दिल्ली जैसे श्हरों में धुंवे व प्रदूषित वायु हानि  . पंहुचती है 
 


 



Copyright @ Bhishma Kukreti  /184 //2018
संदर्भ

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
-
 
 
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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 राहुल गांधी के नासमझ सलाहकारों को प्र . मं . मोदी पर सीधे आक्रमण बंद कर देना चाहिए

 विपणन गुरु : भीष्म कुकरेती

( 18 मई 2018 , कर्नाटक विधानसभा चुनाव उपरान्त ब्रैंडिंग विश्लेषण )

   कर्नाटक विधान सभा चुनाव (मई 2018 ) में भाजपा को बहुमत नहीं मिला पर बहुमत के बहुत करीब पंहुच गयी और कॉंग्रेस जीडीएस को समर्थन देने को मजबूर हो गयी है याने कॉंग्रेस का बंटाधार।  ऐसे में आकलन आवश्यक है कि राहुल गांन्धी के आक्रमण क्यों नहीं सफलता पा रहे हैं।  राहुल गांधी के सफलता के मध्य मोदी छवि सबसे बड़ा रोड़ा है।
 यह जगजाहिर है कि राहुल गांधी जो भी बयान देते हैं वह उनके सलाहकार दिलवाते हैं अन्यथा कॉंग्रेसियों को भी मालुम है श्री राहुल गांधी तो अज्ञानियों के गुरुघंटाल हैं।  यदि कॉंग्रेस परिवारबाद से कैंसर से पीड़ित न होती तो राहुल गांधी को कॉंग्रेस दफ्तर  में कागज इधर उधर उठाने का भी काम नहीं मिलता।  जिस मनुष्य को यह मालुम नहीं कि  भारतीय अपनी सेना की बुराई नहीं सुन सकता वह भारतीय सेना की बुराई करे व उसका सिपासलाकार दीक्षित सेनापति को सड़क का गुंडा कहे ऐसे राजनीतिज्ञ दल के अध्यक्ष को मूर्ख कहना भी मूर्खता ही होगी।  जिस राजनीतिज्ञ और वह भी कॉंग्रेस अध्यक्ष को जनता की रग पता न हो उस के बयान को राजनैतिक जन्मजात मूर्खतायुक्त बयान समझने में कोई हर्ज नहीं।  जिसे पता न हो कि आम जनता नोटबंदी से प्रसन्न है और वह आज भी नोटबंदी की आलोचना करे उसे क्या कहा जा सकता है ?   याने राहुल जी की समझ पर सबको पता है कि वे अपने आप बयान देने में सर्वथा असमर्थ हैं।  यह सर्वविदित है कि राहुल जी या प्रधान मंत्री मोदी जी सलाहकारों की सलाह से बयान देते हैं किन्तु चतुर राजनीतिज्ञ तोतारटंत अनुसार बयान नहीं देते हैं   करते हैं ।  राहुल जी तोतारटंत भाँती बयान देते हैं और   लगभग हर बार मूर्ख राजनीतिज्ञ  साबित होते जाते रहे हैं ।  17 मई को छत्तीसगढ़ में उन्होंने मोदी के एकाधिकारी गुण पर आक्रमण हेतु हिन्दुस्तान की तुलना पाकिस्तान न्यायपालिका से कर दी औरदिन भर टीवी मीडिया में चर्चा मोदी के डिक्टेटरशिप के बजाय राहुल की पाकिस्तान तुलना पर होती रही। इससे इससे बड़ा आत्मघाती बयान तो निरा मुर्ख राजनीतिज्ञ  भी नहीं देते हैं।
 
           मोदी पर आक्रमण आत्मघाती कृत है

राजनीति छवि का खेल है याने ब्रैंडिंग का खेल है और कोई माने या न माने ब्रैंडिंग सदा की भांति युद्ध सिद्धांतों पर ही चलता है।  जी हाँ ब्रैंडिंग के सभी सिद्धांत युद्ध सिद्धांतों पर ही आधारित हैं और प्रमाणित हैं।  वोटरों का मन ब्रैंडिंग युद्धभूमि है।  मन या चित्त में ही ब्रैंडिंग युद्ध चलता रहता है।  हर व्यक्तिवाची संज्ञा एक ब्रैंड ही होता है।  राहुल, नरेंद्र मोदी , जवाहर लाल सभी ब्रैंड हैं।

भारतीय राजनीति में मोदी एक बहुत ताकतवर ब्रैंड है

 इसमें दो राय नहीं कि भारतीय राजनीति में मोदी एक ताकतवर ब्रैंड के रूप में उभर कर आया है।  राहुल गांधी वास्तव में बहुत ही क्षीण हीन  ब्रैंड है।  ब्रैंडिंग युद्ध नियम है कि सबसे ताकतवर ब्रैंड पर अन्य सभी ब्रैंड आक्रमण करते हैं।  किन्तु क्या वास्तव में आक्रमण करना सही है ? जी दूसरे नंबर के ब्रैंड का पहले नंबर के ब्रैंड पर आक्रमण सही होता है किन्तु आक्रमण कभी भी ताकतवाले स्थान या गुण पर नहीं  किया जाता है अपितु शत्रु के कमजोरतम  स्थान या  गुणों पर जबरदस्त आक्रमण किया जाता है।   जैसे राम जब रावण के शरीर पर आक्रमण करते थे तो आक्रमण विफल हो जाता था।  राम ने रावण के कोमलतम अंग नाभि पर तीर मारा तो रावण धराशायी हो गया।  कुरुक्षेत्र युद्ध में भीम जब जब दुर्योधन के ताकतवर अंगों पर गदा वार करता रहा विफल होता रहा किन्तु जैसे ही भीम ने दुर्योधन के कमजोरतम अंग जंघा पर गदावार किया दुर्योधन धराशायी हुआ।
अब हम ब्रैंड राहुल गांधी द्वारा ब्रैंड मोदी पर आक्रमण का विश्लेषण करें। शुरू से ही मोदी विरोधी मोदी के सबसे ताकतवर गुणों पर ही वार करते रहे।  मोदी हिन्दुओं के लिए एक गर्व है (सही या गलत इसे भूल जाईये ) . यहां तक कि जो मोदी ब्रैंड को वोट नहीं देते उन हिन्दुओं की भी सहानुभूति मोदी ब्रैंड के साथ आज भी है।  विरोधी सेक्युलरिज्म या मानव हित के नामपर मोदी पर सीधे आक्रमण करते रहे और अपने तीर विफल करते रहे।  मौत का सौदागर जैसे अमोघ अस्त्र भी असफल हो गया उलटा इस अस्त्र ने कॉंग्रेस को ही क्षति पंहुचाई।  मोदी ब्रैंड की प्रसिद्धि में भाजपा या आर एसएस का उतना हाथ नहीं जितना कि विरोधियों के आक्रमणकारी अपशब्द।  अखिलेश यादव का गधा प्रकरण प्रमाण है कि मोदी पर सीधी  आलोचना आक्रमण मोदी हेतु लाभकारी है। कर्नाटक चुनाव में राहुल गांधी द्वारा संसद में 15 मिनट के भाषण की प्रार्थना वाले बयान पर तो राहुल जी हंसी के ही पात्र बन गए और मोदी ब्रैंड और भी ताकतवर ब्रैंड बनकर उभरकर आ गए। 
  राजनीति में विरोधियों द्वारा मोदी की कमजोरी पर आक्रमण  आवश्यक है किन्तु आक्रमण ताकत पर नहीं अपितु कमजोरी पर किया जाना चाहिए।

      क्या है ब्रैंड मोदी की कमजोरी
 मोदी की जो भी कमजोरी होंगी वे जनता के लिए इर्रेलिवेंट अप्रासांगिक  हैं। आर एसएस संस्थाओं में घुस रहा है बयान भी अप्रासांगिक आक्रमण है। राहुल गांधी या विरोधियों को समझना चाहिए कि भाजपा के 11 करोड़ सदस्यों के साथियों को आर एसएस का विरोध नहीं भायेगा।  मोदी की कमजोर नस मोदी नहीं अपितु उनके मंत्री आदि हैं। यदि राहुल गांधी या अन्य को मोदी ब्रैंड पर आक्रमण करना है तो मोदी नाम लेना सर्वथा बंद कर देना चाहिए।  मोदी ब्रैंड को अप्रासंगिक बनाना है तो मोदी नाम की सर्वथा उपेक्षा कर दी जानी चाहिए।  राहुल गांधी के एक भाषण में राहुल जी ने 59 बार मोदी का नाम लिया जैसे मोदी मोदी न हों राम हो गए हों. राहुल गांधी जी व अन्य विरोधियों को मोदी रट बंद कर लेनी चाहिए।  यदि घरेलू पहलु पर आक्रमण करना हो तो सीधे राजनाथ सिंह पर आक्रमण होना चाहिए।     कमजोरी।  इन्हे टारगेट  किया जाना चहिये।  चीन समस्या पर प्रश्न चिन्ह मोदी पर न लगाया जाय अपितु रक्षामंत्री सौ सीतारमण पर आक्रमण किया जाय. इसी तरह किसानों की समस्या हेतु मोदी पर आक्रमण न किया जाय किन्तु कमजोरतम मंत्री राधा मोहन सिंह पर चारों तरफ से इतना वार किया जाय कि मोदी ब्रैंड को राधा मोहन सिंह के बचाव में उतरना पड़े। मोदी ब्रैंड को उनके युद्धभूमि में पछड़ना कठिन है किन्तु राधा मोहन सिंह सरीखे मंत्री को युद्ध क्षेत्र में लाकर ही मोदी ब्रैंड पर आक्रमण का सही तरीका है।
      जब तक विरोधियों द्वारा मोदी ब्रैंड की अवहेलना या उपेक्षा न हो तब तक विरोधी मोदी ब्रैंड से पार नहीं पा सकते।
   
      भाजपा की क्या रणनीति हो ?
  भाजपा को राहुल गांधी की अज्ञानता को सदा प्रासांगिक बने रहना देना चाहिए और जनसम्पर्कीय  क्रियाकलापों द्वारा सिद्ध करते रहना  चाहिए कि अज्ञानी का साथ केवल मूर्ख दल ही देते हैं जैसे अखिलेश. भाजपा को राहुल गांधी को उकसाना चाहिए कि राहुल गांधी मोदी ब्रैंड पर अनाप सनाप आरोप लगाते रहें और मूर्ख राजनीतिज्ञ सिद्ध होते रहें। 


Bhishma Kukreti

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        फा शीन यात्रा व गुप्त युगीन  विशेषताएं व हरिद्वार ,  बिजनौर व सहारनपुर इतिहास

 Characteristics of Gupta Era & Ancient  Gupta Era History of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur  -215
                   
                         
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 215               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

 प्राचीन भारत के इतिहास में डेढ़ सौ वर्ष के गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल कहा  जाता है इस काल में भारत में कई मायनों में विकास हुआ।
चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय चीनी धार्मिक यात्री फाही यान /फा -शीन  भारत यात्रा पर आया (गाइल्स , ट्रेवल्स ऑफ फा -शीन ). फा शीन ने 322 ईश्वी में यात्रा शुरू की और गोबी रेगिस्तान , खोतान , शंशान , तारतर , कासागरा गांधार होते हुए 400 ईशवी  में भारत पंहुचा व भारत में वह 411 ईशवी  तक विभिन्न स्थानों की यात्रा करता रहा। फा शीन  ने पेशवर ,तक्षिला , पाटलिपुत्र , मथुरा , कन्नौज , पाटलिपुत्र , मालवा , श्रावस्ती , कपिलवस्तु , टॉमलिप्ति -बंगाल बंदरगाह व श्रीलंका की यात्रा की।  फा शीन 411 ईशवी में जावा होते हुए चीन पंहुचा।
    मगध के संबंध में फा शीन के उदगार
मध्यदेश में अन्य प्रदेशों की तुलना में इस प्रदेश में सबसे अधिक विशाल नगर  व कस्बे हैं। मगध में धनी लोग सहायता करते हैं।  पड़ोसियों के साथ लोगों के मधुर सबंध होते हैं व वे एक दूसरे की सहायता करते हैं।
 
       





Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient  History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;   seohara , Bijnor History Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
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Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड परिपेक्ष्य में तिब्बती चिकित्सा प्रचलन व इतिहास भाग -1

 Tibetan Healthcare System in Uttarakhand

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  92

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  - 92                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--195)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 195

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

    समस्त उत्तराखंड का उत्तरी भाग तिब्बत सीमा से सटा है और दीयों से तिबत व उत्तराखंड के राजाओं का सीमा विवाद चलता रहता था किन्तु दोनों क्षेत्रों के व्यापारिक , सांस्कृतिक संबंध कभी बंद नहीं हुए।  1962 के चीनी आक्रमण पश्चात तिब्बत से संबंध समाप्त हुए। गढ़वाल व कुमाऊं के उत्तरी भागों में भोटिया जाती तिब्बती मूल के हैं और तिब्बत के साथ वाणिज्य माध्यम का कार्य सहस्त्र वर्षों से करते आ रहे हैं।  भोटियाों ने गढ़वाल -कुमाऊं व हिमाचल को तिब्बती चिकित्सा पद्धति भी दी व कई  औषधि निर्माण पद्धति /ज्ञान भी उत्तराखंड को भोटियाओं द्वारा प्राप्त हुआ। बद्रीनाथ ,हेमकुंड , उत्तरकाशी , पिथौरगढ़ जोहर आदि स्थानों में अन्वेषकों , पर्वतारोहियों यात्रियों को भोटिया जन तिब्बती पद्धति से चिकित्सा भी प्रदान करते थे।  गढ़वाली सेना को तिबत व नीति -माणा   में तिब्बती पद्धति की चिकित्सा सुलभ थी। पर्यटकों को चिकित्सा प्रदान करने में तिब्बती चिकित्सा का भी हाथ रहा है।  कई तिब्बती चिकित्सा पद्धति ग्रामीण उत्तराखंड चिकित्सा पद्धतियों के साथ इस तरह मिल गयी हैं कि यह पता लगाना कठिन है कि कौन सी पद्धति तिब्बती है और कौन सी निखालिश कुमाउँनी या गढ़वाली पद्धति है।  आयुर्वेद ने भी भोटिया व्यापारियों द्वारा तिब्बती चिकित्सा पद्धति को प्रभावित किया किन्तु अब इन्हे पहचानना कठिन ही है।
    अतः मेडिकल टूरिज्म इतिहास की दृष्टि से तिब्बती चिकित्सा इतिहास भी महत्वपूर्ण है और तिब्बत के प्रसिद्ध चिकित्स्कों का ज्ञान भी प्रासंगिक हो जाता है।

                   बोन चिकित्सा पद्धति
  कहा जाता है कि तिब्बती चिकित्सा पद्धति दुनिया की प्राचीनतम पद्धतियों में से एक है।  इसे बोन चिकित्सा पद्धति भी कहते हैं जो बौद्ध धर्म  प्रसारण युग से पहले तक प्रचलित थी। बॉन चिकित्सा पद्धति की पोथी 'जाम -मा त्सा ड्रेल ' (200 BC ) में रची गयी थी जिसमे वेदों व चिकत्सा वर्णन है । 

       बुद्ध सांख्यमुनि (961 -881 BC )

   सांख्य मुनि ने तिब्बत में बौद्ध धर्म प्रचार किया और सांख्य मुनि क्र बौद्ध प्रवचनों ने बोन  चिकित्सा पद्धति को प्रभावित किया व चिकित्सा पद्धति में बुद्ध के चार अपरिवर्तनीय विचार व 6 सिद्धियों  सिद्धांतों का प्रवेश हुआ।
  ल्हा थोथोरी (245 -364 AD )
 जनश्रुति व यूथोक की नामथार अनुसार भारतीय मूल के दो चिकित्स्क भाई बहिन बिजी  गजे व बिली गजे तिबती राजा युल  पेमा नयिंगपो के चिकित्सक थे।  दोनों ने तक्षशिला जाकर आयुर्वेदाचार्य आत्रेय से चिकित्सा विज्ञान सीखा।  फिर दोनों ने चीन , नेपाल , चीन के पूर्वी तुर्किस्तान की यात्रा की।  दोनों ने मगध में कुमार जीविका से अतिरिक्त  चिकित्सा शिक्षण ग्रहण की।
      बज्रासन में आर्य तारा ने उन्हें तिब्बत जाकर चिकत्सा सिखलाने हेतु तिब्बत भेजा व राजा ने बिजे  का विवाह अपनी बेटी इदकी रोल्छा (जो बाद में चिकित्स्क हुईं ) से की।  बिजे गजे व बिली गजे ने लोगों की चिकित्सा ही नहीं की अपितु कई शिष्यों को चिकित्सा शिक्षा भी दी।  जनश्रुति अनुसार बिजी  गजे व बिली गजे चंदन के वनों में निवास करते हैं।

डंग गी थ्रोचोंग (चौथी सदी )

    बिजी गजे व रोलचा का  पुत्र या डंग  गी  थ्रोचोंग  महान चिकित्सक था व वह अपने नाना का व्यक्तिगत चिकित्सक भी था।  डंग गी थ्रोचोंग ने युवापन में ही अपने पिता से नाड़ी जांचने ,औषधि विज्ञान , रक्तचाप , रक्त रोकने व घाव विज्ञान सीख लिया था। डंग गी थ्रोचोंग की पीढ़ियों में कई चिकित्सक हुए।  डंग थ्रोचोंग की एक पीढ़ी में यूथोंग योंतेन गोनपो महान चिकित्स्क हुए व योंतेन की कई पीढ़ियों ने राजचिकित्स्क का पद संभाले रखा।

     धर्म राजा सौंगतसेन गैम्पो (617 -650 )

      33 वें राजा सौंगतसेन गैम्पो ने भारत से चिकित्स्क भारद्वाज ; ईरान से गालेनोज व चीन से हांग वान हांग डे  चिकित्स्कों को तिब्बत बुलाया व उनसे अपना चिकित्सा ज्ञान तिब्बत के चिकित्सकों को देने की प्रार्थना की।  प्रत्येक ने अपने ज्ञान पर लेख  लिखे जो बाद में 'मिजिग्पे -त्सोंचा ' (डरविहीन हथियार ) नाम से पुस्तक में संकलित किये गए।
   चीनी व भारतीय चिकित्स्क तो अपने देश लौट गए किन्तु ईरानी चिकित्स्क गालेनोज तिब्बत में रहा और उसने कई चिकित्सा पुस्तकें रचीं. राजा की चीनी रानी भी चीन से एक चिकित्सा पोथी लायीं और उसका तिब्बती में अनुवाद करवाया।
धर्म राजा त्रिसौंग देवोत्सेन (742 -797 ई )
धर्म राज देवोत्सेन ने ईरान , भारत , चीन , नेपाल व पूर्वी तुर्किस्तान के चिकित्स्कों का प्रथम सम्मेलन सामये बुलवाया . तिबत का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ बृद्ध युथोंग गोनपो  ने किया।  सम्मेलन में चिकित्सा सबंधी वार्ताएं हुईं।

 युथोंग योन तेन गोनपो (708 -833 ई )
    चिकित्स्क परिवार में जन्मे वरिष्ठ युथोंग ने चिकित्सा शिक्षण हेतु  हेतु कई बार भारत की यात्रा की व , चीन की भी यात्रा की।  युथोंग गोनपो ने सन 763 ई  में तिब्बत का प्रथम चिकित्सा शिक्षण संसथान 'तनाडग ' की स्थापना की।
   लोचेन रिनचेन सांगपो (958 -1056 ई )

लोचेन रिनचेन सांगपो  ने कश्मीर की यात्रा की और आयुर्वेद के अष्टांग की शिक्षा शाली होत्र से प्राप्त की । लोचेन रिनचेन सांगपो ने अष्टांग का तिब्बती में अनुवाद किया औरतिब्बति चिकित्सा में नया अध्याय जोड़ा।

कनिष्ठ युथोंग योनतेन गोनपो (1126 -1202 )

गोनपो चिकित्स्क परिवार में जन्मे कनिष्ठ युथोंग योनतेन गोनपो  युवा होने से पहले ही चिकित्सा शास्त्र में पारंगत हो गया था। अठारह वर्ष के कनिष्ठ युथोंग योनतेन गोनपो  ने छह बार भारत यात्रा की और डाकिनी पाल्डेन त्रिंगवा व चरक से अतिरिक्त चिकित्सा विद्या प्राप्त की।
कनिष्ठ युथोंग योनतेन गोनपो ने चिकित्सा शास्त्र पर कई पुस्तकें रचीं और 300 शिष्यों (जिनके नाम तिब्बती चिकित्सा साहित्य में उपलब्ध हैं ) को चिकित्सा ज्ञान दिया।

जंगपा नाम्यागल द्रासंग ( 1395 -1475 )
जंगपा नाम्यागल द्रासंग  ने दस साल में भारतीय सूत्र व सिद्धांतों में सिद्धि प्राप्त कर ली थी। जंगपा नाम्यागल द्रासंग ने 11 चिकित्सा पुस्तक रचे और जंगपा चिकित्सा पद्धति की स्थापना की।

रीजेंट सांगे गियेतसो (1653 -1706 )
   पांचवें दलाई लामा के रीजेंट रीजेंट सांगे गियेतसो  ने ह्यूमन एनोटॉमी के कई सूत्रों का संपादन किया व ल्हासा में चिकित्सा विद्यालय की स्थापना की। ज्योतिष पुस्तक के अतिरिक्त रीजेंट सांगे गियेतसो  ने तिब्बती चिकित्सा इतिहास भी संकलित किया व कई पुस्तकें रचीं।
खेनरब नोरबू (1883 -1962 )  योगदान  संरक्षण व  आदरणीय है।

  वर्तमान दलाई  लामा
तेरहवें दलाई लामा ने तिबत में मेन  त्सी खांग चिकित्सा संस्थान की स्थापना की थी वर्तमान दलाई लामा व अन्य चिकित्सकों  ने इस संस्थान को 1961  में भारत में पुनर्जीवित किया और संस्थान की कई शाखाएं दिल्ली अमेरिका में खोलीं।

    भोटिया समाज का चिकित्सा योगदान
 भोटिया समाज  कई जड़ी बूटियां सदियों से निर्यात  हैं व तिब्बती पद्धति का प्रचार भी करते आये हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरकाशी में भी हिमाचली भोटिया चिकत्सा तिब्बती चिकित्सा प्रदान करते आये हैं।   

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Copyright @ Bhishma Kukreti  19 /5//2018
संदर्भ

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
-
 
 
  Tibetan Medical practices &  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Tibetan Medical practices &   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;  Tibetan Medical practices &   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Tibetan Medical practices &   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड में   वैकल्पिक चिकित्सा

उत्तराखंड में वैकल्पिक चिकित्सा
 Alternative Healthcare in Uttarakhand

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

  -

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  93

-

  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -   93               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--196)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 196

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
 सदियों से उत्तराखंड में आयुर्वेद के अतिरिक्त वैकल्पिक चिकित्सा भी प्रचलित व सामन्य जन में प्रसिद्ध ही नहीं अपितु लोकप्रिय भी रही हैं।
उत्तराखंड में निम्न पारम्परिक वैकल्पिक चिकित्सा उपलब्ध थी या प्रचलित थीं -
     योग
- कृषिप्रधान क्षेत्र होने से व्यवसायिक योग प्रचलित तो न था पर ऋषि व ब्रिटिश काल में संत योग ध्यान करवाते थे।

विज्ञान भैरव आधारित चिकित्सा
- विज्ञान भैरव आधारित चिकित्सा वास्तव में शरीर संबंधी चिकित्सा है और अंत में मानसिक आनंद प्राप्ति होती है।  कटी तांत्रिक अनुष्ठानों में विज्ञान भैरव के सिद्धांतों में परिवर्तन कर उन्हें क्षेत्रीय आवश्कतानुसार परिवर्तित किया गया है जैसे - तेज नोक को शरीर पर चुभाने की कला /तकनीक को बहुत प्रेत भगाने हेतु कांड /कंडाळी  से झपोड़ने की विधि ; तेल दिखाना , तांत्रि अनुष्ठान (छाया पूजन ) नदी किनारे या ऊँची निर्जन धार में करना आदि . चिकुटी काटना आदि भी विज्ञान भैरव आधारित चिकित्सा है।
  संगीत आधारित चिकित्सा
संगीत आधारित चिकित्सा ने कई रूप ले लिए हैं।  धार्मिक अनुष्ठानों ने संगीत वाद्य वास्तव में आनंद व कई मनोरोग दूर करने की चिकित्साओं का परिवर्तित रूप है।  एकतारा वादन या घंटा वादन भी विज्ञान भैरव आधारित संगीत चिकित्सा ही है।
नृत्य चिकित्सा
नृत्य चिकित्सा तो संस्कृति का अंग है जिसे समग्र चिकित्सा नाम दिया जा सकता है।
सम्मोहन
यद्द्यपि सम्मोहन चिकित्सा भूतकाल में प्रचलित थी अब सम्मोहन चिकित्सा कम ही प्रयोग होती है किन्तु बहुत से मंत्र सम्मोहन संबंधी मंत्र उत्तराखंड में प्रचलित रहे हैं।
ध्यान
ध्यान से चिकित्सा आज अधिक  प्रचलित हो रही है
मूत्र चिकित्सा
वैद्यों  की अनुमति से स्व मूत्र चिकित्सा प्रचलित थी।  गौ मूत्र चिकित्सा तो काफी प्रचलित रही है। गोबर से स्वास्थ्य रक्षा जीवन शैली अंग है।
तंत्र मंत्र चिकित्सा
तंत्र मंत्र चिकित्सा तो आज भी प्रचलित है।
भोजन  आधारित चिकित्सा
समग्र भोजन आधारित चिकित्सा वास्तव में सदियों के अनुभव से संचालित होती रही है।  जैसे शीतकाल में कंडाळी खाना किन्तु गर्मियों में नहीं खाना , सर्दी जुकाम में भट्ट भूनकर सूंघना , ग्रीष्म ऋतू में मसूर की दाल न खाना , रात में दही , चावल , उड़द की दाल वर्जित होना आदि सामन्य समग्र जीवनशैली के अंग थे। व्रत रखना भी समग्र भोजन चिकित्सा अंग है।
भाप या भप्याण  चिकित्सा
भाप द्वारा चिकित्सा भी सामन्य चिकित्सा थी।
एक्यूपंचर व ऐक्यूप्रेस्सर
एक्यूपंचर व एक्यूप्रेसर चिकित्सा भी सामन्य चिकित्सा थी।  ताळ  लगाना या कान नाक छेदन आदि एक्युपंचर  के परिवर्तित रूप हैं। खुरचना आदि एक्यूप्रेसर का ही अंग है।
मानसिक चिकित्सा
मानसिक चिकित्सा के कई रूप सामने आते हैं जो तंत्र मंत्र में परिवर्तित हो गए हैं।
रत्न चिकित्सा
रत चिकित्सा कई रूप में प्रचलित थी।  गंड बांधना आदि रत्न चिकित्सा अंग हैं
धातु स्पर्श चिकित्सा /चुंबक चिकित्सा
लौह कड़े पहनना , पैर  या बाजू में लौह कड़ा पहनना धातु स्पर्श , चुंबक , विद्युत् चिकित्सा के अंग माने जा सकते हैं।
सुगंध चिकित्सा
 सुगंध , गंध चिकित्सा के कई रूप उत्तराखंड में मिलते थे।  कर्मकांड में गंध -सुगंध सामन्य प्रक्रिया है।
स्वास्थ्य रक्षा हेतु जीवन शैली
 पहाड़ों की जीवन शैली वास्तव में स्वास्थ्य रक्षा हेतु बनी थी।
स्पर्श चिकित्सा
स्पर्श चिकित्सा वास्तव में जीवन शैली अंग बन गया है।
हंसी चिकित्सा
हंसी चिकित्सा भी जीवन शैली का एक अंग है
रोदन चिकित्सा
रोदन चिकित्सा को जीवन शैली का अंग बना दिया गया है
पशु पक्षी पास होने की चिकित्सा
कृषि प्रधान क्षेत्र होने से यह चिकित्सा जीवन अंग बन गयी थी।
गाली चिकित्सा
गाली देकर गुबार निकालना भी जीवन शैली अंग है।
सम्भोग चिकित्सा
मानसिक शान्ति हेतु विज्ञान भैरव में सम्भोग का समय बढ़ाओ व अपने सम्भोग कृत स्मरण करो जैसे दो सिद्धांत  तो जीवन शैली अंग है
छींक चिकित्सा
छींक  चिकित्सा जीवन शैली अंग है।  जब छींक आये तो उसे रोकने से मानसिक शान्ति ही नहीं मिलती अपितु शरीर ऊर्जावान हो जाता है भी विज्ञानं भैरव सिद्धांत है।
क्रोध रोकना चिकित्सा
विज्ञानं भैरव का एक सिद्धांत है कि जैसे ही क्रोध आये उसे देखो तो शरीर ऊर्जावान हो जाएगा या शांति मिलेगी।  यह सिद्धांत जीवन शैली का अंग है
सांस व वायु चिकित्सा
सांस व वायु चिकित्सा भी जीवन शैली अंग है। शंख वादन , पिम्परी वादन आदि सांस वायु चिकित्सा के अंग माने जा सकते हैं।
आसमान देखना ,आदि जैसे कई कार्यकलाप वैकल्पिक चिकित्सा के रूप हैं जो उत्तराखंड में प्रचलित थे व आज भी प्रचलित हैं। 




Copyright @ Bhishma Kukreti 20 /5 //2018
संदर्भ

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
-
 
 
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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  मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत छवि /पहचान संकट से जूझ रहे हैं

  छविकरण विज्ञान गुरु - भीष्म कुकरेती
  सभी व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ ब्रैंड हैं , भीष्म कुकरेती ब्रैंड है , त्रिवेंद्र रावत ब्रैंड है और धार मा  कु  गैणा  भी ब्रैंड है।  खड़िक पेड़ जब कहा जाय तो वह जाति  वाचक संज्ञा रहता है किन्तु जैसे ही कहा जाय 'सौड़क खड़िक' तो खड़िक एकदम से ब्रैंड बन जाता है।
     प्रत्येक ब्रैंड की संबंधित लोगों के मध्य एक छवि बनती रहती है, छवि मन , बुद्धि व अहम (चित्त )  में बनती है।  एक बार मन या चित्त में छवि बन जाय तो वह छवि मिटती  नहीं है। छवि और वास्तविकता में अंतर होता है यद्यपि वास्तविकता ही छवि निर्माण करती  है किन्तु यह आवश्यक नहीं वास्तविकता व छवि सामान हों। मैंने ऑफलाइन व ऑनलाइन में सर्वाधिक लेख अंग्रेजी में ही प्रकाशित किये हैं किन्तु मैं अंग्रेजी का लेखक नहीं गढ़वाली का लेखक के रूप में अधिक प्रसिद्ध हूँ।   यह है वास्तविकता व छवि में अभीष्ट अंतर्।  राजनीति में देखें तो राजनाथ सिंह ईमानदार व निर्णय लेने वाले राजनीतिज्ञ हैं किन्तु उनकी वास्तविक छवि ढुलमुल राजनीतिज्ञ की छवि बन गयी है।  वास्तविकता व छवि में अंतर् होता है।
        मेरी छवि मेरे पर निर्भर नहीं करती अपितु दूसरा कैसे धारणा बनाता है पर निर्भर करता है।  धारणा का अर्थ है मन में धरना।  मैं अपने को दक्षिणपंथी लेखक नहीं मानता किन्तु मेरे मित्र श्री गजेंद्र बहुगुणा व कुछ हद तक वरिष्ठ साहित्यकार  मंगलेश डबराल भी मुझे दक्षिणपंथी लेखक मानते हैं।  मेरे मानने या न मानने से छवि निर्माण में कुछ नहीं होगा अपितु बहुगुणा जी या डबराल जी की धारणा ही उनके चित्त (मन , बुद्धि व अहम् ) में मेरी छवि निर्माण हेतु कारगर है, मैं  गौण हूँ । परसेप्सन  (मन में धारणा ) व रियलिटी में अंतर होता है।
      छवि निर्माण  में व्यक्तित्व (शरीर , वाणी , कृत्य) के अतिरिक्त संवाद या कम्युनिकेशन सर्वाधिक भूमिका निभाता है।  छवि याने कम्युनिकेशन से निर्मित धारणा।
     राजनीतिज्ञों हेतु , सेल्समैन हेतु व व्यापार हेतु तो छवि ही वार पार करती है।  राजनीति में तो राजनीतिज्ञ छवि का ही खात  हैं।  मोदी जी  अपनी छवि का खा रहे हैं , राहुल जी अपनी छवि का खा रहे हैं तो बहिन मायावती अपनी छवि के कारण ही दलित रानी हैं।  छवि हे राजनीति की प्राणवायु है।
   यदि सोशल मीडिया (फेसबुक , व्हट्सअप , ई पत्रिकाएं , ई समाचार पत्र ) व फोन द्वारा उत्तराखंड वासियों से संवाद को माध्यम आधार मान लिया जाय तो मैं कह सकता हूँ वर्तमान समय में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भयानक रूप से पहचान /छवि /इमेज संकट से जूझ रहे हैं।  यदि श्री त्रिवेंद्र रावत अभी कुछ नहीं करेंगे तो उन्हें ही नहीं भाजपा को निकट भविष्य में खामियाजा भुगतना पड़  सकता है।  भाजपा वाले चुनाव के कुछ समय पहले मुख्यमंत्री बदल देते हैं और मुंह की खाते हैं।  उत्तराखंड व दिल्ली में यह सब दोहराया गया है। त्रिवेंद्र रावत की छवि ढुलमुल, अनिर्णय के शिकार , यु टर्न वाले मुख्यंत्री की बन चुकी है
    त्रिवेंद्र रावत धूमिल छवि के शिकार हैं या कौज्याळ  छवि के शिकार हैं।  रावत नाम उनकी छवि हेतु एक समस्या है।  जी नहीं ब्राह्मण राजपूत का टंटा नहीं है अपितु भाजपा में नए नए आये दो कद्दावर रावत नेताओं के आने से हुआ है।  छवि व चतुर राजनीतिज्ञ के मामले में हड़क सिंह रावत व सतपाल महाराज रावत त्रिवेंद्र सिंह अधिक ताकतवर नेता हैं।  त्रिवेंद्र रावत इन दोनों के रावतों के मध्य मध्य फंस से गए हैं।
     केंद्र में नरेंद्र मोदी सरीखे ऊँची छवि वाले नेता से भी त्रिवेंद्र रावत अपनी छवि नहीं बना पा रहे हैं।  किन्तु "लड़िक वी जो खड़िक बण जावो"  कहावत वैसे नहीं बनी , योगी जी  भी तो कद्दावर छवि वाले मोदी जी के होते अपनी छवि बनाने में सफल हुए हैं।  सौ सिंधिया भी तो लोहा ले ही रही हैं।
   मैदान व पहाड़ के सामंजस्य रखने में हमेशा ही भाजपा ने पहाड़ को मारा है।  यह कुछ समय पहले गैरसैण  में विधानसभा सत्र के समाचारों से भी विदित होता है कि त्रिवेंद्र मैदान वालों को नाराज नहीं करना चाहते व इसी क्रम में सहारनपुर को उत्तराखंड में मिलाने वाले व्यक्तव्य ने रावत की छवि धूमिल ही की। गैर सैण  प्रकरण में जग हंसाई ही हुयी व मैदान वाले मैती तो न बने बल्कि पहाड़ के मायके वाले रूठे  वह  अलग । सहारनपुर को उत्तराखंड में मिलाने वाले वक्तव्य से रुड़की के ग्रामीण उनके अपने नहीं हुए पर उनका वक्तव्य पहाड़ियों को चिढ़ा अवश्य गया। ऐसे ही   दुविधाजनक कृत्य व बयानबाजी वर्तमान मुख्यमंत्री की छवि के चारों ओर कोहरा ही फैला रहे हैं।  छवि का एक विशेष अमर सिद्धांत है बल एक सधे सब सध जायँ।  मुख्यमंत्री को विशिष्ठ छवि बनानी है तो एक को चुनना ही होगा।  निशंक जी के कार्यकाल में भी चतुर्थ श्रेणी चयन में गढ़वाली , कुमाउनी भाषा में इंटरव्यू  निर्णय वापस लेना पड़ा था।  पहाड़ी अभी भी भाषा के मामले में भाजपा से ससंकित ही  रहते हैं।  रावत जी को एक स्टैंड लेना ही होगा मैदान या पहाड़ प्रेम।
   वैसे बिल्ली पहले दिन ही मारी जाती है।  त्रिवेंद्र सिंह के मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले समाचार जिसने उधम मचाया वह  समाचार था मूविंग शराब की दुकानें ।  भाजपा वाले राहुल गांधी की बड़ी आलोचना करते हैं उनके नादानी भरे बयानों या कृत्यों के लिए।  क्या भाजपा या त्रिवेंद्र जी ने नहीं सोचा कि मुख्यमंत्री बनते ही चलती फिरती शराब की दुकान का समाचार आना चाहिए था ? आजकल गाँवों में शराब ठेका आबंटन भी त्रिवेंद्र की छवि भेळ  ही नहीं गुदनड़  जोग कर रही है।
     त्रिवेंद्र रावत जी ने सोचा होगा कि लोगों के मध्य मुख्यमंत्री बनते ही भलुकरदार की छवि बनाई जाय।  सोच तो सही थी किन्तु माध्यम व क्रियावनित करने की विधि गलत साबित हो गयी।  मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने  'पलायन  आयोग ' गठित किया।  सोच सही थी किन्तु मोच पड़  गयी।  जनता के मन में यह  प्रश्न आज भी उबलता है बल जिस राजनीतिज्ञ का जन्म पहाड़ों में हुआ , जो पहाड़ों में पला बढ़ा क्या उसे नहीं पता कि पहाड़ों की क्या समस्याएं हैं ? आज भी सोसल मीडिया में पलायन आयोग पर वैसे ही जोक्स पोस्ट होते हैं जैसे राहुल जी के जोक्स।  प्रवासियों व वासियों के मन में पलायन आयोग त्रिवेंद्र रावत की कोई सकारात्मक छवि नहीं बना सका है।  पलायन आयोग गठन गलत  नहीं है किन्तु क्रियावणीकरण के कारण पलायन आयोग नकारात्मक छवि ही निर्माण कर रहा है।
     सकारात्मक छवि निर्माण में प्रोऐक्टिव संवाद सदा कामयाब संवाद होता है किन्तु यहां भी मुख्यमंत्री विफल दीखते हैं।  केदारनाथ मंदिर में लेजर शो एक अभिनव पर्यटनगामी प्रयोग है।  किन्तु प्रोऐक्टिव संवाद न होने से सोशल मीडिया में इस कृत्य पर नकारात्मक बहस चली।  यह मुख्यमंत्री की छवि के लिए ही घातक नहीं  है  अपितु  उत्तराखंड में विज्ञान रूचि/टेक्निक वृद्धि हेतु भी हानिकारक है।
     यह भी सत्य है कि किसी भी राजनीतिज्ञ की छवि पत्रकार व बुद्धिजीवी बनाने में सहायता करते हैं। यदि सोशल मीडिया को आधार माने तो मुख्यमंत्री को पता ही नहीं है कि अधिकतर उत्तराखंडी पत्रकार/साहित्यकार / बुद्धिजीवी बामपंथ की छाया तले पले बढ़े हैं और वे एक दिन में त्रिवेंद्र रावत के पाले में नहीं खड़े होंगे।  इसके लिए त्रिवेंद्र रावत ने कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाये हैं कि बामपंथी पत्रकारिता या कॉंग्रेस समर्थित पत्रकारिता के विरुद्ध कोई वैकल्पिक प्रकल्प हो जो प्रोऐक्टिव हो विरोधी पत्रकारिता व बुद्धिजीवियों के समानांतर मुख्य मंत्री की छवि वृद्धि कर सकें।  कार्यकर्ताओं के भरोसे चुनाव जीते जाते हैं किन्तु छवि निर्माता पत्रकारिता विरुद्ध एक विशेष प्रकल्प की   ही आवश्यकता होती है।
     किसी भी व्यक्ति की सोच /सपने /कल्पनाएं ही उसका कृत्य निश्चित करते हैं और वे कृत्य कम्युनिकेशन का कार्य करते है एवं कम्युनिकेशन छवि निर्माण करती है।  अभी अभी मैं गाँव होकर आया हूँ  , कोटद्वार , ऋषिकेश , देहरादून में आम लोगों , अध्यापकों व बुद्धिजीवियों से भी मिला।  यह एक कष्टदायी तथ्य है कि ग्रामीण जनों व बुद्धिजीवियों के मन में त्रिवेंद्र रावत जी के प्रति कोई दुराग्रह  तो नहीं है किन्तु उनसे कोई आशा भी ही नहीं।  राजनीतिज्ञ और वह  भी मुख्यमंत्री से आशा न हो तो वह मुख्यमंत्री लायक राजनीतिज्ञ है ही नहीं । ग्रामीण अभी भी बंदरों , सुंगरों  का समाधान हेतु आशावादी नहीं हैं तो बुद्धिजीवियों के मन में कोई आशा नहीं है कि त्रिवेंद्र शासन ग्लोबलीजेसन काल में उत्तराखंड को एक प्रतियोगी प्रदेश बना सकेंगे।  मुख्यमंत्री वही काबिल राजनीतिज्ञ होता है जिससे आम जनता व बुद्धिजवी कुछ न कुछ आशा करे।  मुख्यमंत्री से आशाहीनता की आशा त्रिवेंद्र रावत जी हेतु किसी बड़े संकट का सूचक तो है ही इसके अतिरिक्त  उत्तराखंड हेतु भी आशाहीनता अति घातक  है। त्रिवेंद्र जी को आम जन के प्रति आशा व विश्वास जगाना चाहिए कि त्रिवेंद्र शासन में उत्तराखंड का कायापलट होगा।  सकारात्मक छवि का मुख्य चरित्र , गुण  है बल कार्य वास्तव में सम्पन हो या न हो यह महत्वपूर्ण नहीं है किन्तु महत्वपूर्ण यह है कि जनता के मन में आशा हो, विश्वास हो , मान्यता हो  कि फलां मुख्यमंत्री काल में  प्रदेश , क्षेत्र या समूह का भला अवश्य होगा।
   मेरी स्पस्ट राय है कि आज ही , अभी मुख्यमंत्री को अपनी छवि सुधार हेतु सही सलाहकार की आवश्यकता है। 
           


सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती 20 /5 /2018


 

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