Author Topic: Articles By Dr. B. L. Jalandhari - बी. एल. जालंधरी द्वारा लिखे गए लेख  (Read 13803 times)

Dr. B L Jalandhari

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कल्पना को जीवंत करने की कला भाषा की लिपि

                                                                                                        डॉ. बिहारीलाल जलंधरी

          मानवीय अभिब्यक्ति के प्रयत्नों में सबसे पुराने तथा सर्बभोमिक आदि काल से ही भाषा तथा उसका संप्रेक्षण मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विकास के प्रत्येक चरण में एबम प्रत्येक युग में सभी देशों के सभ्य-असभ्य, विकसित-अविकसित, जातियों में आदि काल से ही विद्यमान रही है ! सभ्यता तथा असभ्यता, विकसित-अविकसित समाज के एक प्रमुख अभिब्यक्ति के रूप में प्राचीन भारत ही नहीं बल्कि विश्व के प्रत्येक समाज में लोक प्रियता के स्वरूपों में भाषा निर्बिवादित रही है ! इसके प्रमाण कला व साहित्य में अनेक रूपों में उपलब्ध हैं ! एक और भारत के अलावा प्राचीन मानेजानी वाली आर्याकालीन संस्कृति में भाषा में संप्रेक्षण के अस्तित्व को स्वीकार है दूसरी और तत्कालिन समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने उस काल की भाषा को उसके संकेतों के रूप में लिपिबद्ध कर भविष्य के लिए संवर्धित किया !  
          भाषा के ध्वनि रूपक संकेत जिसे वर्तमान में लिपि कहते हैं जिसके प्रमाण भारत में ही नहीं वल्कि पूरे विश्व में मिलते हैं! साक्ष्यों के साथ साथ उद्धरणों का अभाव कहीं नहीं देखा जाता ! शब्दाकानो के साथ साथ चित्रांकन जो अधिकांश चित्रांकनों में दिखाई दिए जाते हैं के साथ साथ छेनी और तूलिका की वह कला आज भी उस सभ्यता को समझने के लिए विवश करती हैं !
          प्रतिकात्मकों जिसके माध्यम से उस काल का मानव अपना सन्देश आने वाली पीढी को देना चाहता था वही सन्देश आज दुनिया भर के अजायबघरों की सोभा बढा रहे हैं ! कई गुफाएँ या पौराणिक स्थान ऐसे हैं जिन्हें अजायबघर नाम दे दिया गया है! जिनमे प्रागैतिहाषिक भीम बैठका, आध्येतिहसिक मोहन जोदद्वो हड़प्पा से लेकर भरहुत, बोधों का पवित्र तीर्थ साँची, अमरावती, नगर्जुन्कोंदा, सारनाथ, पवैया, नचना, भोमर, बाघ, अजंता, सिरपुर, राजिम, वादामी, खाज्राहू, पत्त्द्क्कल, एहोले, कोणार्क, भुवनेश्वर, वेलुर, हेलेविदु, तंजावूर, चिदंबरम, आदि भारत के विविध स्थानों से प्राप्त शिल्पन्कानो, चित्रांकनों, आदि में तत्कालिन भाषा की एक कल्पनाशील लेखा, एक जीवंत व गत्यात्मक मनोदशा परिलक्षित करती है! कहीं चित्र लिपि कहीं अंक लिपि तो कहीं कई अक्षरों के लेख के रूप में सन्देश छोड़ दिए गए हैं ! इसमें से कई शिलालेख खंडित हो चुके हैं! इन खंडित शिलालेखों को भी भाषा संस्कृति के प्रतिमानों के रूप में संग्रहालयों में प्रतिष्ठित किया गया है! भाषा और उसके प्रतीकात्मक ध्वनि अक्षरों की उपलब्धियां इतनी प्रचुर पुष्ट और ब्यापक है,  कि उसके आधार पर सम्पूर्ण देश व उसके अंतर्गत प्रदेशों की भाषा और उसकी संस्कृति के परिपेक्ष्य में प्रागैतिहासिक युग से लेकर वर्तमान समय तक भाषा और उसकी संस्कृति का अनुक्रम उसका इतिहास, उसका समाज में स्थान, उसको गाड़ने या अंकित करने की तकनीकी तथा उसका स्वरुप आदि की द्रश्थी से सुनिश्चित किया जा सकता है कि उस युग कि भाषा और संस्कृति इस युग से कितनी विकसित और उसको अंकन या चित्रण करने वाले कितने बुद्दिजीवी थे !
          प्रागैतिहासिक काल से लेकर १९ वीं शताब्दी प्रयांत भारत की विभिन्न अंचलों में प्रतिष्ठित विद्वानों ने अपनी भाषा और संस्कृति को जीवित रखने कि लिए उसे कई रूपों में संवर्धित करना आरम्भ कर दिया! भूतकाल कि आपदाओं को यादकर बुद्धिजीवियों ने जिनमे इतिहासकार, पुरातत्वविद के साथ साथ अन्य तत्सम्बन्धी विद्वानों ने उसे संरक्षण देने की आवश्यकता समझी! फलश्वरूप जो पौराणिक काल के शिलालेख, ताम्रपत्र, पाषाण लेख आदि वर्तमान सभ्यता को प्राप्त हुए हैं उसके आधार पर ही उस कल्पना  को उन चिन्हों द्वारा समझा जा सकेगा जो उस सभ्यता के महापुरुषों, बुद्दिजीवियों ने भविष्य के लिए सुरक्षित छोडे थे ! भाषा ही एक ऐशा माध्यम है जो द्रस्था की कल्पना को ध्वनि अक्षरों के माध्यम से साकार कर जीवंत कराती है!

          वास्तवित रूप में अपनी भाषा कि ध्वनि और उनका अक्षरों के रूप में साकार होना कल्पना को जीवंत करना ही है! उत्तर भारतीय लिपियों में पंजाबी भाषा की गुरुमुखी लिपि का इतिहास लगभग चार सौ साल पुराना है ! इसी प्रकार अन्य कई लिपियाँ हैं जिनका इतिहास बहुत पुराना नहीं है! इन लिपियों के मूल में ब्राहमी लिपि ही है जिसके मूलाक्षर भारत देश कि सभी प्रचलित लिपियों में कतिपय मिलते हैं !

          सभ्य व विकसित समाज के बुद्धिजीवी जिन्हों ने तत्कालीन समाज में प्रचलित भाषा व उसकी लिपि में अपनी भाषा लिखी तो उन्हें उस लिपि में अवश्य ही कुछ कमी मिली होगी ! वह लिपि उनकी स्थानीय भाषा की  स्थानीय ध्वनियों को पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं कर पाई होगी, अतः उन्होंने उस लिपि के सामानांतर अपनी भाषा की स्थानीय ध्वनियों को परिभाषित करने वाले अक्षरों को लिपि के रूप में ढालना आरम्भ कर दिया ! जिस प्रकार पंजाबी भाषा कि गुरुमुखी लिपि के प्रथम ब्यंजन *कका* तथा देवनागरी के प्रथम ब्यंजन *क* में ध्वन्यात्मक
अन्तर है इन लिपियों के अक्षरों में समानता अवश्य है ! इसी प्रकार कई अन्य लिपियों के उदहारण दिए जा सकते हैं ! उत्तर भारत कि अधिकांस लिपियों ने ब्राह्मी लिपि का ही अनुसरण किया ! इन लिपियों में स्थानीय भाषा के ध्वनियों को अक्षरों के रूप में जोड़ा गया है ! स्थानीय भाषा के बुद्दिजीवियों ने अपनी भाषा के कुछ शब्दों को देवनागरी से अलग कर प्रयोग किया जिस से उन्हों ने अपनी लिखित भाषा की ध्वनि संबन्धी कमियों को पूरा किया ! स्थानीय ध्वनियों को अक्षर के रूप में जोड़ा जो आगे चलकर उस क्षेत्र की लिपि के रूप में प्रचलित हो गयी!

          जिस ब्यक्ति का अपनी भाषा पर पूरा नियंत्रण है वह अन्य लिपियों में अपनी स्थानीय भाषा लिखते समय अवश्य ही कमी पायेगा ! तथाकथित और रातों रात इतिहास गढ़ने वालों कि कमी नहीं है, जो वास्ताबिक रूप में प्रयोगात्मक है तथा जिस ध्वनि की कमी बार बार पाई जाती है उसे मूर्त रूप दिया जाना एक अतिश्योक्ति नहीं माना जाना चाहिए!
          पुराण की उक्तियों में उल्लेख मिलता है कि जिस बोली को सक्षम व संपन्न वर्ग ने अपनाया वह बोली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होकर अंतरराष्ट्रीय रूप में ब्यापकता प्राप्त करती है!
          यहाँ पाठकों कि जिज्ञासा के लिए एक प्रसंग देना उचित होगा कि उत्तराखंड कि गढ़वाली कुमाउनी भाषा में वह गुण मौजूद हैं जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भाषा में भी नहीं हैं! अन्य भाषाओँ कि तरह हमारी भाषा के भी कई प्रत्यय हैं जिनमे केवल एक प्रत्यय के विषय में अवगत कराऊंगा जो प्रत्यय किसी भी शब्द के पीछे लगने से उस शब्द का अर्थ ही बदल जाता है ! वह प्रत्यय है *यांण* ! यदि इस प्रत्यय का प्रयोग उत्तराखंड की भाषाओँ के शब्दों के साथ किया जायेगा तो आपको अवश्य ही अपनी भाषा के केवल एक गुण की अवश्य ही अनुभूति होगी !

Dr. B L Jalandhari

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(1)
उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा हेतु एक पहल
                                                                                                       डॉ.  बिहारीलाल जलंधरी
          उत्तराखंड प्रदेश की परिकल्पना को साकार करने व शहीदों के बलिदान तथ  वासी प्रवासी आन्दोलनकारियों के अथक प्रयास के उपरात उत्तराखंड प्रदेश अस्तित्व में आया ! इस नव निर्मित प्रदेश के विधवत जनों द्वारा अपने अपने क्षेत्र में इस प्रदेश में विकाश के लिए अनवरत रूप से कार्य किया जा रहा है ! जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ब्यावासयिक गतिविधि, पलायन रोकने, जलसंसाधन को उपयोग करने, आपसी सहयोग, बन तीर्थाटन, भाषा-शंश्कृति आदि महत्वपूर्ण विषयों के उन्नयन हेतु सम्बंधित क्षेत्र के विद्वान प्रयासरत हैं ! नवनिर्मित प्रदेश के विकाश की बिभिन्न विधाओं को आगे बढ़ते हुए हम उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा में विषय पर भी सम्बैचारिक बुद्धिजीवी जुड़कर कार्य करे तो उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा का मार्ग सुगम हो सकता है ! इसके लिए सर्बप्रथम प्रबासी उत्तराखंडियों द्वारा इस विषय पर कार्य करने के लिए एक कार्य योजना को मूर्त रूप दिया जाना अति आवश्यक है ! इस प्रकार के कई अन्य विषयों पर प्रवास में कार्यरत कई बुद्धिजिवियों के विचार जानने तथा उन्हें एक समूह के रूप में संगठित कर इस विषय पर कार्य करने की योजना का बनना वर्तमान की आवश्यकता हैं !

          क्या उत्तराखंड प्रदेश की कोई प्रादेशिक भाषा ? आज यह उत्तरखंड प्रदेश की भाषा के सम्बन्ध में एक ज्वलंत प्रश्न बना हुआ हैं ! उत्तरखंड प्रदेश जो मुख्य दो भागों को मिलकर निर्मित हुआ है,  उत्तरखंड के गढ़वाल कुमाओं यह दो भाग पोरानिक काल से एक भाग में स्थापित होने के बावजूद भी इनमे प्रथकता रही है,  इन दोनों क्षेत्रों के तीज त्यौहार, ब्याह शादी, खान पान रीति रिवाज, आदि अम्मुमन में एकरूपता है,  यहाँ की बोली गढ़वाल में गढ़वाली तथा कुमाओं में कुमोनी लाखों लोगों द्वारा निरंतर बोली जाती है ! इन दोनों बोलियों के स्तानीय ध्वनियों में मामूली अंतर है ! इन बोलियों को भाषा मानते हुए कई विद्वानों ने अथक मेहनत कर इनमे साहित्य सर्जन कर प्रकाशित भी किया है तथा कई लेखकों की रचनाएँ पाण्डुलिपि के रूप में सुरक्षित रहते हुए पुस्तक का रूप धारण करने के लिए किसी प्रकाशक व वित्तीय सहायता करने वाली वित्तीय संस्थाओं द्वारा अनदेखा करने से लंबित पड़ी हैं ! उत्तराखंड की दोनों भाषाओँ में जो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं वह अपनी एक अहम् समस्या से गजर रही हैं! यहाँ यही एकमात्र ऐसा साहित्य है जो अपने लिए समुचित पाठक नहीं जुटा पा रहा है ! यहाँ के भाषा विद्वानों ने यहाँ की भाषा भाषा बहुत कुछ लिखा है, यहाँ की विकट परिस्तिथियों को दर्शाते हुए कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,  परन्तु जब वह पुस्तक बाज़ार में पाठकों तक पहुँचती है तो अन्य भाषाओँ की पुस्तकों की अपेक्षा उत्तराखंडी भाषा की पुस्तकें अपने लिए पाठक नहीं जुटा पाती ! अन्य भाषाओँ की पुस्तकों की अपेक्षा इनकी मांग न के बराबर होती है यह पुस्तकें केवल उत्तराखंड की भाषा पर काम करने वाले समाज सेवकों या भाषा के शोधार्थियों तक ही सहिमत कर रह जाती है ! कुछ लोगों द्वारा इन पुस्तकों को उलट पुलट कर अवश्य देखा जाता है, परन्तु वे खरीदने की जगह पर कम्प्लीमेंत्री की चाहत रखते हैं ! इस स्तिथि को देखेते हुए भाषा सम्बन्धी कुछ विद्वानों के मन में अपनी भाषा में प्रति, भाषा को बोलनेवालों के प्रति कई बिचार अवश्य उत्पन्न होंगे, इसमें अतिशयोक्ति नहीं ! यहाँ प्रश्न उठता है की जिस बोली को लाखों लोगों द्वारा अपने आपसी वार्तालाप या संबाद का माध्यम बनाया जा रहा है उसी भाषा या बोली में कोई पुस्तक प्रकाशित होकर बाज़ार में आती है तो गढ़वाली कुमोनी भाषा बोलने वाले अपनी भाषा में छपी हुई पुस्तक को खरीदने में रूचि क्यों नहीं रखते ! उत्तराखंड की भाषा के सम्बन्ध में यह मुख्य और विचारणीय प्रश्न है !  उत्तराखंड की भाषा के पक्ष में यह एक और गंबीर विषय है ! इस विषय पर हेमवती नंदन गढ़वाल विश्व विद्यालय द्वारा शोध संपन्न हो चुका है ! जिसमे कई बिन्दुओं के साथ साथ यह विन्दु भी स्पस्ट हो चूका है की उत्तराखंड की भाषा को संबाद की भाषा में साथ-साथ संपर्क भाषा के रूप में नहीं अपनाया गया ! जिस कारण उत्तराखंड की भाषा के साहित्य के साथ आज यह स्तिथि पैदा हो रही है ! उत्तराखंड की भाषा के सम्बन्ध में एक अन्य विन्दु यह भी है की यहाँ की भाषा को रचनाकारों ने देवनागरी लिपि के माध्यम से लिखा है, देवनागरी लिपि में यहाँ की स्थानीय ध्वनियों को स्पस्ट करने के लिए अक्षर नहीं हैं ! स्थानीय ध्वनि अक्षरों के अभाव से देवनागरी में लिखी जाने वाली गढ़वाली कुमोनी स्पस्ट नहीं होती, भाषा में कई स्थानों पर ध्वनि सम्बन्धी त्रुटियां रहा जाती हैं ! रचनाकार अपने विचारों को जिन स्थानीय ध्वनियों के साथ दर्शाना चाहता है पहले तो वह उन्हें नहीं दर्शा सकता, यदि किसी अन्य समानार्थक शब्द का प्रयोग करता है तो उस से स्थानीय ध्वनि स्पस्ट नहीं होती ! फल्श्वरूप कहीं न कही भाषा के लिखित रूप में कमी रहा जाती है ! रचनाकार कुछ लिखता है और पाठक कुछ अलग ही समझता है ! यह सबकुछ उत्तराखंड की स्तानीय भाषा के ध्वनि अक्षरों के अभाव में हो रहा है ! यदि इस ढर्रे में पूरी पुस्तक प्रकाशित होती है तो उसमे इस प्रकार की हजारों कमियां रहा जाती हैं ! जिन कमियों के कारन पाठक को इन पुस्तकों को पढ़ने में असुविधा होती है ! यही कारन हैं की उत्तराखंड की दोनों भाषाओँ में छपी पुस्तकों के प्रति खुद उत्तराखंडियों का रुझान कम है !  शोध में उत्तराखंड की गढ़वाली कुमौनी भाषा की कई खामियों को दर्शाते हुए उनका समाधान के लिए सकारात्मक परिणाम स्पस्ट हुए हैं ! जिसमे मुख्य रूप से यहाँ की स्थानीय भाषा लिखने के लिए देवनागरी लिपि में स्तानीय ध्वनियों को दरसाने वाले अक्षरों का न होना पाया गया ! शोध ने स्पस्ट किया की उत्तराखंड की भाषा के स्तानीय ध्वनि सूचक ही निसंदेह उत्तराखंड की भाषा के मूलाक्षर हैं ! जिनका देवनागरी लिपि के साथ जुड़ने से ही भाषा सम्बन्धी दुरुहता तो पूरा किया जा सकता है ! उसके उपरांत ही उत्तराखंड की भाषा को संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया जा सकता है !  

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Dr. B L Jalandhari

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(२)
उत्तराखंड की लिखित भाषा सम्बन्धी उपरोक्त समस्या के समाधान के लिए उत्तराखंड में हेमवती नंदन गढ़वाल विश्व विध्यालय, श्रीनगर से बर्षों से शोध किया जा रहा था ! पोरानिक साक्ष्यों के अर्न्तगत शोध संपन्न होने के उपरांत उत्तराखंड की भाषा की मूल ध्वनियों के सम्बन्ध में सकारात्मक परिणाम निकले हैं ! जिसमे उत्तराखंड की मुख्य गढ़वाली कुमोनी भाषा जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है देवनागरी लिपि में स्थानीय ध्वनि के अक्षरों का अभाव है, जिसके कारन भाषा सम्बन्धी कई अद्यतन त्रुटियां हुई हैं ! उत्तराखंड की भाषा  के लिए देवनागरी में उत्तराखंड की भाषा के स्थानीय ध्वनि आखरों को जोड़ने का प्रस्ताव उत्तराखंड सरकार को भेजा है ! उत्तराखंड की भाषा गढ़वाली कुमोनी की लेखन सूचक देवनागरी लिपि के साथ स्थानीय भाषा के ध्वनि आखरों के जुड़ जाने से भाषा में ध्वनि सम्बन्धी लिपिकीय त्रुटि को पूरा किया जा सकता है ! भाषा में लिपि सम्बन्धी त्रुटि का समाधान होने के उपरांत ही उत्तराखंड के ध्वनि-ध्वन्यात्मक, प्लुत-अतिप्लूत, तथा ब्यंज्नंत स्वरों को पूर्ण ध्वनि के साथ स्पस्ट लिखा जा सकेगा !

          उत्तराखंड की गढ़वाली कुमोनी के लिए सफलता पुर्बक शोध तथा इस से उभरे हुए स्थानीय भाषा की मूल ध्वनि और उसके अक्षरों को देवनागरी लिपिके साथ जोड़ने के लिए शासकीय स्थर पर कार्य किया जाना है ! उत्तराखंडी भाषा के स्थानीय ध्वनि आखरों के खोजकर्ता ने इन आखरों को *गउ आखर*  नाम दिया है ! यह क्रमशः पांच आखर हैं जो देवनागरी लिपि के ब्यंजन के नीचे मात्रा के रूप में प्रयोग होंगे ! उत्तराखंड की भाषा को लिखने में देवनागरी के साथ *गउ आखर*  के जुड़ने से उत्तराखंड की भाषा-साहित्य में उत्तराखंड के मूल ध्वनियों को स्पस्ट लिखा व पढ़ा जायेगा ! उत्तराखंड की भाषा के पक्ष में यह एक नया प्रयोग होगा !

          देवनागरी लिपि के साथ जुड़ने वाले उत्तराखंड की भाषा के स्थानीय ध्वनियों *गउ आखर*  का सफ्तावायर विकसित होने के उपरांत ही देवनागरी लिपि में उत्तराखंड की भाषा व उसके साहित्य पर स्वछंद रूप से कार्य हो सकेगा ! वर्तमान में जलंधरी फॉण्ट इन *गउ आखर*  को आप तक पहुचाने की कोशिस कर रहा है !

          इस अध्ययन के कुछ विन्दुओं पर शासकीय स्थर पर कार्य किया जाना अति आवश्यक है ! अध्ययन पर  उत्तराखंड की भाषा के लिए निम्न बिंदु निश्चित हुए हैं !

१.        गढ़वाली-कुमोनी भाषा के अध्ययन के लिए उत्तराखंड भाषा विभाग की स्थापना कराना !

२.        दोनों भाषाओँ में कार्यरत साहित्यकारों की रचनाओं का प्रकाशन तथा साहित्य श्रजन पर प्रोत्साहन !

३.        गढ़वाली-कुमोनी बोलियों को सम्पर्क भाषा की ओर अग्रसर करने के लिए कार्यक्रम तैयार कराना !

४.       दोनों भाषाओँ की शब्द समानता पर आधारित पाठ्यक्रम तैयार कर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों से लागू कराना !

५.        उत्तराखंड प्रदेश के विश्व विद्यालयों व उच्च शिक्षण संस्थानों में उत्तराखंड भाषा विभाग की स्थापना कराना !

           ज्ञातब्य हो की उत्तराखंड की क्रमशः दोनों बोलियों में से किसी एक को भी उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है ! ना ही यहाँ की बोलियों को भाषा के रूप में विकशित करने लिए शासन स्थर पर कार्यवाही हुई है ! एक सम्बैचारिक समूह की स्थापना के उपरांत ही इस अहम् उद्देश्य को अग्रेषित करने में अवश्य ही सफलता मिलेगी !

जय बदरी विशाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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The work being done by Dr Sahab for development of regional language is remarkable.

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                                                          उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा हेतु एक पहल

                                                                                                       डॉ.  बिहारीलाल जलंधरी

          उत्तराखंड प्रदेश की परिकल्पना को साकार करने व शहीदों के बलिदान तथ  वासी प्रवासी आन्दोलनकारियों के अथक प्रयास के उपरात उत्तराखंड प्रदेश अस्तित्व में आया ! इस नव निर्मित प्रदेश के विधवत जनों द्वारा अपने अपने क्षेत्र में इस प्रदेश में विकाश के लिए अनवरत रूप से कार्य किया जा रहा है ! जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ब्यावासयिक गतिविधि, पलायन रोकने, जलसंसाधन को उपयोग करने, आपसी सहयोग, बन तीर्थाटन, भाषा-शंश्कृति आदि महत्वपूर्ण विषयों के उन्नयन हेतु सम्बंधित क्षेत्र के विद्वान प्रयासरत हैं ! नवनिर्मित प्रदेश के विकाश की बिभिन्न विधाओं को आगे बढ़ते हुए हम उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा में विषय पर भी सम्बैचारिक बुद्धिजीवी जुड़कर कार्य करे तो उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा का मार्ग सुगम हो सकता है ! इसके लिए सर्बप्रथम प्रबासी उत्तराखंडियों द्वारा इस विषय पर कार्य करने के लिए एक कार्य योजना को मूर्त रूप दिया जाना अति आवश्यक है ! इस प्रकार के कई अन्य विषयों पर प्रवास में कार्यरत कई बुद्धिजिवियों के विचार जानने तथा उन्हें एक समूह के रूप में संगठित कर इस विषय पर कार्य करने की योजना का बनना वर्तमान की आवश्यकता हैं !

          क्या उत्तराखंड प्रदेश की कोई प्रादेशिक भाषा ? आज यह उत्तरखंड प्रदेश की भाषा के सम्बन्ध में एक ज्वलंत प्रश्न बना हुआ हैं ! उत्तरखंड प्रदेश जो मुख्य दो भागों को मिलकर निर्मित हुआ है,  उत्तरखंड के गढ़वाल कुमाओं यह दो भाग पोरानिक काल से एक भाग में स्थापित होने के बावजूद भी इनमे प्रथकता रही है,  इन दोनों क्षेत्रों के तीज त्यौहार, ब्याह शादी, खान पान रीति रिवाज, आदि अम्मुमन में एकरूपता है,  यहाँ की बोली गढ़वाल में गढ़वाली तथा कुमाओं में कुमोनी लाखों लोगों द्वारा निरंतर बोली जाती है ! इन दोनों बोलियों के स्तानीय ध्वनियों में मामूली अंतर है ! इन बोलियों को भाषा मानते हुए कई विद्वानों ने अथक मेहनत कर इनमे साहित्य सर्जन कर प्रकाशित भी किया है तथा कई लेखकों की रचनाएँ पाण्डुलिपि के रूप में सुरक्षित रहते हुए पुस्तक का रूप धारण करने के लिए किसी प्रकाशक व वित्तीय सहायता करने वाली वित्तीय संस्थाओं द्वारा अनदेखा करने से लंबित पड़ी हैं ! उत्तराखंड की दोनों भाषाओँ में जो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं वह अपनी एक अहम् समस्या से गजर रही हैं! यहाँ यही एकमात्र ऐसा साहित्य है जो अपने लिए समुचित पाठक नहीं जुटा पा रहा है ! यहाँ के भाषा विद्वानों ने यहाँ की भाषा भाषा बहुत कुछ लिखा है, यहाँ की विकट परिस्तिथियों को दर्शाते हुए कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,  परन्तु जब वह पुस्तक बाज़ार में पाठकों तक पहुँचती है तो अन्य भाषाओँ की पुस्तकों की अपेक्षा उत्तराखंडी भाषा की पुस्तकें अपने लिए पाठक नहीं जुटा पाती ! अन्य भाषाओँ की पुस्तकों की अपेक्षा इनकी मांग न के बराबर होती है यह पुस्तकें केवल उत्तराखंड की भाषा पर काम करने वाले समाज सेवकों या भाषा के शोधार्थियों तक ही सहिमत कर रह जाती है ! कुछ लोगों द्वारा इन पुस्तकों को उलट पुलट कर अवश्य देखा जाता है, परन्तु वे खरीदने की जगह पर कम्प्लीमेंत्री की चाहत रखते हैं ! इस स्तिथि को देखेते हुए भाषा सम्बन्धी कुछ विद्वानों के मन में अपनी भाषा में प्रति, भाषा को बोलनेवालों के प्रति कई बिचार अवश्य उत्पन्न होंगे, इसमें अतिशयोक्ति नहीं ! यहाँ प्रश्न उठता है की जिस बोली को लाखों लोगों द्वारा अपने आपसी वार्तालाप या संबाद का माध्यम बनाया जा रहा है उसी भाषा या बोली में कोई पुस्तक प्रकाशित होकर बाज़ार में आती है तो गढ़वाली कुमोनी भाषा बोलने वाले अपनी भाषा में छपी हुई पुस्तक को खरीदने में रूचि क्यों नहीं रखते ! उत्तराखंड की भाषा के सम्बन्ध में यह मुख्य और विचारणीय प्रश्न है !  उत्तराखंड की भाषा के पक्ष में यह एक और गंबीर विषय है ! इस विषय पर हेमवती नंदन गढ़वाल विश्व विद्यालय द्वारा शोध संपन्न हो चुका है ! जिसमे कई बिन्दुओं के साथ साथ यह विन्दु भी स्पस्ट हो चूका है की उत्तराखंड की भाषा को संबाद की भाषा में साथ-साथ संपर्क भाषा के रूप में नहीं अपनाया गया ! जिस कारण उत्तराखंड की भाषा के साहित्य के साथ आज यह स्तिथि पैदा हो रही है ! उत्तराखंड की भाषा के सम्बन्ध में एक अन्य विन्दु यह भी है की यहाँ की भाषा को रचनाकारों ने देवनागरी लिपि के माध्यम से लिखा है, देवनागरी लिपि में यहाँ की स्थानीय ध्वनियों को स्पस्ट करने के लिए अक्षर नहीं हैं ! स्थानीय ध्वनि अक्षरों के अभाव से देवनागरी में लिखी जाने वाली गढ़वाली कुमोनी स्पस्ट नहीं होती, भाषा में कई स्थानों पर ध्वनि सम्बन्धी त्रुटियां रहा जाती हैं ! रचनाकार अपने विचारों को जिन स्थानीय ध्वनियों के साथ दर्शाना चाहता है पहले तो वह उन्हें नहीं दर्शा सकता, यदि किसी अन्य समानार्थक शब्द का प्रयोग करता है तो उस से स्थानीय ध्वनि स्पस्ट नहीं होती ! फल्श्वरूप कहीं न कही भाषा के लिखित रूप में कमी रहा जाती है ! रचनाकार कुछ लिखता है और पाठक कुछ अलग ही समझता है ! यह सबकुछ उत्तराखंड की स्तानीय भाषा के ध्वनि अक्षरों के अभाव में हो रहा है ! यदि इस ढर्रे में पूरी पुस्तक प्रकाशित होती है तो उसमे इस प्रकार की हजारों कमियां रहा जाती हैं ! जिन कमियों के कारन पाठक को इन पुस्तकों को पढ़ने में असुविधा होती है ! यही कारन हैं की उत्तराखंड की दोनों भाषाओँ में छपी पुस्तकों के प्रति खुद उत्तराखंडियों का रुझान कम है !  शोध में उत्तराखंड की गढ़वाली कुमौनी भाषा की कई खामियों को दर्शाते हुए उनका समाधान के लिए सकारात्मक परिणाम स्पस्ट हुए हैं ! जिसमे मुख्य रूप से यहाँ की स्थानीय भाषा लिखने के लिए देवनागरी लिपि में स्तानीय ध्वनियों को दरसाने वाले अक्षरों का न होना पाया गया ! शोध ने स्पस्ट किया की उत्तराखंड की भाषा के स्तानीय ध्वनि सूचक ही निसंदेह उत्तराखंड की भाषा के मूलाक्षर हैं ! जिनका देवनागरी लिपि के साथ जुड़ने से ही भाषा सम्बन्धी दुरुहता तो पूरा किया जा सकता है ! उसके उपरांत ही उत्तराखंड की भाषा को संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया जा सकता है ! 

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Dr. B L Jalandhari

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उत्तराखंडी भाषा में कबी सम्मलेन और सम्मान समारोह
उत्तराखंड के प्रशिद्ध कबी एबम गायक श्री नरेंदर सिंह नेगी तथा हीरा सिंह राणा के अतिरिक्त उत्तराखंड के मूर्धन्य एबम बयोब्रध कबियौं का नॉएडा में परर्पण हो रहा है ! यह कार्य क्रम उत्तराखंड की गर्हवाली कुमौनी भाषा पर कार्यरत पाक्षिक समाचार पत्र देवभूमि की पुकार के पन्द्रह वर्ष में पदार्पण करने के उप्लाक्स में तथा उत्तराखंड की स्तानीय भाषा की ध्वनियौं की पहचान कर उन्हें गौं आखर नाम देने वाले सर्जक डॉक्टर बिहारी लाल जलंधरी के साथ देवभूमि परिवार द्वारा आयोजित किया गया ! इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण भारत से जो कबी आमंत्रित किये गए हैं उनमे श्री नरेंदर सिंह नेगी, हीरा सिंह राणा, श्री प्रेमलाल भट्ट, शेर सिंह बिस्त, गिरीश तिवारी, डॉक्टर दीवा भट्ट, श्री लोकेश नवानी, श्री गणेश कुग्शल गाणी, श्री जगदीश जोशी, श्रीमती वीणा कंडारी, श्री बलवंत सिंह, श्री गिरीश सुन्द्रियाल, श्री हेमंत बिस्त, श्री जयपाल सिंह रावत, श्री दिनेश ध्यानी, श्री पूर्णं चाँद कांडपाल हैं ! यह कार्य क्रम नॉएडा औथोरिर्टी सेक्टर  ६ स्तिथ इन्दिरागंदी इनडोर ऑडिटोरियम में दिनक ५ जुलाई २००९ को संय ३.३० बजे से आरम्भा होगा !
          इस आयोजन में डेल्ही एन सी आर में जहाने वाले उत्तराखंड समाज के मुख्या समाज सेवी तथ दिली अन सी आर की उन सबी संथाओं के आमंत्रित किया गया है, जो उत्तराखंड समाज के सामाजित सरोकारों, संस्कृतिक मान्यताओं तथा यहाँ के भाषा में अधिक से अधिक संप्रेषण कर रहे हैं,  ! यह एक बर्हद कबी सम्मलेन और सम्मान समारोह है, जिसमे कबी समाजसेवी और समाज के लिए कार्यरत संस्थाएँ सम्मानित की जा रही हैं ! इस कार्य क्रम के मुख्य अतिथि श्री उपेंदर दत्त पोखरिया मुख्या सलाहकार सबका प्रयास सोसाइटी, विशिष्ट अतिथि श्री देवेंदर शाह मुखिया ज्योतिदार्शनी ज्योलार्स, तथा श्री महेश चन्द्र संयुक्त महानिदेशक विदेश ब्यापार, डॉक्टर गी सी वैष्णव प्रबंध निदेशक फोर्टीस हॉस्पिटल उपस्तिथ हो रहे हैं !
          इस कार्यक्रम में दिल्ली अन सी आर की हो संथाएं सम्मानित की जा रही हैं उनमे श्री मनमोहन दुद्पुरी महासचिव अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा, पंडित महिमानंद दुविवेदी अध्यक्ष उत्तराँचल परिवार, श्री शम्भू प्रशाद पोखरियाल अध्यक्ष स्मरण हम भूल न जायं उनको, श्री राधेश्याम खली अध्यक्ष उत्तराखंड आध्यात्मिक सांस्कृतिक संस्था, कर्नल पी दी डिमरी अध्यक्ष उत्तरायनी, कर्नल वी एस बिस्त अध्यक्ष उत्तराखंड क्लब नॉएडा, मनमोहन बुदाकोती अध्यक्ष गढ़वाल हितैषिणी सभा, श्री  सतेंदर पर्याशी अध्यक्ष उत्तराखंड मानव कल्याण समिति, श्री राजेंदर चौहान अध्यक्ष पर्वतीय सांस्कृतिक मंच,  श्री जगदीश नेगी अध्यक्ष उत्तराखन जनमोर्चा, श्री उदै राम धोंदियल अध्यक्ष उत्तराखंड राज्य लोक मंच, श्री हरिपाल सिंह रावत अध्यक्ष उत्तराखंड महासभा, श्री मनोरथ निराला अध्यक्ष हरियाली खुश हाली, श्री चंदर दत्त जोशी अध्यक्ष उत्तराँचल महासभा हरियाणा, श्री विजय सिंह रावत अश्यक्ष गढ़वाल सभा गुड गों, श्रीमती सरोज नेगी अध्यक्ष उत्तराखंड सांस्कतिक मंच, श्री शूरवीर सिंह गुसाईं महासचिव बुरांश उतशाह विकाश संस्थ, श्री नंदन सिंग वोहरा महासचिव कुमाओं भरतरी मंडल पालम, श्री सुभाष पोखरियाल सयोजत पूरी गढ़वाल ग्रुप, Creative Uttarakhnd, Merapahd.com Team - एम् एस मेहता  सयोजक क्रियेटिव उत्तराखंड, श्री लक्ष्मण सिंह रोथान संरक्षक उत्तराखंड एकता मंच बदरपुर, श्री बची सिंह रावत महासचिव  खाटली  विकाश समिति, श्रीमती कमला रावत अध्यक्ष गंगोत्री सामाजित संस्था, श्री गंबीर सिंह नेगी अध्यक्ष टिहरी उत्तरकाशी जन्विकाश परिषद् हैं ! जिन  समाज सेवकों को इस आयोजन में सम्मानित किया जाना है,  उनमे श्री अनिल चंदर जोशी, श्री दलबीर सिंह रावत, श्री आर आर एस बागरी,  श्री  अनिल गुसाईं, श्री योगेंदर ममगाईं, श्री पीताम्बर पन्त, श्री भूपाल सिंह भंडारी, श्री एम् एल ध्यानी, श्री विनोद नोतियल, श्री के एन भट्ट, श्री बी दी रतुरी, श्री कैलाश नोतियल, श्री सुरेंदर सिंह रावत, श्रीमती कमला जालंधरी, श्री अनिल उनियाल आदि को सम्मानित किया जा रहा है ! [/b] [/color]

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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A great step to survive the culture of Uttarakhnd.

Meraphd.com (Creative Uttarakhnd) is grateful for the kind invitation and award.

We are really thankful to Dr Jalandhari and the Dev Bhoomi Organization appreciating our efforts.

                                       उत्तराखंडी भाषा में कबी सम्मलेन और सम्मान समारोह

          उत्तराखंड के प्रशिद्ध कबी एबम गायक श्री नरेंदर सिंह नेगी तथा हीरा सिंह राणा के अतिरिक्त उत्तराखंड के मूर्धन्य एबम बयोब्रध कबियौं का नॉएडा में परर्पण हो रहा है ! यह कार्य क्रम उत्तराखंड की गर्हवाली कुमौनी भाषा पर कार्यरत पाक्षिक समाचार पत्र देवभूमि की पुकार के पन्द्रह वर्ष में पदार्पण करने के उप्लाक्स में तथा उत्तराखंड की स्तानीय भाषा की ध्वनियौं की पहचान कर उन्हें गौं आखर नाम देने वाले सर्जक डॉक्टर बिहारी लाल जलंधरी के साथ देवभूमि परिवार द्वारा आयोजित किया गया ! इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण भारत से जो कबी आमंत्रित किये गए हैं उनमे

 1. श्री नरेंदर सिंह नेगी,
 2. हीरा सिंह राणा,
 3. श्री प्रेमलाल भट्ट,
 4. शेर सिंह बिस्त,
 5. गिरीश तिवारी,
 6. डॉक्टर दीवा भट्ट,
 7. श्री लोकेश नवानी,
 8. श्री गणेश कुग्शल गाणी,
 9. श्री जगदीश जोशी,
 10. श्रीमती वीणा कंडारी,
 11. श्री बलवंत सिंह,
 12. श्री गिरीश सुन्द्रियाल,
  13 श्री हेमंत बिस्त,
  14. श्री जयपाल सिंह रावत,
   15 श्री दिनेश ध्यानी,
    1 श्री पूर्णं चाँद कांडपाल हैं !

यह कार्य क्रम नॉएडा औथोरिर्टी सेक्टर  ६ स्तिथ इन्दिरागंदी इनडोर ऑडिटोरियम में दिनक ५ जुलाई २००९ को संय ३.३० बजे से आरम्भा होगा !
          इस आयोजन में डेल्ही एन सी आर में जहाने वाले उत्तराखंड समाज के मुख्या समाज सेवी तथ दिली अन सी आर की उन सबी संथाओं के आमंत्रित किया गया है, जो उत्तराखंड समाज के सामाजित सरोकारों, संस्कृतिक मान्यताओं तथा यहाँ के भाषा में अधिक से अधिक संप्रेषण कर रहे हैं,  ! यह एक बर्हद कबी सम्मलेन और सम्मान समारोह है, जिसमे कबी समाजसेवी और समाज के लिए कार्यरत संस्थाएँ सम्मानित की जा रही हैं ! इस कार्य क्रम के मुख्य अतिथि श्री उपेंदर दत्त पोखरिया मुख्या सलाहकार सबका प्रयास सोसाइटी, विशिष्ट अतिथि श्री देवेंदर शाह मुखिया ज्योतिदार्शनी ज्योलार्स, तथा श्री महेश चन्द्र संयुक्त महानिदेशक विदेश ब्यापार, डॉक्टर गी सी वैष्णव प्रबंध निदेशक फोर्टीस हॉस्पिटल उपस्तिथ हो रहे हैं !
          इस कार्यक्रम में दिल्ली अन सी आर की हो संथाएं सम्मानित की जा रही हैं उनमे श्री मनमोहन दुद्पुरी महासचिव अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा, पंडित महिमानंद दुविवेदी अध्यक्ष उत्तराँचल परिवार, श्री शम्भू प्रशाद पोखरियाल अध्यक्ष स्मरण हम भूल न जायं उनको, श्री राधेश्याम खली अध्यक्ष उत्तराखंड आध्यात्मिक सांस्कृतिक संस्था, कर्नल पी दी डिमरी अध्यक्ष उत्तरायनी, कर्नल वी एस बिस्त अध्यक्ष उत्तराखंड क्लब नॉएडा, मनमोहन बुदाकोती अध्यक्ष गढ़वाल हितैषिणी सभा, श्री  सतेंदर पर्याशी अध्यक्ष उत्तराखंड मानव कल्याण समिति, श्री राजेंदर चौहान अध्यक्ष पर्वतीय सांस्कृतिक मंच,  श्री जगदीश नेगी अध्यक्ष उत्तराखन जनमोर्चा, श्री उदै राम धोंदियल अध्यक्ष उत्तराखंड राज्य लोक मंच, श्री हरिपाल सिंह रावत अध्यक्ष उत्तराखंड महासभा, श्री मनोरथ निराला अध्यक्ष हरियाली खुश हाली, श्री चंदर दत्त जोशी अध्यक्ष उत्तराँचल महासभा हरियाणा, श्री विजय सिंह रावत अश्यक्ष गढ़वाल सभा गुड गों, श्रीमती सरोज नेगी अध्यक्ष उत्तराखंड सांस्कतिक मंच, श्री शूरवीर सिंह गुसाईं महासचिव बुरांश उतशाह विकाश संस्थ, श्री नंदन सिंग वोहरा महासचिव कुमाओं भरतरी मंडल पालम, श्री सुभाष पोखरियाल सयोजत पूरी गढ़वाल ग्रुप, श्री ए एस मेहरा सयोजक क्रियेटिव उत्तराखंड, श्री लक्ष्मण सिंह रोथान संरक्षक उत्तराखंड एकता मंच बदरपुर, श्री बची सिंह रावत महासचिव  खाटली  विकाश समिति, श्रीमती कमला रावत अध्यक्ष गंगोत्री सामाजित संस्था, श्री गंबीर सिंह नेगी अध्यक्ष टिहरी उत्तरकाशी जन्विकाश परिषद् हैं ! जिन  समाज सेवकों को इस आयोजन में सम्मानित किया जाना है,  उनमे श्री अनिल चंदर जोशी, श्री दलबीर सिंह रावत, श्री आर आर एस बागरी,  श्री  अनिल गुसाईं, श्री योगेंदर ममगाईं, श्री पीताम्बर पन्त, श्री भूपाल सिंह भंडारी, श्री एम् एल ध्यानी, श्री विनोद नोतियल, श्री के एन भट्ट, श्री बी दी रतुरी, श्री कैलाश नोतियल, श्री सुरेंदर सिंह रावत, श्रीमती कमला जालंधरी, श्री अनिल उनियाल आदि को सम्मानित किया जा रहा है !

Dr. B L Jalandhari

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                                      उत्तराखंडी भाषा में विराट कवि सम्मलेन और सम्मान समारोह

         नॉएडा : उत्तराखंड के प्रसिद्ध कवि एबम गायक श्री नरेंदर सिंह नेगी और श्री हीरा सिंह राणा के अतिरिक्त उत्तराखंड के मूर्धन्य एबम बयोब्रध कबियों का नॉएडा के इंदिरागांधी इनडोर ऑडिटोरियम में सम्मलेन किया गया ! यह सम्मलेन उत्तराखंड की भाषा पर पिछले पंद्रह वर्षों से कार्यरत पाक्षिक समाचार पत्र देवभूमि की पुकार के पन्द्रहवां बर्ष में पदार्पण करने के उपलक्ष में तथा उत्तराखंड की स्थानीय भाषा की ध्वनियों की पहचान कर उनको गउ आखर नाम देने वाले सृजक डॉक्टर बिहारीलाल जलंधरी के साथ देवभूमि परिवार द्वारा आयोजित किया गया ! इस कार्य क्रम में सम्पूर्ण भारत से उत्तराखंडी भाषा के कवि आमंत्रित किये गए जिनमे श्री नरेंदर सिंह रावत, श्री हीरा सिंह राणा, श्री प्रेमलाल भट्ट, डॉक्टर दीबा भट्ट, श्रीमती नीता कुकरेती, श्री गणेश कुग्शाल गाणी, श्री जगदीश जोशी, श्रीमती बीना कंडारी,  श्री बलवंत सिंह रावत कविराज, श्री गिरीश सुन्द्रियाल, श्री हेमंत बिष्ट, श्री जयपाल सिंह रावत, श्री दिनेश ध्यानी, श्री पूरनचंद कांडपाल, तथ श्री बृजमोहन वेद्वाल उपस्तिथ हुए ! यह कार्यक्रम नॉएडा अथॉरिटी सेक्टर ६ स्तिथ इंदिरागांधी इंदौर ऑडिटोरियम में दिनांक ५ जुलाई २००९ को सयम 4 बजे से आरंभ किया गया !
          इस आयोजन में  दिल्ली एन सी आर में रहने वाले उत्तराखंड समाज  के मुख्य समाज सेवी तथा दिल्ली एन सी आर के अर्न्तगत आने वाली उन सभी संस्थौं को आमंत्रित किया गया जो उत्तराखंड समाज के सामाजिक सरोकारों, सांस्कृतिक मन्यातौं तथा अपने कार्यक्रमों के अवसर पर अपने मंच से अपनी भाषा में अधिक से अधिक संप्रेषण कर रहे हैं तथा लगातार अपनी भाषा को बढावा दे रहे हैं ! उनमे से कुछ मुख्य संस्थाओं को सम्मानित किया जाना है !   यह एक बृहद कवि सम्मलेन और सम्मान समारोह है जिसमे कवि,  समाज सेवी तथा समाज के लिए कार्यरत संथाएं  सम्मानित की गई ! इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री उपेंदर पोखरियाल मुख्य सलाहकार सबका प्रयास सोसाइटी नॉएडा, विशिष्ट अतिथि श्री देवेंदर शाह ज्योति दर्शनी ज्योलेर्स नई दिल्ली, श्री महेश चन्द्र संयुक्त महानिदेशक बिदेश ब्यापार तथा डॉक्टर जी सी वैष्णव प्रबंध निदेशक फोर्टीस हॉस्पिटल नॉएडा, उपस्तिथ हुए ! समारोह में सबसे पहले मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि ने दीप प्रज्वलित किया उसके उपरांत सरस्वती बंदना उत्तराखंड के लोक संगीत मंगल गीत आधार पर की गई !  सरवती बंदना को स्वर दिया कल्पना चौहान ने तथा संगीत राजेंदर चौहान द्वारा समर्पित किया गया ! उसके उपरांत डॉक्टर बिहारीलाल जलंधरी ने मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथियों का बुके भेंट कर व फूल माला पहनाकर किया !  मुख्य अतिथि श्री उपेंदर पोखरियाल ने कबियों का स्वागत उत्तराखंड की सांस्कृतिक पद्धति को आधार मानकर माथे पर कुमकुम और चावल का टीका लगाकर किया और देवभूमि परिवार के सदस्यों ने कबियों को पुष्प माला पहनाकर यथा स्थान बिठाया ! कवि सम्मलेन संपन होने के उपरांत मुख्य अतिथि श्री पोखरियाल ने टीका लगाया विशिष अतिथि श्री देवेंदर शाह ने स्मृति चिन्ह भेंट किया तथा देवभूमि के प्रधान संपादक डॉ. बिहारीलाल जलंधरी ने आदर स्वरुप टीका की रस्म पूरी करते हुए भेंट देते हुए उन्हें स सम्मान विदा किया !
          इस कार्यक्रम में दिल्ली एन सी आर की जो संस्थाए सम्मानित करने के लिए चुनी गई उनमे अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा लखनऊ सम्पूर्ण भारत, नॉएडा से  स्मरण हम भूल न जाएं उनको संस्था, उत्तराखंड आध्यात्मित सांस्कृतिक संस्था, उत्तराखंड क्लब, पर्वतीय सांस्कृतिक मंच, क्रियेटिव उत्तराखंड, दिल्ली से उत्तराँचल परिवार, उत्तरायनी, गढ़वाल हितैशिनी सभा, उत्तराखंड मानव कल्याण समिति नारोजी नगर, उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच संगम विहार, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संगठनों में उत्तराखंड राज्य लोक मंच, उत्तराखंड जनमोर्चा, उत्तराखंड महासभा, बुरांश उत्साह संस्था सरिता विहार, कुमाओं भ्रात्र मंडल पालम, पोडी गढ़वाल़ ग्रुप, उत्तराखंड एकता मंच बदरपुर, खातली विकाश समिति किदवई नगर, गंगोत्री सामाजिक संस्था, टिहरी उत्तरकाशी विकाश संगठन, गाजिअबाद से हरियाली खुशहाली संस्था, हरियाणा से उत्तराँचल महासभा, गढ़वाल सभा गुडगाँव हैं ! देवभूमि की पुकार के इस कार्यक्रम में दिल्ली एन सी आर की जिन संस्थाओं को उनके पदाधिकारियों के माध्यम से सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया उनमे श्री मनमोहन दुद्पुदी, पंडित महिमा नन्द द्विवेदी, श्री शम्भू प्रसाद पोखरियाल, श्री राधेश्याम खाली, कर्नल पी दी डिमरी, कर्नल वी एस विष्ट, श्री मनमोहन बुदाकोती, श्री सतेंदर प्रयासी, श्री राजेंदर चौहान, श्री जगदीश नेगी, श्री उदीय धोंदियाल, श्री हरिपाल रावत, श्री मनोरथ निराला, श्री चंदर दत्त जोशी, श्री विजय सिंह रावत, श्रीमती सरोज नेगी, श्री शुर्बीर सिंह गुसाईं, श्री नंदन सिंह बोहरा, श्री शुभाष पोखरियाल, श्री एम् एस मेहता, श्री लक्ष्मण सिंह रोथान, श्री बची सिंह रावत, श्रीमती कमला रावत, श्री गंभीर सिंह नेगी आदि थे ! इन पदाधिकारियों को स्मृति चिन्ह भेंट किये गए ! इसके साथ साथ उत्तराखंड के कुछ मुख्य समाज सेवकों को इस विराट आयोजन में सम्मानित किया गया ! जिनमे श्री अनिल चंदर जोशी, श्री दलबीर सिंह रावत, श्री आर आर एस बगरी, श्री अनिल गुसाईं, श्री योगेन्द्र माम्गाइन, श्री पीताम्बर पन्त, श्री भूपाल सिंह भंडारी, श्री नरेंदर कला, श्री ए एस मेहरा, श्री एम् एल ध्यानी, श्री विनोद नौटियाल, श्री के एन भट्ट, श्री बी दी रत्युरी, श्री कैलाश नौटियाल, श्री सुरेंदर सिंह रावत, श्रीमती कमला जालंधरी, श्रीमती निर्मल नौटियाल, श्रीमती आनंदी नौटियाल तथा श्री अनिल उनियाल, आदि थे !
          इस कर्यक्रम में दूनागिरी माता ने उपस्थित  होकर कार्यक्रम की शोभा बधाई ! श्री शम्भू प्रशाद पोखरियाल और श्री अनिल चन्द्र जोशी माता को मंच तक लाये तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री उपेंदर पोखरियाल की धर्मपत्नी श्रीमती जय पोखरियाल ने दूनागिरी माता को माला पहनाकर स्वागत किया ! कवि सम्मलेन में उपस्तिथ कबियौं ने उत्तराखंड समाज की वर्तमान वास्तविक स्तिथि का उल्लेख किया वही कबिता के साथ साथ श्री हीरा सिंह राणा व नरेंदर सिंह नेगी को उपस्तिथ जनसमूह ने कबिता को गे रूप में प्रस्तुत करने को कहा ! श्री राणा जब अपना कबिता पाठ कर अपनी जगह बैठ चुके थे तो दर्शकों ने उनको अपनी जगह से उठने के लिए मजबूर कर दिया ! डॉ. दीबा भट्ट ने पहाड़ की नारी की स्तिथि की ब्याख्या कर सबी दर्शकों को भाव बिभोर कर दिया ! जगदीश जोशी ने "म्योर मोहनी घर एइग्यो" पढ़ी तो पूरा बातावरण संत हो गया ! पूरण चाँद कांडपाल ने "राजधानि  गैरसैन निगे" की खूब सराहना हुई ! कार्यक्रम जहाँ रात्रि आठ बजे संपन होना था वही कार्यक्रम रात्रि दश बजे समाप्त हुआ ! यह देखा गया की उत्तराखंडी भाषा कवि सम्मलेन में गढ़वाल व कुमाओं से अधिसंख्यक  लोग थे ! दिल्ली से दूर नॉएडा में होने वाले इस कार्यक्रम को देखने के लिए दूर दराज से दर्शक पहुंचे थे ! जैसे पालम, सागरपुर, नजफगढ़, संतनगर बुरारी, रोहिणी, नंदनगरी, साहिबाबाद, गाजियाबाद, हरियाणा, उत्तम नगर, संगम विहार, बदरपुर, आर के पुरम, सरोजनी  नगर, नारोजी नगर, पंचकुइया रोड, इन्दिरापुरम, द्वारका, डेल्ही कांत,  खोर, दिलसाद गर्दन, विनोद नगर, लक्ष्मी नगर, होस्क्हस, महरौली, आदि स्थानों से पहुंचे थे ! इस कार्यक्रम में यह देखने में आया की उत्तराखंडी समाज में अपनी भाषा और संकृति के प्रति काफी रुझान है !
          कार्यक्रम के मंच सञ्चालन में देब्भूमि के प्रधान सम्पदक और गउ आखरों के सृजक डॉक्टर बिहारीलाल जलंधरी श्री ब्रज मोहन वेद्वाल व श्री कैलाश नौटियाल तथा कवि सम्मलेन का सञ्चालन गढ़वाल से श्री दिनेश ध्यानी और कुमाओं से श्री हेमंत विष्ट ने किया !

dinesh dhyani

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जलन्धरी जी आपके लेख पढ़े भाषा संबधी और हंस सत्संग की महिमा भी सुनी। पहले भाषा के संबध में आपसे अनुरोध है कि आप जरा यह स्पष्ट भी करें कि गढ़वाली और कुमाॅंउनी बोलियों को एक साथ मिलाकर संयुक्त भाषा बन सकती है? अगर हाॅं तो कैसे? और अगर नही तो क्यों नही? भाषा एक विस्तृत विषय है और उसके हर पहलू पर विचार किया जाना चाहिए। स्थानीय बोली और उसके भाषा में निरूपण किया जाना चाहिए। इसके लिए हमारे पास लिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में है और आगे भी नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए इस दिशा में भी सटीक सोच लाजमी है।
अब आपने जो ये बीच में सत्संग के बहाने किसी गुरू की महिमा का गान किया है इसका इस सन्दर्भ में क्या औचित्य है? कृपया इसे स्पष्ट करेंगे तो अच्छा लगेगा।
आज जैसा मनीसी और विद्वान व्यक्ति अगर इस तरह से गुरूओं की महिमा और गान करने लगेगें तो फिर हम आम आदमी से क्या आशा कर सकते हैं। हमारे लिए सभी गुरू हैं। जो हमें शिक्षा दे जो हमें अच्छा मार्ग दिखायें वो सब बन्दनीय हैं। लेकिन किसी खास गुरू या सत्संग के बारें में कहना जरा अटपटा ही नही लीक से हटकर है जो कि अच्छा नही लगता है।
आशा है अन्यथा नही लेंगे।
सादर,
आपका  मित्र
दिनेश ध्यानी


Dr. B L Jalandhari

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गढ़वाली-कुमाउनी-उत्तराखंड की बोली क्या लुप्त हो जायेगी ?

माननीय,

गढ़वाली-कुमाउनी बोली बोलने वाले क्या इस बात को स्वीकार कर सकते है ? परन्तु जिस क्षेत्र के एक प्रदेश के रूप में स्थापित हुए नौ वर्ष ब्यातित होने जा रहे हैं !  उस प्रदेश की सरकार के नुमाइंदों ने प्रदेश की भाषा के विषय में कोई बहस छेड़ने की आवश्यकता नहीं समझी ! इस सम्बन्ध में पिछले पंद्रह वर्षों से गढ़वाली-कुमाउनी के समंजश्य पर कार्य रत डॉक्टर जलंधरी गढ़वाली-कुमाउनी के सयुक्त अध्ययन के लिए सरकार से एक अलग बिभाग की मांग की हैं ! उनका कहना है की जबतक उत्तराखंड की बोलियों को लिलिबद्द करने वाली देवनागरी लिपि में  उत्तराखंड की स्थानीय भाषा की ध्वनियां चिन्ह के रूप में नहीं जुड़ती तबतक गढ़वाली-कुमाउनी किसी भी दशा में शुद्ध नहीं लिखी जा सकती ! हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्व विद्यालय से संपन्न शोध *गढ़वाली-कुमाउनी बोली का तुलनात्मक भाषा विज्ञानिक अध्ययन*  से गढ़वाली-कुमाउनी भाषा के स्थानीय ध्वनियों की पहचान कर ली गई है ! जिन्हें उनके रचनाकार ने *गऊं आखर* नाम दिया है ! यह आखर गढ़वाली-कुमाउनी में सामान रूप से मिलते हैं ! इन आखरों के देवनागरी के साथ जुड़ने से देवनागरी उत्तराखंड की दोनों बोलियों को लिपिबद्ध करने के लिए परिपूर्ण हो जायेगी ! इसके साथ डॉक्टर जलंधरी दोनों बोलियों के शब्दों का समंजश्य करने के लिए प्रयाश्रत हैं ! क्या उनकी उत्तराखंड सरकार से गढ़वाली-कुमाउनी के अध्ययन के लिए अलग *उत्तराखंड भाषा परिषद्* की मांग उचित है ?

यह एक बहस का विषय है ! इस बहस में उत्तराखंड के वाशी प्रवाशी को आमंत्रित किया जाता है !

धन्यवाद

आपका

बी.जलंधरी

Dr. B L Jalandhari

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प्रिय ध्यानी जी

धन्यवाद आपने मुझ जैसे अदने से आदमी को देखा ! आपके अलावा अन्य कई दोस्तों ने महिमा मंडन के विषय में लिखा व अपनी प्रतिक्रिया दी ! शायद वह भी पैत्रिक बंधकों से पीड़ित हैं ! ऐसा मेरे संज्ञान में आया ! उसे भाषा सम्बन्धी मुख्य बहस से हटा दिया है !
भाषा के सम्बन्ध में एक प्रश्न छोडा है ! आशा करता हूँ की उसके मध्य से उत्तराखंड की भाषा के पक्ष में जनमत बनाने की कोशिस करेंगे !
गढ़वाली कुमाउनी का समंज्श्य के लिए समय जरूर लगेगा परन्तु किसी को तो शुरूआत करनी है ! यदि  यह उत्तराखंडी समाज में बहस का मुद्दा बनता है तो निश्चय ही हमारी समंजश्य पूर्ण भाषा का उदय आप जैसे मनीषियों के प्रयाश से पूर्ण होगा !

एक बार फिर धन्यबाद

आपका

डॉक्टर बिहारीलाल जलंधरी

 

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