Author Topic: Articles By Dr. B. L. Jalandhari - बी. एल. जालंधरी द्वारा लिखे गए लेख  (Read 13805 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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दोस्तों,

          हम आज आप से परिचय करा रहे है येसे व्यक्तित्व से जिन्होंने ना केवल उत्तराखंड राज्य के आन्दोलन मे  सन १९८९ से  महत्वपूर्ण भूमिका निभायी बल्कि उत्तराखंड के क्षेत्रीय दोनों भाषाओँ पर शोध किया है वे हैं उत्तराखंड गढ़वाल कुमाऊ दुसांत बीरोंखाल ब्लाक के ग्राम खेतु के निवासी डॉक्टर बिहारी लाल जलंधरी !  डॉक्टर जलंधरी का जन्म २० नवम्बर १९६१ को ग्राम खेतु के ब्राह्मण परिवार में हुआ ! डॉक्टर जलंधरी के पुर्बज गंगोत्री क्षेत्र हर्षिल में हरिजी की शिला में संगम करने वाली जलंधरी नदी की घटी से आकर यहाँ बसे हैं,  ५ वर्ष की उम्र में इनके पिताजी की मृतु हो गई थी इन्हों ने कक्षा ५ तक धोंर खाल तथा कक्षा १० घोरियानाखाल, कक्षा १२ बीरोंखाल, बी.ऐ. दिली विश्व विद्यालय से, स्नातकोत्तर  राजनीती विज्ञानं में  मेरठ विश्व विद्यालय से, स्नातकोत्तर हिन्दी वर्कतुल्लाह विश्व विद्यालय भोपाल, से पास किया !  इनके द्वारा उत्तराखंड की दोनों भाषाओँ के सम्बन्ध में सन १९९६ से कार्य करना आरम्भ किया !  उत्तराखंड की जनता को जागृत करने के लिए एक समाचार पत्र  * देव भूमि की पुकार * पाक्षिक निकलना आरम्भ किया !  इसके प्रधान संपादक रहते हुए आज १४ वर्षों से यह समचार पत्र लगातार उत्तराखंड की भाषा के छेत्र  में अखिल भारतीय स्तर पर समस्त उत्तराखंडियों में जनजाग्रति फेला रहा है !  
          डॉक्टर जलंधरी ने हेमवती नन्दन गढ़वाल विश्व विद्यालय से उत्तराखंड की दोनों भाषाओँ में *गढ़वाली कुमौनी बोली का तुलनात्मक भाषा विज्ञानिक अध्ययन* विषय पर शोध किया ! सफलता पूर्ण शोध करने पर विश्व विद्यालय द्वारा उन्हें पी. एच. डी. की उपाधि से विभूषित किया ! इस शोध के आधार पर उत्तराखंड की भाषा के लिए पाच स्थानीय ध्वनि आखरों की पहिचान की गई ! इन अक्षरों का नाम *गउ आखर* रखा गया है !  इस शोध के आधार पर  दो पुस्तके  प्रकाशनाधीन हैं ! पहली *उत्तराखंड की भाषा के ध्वनि आखर* तथा  दुसरी *गढ़वाली कुमौनी भाषा का तुलनात्मक भाषा वैज्ञानिक अध्ययन*  हैं !
          डॉक्टर जलंधरी कई सामाजिक संगठनो से जुड़े हैं !  सन १९८९ में बी. आर. तमता जी के बोट क्लब पर  प्रथक उत्तराखंड राज्य अन्धोलन का आह्वान के बाद से ही उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के साथ जुड़ गए !  उसके बाद पीछे मुड़ने का नाम नहीं लिया !  उत्तराखंड के गाँधी इन्द्रमणि बडोनी जी के साथ आन्दोलन में लंबे समय तक रहने के कारन उनके आंदोलनकारी छबि की इनके चरित्र पर अनुकूल प्रभाव पड़ा !  यह उत्तराखंड क्रांति दल में कई बार केंद्रीय पदाधिकारी रहे !  उत्तराखंड क्रांति दल में सयोजक पर्वाशी पर्कोष्ठ जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्य करते हुए आप ने उत्तराखंड क्रांति दल की कई प्रदेशों में शाखाएँ गठित की !  
          डॉक्टर जलंधरी जिन सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं उनमे संग्रक्षक-उत्तराखंड भाषा संस्कृति मंच, महासचिव- ग्राम सुधर समिति खेतु दिल्ली, अध्यक्ष-तुगलकाबाद गों सुधर समिति दिल्ली, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष-अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा, प्रदेश मिडिया सचिव-उत्तराखंड मानवअधिकार असोसिएशन, सचिव-हेस्कुस, महासचिव-उत्तरांचल परिवार, सदस्य-उत्तराखंड लोक राज्य मंच, सदस्य-सबका पर्यास सोसाइटी आदि संस्थाओं में कार्यरत हैं !
Dr.B L Jalandhari यहाँ पर उत्तराखंड के विभिन्न विषयों पर अपना लेख इस थ्रेड में लिखिंगे ! उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओ पर उनके द्वारा किया गया कार्य अतुल्य है! Dr. B L Jalandhari  जी इस विषय पर अपना विचार यहाँ पर अपने लेखो मे व्यक्त करेंगे !

          आशा है की आप को डॉक्टर बिहारी लाल जलंधरी जी के लेख पसंद आयंगे और खासतौर से उत्तराखंड के क्षेत्रीय भाषाओ के विकास के लिए उनके द्वारा किए जा रहे प्रयास भी आपको पसंद आयेंगे !

          एम् एस मेहता  

Dr. B L Jalandhari

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भाषा का वास्तबिक रूप ध्वनि स्वर से सुर में निहित [/b]
                                                                                      डॉ. बिहारीलाल जलंधरी,

     हम क्षेत्रीय बोलियो का अध्ययन और उसकी पारस्परिक सम्मानता का तुल्नात्मत अध्ययन कर रहे हैं  किसी विशेष क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली की स्वाभाविक ध्वनियों की विभिन्नता को खोजकर उन पद्धतियों पर बिचार किया गया है जिनके आधार पर क्षेत्रीय बोलिओं की ध्वनियों की कार्यकारिता तथा परभाव व प्रयोग पर बिचार किया जा सके   क्षेत्र में प्रयोग की जनि वाली ध्वनियां ही स्वर के रूप में लय, सुर, सुर्लाहर, आरोह, अवरोह, बलाघात, आदि के रूप में प्रयोग की जाती हैं. यह सभी उस ध्वनि के गुण हैं जो अपने आप में उस क्षेत्र की पहचान समेटे हैं, ध्वनि के इन गुणों की समस्याओं को छोड़कर अपेक्षाकृत अधिक स्पस्ट अंतरों व उन गुणों पर ध्यान केंद्रित किया जाय तौ उसके उपरांत ही बोलीओं की ध्वनियों में कुछ प्रमुख अंतरों के वर्गीकरण भी किया जा सकेगा,  इससे निष्कर्ष निकला जा सकता है कि कौन सी बोली की कौन सी ध्वनि महत्वपूर्ण है, जिसका प्रयोग उस क्षेत्र में पूर्ण रूप से किया जाता है,
     प्रायः यह देखा गया है कि एक बोली में किसी ध्वनि विशेष पर प्रयोग होता है, जब कि दूसरी बोली में उस ध्वनि का अभाव होता है, इस प्रकार के अन्तर कभी तो ध्वन्यात्मक दृष्ठि से परिभाषित किए जाते हैं, वास्तव में एक ही क्षेत्र के दूसरे भाग में बोली में अनेक अंतरों की भांति यह अपेक्षा बोली की अभिनय प्रक्रिया हो सकती है, शब्द समूहों और अन्य तत्तों की भांति ध्वनियों के सम्बन्ध में बोलियाँ धीरे धीरे विघटित होती रहती हैं, तथा उनमे कुछ नयापन आता रहता है, यद्यपि यह विघटन की मात्रा अपनी चरमसीमा पर धीरे धीरे पहुँचती है, परन्तु बोली में विघटन करने वाले तत्तों को केन्द्रीय करण करने वाले प्रभाव कुछ अन्तराल में इनके विपरीत कार्य करने लगते हैं, बोलियों की यद्यपि असंख्य ध्वनियाँ होती हैं, परन्तु उन सभी ध्वनियों का अन्तर महत्वपूर्ण नहीं मना जाता, एक बोली की प्रणाली उसकी महत्वपूर्ण भेधात्मत ध्वनियों का समूह है जिसमे केवल परिवेशगत विभिन्नताओं को छोड़ दिया जाता है या एक समुदाय में वर्गीकृत कर दिया जाता है,  
     प्रश्न उठता है कि बोली के अध्ययन में ध्वनि प्रणाली की अवधारणा का क्या महत्व है वास्तव में यह विचारनीय है
     महाभाष्यकार ने सर्ब प्रथम ध्वनियों को ही स्वर के रूप में लिया है, उसके उपरांत ही ध्वनियाँ और उसके अंगों का वर्णन किया है, यहाँ मुख्य रूप से उन ध्वनियों के उन स्वरों का विवेचन किया जा रहा है जिनका रसाश्वदन के लिए उन्हें कई नामो, उपनामों से अलंकृत किया गया, जब ध्वनि के स्वरों को वासताबिक स्वर मिल जाते हैं, उस समय उनके रसाश्वदन की अपनी एक अलग ही अंत उध्वग्निता उत्पन कर देते हैं, बोलियों में यह स्वर आज भी विद्यमान हैं, जिनको स्वर के साथ मिलकर एक जड़ को चेतन बनाकर थिरकने के लिए मजबूर कर देते हैं, वर्तमान में हमें उनकी पहचान करना आवश्यक है,
     यहाँ महाभाष्यकार की एक उक्ति का विवेचन करना युक्तियुक्त है, जिसमे बोली की ध्वनियों के स्वरों का विवेचन बड़ी कुशलता से व कुशाग्र बुद्धि से किया गया है,

               स्वयं राज्यते इति स्वरः अन्तग्भवती ब्यन्जन्मिति तथा ब्यंजनानी पुनर्नट भार्यवाद,
               भवती तद्यथा नाटन् स्त्रियों रंगरतान यो य प्रच्छ्ती, कस्यां यूयम यूयमिति,
               ततं तवेत्याहू एवं ब्यन्जनान्यापी यस्य यस्यस्च कार्य मुच्यते ततं भजन्ते,

     अर्थात स्वर अपने आप में राजा है जो ब्यंजन को अपने नियम के आधार पर चलाता है, सामान्य भाषा में कहा जाय की भाषा में ब्यंजनों की दशा उस नारी के समान होती है, उसके अभिनयकाल में जो उससे पूछता है की तुम किसकी हो, वह ख़ुद ही उसे कह देती है में तुम्हारी हूँ, इसी प्रकार भाषा में जो स्वर और उसकी मात्रा जिस ब्यंजन के साथ प्रयुक्त किए जाते हैं, वह ब्यंजन उसी ध्वनि में परिवर्तित हो जाते हैं,
     यहाँ भाषा की ध्वनि तथा उसके स्वर का विवेचन किया जा रहा है, मध्य हिमालयी क्षेत्र उत्तराखंड की भाषा में भी इस शब्द को बहुत राशिक और लजीज के रूप में प्रयोग किया गया है, स्वर शब्द का अपभ्रंश रूप ही सुर है, जब ध्वनि सुर के मध्यम से प्रवर्तित हुई उससे आनंदित समुदाय ने उसे अलंकरण व उपमाएँ देना आरम्भ कर दिया कालांतर में यही सुर शब्द सुरा में परिवर्तित हो गया, किसी अति स्वादिस्ट खाध्य के रस को यहाँ सुरा कहा जाता है, वास्तबिक रूप में यह स्वर का ही उपमान है, जिसने उस क्षेत्र की बोली और उसकी ध्वनियों की रोचकता व मिठास को विलुप्त होनो से रोकने के लिए एक एसा उपमान प्रदान किया जो समाज से जीवन पर्यंत अलग नहीं किया जा सकता, यह भाषा की एक बहुत बड़ी विशेषता है जो कहीं न कहीं अपने निशान छोड़ती रहती है,
     हम वाल्यवस्था से देवनागरी के रंग में रंग कर अपनी बोली के स्वरों को आज तक नहीं पहचान पाए हैं, हमने अपनी भाषा को देवनागरी में प्रयोग कर अवस्य कामचलाऊ बना दिया परन्तु हमारी भाषा बिद्वानों के लिए अवस्य निशान छोड़ती जा रही है, उत्तराखंड की भाषा के ध्वनि अक्षरों की जो खोज हुई है, उन्हें *गों आखरों* का नाम दिया है, यही *गौं आखरों* उत्तराखंड की क्रमशः दोनों गढ़वाली कुमोनी बोलियों के साथ साथ jounsari, रवाई, भोजपुरी, magadhi, avadhi,  maithali, tirhari, vaiswari, bagheli, bundeli, kannoji, आदि बोलियों को देवनागरी लिपि के माध्यम से लिखने में पूर्ण रूप से सक्षम होंगी, देवनागरी के साथ साथ इन *गों आखरों* के जुड़ने से उत्तरी भारत में देवनागरी के माध्यम से लिखी जाने वाली भाषाई त्रुटियों का समाधान हो सकेगा,   [/b] [/color] [/size]

Dr. B L Jalandhari

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बोली में लिखे साहित्य पर संदेह क्यों
                                                                                                 डॉ. बिहारीलाल जलंधरी

          यह देखा गया है की बोली में लिखा गया साहित्य प्रायः संदेह की दृष्ठि से देखा जाता है, यह वास्तविकता से परे नहीं है की किशी भी बोलो में साहित्य लिखने वाले साहित्य कारों को प्रायः परिनिष्ठित भाषा की शिक्षा प्राप्त होती है, और वे स्वयम को उससे अप्रवाहित नहीं रख पाते, यहाँ तक देखा गया है की कभी कभी तो बोली में साहित्यकारों  का चिंतन प्रिनिश्तित भाषा में होता है, और बोली का साहित्यकार उसे बोली की ध्वनि संरचना और वातावरण के अनुसार अनूदित मात्र कर देते हैं, बोली में साहित्य की रचना करने वाले उन साहित्यकारों के शब्द समूह प्रिनिस्थित भाषा से अत्यधिक प्रभावित होता है और उससे बोली का साहित्य रचा जा रहा है उसी के आधार पर उसकी शैली, वाक्य रचना और उनकी अभिब्यक्ति भी होती है,
          यहाँ हम उत्तर भारत के म्ध्यहिमालाई बोली गढ़वाली कुमौनी की बात कर रहे हैं, क्यूँ की इन बोलियों को भाषा के दर्जा आज तक भी नहीं मिल पाया है,  यह जानने योग्य अवश्य है की किसी भी बोली का साहित्यकार अपनी बोली को भाषा के रूप में ही मानकर चलता है परन्तु जब वह साहित्य के रूप में परिणत होने की दिशा की और बढ़ता है तो उसे अन्य द्वारा अस्वीकार करते हुए बोली का साहित्य कह कर किनारे कर दिया जाता है,
          वस्तुता गढ़वाली कुमौनी भाषा के साहित्य स्वरुप के आधार पर हम यह नहीं कह सकते की जनता में प्रस्तावित इन बोलियों का मोलिक स्वरुप किस प्रकार का है,  क्यों की इन बोलियों में प्रभूत साहित्य सर्जन नहीं हुआ जिस प्रकार पोरानिक समय में अवधी और ब्रज में हुई थी,  कहते हैं की बोली यदि समाज के अशिक्षित वर्ग तक ही सिमित रह जाती है तो इससे साहित्य के स्रोत नहीं फूटते हैं, बोली का साहित्य उन्ही क्षेत्रों में प्रकट होता है जहाँ पर उसे सामाजिक सम्मान प्राप्त होता है और शिक्षित वर्ग उस में बोलने के लिए अभ्यस्त होता है,  इसमे जो सहियाकर या लेखक बोलियों से अनभिज्ञ हैं, तथा बोलियों में लिखित साहित्य और उसके साहित्यकार को अपदस्थ समझते हैं, वे प्रायः उनके हया और ब्यंग्य की रचना करने का प्रयत्न करते हैं, किंतु जिस क्षेत्र में बोली अब भी सम्पूर्ण समाज के दैनिक बिचार बिनिमय का माध्यम है और समाज के प्रतेक वर्ग द्वारा बोली जाती है, वहां वह साहित्य के रूप में प्रिपुस्ती होकर किसी भी परिनिस्थ भाषा की समानता कर सकती है, बोलीओं के प्रभूत साहित्य में भाषा के सम्बन्ध में तुलशी दास जी ने अपनी एक कृति में एक स्थान पर कहा है,  *भाषा भनति भोरी मति भोरी, हैन्सिबे जोग हँसे नहीं खोरी* ,
          देखा जाय तो उत्तराखंड में गढ़वाली कुमौनी का पोरानिक साहित्य उपलब्ध ही नहीं है, इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है की तत्कालीन परिस्थिति में यहाँ अशिक्षित समाज था, जिसे बोली को साहित्य के रूप में आवश्यकता ही नहीं पड़ी, जो आज हमारे पास पोरानिक साहित्य के रूप में उपलब्ध हैं वह हैं ताम्र पत्र, कबिता, लोकगीत, मुहावरे, तथा बिभिन्न त्योहारों पर प्रयुक्त होने वाले मंगल गीत, इसके अलावा भी मंत्र शाश्त्रों की रचना भी कुछ हद तट बोलियों में ही हुई, जो आज अप्राप्य मात्र है, देवी देवताओं के आह्वाहन मन्त्र जागर केवल मोलिक रचना ही है, कालांतर में जिन्हें कलामबध करने की आवश्यकता ही नहीं समझी गई, इसी प्रकार विध्याराज और वैधंग भी अपने वारिश को अपनी विद्या मुखाग्र ही सिखाते हैं,
                  गढ़वाल और कुमाओं को देव भूमि अवश्य माना गया है परन्तु पोरानिक कृतियों में यहाँ साहित्य का बसंत कभी नहीं देखा गया,  ना ही यहाँ की सत्ता पर कायम रहनेवाले राजे महाराजाओं ने अपनी पोली को महत्व दिया, जब कभी संदेशों के आदान प्रदान या शिलालेखों के लिखने की बात सामने आई तब तत्तकालीन परिनिस्थित भाषा संस्कृत का प्रयोग किया गया, जिस भाषा से आम जनमानस दूर था, आम जन की बोली को आम जन तक ही सिमटा कर रख दिया, उसे राजकाज स्थर तक कभी प्रयोग नहीं होने दिया, जिस वजह से यहाँ की दोनों बोलियाँ वह स्थान प्राप्त नहीं कर सकी जो सम्मान व स्थान उसे उसके बोलनेवालों से मिलता था.
                  उत्तराखंड में इन दोनों बोलीओं की दशा आज भी ज्यों की त्यों बनी है, पूरब काल में राजा महाराजाओं, सभासदों व मंत्रियों की प्रिया भाषा संस्कृत हुआ करती थी, सभी कार्य संस्कृत में हुआ करते थे आम जन की भाषा को महत्वा नहीं दिया जाता था ठीक उसी प्रकार की स्तिथि आज भी है,  कल के महाराजाओं का स्थान आज के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, व मंत्रियों ने ले लिया है, जिनकी अपनी भाषा आम जन की भाषा को छोड़कर बिदेशी भाषा या रास्त्रियाभाषा है, या इन भाषाओँ की और अधिक झुकाव है, जो बोली हमारी कल थी वही बोली हमारी आज भी है, यदि इन बोलियों को पूरब काल से ही शिक्षित बर्ग प्रयोग करता तो निश्चित ही आज हमारी भी मान्यता प्राप्त भाषा होती, इसकी अपनी एक अलग लिपि होती तथा हमरी भाषा अन्य भाषाओँ की तरह परिनिस्थित भाषा होती,  इसका ब्याकरण भी परिनिस्थित होता परन्तु बर्तमान की कुछ दशाब्दियों में उत्त्रखन में जो साहितिक चेतना का जो उद्भव हुआ है वह अवश्य ही बोली को भाषा की और परिणत करने के लिए पहली सीधी का कार्य है,  उत्तर भारतीय बोलियों में जो अधिकांश देवनागरी लिपि के माध्यम से लिखी जाती हैं,  इन प्रतेक बोली को देवनागरी लिपि में माध्यम से लिखने  में कुछ अधूरापन रह जाता है, चाहे आप गंगा के दोआबा की और जाइये या अवध या बिरज की और, इन सभी बोलियों को देवनागरी लिपि में लिखने पर उनका अपनापन स्थानीय अक्श्रभाव से छिप जाता है, खाश तोर पर उत्तराखंड की गढ़वाली कुमौनी जिसे एक मायने में अन्पधों की भाषा भी कहा जा सकता है, क्योंकि पदेलिखे लोगो ने जिस भाषा के लिए कार्य किया है वह आज अपने विकाश की सीमा तक पहुची है, उत्तराखंड में पूरब कल से इसप्रकार कुछ नहीं हुआ है परन्तु पिछली दो सताब्दियों से सेव्नाग्री के माध्यम से जितना भी साहित्य प्रकाशित हुआ है वह अवश्य ही उत्तराखंड की बोली को भाषा की दिशा की और ले जाने में मददगार साबित होगा यह हमारा मानना है,
                  एक समय एसा अवश् आएगा जब उत्तराखंड की गढ़वाली कुमौनी भाषा साहित्य  को बोली के साहित्य से संदेह हट जाएगा और यह इसका साहित्य अन्य भाषाओँ के साहित्य की तरह परिनिस्थित होकर विद्यार्थियों तक पहुंचेगा, [/color] [/b]

पंकज सिंह महर

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जालंधरी जी,
सादर अभिवादन!
        उत्तराखण्ड की स्थानीय भाषा-बोलियों पर आपका शोध कार्य अतुलनीय है, विलुप्ति की कगार पर लगभग पहुंच चुकी इन भाषा-बोलियों का अवसान आप जैसे मुर्धन्य लोगों के रहते हो ही नहीं सकता, ऎसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
      आगे भी आपके लेखों से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा, ऎसी आशा है।
शुभकामनायें,

Dr. B L Jalandhari

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भाषाई अस्मिता के लिए सोचे उत्तराखंडी समाज
                                                                                                   डॉ. बिहारीलाल जलंधरी  

          किसी जीवंत संस्कृति का आएना भाषा ही होती है, भाषा के बिना कितना भी विकसित माना जाया एक अतिशयोक्ति ही माना जाएगा, संस्कृति की पहचान भाषा के पश्चात ही होती है, जहाँ भी संकृति शब्द का प्रयोग होता किया जाता है, उसके साथ यदि भाषा शब्द उसके अग्रज शब्द के साथ न जोड़ा जाय तो वह हमेशा अपूर्ण रहेगा,
          समाज में केवल संकृति की बात करना फूहड़पन ही कहा जाएगा, क्यूं की संस्कृति की ध्वज्बाहक भाषा ही मानी जाती है,  आज के उत्तराखंडी समाज दो भागों में बांटता नजर आ रहा है, इन दोनों के बिच की दूरी चेतना के अभाव में कम होने की बजाय दिन प्रतिदिन बढती जा रही है, यह दूरी क्यों बढ़ रही है यह हम बखूबी से जानते है, हम इस दूरी को कम करने की हर सम्बभा कोशिश में हैं परन्तु हमें इस प्रकार का सशक्त माध्यम नहीं मिल रहा है, जिसके अंतर्गत हम इस दूरी को पता सके,
           उत्तराखंडी समाज उत्तराखंड के अलावा देश के कोने कोने में अपनी उपस्तिथि दर्ज करने के साथ साथ विदेशों में अपनी कीर्ति फैला रहा है, देश विदेश में बसे उत्तराखंडियों के मन में कही न कही एक डर अवश्य होता है की जिस गढ़वाली कुमौनी को आज हम लोग बोल रहे है, क्या उसे हमारी आने वाली पीडी इसी प्रकार बोल पायेगी, इस और देश विदेश में बसने वाले उत्तराखंडियों का ध्यान ही नहीं है, अपितु उत्तराखंड के अंदर रहनेवाले विद्वानों ने भी इसे गहरे से लिया है, कई लोगों ने इसे बेकार की बात मानकर एक किनारे कर दिया, क्योंकि उन्हें केवल वर्तमान दिखाई दे रहा है, उनमे वर्तमान की सोच और आने वाली पीढी को दियेजाने वाले सरोकारों की सूजबूझ ही नहीं है, उदहारण के रूप में विदेश में होने वाले कार्य कर्म का का जिक्र करना आवशक होगो, जब मंच से विदेशी भाषा तथा राष्ट्र भाषा हिन्दी के कर्म के संबोधन को तोड़ते हुए एक गायक की आवाज अपनी स्थानीय भाषा के लोकगीत के रूप में आती है, तो सभी का ध्यान अकग्र्चित होकर उस और एकटक हो जाता है, *आमा की दी माँ घुघती न बंसा* गीत के सुरताल में वासताबिक रूप में क्या था,  *मेरो गधों कु देश बावन गरहों कु देश*  गीत ने आख़िर में सात समुद्र पर बसे उत्तराखंडियों को क्या संदेश दिया, *चम् चमकू घाम कान्थियोंमा हिवाळी डंडी अचंदी की बनी गेना* इन गीतों में आख़िर क्या है, क्या यह कबी की कल्पना है, या अपनी धरती से रू व रू होने का साक्षात्कार, बहुत कम लोगों का इसकी मूल भावना की और ध्यान गया होगा, क्यों की केवल तीन घंटे का कार्यकर्म जिसमे केवल आधा घंटा ही बमुश्किल से इस कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने अपनी धरती से साक्षात्कार होने का मोका मिला उस आधे घंटे ने पूरे तीन घंटे वसूल कर दिए, ऐ जो तीन गीत गढ़वाली कुमौनी भाषा के मूल ध्वनियों के साथ सुरताल में प्रस्तुत किए गए यह वास्ताबिक रूप में यहाँ की भाषा का ही कमल है, जिसने हजारों मील दूर बैठे उत्तराखंडियों को झुमने के लिए मजबूर कर दिया, यह भी भाषा का ही कमल है, जो आज के समय में प्रतीक मात्र बनती जा रही है,
           आज का उत्तराखंडी उत्तराखंड के बहार के अलावा उत्तराखंड में स्वयं के घर में स्वयम को असहाय महसूश कर रहा है, क्योंकि उनको अपनी मात्र भाषा अपने घर में भी पराई लग रही है,  क्योंकि उनका बचा जब प्राइमरी स्कूल से घर आता है तो वह पूरे वाक्य को आधा अपनी भाषा में बोलता है तो आधा दूसरी भाषा में, इस प्रकार की भाषा पर कभी उसके माँ उसका मजाक तक उड़ा देती हैं, तथा नाराज होने पर हंसते हुए पुचकारती भी है, किंतु उस बचे की मानसिकता उस समय कैसी रही होगी जब उसके बोलने पर उसका मजाक उडाया गया, उसके इस प्रकार की भाषा में बतियाने में उसकी कहाँ गलती है जो उसका मजाक उडाया गया, उसने तो वही कहा जो उसने सीखा, अपनी माँ के साथ रहा तो मात्र भासा सीखी, स्कूल में मास्टर जी ने दूसरी भाषा सिखाई, वास्ताबिक रूप में क्या यह स्थिति उन नोइनिहलों की दुधी के विकाश में सहायक सिद्ध होगी, जिनको कैन भी पूर्णता नहीं मिल प् रही है, और परोतोशिक के रूप में उन्हें हैसी का पात्र बनना पड़ रहा है, प्रश्न उठता है, की क्या उस बालक का बोद्धिक विकाश इच्छानुसार हो पाएगा,
          उत्तराखंडी समाज आज अपनी भाषा के बिमुख क्यों हो रहा है, न चाहते हुए भी इस और बढ्ता ही जा रहा है, राज्य आन्दोलन के दौरान एक सोच उभरकर आई थी की अपना राज्य होगा अपने लोग होंगे सब अपने पिछडेपन से अगड़ने की बात करेंगे, सभी क्षेत्र में स्वायत्ता होगी, स्वायत्ता भी मिली परन्तु कुछ गिनेचुने क्षेत्र में, जहाँ राज्य की संविधानिक आधार पर पहचान बनानी थी उस क्षेत्र में सोचने के लिए किसी के पास समय ही नहीं है, सत्ता प्राप्त करने के लिए राजनेताओं नें जितने वादे किए परन्तु सत्ता की मदहोशी छाने पर वह यह सबकुछ भूल गए की इस राज्य की संस्कृति की ध्वजवाहक को भी जीवित रखना चाहिए.
          इस संदर्भ में एक स्मरण का जिक्र करना अतिशयोक्ति न होगा की सूबे के मुखिया ने अपने चुनाव की दौर में अपनी सठिया बोली के सिवा अन्य भाषा में बात तक नहीं की, लोगों की खूब सहानुभूति बटोरी, भाषा के भावनात्मक जुदौव से उनको अपने क्षेत्र में वाहवाही मिली, परन्तु जब अन्य स्थान पर उनका कर्यकर्ता अपनी भाषा में बात करने की हिम्मत जुटता है तो वह उनके ब्यवहार से अपनेआप को ठगा सा महसूस करते हैं,
          यहाँ भाषा का प्रयोग आम भोली भाली जनता को भावनात्मक रूप में आकर्षित करने के लिए कियस गया, स्थानीय भाषा के प्रयोग से यदि आसानी से साध्य पूरा होता है, तो इसे अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि इस साध्य से एक उद्देश्य तो स्पष्ठ होता है की उतराखंड के स्थानीय लोग पानी भाषा को बहुत चाहते हैं, यदि सूबे का सिरमोर इस भाषा में बात कर रहा है तो वह अवश्य ही इसके विकाश के लिए अवश्य कार्य करेंगे, किंतु उत्तराखंड की दो मुख्य भाषा गढ़वाली कुमौनी के लिए आज तक किसी प्रकार की निति निर्धारित नहीं की गई, यहाँ तक स्तानीय भाषा में शोधकर्ताओं की आज दिनाक तक किसी ने खोजखबर तक नहीं की, यह उस भाषा के साथ साथ उस संस्क्तिती के लिए भी एक चुनोती बनकर उभरेगा, आज नहीं तो आने वाले कल में उत्तराखंड की भाषा संस्कृति की रक्षा के लिए लोग सड़कों पर उतरेंगे तथा अपनों से ही अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए लडेंगे, तब यह भाषाई आन्दोलन कहा जाएगा, जिसमे प्रतेक उत्तराखंडी अपनी भाषाई अस्मिता की रक्षा व पहचान के लिए आगे आएंगे, [/color] [/b]

Dr. B L Jalandhari

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भाषा का अस्तित्व
                                                                                                  डॉ. बिहारीलाल जलंधरी  
          किसी भी क्षेत्र की बोलियाँ भाषा नहीं होती, भाषा का अस्तित्व लिपि पर निर्भर करता हैं, जिस लिपि में उस क्षेत्र की बोली में साहित्य लिखा जाता है, वही एक दिन सुद्रढ़ भाषा का रूप धारण कर लेती है, बोलियाँ किसी क्षेत्र विशेष की संस्कृति पर निर्भर करती हैं, जब वह बोली पिलिबध की जाती है तो उस क्षेत्र की पह्के सम्पर्क भाषा बनती है और फिर भाषा का रूप धर लेती है,
          वर्तमान समय में भारत देश में कई भाषाएँ है, पर क्षेत्रीय भाषा जो पहले बोली थी, जिनपर उस क्षेत्र की संस्कृति की झलक दिखती थी वह आज सकारात्मक रूप से भाषा का रूप धारण कर चुकी है, क्योँ की उस बोली को बोलनेवालों ने अपनी बोली की भाषा के रूप में परिणत करने के लिए उस बोली को लिपिबद्ध करने के लिए स्थानीय भाषा के ध्वनि आखरों को स्थान दिलाने के लिए अदम्य साहस किया, बोली अपने ध्वनियों के साथ लिपिबद्दा होने के साथ संपर्क भाषा में प्रयुक्त होकर उस क्षेत्र की मान्यता प्राप्त भाषा बन गई, इसी तरज पर भारत देस की कई बोलीओं ने अपने स्थानीय ध्वनि आखरों के साथ लिपिबद्ध होने के बाद ही भाषा का दर्जा प्राप्त किया,  भारत देस के संविधान में देखा गया है की भाषा के आधार पर कई रुके हुए कार्य पूरे हुए हैं, यह सर्ब विदित है की हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी है, जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है,
          भाषा हिन्दी है जिसे शाशन द्वारा राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है, राष्ट्र में राष्ट्रभाषा होने पर भी यह भाषा किशी के ऊपर थोपी नहीं गई है, भाषा एक ऐसा विषय है जिसे थोपा नहीं जा सकता,  अपनी आवश्यकता के लिए भाषा को सीखना जरुरी हो जाता है, इस विषय के तरफ मानव अपनेआप आकर्षित हो जाता है, यह भाषा के विषय पर अपने भविष्य को तलाशने की बात है, परन्तु जब स्थानीय भाषा या मात्र भाषा की बात सामने आती है तो वहां कहीं न कहीं अपनापन अवश्य आ जाता है, स्थानीय बोली और उसको लिपिबद्द करना उस बोली के बोलने वालों के ऊपर निर्भर करता है, एक क्षेत्र की कई बोलियाँ या भाषाएँ होती है, जिस प्रकार दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषा की कई धराये हैं, इन भाषाओँ की अपनी अपनी लिपि भी है जो उस क्षेत्र विशेष की बोलीओं की उपस्तिथि के आधार पर ब्यंजित की गई हैं, यदि इसी प्रकार उतराखंड की भाषा गढ़वाली कुमौनी की लेखन शैली विकसित की जाय तो यह अतिशंयोक्ति नहीं होगी, बोली के मूल ध्वनि आखरों को चिन्हित करने से लिपि, भाषा के लिपिबद्ध होने व उसमे साहित्य निर्माण के बाद वह समर्द्ध भाषा बनती है, किसी क्षेत्र की भाषा ही उस क्षेत्र के संस्कृति का विरत रूप है, यह भाषा ही उस क्षेत्र की संस्कृति को जीवित रखती है, जिस बोली में संस्कृति की झलक होती है यदि वह विलुप्तता की और अग्रसर हुई तो भविष्य में उस क्षेत्र विशेष की संस्कृति नष्ट होने की सम्भावनाये रहती हैं, यही सांस्कृतिक संकट की संभावना उत्तराखंड में भी दीख रही हैं, जहाँ से लगातार पलायन हो रहा है, अन्य स्थानों पर लंबे अरसे ताड़ रहने के बाद ये लोग अपनी संस्कृति भूलते जा जाहे हैं, जिन परिवारों के सदस्यों ने उत्तराखंड में वर्षों से जाना आना छोड़ दिया क्या वह अपनी संस्कृति की सूझा बूझ रखते हैं, यह वर्तमान समय के लिए मंथन का विषय है,  यह विषय केवल देव भूमि या देवभूमि परिवार का नहीं है, यह विषय उन लोगों का भी है जो अपनी मूलभूत संस्कृति से बिमुख हो रहे हैं, जो लोग अपनी मूल्भुई संस्कृति से बिमुख हो गए हैं, यह उनकी गलती नहीं, यह उस पूरे समाज की गलती है, जिसने निजी स्वार्थ को सर्बोपरी रखकर अपने समाज अपनी भाषा में लिए निश्वार्थ रूप से कम नहीं किया, इन लोगों द्वारा बड़ी बड़ी डिग्रियां ली गई पर यह लोग अपनी भाषा के लिए कार्य नहीं कर पाए, जिससे समाज के समुख अपनी भाषा की अलग पहिचान बने जा सकती,
          आज समय आ गया है की हम सभी को अपनी मूल पहिचान के लिए कार्य करना हैं, यह कार्य कठिन अवश्य होगा परन्तु असंभव नहीं, दृढ इच्छा शक्ति यदि हमारे अंदर होगी तो निश्चित तोर पर उत्तराखंड की भाषा के लिए देवनागरी लिपि में गौ आखर जोड़कर व इसका विस्तार कर उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा का दर्जा दिलाएंगे, [/b] [/color] [/size]

Dr. B L Jalandhari

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बोलियाँ  स्वतंत्र  रह  कर  ही  विकसित  हुई
                                                                                                                    डॉ. बिहारीलाल जलंधरी

               भाषा पर कार्यरत किसी भी भाषा शास्त्री को भाषा और बोली के बीच अन्तर ज्ञात होने का कोई पारिभाषिक  आधार प्राप्त नहीं होता. भाषा या  बोली के लिए पारंपरिक बोधगम्यता का निरिक्षण एक ब्यवहारिक आधार है,  भाषा के आधार पर प्रयत्न करने पर एक भाषा को बोलनेवाला दूसरी संभाषा को समझ लेता है, परन्तु बिना सीखे हुए वह उस भाषा को नहीं समझ पता जिस भाषा से वह कोसो दूर है, एक भाषाई क्षेत्र में कभी कभी इतनी बिभिन्न बोलियाँ मिलती हैं, जो वास्ताबिक रूप से एक दूसरे से भिन्न होती हैं, कभी इन बोलियों को समझना इतना कठिन हो जाता है तथा दुर्गम स्थानों में ऐसे समुदाय मिल जाते हैं,  जो एक दूसरे की बोली को नहीं समझ पाते हैं, इसमे क्रमागत बोलियाँ एक दूसरे से इतने कम अंशों में भिन्न होती है, कि प्रतेक स्थान पर भाषिक संप्रेक्षण सम्बभ होता है, ऐसे दशा में इन सभी निकटस्थ बोलीओं को क्या एक ही मान लेना चाहिए, या ऐसी स्तिथि में इनको एक भाषा के रूप में मानना उचित नहीं होगा, इस परिस्तिथि से एक निर्णय पर पहुँचा जा सकता है कि भाषा और उसकी बोलियों का अन्तर अंशों का होता है, प्रकार का नहीं, भाषा शास्त्रीय अध्ययन में बोलियों और भाषाओँ के पारस्परिक सम्बन्ध विषयक अधिक शुद्ध धारणाओं को भी कम महत्वा नहीं दिया जा सकता, इससे यह बात स्पस्ट हो जाती है कि बिभिन्न प्रादेशिक बोलियाँ स्वतंत्र रह कर ही विकसित हुई हैं, उन्हें अन्य भाषाओँ के समक्ष उसके साहित्य को विकृत रूप की संज्ञा नहीं दी जा सकती, ये भाषा साहित्य अपनेआप में प्रणालीबद्ध है, जिस प्रादेशिक स्वतंत्र बोली में साहित्य सर्जन होता रहा उनकी ब्याकर्निक संरचना, उच्चारण  एबम शब्दावली से सम्बद्ध उनकी अपनी ही कुछ नियमित्तायाँ हैं, जिन प्रसंगों से वह स्वतंत्र प्रादेशिक बोली प्रयुक्त होती है वह उस क्षेत्र के पारस्परिक  आदान प्रदान का साधन के रूप में पूर्णता उपयुक्त होती है, वास्ताबिक रूप में भाषा और उसके निकटस्थ बोलीओं में पाए जाने वाले अन्तर भाषात्मक अन्तर न होकर प्रकारात्मक अन्तर होते हैं, जो उस क्षेत्र की जलवायु पर निर्भर करते हैं, इस सम्बन्ध में यदि शुद्ध भाषा वैज्ञानिक द्रष्टि से देखा जाय तो परम्परागत रूप से स्रेस्थ भाषाएँ केवल उस स्थान विशेष की बोलियाँ ही होती हैं जो ऐतिहासिक घटनाक्रम के कारण राजनितिक और सांस्कृतिक द्रष्टि से उस क्षेत्र विशेष में महत्व प्राप्त कर गई, निसंदेह किसी विशिष्ठ स्वतंत्र बोली के साहित्य प्रकाशन दर्शन तथा उसके अनेक प्रयोजनों और ब्यापक रूपों में प्रयोग का परिणाम यहाँ होता है कि उस क्षेत्र विशेष की बोली की शब्दावली उन सभी आवश्यक विभेदों के साथ अत्यधिक ब्यापक हो जाती है, जिसके द्वारा वह अपने स्वतंत्र प्रयोग क्षेत्र में अपने नए रूप में संतोष जनक ढंग से काम कर सकती है, इस विचार के सम्बन्ध में कुछ तथ्य भिन्न हो सकते हैं, जो किसी जाती विशेष द्वारा प्रयुक्त बोली के सम्बन्ध में कहे जा सकते हैं, जो केवल अपनी जाती तक ही सीमित रहती है, देश में सामान्यतया सभी आदर्श कही जाने वाली भाषाओँ का जन्म भी उन सभी स्वतंत्र बोलियों से हुआ है, जो समाज के प्रतिष्ठित व सबल वर्ग द्वारा बोली जाती है या प्रयुक्त की जाती है या कहीं न कही उसे राजनितिक या प्रसाशनिक संरक्षण प्राप्त था,  यह वास्थाबिकता से परे नहीं है की जिस स्वतंत्र बोली को सबल वर्ग व राजतन्त्र का संरक्षण प्राप्त हो हुआ वह अवश्य ही उस प्रदेश की प्रादेशिक भाषा या आदर्श प्रतिष्ठित भाषा बनकर उभरी,
               यहाँ विश्व के चर्चित भाषा वैज्ञानिकों के अनुभव को बाँटना आवश्यक है, भाषा विज्ञानं की शाखा के अंतर्गत प्रादेशिक स्वतंत्र बोली पर हुए एक अनुसन्धान के अंतर्गत एक बात अवश्य स्पस्ट हुई है,  कि एक ही स्वतंत्र बोली की उपबोलियों या विबिध बोलियों के बीच विधेयक रेखा खींच पाना असंभव है, विश्व या देश के उन भागों में या जहाँ  राजनीतिक सीमा में सामान्यतय परिवर्तन होते रहते हैं, या जहाँ आदान प्रदान की सीमाएं एक दूसरे देश की सीमा को लाँघ जाती हैं, वहां किसी भाषा विशेष से समझी जाने वाली बोलियाँ भी किसी अन्य भाषा की बोली के सामान ही लगती हैं, क्योँ कि भाषा के शब्दों के आदान प्रदान से स्थानीय भाषा में कुछ शब्द इस प्रकार घुलमिल जाते हैं, जिस को उस भाषा या बोली से अलग करना असंभव हो जाता हैं, यहीं यह कहा जाना अतिशयोक्ति न होगा की दूर दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले रहवासियों की बोली का कोई स्वतंत्र परिनिस्थित रूप नहीं होता, उनकी बोली को हमेशा एक बोली के रूप में लिया जा सकता है, भाषा के सम्बन्ध में यह एक ऐसा    द्रिस्थिकों है जो उस स्वतंत्र बोली के लिखित और साहित्यिक रूप पर आधारित है, एक स्वतंत्र बोली के लिए राजनितिक  दृष्ठी से यह समाधान प्रस्तुत किया जा सकता कि उस बोली को उस परिवेश में शासन कार्य में प्रयोग किए जाने के लिए किया जाए,  जहाँ एक स्वतंत्र बोली को इस प्रकार का संरक्षण प्राप्त हो गया वहां की बोली निशंदेह वहां की परिनिस्थित भाषा या प्रादेशिक भाषा रूप धारण कर लेती है,
               प्रायः यह देखा गया है कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ को छोड़कर मध्य हिमाली स्वतंत्र बोलियों को राजनितिक व सांस्कृतिक विराशत के रूप में संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ है,  इन भाषाओँ को पूरब में यदि राजतन्त्र का संरक्षण मिला होता तो निशंदेह यह वर्तमान में एक परिनिस्थित भाषा के रूप में उभर कर उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा बन गई होती, मध्य हिमाली क्षेत्र के सम्बन्ध में राजनितिक उथल पुथल माने तो यहाँ केवल गोरखों का ही अधिपत्य रहा, उसके बाद बिर्टिश हुकूमत ने अपने पैर पसारे, परन्तु जो पौराणिक समय से रियासत चलती आ रही थी, उसके अवशेष तो वर्तमान में भी अपनी जड़े जमाये बैठी हैं, परन्तु उस रियाशतदार ने भी अपनी भाषा के संरक्षण के बारे में नहीं सोचा, उसने अपनी स्थानीय भाषा को स्वतंत्र रूप से अपने राज्य की राज काज की भाषा के रूप में प्रयोग  नहीं किया, नाही अपने राज्य के शिक्षण संस्थानों में इसमे पठान पठान की ब्यवस्था की, यदि यहाँ की स्वतंत्र बोली को स्वतंत्र रूप से राज काज और पठान पाठन में प्रयोग किया जाता तो यहाँ की भाषा और उसकी लिपि भी पुर्बोत्तर के छोटे छोटे राज्यों के समकक्ष होती और उसमे रचित साहित्य एक परिनिस्थित साहित्य होता,  वर्तमान में आवश्यकता है यहं की स्वतंत्र बोली को राजनितिक संरक्षण की,


hem

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 प्रायः यह देखा गया है कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ को छोड़कर मध्य हिमाली स्वतंत्र बोलियों को राजनितिक व सांस्कृतिक विराशत के रूप में संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ है,  इन भाषाओँ को पूरब में यदि राजतन्त्र का संरक्षण मिला होता तो निशंदेह यह वर्तमान में एक परिनिस्थित भाषा के रूप में उभर कर उत्तराखंड की प्रादेशिक भाषा बन गई होती,- पूर्णतः सत्य है.

Dr. B L Jalandhari

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बोली के प्रयोग में वर्ग विशेष की भूमिका  

                                                                                                    डॉ. बिहारीलाल जलंधरी

          एक विस्तृत भू भाग में एक संगठित भाषा की स्थापना हो जाने के बाद सामाजिक मानदंड में उस क्षेत्र की बोलियाँ धीरे धीरे दब जाती है, क्योँ की क्षेत्रीय बोलियों में से एक प्रचुर बोली का मानकीकरण ही उन सभी बोलियों के मानकीकरण का द्योतक बन जाता है,
          हम राष्ट्र भाषा बिंदी की बात लें, हिन्दी के विकास की एक लम्बी कहानी हैं, जिसका प्रयत्न खिलजी बंश के शासकों ने १२९६ में आरम्भ किया था, और इसी दौरान हिन्दी दक्षिण भारत में गई, दक्षिण भारत के आदिलशाही, कुतुबशाही, बिदार्शाही, इमाम्शाही और निजामशाही राज्यों में इसे संरक्षण मिला, मुग़ल साम्राज्य के वास्ताबिक संस्थापक सम्राट अकबर ने हिन्दी कबिता को अत्यन्त प्रोत्साहन दिया, निर्गुण संतों ने अपने सिद्धांतों के प्रचार के लिए मिली जुली और सधुकरी हिन्दी को अपनाया, यह प्रारम्भ से ही एक ब्यापक भाषा थी, संतों के भक्ति काब्य के रूप में हिन्दी मध्य कल में इतनी ब्यापक हुई की अन्य भाषाभाषी कबी भी इनके आकर्षण से बच नहीं सके, अपनी ब्यापकता के कारन यह तीरथ यात्रियों और पर्यटकों की भाषा बन गई, उत्तर भारत में ब्यापारियों की भाषा होने के कारन यह ब्यापार की भाषा भी बन गई,
          उत्तर भारत में संस्कृत भाषा को स्थापित करने में ब्रह्मण धर्म का मत्वा पूर्ण हाथ है, उनके द्वारा संरक्षण दिए संस्कृत साहित्य आज भी वेड पुरानो के रूप में जीवित है, ब्रह्मण धर्मं का सबसे अधिक प्रभाव मध्य हिमालयी क्षेत्र उत्तराखंड पर पड़ा, ब्रह्मण धर्म ने अपनी बुद्दी कौशल से राजशाही को अपनी मुठी में रखा और राजशाही के माध्यम से संकृत को सम्पूर्ण मध्य हिमालयी क्षेत्र में लिखित भाषा के रूप में स्थापित कराने में सफलता प्राप्त की और परिनिस्थित पाणिनि संस्कृत का स्वरुप स्वीकार किया गया, किंतु अध्येता यह विश्वाश करते है, की यह एकरूपता, काब्य भाषा की समरूपता का समांतर नहीं थी और स्थानीय ध्वनि और सुर की विशेषताओं की आधार शिला रखी, वेड ब्यास ने अपने ग्रन्थ १९६१:२४० में इसका उल्लेख किया है, आधुनिक समय में इस प्रकार की प्रक्रिया उन स्थानों में देखी जाती है, जिन्हों ने एक परिमाण में रास्ट्रीय एकता प्राप्त करनी है,  ऐसी परिस्थिति में परिनिस्थित भाषा का प्रयोग क्षेत्र बढ़ जाता है और स्थानीय बोलियाँ त्याग दी जाती हैं, या अपने आप दब जाती है, या प्रयोग न होने से हतोस्थानित हो जाती हैं,  नई पीढी के अधिकाधिक लोग शिक्षित होने के कारन परिनिस्थ भाषा को स्थानीय प्रभाओं से यथाशक्ति निरापद रखकर स्वीकार करते हैं और यदि कोई स्थानीय प्रभाव पड़ता भी है तो वह उनमे जीवित रहती है और समाज में उसकी एक स्थारीय धारा पड़ी रहती है, जिससे अवसर पाकर वह पुनः खड़ी हो जाती हैं, यहाँ यह प्रश्न स्वाभावित है की किसी विशेषे भाषा या बोलो को बोलने वाला किसी नए रूप को क्यों प्राथमिकता देता है, यदि कोई बोली कम से कम दो ब्यक्तियों द्वारा बोली जाती है, तो उन दोनों में प्रयोगों की कुछ न कुछ बिभिन्नता अवश्य रहती है, जिसे शुक्ष्म निजिक्षण द्वारा परिलक्षित किया जा सकता है, किसी बड़े जनसमुदाय की भाषा में प्रयोगों की बिभिन्न्तायें उस समुदाय के सामाजिक एवं भोगोलिक संगठन से कुछ अंशों में अंतर्संबंधित होती है, प्रायः एक समुदाय के लोगों की बोली में एक ही गाव के निवासी होने के कारन यह एक ही सामाजिक अवस्था आर्थिक वर्ग के अंतर्मन होने के कारन प्रयोगों की कुछ समानता प्राप्त होती है, किंतु उन लोगों के वाक ब्यवहार में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है जो एक दूसरे के संपर्क में बहुत कम आते हैं या फिर कभी नहीं आते,
          प्रतेक समाज में सामाजित वर्ग विघटन की मात्रा और उसकी प्राकृत भिन्न होती है,  अतः यह तरवा बोली के मिलाप को उद्घाटित करने के लिए सर्बथा उपयुक्त नहीं है,  वहां हम देखते हैं की निम्न वर्ग की अपेक्षे उच्च वर्ग की बोली एक स्थान से दूसरे स्थान तक अधिक एकरूप होती है, उच्च वर्ग के लोग अधिक यात्रायें करते हैं, और उनकी यात्रायें उन्हें उसे वर्ग के दूसरे सदस्यों के संपर्क में लती है, जबकि निम्न वर्ग के लोग घर और उसके आसपास से ही लगे जह जाते हैं, यहाँ पर साधू भाषा का प्रश्न भी हल हो जाता है, क्योंकि साधू प्रयोगों का नियमन उच्च वर्ग की भाषा की स्वाबभिक परवर्तियों से होता हैं, थोडी देर के लिए मात्र सम्मान की चीज मालूम होती है,  यह मनुष्य की प्रकृत्ति ही है की वह अन्य जीवन ब्यापरों के साथ साथ भाषा में भी उनका अनुकरण करता है, जिन्हें वह अपने समाज में श्रेष्ठ समझता है, उच्च वर्ग अपने भाषाई प्रयोगों को ब्याव्ह्र्ट करता हैं और निम्न वर्ग उसका अनुसरण करता है, किंतु जब कभी ऐशा विश्वाश जाग्रत हो जाता है की निम्न व निर्धन परिवार में जन्म लेना किसी सामाजिक उपलब्धि का द्योतक नहीं है तो साधू और परिनिस्थित प्रयोगों की धारा का दिशाक्रम ही दूसरा हो जाता है, चाहे हजारों या लाखों अमुश्यों का समुदाय सामाजिक वर्ग विभेद प्रर्दशित करे या न करे, भोगोलिक निकटता या पर्थाक्यता के तत्वा बोली के चित्र को सदैब बिघतित करने में सहायक होते हैं, वर्ग विहीन समाज में प्रतेक अमुष्य इससे प्रभावित होता है और वर्गीक्रत समाज में निम्न वर्ग के सदस्य इससे अधिक प्रभावित होते हैं,
          यहाँ बोलियों में एक मानक बोली की बात मुख्या रूओप से सामने आ रही है, माना जाया तो मध्य हिमालयी क्षेत्र में कई बोलियाँ हैं, सभी बोलियों को संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता, परन्तु कई बोलियों में से एक बोली ऐसी है जो उस भूभाग के अधिकांस क्षेत्र में बोली जाती है तो क्यों न उसी बोली को ही मानक रूप प्रदान कर परिनिस्थित भाषा के रूप में स्थापित किया जाय,                      

Parashar Gaur

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Dr sahib,


Abhi tak sab theek taak chal rahaa thaa.. Vasha/Bole ko laker. aap ki pakdad aur soch saaf saaf dekhaye dete hai. 

  Gambher vishya aate aate ye kya ,  beech me ,  aap kise vykte ya samudyaa ki pranshaa karne lage... jiskaa vashaa bole se koee lanaa denaa nahi .

parashar

 

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