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Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
Dosto,

We will be posting here articles by Shri Mani Ram Sharma. Brief Introduction of Mr Mani Ram Sharma Ji is given below:-

नाम: मनीराम शर्मा

पता: नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे

सरदारशहर -331403

जिला: चुरू (राजस्थान)

संपर्क: 919460605417 , 919001025852

शैक्षणिक योग्यता : बी कोम , सी ए आई आई बी , एल एल बी

एडवोकेट

वर्तमान में, 22 वर्ष से अधिक स्टेट बैंक समूह में अधिकारी संवर्ग में सेवा करने के पश्चात

स्वेच्छिक सेवा निवृति प्राप्त, एवं समाज सेवा में विशेषतः वास्तविक लोकतंत्र की चिंगारी

सुलगाने में व्यस्त

ई-मेल :maniramsharma@gmail.com

मेरा ब्लॉग: जनतांत्रिक अधिकार

Name: Mani Ram Sharma
Address: Nakul Niwas , Behind Roadways Depot
Sardarshahar -331403
Distt. Churu (Raj)
M- 919460605417,919001025852
Qualifications: B. Com., CAIIB, LL B
Advocate
Presently Busy Bee in Serving Societal Interests especially to flame the saga
of conceptual democracy, after taking voluntary retirement on completion of 22
years services in Officer Grade in State Bank Group
E-mail: maniramsharma@gmail.com
My Blog: justicemiracle-mrp.blogspot.in
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M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
भारत में जन विरोधी बजट व आर्थिक नीतियाँ

By - Mani Ram Sharma

देश की आजादी के समय हमारे पूर्वजों के मन में बड़ी उमंगें थी और उन्होंने अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुन्दर सपने संजोये थे| आज़ादी से लोगों को आशाएं बंधी थी कि वे अपनी चुनी गयी सरकारों के माध्यम से खुशहाली और विकास का उपभोग करेंगे | देश में कुछ विकास तो अवश्य हुआ है लेकिन किसका, कितना और इसमें किसकी भागीदारी है यह आज भी गंभीर प्रश्न है जहां एक मामूली वेतन पाने वाला पुलिस का सहायक उप निरीक्षक निस्संकोच होकर धड़ल्ले से अरबपति बन जाता है उच्च लोक पदों पर बैठे लोगों की तो बात क्या करनी है| वहीं आम नागरिक दरिद्रता के कुचक्र में जी रहा है- उसे दो जून की रोटी भी उपलब्ध नहीं हो रही है| शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसे झूझना पड़ता है| स्वयं योजना आयोग ने लगभग 40 वर्ष पहले भी माना था कि आज़ादी के बाद अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ी है जबकि हमारा पवित्र संविधान सामाजिक और आर्थिक न्याय का पाठ पढाता है| आज तो यह खाई इतनी बढ़ चुकी है कि शायद आने वाली कई पीढ़ियों के लिए भी इसे पाटना मुश्किल हो जाएगा|
एक नागरिक पर उसके सम्पूर्ण परिवार के भरण पोषण का नैतिक और कानूनी दायित्व होता है| इस तथ्य को स्वीकार करते हुए अमेरिका में आयकर कानून बनाया गया है और वहां नागरिकों का कर दायित्व उनकी पारिवारिक व आश्रितता की स्थिति पर निर्भर करता है| यदि करदाता अविवाहित या अलग रहता हो तो भी यदि उस पर आश्रित हों तो उसे आयकर में काफी छूटें उपलब्ध हैं| उदाहरण के लिए एक अविवाहित पर यदि कोई आश्रित नहीं हों तो उसकी मात्र 9750डॉलर तक की वार्षिक आय करमुक्त है वहीँ यदि उस पर आश्रितों की संख्या 6 हो तो उसे 32550 डॉलर तक की आय पर कर देने से छूट है| ठीक इसी प्रकार यदि एक व्यक्ति घर का मुखिया हो व उस पर आश्रितों की संख्या 6 हो तो उसे 35300 डॉलर तक की आय पर कोई कर नहीं देना पडेगा|इसी प्रकार आश्रितों की विभिन्न संख्या और परिवार की संयुक्त या एकल स्थति के अनुसार अमेरिकी कानून में छूटें उपलब्ध हैं| इस प्रकार अमेरिका पूंजीवादी देश होते हुए भी समाज और सामाजिक-आर्थिक न्याय को स्थान देता है| 
भारत में अंग्रेजी शासनकाल में 1922 में राजस्व हित के लिए 64 धाराओं वाला संक्षिप्त आयकर कानून का निर्माण किया गया था और तत्पश्चात स्वतंत्रता के बाद 1961 में नया कानून बनया गया| इस कानून को बनाने में यद्यपि संवैधानिक ढांचे को ध्यान में रखा जाना चाहिए था किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं किया गया है| कानून को समाज का अनुसरण करना चाहिए और इनके निर्माण में जन चर्चाओं के माध्यम से जनभागीदारी होनी चाहिए क्योंकि कानून समाज हित के लिए ही बनाए जाते हैं| भारत के संविधान में यद्यपि समाजवाद, सामजिक न्याय और आर्थिक न्याय का उल्लेख अवश्य किया गया है किन्तु इन तत्वों का हमारी योजनाओं,नीतियों और कानूनों में अभाव है| भारत में सभी नागरिकों को एक सामान रूप से कर देना पड़ता है चाहे उन पर आश्रितों की संख्या कुछ भी क्यों न हो| संयुक्त परिवार प्रथा भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है| हमारे यहाँ परिवार के कमाने वाले सदस्य पर शेष सदस्यों के भरण-पोषण का नैतिक और कानूनी दायित्व है क्योंकि भारत में पाश्चात्य देशों के समान सामजिक सुरक्षा या बीमा की कोई योजनाएं लागू नहीं हैं| जबकि पश्चात्य संस्कृति में परिवार नाम की कोई इकाई नहीं होती और विवाह वहां एक संस्कार के स्थान पर अनुबंध मात्र है| पाश्चात्य देशों में एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में औसतन 5-6 विवाह करता है| परिस्थितिवश जब परिवार में एक मात्र कमाने वाला सदस्य हो और उस पर आश्रितों की संख्या अधिक हो तो भारत में उसके लिए आयकर चुकाने की क्षमता तो दूर रही अपना गरिमामयी जीवन यापन भी कठिन हो जाता है | वैसे भी भारत में आश्रितता की औसत संख्या5 के लगभग आती है| इन सबके अतिरिक्त समय समय पर विवाह जन्मोत्सव आदि सामाजिक समारोहों पर होने वाले व्यय का भार अलग रह जता है| इस प्रकार हमारा आयकर कानून हमारे सामाजिक ताने बाने पर आधारित नहीं और न ही यह अमेरिका जैसे पूंजीवादी समर्थक देशों की प्रणाली पर आधरित है| बल्कि हमारे बजट, कानून और नीतियाँ तो, जैसा कि एक बार पूर्व प्रधान मंत्री श्री चंद्रशेखर ने कहा था, आयातित हैं जिनका देश की परिस्थितियों से कोई लेनादेना या तालमेल नहीं है| उक्त विवेचन से यह बड़ा स्पष्ट है कि देश में न तो अमेरिका की तरह पूंजीवाद है और न ही समाजवाद है बल्कि अवसरवाद है तथा हम आर्थिक न्याय, समाजवाद और सामजिक न्याय का मात्र ढिंढोरा पीट रहे हैं, उसका हार्दिक अनुसरण नहीं कर रहे हैं| 
 
देश में सत्तासीन लोग नीतिगत निर्णय लेते समय राजनैतिक लाभ हानि व सस्ती लोकप्रियता पर अधिक और जनहित पर कम ध्यान देते हैं| हमारे पास दूरगामी चिंतन, दीर्घकालीन तथा टिकाऊ लाभ देने वाली नीतियों  का सदैव अभाव रहा है| सामाजिक हितों के सरोकार से देश में 14 बैंकों का 1969 में राष्ट्रीयकरण किया गया और 1980 में फिर 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया किन्तु कुछ समय बाद ही इन्हीं बैंकों के निजीकरण पर मंथन होने लगा| यह हमारी अपरिपक्व और विदेशी इशारों पर संचालित नीतियों की परिणति है| देश में बैंकों और वितीय कंपनियों, जिनमें जनता का धन जमा होता है,  पर निगरानी रखने और उनके लिए नीतियाँ निर्धारित करने का कार्य रिजर्व बैंक को सौंपा गया है| किन्तु ध्यान देने योग्य तथ्य है कि देश में नई-नई निजी वितीय कम्पनियां और बैंकें मैदान में बारी बारी से  आती गयी हैं और इनमें जनता का पैसा फंसता रहा है| इन कमजोर और डूबंत बैंकों का अन्य बैंकों में विलय कर दिया गया या अन्य तरीके से उनका अस्तित्व मिटा दिया गाया| रिजर्व बैंक अपने कानूनी दायित्वों के निर्वहन में, और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करने में विफल रहा है| देश को राष्ट्रीय सहारा जैसी कंपनियों द्वारा दिए गए जख्म भी अभी हरे हैं| आज देश में राष्ट्रीय स्तर का ऐसा कोई भी निजी क्षेत्र का बैंक या वितीय कंपनी नहीं है जिसका 20 वर्ष से पुराना उज्जवल इतिहास हो| कुल मिलाकर वितीय और बैंकिंग क्षेत्र में हमारी नीतियाँ जनानुकूल नहीं रही हैं| जो निजी क्षेत्र के बैंक आज देश में कार्यरत हैं उनकी भी वास्तविक वितीय स्थिति मजबूत  नहीं है चाहे उन्होंने चार्टर्ड अकाऊटेन्ट की मदद से कागजों में कुछ भी सब्ज बाग़  दिखा रखे हों| 

देश के संविधान में यद्यपि समाजवाद का समावेश अवश्य है किन्तु देश के सर्वोच्च वितीय संस्थान रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में ऐसे सदस्यों के चयन में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है जिनकी समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि अथवा कार्यों से कभी भी वास्ता रहा है| सर्व प्रथम तो बोर्ड के अधिकाँश सदस्य निजी उद्योगपति – पूंजीपति हैं| जिन सदस्यों को उद्योगपतियों के लिए निर्धारित कोटे के अतिरिक्त -  समाज सेवा , पत्रकारिता आदि क्षेत्रों से चुना जाता है वे भी समाज सेवा, पत्रकारिता आदि का मात्र चोगा पहने हुए होते हैं व वास्तव में वे किसी न किसी  औद्योगिक घराने से जुड़े हुए हैं| एक उद्योगपति का स्पष्ट झुकाव स्वाभाविक रूप से व्यापार के हित में नीति निर्माण में होगा| इससे भी अधिक दुखदायी तथ्य यह है कि  केन्द्रीय बोर्ड के 80% से अधिक सदस्य विदेशों से शिक्षा प्राप्त हैं फलत: उन्हें जमीनी स्तर की भारतीय परिस्थितियों का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है अपितु उन्होंने तो “इंडिया” को मात्र पुस्तकों  में पढ़ा है| ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक बोर्ड द्वारा नीति निर्माण में संविधान सम्मत और जनोन्मुख नीतियों की अपेक्षा करना ही निरर्थक है| रिजर्व बैंक, स्वतन्त्रता पूर्व 1934 के अधिनियम से स्थापित एक बैंक है अत:उसकी स्थापना में संवैधानिक समाजवाद के स्थान पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की बू आना स्वाभाविक  है| देश के 65% गरीब, वंचित और अशिक्षित वर्ग का रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में वास्तव में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है| दूसरी ओर भारत से 14 वर्ष बाद 1961 में स्वतंत्र हुए दक्षिण अफ्रिका के रिजर्व बैंक के निदेशकों में से एक कृषि व एक श्रम क्षेत्र से होता है| 
संयुक्त राज्य अमेरिका में आयकर ढांचा
            No. of Dependents→
 Status                   EXEMPTED INCOME  IN $    0 1 2  3 4 5  6 Single  9750 13550 17350 21150 24950 28750 32550 Married joint 19500 23300 27100 30900 34700 38500 42300 Married separate   9750 13550 17350 21150 24950 28750 32550 Head of house 12500 16300 20100 23900 27700 31500 35300

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
भारतीय न्याय व्यवस्था पर श्वेत-पत्र
From - Mani Ram

उदारीकरण से देश में सूचना क्रांति, संचार , परिवहन, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में सुधार अवश्य हुआ है किन्तु फिर भी आम आदमी की समस्याओं में बढ़ोतरी ही हुई है| आज भारत में आम नागरिक की जान-माल-सम्मान तीनों ही सुरक्षित नहीं हैं| ऊँचे लोक पद धारियों को जनता के पैसे सरकार सुरक्षा उपलब्ध करवा देती है और पूंजीपति लोग अपनी स्वयं की ब्रिगेड रख रहे हैं या अपनी सम्पति, उद्योग, व्यापार की सुरक्षा के लिए पुलिस को मंथली, हफ्ता या बंधी देते हैं| छोटे व्यवसायी संगठित रूप में अपने सदस्यों से उगाही करके सुरक्षा के लिए पुलिस को धन देते हैं और पुलिस का बाहुबलियों की तरह उपयोग करते हैं| अन्य इंस्पेक्टरों अधिकारियों की भी वे इसी भांति सेवा करते हैं| व्यावसायियों को भ्रष्टाचार से वास्तव में कभी कोई आपति नहीं होती, जैसा कि भ्रष्टाचार के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधिपति ने कहा है,  वे तो अपनी वस्तु या सेवा की लागत में इसे शामिल कर लेते हैं और इसे अंतत: जनता ही वहन करती है|
भारत में एक सरकारी कर्मचारी को किसी दुराचार का संदिग्ध पाए जाने पर उसे निलंबित किया जा सकता है किन्तु उसे इस अवधि में जीवन यापन भत्ता दिया जाता है और उसे निर्दोष पाए जाने पर सभी बकाया वेतन और परिलब्धियां भुगतान कर नियमित सेवा में पुन: ले लिया जाता है| यदि उसे गंभीर दुराचार का दोषी पाया जाने पर उसकी सेवाएं समाप्त भी कर दी जाएँ तो भुगतान किया गया जीवन यापन भत्ता उससे वसूल नहीं किया जाता| दूसरी ओर यदि एक सामान्य नागरिक को किसी अपराध का संदिग्ध पाया जाये तो अनावश्यक होने पर भी पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है और मजिस्ट्रेट उसे जेल भेज देता है| देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं| गिरफ्तार व्यक्ति की प्रतिष्ठा को तो अपुर्तनीय क्षति होती ही है, इसके साथ साथ उसका परिवार इस अवधि में उसके स्नेह, संरक्षा व सानिद्य से वंचित रहता है| गिरफ्तार व्यक्ति हिरासती यातनाएं सहने के अतिरिक्त अपने जीविकोपार्जन से वंचित रहता है जिसका परिणाम उसके आश्रितों व परिवार को अनावश्यक भुगतना पड़ता है| कमजोर और भ्रष्ट न्याय व्यवस्था के चलते देश में मात्र 2% मामलों में दोष सिद्धियाँ हो पाती हैं और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में भी यह 26% से अधिक नहीं है| एक लम्बी अवधि की उत्पीडनकारी कानूनी प्रक्रिया के बाद जब यह गिरफ्तार व्यक्ति मुक्त हो जाता है तो भी उसे इस अनुचित हिरासत की अवधि के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जाती जबकि सरकारी कर्मचारियों के दोषमुक्त होने पर उन्हें सम्पूर्ण अवधि का वेतन और परिलब्धियां भुगतान की जाती हैं| हमारी यह व्यवस्था जनतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत और साम्रज्यवादी नीतियों की पोषक है| दिल्ली पुलिस (दंड एवं अपील) नियम,1980 के नियम 11(1) में तो यह विधिवत प्रावधान है कि यदि एक पुलिस अधिकारी को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध कर दिया जाता है तो भी वह अपील के निस्तारण तक सेवा में बना रहेगा| उल्लेखनीय है कि सी बी आई भी इसी नियम से शासित है और इससे लाभान्वित होती है| ऐसे भी उदाहरण हैं जहां इस नियम की आड़ में सरकार ने पुलिस अधिकारियों को अन्तिमत: दोषी पाए जाने के बावजूद भी 12 वर्ष तक सरकारी सेवा में बनाए रखा क्योंकि इन्हीं पुलिस अधिकारियों का अनुचित उपयोग कर लोग सत्ता में बने हुए हैं| ऐसी स्थिति में यह विश्वास करने का कोई कारण  नहीं कि देश में लोकतंत्र है  बल्कि लोकतंत्र तो मात्र कागजों तक सिमट कर रह गया है| 
 
अमेरिका में एक अभियुक्त को “संयुक्त राज्य का अपराधी” कहा जाता है और वहां सभी आपराधिक मामले राज्य द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं व वहां भारत की तरह कोई व्यक्तिगत आपराधिक शिकायत नहीं होती है| अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 256 और भारत में 130 पुलिस है जबकि अमेरिका में भारत की तुलना में प्रति लाख जनसंख्या 4 गुणे मामले दर्ज होते हैं| तदनुसार भारत में प्रति लाख जनसंख्या 68 पुलिस होना पर्याप्त है| किन्तु भारत में पुलिस बल का काफी समय विशिष्ट लोगों को वैध और अवैध सुरक्षा देने, उनके घर बेगार करने, चौथ वसूली करने आदि में लग जाता है| अपनी बची खुची ऊर्जा व समय  का उपयोग भी पुलिस अनावश्यक गिरफ्तारियों में करती है| आपराधिक मामले को अमेरिका में मामला कहा जाता है और सिविल मामले को वहां सिविल शिकायत कहा जाता है| भारत में भी गोरे कमेटी ने वर्ष 1971 में यही सिफारिश की थी कि समस्त आपराधिक मामलों को राज्य का मामला समझा जाये किन्तु उस पर आज तक कोई सार्थक कार्यवाही नहीं हुई है| हवाई अड्डों की सुरक्षा में तैनात पुलिस आगंतुकों के साथ, जो उच्च वर्ग के होते हैं, बड़ी शालीनता से पेश आती है| वही मौक़ापरस्त पुलिस थानों  में पहुंचते ही गाली-गलोज, अभद्र व्यवहार और मार पीट पर उतारू हो जाती है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान और विश्वास है कि आम आदमी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता चाहे वह किसी भी न्यायिक या गैर न्यायिक अधिकारी के पास चला जाये, कानून और व्यवस्था उसके पक्ष में ही रहेगी|  राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार एक वर्ष में पुलिस द्वारा मानव अधिकारों के हनन के सभी प्रकार के मात्र 141 मामले बताये जाते हैं जिनमें 466 पुलिस अधिकारियों को दोष सिद्ध किया गया| वहीं एशियाई मानव अधिकार आयोग के अनुसार देश में 9000 मामले तो मात्र हिरासत में मौत के हैं| इसमें अन्य मामले जोड़ दिए जाएँ तो यह आंकड़ा एक लाख को पार कर जाएगा| यह स्थिति पुलिस की कार्यप्रणाली और तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने की सिद्धहस्तता का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करती है| जब  आपराधिक मामलों में न्याय के लिए ऐसी पुलिस पर निर्भर रहना पड़े तो न्याय एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं हो सकता| भारतीय रिजर्व बैंक की सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मियों की समय-समय पर अचानक जांच में काफी नफरी नदारद भी पाई जाती है और उस पर कोई कार्यवाही नहीं होती है| यह पुलिस और उसके वरिष्ठ अधिकारियों की कर्तव्यनिष्ठा का द्योतक है| |
 
 
देश में कानून और न्यायव्यवस्था की दशा में सोचनीय  गिरावट आई है समाज में बढती आर्थिक विषमता ने इस आग में घी का काम किया है| इस स्थिति के लिए हमारे न्यायविद, पुलिस अधिकारी और राजनेता संसाधनों की कमी का हवाला देते हैं और विदेशों की स्थिति से तुलना कर गुमराह करते हैं| किन्तु उनके इस तर्क में दम नहीं है| पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित महानगरीय संस्कृति को छोड़ दिया जाये तो भारत एक आध्यात्मिक चिंतन और उन्नत सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि वाला देश है| यहाँ लोग धर्म- कर्म और ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं| भारत में मात्र 4.2% लोगों के पास बंदूकें हैं जबकि हमारे पडौसी देश पकिस्तान में 11.6% और अमेरिका में 88.8% लोगों के पास बंदूकें हैं| इससे रक्तपात और अपराध की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है| अमेरिका में कानून, और कानून का उल्लंघन करने वालों के प्रति न्यायाधीशों- दोनों ही का रुख सख्त हैं अत: कानून का उल्लंघन करने वालों को विश्वास है कि उन्हें न्यायालय दण्डित करेंगे| इस कारण अपराधी लोग वहां प्राय: अपना अपराध कबूल कर लेते हैं जिससे मामले के परीक्षण में लंबा समय नहीं लगता और ऐसी स्थिति में दंड देने में न्यायाधीशों का उदार रवैया रहता है यद्यपि उनके पास दंड की अवधि निर्धारित करने के लिए भारत की तरह ज्यादा विवेकाधिकार नहीं होते| ऐसी व्यवस्था के चलते अमेरिका में 75% सिविल  मामलों में न्यायालय में जाने से पूर्व ही समझौते हो जाते हैं| अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 5806 मुकदमे दायर होते हैं जबकि भारत में यह दर मात्र 1520 है| इसके अतिरिक्त अमेरिका में संघीय और राज्य कानूनों के लिए अलग अलग न्यायालय हैं| उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति बैंक का एटीएम तोड़ता है तो बैंक संघ का विषय होने के कारण संघीय न्यायालय का मामला होगा किन्तु वही व्यक्ति यदि एटीएम कक्ष में किसी व्यक्ति की चोरी करता है तो यह राज्य का मामला होगा| प्रति लाख जनसंख्या पर अमेरिका में 10.81  और भारत में 1.6 न्यायाधीश हैं | एक अनुमान के अनुसार भारत के न्यायालयों में दर्ज होने वाले मामलों में से 10% तो प्रारंभिक चरण में या तकनीकी आधार पर ही ख़ारिज कर कर दिये जाते हैं, कानूनी कार्यवाही लम्बी चलने के कारण 20% मामलों में पक्षकार अथवा गवाह मर जाते हैं| 20% मामलों में पक्षकार थकहार कर राजीनामा कर लेते हैं और 20% मामलों में गवाह बदल जाते हैं परिणामत: शेष 30 % मामले ही पूर्ण परीक्षण तक पहुँच पाते हैं| इस प्रकार परिश्रम और समय की लागत के दृष्टिकोण से भारत में दायर होने वाले मामलों को आधा ही मना जा सकता है और भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर दायर होने वाले मामलों की संख्या मात्र 760 आती है जो अमेरिका से लगभग 1/7 है और भारत में प्रति लाख जनसंख्या न्यायाधीशों की संख्या लगभग 1/7 ही है जो दायर होने वाले मामलों को देखते हुए किसी प्रकार से कम नहीं है|अमरीका में न्यायालय में दिए गए अपने वक्तव्य से एक वकील बाध्य है और वह कानून या तथ्य के सम्बन्ध में झूठ नहीं बोल सकता क्योंकि ऐसी स्थिति में दण्डित करने की शक्ति स्वयं न्यायालय के ही पास है| मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति किरुबकर्ण ने हाल ही एक अवमान मामले की सुनवाई में कहा है कि देश की जनता न्यायपालिका से पहले ही कुण्ठित है अत: मात्र 10% पीड़ित लोग ही न्यायालय तक पहुंचते हैं| यह स्थिति न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर स्वत: ही एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाती है|
पूर्ण न्याय की अवधारणा में सामाजिक और आर्थिक न्याय को ध्यान में रखे बिना न्याय अपने आप में अपूर्ण है| भारत में प्रति व्यक्ति औसत आय 60000 रुपये, न्यूनतम मजदूरी 72000 रुपये और एक सत्र न्यायधीश का वेतन 720000 रुपये वार्षिक है वहीँ यह अमेरिका में क्रमश: 48000, 15000 और 25000 डॉलर वार्षिक है| अमेरिका में न्यायालयों में वर्ष भर में मात्र 10 छुटियाँ होती हैं वहीँ भारत में उच्चतम न्यायालय में 100, उच्च न्यायलय में 80 और अधीनस्थ न्यायालयों में 60 छुटियाँ होती है| इस दृष्टि से देखा जाये तो भारतीय न्यायाधीशों का वेतन बहुत अधिक है |इस प्रकार भारत की जनता कानून और न्याय प्रशासन पर अपनी क्षमता से काफी अधिक धन व्यय कर रही है| इस सत्य को किसी वर्ग द्वारा स्वीकार या अस्वीकार किये जाने से भी तथ्य नहीं बदल जाता| उक्त धरातल स्तरीय तथ्यों को देखें तो भारत में कानून और न्याय प्रशासन के मद पर होने वाला व्यय किसी प्रकार से कम नहीं है बल्कि देश में कानून-व्यवस्था और न्याय प्रशासन कुप्रबंधित हैं| भारत में कानून, प्रक्रियाओं और अस्वस्थ परिपाटियों के जरिये  जटिलताएं उत्पन्न कर न्यायमार्ग में कई बाधाएं खड़ी कर दी गयी हैं जिससे मुकदमे द्रौपदी के चीर की भांति लम्बे चलते हैं| भारत में 121 करोड़ की आबादी के लिए 17 लाख वकील कार्यरत हैं अर्थात प्रति लाख जनसँख्या पर 141 वकील हैं और अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या पर 391 वकील हैं| परीक्षण पूर्ण होने वाले मामलों के साथ इसकी तुलना की जाये भारत में यह संख्या 60 तक सीमित होनी चाहिए| दूसरी ओर हमारे पडौसी चीन में 135 करोड़ लोगों की सेवा में मात्र 2 लाख वकील हैं| इस दृष्टिकोण से भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर चीन से 10 गुने ज्यादा वकीलों की फ़ौज हैं जिनके पालन पोषण का दायित्व अप्रत्यक्ष रूप से न्यायार्थियों पर आ जाता है| दिल्ली राज्य की तो स्थिति यह है कि वहां हर तीन सौ में एक वकील है| वहीँ  चीन का यह सुखद तथ्य है कि वहां न्यायालयों के लिए निर्णय देने की समय सीमा है और इस सीमा के बाद निर्णय देने के लिए उन्हें उच्च स्तरीय न्यायालय से अनुमति लेनी पड़ती है जबकि भारत में तो न्यायालय के मंत्रालयिक कर्मचारियों के लिए तारीख पेशी देना, जैसा कि रजिस्ट्रार जनरलों की एक मीटिंग में कहा गया था, एक आकर्षक धंधा है और उससे न्यायालयों की बहुत बदनामी हो रही है|
 
उच्चतम और उच्च न्यायालयों में प्रमुखतया सरकारों के विरुद्ध मामले दर्ज होते हैं और यदि सरकारी बचाव पक्ष अपना पक्ष सही सही और सत्य रूप में प्रस्तुत करे तो मुकदमे आसानी से निपटाए जा सकते हैं किन्तु सरकरी पक्ष अक्सर सत्य से परे होते हैं फलत: मुकदमे लम्बे चलते हैं| यदि मामला सरकार के विरुद्ध निर्णित हो जावे तो भी उसकी अनुपालना नहीं की जाती क्योंकि सरकारी अधिकारियों को विश्वास होता है कि न्यायाधीश उनके प्रति उदार हैं अत: वे चाहे झूठ बोलें या अनुपालना न करें उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है, आखिर एक नागरिक को ही गीली लकड़ी की भांति अन्याय की अग्नि में सुलगना है| अत: एक ही समान  मुकदमे अनावश्यक रूप से बारबार दर्ज होते रहते हैं|  उच्चतम और उच्च न्यायालयों में सामान्यतया कोई साक्ष्य नहीं होता है और मात्र बहस व शपथपत्र के आधार पर निर्णय होते हैं अत: इनमें लंबा समय लगने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है| फ़ास्ट ट्रेक न्यायालयों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता जब मामले को उच्च स्तरीय न्यायालयों द्वारा स्टे कर दिया जाये और उसे फ़ास्ट ट्रैक मामला ही मानते हुए तुरंत निपटान नहीं दिया जाए| देश के प्रबुद्ध, जागरूक, जिम्मेदार और निष्ठावान नागरिकों से अपेक्षा है कि वे इस स्थिति पर मंथन कर देश में अच्छे कानून का राज पुनर्स्थापित करें|
जय हिन्द ! 
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:

From Mr Mani Ram

भारत में समाजवाद और आर्थिक-सामाजिक न्याय का सपना ब्रिटिश सरकार ने भारत के देशी उद्योग धंधों को नष्ट कर दिया था| कच्चा माल ब्रिटेन जाता था और बदले में तैयार माल आता था| इस प्रकार देश का शासन विशुद्ध व्यापारिक ढंग से संचालित था| स्वतंत्रता के पश्चात देशवासियों को आशा बंधी थी कि रोजगार में वृद्धि से देश में खुशाहाली  आएगी और देश फिर से सोने की चिड़िया बन सकेगा|भारत में प्राकृतिक और मानव संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं| यहाँ तक कि देश में उपलब्ध संसाधनों की अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण अफ्रिका से तुलना की जाये तो भी भारत किसी प्रकार से पीछे नहीं है| जापान में तो मात्र 1/6 भूभाग ही समतल और कृषि योग्य है और वहां बार बार भूकंप आते रहते हैं किन्तु फिर भी वहां कुछ घंटों में ही जनजीवन सामान्य हो जाता है| भारत की स्थिति पर नजर डालें तो यहाँ आम व्यक्ति को पेयजल, बिजली, सडक जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए महानगरों से लेकर ढाणियों तक वंचित रहना पड़ता है और धरने प्रदर्शन करने पड़ते हैं फलत: उत्पादक समय नष्ट होता है| हमारी सरकारें वर्षा अच्छी होने पर भी बिजली पर्याप्त नहीं दे पाती और बहाने बनाती हैं कि कोयला खदान में पानी भर जाने से कोयला नहीं पहुँच सका, बिजली की लाइनें खराब हो गई| वहीं वर्षा की कमी होने से सरकार कहती है कि गर्मी के कारण फसलों की सिंचाई व सामान्य उपभोग में बढ़ोतरी के कारण बिजली की कमी आ गयी है| ठीक यही हालत पेयजल की है| हमारी सड़कें भी बरसात से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और गर्मी में आंधियों से सड़कें मिटटी से सन जाती हैं|कुल मिलाकर प्रकृति चाहे हमारे पर मेहरबान या कुपित हो, हम दोनों ही स्थितियों का मुकाबला करने के स्थान पर बहाने गढ़ने में माहिर है| नगरपालिका क्षेत्र में नालों की सफाई के लिए कई दिनों तक जलापूर्ति रोकनी पड़ती है| इन सभी के लिए संसाधनों की कमी एक बहुत बड़ा कारण बताया जाता है किन्तु चुनाव नजदीक आते ही संसाधनों का जुगाड़ हो जाता है और जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए सडक, बिजली और पानी की व्यवस्था को कुछ समय के लिए सुचारू बना दिया जाता है और  वोटों के ठेकेदारों को थैलियाँ भेंट कर दी जाती हैं| फिर 5 वर्ष के लिए रामराज्य की पुन:स्थापना हो जाती है| यह हमारी लोकतांत्रिक  व्यवस्था है जिस कारण देश में आर्थिक विकास की गति मंद रही है और स्वतंत्रता के वृक्ष  के फल आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं| देश नौकरशाही और लालफीताशाही के शिकंजे से आज भी मुक्त नहीं है अत; विकास की गति धीमी है| भ्रष्टाचार, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की स्थिति तो और भी खराब है अत: आम व्यक्ति अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता है| देश के आम नागरिक को कोई उपक्रम शुरू करने से पूर्व अपनी पूंजी की सुरक्षा और सरकारी तंत्र की भेंटपूजा के विषय में कई बार सोचना पड़ता है| दूसरी ओर जापान, जो द्वितीय विश्व युद्ध में 1946 में  जर्जर हो गया था विश्व पटल पर आज एक गण्यमान्य स्थान रखता है| दक्षिण अफ्रिका को जो भारत से 14 वर्ष बाद आजाद हुआ उसने भी काफी तेजी से विकास किया है और आज वहां प्रति व्यक्ति आय (10,973 डॉलर) भारत (3,694) से  3 गुणी है वहीं युद्ध जर्जरित व्यवस्था का पुनर्निर्माण करने के बाद आज  जापान की प्रति व्यक्ति आय (34,740) भारत से 9 गुणा है| यही नहीं भारत की प्रति व्यक्ति आय विश्व की प्रति व्यक्ति औसत आय (10,700) से भी एक तिहाई है|  आज जिस गति से भारत में हवाई जहाज चलते हैं उस गति से तो जापान में रेलगाड़ी चलती है| भारत में देशी उद्यमियों को जिन छूटों से इनकार किया जाता है वे छूटें विदेशी निवेशकों को दे दी जाती हैं| जिस दर पर विदेशों से घटिया गेहूं आयात किया जाता है वह समर्थन मूल्य देश के मेहनतकश किसानों को उपलब्ध नहीं करवाया जाता है| क्या लोकतंत्र का यही असली स्वरूप है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजो की लाठियां और गोलियां खाई थी या देश का नेतृत्व फिर विदेशी और पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली मात्र रहा गया है| देश की खराब हालत का जिक्र करने पर नेता लोगों का बचाव होता है कि बड़ा क्षेत्र होने के कारण नियंत्रण नहीं हो पाता है| किन्तु उनका यह बहाना भी बनावटी मात्र है| एक छोटा सा महावत अपनी युक्ति, इच्छाशक्ति और कौशल के आधार पर विशालकाय हाथी पर भी नियंत्रण कर लेता है| दूसरी और हमने इसी तर्क पर झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य भी बनाकर देख लिए हैं किन्तु इन राज्यों में अराजकता, असुरक्षा और सार्वजानिक धन की लूट में बढ़ोतरी ही हुई है कोई कमी नहीं आई है| छोटे प्रदेश तो राज नेताओं को अधिक पदों का सृजन कर अपने स्वामीभक्तों को उपकृत करने के लिए चाहिए| वास्तव में आज भारत में जनता के सुख-दुःख से राजनीति का कोई सरोकार नहीं रह गया है|        जब देश में निगरानी, नियंत्रण और शासन व्यवस्था मजबूत हो तो नीजी क्षेत्र से भी अच्छा काम लिया जा सकता है| अमेरिका और इंग्लॅण्ड में आज जेलें, जोकि सरकार का संप्रभु कार्य है, भी निजी क्षेत्र में सफलतापूर्वक संचालित हैं| भारत में सरकारें सामाजिक उद्देश्यों की आड़ में राजनैतिक हित साधने के लिए  उद्यमों का भी राष्ट्रीयकरण करती हैं किन्तु आज भारत में जनता का रक्तपान करने की दौड़ में सरकारी उपक्रम भी पीछे नहीं हैं| जब बैंकों की ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक का नियंत्रण हुआ करता था तब रिजर्व बैंक के उप गवर्नर की अध्यक्षता में भारत सरकार ने बैंकों की मियादी जमा पर ब्याज दरों के निर्धारण के लिए एक कमेटी का गठन किया था| तत्कालीन कमिटी का आकलन था कि मियादी जमाओं पर ब्याज दर चालू मुद्रा स्फीति की दर से 2% प्रतिशत अधिक होनी चाहिए ताकि जमाकर्ता को वास्तव में सकारात्मक ब्याज मिले अन्यथा मुद्रा स्फीति की दर से कम ब्याज दर से तो जमाकर्ता को ऋणात्मक ब्याज मिलेगा और उसे बचत से किसी वस्तु का संग्रहण करने के बजाय जमा कराने पर शुद्ध हानि होगी| बाद में रिजर्व बैंक की ही एक अन्य कमिटी ने दिनांक 17.09.01 को प्रस्तुत एक अन्य रिपोर्ट में भी इस तथ्य पर विचार किया है| कमजोर कानून और न्यायव्यवस्था के चलते देश के निजी क्षेत्र में निवेश सुरक्षित नहीं है अत: निजी क्षेत्र को जनता से सीधा धन मिलना कठिन होता है| एक व्यवसायी के लिए तो कोई भी ब्याज दर मायने नहीं रखती क्योंकि उसने तो अपने उत्पाद या सेवा की लागत में ब्याज को भी जोड़ना है| व्यवसायी लोग तो स्टोक का अपसंचय कर मुनाफाखोरी और कालाबाजारी के माध्यम से सामान्य लाभ के अतिरिक्त अच्छा लाभ कमा लेते हैं अत: मुद्रास्फीति  भी उनके लिए लाभकारी होती है और वे उसका विरोध नहीं करते|समाजवादी सिद्धांतों के विपरीत, कालांतर में पूंजीपतियों के इशारों पर, बैंकों जमा की ब्याज दरों को अनियंत्रित कर दिया गया ताकि ऋणों की ब्याज दरों में कमी होने से उनको लाभ मिल सके| भारत में स्वतंत्रता काल से आज तक की मुद्रास्फीति दर का औसत 8% वार्षिक चक्रवृद्धि आता है| गत 10 वर्ष में तो यह दर 13% आती है किन्तु आज किसी भी बचत योजना में ब्याज दरें मुद्रा स्फीति की इस  दर से अधिक होना तो दूर रहा इसके बराबर भी नहीं है और बचत करने वालों को शुद्ध हानि हो रही है| आज मियादी जमाओं पर ब्याज दरें 9% के दायरे में चल रही हैं और ब्याज दरों में कमी का लाभ बैंकों के माध्यम से जहां एक ओर ऋण लेने वाले पूंजीपतियों को प्राप्त हो रहा है, वहां अल्प साधनों वाले नागरिकों को बचत करने से शुद्ध हानि हो रही है| इनमें भी सेवानिवृत और वृद्ध नागरिक जो अपनी बचतों को किसी अन्य स्थान पर लगाने या व्यवसाय करने की स्थिति में नहीं हैं उन्हें विवश होकर अपनी बचतों को मात्र बैंकों या अल्प बचत योजनाओं में लगाना पड़ता है| लोक –प्रदर्शन के लिए उन्हें ½% की दर से अतिरिक्त ब्याज दिया जाता है जो किसी भी प्रकार से पर्याप्त नहीं है| उक्त वृतांत से बड़ा स्पष्ट है कि  संवैधानिक उद्देश्यों के विपरीत कमजोर वर्ग से सस्ती दर पर जमाएं एकत्रित करके समर्थ व्यावसायियों को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाने में हमारा बैंकिंग तंत्र मदद कर रहा है और मजबूर लोगों का शोषण कर रहा है| ऐसी स्थिति में देश में समाजवाद कैसे स्थापित हो सकता है|हमारी सरकारों के छुपे हुए एजेंडे होते हैं जिन पर चलकर वे लोक कल्याण के स्वांग करती हैं| आज से 10 वर्ष पूर्व जब सीमेंट और स्टील उद्योग मंदी का गिरफ्त में था तो बैंकों को निर्देश देकर आवास ऋण की ब्याज दरें 7% तक नीचे ला दी गयी और कालान्तर में उक्त उद्योग मंदी से उबर गए हैं और भू सम्पतियों की दरें आसमान छूने लगी हैं| अब मकानों की अधिक लागत के कारण ऋण की आवश्यकताएं बढ़ी हैं किन्तु अब आवास ऋणों की ब्याज दरें 11% कर दी गयी हैं| वित्तीय क्षेत्र में लोग जनता का धन लूटकर उसका मनमाना उपभोग करते हैं अथवा  फरार हो जाते हैं व उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता है  और जनता हाथ मलती रह जाती है| देश की इस कमजोर व जिम्मेदारी विहीन कानूनी और न्याय व्यवस्था को देखकर ही निजी व विदेशी लोग बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र में आने को आतुर रहते हैं| ये लोग जानते हैं कि इस देश में चाहे कितने ही सख्त कानून बना दिए जाएँ उन्हें पैसे की शक्ति से नर्म बनाया जा सकता है| अत: बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र विदेशी और निजी निवेशकों के लिए बड़ा आकर्षक है| भारत में जीवन बीमा व्यसाय में मात्र 1.5% जोखिम है किन्तु वे एजेंटों के माध्यम से जनता को डरावने सपने दिखाकर व्यवसाय कर रहे हैं और बीच में पालिसी बंद करने वालों का धन अवैध रूप से हडप रहे हैं| आम जनता को भ्रमित करने, और बीमा योजनाओं को बैंकों से अधिक आकर्षक बताने के लिए बीमा कम्पनियां अपना बोनस भी प्रतिशत के स्थान पर प्रति हजार घोषित करती हैं जोकि 3-5% आता है और यह भारत में प्रचलित मुद्रा स्फीति की दर से ही कम है| अत: बीमा में निवेश करने पर भी आम जनता को हानि ही हो रही है| बीमा कंपनियों द्वारा संग्रहित इस धन में से 5% हिस्सा सरकार को सस्ते ब्याज पर उपलब्ध हो जाता है अत: सरकार भी इस लोभ में जनता के शोषण के प्रति आँखें मूंदे रहती है और इस आकर्षक क्षेत्र में भी निजी और विदेशी निवेशक आने को लालायित रहते हैं| बैंकिंग, दूर संचार, शेयर बाजार, बीमा आदि व्यवसायों की नियामक एजेंसियां भी जनता को कोई राहत नहीं देती हैं और अंत में जनता को सक्षम न्यायालय/मंच में जाने का परामर्श देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं|     केंद्र सरकार ने कृषि ऋणों पर ब्याज दरें कम करने और नियमित खातों पर कृषकों को ब्याज अनुदान  देने की घोषणा की किन्तु इस घोषणा का भी वास्तविक लाभ किसानों को नहीं मिला| सरकारी बैंकें पहले 30000  रूपये तक के कृषि ऋणों पर मात्र 25 रूपये वार्षिक खाता प्रभार लिया करते थे किन्तु सरकार द्वारा रियायती ब्याज दर की घोषणा करने पर यह प्रभार 10 गुना से भी अधिक अर्थात 280 रूपये वार्षिक कर दिया गया है|इस प्रकार किसानों को सरकार ने एक हाथ लाभ दिया और दूसरे हाथ सरकारी बैंकों के माध्यम वसूल लिया| कृषि ऋण खातों की निगरानी के लिए सामान्यतया बैंक अधिकारीगण कोई निरीक्षण नहीं करते फिर भी अवैध रूप से रूपये 500  से अधिक वार्षिक निरीक्षण प्रभार वसूल रहे हैं| भारी भरकम नवीनीकरण शुल्क अलग रह जाता है| बहुत सी बैंक शाखाओं में इन वसूले गए प्रभारों की राशि बैंक द्वारा खर्च किये गए यात्रा भत्ता बिलों की राशि से भी अधिक हो सकती है| कृषि क्षेत्र के ऋण के लिए रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार किसी अन्य बैंक या वित्तीय संस्था से कोई अदेय प्रमाण-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है और इसके लिए मात्र संभावित ऋणी से इस आशय का शपथ पत्र लेना पर्याप्त है| राजस्थान सरकार ने वर्ष 1980 में एक अधिसूचना जारी कर सरकारी बैंकों के शाखा प्रबंधकों को इस शपथ पत्र के सत्यापन के लिए अधिकृत कर रखा है और इस पर देय स्टाम्प शुल्क की भी छूट दे दी गयी है| किन्तु इसके बावजूद बैंकें कृषकों से अदेय प्रमाण पत्र पर बल देती हैं जिनके लिए उन्हें शुल्क देना पड़ता है और समय नष्ट होता है| रिजर्व बैंक के निर्देश हैं कि आवश्यक होने पर कृषकों के अदेय प्रमाण पत्र ऋणदाता बैंकें एक साथ समूह में अपने स्वयम के ही स्तर पर मंगवा सकती हैं| किन्तु इन निर्देशों की अवहेलना खेदजनक तथ्य है|    भारत गाँवों का देश है और कृषि व सम्बंधित उद्योग उसकी आत्मा है| कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को सस्ता व सुलभ ऋण उपलब्ध करवाने के लिए सहकारिता आन्दोलन की शुरुआत की गयी थी और सहकारिता के माध्यम से देश के ग्रामीण क्षेत्र की बड़ी आर्थिक सहायता की जा रही है| केंद्र सरकार सहकारिता क्षेत्र को वितीय सहायता उपलब्ध करवा सकती है| सहकारिता, राज्य सरकारों का विषय है अत: इस क्षेत्र में अतिक्रमण करने के लिए केन्द्र सरकार ने बिना किसी व्यवहारिक योजना के 1974   से  जिला स्तर पर 300 से अधिक ग्रामीण बैंकों की स्थापना की| कुछ समय तक ग्रामीण बैंकों की अंधाधुंध शाखाएं खोलने का सिलसिला चला और इस हेतु प्रशस्ति-पत्र दिए गए| किन्तु शीघ्र ही इस अभियान से सरकार को हाथ खेंचने पड़े| बाद में इन शाखाओं को अर्थक्षम और व्यवहारिक नहीं पाया गया अत: इनमें से लगभग आधी शाखाओं को बंद कर दिया गया या अन्य शाखाओं में मिला दिया गया अथवा स्थापित उद्देश्यों के विपरीत शहरी  क्षेत्र में अंतरित कर दिया गया| कालान्तर में ये बैंकें भी जब सक्षम नहीं रही तो इनका विलय कर अब मात्र 56 ग्रामीण बैंकें बना दी गयी हैं| यह सब हमारी अपरिपक्व व अदूरदर्शी सोच और सस्ती  लोकप्रियता मूलक  नीतियों का परिणाम था|

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
श्री मनमोहन सिंह जी,
प्रधान मंत्री,
भारत सरकार,
नई दिल्ली

मान्यवर, 
नीतिगत मामले : अधिकारों का प्रत्यायोजन एवं प्रयोग

मैं आपको यह स्मरण करवाने की आवश्यकता नहीं समझता कि शक्तियों के उचित प्रयोग करने के लिए पारदर्शिता होना आवश्यक है और इस दिशा में सूचना का अधिकार अधिनियम अधिनियमित करने का श्रेय  भी आपकी लोकप्रिय सरकार को जाता है| अधिनियम की धारा 4 (1) (b) (ii) में  सभी अधिकारियों की शक्तियां स्वप्रेरणा से प्रकाशित करना बाध्यता है किन्तु अधिकाँश कार्यालयों ने इसकी अनुपालना नहीं की है और अपनी शक्तियों के अतिक्रमण में निर्णय ले रहे हैं| वित्त मंत्रालय के बजट खंड, राज्य सभा सचिवालय, लोक सभा सचिवालय इसके सुन्दर उदाहरण हैं जहां नीतिगत मामलों में जन परिवेदनाओं को, बिना किसी जनप्रतिनिधि की अनुमति के, सचिव स्तर पर ही निस्संकोच निरस्त कर  दिया जाता है| इससे यह विशवास नहीं होता कि देश में लोकतांत्रिक सरकार कार्यरत है|   
 
लोकतंत्र में सरकारी अधिकारी अपने विभाग प्रमुख के प्रति जवाबदेह हैं और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं| किसी भी नीतिगत मामले में हस्तक्षेप करने, संशोधन करने या स्वीकार करने का अधिकार मात्र जनप्रतिनिधियों को ही है| निश्चित रूप से जब किसी नीतिगत मामले को स्वीकार करने का किसी अधिकारी को कोई अधिकार नहीं है तो फिर उसे अस्वीकार करने का भी कोई अधिकार नहीं हो सकता| यदि अस्वीकार करने का अधिकार ही नीचे के स्तर पर दे दिया जाए या प्रयोग किया जाए तो फिर उच्च स्तर पर ऐसा कोई अधिकार अर्थहीन रह जाएगा| अतेव कृपया व्यवस्था करें कि समस्त अधिकारियों की शक्तियां सहज दृश्य रूप में प्रकाशित की जाती हैं और नीतिगत मामलों में कोई भी निर्णय, यथा स्थिति, सशक्त सम्बंधित मंत्री, समिति या अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं लिया जाये ताकि देश में वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो सके| आप द्वारा इस प्रसंग में की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इन्तजार रहेगा| 
 
सादर,
 
भवनिष्ठ

मनीराम शर्मा                                       दिनांक: 05.03.2013
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