Author Topic: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख  (Read 19060 times)

Mani Ram Sharma

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[justify]हमारा नेतृत्व भारतीय संविधान की भूरी-भूरी प्रशंसा करता है और जनता को अक्सर यह कहकर गुमराह करता रहता है कि हमारा संविधान विश्व के विशाल एवं विस्तृत संविधानों में से एक होने से यह एक श्रेष्ठ संविधान है| दूसरी ओर इसके निर्माण के समय ही इसे शंका की दृष्टि से देखा गया था|
डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में दिंनाक 19.11.1949 को संविधान सभा की बैठक संपन्न हुई| इस सभा में संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के श्री सेठ दामोदर स्वरुप ने बहस के दौरान कहा कि सामान्यतया सदन के सदस्य मुझ जैसे व्यक्ति को हमारे परिश्रम के सफलतापूर्वक पूर्ण होने पर संतुष्ट होना चाहिए था| किन्तु श्रीमानजी मुझे इस क्षण अनुमति प्रदान करें कि जब मैं इस सदन में संविधान पर विचार व्यक्त कर रहा हूँ तो किसी संतोष के स्थान पर मुझे निराशा होती है| वास्तव में मुझे लग रहा है कि मेरा हृदय टूट रहा है और मुझे लकवा हो रहा है| मुझे यह लग रहा है कि ब्रिटिश शासन यद्यपि दो वर्ष पूर्व समाप्त हो गया है किन्तु इस देश और निवासियों का दुर्भाग्य है कि इस परिवर्तन के कारण उनकी स्थिति में लेशमात्र भी सुधार नहीं हुआ है| मुझे अंदेशा है कि आम जनता अपने लिए किसी सुधार के स्थान पर इस राजनैतिक परिवर्तन से अपनी स्थिति में और खराबी का संदेह कर रही है| वे यह समझने में असमर्थ हैं कि इसका अंत कहाँ होगा| वास्तव में आम आदमी, जिसके नाम से जो संविधान बनाया गया है और पारित होगा, इसमें मात्र निराशा और अपने चारों ओर अन्धेरा ही देखता है|
श्री सेठ ने आगे  कहा कि हमारे कुछ साथी यह सोचते हैं कि आम व्यक्ति की स्थिति में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता क्योंकि ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गए कानून अभी लागू हैं| उनका विश्वास है कि भारतीय संविधान अब तैयार है और आम व्यक्ति यह महसूस करेगा कि अब वे निश्चित रूप से प्रगति पथ पर हैं| किन्तु मैं कटु सत्य को आपके समक्ष रखने के लिए क्षमा चाहता हूँ| इस देश के लोग इस संविधान के पूर्ण होने और लागू होने पर भी संतुष्ट  या प्रसन्न नहीं होंगे क्योंकि इसमें उनके लिए कुछ भी नहीं है| आप प्रारम्भ से अंत तक इसमें कहीं भी गरीब के लिए भोजन, भुखमरी, नंगे और दलितों के लिए कोई प्रावधान नहीं पाएंगे| इसके अतिरिक्त यह कार्य या रोजगार की कोई गारंटी नहीं देता| इसमें न्यूनतम मजदूरी, जीवन निर्वाह भत्ता के भी कोई प्रावधान नहीं हैं| इन परिस्थितियों में यद्यपि यह संविधान विश्व का सबसे बड़ा और भारी तथा विस्तृत संविधान हो सकता है, यह वकीलों के लिए स्वर्ग है व भारत के पूंजीपतियों के लिए मैगना कार्टा है किन्तु जहां तक गरीबों और करोड़ों मेहनतकश, भूखे और नंगे भारतीयों का सम्बन्ध है उनके लिए इसमें कुछ भी नहीं है| उनके लिए यह एक भारी ग्रन्थ और रद्दी कागज के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है| यह बात अलग है कि हम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं या नहीं, किन्तु हमें यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि यदि हम आम व्यक्ति के विचारों की अनदेखी करते हैं तो भी बड़े लोगों के मत का ध्यान रखना पडेगा| भारतीय संसद के अध्यक्ष ने कहा है कि बनाये गए संविधान में भारतीय मानसिकता  की बिलकुल भी परछाई नहीं है और यह उसके ठीक विपरीत है|  कांग्रेस पार्टी के महासचिव श्रीशंकर राव देव के अनुसार यदि इस पर जनमत करवाया जाये तो इसे अस्वीकार कर दिया जायेगा| इस प्रकार यह कैसे कहा जा सकता है कि जनता इससे संतुष्ट होगी| यह स्पष्ट है कि जिन लोगों ने संविधान का निर्माण किया है वे सचे अर्थों में आम जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं| संविधान निर्माता मात्र 14% भारतीय लोगों के प्रतिनिधि हैं| यह एक कटु सत्य है| जो लोग हम यहाँ इस सदन में जनता के प्रतिनिधि के तौर पर इकठे हुए हैं राजनैतिक पार्टीबाजी जैसे विभिन्न कारणों से अपने कर्तव्यों के पालन में विफल हैं | इस कारण से भारत के लोग जिस प्रकार सरकार परिवर्तन के निराश हैं ठीक उसी प्रकार इस संविधान से भी निराश हैं| यह संविधान इस देश में स्थायी तौर पर कार्य नहीं कर सकता| हम पाते हैं कि इस संविधान में कुछ बातें और सिद्धांत यथा – आम मतदान और संयुक्त मतदाता, अस्पृश्यता निवारण जैसे अच्छे हैं| किन्तु जहां तक सिद्धांतों का प्रश्न है वे बिलकुल ठीक हो सकते हैं फिर भी यह देखने योग्य है कि उन्हें व्यवहार में किस प्रकार अमल में लाया जाये| संविधान में मूल अधिकारों का उल्लेख एक महत्वपूर्ण बात है लेकिन क्या हमें इस संविधान के माध्यम से वास्तव में कोई मूल अधिकार मिले हैं|
श्री सेठ ने आगे  कहा कि मैं जोर देकर कह सकता हूँ कि मूल अधिकार दिया जाना मात्र एक झूठ है| ये एक हाथ से दिए गए हैं और दूसरे हाथ से ले लिए गए हैं| हमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि वर्तमान में लागू कानूनों के विषय में मूल अधिकारों की गारंटी नहीं है और अपमानकारी प्रकाशन, न्यायालयी अवमानना पर सरकार भविष्य में भी कानून बना सकती है| इसके अतिरिक्त संगठन बनाने या एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के अधिकार का सम्बन्ध है, सरकार को जनहित की आड़ में इन अधिकारों को छीननेवाले कानून बनाने का अधिकार रहेगा जिससे मूल अधिकार दिया जाना मात्र एक छलावा रह जाता है| ठीक इसी प्रकार सम्पति सम्बंधित अधिकार भी भारत सरकार अधिनियम,1935  के प्रावधान के समान ही है| परिणामत: सम्पति का राष्ट्रीयकरण असंभव होगा और जनहित में आर्थिक सुधार करने के मार्ग में कई बाधाएं होंगी|
एक ओर हम चाहते हैं कि सामजिक ढाँचे को बिना किसी परिवर्तन के बनाये रखा जये  और दूसरी ओर गरीबी और बेरोजगारी देश से मिट जाए| ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती| हमारे प्रधान मंत्री ने अमेरिका में कहा था कि समाजवाद और पूंजीवाद दोनों एक साथ नहीं चल सकते, यह आश्चर्य होता है कि वर्तमान स्थिति को किस प्रकार अपरिवर्तित रखा जा सकता है कि पूंजीवाद बना रहे और जनता की गरीबी और बेरोजगारी मिट जाए| ये दोनों बातें बेमेल हैं| अत: यह महसूस किया जा रहा कि भारत के लोगों की भूख, गरीबी और शोषण ठीक उसी प्रकार जारी रहेगी  जैसे आज है| यद्यपि आजकल हमारे देश में सहकारिता की चर्चाएँ जोरों पर हैं लेकिन नीतिनिदेशक तत्वों में ऐसा कोई सन्देश नहीं है| शब्दजाल के आवरण  में गोलमाल निर्देश देना ऐसी व्यवस्था स्थापित करने से बिलकुल भिन्न है| फिर भी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष हमें दिलाशा दिलाना चाहते हैं कि देश में पांच वर्ष में ही वर्गहीन समाज स्थापित हो जायेगा| मेरे जैसे एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना कठिन है कि इन दोनों कथनों का किस प्रकार समाधान किया जाये कि एक ओर हम समाजवाद से घृणा करते हैं और यथा स्थिति चाहते हैं तथा दूसरी ओर शोषक वर्ग का संरक्षण करते हुए वर्गहीन समाज स्थापित करना चाहते हैं| मैं नहीं समझता कि ये दोनों विरोधाभासी उद्देश्य किस प्रकार प्राप्त किये जा सकते हैं| कार्यपालिका और न्यायपालिका के अलग होने की मांग भी कांग्रेस पार्टी के समान ही पुरानी  है| किन्तु इस संविधान में  कार्यपालिका और न्यायपालिका को  यथा शीघ्र अलग करने की ऐसी कोई सुनिश्चित योजना या पर्याप्त प्रावधान नहीं है| राज्यों की स्थिति देखें तो स्पष्ट होता है की जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए कोई निर्णय नहीं लिया गया है| परिणामत: राज्यों के करोड़ों किसान जागीरदारों के गुलाम बने हुए हैं| इसके अतिरिक्त कृषि श्रमिक साहूकारों के गुलाम बने हुए हैं| इसके साथ साथ हम पाते हैं कि इस संविधान में भारत सरकार अधिनियम,1935  के प्रावधानों से भी  कई अत्यंत पिछड़ी और प्रतिगामी बातें हैं| संविधान के प्रारूप में पहले प्रावधान किया गया था कि राज्यपाल मतदाताओं द्वारा सीधा चुना जायेगा| बाद में प्रस्तावित किया गया कि राज्यपाल एक पैनल द्वारा नियुक्त किया जायेगा| किन्तु अब राष्ट्रपति को राज्यपाल नियुक्त करने और उनका कार्यकाल निर्धारित करने की शक्ति दी गयी है| यह ठीक है कि राष्ट्रपति यथा संभव अपने अधिकारों का उचित प्रयोग करेंगे किन्तु यह स्थिति प्रांतीय सरकारों और राज्यपाल के मध्य द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न करेगी| यह संभव है कि प्रांतीय सरकार की विचारधारा केंद्र सरकार से भिन्न हो और विचारधाराओं में अंतर से प्रांतीय सरकार और राज्यपाल के मध्य संघर्ष को स्थान मिले| इसके अतिरिक्त राज्यपालों को 1935 के अधिनियम से भी पिछड़े विवेकाधिकार दिए गए हैं| 1935 के अधिनयम में राज्यपालों के लिए व्यक्तिगत निर्णय के अधिकार थे किन्तु उनके लिए मंत्रिमंडल से परामर्श आवश्यक था| किन्तु अब विवेकी शक्तियों के उपयोग के लिए राज्यपालों का मंत्रिमंडल से परामर्श करना आवश्यक नहीं है| इस प्रकार हम देखते हैं कि राज्यपालों की शक्तियां भी आगे बढ़ाने की बजाय पीछे चली गयी  हैं| पुनः राष्ट्रपति को भी आपातकाल के नाम से आवश्यकता से अधिक बड़ी शक्तियां दी गयी हैं और केन्द्र को भी प्रान्तों के मामलों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता से अधिक शक्तियां दी गयी हैं| हमारा संवैधानिक ढांचा  कहने को तो संघीय है किन्तु जहां तक प्रशासनिक स्वरुप का प्रश्न है यह पूर्णतः ऐकिक है| हम समझते हैं कि कुछ सीमा तक केन्द्रीयकरण आवश्यक है किन्तु अति केन्द्रीयकरण का अर्थ देश में अधिक भ्रष्टाचार फैलाना है|
   May peruse my more contribution at http://justicemiracle-mrp.blogspot.in/  and    http://www.judicialreform.in/forums/
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Mani Ram Sharma

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[justify]श्री सेठ दामोदर स्वरुप ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में दिंनाक 19.11.1949 को संविधान सभा में बहस को आगे बढाते हुए आगे  कहा कि महात्मा गाँधी ने अपने जीवनभर विकेन्द्रीयकरण की वकालत की है| आश्चर्य का विषय है उनके विदा होते ही हम इस बात को भूल गए हैं और राष्ट्रपति व केंद्र को अनावश्यक शक्तियां दे रहे हैं| वर्तमान सरकार का स्वरुप- दो वर्गों – राज्यों और केंद्र के मध्य  शक्तियों के विभाजन पर आधारित है | यह पहले से ही अतिकेंद्रीयकृत है| यदि हमें भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और भाई भतीजावाद समाप्त करना है तो दो खण्डों की योजना उपयुक्त प्रतीत नहीं होती| इसके लिए हमें चार खण्डों की योजना की आवश्यकता है| जैसा कि मैनें एक बार प्रस्तावित किया था कि ग्राम, शहर और प्रान्त स्तर पर अलग –अलग गणराज्य होने चाहिए व उनका संघीय स्तर पर केन्द्रीय गणराज्य में एकीकरण होना चाहिए जिससे ही हमें वास्तविक अर्थों में संघीय लोकतांत्रिक ढांचा मिल सकेगा| किन्तु जैसा कि मैंने पहले कहा है हमने संघीय के स्थान पर ऐकिक संविधान का निर्माण किया है| इससे निश्चित रूप से अति केन्द्रीयकरण होगा, और हमारी सरकार जो लोगों की सरकार होनी चाहिए थी फासिस्ट सरकार हो जायेगी| इस दृष्टिकोण से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमारे देश के लिए बनाये गये संविधान से न तो देश का कल्याण होगा और न ही उन दिखाई देने वाले सिद्धांतों का संरक्षण होगा जिनके लिए हम आगे बढे हैं| इसी कारण से भारत की समाजवादी पार्टी ने घोषणा की है कि वे जब कभी भी सता में आये तो वे सर्व प्रथम आम मतदान आधारित एक नई संविधान सभा का गठन करेंगे और वह सभा इसे पूरी तरह से परिवर्तित करेगी या आवश्यक संशोधन करेगी| अत: जन हित और उच्च संवैधानिक सिद्धांतों के दृष्टिकोण से यह संविधान पारित करने के योग्य नहीं है| हमें इस संविधान को निरस्त कर देना चाहिए| मेरे सम्माननीय साथी शंकर राव देव के शब्दों में चाहे हम इस संविधान को स्वीकार कर लें, देश के लोग इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे| उनके लिए यह संविधान एक सामन्य कानून की किसी अन्य पुस्तक से अधिक कुछ नहीं है| जिस प्रकार सरकार परिवर्तन से लोगों की आशाओं की पूर्ति नहीं हुई है ठीक उसी प्रकार इस संविधान से भी लोगों की आशाएं अपूरित रहेंगी| अत: यदि हम लोगों का विश्वास कायम रखना चाहते हैं तो एक परिवर्तन फिर करने की आवश्यकता है, किन्तु यदि हम यह करने में असफल रहते हैं तो  मुझे विश्वास है भारत की जनता और आने वाली पीढियां  हमें किसी अच्छे या सम्माननीय नाम से नहीं जानेंगी|
इसके पश्चात मद्रास से प्रतिनिधि श्री टी प्रकाश ने कहा कि यह वह संविधान नहीं है जिसकी मैंने अपने देश के लोगों के लिए आशा की थी, ऐसा संविधान जिसकी महात्मा गांधी ने योजना बनायीं थी जिसमें व्यहाहरिक रूप से पंचायती राज हो| इस अविर्भाव और इस कार्यक्रम से पूर्व में किसी ने भी कल्पना नहीं की थी कि देश के लोग जिस प्रकार बंटे हुए होते हुए भी एक नेतृत्व में एक बैनर के नीचे साथ-साथ आयेंगे और उनके व काँग्रेस के आदेशों की अनुपालना करेंगे| वे ही एक मात्र व्यक्ति थे जिन्हें संविधान बनाना चाहिए था - इस देश के लोगों के लिए सरल संविधान- जिससे उन्हें करोड़ों लोगों को पूर्ण राहत मिले| उनकी योजना करोड़ों को शिक्षित करने की थी  और जब से उन्होंने अफ्रीका से इस धरती पर कदम रखा इस स्वतंत्रता की लड़ाई को तब से ही चालू रखा| उन्होने संविधान का प्रारूप तैयार करने से पहले एक पत्र एक सृजनात्मक कार्यकर्ता, एक वकील और एक शिक्षित व्यक्ति को लिखा जिसने अपना महत्वपूर्ण समय गाँव में बिताया हो| उस पत्र में महत्मा गांधी के पंचायत संगठन के विषय में सुझाव दिया गया था और आपने उसका विस्तार से उत्तर दिया था और उससे सर्वाधिक प्रभावित हुए थे क्योंकि आप महात्मा के सर्वाधिक अग्रणी अनुयायी रहे हैं| ब्रिटिश राज में करोड़ों लोगों की  उपेक्षा हुई और ब्रिटिश शासन के अंत के बाद भी हमारे देश में उनकी उपेक्षा हुई है व हम इस संविधान की ओर बढ़ रहे हैं| संविधान एक महान दस्तावेज है और  साथी  – डॉ अम्बेडकर, बड़े वकील व एक योग्य व्यक्ति हैं - इसके निर्माण के प्रभारी रहे हैं| उन्होंने जो काम किया है उससे दिखा दिया है कि वे इंग्लॅण्ड के राजा के सलाहकार होने के लिए योग्य हैं| किन्तु यह वह संविधान नहीं है जिसे कि इस देश के हम लोगों ने चाहा हो| जैसे ही अंग्रेजों को इस देश से बाहर भेजा गया हमें गांधीजी द्वारा दी गयी शिक्षा के आधार को अस्वीकृत नहीं करना चाहिए था, मात्र शिक्षित ही नहीं अपितु प्रत्येक क्षेत्र के लोगों को कार्य करने के लिए समर्थ बनाया जाना चाहिए था| जो गत 26 वर्षों में अपना कपड़ा बनाने, अपनी रोटी कमाने और अन्य सभी रचनात्मक कार्यक्रम चलाने की बातें हुई अब इस संविधान में कहीं नहीं हैं| इस प्रकार श्री प्रकाश ने अपनी बहस को पूर्ण किया|
आज हम देखें तो पाएंगे कि विश्व बहुत छोटे देश यथा जापान, तुर्की आदि के संविधान हमारे संविधान से बहुत अच्छे हैं| उनमें जनता की स्वतंत्रता और गरिमा का विशेष ध्यान रखा गया है जबकि भारत में पुलिसिया अत्याचार- रामलीला मैदान, सोनी सोरी आदि- आज भी अंग्रेजी शासन के समान ही बदस्तूर जारी हैं और लोकतंत्र के सभी स्तम्भ मूकदर्शक बने हुए हैं| भारत के ही पडौसी देश श्रीलंका के संविधान के अनुच्छेद 11 में प्रावधान है कि किसी को भी अमानवीय या निम्न श्रेणी का व्यवहार, निर्दयी यातना या दंड नहीं दिया जायेगा| अनुच्छेद 14 में आगे कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक को प्रकाशन सहित भाषण और अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सम्मलेन, संगठन बनाने, श्रम संगठन बनाने और उसमें शामिल होने, श्रीलंका के भीतर विचरण और निवास व श्रीलंका लौटने का अधिकार होगा| अनुच्छेद 24 में यह प्रावधान है कि सम्पूर्ण श्रीलंका में न्यायालयों की भाषा सिंहली और तमिल होगी| अनुच्छेद 107 में यह प्रावधान है कि प्रत्येक न्यायाधीश अपने अच्छे आचरण के साथ पद धारण करेगा और संसद को संबोधन के पश्चात राष्ट्रपति के आदेश के बिना नहीं हटाया जायेगा जोकि संसद के बहुमत वाले सदस्यों द्वारा समर्थित हो| अनुच्छेद 111 के अनुसार  उच्च न्यायालय न्यायाधीश को न्यायिक सेवा आयोग की अनुशंसा पर अटॉर्नी जनरल से परमार्श पर नियुक्त किया जायेगा और वह न्यायिक सेवा आयोग की अनुशंसा पर राष्ट्रपति के अनुशासनिक नियंत्रण और पद से हटाये जाने के अधीन होगा|

उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आज हमारी बहुत सी आर्थिक, न्यायिक, सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं की जड़ें हमारे  संविधान से ही निकलती हैं| वस्तुत: यह प्रारंभ से ही अस्पष्ट और दोषपूर्ण रहा है| इस अस्पष्टता में ताकतवर लोगों द्वारा कमजोर, दलित और बेसहारा वर्ग के आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक और मानसिक शोषण के लिए पहले से ही पर्याप्त गुन्जाइस छोड़ी गयी थी जिसका आज खुलकर दुरूपयोग हो रहा है| आज दंड प्रक्रिया संहिता में तो प्रावधान अवश्य है कि किसी महिला के बयान पुलिस उसके घर पर ही लेगी किन्तु भारत सरकार अधिनियम,1935 के प्रतिरूप हमारे इस संविधान की ताकत पर ही पुलिस को आज भी अपने कर्कश स्वर में किसी महिला को फोन पर  निस्संकोच यह कहते सुना जा सकता है कि हम तुम्हारे नौकर नहीं हैं, यहाँ आओ और बयान दो वरना तुम्हें पकड़कर ले जायेंगे| हमारे संविधान में लोकतंत्र के सेवकों के अधिकारों, शक्तियों और विशेषाधिकारों की तो भरमार है किन्तु उनके दायित्व, कर्तव्यों और आचरण के नियमों को देश के सम्पूर्ण कानून में भी नहीं ढूंढा जा सकता है| देश की न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका के कार्य की न्यायिक समीक्षा करने और निर्देश देने का अधिकार है अत: पीड़ित और शोषित वर्ग का यह अनुमान है कि यह सब कुछ न्यायपालिका के सक्रिय अथवा निष्क्रिय सानिद्य व संरक्षण के अंतर्गत ही संभव है| सभी ताकतवार लोग इस अस्पष्ट संविधान का समय-समय पर अपनी सुविधानुसार और मनमाना अर्थ लेते हैं और दिन प्रतिदिन उजागर होते नित नए घोटालों पर एक नज़र डालें तो भी यही संकेत मिलता है कि आज भारतीय संविधान अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में पूरी तरह विफल है| जब तक इस दोषपूर्ण संविधान की पूर्ण सफाई नहीं कर दी जाती तब तक आम जनता के लिए यह भ्रम मात्र है कि देश में उनकी रक्षा करने वाले कानून हैं अथवा कानून का राज है| देश की स्वतंत्रता को एक लंबा समय व्यतीत होने बावजूद आमजन की समस्याएं द्रुत गति से बढ़ी हैं और आमजन को राहत की कोई सांस नहीं मिली है| जनतंत्र में प्रजा को राहत की आशा अपने चुने गए प्रतिनिधियों से ही हो सकती है किन्तु देश के नेतृत्व में अपनी भूल स्वीकार करने का साहस नहीं है परिणामत: यह दोषपूर्ण संविधान आज तक जारी है| हमारे लोकतंत्र पर मात्र न्यायपालिका ही भारी नहीं पड़ रही है अपितु  प्रजातंत्र के सभी स्तंभ अपने संविधान सम्मत कर्तव्यों की पालना में जन आकांक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं|
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Mani Ram Sharma

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[justify]पुलिस द्वारा अवैध हिरासत एवं गिरफ्तारी के बम्बई उच्च न्यायालय के प्रकरण दाण्डिक रिट याचिका  संख्या  1666-10 -सुश्री वीणा सिप्पी बनाम नारायण दुम्ब्रे आदि के निर्णय दिनांक 05.03.2012 के लिए महिला याचिकाकर्त्री सुश्री वीणा सिप्पी  इस साहसिक कार्य के लिए धन्यवाद की पात्र है जिसने महाराष्ट्र पुलिस जैसे भयावह संगठन से मुकाबला किया है| प्रकरण के तथ्य इस प्रकार हैं कि वीणा ने दिनांक  4.4.08 को गामदेवी पुलिस थाने में एक शिकायत प्रस्तुत की थी अत: वह दिनांक  5.4.08 को लगभग 5 बजे सांय एफ आई आर की नकल लेने थाने गयी | ड्यूटी पर उपस्थित पुलिस कर्मी ने बड़ा अभद्र व्यवहार कर बताया कि कोई एफ आई आर दर्ज नहीं हुई है  और न ही दर्ज होगी | उसी भवन की प्रथम  मंजिल पर सहायक पुलिस आयुक्त का कार्यालय है| यद्यपि  सहायक पुलिस आयुक्त से मिलने का समय सांय 4 से 6 बजे निर्धारित है किन्तु उसने याचिकाकर्त्री की उपस्थिति का ज्ञान होने पर अपना चेंबर अंदर से बंद कर लिया और सन्देश भेजा कि वह 10 मिनट इन्तजार करे|
कई बार दरवाजा खटखटाने के बाद भी उसने दरवाजा नहीं खोला और अंतत: यह सूचित किया गया कि वह ड्यूटी ऑफिसर के पास जाकर एफ आई आर लिखवाये| याचिकाकर्त्री ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों से कहा कि यदि एफ आई आर नहीं लिखी गयी तो वह संयक्त आयुक्त से मिलेगी| इतना कहते ही उसने याचिकाकर्त्री से कहा कि उसने याचिकाकर्त्री जैसे कई देखें और वह उसे भी सबक सिखायेगा|
याचिकाकर्त्री को पुलिस ने अवैध रूप से गिरफ्तार कर पुलिस लोक अप में डाल दिया और उस पर बम्बई पुलिस अधिनयम, 1959 की धारा 117 सहपठित 112 के आरोप मिथ्या रूप से गढ़ दिए गए| यही नहीं याचिकाकर्त्री की गिरफ्तारी का कोई पंचनामा तक तैयार नहीं किया गया और न ही उसकी 90 वर्षीय वृद्ध और बीमार माता को कोई सूचना दी गयी किन्तु इन सभी अभियोगों से बचाव के लिए पुलिस ने फिर कुछ फर्जी दस्तावेज गढे और महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया| मजिस्ट्रेट के समुख प्रस्तुत करने पर उसे  व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा कर दिया गया व अंतत: मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्त्री को दोषमुक्त कर दिया|
 
माननीय न्यायालय ने  याचिकाकर्त्री की गिरफ्तारी को अवैध पाया है और  प्रासंगिक प्रकरण में निर्णय प्रसारित करते हुए अन्य बातों के साथ साथ कहा है कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्त्री को 250000रुपये क्षतिपूर्ति जिस दिन उसे अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया अर्थात दिनांक 05.04.2008 से 8% वार्षिक ब्याज सहित दिलाना उचित समझते हैं| राज्य सरकार इस क्षतिपूर्ति का भुगतान करेगी| याचिकाकर्त्री इस न्यायालय में कम से कम 22 बार उपस्थित हुई जिसके लिए हम 25000रुपये खर्चे के दिलाना उपयुक्त समझते हैं| राज्य सरकार इस क्षतिपूर्ति और खर्चे की, दोषी अधिकारियों का दायित्व निर्धारित करने के पश्चात, उनसे वसूली करने को स्वतंत्र है|

मेरे विनम्र मतानुसार जिन अभियोगों के लिए अधिकतम दंड मात्र 1200रुपये अर्थदंड ही हो और कारावास का कोई प्रावधान ही न हो उन अभियोगों में तो गिरफ्तार करना सरासर अनुचित और अवैध है| जब गिरफ्तारी मूल रूप से अवैध हो तो गिरफ्तार व्यक्ति से जमानत /मुचलके की अपेक्षा ही क्यों की जाय अर्थात मजिस्ट्रेट को उसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 59 के अंतर्गत बिना शर्त रिहा करना चाहिए था|


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Mani Ram Sharma

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[justify]श्री रमेश कुमार अग्रवाल अपने परिवार- पत्नि, तीन पुत्रियों और एक पुत्र मास्टर प्रथम- के साथ दिल्ली में अपने मकान की दूसरी मंजिल पर रहते थे| उन्होंने अपने ड्राइवर जीतू की सिफारिश पर संजय नामक एक नौकर को पांच दिन पूर्व ही काम पर रखा था| संजय (अभियुक्त) उनके निवास की छत पर निर्मित एक कमरे में रहता था| घटना के दिन वे अपनी पत्नि  और बच्चों के साथ टेलीवीजन देख रहे थे| लगभग रात्री के 10 बजे उसके तीनों बच्चे –पुत्री एक्स ,वाई और (मृतक) पुत्र मास्टर प्रथम अपने कमरे में चले गए जबकि अभियुक्त उनके कमरे में 11.15  बजे तक रहा| अभियुक्त टेलीवीजन देखते हुए उनके पैर दबाता रहा और तत्पश्चात चला गया| श्री अग्रवाल और उनकी पत्नि सो गए| लगभग रात्रि के 12.45  बजे उनकी पुत्री एक्स खून से सनी हुई और दर्द से कराहती हुई अचानक उनके कमरे में आई |

उसने उनको बताने के बाद  कि अभियुक्त ने उसे चोट पहुंचाई है,  बिस्तर पर गिर पड़ी और बेहोश  हो गयी| इसी बीच वाई जोकि खून से सनी हुई थी वह भी आ गयी और उसने बताया कि अभियुक्त ने उसको व प्रथम को चोट पहुंचाई है जिस पर श्री अग्रवाल व उनकी पत्नि अपने बच्चों के कमरे की ओर दौड़े| वहाँ उन्होंने देखा कि प्रथम खून के तालाब के बीच में पड़ा है और उसकी गर्दन में चाकू फंसा हुआ है| यह देखने के बाद उन्होंने चिल्लाहट की और अपने बच्चों को पड़ौसियों और रिश्तेदारों की मदद से सुन्दरलाल जैन अस्पताल ले गए| मास्टर प्रथम को पूर्व में ही मृतक  घोषित कर दिया गया| दोनों पुत्रियों की हालत भी नाज़ुक बताई गयी| अभियुक्त ने प्रथम को मार दिया था और दोनों पुत्रियों पर प्राण घातक हमला किया था|

तत्पश्चात अभियुक्त घर से गायब हो गया| इस बीच घायल पुत्री एक्स का अस्पताल में ओपरेशन हुआ और डॉ सीमा पाटनी ने  रिपोर्ट तैयार की जिसमें कहा गया कि उसकी छाती पर चाकू की कई चोटें आयीं और उसके शरीर पर 10 घाव पाए गए| डॉ सीमा ने यह भी लिखा कि उसके शरीर पर पाई गयी चोटें खतरनाक प्रकृति की हैं|
आपराधिक  न्याय तंत्र रात्रि को 1.05 पर सक्रिय हो गया जब मोबाइल से सूचना पर पुलिस कट्रोल रूम में इस आशय की प्रविष्टि दर्ज कर ली गयी थी| हैड कानिस्टेबल जय कुमार ने यह सूचना तुरंत ही पुलिस थाना रूप नगर को भेज दी | सम्बंधित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अपने निर्णय दिनांक 04.10.08 से भारतीय दंड संहिता की धारा 302(हत्या), 307(हत्या का प्रयास), 376( बलात्कार), 379(चोरी)  के अंतर्गत अभियुक्त को दोषी पाया| यद्यपि संजय पर धारा 392(लूट  ) का आरोप था किन्तु  उसे कम गम्भीर आरोप यानी धारा 379 के अंतर्गत दोषी पाया गया| जहाँ तक दंड का प्रश्न था अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सख्ततम दंड मृत्यु दंड से दण्डित करने हेतु आदिष्ट किया और मामला राज्य बनाम संजय दास पुष्टि हेतु दिल्ली उच्च न्यायालय भेजा गया| उच्च न्यायालय के सामने अभियुक्त पक्ष की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि प्रथम की माँ के बयानों में अंतर है अतः उसे विश्वसनीय नहीं माना जा सकता| किन्तु न्यायालय ने कहा कि  एक साक्षी यद्यपि पूर्णत सत्य बोल  सकता है किन्तु न्यायालय के वातावरण से घबरा सकता है और प्रति परीक्षा से घबराने पर हतास हो सकता है जिस कारण वह घटनाओं की क्रमिकता के सम्बन्ध में भ्रमित हो सकता है और उस समय अपनी कल्पना के आधार पर पूर्ति करना संभव है|
उच्च न्यायालय के सामने अपील एवं मृत्यु दंड पुष्टि रेफरेंस दोनों पहुंचे और उस पर सुनवाई की गयी| उच्च न्यायालय ने मास्टर  प्रथम की हत्या, कुमारी एक्स की हत्या के प्रयास और उसके साथ बलात्कार के अभियोग का दोषी पाया| कुमारी वाई की हत्या के प्रयास के अभियोग को संशोधित कर गंभीर चोट पहुँचाने का दोषी पाया| उसे धारा 379 के आरोप के दोष से मुक्त कर दिया गया| दंड के विषय में उच्च न्यायालय का विचार था कि अभियुक्त की उम्र अपराध के समय 20 वर्ष के लगभग रही है और वह एक बच्ची का पिता भी है| बच्ची के संरक्षण के लिए पिता के साये की आवश्यकता है| इन परिस्थितियों को देखते हुए मास्टर प्रथम की हत्या के अभियोग में आदेश दिनांक 27.10.09 से मृत्युदंड के स्थान  पर इस निर्देश सहित आजीवन कारावास से दण्डित किया गया की उसे 25 वर्ष की अवधि से पूर्व रिहा नहीं किया जायेगा| अन्य अभियोगों के सम्बन्ध में उपरोक्तानुसार अधिकतम दंड रखा गया और मृत्यु दंड की पुष्टि से मना कर दिया गया|


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[justify]दिनांक 18.6.2004 को कैलाश जोशी ने अपने आपको मेमोरियल ट्रस्ट का संयोजक बताते हुए राज्य के प्रमुख सचिव, आवासन विभाग ,मध्यप्रदेश सरकार को ग्राम बावडिया कलां के खसरा न. 83, 85/1 और 85/2 में तीस एकड़ भूमि मेमोरियल ट्रस्ट के पक्ष में आरक्षित करने के लिए आवेदन किया ताकि वह कुशाभाऊ ठाकरे की स्मृति में एक प्रशिक्षण संस्थान बना सके| यद्यपि यह पत्र प्रमुख सचिव को संबोधित था किन्तु किन्तु वास्तव में आवासन मंत्री बाबूलाल गौर को दिया गया था| इसे मंत्री महोदय द्वारा प्रमुख सचिव, आवासन विभाग को तुरंत कार्यवाही के लिए भेज दिया गया | इस पत्र पर आश्चर्यजनक रूप से द्रुत गति से कार्यवाही हुई और भूमि आवंटित हो गयी| अपीलार्थी संसथान- अखिल भारतीय उपभोक्ता कांग्रेस को इसका ज्ञान होने पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय  में रिट दाखिल की जोकि खंड पीठ ने यह कहते हुए संक्षिप्तत: निरस्त कर दी कि याची के किसी अधिकार का हनन नहीं हुआ है और जमीन सरकार की है और यह सरकार ने तय करना है कि वह अपनी नीति के अनुसार जमीन किसे दे| उच्च न्यायालय के इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गयी|

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मध्यप्रदेश राज्य के इस प्रकरण में भूमि के आरक्षण हेतु एक्स द्वारा मेमोरिअल ट्रस्ट के संयोजक की हैसियत में आवेदन किया गया किन्तु प्रत्यर्थिगण ने कोई भी ऐसा दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह स्थापित होता हो कि आवेदन की तिथि को यह ट्रस्ट पंजीकृत था| 30 एकड़ भूमि आरक्षित करने और 20 एकड़ भूमि आवंटित करने से पूर्व अखबार में या अन्य किसी उपयुक्त माध्यम में उपयुक्त संस्थानों से आवेदनपत्र आमंत्रित करने हेतु कोई विज्ञापन नहीं दिया गया और प्रत्येक अर्थ में  राजनैतिक और राज्य के गैरराजनैतिक कार्यकारियों ने इस प्रकार भूमि को आवंटित किया मानों कि वे मेमोरिअल ट्रस्ट को भूमि आवंटन के कर्ताव्यधीन हों| सभी ट्रस्टी राजनैतिक दल विशेष के सदस्य रहे हैं और भू आरक्षण व आवंटन की समस्त प्रक्रिया और अधिकांश प्रीमियम की छूट इसलिए दी गयी कि राज्य के राजनैतिक कार्य कर्ता को लाभ देना चाहते थे| सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय उपभोक्ता कांग्रेस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (मनु/सुको /0345/2011) के निर्णय में कहा है कि राज्य या इसकी  एजेंसियां राजनैतिक संस्थानों/या राज्याधिकारियों  की इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को खैरात  या लाभ  नहीं दे सकती| ऐसा लाभ  पारदर्शी और निश्चित नीतिगत सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए | विवादित भूमि का लाभार्थी को आवंटन संविधान के अनुच्छेद 14 और मध्य प्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम ,1973 के प्रावधानों के विपरीत है|


सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि भोपाल विकास योजना में जो भूमि आरक्षित की गयी एवं एक पक्षकार को आवंटित की गयी को सार्वजानिक और अर्ध-सार्वजानिक (स्वास्थ्य) उद्देश्य के लिए दर्शाया गया था |राज्य सरकार ने अधिनियम की धारा 23 क 1 (क) की शक्तियों के प्रयोग में एक पक्षकार द्वारा संस्थापित संस्था को सुविधा देने के लिए योजना को संशोधित किया और न कि भारत सरकार या राज्य सरकार या उसके उपक्रमों के लिए| भूउपयोग परिवर्तन की कार्यवाही जोकि योजना में संशोधन करती है मात्र एक कोरी औपचारिकता है क्योंकि भूमि का एक पक्षकार को आवंटन  अधिनियम की धारा 23 क 1 (क) के अंतर्गत अधिसूचना जारी होने से 2 वर्ष पूर्व ही कर दिया गया था| अतः योजना में संशोधन अधिकार क्षेत्र से बाहर था| खंड पीठ का आदेश निरस्त किया जाता है,  पक्षकार को  20 एकड़ भूमि का आवंटन  अवैध घोषित कर निरस्त कर अपील अनुमत की गयी|
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Mani Ram Sharma

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[justify]संयुक्त राज्य अमेरिका के (आठवें सर्किट) अपील न्यायालय ने संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम माईकल एंजिलो बर्मियो द्वारा दिनांक 16.06.11 को दायर अपील के निर्णय दिनांक 30.09.11 में कहा है कि  फरवरी 2009 में एक 15 वर्षीय बालिका जे. ने  स्कूल के अधिकारियों को सूचित किया कि उसके साथ माईकल बर्मियो, जो कि स्काउट टुकड़ी का नेता होते हुए वर्ष 2007 की गर्मियों में उसके परिवार के साथ रहा था, द्वारा ब्लात्संग किया गया है| अनुसंधान में बर्मियो के मोबाइल व कंप्यूटर  पर जे. व उसकी 13 वर्षीय बहिन के कामुक चित्र और एक वयस्क पुरुष के साथ जे. के अश्लील चित्रों का विडियो पाए गए|
 {यहाँ उल्लेखनीय है कि एक बालिका द्वारा अपने स्कूल प्रशासन को सूचित करने मात्र से मामला शुरू हो गया और आजीवन कारावास की सजा मिल गयी जबकि भारत में तो स्थिति यह है कि ऐसी सूचना देने पर  पुलिस तो दूर मजिस्ट्रेट भी कार्यवाही में आनाकानी करते हैं| अन्य विशेषता यह प्रकट होती है कि वहाँ के न्यायालय मामला दायर एवं निर्णय होने दोनों की तिथियाँ शीर्षक पर ही दे देते हैं जिससे प्रथम दृष्टया ही मामले में लगा समय ज्ञात हो जाता है व पारदर्शिता बनी रहती है जबकि भारत में तो पारदर्शिता से सर्वाधिक परहेज तो न्यायपालिका को ही है| उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि मामले के निर्णय में दायर एवं निर्णय की तिथि सूचित की जायेगी किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं किया जा रहा है| अमेरिकन मामले का अन्य सुखद पहलू यह है कि इतने गंभीर मामले में भी अपील में निर्णय लगभग मात्र 105 दिन में हो गया जिसकी भारत में कल्पना ही नहीं की जा सकती क्योंकि यहाँ तो नोटिस की तामील के लिए प्रथम पेशी में ही 90 दिन से भी अधिक समय देने में भारत की न्यायपालिका को कोई संकोच नहीं होता है|}
 मामले में आगे अनुसंधानकर्ताओं को ज्ञात हुआ कि बर्मियो ने जे. के साथ वर्ष 2007 के अंत से कामुक दुर्व्यवहार व प्रकृति  विरुद्ध अपराध किया|  बर्मियो ने आरोप स्वीकार कर लिए और उस पर बाल अश्लील चित्रण के सात अभियोग लगाये गए थे| बर्मियो की गिरफ़्तारी के बाद उसकी स्वयं की 12 वर्षीय पुत्री ओ. ने भी सूचित किया कि उसने उसका (पुत्री का) भी छः वर्षों से नियमित रूप से, कामुक व प्रकृति  विरुद्ध अपराध सहित, शोषण किया और जब बर्मियो ने जे. के साथ संसर्ग किया तब वह उपस्थित थीं|

प्रकरण में निचले विचारण (जिला) न्यायालय ने अवयस्कों के साथ बारम्बार और खतरनाक कामुक अपराधों के लिए आजीवान कारावास से दण्डित किया था| बर्मियो ने अपराध स्वीकार कर लिया किन्तु उसका तर्क था कि उसने अश्लील चित्रों को आगे प्रसारित नहीं किया अतः उसने परामर्शी दिशानिर्देशों (जो कि न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं हैं) में इस अपराध के लिए विहित न्यूनतम 262 माह के कारावास की प्रार्थना की और दूसरी ओर सरकार ने अधिकतम 327 माह के कारावास की प्रार्थना की किन्तु अनुसंधान पक्ष ने एकाधिक पीड़ित व्यक्तियों का फार्मूला सुझाया और आजीवन कारावास की अनुशंसा की|
{भारत में न्यायपालिका के लिए विवेकाधिकार का स्वछन्द मैदान उपलब्ध है| यहाँ अधिकांश अपराधों में अधिकतम दण्ड की सीमाएं दी गयी हैं और न्यूनतम दण्ड निर्धारित न होने से, अपवित्र करणों से कानून की व्याख्याएं प्रायः अभियुक्तों के पक्ष में ही की जाती हैं| जहाँ कहीं न्यूनतम और अधिकतम सीमाएं हैं उनके मध्य अंतर भी काफी लंबा है अतः वे सीमाएं ही बेमानी हो जाती हैं| उक्त प्रकरण में  न्यूनतम और अधिकतम दण्ड अवधि के बीच अंतर कम यानि 20% ही है जबकि भारत में यह अंतर 90% तक पाया जाता है|
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 55 के  अनुसार  भारत में आजीवन कारावास की प्रभावी अवधि 14 वर्ष मात्र है जबकि अमेरिका में यह अवधि 30 वर्ष निर्धारित है| अमेरिका में अभियोजन पक्ष -सरकार के अतिरिक्त अनुसन्धान एजेंसी एवं पीड़ित पक्षकार की स्वतंत्र भूमिकाएं हैं व न्यायालय अभियोजन की मांग से भी अधिक दण्ड दे सकता है| भारत में परम्परा यह है कि एक से अधिक अपराधों की स्थिति में अधिकतम दण्ड वाले अपराध की सीमा तक दण्ड देकर न्यायालय अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और आदेश में यह उल्लेख कर दिया जाता है कि  सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी जबकि उक्त अमेरिकी मामले में ऐसा नहीं करके बलात्संग के लिए निर्दिष्ट अधिकतम 327 माह के दण्ड से भी कठोर किन्तु अधिकतम 360 माह का दण्ड  दिया गया है| अन्य उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि अमेरिका में (यु एस कोड धारा 920) कामुकता से संबंधित दुराचार व यौन हिंसा की सूची पर्याप्त लंबी व व्यापक है और अभद्र प्रदर्शन भी इस श्रेणी के अपराधों में आता है| इस प्रकार हमारी विधायिकाएं एवं न्यायपालिका दोनों ही अपराधियों के लिए ज्यादा अनुकूल हैं|

अमेरिकी व्यवस्था के संबंध में अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत में अधिकांश मामलों में न्यूनतम दण्ड सीमा न होने, कुछेक मामलों में न्यूनतम व अधिकतम सीमाओं में भारी अंतर होने और दण्ड के लिए स्पष्ट दिशानिर्देशों के अभाव  में मनमानेपन को बढ़ावा मिलता है| इसके ठीक विपरीत अमेरिका एवं इंग्लैंड में दण्ड परिषद कार्यरत हैं जो कि  दण्ड के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करती हैं यद्यपि ये निर्देश न्यायालयों पर बाध्यकारी नहीं हैं किन्तु सामान्यतया  इनका अनुसरण किया जाता है और विशेष परिस्थितियों व कारणों से ही न्यायालय इन दिशानिर्देशों से भिन्न सजा देते हैं|}
अपराध की गंभीरता को देखते हुए पीडिता जे. और उसका परिवार आजीवन कारावास के पक्ष में थे क्योंकि अन्य बच्चों को बोर्मियो से बचाने का यही एक मात्र रास्ता था| तदनुसार जिला न्यायालय ने उसे 360 माह के कारावास से दण्डित किया था| अपील में बोर्मियो की आपति यह रही कि जिला न्यायालय ने दण्डित करने में विवेकाधिकार का दुरूपयोग किया है|
अपीलीय न्यायालय ने आगे विवेचना करते हुए कहा  कि एक न्यायाधीश द्वारा विवेकाधिकार का दुरूपयोग तब कहा जाता है जब वह ऐसे सम्बंधित तथ्य का विचारण नहीं करता जो महत्वपूर्ण हो, अथवा  असंबंधित या अनुचित तथ्य को महत्त्व दिया हो या महत्त्वपूर्ण तथ्यों को उचित महत्त्व देने में स्पष्ट गलती की हो| दण्ड देते समय विचारण न्यायालय ने दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत समस्त सामग्री एवं तर्कों पर ध्यान दिया है| न्यायालय ने यह भी पाया कि उसने बोर्मियो के अपराध की गंभीरता और उससे समाज को उत्पन्न भयंकर खतरे का भी मूल्यांकन किया है| न्यायालय ने कहा कि आखिर हिंसा का चक्र कहीं रुकना चाहिए था किन्तु बोर्मियो तुमने तो तीन शिकार/पीडितों का शोषण किया है| बोर्मियो का यह तर्क था कि उसने अश्लील चित्रों का आगे वितरण नहीं किया अतः उसके साथ नरमी बरती जानी चाहिए किन्तु न्यायालय का यह दृष्टिकोण था कि इस बात की पूर्ति तो इस अपराध की गंभीरता व इस अति ने कर दी है कि पीडितों को हुई  क्षति की कभी भी पूर्ति नहीं हो सकेगी| यह एक उपयुक्त मामला है जहाँ अधिकतम दण्ड देना बोर्मियो जैसे अपराधी के लिए उपयुक्त है| न्यायालय नहीं समझता कि इससे कम दण्ड देने से जनता सुरक्षित रह सकेगी अथवा वास्तव में इस असाधारण रूप से गंभीर अपराध के लिए कोई अन्य दण्ड पर्याप्त हो सकेगा| पीडितों  के साथ संबंधों का जिस प्रकार बोर्मियो ने नाजायज लाभ उठाया वह समाज के सामने भयावह दृश्य प्रस्तुत करता है और उसी अपराध की बारम्बरता को देखते हुए दण्ड पूर्णतः न्यायोचित और न्यायालय की शक्ति के भीतर है| इस प्रकार न्यायालय द्वारा विवेकाधिकार का कोई दुरूपयोग नहीं हुआ है और तदनुसार अपील ख़ारिज कर अधीनस्थ न्यायालय के दण्ड आदेश की पुष्टि कर दी गयी|
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Mani Ram Sharma

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[justify]यह आदिकाल से स्थापित है कि न्याय देना राजा का कर्तव्य है अत: नैतिकत: इसके लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए| किन्तु भारत में तो न्याय के लिए मात्र शुल्क ही नहीं लिया जा रहा है अपितु कई राज्यों की तो स्थिति यह पाई गयी कि न्यायालयों पर होने वाले खर्चे से भी ज्यादा सरकार को आय हो रही थी| सरकार से कोई सेवा लेने के लिए सामान्यतया उस पर होने व्यय के अनुपात में ही शुल्क लिया जाना चाहिए| हमारे संविधान के अनुसार न्यायशुल्क का विषय राज्यों के लिए सुरक्षित है अत: विभिन्न राज्य सरकारों ने अपनी सुविधानुसार कोर्ट फीस तय कर रखी है| उक्त विसंगति के कारण विभिन्न राज्यों में कोर्ट फीस कानून को चुनौती दी गयी और ये सभी प्रकरण अंतिम निर्णय हेतु सुप्रीम कोर्ट के पास आये|   
सुप्रीम कोर्ट ने पी.एम. अश्वथानारायन शेट्टी बनाम कर्नाटक राज्य (एआईआर 1989 एससी 100) में स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के पास प्रचुर मात्रा में आर्थिक संसाधन है वे अपना दावा चलाने या अपने विरूद्ध दावे की रक्षा करने की लाभप्रद स्थिति में होते हैं। हुगबी बनाम हुगबी के मामले में कहा गया है कि यदि सम्राट न्याय के लिए खर्चा लेते हैं तो ऐसा शुल्क न्यूनतम डाक शुल्क के समान होना चाहिए, कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे मुकदमे की यात्रा कितनी भी लम्बी हो शुल्क समान होना चाहिए। क्योंकि यह मुकदमा करने वाले का कोई दोष नहीं है कि न्यायाधीश के सामने निर्धारण हेतु अन्य मुकदमे की तुलना में  अधिक कठिन प्रश्न उपस्थित किये जाते हैं और न्यायालय में लम्बी सुनवाई होगी। एक प्रार्थी  न्याय के लिए कुछ कह रहा है न कि मकान जायदाद किराये पर ले रहा है जिसका किराया समय के हिसाब से लिया जाता है।
न्यायालय ने आगे कहा है कि  पुलिस के लिए सरकार को प्रत्येक व्यक्ति कर चुकाता है किन्तु कुछ लोग अन्य लोगों की तुलना में पुलिस का अधिक प्रयोग करते हैं। इसकी कोई शिकायत भी नहीं करता। यदि आपके यहां सेंधमारी हो जाये या पुलिस वाले की आवश्यकता पड़े तो बार-बार विशेष शुल्क नहीं देना पड़ता। वास्तव में न्याय तक पहुंच शब्दावली सामाजिक आवश्यकता की गंभीर एवं शक्तिशाली अभिव्यक्ति है जो कि जरूरी और अधिक विस्तृत है। न्याय तक पहुँचने में न्याय शुल्क अपने आप में बाधक है। दूसरे शब्दों में न्याय देने  पर कर नहीं लगाया जा सकता और भवन निर्माण, शिक्षा या अन्य लाभप्रद योजनाओं की भांति न्याय के लिए राज्य भुगतान की मांग नहीं कर सकता।

झूठे और तंगकारी  दावे दायर होना एक बड़ी बुराई है किन्तु यह एक बुराई है जिसके लिए मात्र सरकार और उसके एजेन्ट ही दोषी हैं जिसके लिए उसे सबसे शक्तिशाली उपचार के रूप में प्रमाणित करना है| अनुचित मुकदमेबाजी को टालने के लिए आवश्यक  है कि निर्णय न्यायपूर्ण हो। कोई व्यक्ति जीतने की आशा के अतिरिक्त न्यायालय नहीं जाता है। कोई भी व्यक्ति अनुचित/झूठे  मामले में जीत की आशा नहीं रखता यदि उसे विश्वास  नहीं है कि मामला बुरे कानून या बुरे न्यायाधीश द्वारा निर्णित होगा। राजस्थान और कर्नाटक राज्य के कोर्ट फीस और न्यायालय पर खर्चे के आंकड़ों को देखने से यह लगता है कि ये फीस की बजाय कर जैसे हैं|
 बेईमानीपूर्ण दावे सामान्यतया प्रस्तुत नहीं होंगे यदि जनता को न्याय प्रशासन के विषय में उचित होने का विश्वास हो। राज्यों के लिए वांछनीय है कि प्रारम्भ स्लेब अर्थात् रूपये 15000 तक के दावों पर नाम मात्र का 2 से 2.5%  शुल्क लिया जाना चाहिए ताकि छोटे दावे न्याय से वंचित न हो जाये। न्यायालय ने सामाजिक न्याय की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए बड़ी राशि के दावों पर बढ़ाते हुए क्रम में न्याय शुल्क लेने को कहा और राज्य सरकारों से अपेक्षा की कि वे उक्त बातों पर ध्यान दें और न्याय शुल्क को एक तर्कसंगत ढाँचे में लाएं|
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Mani Ram Sharma

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[justify]मासिक पत्रिका सूर्य की संपादिका मेनका संजय गांधी पर बम्बई के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के न्यायालय में रामजेठमलानी की पुत्री रानी जेठमलानी  द्वारा मानहानि का दवा प्रस्तुत किया गया| उक्त मामले को कई आधारों पर दिल्ली के न्यायालय में अंतरित करने का सुप्रीम कोर्ट से  निवेदन किया गया|मामले में, अन्य बातों के साथसाथ यह अंदेशा व्यक्त किया गया कि बम्बई में अभियुक्त को खतरा हो सकता है तथा बड़े लोगों का मामला होने से भीड़ इक्कठी होने से सुनवाई भी बाधित हो सकती है| सुप्रीम कोर्ट ने मेनका संजय गांधी बनाम रानी जेठमलानी (1979 एआईआर 468) में कहा है कि हमें याची के आधारों की इस नियम के सन्दर्भ में परीक्षा करनी है कि सामान्यतया शिकायतकर्ता को यह अधिकार है कि क्षेत्राधिकार वाले  न्यायालयों में से चुनाव करे और अभियुक्त इस बात पर हावी नहीं हो सकता कि उसके विरूद्ध किस न्यायालय में अन्वीक्षा की जाय। न्यायालय की कार्यवाहियों  के व्यवस्थित संचालन का मजिस्ट्रेट स्वामी है। यदि धमकाने से उसका कार्य बाधित होता है तो उसकी प्राधिकृति नहीं लंगड़ानी चाहिए। भीड़ न्यायिक प्रक्रिया के गियर एवं पहियों को व्यवस्था से बाहर कर सकती है। पक्षकार के अपना मामला या परीक्षण में भाग लेना की क्षमता को सुनियोजित भय बाधित कर सकता है।
न्यायालय ने आगे कहा कि किसी भी मामले का उचित परीक्षण मूलभूत आवशयकता है| अन्वीक्षण न्यायालय को अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए, आवश्यक अवसरों को छोड़ते हुए, अपनी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। उक्त टिप्पणियों सहित याचिका को निरस्त कर दिया गया और मजिस्ट्रेट न्यायलय से अपेक्षा की गयी कि मामले की उचित सुनवाई निश्चित करे|
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Mani Ram Sharma

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[justify]एक सिविल ठेकेदार की बिहार राज्य बिजली बोर्ड के सहायक अभियंता के विरुद्ध एक हज़ार रुपये की रिश्वत मांगने की शिकायत के आधार पर पुलिस अधीक्षक अपराध अनुसंधान विभाग (सतर्कता) ,मुज़फरपुर  द्वारा तलाशी ली गयी| उक्त कार्यवाही में अभियुक्त वकील प्रसाद सिंह सहायक अभियंता की जेब से रसायन लगे नोट बरामद किये गए| तत्पश्चात अनुसंधान के बाद दिनांक 28.02.82 को  पुलिस निरीक्षक द्वारा आरोप पत्र दाखिल किया गया| मजिस्ट्रेट ने 09.12.82  को प्रसंज्ञान लिया और 06.07.87 तक कोई प्रगति नहीं हुई| दिनांक 07.12.90 को अपीलार्थी अभियुक्त ने पटना उच्च न्यायलय में याचिका दायर कर मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए प्रसंज्ञान को इस आधार पर चुनौती दी कि जिस निरीक्षक ने आरोप पत्र दाखिल किया है उसे क्षेत्राधिकार ही नहीं है और उच्च न्यायालय ने उसी दिन प्रसंज्ञान आदेश निरस्त कर तीन माह की अवधि में अनुसंधान पूर्ण करने के निर्देश दिए| वर्ष 1998 तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई | ( लेखकीय टिपण्णी – इससे ज्ञात होता है न्यायालयों की आदेशों का  पुलिस कितना सम्मान करती है और इस असम्मान को न्यायालय किन अज्ञात कारणों से देख और सहन कर रहे हैं| )  अपीलार्थी ने पुनः उच्च न्यायालय में याचिका दायर की कि सात वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत होने के बावजूद अभी तक कोई प्रगति नहीं हुई है और अपीलार्थी का अनुचित उत्पीडन हो रहा है अत: सम्पूर्ण कार्यवाही को निरस्त किया जाये| और जब नौ वर्ष बाद 2007 में मामला अंतिम सुनवाई हेतु आया तब अभियोजन पक्ष ने और समय चाहा| उच्च न्यायालय ने अन्वीक्षण न्यायालय को दिन प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई का आदेश दिया और चार माह में सुनवाई पूर्ण करने का भी आदेश दिया|


उच्च न्यायालय के इस आदेश  से व्यथित होकर अपीलार्थी ने यह याचिका उच्चतम न्यायलय के समक्ष पेश की| सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रसाद सिंह बनाम बिहार राज्य के निर्णय दिनांक 23.01.09 में कहा है कि ऐसी प्रक्रिया जो तर्क संगत त्वरित अन्वीक्षा सुनिश्चित नहीं करती उसे तर्कसंगत, उचित या न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता और यह अनुच्छेद 21 के क्रम में दूषित है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अन्वीक्षण का अर्थ तर्कसंगत त्वरित अन्वीक्षण से है जो कि अनुच्छेद 21 के अर्थ में जीवन तथा स्वतन्त्रता के मूल अधिकार का एकीकृत एवं आवश्यक भाग है। अनुच्छेद 21 के अनुसरण में अन्वीक्षण के अधिकार के संदर्भ में सभी चरणों पर अर्थात - अनुसंधान, जांच, अन्वीक्षा, अपील, पुनरीक्षण एवं पुनः अन्वीक्षण शामिल है।
उच्चतम न्यायलय ने पाया कि उच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद मामले में अभियोजन लगभग सत्रह वर्षों तक सोता रहा| ( लेखकीय टिपण्णी: इस प्रकार के विलम्ब प्रायः मिलीभगत से और सुनियोजित गुप्त कूटनीति के अंतर्गत किये जाते हैं ताकि अभियुक्त को लाभ मिल सके| किसी दोषी को अनुचित लाभ देने के लिए कई बार उसे जानबूझकर दोष के अनुपात से अधिक दंड दे दिया जाता है ताकि उसकी अपील ग्राह्य बन सके| इसी प्रकार पदोन्नति के लिए किसी पात्र के स्थान पर किसी अपात्र को उपकृत कर नियमित पदोन्नति दे दी जाती है ताकि अपात्र और स्वामीभक्त का उद्धार हो सके क्योंकि पात्र कर्मचारी को तो बाद में अपील में भी पदोन्नति मिल सकती है|) अभियोजन इस विलम्ब के लिए कोई समुचित स्पष्टीकरण नहीं दे सका| इस  विलम्ब के लिए अपीलार्थी किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता | मामले के तथ्यों से स्पष्ट है कि इस विलम्ब से अनुच्छेद 21 में समाहित  अपीलार्थी के त्वरित अभियोजन के मूल अधिकार का उल्लंघन हुआ है| इन परिस्थितियों में अभियोजन को चालू रखना अनुचित है और  इस तथ्य के बावजूद कि आरोप गंभीर हैं मामला निरस्त किया जाता है| उच्चतम न्यायलय ने मामला निरस्त कर दिया |
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Mani Ram Sharma

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[justify]इस प्रकरण में गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा पुलिस को आदेश दिया गया था कि वह जांच रिपोर्ट इस न्यायालय के आदेश के बिना ट्राइल न्यायालय में प्रस्तुत नहीं करे| वास्तव में इस प्रकरण में भू सम्पति को लेकर बिभिन्न पक्षकारों के मध्य विवाद था | विवादित भू सम्पति को कई सह हिस्सेदारों ने विक्रय पत्र और/अथवा पॉवर ऑफ अट्टोरनी के मध्यम से हस्तान्तरित कर दिया था| उच्च न्यायालय ने प्रकरण में समय समय पर प्रगति रिपोर्ट मांगी जिससे व्यथित होकर प्रार्थी ने उच्चतम न्यायालय में यह याचिका प्रस्तुत कर निवेदन किया कि उच्च न्यायालय का उक्त कृत्य अनुसंधान में अनुचित हस्तक्षेप है अत: उच्च न्यायालय के आदेश निरस्त किये जायें|
सुप्रीम कोर्ट ने बाबूभाई जमनादास पटेल बनाम गुजरात राज्य के निर्णय दिनांक 02.09.09 में कहा है कि न्यायालय को नागरिकों जिनके हितों के लिए वे बनाये गये हैं उनके द्वारा दायित्वों व कर्त्तव्यों के निर्वहन में सरकारी अधिकारियों की लापरवाही पर लगातार नज़र रखनी होती है । अतः इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जब न्यायालय को यह संतोष हो कि अनुसंधान नहीं हो रहा है या हितबद्ध लोगों द्वारा प्रभावित हो रहा है तो उपयुक्त मामलों में न्यायालय को किसी अपराध के अनुसंधान पर ध्यान देना पड़ता है । यदि न्यायालय के यह ध्यान में लाया जाता है कि किसी अपराध में अनुसंधान जिस प्रकार से होना चाहिए उस तरह नहीं हो रहा है तो अनुसंधान एजेन्सी को न्यायालय द्वारा निर्देश दिया जाये कि निर्धारित दिशा निर्देशों के अनुरूप अनुसंधान हो अन्यथा अनुसंधान का उद्देश्य फलहीन हो जायेगा। याचिका स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि अनुसंधान एजेंसी उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार कार्य करे|


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