Author Topic: Articles By Charu Tiwari - श्री चारू तिवारी जी के लेख  (Read 14232 times)

Charu Tiwari

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बाघ से बकरी का मुआवजा

आजादी से पहले और बाद में उत्तराखंड में विकास की जितनी भी बातें हुयीं उनमें यहां की प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी की मांग महत्वपूर्ण रही है। लंबे समय तक चले जंगलात आंदोलन में भी इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक जंगलों पर स्थानीय लोगों के हक-हकूक नहीं होंगे तब तक यहां सर्वागीण विकास का रास्ता नहीं निकाला जा सकेगा। जब 1980 में वन अधिनियम के तहत पहाड़ के ग्रामीणों को उनके हक-हकूकों से अलग किया गया तो उनके सामने वन आधारित जीने के तमाम साधन समाप्त हो गये। सरकार ने विकास का जो नया नारा दिया वन अधिनियम से वह भी पूरा नहीं हो पाया। सड़क, स्कूल, चिकित्सालय, खेल के मैदान, पेयजल योजनायें आदि विकास के काम भी इसलिये बाधित होते रहे क्योंकि इसमें बन अधिनियम का काला कानून आड़े आता रहा। परिणामस्वरूप सैकड़ों सड़के और अन्य निर्माण कार्य वर्षों तक शुरू नहीं हो पाये। वर्ष 1989 में वन अधिनियम के खिलाफ व्यापक आंदोलन चला। आंदोलनकारियों ने विकास कार्यों में बाधा बने पेड़ों को काटने का नारा दिया। आंदोलनकारियों ने यह भी सुनिश्चित किया किया कि वह जितने पेड़ काटेंगे उसके तिगुने पेड़ लगाये जायेंगे। इसके पीछे हिमालय की धरोहरों को बचाकर लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने का विचार भी था। नीति-नियंताओं ने पहाड़ में विकास का जो अनियोजित खाका खींचा उससे आम लोगों में हमेशा असंतोष ही रहा। बाद में विधायक निधि ने इसे विकास के तुष्टीकरण के रास्ते तक पहुंचाया। आज भी लोग सड़क और पंचायत घरों के निर्माण की मांगों पर उलझे हैं। इस बीच दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी को बचाने की चिंता है। सबकी निगाहें उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों पर लगी हैं कि वह किसी तरह यहां के संसाधनों को बचाकर समाप्त हो रहे ऑक्सीजन की पूर्ति करे। इसके लिये जिम्मदार भी यहीं के लोगों को बताया जा रहा है। इस पर राजनीतिक लोगों ने सौदेबाजी भी शुरू कर दी है। सरकारें यहां के संसाधनों को बचाने के बजाए इसके एवज में मुआवजा मांग कर पहाड़ की हवा को बेचने की साजिश में जुट गये हैं।
   उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक लगातार इस बात की मांग कर रहे हैं कि हमें पर्यावरण संरक्षण के एवज में केन्द्र से मुआवजा मिलना चाहिये। उनका तर्क है कि वन अधिनियम और अन्य वन संरक्षण कानूनों से पहाड़ का विकास बाधित हुआ है। इस पैसे से यहां के जनकल्याण के कामों को आगे बढ़ाया जा सकता है। हमारे नीति-नियंताओं को किसी भी हालत में पैसा चाहिये। विशेष राज्य के पैकेज के नाम पर, कुंभ मेले के नाम पर, पर्यटन को बढ़ाने के नाम पर और अब पर्यावरण संरक्षण के मुआवजे के नाम पर। इस पैसे को खर्च करने की न तो इनके पास समझ है और कभी इस पैसे का सही उपयोग उत्तराखंड में हो पाया है। प्रदेश की राज्यपाल मार्ग्रेट अल्वा ने योग्य मुख्यमंत्री के दावों की पोल पिछले दिनों कुंभ मेले की तैयारियों का जायजा लेते समय खोल दी। उन्होंने निर्माण कार्यो की गुणवत्ता पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा कि इससे अच्छी सड़कें तो मेरे गांव की हैं। राज्यपाल के इस बयान से उन लोगों को सबक लेना चाहिये जो विकास कार्यों के लिये सिर्फ पैसे को ही महत्वपूर्ण मानते रहे हैं। इस पैसे को खर्च करने के लिये नियोजन की समझ भी जरूरी है। जहां तक मुख्यमंत्राी के संसाधनों को बचाने के एवज में पैसे और कम दर में बिजली देने की मांग है वह बकरी को बाघ के खाने के बाद का हो-हल्ला है। वन अधिनियम के आने के बाद गांव की सड़क 18 साल रुकी रही, अस्पताल नहीं बन पाया, स्कूलों में खेले के मैदान नहीं बन पाये लेकिन संसाधनों पर लुटेरों का आना नहीं कम नहीं हुआ। जो वन अधिनियम आम लोगों की परेशानी का सबब बना उसका बड़े पूंजीपतियों पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़ी बांध परियोजनाओं को सरकार लगातार मंजूरी देती रही। अब छोटी-बड़ी बाध परियोजनाओं की संख्या 500 से अधिक हो गयी है। जिस उत्तराखंड राज्य की आर्थिकी का आधार बागवानी और इस पर आधारित फल उद्योग को माना जा रहा था उसे भी सरकार के निकट रहने वाले पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। अब सरकार और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की शह पर रामदेव ने कचार, जैम, जैली और जूस का कारोबार उत्तराखंड से करने का मन बना लिया है। उसे यही राजनीतिक पार्टियां पुष्पित-पल्लवित कर रही हैं। आयुष प्रदेश का नारा देने वाली सरकार कब चुपके से पूरी जड़ी-बूटियां रामदेव को सौप दे कहा नहीं जा सकता। जंगल लोगों के नहीं, नदियां लोगों की नहीं अब घरों से विस्थापन का दंश लोग झेल रहे हैं। टिहरी के अलावा अन्य बांधों से विस्थापन की पीड़ा और बिगड़ते पारिस्थितिकी परिवर्तन के बीच पंचेश्वर बांध से एक लाख से अधिक लोगों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।
   मुख्यमंत्री पर्यावरण सरंक्षण और उससे हुये नुकसान की भरपाई का अनुदान मांग रहे हैं। उनकी मांग अपने सोचने के तरीके से जायज भी हो सकती है। लेकिन मुख्यमंत्री यह नहीं समझ पा रहे हैं बाड़ के अन्दर बाघ घुस आया है अब बकरी का बचना संभव नहीं है। जब हिंसक पशुओं के दांत एक बार शिकार कर देते हैं तो वह सिलसिला जारी रहता है। राजनीतिक लोगों की तो आदत हो गयी है मरी बकरी का मुआवजा मांगना। यह पहली बार नहीं हो रहा है। उत्तराखंड के साथ यह होता रहा है। यह सिलसिला रुकेगा भी नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण यहां के विकास और संसाधनों को बचाने की सोच न रखने वाले लोगों के हाथ में सत्ता का होना है। यदि ऐसा नहीं होता तो इस बीच पहाड़ के विकास के बारे में गंभीर काम करने के जितने भी मौके आये उनको सबने अपनी नासमझाी से गंवाया। केन्द्रीय विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान, एनआईटी आदि ऐसे मुद्दे थे जिन्हें बहुत गंभीरता से सुझाकर हम एक आदर्श राज्य के सपने को साकार कर सकते थे। इन सभी संस्थानों की स्थापना में कुमांउ-गढ़वाल और अपने राजनीतिक गुणा-भाग के हिसाब से तय करने की प्रवृत्ति रही। यह तब तक ठीक नहीं होगा जब तक विकास का एक सही दर्शन सामने न हो। दुर्भाग्य से राज्य में अपने को बेचकर मुआवजा मांगने वालों की सरकार है।

Charu Tiwari

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एक और आंदोलन की जरूरत

उत्तराखण्ड में उत्तरायणी का मेला धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जितना महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा यह नई चेतना और नये संकल्पों के साथ आगे बढने का पड़ाव है। सदियों से इस मेले से कई लोकोक्तियों और लोककथाओं की रचना हुयी। ये इस संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण और सार्थक हैं कि सरयू और गोमती के संगम से जल से संकल्प लेकर हमने आंदोलन के कई पड़ावों को देखा और प्रतिकार की धार को पैना किया है। कहा जाता है कि खांणि नि खांणी बागस्यर देखियाल। इसका अर्थ है कि खाने और न खाने वाले लोग बागेश्वर में देखेंगे। इस लोकोक्ति ने उस समय भी छुआछूत के खिलापफ आवाज उठाने के लिये बागेश्वर को ही चुना। पहले उत्तरायणी मेले को जब सांस्कृतिक रूप से मनाने की पंरपरा थी तो तब भी इसमें सामाजिक सरोकारों की व्यापक दृष्टि समाहित थी। रात-रात भर जागरण कर लोग गांवों में अपनी समस्याओं और उसके समाधान के रास्ते तलाशते रहे हैं। आजादी की लड़ाई के शुरुआती दौर में बागेश्वर से आजादी के स्वर मुखर होने शुरू हो गये थे। वर्ष 1921 में कुली बेगार के खिलापफ निर्णायक लड़ाई के लिये उर्जा भी बागेश्वर के बगड़ से मिली। यह एक दिन या एक स्वर की ताकत नहीं, बल्कि वर्षों से पनप रहे असंतोष की परिणति थी। इसका बागेश्वर में पफूटना इस दृष्टि से भी ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण था कि बाद की पीढ़ियों ने इससे सबक लिये, चेतना समेटी, आंदोलनों की अगुआई करना सीखा। इतना ही नहीं मुद्दों को शक्ल देने के लिये से प्रेरणा की जमीन के रूप में भी अपना आदर्श माना। यह हमारी सांस्कृतिक चेतना से उसी तरह आत्मसात हो गये जैसे सरयू और गोमती का संगम। यही संगम उत्तराखंड के जनसरोकारों से जूझने वाले लोगों को बल देने वाला है। इस बार भी सब लोग जुटेंगे। राज्य बनने के बाद नये संकल्प  लेने वालों का इंतजार संगम को है। पिछले कई दशकों से बगड़ में चेतना की हुंकार नहीं सुनाई दी।
   बागेश्वर कई आदंालनों का गवाह रहा है। 1916 में कुमांउ परिषद की स्थापना के बाद लगातार आजादी के आंदोलन के स्वर इस जमीन से उठते रहे। बोरगांव का चरखा वर्ध तक गया। चामी गांव ने आजादी के दीवानों को संरक्षण देने के साथ इस अलख को गांव-गांव तक पहुंचाने का काम किया। स्वरोजगार के लिये ग्रामीणों में चेतना और खादी को बढ़ावा देने का काम किया। बागेश्वर में कुली उतार आंदोलन ने महिलाओं को चूल्हे-चौके से बाहर निकालकर चेतना का नया आकाश दिया। 1929 में गांधीजी के बागेश्वर आने पर उनकी मुलाकात वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से हुयी। इसी बागेश्वर में उन्होंने गांधी टोपी पहनी। 1930 में पेशावर में उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का इतिहास रच दिया। आजादी के प्रमुख स्तभों में रहे बद्रीदत्त पांडे, हरगोबिन्द पंत, विक्टर मोहन जोशी, श्यामलाल गंगोला, मोहन सिंह मेहता, बिश्नी देबी साह, कुंती देवी, तुलसी देवी के अलावा उत्तराखंड में आजादी को नये स्वर देने वालों की यह जमीन रही है। आजादी के बाद भी यहां चेतना के नये स्वर उभरते रहे हैं। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, वन बचाओ, वन संरक्षण के खिलापफ आंदोलन और भ्रष्टाचार के प्रतीक कनकटे बैल ने भी इसी भूमि से अपनी हुंकार भरी। आंदोलन के कई पड़ाव इस जमीन ने देखे हैं। उम्मीद की जानी चाहिये कि यह जमीन पिफर पहाड़ के पुनर्निमाण के लिये गोमती-सरयू संगम से कोई संकप लेगी।
   बागेश्वर में उत्तरायणी मेले के साथ ही कुंभ मेले की तैयारी चल रही है। इसी दिन से कुंभ मेला भी शुरू होगा। सरकार की ओर से सबका स्वागत किया जा रहा है। विज्ञापनों में बताया जा रहा है कि देवभूमि में आपका स्वागत है। भारी संख्या में पुलिस बल की व्यवस्था की जा रही है। पड़ोसी राज्यों से भी पुलिस मंगाई जा रही है। सरकार के दावों की पोल प्रदेश में अपराधें ने खोल दी है। कालाढूंगी और रामनगर कांडों के खून के ध्ब्बे अभी सूखे भी नहीं थे कि हल्द्वानी में एक स्कूली छात्रा अपहरण कर हत्या कर दी गयी। हल्द्वानी में ही एक नर्सिग होम में इलाज के लिये आयी महिला के साथ बलात्कार का मामला सामने आया है। रिषिकेश में चलती कार में एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ। बागेश्वर जनपद के गरुड विकास खंण्ड के पूर्व प्रमुख चतुर सिंह परिहार की हत्या ने सबको सन्न कर दिया। ये सब अपराध् सिपर्फ दस दिन के अन्दर हुये हैं। इनके अलावा अपेक्षाकृत शांत माने जाने वाले पहाड़ में लगातार अपराधों का ग्रापफ बढ़ रहा है। मुख्यमंत्राी और उनकी सरकार शब्दों की लपफाजी से इन्हें सामान्य मान रही है। जिस हरिद्वार में गंगा स्नान कर लोग अपने को धन्य समझते थे उसमें डुबकी लगाने की इजाजत भी अब टिहरी हाइडो पा्रेजक्ट देगा। सरकार इस बात पर खुश है कि टिहरी से लोगों के लिये पानी छोड़ने की मांग परियोजना के कर्ताधर्ताओं ने मान ली है। गंगा में स्नान के अलावा अपनी परिजनों की अन्तेष्टि के लिये घाटों पर पानी छोड़ने के लिये ग्रामीणों को अनुमति लेनी पड़ती है। अब बागेश्वर के सरयू-गोमती की बारी है। यहां सरयू पर बन रहे बांध् ने इस बात के संकेत दे दिये हैं कि जिस सरयू को  तुम अपना अराध्य मानते हो वह अब एक निजी कंपनी की मल्कियत होने जा रही है। पहाड़ में जिन नदियों से हम आप संकल्प लेते रहें हैं उन्हें निजी हाथों को या तो बेच दिया है या बेचने की तैयारी है। गढ़वाल में सारी नदियों को जेपी और थापर के हवाले करने के बाद लुटेरे अब बची हुयी नदियों पर नजरें गढ़ायें हैं।
   बढ़ते अपराध् और लुटती नदियों का भारी अर्न्तसंबंध् है। संसाधनों पर लूट और राजनीतिक संरक्षण से इन्होंने पहाड़ चढ़ना शुरू किया है। जीवनदायनी नदियां और हमारी चेतना की प्रतीक नदियां अब मापिफया के हाथों में जा रही हैं। इसी रास्ते अपराध आ रहे हैं। इन्हें पूरी तरह हमारी नासमझ सरकारें पोषित कर रही हैं। राज्य बनने के बाद का यह पहा दशक है जिसमें उत्तराखण्ड के लोगों ने कोई प्रतिकार नहीं किया है। इससे पहले उत्तराखण्ड में बीस-तीस का दशक आजादी के लिये एकजुट होने का, चालीस का दशक भारत छोड़ों आंदोलन और टिहरी रियासत के खिलापफ लड़ने का, पचास-साठ का दशक हिमालय की हिपफाजत के लिये, सत्तर का दशक युवा चेतना और वनों को बचाने का, अस्सी का और नब्बे का दशक राज्य आंदोलन का रहा है। अब राज्य बन गया है। जो लोग इन लड़ाइयों और चेतना में साथ नहीं थे वे बारी-बारी यहां के नीति नियंता बन बैठे। सरयू-गोमती के संगम से इस बार नई चेतना के स्वर उभरें। एक नई ताकत के साथ अपनी धरोहरों को बचाने के लिये एक ओर कुली बेगार आंदोलन चलाने की उम्मीद की जानी चाहिये।

Charu Tiwari

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मजबूर जनता, निरंकुश सरकार

उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान जनकवि ‘गिर्दा’ ने एक गीत के माध्यम से राज्य के भावी स्वरूप का खाका खींचा था। उन्होंने इस गीत के माध्यम से सपन्न और आत्मनिर्भर राज्य बनाने की जरूरत पर जोर दिया था। राज्य बनने के लगभग एक दशक बाद इस गीत की प्रासंगिकता अध्कि हो गयी है वह इसलिये भी क्योंकि नासमझ लोगों के हाथ में सत्ता होने से अब बेरोजगार आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। ‘गिर्दा’ ने बागस्यरौक गीत से अपने गीत की रचना की थी। इस लंबे गीत कुछ पंक्तियां आज राज्य की व्यवस्था सुधारने और नवनिर्माण के लिये प्रेरित करती हैं-
कस हलो उत्तराखंड कस हमार नेता,
कस हलों पधन गौं क कसि होली व्यवस्था।
जड़ि-कंजड़ि, उखेलि सबुकें पिफर पफैसाल करूलो,
उत्तराखंड ल्यू उकड़ि मनकस बडूंलो।
भ्यौव नि पडेलि दिदी-भुली, रौ नि पडल भाई,
बरोजगार नि मांजला दिल्ली म कढ़ाई।
सब जतन करिबे, हम यस अलख जगूलो,
उत्तराखंड ल्यूल उकड़ि मनकस बडूंलो
   
अर्थात हम ऐसा राज्य बनाना चाहते हैं जिसमें ग्राम प्रधन से लेकर बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनपक्षीय लोग शामिल होंगे। इस बारे में हम जनता से पूरी बहस कर पफैसला करेंगे। इससे अपने मन जैसा राज्य बनायेंगे। ऐसा राज्य जिसमें कोई बहन पहाड़ से कूदकर अपनी जान नहीं देगी, कोई भाई नदी में कूदकर आत्महत्या नहीं करेगा। पहाड़ के बेरोजगार दिल्ली में जाकर बर्तन मांजने को मजबूर नहीं होंगे। ‘गिर्दा’ के इस गीत में उत्तराखंड के उन लाखों लोगों की भावनायें और उम्मीदें समाहित थी जो एक बेहतर राज्य का सपना देखते थे। उसके लिये जनता ने संघर्ष किया, 42 लोगों ने अपनी शहादतें दी। राज्य भी बन गया, लेकिन वह राज्य नहीं जो ‘बागस्यरोक गीत’ में अभिव्यक्त था। उत्तराखंड राज्य इस गीत के बिल्कुल उलट मिला। अर्थात जनभावनाओं को कुचलने और अभिव्यक्ति का गला घोंटने वाला राज्य। सरकारी नीतियों के चलते भाई-बहनों को आत्महत्या के लिये मजबूर करने वाला राज्य। दमन करने वाले पुलिसकर्मियों को पुरस्कृत करने वाला राज्य।
   यह गीत राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार और उसके मुखिया को आइना दिखाने के लिये कापफी है। उन लोंगों के लिये भी जो लोकतंत्रा में विश्वास का आवरण ओढे हैं। पिछले दिनों अस्थाई राजधनी देहरादून में शिक्षा मित्रों के साथ जो हुआ उससे इस सरकार के जनविरोध्ी चरित्रा को समझा जा सकता है। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर शिक्षा मित्रा और अनुदेशक ध्रने पर बैठे हैं। 720 दिन से विधनसभा के सामने ध्रने पर बैठे इन शिक्षकों की बात सुनने के लिये सरकार तैयार नहीं थी। गणतंत्रा दिवस के मौके पर संगठन के अध्यक्ष पूर्ण सिंह राणा ने आंदोलनकारियों की बात न सुनने के विरोध् में टावर पर चढ़कर आत्मदाह का प्रयास किया। इस बहरे गणतंत्रा में राणाओं के पास आत्महत्या करने के अलावा चारा भी क्या बचा है? यह घटना उस समय हुयी जब प्रदेश के मुख्यमंत्राी अपने लोगों को मानद मंत्राी की रेवडियां बांट रहे थे, विधनसभा सदस्यों के वेतन में भारी वृद्धि की जा रही थी। सरकार की संवेदहीनता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने राणा और उनके साथियों को संगीन धराओं में बंद कर दिया जबकि लोकतंत्रा में अभिव्यक्ति का गला घोंटने वाले पुलिसकर्मियों को पांच लाख का पुरस्कार भी दे दिया। इतना ही नहीं सरकार के खिलापफ आवाज उठाने वालों को रोकने की बहादुरी करने वाले पुलिस अध्किारी को वीरता सम्मान से नवाजने की तैयारी है।
   उत्तराखंड में इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुयी है। इस सरकार की नीतियों से आहत कई लोग पहले भी आत्महत्या या आत्महत्या प्रयास कर चुके हैं। इससे पहले एक शिक्षक मित्रा ने अपने प्रमाण पत्रों के साथ नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। हल्द्वानी में सुशीला देवी अस्पताल के कई निविदाकर्मियों ने जहर पीकर आत्महत्या करने का प्रयास किया था। पिछले दिनों विकलांग संगठन के पदाधिकारियों ने भी आत्मदाह करने की कोशश की थी। ये लोग दो साल से ध्रने पर बैठे हैं। पिछले दो साल से आंदोलनरत एलटीटी प्रशिक्षितों ने भी कई बार जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। इस सिलसिले के रुकने के आसार भी नहीं हैं। इस समय प्रदेश में दा दर्जन से भी अधिक आंदोलन चल रहे हैं। पिछले दिनों विगांग संगठन के पदाधिकारियों ने भी आत्मदाह करने की कोशश की थी। राजधनी गैरसैंण को लेकर बाबा उत्तराखंडी और नशे के खिलापफ निर्मल पंडित को आत्मदाह करना पड़ा। यह एक बानगी है उस उत्तराखंड राज्य की जिसकी कल्पना में कहा गया था कि हम किसी भाई को नदी में डूबकर आत्महत्या नहीं करने देंगे, किसी बहन को पहाड़ से गिरकर मरने को मजबूर नहीं करेंगे। दिल्ली में जाकर बर्तन मांजने की मजबूरी नहीं होगी। इस एक दशक में उन सपनों को टूटते हुये लोग देख रहे हैं। सरकार के विकास और लोगों के लिये किये गये बेहतरी के दावों के विपरीत पूरा उत्तराखंड असंतोष की आग में जल रहा है। कर्मचारी संगठनों से लेकर गांवों में मूलभूत समस्याओं को लेकर लगातार आंदोलन चल रहे हैं। असल में राज्य में बारी-बारी से सत्ता में आये लोग कभी ‘बागस्यरक गीत’ के साथ न कभी रहे और न उनकी ऐसी भावना रही। इस सरकार में पिफर राणाओं को आत्महत्या के लिये टावरों में चढ़ना पड़ेगा। कोई पुलिस अध्किारी उसे जेल भेजने के एवज में पुरस्कार प्राप्त करता रहेगा।
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Pooran Chandra Kandpal

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Dear Kukreti ji, uttrakhand mein kumauni and garhwali bhashaon ki
abhi tak bhasha parishad nahi hai aur bhasha academy bhi nahi hai.
Rajniti wale vote mangne ke samay hi kumauni or garhwali bolte hain.
Baad mein we eng or hindi bolte hain.  Uttrakhand mein Kumauni and
Garhwali class vi se viii tak sanskrit ki tarah eak bhasha ke taur
par sikhayi jani chahiye.  Kurshi mein baithe log kahte hain 'achchhi
salah hai. is par sonchenge.  fir baad mein koi nahi sochta. ek sawal
seedha hai "yadi hamein Kumaouni aur Garhwali bolni -likhni nahi aati
to hamare paas kya hai jisse ham kah saken ki ham Uttrakhandi hain.
pooran chandra kandpal. (do kumauni kitabon ' ukao-horao' and
'bhal karau chyala tweel" ka lekhak)

Charu Tiwari

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स्मृति शेष
निर्मल के मायने

निर्मल भाई के निधन की खबर विश्वास करने वाली नहीं थी। तमाम मित्रों से फोन पर बातचीत से इस बात पर यकीन करना पड़ा। नैनीताल में जब पढ़ाई के लिये गया तो उसे समय तक निर्मल मुबंई चले गये थे। नैनीताल में जनसरोकारों से जुड़ी नाट~य संस्था युगमंच के माध्यम से उनके काम और ताकतवर हस्तक्षेप से परिचित था। मेरे ही पड़ेासी गांव पान के होने से मुझे नैनीताल में उनके रंगमंचीय सरोकार और आगे बढ़ने संभावनाओं पर खुशी भी होती। लेकिन लंबे समय तक चाहते हुये भी कोई संपर्क नहीं हो पाया। उसका सबसे बड़ा कारण उनका अपने काम में व्यस्त और हम लोगों का राज्य आंदोलन में सकिzय होना रहा। निर्मल भाई से पहली बार मिलना वर्ष 2002 में हुआ। उत्तराखंड राज्य के शिल्पी और प्रखर समाजवादी नेता स्व. विपिन त्रिपाठी के चुनाव प्रचार में वे अपने क्षेत्र में आये। मैं उस समय नोएडा के एक समाचार पत्र में काम करता था। मुझे त्रिपाठीजी के चुनाव प्रचार के लिये जाना था। जब पहाड़ जाने की तैयारी कर रहा था तो विपिन दा ने बताया निर्मल भी साथ रहेंगे। वे चाहते थे कि जहां भी निर्मल रहें वहां मंच का संचालन मैं ही करूं।
   मैं दिल्ली से अपने घर बहुत सबेरे पहुंचा ही था कि त्रिपाठीजी ने गाड़ी भेजकर मुझे तुरंत द्वाराहाट आने को कहा। मुझे बताया गया कि दस बजे द्वाराहाट के ऐतिहासिक शीतल पुष्कर मैदान में निर्मल पांडे की जनसभा होगी। द्वाराहाट पहुंचने तक निर्मल को देखने-सुनने के लिये लोगों हुजूम जुट गया था। यह उत्तराखंड की विधानसभा के लिये पहला चुनाव था। जैसे ही निर्मल द्वाराहाट पहुंचे लोगों में उनकी एक झलक पाने की होड़ लग गयी। रमेश दा की दुकान में उनकी चाय-पानी की व्यवस्था हुयी और हम मंच तैयारी में जुट गये। एक देखकर आश्चर्य हुआ कि गांवों के लोगों में निर्मल के प्रति बहुत आकर्षण था। द्वाराहाट की सड़क, मंच और घरों की छतों के अलावा पेड़ों पर भी लोग बैठ गये थे। उनसे मिलने के लिये लोगों का इतना बड़ा रेला जुटा कि हम लोग मंच से गाड़ी तक लोगों धक्कों से ही पहुंच गये। रमेश दा की दुकान, मंच, उनके घर पान से लेकर चौखुटिया तक की यात्रा में ही उनके साथ रहने का मौका मिला। यही उनसे पहली और अंतिम मुलाकात थी। इस बीच एक-आध बार फोन पर बातचीत जरूर हुयी। हम चाहते थे कि वह प्रवास में रह रहे युवाओं की संस्था किzएटिव उत्तराखंड म्यर पहाड़ से जुडे। हमने उनसे इस बारे में बातचीत की थी। उस समय वह पहाड़ के रमंचीय सरोकारों और यहां फिल्म उद्योग की संभावनाओं को तलाश रहे थे। हमारी जानकारी में यह बात भी थी कि वे पहाड़ के विषयों पर फिल्म और धारावाहिकों के निर्माण के बारे में सोच रहे हैं।
   निर्मल को उत्तराखण्ड के लोग हमेशा एक आइकाWन की तरह देखते थे। द्वाराहाट और चौखुटिया के बीच संभzात माने जाने वाले बैरती-पान गांव से मुबंई के फिल्म आकाश तक की उनकी यात्रा एक प्रतिबद्ध रंगमंचीय प्रतिभा की जिजीविषा को समझने के लिये काफी है। अपनी जमीन से जुड़ाव और उसके प्रति उसकी संवेदनाओ को हमने उनके साथ रहकर बहुत कम समय में बहुत करीब से देखा। अपने भाषण में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ‘‘हमारी सफलता का मूल्यांकन सिर्फ अपने क्षेत्र में विशिष्ट स्थान पा लेना नहीं है। इस सफलता का अर्थ तभी है जब वह हमारे समाज के काम आये। उस समाज के जो हमसे बेहतर कल की उम्मीद करता है। उसकी उम्मीदें और उसकी अपेक्षाओं की नींव पर ही हमारा भविष्य टिका रहता है। निर्मल ने कहा कि जब वे पहाड़ को छोड़कर गये थे तो उनकी पहाड़ की आमाओं और ईजाओं की पीठ पर समस्याओं का बड़ा बोझ लदा रहा। पान से मुबई और विदेशी फिल्म, नाटकों में काम करने से मुझ जैसे लोगों को नाम और पैसा मिल गया। इतने वर्षों के बाद देख रहा हूं कि ईजाओं और आमाओं की पीठ से हम बोझा नहीं उतार पाये। यह पीड़ा मेरा पीछा नहीं छोड़ रही है। इसलिये एक बेहतर समाज के निर्माण के लिये हमें अपनी प्रतिभा और विशेषज्ञता का लाभ आम जनता तक पहुंचाना होगा।’’
   उनकी फिल्म ‘बेंडिट क्वीन’ में विकzम मल्लाह के किरदार को देखकर यह विश्वास करना सहज नहीं था कि पहाड़ का कोई लड़का ऐसी गाली भी दे सकता है। वह भी निर्मल पांडे जैसा जिसकी रंगमंचीय परवरिश दूसरे माहौल में हुयी। लेकिन उन्होंने इस किरदार के माध्यम से प्रतिकार की जिस धारा का प्रतिनिधित्व किया उसका लोहा सबने माना। निर्मल पर कभी फिल्मी ग्लैमर का रंग नहीं चढ़ा। यही कारण था कि उन्होंने हमेशा सार्थक सिनेमा को ही अपनी प्राथमिकता में रखा। फिल्मी दुनिया में सब कुछ पा लेने की आपाधापी से भी वे हमेशा दूर रहे। इसके लिये किसी तिकड़मबाजी का सहारा भी नहीं लिया। बावजूद एक रंगकर्मी, फिल्मी अभिनेता और एक सफल टीवी एंकर के रूप में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। इससे भी ज्यादा एक सहज और जिंदादिल इंसान के रूप में हम सबके बीच हमेशा मौजूद रहेंगे।
   निर्मल पांडे राष्टीय नाट~य विद्यालय को छोड़ने के बाद वे तारा थियेटर गुzप के साथ लंदन चले गये। वहां उन्होंने हीर-रांझ जैसी प्रेम कहानी पर आधारित नाटक का मंचन किया। इसके अलावा उन्होंने 125 से ज्यादा नाटकों में छोटे-बड़े किरदार निभाये। उन्हें पहली बार 1996 में शेखर कपूर की फिल्म बेंडिट क्वीन में नई पहचान मिली। विकzम मल्लाह के किरदार को जिस तरह उन्होंने जिया वह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। इसके बाद 1996 में ही अमोल पालेकर की फिल्म दायरा, 1998 में टेन टू पाकिस्तान, इस सुबह नहीं और हम तुम पर मरते हैं जैसी फिल्मों में अपनी अभिनय का लोहा मनवाया। इसके अलावा उन्होंने ललिता, प्यार किया तो डरना क्या, वन टू का फोर और शिकारी फिल्में में काम किया। निर्मल पांडे ने वर्ष 2005 में स्टार प्लस पर प्रसारित नाटक हातिम और प्रिंसेज डाWली और उसका मैजिक बैग में काम किया। निर्मल अभिनेता के साथ एक अच्छे गायक भी थे। उन्होंने वर्ष 2002 में जज्बा नाम से एक एलबम भी रिलीज किया। उन्होंने अंधायुग नाटक का निर्देशन किया। उन्होंने वर्ष 1994 में उन्होंने संवेदना नाम से थियेटर गुzप चलाया। नई प्रतिभाओं को मौका देने के लिये उन्होंने गाजियाबाद में फzेस टेलेंट एकेडमी के नाम से संस्थान की शुरुआत की। इसके माध्यम से कई कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। इसके अलावा एक टीवी चैनल पर उनका लोकप्रिय कार्यकzम दिवानगी चलता था। रंगमंच और फिल्मों में उनके योगदान के लिये उनहें कई पुरस्कारों से नवाजा गया। फzांस फिल्म फेस्टेबल में दायरा में निर्मल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्राी का पुरस्कार दिया गया। निर्मल का जाना न केवल रंगमंच के लिये एक बड़ क्षति है, बल्कि आम लोगों की संवेदनाओं से जुडे एक बेहतर इंसान का जाना भी है।

निर्मल का रंगमंचीय सफर
फिल्म                        वर्ष         किरदार
लाहौर                        2010      अनवर सिक्का
कैदी, तेलगू फिल्म              2010     
देशदzोही                   2008      नागेश कुलकर्णी
राजकुमार आर्यन, टीवी सीरियल         2008      सेनपति भुजंग
आजा नचले               2007      इंस्पेक्टर
प्रिंसेज डाWली और उसका मैजिक बैग      2005      सिंदबाद दि सेलर
ललिता                  2005      फिल्म स्टार
पथ                  2003      भुल्लर
हातिम, टीवी सीरियल            2003     
आंच                  2003      कीर्ति ठाकुर
दीवानगी                  2002      अभिजीत मेहता
वन टू का फोर               2001      कृष्णकांत बिरमानी
शिकारी                  2000
दुबई, मलायालम फिल्म            2000     
हद कर दी आपने            2000      संजय
हम तुम पे मरते हैं            1999      धनंजय
गाWडमदर                  1999     
जहां तुम ले चलो            1999
प्यार किया तो डरना क्या            1998      ठाकुर विजय सिंह
टेन टू पाकिस्तान               1998
औजार                  1996
इस रात की सुबह नहीं            1996      आदित्य
बेंडिट क्वीन               1994      विकzम मल्लाह   
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Charu Tiwari

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त्ता जीती, उकzांद हारा

उत्तराखण्ड कzान्ति दल का बहुप्रतीक्षित द्विवार्षिक सम्मलेन भारी हंगामे के बाद समाप्त हुआ। नैनीताल जनपद के पीरुमद्वारा के एक बैंकट हाWल में सत्ता की धनक और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का जो खेल कथित नेतृत्व ने खेला उसे दूर-दराज से आये कार्यकर्ताओं में भारी मायूसी छाई रही। कार्यकर्ताओं की सरकार से समर्थन की वापसी की बात को नेताओं ने नहीं सुना। इतना ही नहीं दो साल में होने वाले कार्यकर्ताओं  के इस आम जलसे में पार्टी ने यह संदेश भी दिया कि अब वह जनसरोकारों से काफी दूर जा चुकी है, जहां से उसका लौटना अब संभव नहीं है। इस दो दिन के सम्मेलन में मुद~दों की जगह जिस तरह नेताओं ने अपने अंह से अध्यक्ष के चुनाव को टाला उससे एक आंदोलनकारी संगठन के लोकतांत्रिक स्वरूप पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं। चालीस प्रस्ताव पारित कर जिस तरह इस सम्मेलन की खानापूर्ति हुयी उससे क्षेत्रीय पार्टी की कमजोर राजनीतिक समझ ही परिलक्षित होती है। दो दिनों तक हंगामे के अलावा इस सम्मेलन की उपलब्धि शून्य रही।
   उल्लेखनीय है कि कभी राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाले उत्तराखण्ड कzान्ति दल ने अपनी विचारधारा के विपरीत प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया। दल के जमीनी कार्यकर्ताओं ने इस समर्थन का विरोध किया था, लेकिन पार्टी के कथित सर्वोच्च निर्णायक मंडल ने देहरादून में बैठकर कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ सरकार को समर्थन दिया। इन तीन सालों में विभिन्न बैठकों और अपने बयानों में पार्टी का एक बड़ा तबका इसके खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा। भाजपा ने दल के एक विधायक को केबिनेट मंत्री और दो को लालबत्ती से नबाजा। पार्टी के शीर्ष नेता माने जाने वाले काशी सिंह ऐरी ने भी संबसे कम महत्व के हिल्टान जैसे विभाग का अध्यक्ष बनना स्वीकार किया। संगठन और नेताओं के बीच यह विरोध लगातार जारी रहा। पिछले मसूरी सम्मेलन में भी सरकार से समर्थन वापसी का मुद~दा छाया रहा, लेकिन कार्यकर्ताओं की बात सुनने वाला कोई नहीं था। इन तीन वर्षों में भाजपा ने अपने सहयोगी पार्टी को महत्वहीन बनाकर कहीं का नहीं छोड़ा। एक तरफ जहां पार्टी के नेता देहरादून में सत्ता सुख भोगने में लगे रहे वहीं कार्यकर्ता गांवों में लोगों के सवालों से जूझते रहे। कार्यकर्ताओं को इस सम्मेलन का इंतजार था। वे चाहते थे कि 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुये सरकार से तुरंत समर्थन वापस लिया जाना चाहिये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अध्यक्ष पद के लिये जिस तरह की औछी राजनीति हुयी उसने पार्टी की रही-सही साख पर भी बट~टा लगा दिया।
   पार्टी के कार्यकर्ताओं के अलावा उत्तराखण्ड कzान्ति दल का यह सम्मेलन उन तमाम शक्तियों के लिये भी निराशा भरा रहा जो राज्य के आमजन से उठे सवालों को एक मंच से उठाने की पैरवी करता रहा है। वह मानता रहा है कि बिना उकzांद के किसी तीसरे गठबंधन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। सबको इस बात का भी इंतजार था कि देर से ही सही आंदोलन की ध्वजवाहक रही इस पार्टी के नेताओं को अक्ल आयेगी। लेकिन इस बार बिल्कुल उल्टा हुआ। पार्टी में जिस तरह कार्यकर्ताओं की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं का गला घोंटा उसने राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के प्रति लोगों के जनविश्वास को और कमजोर किया है। उकzांद भाजपा से समर्थन के जिन नौ बिन्दुओं की बात करता रहा है, उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है। इस समर्थन पर सवालिया निशान लगाने वाला सबसे बड़ा मुद~दा स्थाई राजधानी गैरसैंण है। इस सरकार के साथ रहते हुये दीक्षित आयोग का कार्यकाल दो बार बढ़ा, जिसे पार्टी हमेशा असंवैधानिक मानती रही है। आश्चर्यजनक बात यह है कि जब सदन में इस आयोग की रिपोर्ट गयी तो पार्टी की ओर से इस पर कोई ठोस प्रतिकार नहीं किया गया। पार्टी के युवा विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने आयोग की रिपोर्ट को सदन में ही फाड़ दिया था, लेकिन पार्टी के मंत्री ने इसे उनका व्यक्तिगत नजरिया कहकर कमजोर कर दिया। पार्टी के शीर्ष नेता भाजपा के जिला स्तर के नेताओं के सामने भी गिड़गिड़ाते रहे। सरकार के साथ गलबहियां करते जहां एक ओर भाजपा की कृपा से पद पाने और कहीं समारोहों में एक सीट पाने जैसी छोटी आंकाक्षाओं के चलते इस पार्टी के इतिहास बनने का रास्ता तैयार किया।
   असल में उकzांद में राजनीतिक समझ का भारी अभाव रहा है। संगठन में पिछले तीन-चार वर्षों से जिस तरह के लोग और जिस तरह की प्रवृतियों ने घुसपैठ की है उसने कभी जनसरोकारों के लिये खड़ी एक बड़ी जमात के सपनों को न केवल कुचला है बल्कि आने वाली स्वस्थ राजनीतिक समझ वाले लोगों के रास्ते को भी रोका है। झोला लटकाकर और चंदा कर सम्मेलनों में ओने वालों की जगह बड़ी गाड़ियों ने ले ली है। सैकडों कारों में उत्तराखण्ड कzान्ति दल के पदाधिकारियों के चमचमाते बोर्ड हैं। रहने के लिये रेस्ट हाउस और रिसोर्ट हैं। देहरादून में बैठकर लाइजिंनिग करने वाला का एक नया वर्ग पैदा हुआ। जिला पंचायत के हाWल में दरी में बैठकर राज्य बनाने और उसे संवारने की चिंता करने वालों की जगह बैंकट हाWल और नेताओं के बैठने के लिये धुली चादरों का मंच है। ऐसे में आम कार्यकर्ता की हैसियत क्या होगी यह सहजता से समझा जा सकता है। रामनगर में संपन्न इस सम्मेलन का कुल संदेश यही था। तीस साल पहले एक बड़े उद~देश्य और बेहतर राज्य का सपना देखने वाले लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनकी विरासत ऐसे लोगों के हाथों में चली जायेगी जो उसे नोंच-नोंच कर खा जायेंगे। उत्तराखण्ड कzान्ति दल की दुर्गति किसी काशी सिंह ऐरी या दिवाकर भट~ट के सत्ता सुख से उपजी पतन की कहानी नहीं, बल्कि उन लोगों की असहय पीड़ा है जिन्होंने तीन दशक तक अपना सबकुछ त्याग कर एक बेहतर राज्य का सपना देखा था। इसी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिये पुराने कार्यकर्ता इस सम्मेलन में गये थे, लेकिन यहां सत्ता जीत गयी और उकzांद हार गया। अब कौन रोयेगे उकzांद के लिये।

Charu Tiwari

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मत मारो मोहना पिचकारी

उत्तराखण्ड के जनकवि शेरदा ‘अनपढ’ की होली पर बनी एक कविता प्रतिवर्ष होली में व्यवस्था के खिलाफ रंग डालने को प्रेरित करती है। कविता है-
मत मारो मोहना पिचकारी,
पैलिके छू मंहगाई मारी
मत मारो मोहना पिचकारी...
   शेरदा की मंहगाई पर लिखी यह कविता आज देश और उत्तराखण्ड की व्यवस्था पर सटीक चोट करती है। अब पिचकारी भी कहां मारूं। जहां-तहां बदरंग व्यवस्था पर कोई रंग चढ़ेगा भी नहीं। सुविधाभोगी रंग में रंग चुके उत्तराखण्ड के नीति-नियंताओं पर कोई रंग नहीं भा रहा है। यहां एक ही रंग है सत्ता का। उसके लिये हौल्यार भी अलग हैं और आयोजक भी अलग। इसमें जनता नहीं पूंजीपति शामिल होते हैं। इसमें बांधों का रंग है, सिडकुल में उद्योग लगाने का जुगाड़ है, देहरादून में बैठकर दलाली करने वालों की जमात है, टासंफर पोस्टिंग है, माफिया-अधिकारी और नेताओं का गठजोड़ है। ये सब मिलकर नई होलियों की रचना कर रहे हैं। बोल बदल गये हैं, संगीत बदल गया है अब होली के स्थान भी बदल रहे हैं। जनता ने कहा हमारी होली गैरसैंण में तो पार्टियों ने कहा देहरादून में। इस नहीं होली की जील उठाने वाले कहीं थापर है तो कहीं, जेपी। कहीं नैनो लगाने वाला टाटा है तो कहीं सब्सिडी डकार भागने वाले उद्योगपति। सत्ता की होली में अब राष्टीय ही नहीं क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी शामिल होने लगे हैं। गांव में होली खेलने के लिये लोग नहीं हैं। सरकार बाहर से हाल्यारों को बुला रही है। कभी बोगश्वर मेले में तो कभी गौचर में। इसके अलावा हर शहर में महोत्सव मनाकर वह पहाड़ को रंगना चाहती है। मुबई से कलाकार आ रहे हैं। नगर पालिकाओं को भारी बजट सौंपा जा रहा है कार्यकzम करने के लिये। इसके अलावा विरासत जैसी संस्थायें हैं पहाड़ की संस्कृति की पहरेदार। होलियों को संरक्षित यही करेंगी। सरकार ने ऐसे ही हजारों एनजीओ ओ अपना एजेंट बनाया है। पूरे वर्ष सरकार ने जनता के साथ खूब होली खेली। बेरोजगार कहां  होली खेलें। विधानसभा के आगे पहरा है। ज्यादा अपनी बात करोगे तो सरकार डंडों की होली खेलेगी। गोली से होली खेलेगी। आत्महत्या के लिये मजबूर करने की होली खेलेगी। हल्द्वानी में बेरोजगारों को जहर पीने की होली ोलनी पड़ी। देहरादून में राणा को टावर में चढ़कर आत्महत्या की हाली खेलनी पडी। पूरे पहाड़ में अपराधों की होली खेली जा रही है। देहरादून में नये हाल्यारों की मौज है। राजनीतिक छुटभैयौं को लालबत्ती मिल रही है। मुख्यमंत्राी हर महीने, हर साल एक पुस्तक लिखकर होली खेल रहे हैं। महंगे ग्लैज पेपर पर अपना फोटो छपवा रहे हैं। शहरों में अपने चमचों के माध्यम से अपने को राष्टकवि घोषित करने में लगे हैं। उनके लिये पूरे साल भर होली ही होली है। देश-विदेश में लोग उन्हें सम्मानित कर रहे हैं। उन्हें उर्जा प्रदेश का मुख्यमंत्राी बताया जा रहा है। उस प्रदेश का जहां इस समय आठ घंटे की विद्युत कटौती चल रही है।
   खैर, होली में इस तरह के रंग घुस गये हैं। यही परेशानी है। इन रंगों ने उत्तराखण्ड के रंग को बदलना शुरू किया है। बदरंग होली की इस प्रवृत्ति के खिलाफ नई होली की रचना का समय आ गया है। उत्तराखण्ड आंदोलनों की जमीन रही है। यहां आंदोलन भी होली रंगों मे सराबोर हो जाते हैं। आंदोलन के दौर में ऐसी होलियों की रचना हुयी है जो व्यवस्था पर तो चोट करती ही है, जनता को संघर्ष का संदेश भी देती थी। जनकवि ‘गिर्दा’ द्वारा रचित एक होली विदेशी कंपनियों के खिलाफ माहौल बनाती है। इस तर्ज पर उत्तराखण्ड की व्यस्था पर एक होली पिछले दिनों हमारे साथियों ने गायी। यह होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आप सबको प्रेषित-
झुकि आयो शहर में व्यापारी
अलिबैर की टेर गिरधारी। झुकि...
उद्योगपतियों की गोद में बैठी,
निशंक मारो पिचकारी। झुकि...
देहरादून में लूट मची है,
आओ लूटो व्यापारी। झुकि...
एनजीओ से विकास की रचना
सरदार बने अफसर भारी। झुकि...
झूठ रचो, प्रपंच रचो है,
विकास पर विज्ञापन भारी। झुकि...
कमल का फूल, कांगzेस की विरासत,
लालबत्तियों की भरमारी। झुकि...
यूकेडी को दोस्त बनाकर,
गैरसैंण पर साजिश भारी। झुकि...
अपराधी पहाड़ चढ़े हैं,
निशंक की कविता न्यारी। झुकि...
माफिया ठेकेदार, पहाड़ को लूटें,
नेताओं को सत्ता प्यारी। झुकि...
इस होली के संकल्प बडो है,
अबकी है जनता की बारी। झुकि..

धनेश कोठारी

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          ‘मेरा पहाड़’ और ‘जनपक्ष आजकल’ पत्रिका के माध्यम से मैं चारु तिवारी जी के लेखों से हाल ही में परिचित हुआ। उनके तेवरों में जो युवापन है, वह काबिलेगौर है। क्योंकि उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद पहाड़ की पत्रकारिता में अब ऐसी हिकमत लगभग नदारद ही दिखती है। जिस तरह से राज्य निर्माण के बाद पहाड़ को हर स्तर पर बेचने, लुटने, खसोटने और नीलाम कर दिये जाने के करतब जारी हैं। ऐसे में हम इसे कब तक ‘पहाड़ी राज्य’ कह पायेंगे, कहना मुश्किल है।
            होली के परिदृश्य में चारु जी ने अपने नये आलेख में राज्य की जैसी पड़ताल की है, वह सच है। आज यहां हौल्यार (राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, नौकरशाह, ठेकेदार, माफिया, एनजीओ इत्यादि) जी भरकर होली खेलने में ‘रौंस’ महसूस कर रहे हैं। यहां तक कि चौथा पांया भी आदमकद विज्ञापनों और कथित मेहरबानियों की बदौलत भरपूर उत्तेजना में लगता है। अगर कोई मायूस है तो वह यहां का ऐसा युवा है जिसके पास न सोर्स है, न धन और न आसान पहुंच।
मुझे लगता है कि चारु जी की जीवटता को सलाम ही नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि जन- पक्ष में उनका समर्थन भी किया जाना बाजिब होगा। वरना ‘गिर्दा’ की कविता ‘झूकी आयो शहर में व्यापारी’ के ‘यथार्थ’ से हमें कोई शायद ही बचा पायेगा।


Charu Tiwari

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हम अपने इतिहास को कैसे याद करें

उत्तराखण्ड के मौजूदा सवालों को समझने के लिये हम अतीत के कई ऐतिहासिक संदर्भों को को उठाकर उनकी आज की प्रासंगिकता को जोड़कर देख सकते हैं। इस बीच कई ऐसे मौके आये और आने वाले हैं जिनसे संवाद का एक बड़ा फलक तैयार किया जा सकता है। पिछले दिनों उत्तराखण्ड की पत्रकारिता के युग पुरुष आचार्य गोपेश्वर कोठियाल की जन्म शताब्दि पर एकजुट हुये समाज के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं ने मौजूदा सवालों पर चिन्तन किया। यह मौका कई संदर्भों में बहुत महत्वपूर्ण था। पहला आज के दौर की पत्रकारिता में पक्षधरिता की तलाश और दूसरा जनसरोकारों के लिये प्रतिबद्ध नई पीढ़ी को उस धारा से जोड़ने का काम। उत्तराखण्ड का मौजूदा दौर आजादी से पहले के पहाड़ को समझने का भी है।  क्योंकि जिन संदर्भों में हम आचार्य कोठियाल और युगवाणी को याद करते हैं, आज पत्रकारिता में उसी असहमति और प्रतिकार की जरूरत है। जंगलात, पानी और जमीन के सवाल आज भी उसी तरह मौजूद हैं जिस तरह टिहरी रियासत के समय थे। उत्तराखण्ड में प्राकृतिक धरोहरों पर आश्रित जनता के लिये इनकी हिफाजत हमेशा प्रमुखता में रही है। तीस के दशक में तिलाड़ी और चालीस के दशक में सालम और सल्ट में अपनी धरोहरों को बचाने के लिये ही आंदोलनकारियों ने अपनी शहादतें दी थी। टिहरी में राजा का कानून और शेष पहाड़ में अंग्रेजों का दमन उस समय की युवा पीढ़ी को अपने-अपने तरह से प्रतिकार के लिये तैयार कर रही थी। टिहरी में आंदोलन को किसी भी रूप में समर्थन करना देशद्रोह था। ऐसे समय में जब पूरे देश में आजादी की लड़ाई नई अंगडाई ले रही थी, वहीं टिहरी में राजशाही से मुक्ति के लिये अलग इबारत भी लिखी जा रही थी। उस दौर में सच और प्रजा के पक्ष में खड़ा होना बड़ी चुनौती थी। पत्रकारिता के माध्यम से उस चुनौती को स्वीकार करने का जज्बा और उसे परिणाम तक पहुंचाने की जिद का नाम ही युगवाणी जैसी पक्षधरता ही कर सकती थी। देश को आजादी मिली और टिहरी रियासत से मुक्ति भी, लेकिन आजादी के साठ दशक बाद स्वत्रंत्र कहे जाने वाले देश में जनता को उन्हीं सवालों से लड़ना पड़ रहा है। इसलिये आचार्य कोठियाल जी की जन्म शताब्दी की प्रासंगिता और बढ़ गयी है।
   जनपक्षधरता का जो सवाल लंबे समय से उठाया जा रहा है वह पत्रकारिता के साथ ही नहीं समाज के प्रत्येक क्षेत्र के साथ जोड़ा जाना चाहिये। उत्तराखण्ड की पत्रकारिता अैर जनसरोकारों की पूरी यात्रा अबाध गति से चलती रही है। युगवाणी, कर्मभूमि, गढ़वाली, शक्ति, स्वाधीन प्रजा से लेकर पर्वतीय, युवजन मशाल, नैनीताल समाचार से लेकर आज कई छोटी पत्र-पत्रिकाएं इस धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्होंने ही सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक सवालों को न केवल उठाया है बल्कि इन्हें आगे ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। आजादी के बाद सत्तर के दशक में इसी पक्षधरता ने आंदोलनों का एक बड़ा मंच तैयार किया। 26 मार्च 1974 को चमोली जनपद के रैंणी गांव में महिलाओं की एक आवाज ने पूरी दुनिया को जो संदेश दिया वह चिपको आंदोलन के रूप में सामने आया। इस आंदोलन को इसी महीने 36 वर्ष पूरे हो गये हैं। यह मौका भी इस बात को याद करने का है कि अपनी धरोहरों को बचाने के लिये गांवों से जो आवाज उठी उमें सबसे बड़ी बात पक्षधरता की है। गांवों में अंदर जिस तरह हकों के लिये उठने वाली आवाज को कुंद किया जा रहा है उसके खिलाफ गौरा देवी का साढ़े तीन दशक पहले लिया गया संकल्प सबका मार्गदर्शन दे सकता है। जिस पहाड़ से जंगलों को बचाने की आवाज सुनी गयी थी वहीं जल, जंगल और जमीन पूंजीपतियों के हवाले किये जा रहे हैं। उस समय जंगलों को ठेकेदारों और कुछ कंपनियों को तीस साला एग्रीमेंट पर दिया जा रहा था, आज पूरी नदियां जेपी और थापर के हवाले कर दी गयी हैं। अपने घर में बेगानी होती गौरा की सुध लेने के लिये के लिये भी पक्षधरता को खोजना पड़ रहा है।
   इस बीच 24 मार्च को शहीद उमेश डोभाल की पुण्यतिथि का मौका भी जनपक्षधरता को याद करने  का भी मौका है. उमेश को शराब माफिया के खिलाफ एक लंबी जंग में अपनी जान देनी पड़ी। उत्तराखण्ड में जंगलात और शराब की लड़ाई बहुत पुरानी है। जब भी पहाड़ के विकास की बात आती रही है नशामुक्त उत्तराखण्ड का नारा बुलंद होता रहा है। व्यापक शराबबंदी आंदोलन और उमेश की शहादत के बाद भी पहाड़ में नशे के व्यापारी अपना नेटवर्क बढ़ाते रहे। राजनीति के साथ शराब ने जिस तरह पहाड़ में प्रवेश किया है उसके खिलाफ एक बड़ी मुहिम की जरूरत है। 24 मार्च को जनपक्षधरता की हिमायत करने वाले तमाम लोग पौड़ी में जुटकर इस मुहिम को आगे बढ़ायेंगे ऐसी उम्मीद है। इस वर्ष जनता के साथ हमेशा खड़े रहने वाले राजू रावत हमसे बिछड़ गये थे उन्हें भी पौड़ी में सभी साथी याद कर जनपक्षधरिता के अभियान को आगे बढ़ायेंगे।
   इन अवसरों का जिक्र इसलिये जरूरी है क्योंकि इन पड़ावों ने समाज को आगे बढ़ने का साहस दिया है, समझ दी है और उस पर चलने वालों का एक समाज दिया है। उत्तराखण्ड में इन तीनों अवसरों पर दिये जाने वाले संकल्प निश्चित रूप से राज्य की दिशा को तय कर सकते हैं। लेकिन एक सबसे बड़ा सवाल खड़ा है हम किस तरफ हैं। उत्तराखण्ड में राजनीतिक अपसंस्कृति और राष्टीय राजनीतिक दल इन तीनों अवसरों पर उठने वाले सवालों के लिये जिम्मेदार है। हमारे लिये अभी यह तय कर पाना कठिन हो रहा है कि हम किस तरफ हैं। हम जनपक्षधरता को किस तरह परिभाषा करते हैं। अब भी हमारे कार्यक्रमों इस चिन्ता की बजाय सत्ता में बैठे लोगों का आतिथ्य बड़ा है। राज्य की आबकारी नीति को माफिया के हितों में बनाने वाले, बांधों से लोगों का बेघर करने वालों को, नदियों को बेचने वालों जनविरोध पर खड़े राजनीतिक दलों के इन कांर्यक्रमों में भाषण सुनना यदि हमारी मजबूरी है तो जनपक्षधरता की नई परिभाषा करें। आचार्य कोठियाल, गौरा देवी, शहीद उमेश डोभाल और राजू रावत को याद करते हुये उम्मीद है कि आने वाला कल फिर उत्तराखण्ड में नई चेतना की सुबह लायेगा।

Charu Tiwari

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उत्तराखण्ड में पिछले दिनों दो बातें चर्चा में रही। पहला राज्य को विशेष औद्योगिक पैकेज देना और दूसरा गंगा को अविरल बहने देने के लिये बांधों पर रोक। इन दोनों पर सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल उत्तराखण्ड में श्रेय लेने की होड़ मची रही। सरकार में शामिल क्षेत्रीय राजनीतिक दल उक्रांद भी अपनी मूल विचारधारा को ताक में रखकर इन दलों के साथ शामिल रहा। इन दोनों मुद्दों पर भाजपा, कांग्रेस और उक्रांद के पास न तो कोई अपन समझ थी और न वह इस पर कोई जनपक्षीय रास्ता बनाने की इच्छाशक्ति। यही कारण था कि जब भी विशेष आर्थिक पैकेज या बांधों के विरोध की बात आती तो वह जाने-अनजाने जनता के खिलाफ ही खड़े दिखाई देते हैं। ये दोनों सवाल उत्तराखण्ड के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिये नहीं कि आर्थिक पैकेज मिलने से पहाड़ के लोगों की तस्वीर बदल जायेगी। इसलिये भी नहीं कि बांधों के निर्माण से उत्पादित बिजली से बनने वाले राज्य की दरिद्रता समाप्त  हो जायेगी। इन सवालों का महत्व इस रूप में है कि इस बात की पड़ताल होनी चाहिये कि आखिर सरकार विशेष ओद्यौगिक पैकेज किसके भले के लिये लेना चाहती है। बांधों के सवाल को उर्जा प्रदेश के रूप में नहीं, बल्कि वहां के विस्थापन और पहाड़ को नस्तनाबूद होने के खतरे के रूप में उठाया जाना चाहिये।
   उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के समय से ही यह बात राजनीतिक पार्टियों की तरफ से जोर-शोर से उठायी जाती रही है कि नये राज्य की हालत सुधारने के लिये उसे विशेष ओद्यौगिक पैकेज दिया जाना चाहिये। राज्य जब अस्तित्व मे आया तो यह पैकेज एक अवधि तक के लिये दिया भी गया। इस पैकेज से प्रभावित होकर देश के तमाम उद्योगपतियों ने उत्तराखण्ड का रुख किया। राज्य में सिडकुल के माध्यम से रुद्रपुर, पंतनगर, खटीमा, सितारगंज, देहरादून और हरिद्वार में उद्योगों के लिये नई जमीन तलाशी गयी। कांग्रेस सरकार ने इस पूरे ओद्यौगीकरण को अपने तरीके से भुनाया। भाजपा लगातार कहती रही कि उनके प्रधानमंत्राी अटलबिहारी वाजपेयी ने अगर विशेष आर्थिक पैकेज की व्यवस्था नही की होती तो राज्य के उद्योगों का स्वरूप ऐसा नहीं होता। इस पूरे उद्योगों को बसाने की आपाधापी में इन उद्योगों से यहां की जनता को मिलने वाले लाभों को हमेशा दरकिनार किया जाता रहा। हमेश यही कहा जाता रहा है कि यहां उद्योगों को सब्सिडी इसलिये मिलनी चाहिये कि इससे यहां के लोगों का रोजगार जुड़ा है। राज्य के मौजूदा चतुर मुख्यमंत्राी ने कहा कि यदि इस पैकेज की अवधि नहीं बढ़ी तो राज्य के दो लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ेगा। उन्होंने इस पैकेज की मांग के साथ उत्तराखण्ड के सामाजिक, सामरिक, आर्थिक और माओवादी खतरों के साथ भी जोड़ दिया है। कमोवेश कांग्रेस भी यही बात करती है। यह पैकेज नहीं उत्तराखण्ड के लिये संजीवनी हो गयी है जो सुंघाते ही यहां की दरिद्रता को दूर कर देगी। पिछले दिनों इस पैकेज के लिये अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ प्रधानमंत्राी से मिलकर मुख्यमंत्री ने एक रिकार्ड भी बना दिया। कुछ समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ कि वह ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात की। कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। राज्य के तमाम बड़े नेता भी एक प्रतिनिधिमंडल लेकर संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर इस पैकेज को बढ़ाने की मांग कर आयी।
   असल में इस आर्थिक पैकज को पूंजीपतियों के हितों के लिये बढ़ाने की मंशा है। इससे जनता को किसी प्रकार का फायदा नहीं होने वाला है। उत्तराखण्ड में जिस तरह उद्योगों को बसाने की कवायद चली है उसके अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। राज्य बनने से पहले और बाद मे जितने भी क्षेत्र उद्योगों के नाम पर विकसित किये गये उन्होंने हमेशा यहां की जनता को छला ही है। वर्ष 1988 में काशीपुर और भीमताल को नये ओद्यौगिक क्षेत्रों के रूप में विकसित किया। इन उद्योगों को पंाच साल की सब्सिडी दी गयी। लोगों की कृषि योग्य जमीनों पर उद्योग स्थापित किये गये। ये तमाम उद्योग पांस साल सब्सिडी लेने के बाद गायब हो गये। काशीपुर और भीेमताल के लगभग सभी पुराने उद्योग बंद हो गये हैं। इतना ही नहीं उनका भू उपयोग बदल कर अब उन्हें बेचा जा रहा है। राज्य बनने के बाद जिस तरह से उद्योगों से रोजगार का छलावा लोगों को दिया जा रहा है उसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पंतनगर और सितारगंज की सोना उगलने वाली जमीन को कौड़ी के भाव उद्योगपतियों के हवाले कर दिया गया है। इन तमाम उद्योगों को आर्थिक पैकेज की जरूरत है ताकि वे इसका लाभ उठाकर फिर कई और अपने उद्योगों को ले जायें। इस समय राज्य में जितने भी उद्योग लगे हैं उनमें स्थानीय लोगों को रोजगार देने के नाम पर ठेकेदारों के हवाले कर दिया गया है। यहां अच्छा पैसा तो दूर उनका जीवन भी सुरक्षित नहीं है। अब तक दो दर्जन से अधिक ध्याडी के मजदूर इन उद्योगों में घायल हो गये हैं, इनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। मुख्यमंत्री उन कौन से दो लाख लोगों के रोजगार की बात कर रहे हैं यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है। सिडकुल से कई उद्योग अपना बोरिया-बिस्तर बांधने की तैयारी में हैं। राज्य में उद्योग लगाने में किसी को ऐतराज नहीं है। विशेष आर्थिक पैकेज मिलने का भी विरोध नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है जिस पैकेज को हम मांग रहे हैं उसमें यहां के लोगों के कितने हित सुरक्षित हैं। उद्योगों को इस पैकेज का लाभ देने से पहले यह सुनिश्चित कराना जरूरी है कि वे यहां के लोगों को कितना स्थायी रोजगार देंगे। इस बात की गारंटी भी सुनिश्चित हो कि वह इसका लाभ लेने के बाद भागेंगे नहीं। लेकिन भाजपा-कांग्रेस और उक्रांद को इसकी कोई परवाह नहीं है। इनके लिये टाटा की नैनों का पंतनगर में बनना और निशंक का हिन्दुजा बंधुओं के साथ मुलाकात करना ज्यादा गौरवमयी है।
   मौजूदा समय में राज्य में बन रहे सैकडों बांधों का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। राज्य की जनता पिछले चार दशक से इन बांधों के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रही है। भाजपा-कांग्रेस हमेशा किसी न किसी रूप में इन बांधों के समर्थन में खड़ी रही है। अब वे इसे यहां के रोजगार के साथ भी जोड़ने लगे हैं। पिछले दिनों साधु-संतों के दबाव में भागीरथी पर बने रहे दो बांधों को निरस्त किये जाने के बाद भाजपा, कांग्रेस और उक्रांद के लिये नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। प्रदेश के मुख्यमंत्राी निंशक जो पिछले दिनों भोपाल में गंगा को अविरल बहने की कसम खाकर आये थे, अब कहने लगे हैं कि ये बांध बंद नहीं होने चाहिये थे क्योंकि इससे लोगों का रोजगार जुड़ा है। उनका यह भी तर्क है कि ये परियोजनायें राय सरकार की थी इसे बंद करने का अधिकार केन्द्र को किसने दे दिया। असल में झूठ और लफाजी के पैर नहीं होते। भोपाल में कुछ और उत्तरकाशी में कुछ, इस तरह का दागला चरित्र अब उत्तराखण्ड के बांध प्रभावितों के लिये खतरनाक साबित हो रहा है। रही-सही कसर हमेशा बड़े बांधों का विरोध करने वाले उक्रांद ने पूरी कर दी। उन्होंने भी फैसला लिया है कि चाहे जान चली जाये पहाड़ में बांधों केकाम को नहीं रोकने देंगे। कांग्रेस तो इन बांधों की जनक ही है। असल में गंगा उत्तरकाशी में 35 किलोमीटर तक बांध न बनाने से शुद्ध नहीं होगी। गंगा की तीन मुख्य धारायें हैं, भगीरथी, भिलंगना और अलकनन्दा। इन तीनों को बचाये बगैर हम गंगा के अविरल बहने की कल्पना नहीं कर सकते। इन धाराओं से पंच प्रयाग बनते हैं। यही फिर देवप्रयाग में गंगा बनती है। दुभार्ग्य से भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों को गंगा कुछ ही किलोमीटर दिखाई दे रही है। इसलिये वे कभी टिहरी बांध का समर्थन करने वाले वैज्ञानिक जीडी अग्रवाल की अगवाई में पानी और पर्यावरण की दलाली करने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं। यहां की जनता जो चालीस साल से सके विरोध में आंदोलन चला रही है उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। भागीरथी, भिलंगना और अलकनन्दा पर बन रहे सैकडों बांधों को बंद कर ही गंगा और हिमालय बचेगा। आर्थिक पैकेज और बांधों के साथ स्थानीय लोगों के रोजगार को जोड़कर ठगी करने वाले लोगों की मंशा को समझना जरूरी है।

 

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