Author Topic: Articles By Dinesh Dhyani(Poet & Writer) - कवि एव लेखक श्री दिनेश ध्यानी के लेख  (Read 24095 times)

dinesh dhyani

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उत्तराखण्ड में जारी है धर्म के नाम पर निरीह पशुओ की बलि

दिनेश ध्यानी

उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है। कहा जाता है कि यहां के कण-कण में भगवान का वास है लेकिन इसी भूमि में सदियों से कुछ कुप्रथायें जुड़ी हुई जो आज भी निर्बाध रूप से जारी हैं। उनमें से ही एक कुप्रथा है धर्म की आड़ में हर साल हजारों निरीह पशुओं की हत्या। यहां के जनमानस में यह धारणा है कि पुशओं की बलि देने से भगवान खुश होते हैं और उनके बिगड़े काम बन जाते हैं। यह कुप्रथा आज विकराल रूप ले चुकी है। पहले जहां मात्र मंदिरों में ही पुशओं की बलि दी जाती थी अब हालाता यह हैं कि शादी ब्याह के अवसर पर भी बकरा मारना लाजमी सा हो गया है। कुछ समाजसेवी संस्थाओं एवं जागरूक लोगों के प्रयासों के बावजूद भी यह कुप्रथा आज यथावत जारी है।
उत्तराखण्ड में धर्म के नाम पर और देवता को खुश करने की चाह में तथा अपनी मनौती या बीमारी को ठीक करने के नाम पर निरीह पुशओं की बलि चढ़ा दी जाती है। क्या भगवान निरीह जानवरों की बलि से प्रसन्न होते हैं? यह प्रश्न आज कचोट जाता है जब उत्तराखण्ड की भूमि में आये दिन सैकड़ों बकरों और कई भैसों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। मुख्यतः मुड़नेश्वर, खैरालिंग, बूंखाल-कालिंकाए कांड़ा मंजीन और कालिंका बीरोंखाल में हर साल मेलों का आयोजन किया जाता है और इन्हीं मेलों में निरीह पशुओं की बलि दी जाती है। इड़िया भौन की देवी के मंदिर में हर यो तो सालभर जात के नाम पर बकरों की बलि दी जाती है लेकिन बैशाख के महीने में जब यहां दो और तीन गते बैशाख को मेला लगता है तो उन दिनों यहां सैकड़ों बकरों की बलि दी जाती है।
उत्तराखण्ड में बलि प्रथा की शुरूआत सैकड़ों साल पुरानी है। यहां का जनमानस अपने कुल देवताओं और माता को प्रसन्न करने के लिए बलियां देता आया है। यहां के लोग निरीह पशुओं की बलि देने से पहले पूरे धार्मिक प्रक्रियांये पूरी करते हैं। जैसे कालि रात्रि का चक्कर किया जाता है जिसमें भेड़े की बलि दी जाती है। उससे पहले जागर लगाकर देवता को नचाया जाता है और उसके बाद अर्धरात्रि में भेडे़ की बलि दी जाती है। लोग भेड़े को रात में ही पकाकर खा जाते हैं और रात खुलने से पहले ही उसकी हड़्डियों को जमींदोज कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त कई साल बाद पुजाई का आयोजन किया जाता है। इन पुजाईयों में एक जाति विशेष के लोग जगह-जगह से एक गांव में इकट्ठा होते हैं और फिर रातभर जागर लगते हैं देवता नाचते हैं और अगले दिन पुजारी द्वारा सैकड़ों बकरों की बलि दी जाती है। गढ़वाल में कुकल्याल रावतों, गुसाई आदि जातियों की पुजाइयां प्रसिद्ध हैं जिनमें एक ही दिन हजारों बकरों की बलि दी जाती है। गढ़वाल में कई जातियां ऐसी है जो देवी को प्रसन्न करने के लिए भैंसे की बलि देते हैं। कांलिका वीरोखाल में जो पुजाई होती है उसमें बकरों एवं भैंसे की बलि दी जाती है। बलि देते समय अगर बकरा या भैसे ने आवाज निकाली तो माना जाता है कि देवता प्रसन्न नही हुआ और फिर अगले साल फिर से बलि के लिए निरीह पशुओं को मारा जाता है। 
उत्तराखण्ड देवभूमि से कई ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक तथ्य जुडे़ हुए हैं। जिस भूमि में कुत्ते के दर्शन भी देवता स्वरूप माने जाते हैं उस भूमि में आज भी पशुबलि का इस प्रकार का तांड़व जारी है जा कि किसी भी लिहाज से उचित नही है। यह पूरी मानवता एवं सहिष्णुता पर कुठाराघात है। इस प्रकार के कृत्यों को तुरंत रोका जाना चाहिए। धर्म कर्म की अपनी अलग महत्ता है और उस लिहाज से धर्म की रक्षा भी की जानी चाहिए लेकिन अगर वहीं धर्म के नाम पर निरीह जानवरों की बलि ली जाती है तो यह उचित ही नही तथ्य और तर्क हीन भी है। कई साल पहले की बात है गढ़वाल जिले के रिखणीखाल के खन्दवारी गांव में ध्यानी लोगों की पूजा पशुबलि से पूरी होती थी। उसमें बकरों को काटा जाता था लेकिन कुछ साल बाद उनके देवता के ड़ांगर जिस पर देवता आता है श्री ईश्वरी दत्त ध्यानी एवं उनके पुत्र की हत्या पैंनों पट्टी में कर दी गई थी और बहुत ही जघन्य तरीके से उनको मारा गया था। तब से ध्यानी लोगों ने कहा कि हम आज से अपने नरंकार के लिए पशुबलि नही देंगे और तब से वहां जो नरंकार की पूजा होती है नारियल और प्रसाद आदि से सम्पन्न होती है। उत्तराखण्ड में कई गांव और जातियां हैं जो पशुबलि को बन्द कर नारियल से पूजा करते हैं।
उत्तराखण्ड के जनमानस में पशुबलि का प्रचलन हाल ही के वर्षों में काफी देखने को आया है। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं कि जो कहते हैं कि हम पूजा के नाम पर पशुबलि बन्द करना चाहते हैं लेकिन पुजारी लोगों का कहना है कि अगर तुम पशुबलि को बंद करोगे तो तुम्हारा नुकसान होगा और इसके जिम्मेदार तुम खुद होंगे। विशेषर जब कालीमाता की पूजा की जाती है तो उसमें चक्र पूजने के लिए भैंसे, बकरी और भेड़ तीनों की बलि दी जाती है। लोगों को कहना है कि अगर पशुबलि को रोका जाएगा तो काली माता नर बलि लेती है और वह भी नई पीढ़ी के किसी की बलि लेती है।  लोगों  का कहना है कि हमें इसके एवज में क्या करना चाहिए? इस प्रकार की आशंका के कारण भी कई लोग पशुबलि देने को मजबूर हैं। पंण्डे और पुजारी भी इस आशंका से कि अगर पशुबलि को तुरंत रोका जाता है तो फिर हमारा नुकसान न हो जाए। इस दिशा में धर्माधिकारी एवं विद्वान लोगों को बैठकर विचार करना होगा। कुछ लोगों का मानना है कि पहाड़ में जब पहले पहल लोग बसे होंगे तो उनका जीवन पशुओं पर आधारित रहा होगा इसलिए यह प्रथा प्रचलन में आई।
उत्तराखण्ड जैसे शांत प्रदेश में जहां कण कण में भगवान का वास है और जहां चारों धाम विराजमान हैं वहां पर आज भी इस प्रकार से निरीह पशुओं को भगवान के नाम पर मारा जा रहा है यह सोचनीय विषय है। इस दिशा में कठोर कदम उठाये जाने चाहिए लेकिन जब प्रशासन अपेर सरकार इस प्रकार के कृत्यों को बढ़ावा देंगे तो इसका विरोध कौन करेगा। जो भी हो लेकिन कम से कम आज तो भगवान के नाम पर निरीह पशुओं की हत्या का रोका जाना चाहिए। इस दिशा में स्वंयसेवी संस्थायें एवं समाज को आगे आना होगा अन्यथा इसी प्रकार निरीह जानवरों पर जुल्म होते रहेंगे।











dinesh dhyani

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भ्रष्टाचार और नशे में डूबते पहाड़
दिनेश ध्यानी

उत्तराखण्ड को देवभूमि का गौरव प्राप्त है। कहते हैं कि यहां देवताओं का वास है, यहां की वादियों एवं धार्मिक परिवेश को देखते हुए तो लगता है कि वास्तव में यहां आज भी देवताओं का वास है। दूर पहाड़ की चोटियांे पर बने देवालय और ब्रह्म मूहूर्त में मंदिरों एवं घरों से आती घंटी, शंख की आवाजें आज भी इस भूमि की पवित्रता को बनाये हुए हैं लेकिन यहां की शान्त वादियों में जिस कदर से शराब आदि नशे का कारोबार एवं आम जनता का नशे के प्रति बढते रूझान को देखते हुए इस भूमि की देवभूमि होने पर शंका होने लगती है। आज पहाड़ के गांवों में सात साल के बच्चे से लेकर अस्सी साल के बूढ़े तक सब नशे के गर्त में डुबकी लगाते देखे जा सकते हैं। यही हालात यहां के हर विभाग और इकाई में बढ़ते भ्रष्टाचार को देखते हुए लगता है। किसी भी विभाग में चले जाइये आपको बिना रिश्वत के कोई काम नही होगा। जिला मुख्यालय हों या किसी भी विभाग के कार्यालय सब जगह भ्रष्टाचार के दानव इस कदर मुंह फैलाये हैं कि आप दाॅंतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जायेंगे।
 उत्तराखण्ड में नशा हर घर और आम आदमी की जिन्दगी तक घर कर गया है। यहां के समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली ममता की मूर्ति नारी भी इस बीमारी से अछूती नही रह गई है। पहाड़ की रीढ़ तथा पहाड़ी परिवेश को जिन्दा रखने वाली महिलायें भी नशे को अपनाने से नही चूकती हैं। गांवों में बीड़ी, हुक्का पीना तो अब गये जमाने की बात हो गई है। आज तो यहां की नारी शराब आदित का नशा भी करने लगी हैं। अभी शराबी की आदी महिलाओं की संख्या कम हो सकती है लेकिन आने वाले समय के लिए यह खतरे की घंटी है। जब किसी परिवार में पति और पत्नी दोनों नशे के आदी होगंे तो उनकी आने वाली सन्तानें कैसी होगीं? जब परिवार में मुखिया से लेकर परिवार की देखरेख करने वाली माॅं भी शराब का सेवन करेगी तो फिर बच्चों को अच्छे संस्कार कहां से आयेंगे तथा उन्हें अच्छी शिक्षा कौन देगा? गावों के चैपाल से लेकर पनघट या जंगल जाते हुए रास्तों पर जहां घास-लकड़ी के लिए जाती औरतें बैठती हैं वहां पर राजदरबार, गुटखा के सैकड़ों खाली पाउच स्वयं ही बता देते हैं कि मामला कितना संगीन है। पूछने पर महिलायें कहती हैं कि जंगल में घास काटते समय गुटखा आदि खाने से प्यास नही लगती है इसलिए इसका सेवन करती हैं लेकिन असल में ये औरतें शुरू में शौकीया तौर पर राजदरवार और गुटखा खाते-खाते आज इस सबकी आदी हो गई हैं। यही कारण है पहाड़ में कैंसर के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। और वह भी मुंह का कैंसर, लीबर, खाने की नली आदि का कैंसर तो काफी तेजी से फैल रहा है। लेकिन यहां के जनमानस को इससे कुछ भी सबक नही मिल रहा है। तपेदिक के मामले में तो पहाड़ की हालात काफी खराब हैं। पहाड़ को कोई भी ऐसा गांव नही होगा जहां तपेदिक के मरीज नही होगें। अभी तक यहां की आबोहवा काफी ठीक है इसलिए इन लेागों की बीमारी काफी हद तक भंयकर रूप से नही बढ़ती है अन्यथा जिस तरह से यहां के लोगों में नशे की आदतें बढ़ती जा रही है अगर यहां का पर्यावरण भी उसी तरह खराब होता तो फिर यहां तपेदिक सहित कई बीमारियां महामारी फैला सकती थीं। एक आकलन के अनुसार पहाड़ में प्रतिसाल लगभग 6000 हजार कैंसर के नये रोगी बढ़ रहे हंै।
 पहाड़ के किसी भी गांव में चले जाइये आपको दस साल के अधिकांश बच्चे शराब, चरस, गांजा, बीड़ी सिगरेट का आदी मिल जायेंगे।  लेकिन दूसरे ही पल यहां के लोगों मानसिकता और आत्मसंयम की घोर कमी तथा नशे की ओर बढ़ती यहां की जनता को देखकर नही लगता कि यह देव भूमि है। आज तो लगता है कि यहां देवता नही राक्षसों का वास है। नशा इस कदर यहां के मानवीय जीवन और सामाजिक ताने-बाने में हाबी हो चुका है कि यहां के कई गांवों में आज हालात यह हैं कि जीते-मरते कोई किसी के भी काम तब आयेगा जब उसे शराब पिलाई जाए अन्यथा लाॅंश अन्दर ही सड़ जायेगी लेकिन कोई उसे हाथ नही लगायेगा। शादी ब्याह हो या किसी भी प्रकार के सामाजि कार्य जब तक लोगों को शराब नही पिलाई जायेगी वे किसी भी प्रकार से सहयोग नही करेंगे। आज पहाड़ के गाॅंवों में हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि लोगों को गांव वालों से काम या किसी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा कम ही होती है लेकिन किसी भी शादी ब्याह में शादी वाले घरवालों को चिन्ता लगी रहती है कि गांव के लोग हमारे कार्य में बेवजह बिघ्न या किसी प्रकार का अवरोध खड़ा न कर दें। गांवों के बच्चों जिन्हें देखकर आपको लगेगा कि ये सही से अपनी पैंट भी नही बांध सकते हैं अगर उन्हें शराब नही पिलाई तो समझिये कि आपक कार्य में किसी न किसी प्रकार से बाधा उत्पन्न होनी ही है। एक गांव में बारात में जाने का मौका मिला। उस गांव में सड़क गांव तक ही थी लिहाता बरात बस से ही गई थी। रात में न जाने क्या हुआ सुबह जब दुल्हन को लेकर बारात वापस जाने लगी तो सड़क में जगह-जगह बडे़-बड़े पत्थर और पेड़ काटकर ड़ाले गये थे। पूछने पर पता चला कि रात को लड़कोे को लड़की के पिता ने शराब नही दी इसलिए उन्हौंने नाराज होकर सड़क में रात को ही अवरोधक लगा दिये। कहां तो पहले गांव में किसी की भी शादी ब्याह हों सब लोग अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार योगदान करते थे और कहां आज की सोच कि हमें शराब पिलाओं नही तो तुम्हारी शादी में घपला और व्यवधान कर देेंगे।
पहाड़ में शराब का कारोबार इस कदर फल-फूल रहा है कि किसी भी गांव या कस्बे में आपकी जेब में पैसे होने चाहिए और आपको चैबीसों घंटें कहीं भी शराब की कमी नही खलेगी। कच्ची से लेकर पक्की और फौजी रम से लेकर ह्वििस्की जो चाहो मन माफिक पैसा    फेंको और शराब लो। आज तो हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि शहरों में नौकरी करने वाले कई लोग गांव जाते समय अपने घरों में दो-चार बोतल शराब छोड़कर आ जाते हैं और उनके बीबी बच्चे समय आने पर पचास की बोतल को पाॅंच सौ रूपये में बेच देते हैं।
उत्तराखण्ड ही नही समूचे देश में नशा इस कदर बढ़ रहा है कि आये दिन नये-नये प्रकार के नशे बाजार में आ रहे हैं। चाहे तम्बाकू के पाउच हांे या बीड़ी सिगरेट, चरस या भांग या शराब हो इस प्रकार के नशे के आदी दिनों दिन बढते जा रहे हैं। पहाड़ की बात पर इसलिए अफसोस होता है कि शहरों की अपेक्षा यहां पर रोजगार के साधन उपलब्ध नही हैं और यहां की युवा होती पीढ़ी नशे के कारण जवान होने से पहले ही बुढ़ापे का बरण कर रही है। पहले पहाड़ के लोग कहते थे कि और कहीं रोटी-रोजगार नही लगेगा तो फौज मेें तो भर्ती होना ही है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देखने मंे आया है कि यहां के युवा अब फौज के लायक भी नही रह गये हैं। आखिर रहें भी कैसे जब दूध पीने की उम्र से शराब और गुटखा तथा बीड़ी-सिगरेट आदि का सेवन करेेंगे तो फिर उनका शारिरिक विकास कैसे होगा? यही कारण है कि यहां के युवा अब फौज में भी कम ही लिये जा रहे हैं। 
पहाड़ की वादियों में घुलता नशे का यह जहर कई जिन्दगियों को अकाल ही मौत के मुंह में तो धकेल ही रहा है। यहां के सामजिक और सांस्कृतिक परिवेश को भी तहस-नहस कर रहा है। यहां सामाजिक तानाबाना इस कदर खराब हो चुका है कि गांवों में अब लोग एक दूसरे के सहयोगी और अपनापन की जगह आपस में एक दूसरे से दुश्मनी रखने लगे हैं। पहले पहाड़ के गांवों में कौपरेटिव व्यवस्था थी लोग एक दूसरे पर निर्भर रहते थे और आपसे में सामाजिक तथा अपने पारिवारिक दायित्विों के प्रति ईमानदारी एवं समर्पण की भावन थी। इसी का परिणाम रहा है कि यहां के सभी विद्यालय जो आज से बीस-पच्चीस साल पहले बने उन्हें शुरू स्थानीय जनता ने आपसी सहयोग से ही बनाया।  गांवों के रास्ते हों या पीने के पानी के श्रोतों की सफाई आदि लोग आपस में मिलकर ही श्रमदान से कार्य करते थे। कई गांवों मंे तो लोगों ने मोटर सड़क  भी श्रमदान के द्वारा बनाई हैं। लेकिन आज के परिवेश को देखकर नही लगता है कि यहां का समाज इस तरह आपसे में जुड़ा हुआ था। जिस समाज में आज बिना शराब के मुर्दें को कंाधा कोई नही देता हो या जिस समाज में किसी की बेटी की बारात को इसलिए परेशान किया जाता हो कि उसके पिता ने गांव के लोगों को शराब नही पिलाई वहां किसी प्रकार की मानवीय संवेदना या किसी प्रकार के सामाजिक चेतना की बात करना भी बेमानी होगी।
उत्तराखण्ड में बढ़ते नशे के कारण यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था जर्जर हो चुकी है। वैसे ही पहाड़ में आज भी जनता स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर भगवान भरोसे है उस पर नशे के कारण गंभीर बीमारियों के कारण यहां का जन-जीनव अस्त व्यस्त हो चुका है। तपेदिक, कैंसर सहित एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों यहां काफी तेजी से फैल रही हैं। एड्स को फैलाने में बाहर से आने वाले लेागों को काफी योगदान है। आज अकेले पौड़ी जिल्ले में लगभग 100 लोगों को सरकारी रिकार्ड़ के अनुसार एड्स के लक्षण मौजूद हैं। ऐसे कितने ही लोग हैं जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं लेकिन उनका पता किसी को नही है। आज पहाड़ में आम आदमी को रोजगार के साथ अपने समाज के सामाजिक ताने-बाने को बचाने के लिए भी आगे आना होगा। समाज के हर वर्ग और प्रशासन को पहाड़ बढते नशे के कारोबार और लोगों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता के मूल में जाना होगा। आज की हालात पर अगर किसी प्रकार से रोक नही लगे तो आने वाले समय में पहाड़ में नशा ओर बीमारियों के अलावा कुछ शेष नही होगा। यह बात आज किसी का खल सकती है और इससे कई लोगों को बुरा लगेगा लेकिन यह सत्य है कि पहाड़ के लोग तेजी से नशे के गर्त में डूबते जा रहे हैं। एक तरह से कहें तो नशा पहाड़ की अपसंस्कृति का अंग बनता जा रहा है। समय रहते हुए इन वादियों को नशे और भ्रष्टाचार से मुक्त करना होगा अन्यथा वह दिन दूर नही जब यहां चारों तरफ नशा और भ्रष्टाचार का ही बोलबाला होगा ओर तब हालात हमारे हाथ से बाहर हो चुके होंगे। अभी भी समय है अपनी जवानी और यहां के संसाधनों को सही तरीके से बचाये रखने का। यही रफ्तार रही तो बाद में पछताने के सिवाय हमारे पास कुछ नही होगा और तब हमें न तो संभलने का मौका मिलेगा और न ही जड़ें जमा चुकी नशे की बीमारी और लाईलाज  हो चुके भ्रष्टाचार को मिटाने का नैतिक साहस कोई भी नही कर पायेगा। सरकार और समाज को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा।







dinesh dhyani

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  PRESS RELEASE(IMMEDIATE)    8-8-2009
        The death anneversary of Prominant Uttarakhandi leader Baba Mohan Uttarakhandi was observed as "Gairsain Day all over the Uttarakhand, Delhi and many other areas of the country.
The day was observed by Uttarakhand Sanyukt Sanghrash Samiti (USSS) as "Gairsain Day".The call was given by the Samiti Central President Mr.Dhirendra Pratap,a former Minister in Uttarakhand Govt.Programmes were held throughout the hill state and people remembered Baba Mohan Uttarakhandis sacrifice for the cause of the permanent capital of Uttarakhand. It may be recalled that Baba Uttarakhand had died after a 38 day long fast un to death at Garhwal for demanding the declaration of Gairsain as the permanent capital of the hill state in placeof Dehradun,which is the temporary capital of the state.
meanwhile USSS President Mr.Dhirendra Pratap hass congratulated the Uttarakhandi agitators for coming in large numbers on the road on the Gairsain capital issue and declared that USSS will organise "a complete Uttarakhand Band" on 2nd October,2009 to highlight the problem and to press the state government to honor the public sentimant.He declared Baba Uttarakhandi a great martyr and urged the state Government to build a memorial at Satpuli to for keeping his memories alive forever.
He also condemned those forces who want to make political capital out of gairsain issue.This issue is directly related to out martyrs dreams and nobody would be allowed to make political capital out of it,he warned.
Dhirendra Pratap
President,USSS
Mobile:9411583434/ 09891068431



Dr. B L Jalandhari

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प्रिय ध्यानी जी

धन्यवाद आपने मुझ जैसे अदने से आदमी को देखा ! आपके अलावा अन्य कई दोस्तों ने महिमा मंडन के विषय में लिखा व अपनी प्रतिक्रिया दी ! शायद वह भी पैत्रिक बंधकों से पीड़ित हैं ! ऐसा मेरे संज्ञान में आया ! उसे भाषा सम्बन्धी मुख्य बहस से हटा दिया है !
भाषा के सम्बन्ध में एक प्रश्न छोडा है ! आशा करता हूँ की उसके मध्य से उत्तराखंड की भाषा के पक्ष में जनमत बनाने की कोशिस करेंगे !
गढ़वाली कुमाउनी का समंज्श्य के लिए समय जरूर लगेगा परन्तु किसी को तो शुरूआत करनी है ! यदि  यह उत्तराखंडी समाज में बहस का मुद्दा बनता है तो निश्चय ही हमारी समंजश्य पूर्ण भाषा का उदय आप जैसे मनीषियों के प्रयाश से पूर्ण होगा !

एक बार फिर धन्यबाद

आपका

डॉक्टर बिहारीलाल जलंधरी

dinesh dhyani

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पहाड़ी भाषा बने अच्छी बात है लेकिन इससे पहले हमें गढ़वाली कुमाउंनी बोलियों को बचाने का प्रयास भी करना होगा।


श्रृद्धेय,
श्रीमान जलन्धरी जी सादर, आपने भाषा के विशद विषय को चुना है इसके लिए साधुवाद! आपने गढ़वाली और कुमांउनी दो बोलियों को मिलाकर उत्तराखण्डी भाषा की बात की है। इस दिशा में विस्तृत विचार विमर्श और भाषा संबधी सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। लेकिन उससे पहले मैं एक निवेदन करना चाहॅंूगा कि हमारे समाज में आज जो हालात बन रहे हैं उनमें तो इन दोनों बोलियों का अस्तित्व ही खतरे में है। हम लोग अपनी बोलियों में न तो बात करते हैं और न ही इनमें साहित्य प्रकाशित हो रहा है। जो कि इनके भविष्य के लिए शुभ नही है। सभा बैठकें हो या परिवार हम अपनी बोलियों को छोड़ते जा रहे हैं। मैं जानता हूॅं कि सच कहना आज के जमाने में इतना आसान नही है लेकिन सच से कब तक बचा जा सकता है।
हालात यह है कि गांव का एक बच्चा यहंी पढकर यहींे के स्कूल में टीचर या अन्य प्रकार के रोजगार में आ जाता है तो वह अपनी उक्त बोलियों को नही बोलता, उसे अपनी बोलियों में बोलने में शर्म महसूस होती है फिर नगरों महानगरों में बसे अधिसंख्य लोगों के बारे में क्या कहना है। चन्देक लोग हैं जो अपनी बोली और संस्कृति के बारे में सजग हैं लेकिन इन बोलियों को तभी बचाया जा सकता है जब इनके बोलने वालों की संख्या बढ़े, इनमें साहित्य प्रकाशित हो लेकिन आज इन बोलियों के बोलने वालों की संख्या लगातार कम हो रही है। भाषाविदों ने विश्व की जिन बोलियों के अस्तित्व पर संकट बताया है और कहा कि अगर यही दशा रही तो आने वाले पन्द्रह साल के दौरान विश्व की सैकड़ों बोलियां लुप्त हो जायेंगी उनमें दुर्भाग्य से हमारी ये दोनों बोलियां भी शामिल हैं।
इसलिए हमें भाषा के साथ साथ इन बोलियों को बचाने का प्रयास भी करना होगा। मात्र गीत, संगीत के माध्यम से बोलियों को नही बचाया जा सकता है। इस दिशा में समाज में चेतना और साहित्यकारो ंको आगे आना होगा। तभी इन बोलियों को भाषा के रूप में स्थान दिलाया जा सकता है। आपका प्रयास सराहनीय है। इस हेतु पुनः आपको साधुवाद!

धन्यवाद।

dinesh dhyani

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जन्तर-मन्तर की संतानें


जन्तर-मन्तर की संताने
देखो कैसी चादर ताने,
कल तक दाने-दाने फिरते
अब दोनों हाथों से खाते।
जन्तर-मन्तर जब से आये
तब से दीन-हीनता भागे
इनकी हर दिन भई दिवाली
जन्तर-मन्तर गुल्लक खाली।

जन्तर-मन्तर से जो जन्मे
इनकी करनी अजब अजूबे
गांधी की सूरत पर मरते
इसकी खातिर कुछ भी करते।

जन्तर मन्तर से हैं चमकें
कुछ नेता कुछ क्रातिंवीर हैं
गांधी नोट की पूजा करते
लोगों निसदिन हैं ठगते।

कलमकार है कुछ अतिवादी
जो लोगों को लड़ा रहे हैं
जातिवाद नारा देकर
अपनी रोटी चला रहे हैं।

जन्तर-मन्तर की संतानें
देखो कैसा नाटक करते
आन्दोलन की आड़ में देखो
अपना घर अब भी ये भरते।।



dinesh dhyani

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उत्तराखण्ड को समर्पितः उत्तराखण्ड राज्य लोक मंच

दिनेश ध्यानी

उत्तराखण्ड पृथक राज्य प्राप्ति हेतु दशकों तक कई संगठनों और स्थानीय वासी-प्रवासी लोगों ने एकजुट होकर जो संघर्ष किया उसकी परिणीति 9 नवम्बर, 2000 में अलग उत्तराॅंचल राज्य के रूप में हुआ लेकिन आज लगभग आठ साल बाद भी उत्तराखण्ड जनता की अपेक्षायें और आकाॅंक्षायें कितनी फलीभूत हुई इसका आकलन उत्तराखण्ड के गाॅंवों से हो रहे पलायन तथा धरातल पर विकास की वीथिका को जानने और समझने के बाद स्वतः ही लग जायेगा। राज्य बनने के बाद कुछ तो हुआ है लेकिन आम जनता और शहीदों के बलिदानों का मान किसी ने भी नही रखा। राजनैतिक दलों और सरकारों से तो क्या अपेक्षा की जा सकती है लेकिन स्थानीय संगठनों खासकर जिनका गठन राज्य प्राप्ति के लिए ही हुआ था उनकी जिम्मेदारी बनती थी कि राज्य बनने के बाद विकास की नींव रखने के लिए आगे आते लेकिन राज्य बनने के बाद जैसे इन आन्दोलनकारियों को लगा कि अब तो विशुद्ध राजनीति करने का वक्त आन चुका है और उनमें से अधिकांश राजनैतिक दलों की गोद में जा बैठे। कुछ चाटुकार किस्म के मशखरे जो पहले भी स्वार्थ की राजनीति कर रहे थे और राज्य बनने के बाद भी सत्ता सुख भोगने को हकलान हो गये उनको चाठुकारितक के सिवाय कुछ न मिला। दलालों की एक फौज और लाल बत्तियों की बाढ़ राज्य का सपना नही था। जनता धरातल पर विकास चाहती थी दैनिक जीवन और पलायन जैसी विभीषिकाओं से निजात चाहती थी लेकिन न तो पलायन रूका और न विकास के नाम पर जनता को कुछ हासिल हुआ।
राज्य गठन के लिए अस्तित्व में आये चन्द संगठनों ने अपनी छवि तथा गरिमा को आज भी बचाये हुए है। उनमें एक संगठन है उत्तराखण्ड राज्य लोक मंच यह मंच आज भी उत्तराखण्ड के सर्वांगीण विकास लिए संर्घषरत है। इस मंच को जिन्दा रखने के पीछे सर्मपण की भावन तथा अपने समाज के लिए कुछ कर गुजरने की सोच विद्यमान है। मंच के संस्थापक सदस्य श्री बृजमोहन उपे्रती तथा देवन्द्र सिंह नेगी ने 17 जुलाई, 1998 को संसद में लोकसभा दीर्घा सें पर्चें फेंककर उत्तराखण्ड आन्दोलन को जहां एक नई धार प्रदान की वहीं तत्कालीन केन्द्र सरकार को झकझोर कर रख दिया था। आज श्री देवेन्द्र सिंह नेगी का लम्बी बीमारी के बाद देहान्त हो गया है उनके परिजनों के लिए मंच अपने स्तर पर हर प्रयास कर रहा है। यों तो मंच का हर सदस्य और प्रत्येक इकाई अपनेआप में सशक्त और सर्मपित रहे हैं लेकिन इस मंच के पीछे जो मुख्य योगदान रहा है वह श्री उदय राम ढ़ौंडियाल जी का रहा है। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के लिए उदयराम ढ़ौंड़ियाल ने अपना पूरा कारोबार दांव पर लगा दिया और आज भी उत्तराखण्ड के सरोकारों के प्रति किसी युवा से समर्पित हैं। परिसीमन का मुद्दा हो या गैरसैंण राजधानी बनाने की मांग हो, गंगोलीहाट में शराब माफिया द्वारा एक आन्दोलनकारी महिला के साथ बलात्कार का मामला हो मंच आज भी उसी पुरानी धार से जन सरोकारों को उठाता रहता है। लोक मंच के अभी तक अपनी अस्तित्व को बनाये रखने के पीछे इसका सुलझा नेतृत्व तथा मंच पर राजनैतिक महत्वाकांक्षा  का हावी न होना मुख्य है। साथ ही मंच का अपना एक लम्बा सामाजिक सरोकारों का इतिहास भी रहा है।
उत्तराखण्ड राज्य गठन के  उदेश्य से लिए 14 जुलाई, 1994 को अस्तित्व में आये लोक मंच ने अपने गठन के साथ ही एक ऐतिहासिक पारी की शुरूआत की। पहली बार दिल्ली में गठित इस मंच ने महानगर दिल्ली में लाखों उत्तराखण्ड वासियों जिनमें अधिकांश सरकारी सेवाओं में हैं उन लोगों को जोड़ा। मंच का जो सबसे पहले आधार पत्र सामने आया उसमें कहा गया कि उत्तराखण्ड राज्य लोक मंच मूलतः उत्तराखण्ड राज्य गठन के उदे्श्य को सामने रखकर गठित किया गया है तथापि मंच सामाजिक चेतना के निमित्त दलगत राजनीति से दूर, उत्तराखण्ड के निवासियों को एकता के सूत्र में बांधते हुए उनके सांसकृतिक, साहित्यिक, भाषायी, शैक्षिकतथा सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ उत्तराखण्ड के आर्थिक विकास के लिए नवीन बैज्ञानिक विचारधारा का प्रसारण करेगा। लोक मंच ने अपने गठन के साथ ही अपने उक्त उदे्श्यों तथा विचार को आकार देना शुरू कर दिया। चन्द महीनों में मंच ने दिल्ली, फरीदबाद तथा गाजियाबाद आदि में अपनी लगभग 52 शाखाओं का गठन करने के साथ ही मंच सबसे बड़ा गैर  राजनैतिक संगठन बन गया। इन शाखाओं में सरकारी कर्मचारी तथा महिलाओं व युवाओं को विशेषरूप से जोड़ा गया।
सामाजिक गतिविधियों में मंच ने 15 सितम्बर, 1994 को उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के सर्मथन में सबसे पहले सांय सात बजे जन्तर मन्तर से संसद भवन तक एक विशाल मशाल जुलूश का आयोजन किया जिसमें महिलाओं और बच्चों की भागीदारी ऐतिहासिक रही। इस बीच 2 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली आ रही रैली पर मुज्जफर नगर, नारसन में अमानवीय कृत्य किये गये दर्जनों आन्दोलनकारियों को मौत के घाट उतार दिया गया तथा कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। इस जघन्य अपराध से समूचा देश विचलित हो गया। लोक मंच के तत्वाधान में 8 अक्टूबर, 1994 को खटीमा, मसूरी, मुज्जफरनगर में हुए नरसंहार तथा आन्दोलनकारी महिलाओं पर हुए अत्याचारों के विरूद्ध बच्चों और महिलाओं ने संसद पर विशाल प्रदर्शन किया तथा राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया। इसी क्रम में 16 अक्टूबर, 1994 को, 22 अक्टूबर, 1994 को तथा 29 व 30 अक्टूबर, 1994 को भगतसिंह टर्मिनल से अमर जवान ज्योति तक विशाल मौन जुलूश, दीपावली का वहिष्कार तथा दिल्ली में अनेकों क्षेत्रों में जाकर जनविरोधी नीतियों तथा उत्तराखण्ड की शान्त जनता के साथ किये जा रहे जघन्य अपराधों के प्रति लोगों को जागृत किया।  9 नवम्बर 1994 को मंच ने उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान घायल आन्दोलनकारियों के इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल तथा चंड़ीगढ़ में 15 पन्द्रह हजार रूपये का आर्थिक सहयोग दिया। संसद के शीतकालीन सत्र में उत्तराखण्ड राज्य की मांग तथा आन्दोलनकारियों पर अत्याचारों के बारे में सांसदों को जागृत करने के लिए मंच एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मण्डल ने दिल्ली में 10 दिसम्बर 1994 से लेकर 25 दिसम्बर 1994 तक विभिन्न दलों के सांसदों से मुलाकात की जिनमें सर्वश्री पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, जार्ज फर्नाड़ीज, अटल बिहारी बाजपेयी, तथा इन्द्र जीत गुप्त आति प्रमुख थे। मंच ने इन नेताआंें से उत्तराखण्ड राज्य की मांग को संसद में पुरजोर ढंग उठाने का आग्रह किया तथा उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों का दमन करने वाले अपराधियों को कठोर दण्ड दिये जाने का अनुरोध किया।
इसी प्ररिप्रक्ष्य में मंच ने दिल्ली में पहली बार 1जनवरी 1995 को संकल्प दिवस के रूप् में मनाया तथा इस दिन किदवई नगर-मेड़ीकल चैराहे के तत्कालीन विशाल मैदान में एक संकल्प महासभा का आयोजन किया। इस सभा में दिल्ली, गाजियाबाद, फरीदाबाद आदि से लगभग पच्चीस हजार प्रवासियों ने भाग लिया। मंच ने इसमें विभिन्न दलों के राजनेताओं को आमंत्रित किया जिनमें श्री चुरानन मिश्र, श्री सिकन्दर बख्त, आदि ने शिकरत की। इन नेताओं ने दलगत राजनीति से उठकर कहा कि उत्तराखण्ड राज्य की मांग को वे अपने दलों तथा संसद में उठायेंगे तथा उत्तराखण्ड राज्य के गठन में अपना समर्थन देने का वायदा किया। मंच ने सभा में पास प्रस्तावों मे कहा कि जब तक उत्तराखण्ड राज्य का गठन नही हो जाता तब तक मंच लोकसभा, विधानसभा एव शासकीय चुनावों का बहिष्कार करेगा तथा जनता से भी राज्य गठन तक किसी भी चुनाव में शिरकत नही करने का अनुरोध करेगा। मंच ने कहा कि जब तक उत्तराखण्ड राज्य का गठन नही हो जाता तब तक राज्य हेतु संर्घष किया जायेगा।  वर्ष 1996 में मंच ने उत्तराखण्ड में मंच ने 10 मई 1996 को उत्तराखण्ड के कई संगठनों के ग्याहरवीं लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने का पुरजोर विरोध किया तथा इनकी कारगुजारियों पर एक श्वेत पत्र निकाला। 27 सितम्बर 1996 को मंच का एक 18 सदस्यीय प्रतिनिधि मंड़ल अक्टूबर 1996 में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के बहिष्कार हेतु सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में गया तथा गांव-गांव जाकर मंच ने अपनी बात लोगों से कही तथा चुनाव के विरोध में तथा राज्य प्राप्ति के लिए एकजुट किया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री देवगौड़ा द्वारा 15 अगस्त, 1996 को लाल किला प्राचीर से उत्तराखण्ड राज्य गठन के बारे में अस्पष्ट घोषणा के बाद मंच ने राजघाट पर 18 अगस्त 1996 से अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल का शुरू की, इसी दौरान मंच का एक प्रतिनिधि मंडल मंच के महासचिव श्री भवानन्द शर्मा के नेतृत्व में तत्कालीन गृहमंत्री से मिला तथा उनके द्वारा स्पष्टीकरण देने के बाद 19 अगस्त, 1996 को भूख हड़ताल समाप्त की गई।
मुजफ्फरनगर, मसूरी , खटीमा तथा नारसन कांड़ों के विरोध में मंच ने मंण्डी हाउस से संसद भवन तक मौन जुलूश तथा धरना आदि समय-समय पर आयोजित किये। राजधनी के मंद्ेपर मंच समबैचारिक संगठनोें के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहा है। आज भी मंच का अपने समाज से जुड़ाव ही नही आपस में सभी के दुख सुख में भी काम आ रहा है।समाज के किसी भी भी सदस्य को यदि किसी प्रकार की सामाजिक तथा राजनैतिक आवश्यकता महसूस होती है तो मंच आगे बढ़कर सहयोग करता है। मंच का स्पष्ट मानना है दिल्ली में प्रवासी उत्तराखण्ड वासियों को अपनी राजनैतिक तथा सामाजिक पहचान को बनाने लिए आगे आना होगा। इस हेतु राजनैतिक दलों को अपनी कीमत तथा महत्व को समझाना होगा। इस दिशा में कारगर उपाय तथा कार्य किया जाना है। मंच इस विषय पर गंभीर है तथा निकट समय में इस विषय पर आन्दोलनकारी संगठनों तथा प्रवासी बंधुओ से एक सेमिनार के माध्यम से मुखातिब होने का मंच का विचार है। विगत में टिहरी बांध पीड़ितों ने जन्तर-मन्तर पर अपनी मांगों के समर्थन में जो धरना दिया उसमें मंच के संगठन सचिव श्री बृजमोहन उपे्रती ने मंच तथा व्यक्तिगत स्तर पर पूरे धरने का आयोजन तथा लगभग अस्सी आन्दोलनकारियों के खाने,ठहरने तथा दवाई आदि की व्यवस्था की। आन्दोलनक के दौरान एक आन्दोलनकारी महिला की मौत हो गई उसके परिजनों कोे मंच ने सरकार से उचित मुआवजा तथा सहयोग दिया। इस कार्य में श्री बृजमोहन उपे्रती ने जो सहयोग दिया उसका समाज के सभी वर्गों तथा विशेषर गाजणा से आये आन्दोलनकारी लोगों ने आभार प्रकट किया।  पर्वतीय टाइम्स के सम्पादक स्वर्गीय मदन जोशी की पुण्य तिथि पर मंच ने 29 जुलाई, 2006 को  दिल्ली में वर्तमान परिपेक्ष्य में आंचलिक पत्रकारिता पर एक विशाल गोष्ठी का आयोजन किया।
पेशावर के महानायक तथा पेशावर कांड़ के प्रण्ेाता वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली सहित उनके तमाम साथियों के परिजनों तक पहुॅंचने का मंच का विचार है तथा इन वीर सेनानियों के परिजनों को हर स्तर पर सहयोग आदि की यदि आवश्यकता हो तो मंच उस हेतु प्रयास करेगा। मंच के अध्यक्ष श्री उदयराम ढ़ौंड़ियाल का कहना है कि हम यदि अपने पूर्वजों का सम्मान नहीें करेंगे तो हम अपने को सामाजिक किस आधार पर मान सकते है। इस परिपेक्ष्य में मंच ने 20 अपै्रल, 2008 को गढ़वाल भवन नई दिल्ली में पेशावर कांड़ की पूर्व संध्या पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया इस सम्मेलन में समाज के कई गण्यमान्य व्यक्तियों सहित कई पत्रकार, साहित्यकार तथा राजनेताओं ने शिकरत की सभी ने मुक्त कंठ से मंच के प्रयासों की भूरि-भूरि सराहना की। मंच की ओर से उत्तराखण्ड सरकार से मांग की गई है कि पेशावर के महान नायक वीर चन्द्र सिंह गढवाली की आदमकद मूर्ति विधानसभा परिसर में स्थापित की जाये तथा पेशावर के वीर सैनिकों के परिजनों को नौकरी तथा उनके नौनिहालों को निःशुल्क शिक्षा दी जाये।
 कहना न होगा कि उत्तराखण्ड राज्य लोक मंच आज भी सामाजिक सरोकारों तथा उत्तराखण्ड के सर्वांगीण विकास के लिए कार्यरत है तथा सभी आन्दोलनकारी संगठनों को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहा है। मंच का मानना है कि अभी उत्तराखण्ड में आन्दोलन की आवश्यकता है तथा सभी आन्दोलनकारी संगठनों को एक जुट होकर राज्य के विकास के लिए, पलायन रोकने, उद्योग स्थापित करने तथा राज्य के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा भाषायी आधार बचाये रखने के लिए संर्घष करना होगा। लोक मंच आज भी जन सरोकारों के प्रति कृतसंकल्प है।


dinesh dhyani

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पेशावर का महानायकः वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली
दिनेश ध्यानी
 

आज हम जिस आजादी में संास ले रहे हैं वह हमें ऐसे ही नही मिल गई थी इसके लाखों लोगों को अनेकों कुर्वानिंया दी यातनायें सही। लोगों ने सोचा था कि देश आजाद होगा हम आजाद होगें हमें अपना विकास और अपने तरीके से जीवन जीने के अवसर मिलेंगे लेकिन आजादी के बाद जिस तरह से देश का विभाजन हुआ वह भारतीय इतिहास में सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण रहा। देश के विभाजन को दंश आजादी के छः दशक बाद भी लोगों को चैन से नही रहने दे रहा है। आजादी के बाद जो अल्पसंख्यक पाकिस्तान में रह रहे हैं जिन्हौने तब देश की आजादी के लिए जंग लड़ी थी वे अपने ही देश में बंधुवा मजदूरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। जब-जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है उन लोगों का जीवन नरक हो जाता है। हाल ही के दिनों में मुम्बई बम धमाकों के बाद वहां रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को लूटा जा रहा है उनकी बहू बेटियां सुरक्षित नही हैं। उन्हें कहा जा रहा है कि या तो मजहब बदलो या देश बदलो। वे लोग किससे से पूछें कि हमारा क्या कसूर है? क्या यही हमारा दोष है कि हम अपने देश में ही रहे? दिल्ली में बैठकर बंटवारा करने वाले क्या जाने के बलूस्तिान व पेशावर में रह रहे हिन्दू किस हाल में हैं और इस बंटवारे के बाद उनपर क्या कहर बरपेगा। यही हाल हिन्दुस्तान में भी था। बंटवारे के बाद भी कुछ लोग थे जिन्हें अपना वतन प्यारा था और वे अपने ही देश में ही रह गये लेकिन समय के साथ-साथ उनके जीवन और अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।
कश्मीर समस्या हो या पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद हो ये कुछ ऐसे मसले हैं जो आजादी के बाद से हमेशा से हमारे लिए सरदर्द बने हुए हैं। लोगों ने कभी नही सोचा था कि आजादी के बाद हमें इस प्रकार की समस्याओं से दशकांे बाद तक दो-चार होना पडेगा। भारतीय स्वाधीनका संग्राम के स्वतत्रंता सेनानियों ने अपनी सर्वस्व को दंाव पर लगाकर यह आजादी दिलाई थी लेकिन आजादी के बाद काले अंग्रेजों ने उन क्रान्तिकारियों को भी जलील करने में कोई कोर कसर नही छोड़ी। इसी प्रकार का दंश पेशावर की अमर क्रान्ति के जनक और प्रखर स्वतंत्रता सेनानी वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली को भी आजीवन झेलना पड़ा। लेकिन हिमालय का यह बेटा आजीवन अपने सिद्धान्तों के लिए लड़ता रहा लेकिन किसी के आगे झुका नही। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जिनका नाम  आज देश से अधिक पेशावर और पाकिस्तान में बड़े सम्मान से लिया जाता है। लेकिन आजाद में  उनके योगदान को काले शासकों ने अपनी राजनीति में बाधा समझकर हमेशा कम करके आंका और इस जांबाज सिपाही को कभी भी चैनी से नही रहने दिया। आज गढ़वाली जी इस संसार में नही हैं लेकिन आज भी उनके परिजन दर-दर की ठोकर खा रहे हैं किसी को उनकी सुध लेने की फुरसत नही है। उत्तराखण्ड में चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम से अनेकों सरकारी योजनायें चल रही हैं लेकिन गढ़वाली जी की अल्मोड़ा की पुस्तैनी जमीन के बदले कोटद्वार हल्ुदखत्ता में जो 60 बीघा जमीन लीज पर दी गई थी वह आज भी लीज पर है और कोटद्वार में होते हुए भी उसको परिसीमन में उत्तर प्रदेश में दिखाया गया है। उनके परिजनों की इस मांग को कि हमें इस जमीन के बदले में चाहे कम जमीन दे दो लेकिन हमें मालिकाना हक तो दो। इस बात पर किसी के कान पर जंू नही रेंगती है। अपने चेहतों को औने-पौंने दामों पर ऐकड़ों जमीन देने वाले राजनेता जानते हैं कि चन्द्रसिंह गढ़वाली के आज उनके लिए वोट बैंक नही हैं इसलिए उनके परिजनों की हालात को कौन समझे। गढ़वाली जी सहित कई वीर सैनिक हैं जिनके परिजनों को तथा जीवित स्वतत्रता सेनानियो ंको आज कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
लगभग 78 वर्ष पूर्व 23 अपै्रल 1930 को पेशावर में रायल गढवाल राइफल्स के वीर गढ़वाली सैनिकों ने अंग्रेजों के आदेश का उलंघन करते हुए पेशावर में अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे निहत्थे पठानों पर गोलियां चलाने से मना कर दिया था। गढ़वाली सैनिकों की अचानक इस बगावत से अंग्रेज शासकों की पांवों तले की जमीन खिसक गई। अंग्रेजी हुकूमत का  हुक्म न मानकर गढ़वाली सैनिकों ने सैकड़ों निहत्थे पठानों की जान बचाई ही देश की आजादी के लिए लड़ रहे लोगों को एक दिशा भी दी। पेशावर की यह घटना देश के इतिहास में एक ऐसी घटना थी जिसके बारे में नेताजी सुभाषचन्द्र वोस ने कहा कि हमें आजाद हिन्द फौज सेना के गठन की प्रेरणा रायल गढ़वाल राईफल्स के जवानों की पेशावर की बगावत से मिला। अब देश को आजाद होने से कोई नही रोक सकता। तब महात्मा गांधी ने कहा था कि वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली यदि मुझे पहले मिल गया होता तो देश कब का आजाद हो गया होता। यह अलग बात है कि देश के आजाद होन के बाद कहते हैं कि गांधी जी से जब पेशावर की बगावत तथा उसके बन्दियों के बारे में पूछा गया तो तब गांधी जी ने कहा था कि पेशावर में 23 अपै्रल 1930 को गढ़वाली सैनिकों ने सर्वोंच्च सत्ता के खिलाफ बगावत की थी और बगावत बगावत होती है इसलिए हम इस बगावत को मान्यता नही देते हैं। यही कारण रहा कि सन् 1947 में देश आजाद हो गया लेकिन पेशावर के बहादुर सैनिकों को सरकार की तरफ से कुछ भी सहयोग या सम्मान नही मिला। सन् 1974 में जाकर इन वीर सैनिकों को स्वतत्रता सेनानियों का दर्जा दिया गया व 65 रूपये पेंशन तय की गई। तब तक कई वीर सैनिक दिवंगत हो चुके थे।  वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को जो पेंशन दी गई उन्हौंने उसे लेने से मना कर दिया था।
असल में पेशावर में गढ़वाली वीर सैनिकों ने जो बगावत की उसकी योजना एकदम नही बनी। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली 11 सितम्बर 1914 को घर से भागकर लैन्सडौंन में 2/18 गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गये थे। अगस्त 1915 ई. में चन्द्र सिंह प्रथम विश्व युद्ध में मित्र देशों की ओर से लड़ने के लिए फ्रांस गये वहंा जब फ्रांसीसी हिन्दुस्तानी सैनिकों को मिलने लगे पुलिस द्वारा उन्हें रोक दिया। पूछने पर पता चला कि अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को बता दिया था कि हिन्दुस्तानी हमारे गुलाम हैं इसलिए तुम्हारे से ऐसा व्यवहार किया जा रहा है। अंग्रेज सेना में हिन्दुस्तानी सैनिकों को कम वेतन देते थे और अंग्रेज सैनिकों को उनसे पांच गुना वेतन देते थे। हिन्दुस्तानी सैनिकों को गुलाम समझते थे यही कारण था कि हिन्दुस्तानी ओहदेदार मामूली अंग्रेज सैनिकों को सल्यूट मारते थे। 1920 में गढ़वाल में अकाल पडा अंग्रेजों ने सेना में जो ओहदेदार थे उन्हें कहा कि यदि सेना में रहना है तो आम सिपाही बनकर रहो तथा पन्द्रह साल से कम नौकरी जिसकी भी थी सबकों सेना से निकाल दिया। इन सभी बातों का चन्द्र सिंह के मन पर काफी गहरा असर पड़ा और वे अंग्रेजों की सेना में रहते हुए देश की आजादी के लिए सोचने लगे। कहते हैं जहां चाह वहां राह चन्द्र सिंह सेना में जहां भी रहे वे देशकाल की घटनाओं से जुड़े रहे और समय-समय पर वे अखबार और लोगों के माध्यम से देश की आजादी के बारे में जानते सुनते रहे। इस बीच चन्द्र सिंह 1929 में गांधी जी के अल्मोड़ा आगमन पर उनसे भी मिले थे गांधी जी से चन्द्र सिंह ने एक टोपी मांगी और उसे पहनते हुए कहा कि मैं इस टोपी की कीमत चुकाकर रहंूगा। मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, पं. गोविन्द बल्लभ पंत, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि नेताओं से मिले थे।
23 अप्रैल 1930 को पेशावर में एक वहां कांग्रेस के बैनर तले एक जलसे का आयोजन किया गया था जिसमें देश की आजादी के लिए लोग अपने नेताओं को सुनने के लिए हजारों की संख्या मंें उपस्थित थे। अंग्रेज फौजी शासकों ने अपनी पूर्व नियोजित षड़यंत्र के आधार पर पहले पेशावर में तैनात गढ़वाली सैनिकों को भड़काया कि यहां पेशावर में 98 प्रतिशत मुसलमान हैं और मात्र 2 प्रतिशत हिन्दू हैं। हिन्दू चूंकि व्यापारी हैं इसलिए मुसलमान उनकी दुकानें लूट लेते हैं तथा हिन्दुओं पर अत्याचार करते हैं। राम-कृष्ण को गालियां देते हैं गौ हत्या करते हैं।हिन्दुओं की बहू बेटियों को उठा ले जाते हैं गढ़वाली पल्टन को शहर जाकर हिन्दुओं की रक्षा करनी होगी और जरूरी हुआ तो मुसलमानों पर गोलियां भी चलानी पड़ेंगी। अंग्रेज अफसर के चले जाने के पर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने अपने साथियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराया और कहा कि यह लड़ाई हिन्दू मुसलमान की नही है बल्कि यह अंग्रेजों और कांग्रेस की लड़ाई है। अंग्रेज हिन्दू-मुसलमानों के नाम पर पेशावर मंे दंगा कराना चाहते हैं। इसलिए चन्द्र सिंह ने अपनी कंम्पनी सहित तमाम गढ़वाली सैनिकों तक यह संन्देश पहुंचा दिया कि जब भी हमें पेशावर में निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने के लिए आदेश दिया जाये हम उसे न मानें। इसके लिए सैनिकों को तैयार करने में चन्द्र सिंह को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। जिन अंग्रेजों के अधीन वे नौकरी कर रहे थे उनके आदेश को खुद भी न मानना तथा बटालियनों को इसके लिए संयुक्त रूप से तैयार करना कितना जोखिम भरा काम था। जरा सी चूक होने पर कोर्ट मार्शल की सजा या गोली भी मारी जा सकती थी लेकिन चन्द्र सिंह के अन्दर तो देश की आजादी का जो जुनून उफन रहा था उसके मूल में कई कारण थे।
22 अप्रैल को गढ़वाली सैनिकों को आदेश मिला कि उन्हें कल 23 अप्रैल को पेशावर जाना होगा। चन्द्र सिंह ने तत्काल पाॅंचों कम्पनियों के पाॅंच प्रमुख व्यक्तियों को बुलाया और उनके साथ विचार-विमर्श से गोली न चालने की योजना पास हो गई।
23 अप्रैल, 1930 की सुबह कप्तान रिकेट 72 सैनिकों को लेकर पेशावर में किस्साखानी बाजार पहॅंुच गये। किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत किये जाने पर चन्द्रसिंह पर सन्देह हो जाने के कारण कप्तान रिकेट उन्हें शहर नही ले गये। चन्द्र सिंह ने दूसरे अधिकारी से पेशावर में पहुॅंची सेना के लिए पानी ले जाने के बहाने पेशावर जाने की इजाजत ले ली और पानी लेकर पेशावर के लिए रवाना हो गये। पेशावर पहुॅंकर चन्द्रसिंह ने देखा कि पेशावर में हजारों की संख्या में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। कैप्टेन रिकेट उन्हें वहां से हटने के लिए कह रहा है लेकिन कोई भी अपनी जगह से टस से मस नही हुआ। रिकेट चिल्ला रहा था कि हट जाओं नही तो गोलियों से मारे जाओगे। जनता उसकी धमकियों से भड़क गई और अंग्रेजों के ऊपर बोतलें आदि फेंकने लगी। रिकेट ने गढ़वाली सिपाहियों को आदेश देते हुए कहा गढ़वाली थ्री राउंड़ फायर, यानि गढ़वाली सैनिकों तीन राउंड़ गोली चलाओं तो तभी चन्द्र सिंह गढ़वाली ने कहा कि गढ़वाली सीज फायर यानि कि गढ़वाली सैनिकों फायर न करो। गढ़वाली सैनिकों ने अंग्रेजों अफसर के आॅर्डर को न मानते हुए अपने नेता चन्द्र सिंह गढ़वाली की बात को मानते हुए अपनी राइफलें नीचे रख दीं। चन्द्र सिंह ने कहा कि हम निहत्थे पठानों पर गोली नही चलायेंगे। हम देश की सेना में देश की रक्षा के लिए भर्ती हुए हैं न कि किसी निदोंर्ष की जान लेने के लिए। हम अपने पठान भाइयों पर किसी भी कीमत में गोली नही चलायेंगे चाहो तो हमें गोलियां से भून दो।
तत्पश्चात गढ़वाली सैनिकों को छावनियों में लाया गया। 24 अप्रैल 1930 को पुनः इन सैनिकों को पेशावर में जाने के लिए कहा गया तो गढ़वाली सैनिकों ने अंग्रेजों के हुक्म को मानने से मना कर दिया था। तब पेशावर में अंग्रेज सैनिकों को बुलाकर निहत्थे प्रदर्शनकारियेां पर गोलियां चलवाई गई। पेशावर की इस बगावत में 67 गढ़वाली सैनिकों पर मुकदमा चलाया गया और उनमें से कईयों को काला पानी की सजा व आजीवन कारावास हुआ। 12 जून 1930 को रात में चन्द्र सिंह को एकटाबाद जेल में भेज दिया गया। चन्द्रसिंह कई जेलों में यातनाएॅं सहते रहे। नैनी जेल में उनकी भंेट क्रान्तिकारी राजबन्दियों से हुई। लखनऊ जेल में उनकी मुलाकात सुभाष चन्द बोस से हुई। चन्द्रसिंह कहते थे कि जेल में जो बेड़ियां हाथ पांवों में लगी हैं वे मर्दों के जेवर होते हैं।  चन्द्र सिंह गढ़वाली को सबसे पहले कालापानी की सजा व कोड़ों की सजा हुई क्योंकि अंग्रेज मानते थे कि पेशावर की बगावत चन्द्र सिंह के ही कहने पर हुई थी। गढ़वाल के प्रसिद्ध वैरिस्टर मुकुन्दीलाल जिन्हौंने गढ़वाली सैनिकांे का केस लड़ा उनका कहना है कि कमांड़र-इन-चीफ स्वंय चाहते थे कि संसार को यह पता न लेगे कि भारतीय सेना अंगे्रजों के विरूद्ध हो गई है इसलिए उन्होंने मेरी ओर ध्यान न देकर चन्द्रसिंह की मौत की सजा को आजन्म कारावास की सजा में बदल दिया।
 23 अप्रैल को सैनिक बगावत हुई लेकिन अंग्रेजों ने बगावत का केस दर्ज नही किया वे जानते थे कि यदि बगावत का केस दर्ज होगा तो देश में जो आन्दोलन चल रहा है उसमें यह आग में घी का काम करेगा। इसी आधार पर उन्हें बन्दी बनाया गया। लेकिन देश की जनता 23 अप्रैल 1930 की सैनिक बगावत के बारे में जान चुकी थी कई अखबारों में इस खबर को छापा। यह अलग बात है कि देश के इतिहास में पेशावर की बगावत को उतना महत्व नही दिया गया जिस प्रकार से यह कं्रान्ति हुई थी।
पंड़ित जवाहर नेहरू ने अपनी एक पुस्तक मंे लिखा है कि पेशावर में गढ़वाली सैनिकों ने सैनिक बगावत इसलिए की थी कि वे जानते थे कि देश आजाद होने वाला है और उनके खिलाफ किसी प्रकार की कठोर कार्यवाही नही की जायेगी। इससे जाहिर होता है कि देश की लिए अपनी जान को दांव पर लगाने वाले वीर सैनिकांें की उस समय भी नेताओं की नजर में कोई कीमत नही थी। जो सैनिक अंग्रेजों के अधीर नौकारी कर रहे थे उनके खिलाफ सशस्त्र बगावत करना आम बात नही थी। अंग्रेज चाहते तो गढ़वाली सैनिकों को पेशावर में गोलियों से भून देते कोई उस समय पूछने वाला नही था। फिर गढ़वाली सैनिक जानते थे कि इस बगावत का अंजाम कुछ भी हो सकता था। लेकिन नेहरू जी की बातों से लगता है उस समय भी देश की आजादी को नेता राजनीति के चश्मे से देखने लगे थे।
चन्द्र सिंह गढ़वाली को सन् 1945 में जेल से रिहा कर दिया गया लेकिन उनके गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जेल में क्रान्तिकारी यशपाल से परिचय होने से जेल से बाहर आने के बाद गढ़वाली जी कुछ दिन लखनऊ में उनके साथ रहे। उसके बाद वे हल्द्वानी आ गये।1946 में चन्द

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23 अप्रैल को सैनिक बगावत हुई लेकिन अंग्रेजों ने बगावत का केस दर्ज नही किया वे जानते थे कि यदि बगावत का केस दर्ज होगा तो देश में जो आन्दोलन चल रहा है उसमें यह आग में घी का काम करेगा। इसी आधार पर उन्हें बन्दी बनाया गया। लेकिन देश की जनता 23 अप्रैल 1930 की सैनिक बगावत के बारे में जान चुकी थी कई अखबारों में इस खबर को छापा। यह अलग बात है कि देश के इतिहास में पेशावर की बगावत को उतना महत्व नही दिया गया जिस प्रकार से यह कं्रान्ति हुई थी।
पंड़ित जवाहर नेहरू ने अपनी एक पुस्तक मंे लिखा है कि पेशावर में गढ़वाली सैनिकों ने सैनिक बगावत इसलिए की थी कि वे जानते थे कि देश आजाद होने वाला है और उनके खिलाफ किसी प्रकार की कठोर कार्यवाही नही की जायेगी। इससे जाहिर होता है कि देश की लिए अपनी जान को दांव पर लगाने वाले वीर सैनिकांें की उस समय भी नेताओं की नजर में कोई कीमत नही थी। जो सैनिक अंग्रेजों के अधीर नौकारी कर रहे थे उनके खिलाफ सशस्त्र बगावत करना आम बात नही थी। अंग्रेज चाहते तो गढ़वाली सैनिकों को पेशावर में गोलियों से भून देते कोई उस समय पूछने वाला नही था। फिर गढ़वाली सैनिक जानते थे कि इस बगावत का अंजाम कुछ भी हो सकता था। लेकिन नेहरू जी की बातों से लगता है उस समय भी देश की आजादी को नेता राजनीति के चश्मे से देखने लगे थे।
चन्द्र सिंह गढ़वाली को सन् 1945 में जेल से रिहा कर दिया गया लेकिन उनके गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जेल में क्रान्तिकारी यशपाल से परिचय होने से जेल से बाहर आने के बाद गढ़वाली जी कुछ दिन लखनऊ में उनके साथ रहे। उसके बाद वे हल्द्वानी आ गये।1946 में चन्द्र सिंह ने रानीखेत में भंयकर अकाल से पीड़ित लोगों की मदद से सरकारी गल्ले के भण्डार को जनता में बांट दिया। इससे स्थानीय प्रशासन नाराज हुआ लेकिन गढ़वाली जी ने कहा कि एक तरफ हमारी जनता भूख से मर रही है और तुम हमारे हिस्से के अनाज को ब्लैक में बेच रहे हो। रानीखेत में अंग्रेजों की बटालियनें थी उनके लिए पानी का समुचित प्रबन्ध था लेकिन स्थानीय लोगों को काफी परेशानी होती थी गढ़वाली जी ने लोगों की पानी की समस्या का भी समाधान कराया। दिसम्बर 1946 को चन्द्र सिंह ने गढ़वाल में प्रवेश किया गढ़वाल की जनता ने उन्हें सर आॅंखों पर स्थान दिया और जगह.जगह उनका भव्य स्वागत हुआ। चूंकि गढ़वाली जी 1944 में पक्के कम्युनिस्ट बन गये थे इसलिए गढ़वाल के कांगे्रसी उनके स्वागत सत्कार को पचा नही पाये इसलिए उनका विरोध करना शुरू कर दिया।सन् 1948 में टिहरी में राजशाही के खिलाफ लड़ने वाले अमर वीर नागेन्द्र दत्त सकलानी के शहीद हो जाने के बाद वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जी ने टिहरी आन्दोलन का नेतृत्व भी किया। सरकार को आशंका हो गई थी कि चन्द्रसिंह जिला बोर्ड के चेयरमैन का चुनाव लड़ना चाहते हैं इसलिए सरकार ने उन्हें पेशावर का सजायाफ्ता बताकर जेल में ड़ाल दिया। कुछ माह बाद जेल से छूटने के बाद गढ़वाली जी ने गढ़वाल में शराब के खिलाफ आन्दोलन भी किया इसमें कोटद्वार की इच्छागिरि मांई जिन्हंे लोग टिंचरी मांई के नाम से जानते थे उनका भी अहम योगदान रहा। और इसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली।
सन् 1947 में देश आजाद हो गया। नेहरू जी आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बन गये थेए चन्द्र सिंह गढ़वाली उनके पास पेशावर के सैनिकों की पेंशन के बारें में मिलने आये और उनसे पेशावार के स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन के बारे में कुछ करने का आग्रह किया तथा कहा कि पेशावर की क्रान्ति को राष्ट्रीय पर्व समझा जाये जीवित सैनिकों को पेंशन तथा मृत सैनिकों के परिजनों को आर्थिक सहयोग दिया जायए तो नेहरू जी क्रोध में उबल पड़े और बोले कि मान्यवर तुम यह कैसे भूल जाते हो कि तुम बागी हो। पंड़ित मोतीलाल नेहरू ने अपने अन्तिम दिनों में जवाहर लाल नहेरू से कहा था कि गढ़वाली सैनिको को  मत भूलना। जवाहर लाल नेहरू ने जो टिप्पणी गढ़वाली सैनिकों के लिए की थी उसका विरोध वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने उनसे किया और उन्हंे बताया कि गढ़वाली सैनिकों ने वही काम किया जो उन्हें देश हित में अपना फर्ज दिखा इसके जो मतलब आप निकाल रहे हैं वह सरासर गलत और पेशावर की बगावत के महत्व को कम करना ही है।
देश की अस्मिता और आजादी को नेताओं ने किस कदर अपनी कुंठा का शिकार बनाया इसका जीता जागता उदाहरण हमारे सामने आज कश्मीर है। आजादी के बाद जब देसी रियासतों का भारत में सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा विलय कराया जा रहा था लेकिन कश्मीर को नेहरू जी ने आसानी से भारत में मिलाने नही दिया और कश्मीर का मसला आज भी देश के लिए नासूर बना हुआ है। इस बात को आम हिन्दुस्तानी जानता है कि अगर अन्य रियासतों की तरह उस समय कश्मीर को भी भारत में मिलाने दिया जाता तो आज हजारों निरीह लोगों की जान न गंवानी पड़ती तथा देश के लिए हमेशा का यह सरदर्द नही होता।
सन् 1951.52 में देश में नये संविधान के अनुसार चुनाव कराये गये। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली ने गढ़वाल से कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा तो उन्हें पेशावर का बागी होने के दोष में आजाद भारत की सरकार ने बंदी बना दिया तथा महीनों तक जेलों में यातनायें दी। जिस आदमी ने देश की आजादी के लिए अपने सर्वस्व को दाॅंव पर लगा दिया उसे देश की आजादी के बाद भी यातनायें दी गईं उनको कई बार बे.वजह गिरफ्तार करके जेल में ड़ाला गया। अपने मित्रों के सहयोग से गढ़वाली जी ने चुनाव लड़ा और बिना संसाधनों के 7714 वोट लिये जबकि विजयी प्रत्याशी को 10000 वोट मिले।
पेशावर की सैनिक बगावत को देश की आजादी के बाद भी उतना महत्व नही दिया गया जिस तरह से इसे दिया जाना चाहिए था यही कारण रहा कि अपनी राजनीति चमकाने वाले समय.समय पर वीर चन्द्र सिंह जैसे देश भक्तों के लिए नारे तो लगाते रहे लेकिन देश की आजादी के बाद भी पेशावर के बागी सैनिकों को दोयम दर्जे की जिन्दगी गुजारनी पड़ी। जिन वीरों ने देश की आजादी के लिए एक लौ जलाई और देश की आजादी को एक नई दिशा दी उन्हें दर.दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया।
   चन्द्रसिंह गढ़वाली में ऐ सेनानायक के सभी गुण विद्यमान थे। उनका जीवन संर्घषमय रहा। उन्हौंने देश सेवा एंव समाज सेवा का कार्य बड़ी कर्तव्य.परायणता के साथ निभाया। गांधी जी ने उनके बारे मंे कहा कि अगर मुझे एक गढ़वाली और मिल गया होता तो देश कब का आजाद हो गया होता। चन्द्रसिंह गढ़वाली के पेशावर सैनिक विद्रोह ने हमें आजाद हिन्दे फौज को संगठित करने की प्रेरणा दी। वहीं बैरिस्टर मुकुन्दीलाल जी के शब्दों में चन्द्रसिंह गढ़वाली एक महान पुरूष हैं। आजाद हिन्द फौज का बीज बोने वाला वही है। पेशावर कांड का नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज समझ गये कि भारतीय सेना में यह विचार गढ़वाली सिपाहियों ने ही पहले पहल पैदा किया कि विदेशियों के लिए अपने खिलाफ नही लड़ना चाहिए। यह बीज जो पेशावर में बोया गया था उसका परिणाम सन् 1942 में सिंगापुर में देशभक्त हजारो गढवाली नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज में भर्ती होने आ गये थे। प्रसिद्ध विचारक एवं महाने लेखक राहुल सांकृत्यायन के अनुसार पेशावर का विद्रोह विद्रोहों की एक श्रृंखला को पैदा करता है जिसका भारत को आजाद करने में भारी हाथ है। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली इसी पेशावर.विद्रोह के नेता और जनक हैं।
वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली आजीवन यायावर की भांति घूमते रहे। आजादी से पहले तो अंग्रेज शासकों ने उन्हें तरह.तरह की यातनायें दी लेकिन आजादी के बाद भी उनका कोई ठिकाना न रहा और वे समाज के कार्यों में सदा ही लगे रहे। देश के आजाद होने के बाद भी गढ़वाली जी कभी कोटद्वार कभी चैथान गढ़वाल में अनेकों योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए लड़ते रहे लेकिन कांगे्रस के नेताओं ने हमेशा उन्हें परेशान ही किया। असल में कांगे्रसी चाहते थे कि गढ़वाली जी काग्रेस में रहें लेकिन गढ़वाली जी पहले तो साधारण आर्यसमाजी थे लेकिन बाद में वे पक्के कम्युनिस्ट बन गये। और आजीवन कम्ुयनिस्ट पार्टी के कार्ड़ होल्डर ही रहे। गढ़वाली जी के सामाजिक जीवन का खामियाजा उनके परिवार को उठाना पड़ा। जब जेल में थे देश गुलाम थ तब उनकी पत्नी भागीरथी देवी बच्चों को लिये दर.दर की ठोकरें खाती रहीं और तो और इतने बड़े स्वतत्रता सेनानी की पत्नी को कई बार लोगों के जूठे वर्तन तक साफ करने पड़े और लोगों दया पर आश्रित रहना पड़ा। आजादी के बाद भी गढ़वाली जी दिन रात देश और समाज के बारे मे ंसोचते रहेत थे। उनका सपना था कि कोटद्वार गढ़वाल में जहां कण्वऋर्षि का आश्रम था और जहां महाराजा भरत का जन्म हुआ वहां भरत नगर बसाया जाय और उनके गांव चैथान के गवणी में तहसील बने तथा चन्द्रनगर जिसे आज गैरसैंण कहा जाता है वहां उत्तराखण्ड राज्य की राजधानी बने। गढ़वाली जी रामनगर से चैथानए दूधातोली रेलमार्ग बनाने के लिए भी प्रयासरत रहे लेकिन सत्ता की राजनीति तथा उनका कम्ुयनिस्ट होना ही उनके लिए एक तरह से अभिषाप रहा। कल तक नेहरू सहित जो नेता उन्हें बड़ा भाई कहते थे वे आज उनकी तरफ देखना भी नही चाहते थे। आज भारत का यह वीर योद्धा किसी के लिए वोट बैंक नही बन सका। यही कारण रहा कि आजादी के बाद भी चन्द्र सिंह गढ़वाली जी को दर.दर भटकना पड़ा।
   वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म जिला पौड़ी गढ़वाल के चैथान पट्टी के रैणूसेरा गांव में 25 दिसम्बर 1891 में ठाकुर जाथल सिंह के घर हुआ। चन्द्रसिंह बचपन से शरारती तथा तेज स्वभाव के थे इसलिए लोग इन्हें भड़ कहकर पुकारते थे। चन्द्र सिंह ने गांव में ही दर्जा चार तक पढ़ाई की। चन्द्रसिंह गांव में सैनिकों को देखकर सेना में भर्ती होना चाहते थे लेकिन मां.बाप नही चाहते थे कि वे भर्ती हो इसलिए 3 सितम्बर सन् 1914 में घर से भागकर लैन्सड़ौन में सेना में भर्ती हो गये। 15 जून 1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चन्द्रसिंह मित्र देशो की सेना के साथ फ्रांस के मोर्चे पर गये थे।  1917 को वे तुर्कों के खिलाफ सीरियाए रमादी तथा तथा बसरा के मोर्चों पर भी लड़ने के लिए गये। सन् 1920 में गढ़वाली जी की कम्पनी को वजीरिस्तान के बार्ड़र पर भी लड़ाई में भेजा गया। देश में तथा देश क बाहर गढ़वाली जी अनेकों बार अपने जौहर दिखा चुके थे। लेकिन इसबीच देश प्रेम का अंकुर भी अन्दर ही अन्दर पलता रहा जो 23 अपै्रल 1930 को पेशावर की सशस्त्र बगावत के रूप में सामने आया। प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाल राइफल्स से लगभग 13000 जवानों ने अपनी कुर्वानी दीए दो विक्टोरिया क्रास और बाद में फिर कहीं जाकर 1921 में इसे राॅयल गढ़वाल राइफल्स का खिताब मिला।
पेशावर की बगावत के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली अपने सिद्धान्त के लिए हिमालय की तरह अटल थे। आजीवन उन्हौंने अपने सिद्धान्तों से समझौता नही किया। हिमालय का यह अटल सिद्धान्तवादी लौह पुरूष अपने सिद्धान्तों के लिए लड़ते हुए 1 अक्टूबर 1979 को दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में मानव देह को त्यागकर परमधाम को चला गया लेकिन उनके विचार और सिद्धान्त हमेशा देश और समाज को आगे बढ़ने तथा गरीब और लाचार लोगोें की आवाज बनने की प्रेरणा देते रहेंगे।

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23 अप्रैल को सैनिक बगावत हुई लेकिन अंग्रेजों ने बगावत का केस दर्ज नही किया वे जानते थे कि यदि बगावत का केस दर्ज होगा तो देश में जो आन्दोलन चल रहा है उसमें यह आग में घी का काम करेगा। इसी आधार पर उन्हें बन्दी बनाया गया। लेकिन देश की जनता 23 अप्रैल 1930 की सैनिक बगावत के बारे में जान चुकी थी कई अखबारों में इस खबर को छापा। यह अलग बात है कि देश के इतिहास में पेशावर की बगावत को उतना महत्व नही दिया गया जिस प्रकार से यह कं्रान्ति हुई थी।
पंड़ित जवाहर नेहरू ने अपनी एक पुस्तक मंे लिखा है कि पेशावर में गढ़वाली सैनिकों ने सैनिक बगावत इसलिए की थी कि वे जानते थे कि देश आजाद होने वाला है और उनके खिलाफ किसी प्रकार की कठोर कार्यवाही नही की जायेगी। इससे जाहिर होता है कि देश की लिए अपनी जान को दांव पर लगाने वाले वीर सैनिकांें की उस समय भी नेताओं की नजर में कोई कीमत नही थी। जो सैनिक अंग्रेजों के अधीर नौकारी कर रहे थे उनके खिलाफ सशस्त्र बगावत करना आम बात नही थी। अंग्रेज चाहते तो गढ़वाली सैनिकों को पेशावर में गोलियों से भून देते कोई उस समय पूछने वाला नही था। फिर गढ़वाली सैनिक जानते थे कि इस बगावत का अंजाम कुछ भी हो सकता था। लेकिन नेहरू जी की बातों से लगता है उस समय भी देश की आजादी को नेता राजनीति के चश्मे से देखने लगे थे।
चन्द्र सिंह गढ़वाली को सन् 1945 में जेल से रिहा कर दिया गया लेकिन उनके गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जेल में क्रान्तिकारी यशपाल से परिचय होने से जेल से बाहर आने के बाद गढ़वाली जी कुछ दिन लखनऊ में उनके साथ रहे। उसके बाद वे हल्द्वानी आ गये।1946 में चन्द्र सिंह ने रानीखेत में भंयकर अकाल से पीड़ित लोगों की मदद से सरकारी गल्ले के भण्डार को जनता में बांट दिया। इससे स्थानीय प्रशासन नाराज हुआ लेकिन गढ़वाली जी ने कहा कि एक तरफ हमारी जनता भूख से मर रही है और तुम हमारे हिस्से के अनाज को ब्लैक में बेच रहे हो। रानीखेत में अंग्रेजों की बटालियनें थी उनके लिए पानी का समुचित प्रबन्ध था लेकिन स्थानीय लोगों को काफी परेशानी होती थी गढ़वाली जी ने लोगों की पानी की समस्या का भी समाधान कराया। दिसम्बर 1946 को चन्द्र सिंह ने गढ़वाल में प्रवेश किया गढ़वाल की जनता ने उन्हें सर आॅंखों पर स्थान दिया और जगह.जगह उनका भव्य स्वागत हुआ। चूंकि गढ़वाली जी 1944 में पक्के कम्युनिस्ट बन गये थे इसलिए गढ़वाल के कांगे्रसी उनके स्वागत सत्कार को पचा नही पाये इसलिए उनका विरोध करना शुरू कर दिया।सन् 1948 में टिहरी में राजशाही के खिलाफ लड़ने वाले अमर वीर नागेन्द्र दत्त सकलानी के शहीद हो जाने के बाद वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जी ने टिहरी आन्दोलन का नेतृत्व भी किया। सरकार को आशंका हो गई थी कि चन्द्रसिंह जिला बोर्ड के चेयरमैन का चुनाव लड़ना चाहते हैं इसलिए सरकार ने उन्हें पेशावर का सजायाफ्ता बताकर जेल में ड़ाल दिया। कुछ माह बाद जेल से छूटने के बाद गढ़वाली जी ने गढ़वाल में शराब के खिलाफ आन्दोलन भी किया इसमें कोटद्वार की इच्छागिरि मांई जिन्हंे लोग टिंचरी मांई के नाम से जानते थे उनका भी अहम योगदान रहा। और इसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली।
सन् 1947 में देश आजाद हो गया। नेहरू जी आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बन गये थेए चन्द्र सिंह गढ़वाली उनके पास पेशावर के सैनिकों की पेंशन के बारें में मिलने आये और उनसे पेशावार के स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन के बारे में कुछ करने का आग्रह किया तथा कहा कि पेशावर की क्रान्ति को राष्ट्रीय पर्व समझा जाये जीवित सैनिकों को पेंशन तथा मृत सैनिकों के परिजनों को आर्थिक सहयोग दिया जायए तो नेहरू जी क्रोध में उबल पड़े और बोले कि मान्यवर तुम यह कैसे भूल जाते हो कि तुम बागी हो। पंड़ित मोतीलाल नेहरू ने अपने अन्तिम दिनों में जवाहर लाल नहेरू से कहा था कि गढ़वाली सैनिको को  मत भूलना। जवाहर लाल नेहरू ने जो टिप्पणी गढ़वाली सैनिकों के लिए की थी उसका विरोध वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने उनसे किया और उन्हंे बताया कि गढ़वाली सैनिकों ने वही काम किया जो उन्हें देश हित में अपना फर्ज दिखा इसके जो मतलब आप निकाल रहे हैं वह सरासर गलत और पेशावर की बगावत के महत्व को कम करना ही है।
देश की अस्मिता और आजादी को नेताओं ने किस कदर अपनी कुंठा का शिकार बनाया इसका जीता जागता उदाहरण हमारे सामने आज कश्मीर है। आजादी के बाद जब देसी रियासतों का भारत में सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा विलय कराया जा रहा था लेकिन कश्मीर को नेहरू जी ने आसानी से भारत में मिलाने नही दिया और कश्मीर का मसला आज भी देश के लिए नासूर बना हुआ है। इस बात को आम हिन्दुस्तानी जानता है कि अगर अन्य रियासतों की तरह उस समय कश्मीर को भी भारत में मिलाने दिया जाता तो आज हजारों निरीह लोगों की जान न गंवानी पड़ती तथा देश के लिए हमेशा का यह सरदर्द नही होता।
सन् 1951.52 में देश में नये संविधान के अनुसार चुनाव कराये गये। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली ने गढ़वाल से कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा तो उन्हें पेशावर का बागी होने के दोष में आजाद भारत की सरकार ने बंदी बना दिया तथा महीनों तक जेलों में यातनायें दी। जिस आदमी ने देश की आजादी के लिए अपने सर्वस्व को दाॅंव पर लगा दिया उसे देश की आजादी के बाद भी यातनायें दी गईं उनको कई बार बे.वजह गिरफ्तार करके जेल में ड़ाला गया। अपने मित्रों के सहयोग से गढ़वाली जी ने चुनाव लड़ा और बिना संसाधनों के 7714 वोट लिये जबकि विजयी प्रत्याशी को 10000 वोट मिले।
पेशावर की सैनिक बगावत को देश की आजादी के बाद भी उतना महत्व नही दिया गया जिस तरह से इसे दिया जाना चाहिए था यही कारण रहा कि अपनी राजनीति चमकाने वाले समय.समय पर वीर चन्द्र सिंह जैसे देश भक्तों के लिए नारे तो लगाते रहे लेकिन देश की आजादी के बाद भी पेशावर के बागी सैनिकों को दोयम दर्जे की जिन्दगी गुजारनी पड़ी। जिन वीरों ने देश की आजादी के लिए एक लौ जलाई और देश की आजादी को एक नई दिशा दी उन्हें दर.दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया।
   चन्द्रसिंह गढ़वाली में ऐ सेनानायक के सभी गुण विद्यमान थे। उनका जीवन संर्घषमय रहा। उन्हौंने देश सेवा एंव समाज सेवा का कार्य बड़ी कर्तव्य.परायणता के साथ निभाया। गांधी जी ने उनके बारे मंे कहा कि अगर मुझे एक गढ़वाली और मिल गया होता तो देश कब का आजाद हो गया होता। चन्द्रसिंह गढ़वाली के पेशावर सैनिक विद्रोह ने हमें आजाद हिन्दे फौज को संगठित करने की प्रेरणा दी। वहीं बैरिस्टर मुकुन्दीलाल जी के शब्दों में चन्द्रसिंह गढ़वाली एक महान पुरूष हैं। आजाद हिन्द फौज का बीज बोने वाला वही है। पेशावर कांड का नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज समझ गये कि भारतीय सेना में यह विचार गढ़वाली सिपाहियों ने ही पहले पहल पैदा किया कि विदेशियों के लिए अपने खिलाफ नही लड़ना चाहिए। यह बीज जो पेशावर में बोया गया था उसका परिणाम सन् 1942 में सिंगापुर में देशभक्त हजारो गढवाली नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज में भर्ती होने आ गये थे। प्रसिद्ध विचारक एवं महाने लेखक राहुल सांकृत्यायन के अनुसार पेशावर का विद्रोह विद्रोहों की एक श्रृंखला को पैदा करता है जिसका भारत को आजाद करने में भारी हाथ है। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली इसी पेशावर.विद्रोह के नेता और जनक हैं।
वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली आजीवन यायावर की भांति घूमते रहे। आजादी से पहले तो अंग्रेज शासकों ने उन्हें तरह.तरह की यातनायें दी लेकिन आजादी के बाद भी उनका कोई ठिकाना न रहा और वे समाज के कार्यों में सदा ही लगे रहे। देश के आजाद होने के बाद भी गढ़वाली जी कभी कोटद्वार कभी चैथान गढ़वाल में अनेकों योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए लड़ते रहे लेकिन कांगे्रस के नेताओं ने हमेशा उन्हें परेशान ही किया। असल में कांगे्रसी चाहते थे कि गढ़वाली जी काग्रेस में रहें लेकिन गढ़वाली जी पहले तो साधारण आर्यसमाजी थे लेकिन बाद में वे पक्के कम्युनिस्ट बन गये। और आजीवन कम्ुयनिस्ट पार्टी के कार्ड़ होल्डर ही रहे। गढ़वाली जी के सामाजिक जीवन का खामियाजा उनके परिवार को उठाना पड़ा। जब जेल में थे देश गुलाम थ तब उनकी पत्नी भागीरथी देवी बच्चों को लिये दर.दर की ठोकरें खाती रहीं और तो और इतने बड़े स्वतत्रता सेनानी की पत्नी को कई बार लोगों के जूठे वर्तन तक साफ करने पड़े और लोगों दया पर आश्रित रहना पड़ा। आजादी के बाद भी गढ़वाली जी दिन रात देश और समाज के बारे मे ंसोचते रहेत थे। उनका सपना था कि कोटद्वार गढ़वाल में जहां कण्वऋर्षि का आश्रम था और जहां महाराजा भरत का जन्म हुआ वहां भरत नगर बसाया जाय और उनके गांव चैथान के गवणी में तहसील बने तथा चन्द्रनगर जिसे आज गैरसैंण कहा जाता है वहां उत्तराखण्ड राज्य की राजधानी बने। गढ़वाली जी रामनगर से चैथानए दूधातोली रेलमार्ग बनाने के लिए भी प्रयासरत रहे लेकिन सत्ता की राजनीति तथा उनका कम्ुयनिस्ट होना ही उनके लिए एक तरह से अभिषाप रहा। कल तक नेहरू सहित जो नेता उन्हें बड़ा भाई कहते थे वे आज उनकी तरफ देखना भी नही चाहते थे। आज भारत का यह वीर योद्धा किसी के लिए वोट बैंक नही बन सका। यही कारण रहा कि आजादी के बाद भी चन्द्र सिंह गढ़वाली जी को दर.दर भटकना पड़ा।
   वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म जिला पौड़ी गढ़वाल के चैथान पट्टी के रैणूसेरा गांव में 25 दिसम्बर 1891 में ठाकुर जाथल सिंह के घर हुआ। चन्द्रसिंह बचपन से शरारती तथा तेज स्वभाव के थे इसलिए लोग इन्हें भड़ कहकर पुकारते थे। चन्द्र सिंह ने गांव में ही दर्जा चार तक पढ़ाई की। चन्द्रसिंह गांव में सैनिकों को देखकर सेना में भर्ती होना चाहते थे लेकिन मां.बाप नही चाहते थे कि वे भर्ती हो इसलिए 3 सितम्बर सन् 1914 में घर से भागकर लैन्सड़ौन में सेना में भर्ती हो गये। 15 जून 1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चन्द्रसिंह मित्र देशो की सेना के साथ फ्रांस के मोर्चे पर गये थे।  1917 को वे तुर्कों के खिलाफ सीरियाए रमादी तथा तथा बसरा के मोर्चों पर भी लड़ने के लिए गये। सन् 1920 में गढ़वाली जी की कम्पनी को वजीरिस्तान के बार्ड़र पर भी लड़ाई में भेजा गया। देश में तथा देश क बाहर गढ़वाली जी अनेकों बार अपने जौहर दिखा चुके थे। लेकिन इसबीच देश प्रेम का अंकुर भी अन्दर ही अन्दर पलता रहा जो 23 अपै्रल 1930 को पेशावर की सशस्त्र बगावत के रूप में सामने आया। प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाल राइफल्स से लगभग 13000 जवानों ने अपनी कुर्वानी दीए दो विक्टोरिया क्रास और बाद में फिर कहीं जाकर 1921 में इसे राॅयल गढ़वाल राइफल्स का खिताब मिला।
पेशावर की बगावत के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली अपने सिद्धान्त के लिए हिमालय की तरह अटल थे। आजीवन उन्हौंने अपने सिद्धान्तों से समझौता नही किया। हिमालय का यह अटल सिद्धान्तवादी लौह पुरूष अपने सिद्धान्तों के लिए लड़ते हुए 1 अक्टूबर 1979 को दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में मानव देह को त्यागकर परमधाम को चला गया लेकिन उनके विचार और सिद्धान्त हमेशा देश और समाज को आगे बढ़ने तथा गरीब और लाचार लोगोें की आवाज बनने की प्रेरणा देते रहेंगे।

 

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