Author Topic: Articles By Parashar Gaur On Uttarakhand - पराशर गौर जी के उत्तराखंड पर लेख  (Read 42556 times)

Parashar Gaur

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भारत में लुप्त होता .. लोक साहित्य  ;  by parashar gaur


    राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय दिनकर जी ने ठीक ही कहा था !  सभ्यत्ता जब जब अत्यन्त सभ्य हुई तो वो  नपुंसक हो जाती है और जब जब सभ्यत्ता नपुंसक या बीमार हुई तब तब साहित्य शैली जीने पर मजबूर हुई !   आज का बीमार साहित्य और नपुसक सभ्यत्ता दोनों एक ही शैली में जी रही है !  देखा जाया तो मनुष्या की मजबूरी है जीना  इसीलिये आनेवाले समय में ना तो मनुष्या ही मरेगा और नही साहित्य !  सुनने में  आया ह कि हर शत्ताब्दी  एक नई सभ्यत्ता जन्म लाती है या जन्म लेन का इंतज़ार करती है !   आलम ये है कि बिना सोचे समझे इस सभ्यत्ता कि दौड़ में हम दौडे जा रहे है और पीछे छोडे जा रहे है अपनी लोक संस्कृति , लोक साहित्य जो हमरी  आने वाली पीड़ी उनके और हमारे सामाजिक समंधो के लिए बहुत आवश्यक है ! आज जब हम अपनी परम्परा अपनी संस्कृति , अपनी बोली , अपना लोक साहित्य  को अनदेखा कर नई संस्कृति नई   परम्परो को अपनाकर  इस से मुह मुड़कर आगे जाते है तो हम अपनी भाबी पीडी के साथ अन्या कर रहे है !  कल आने वाली पीड़ी हमें इसके लिए अवशय कोशेगी इ हमने अपने युग कि धरोहर को दूसरे युग के उत्तराधिकारी को देने अपने कर्तब्य का पालन नही किया  !
 
   किसी भी देश का मूल्यांकन  करना हो, या उसके बारे में जानना हो तो उसके पीछे उसके लोक संस्कृति व लोक साहित्य को देखना होगा ! जितना समर्ध उसका साहित्य    अवम लोक संस्कृति होगी वो उतना ही समर्ध होगा !  भारत जिसमे लोक साहित्य अवम लोक संस्कृति का अपार भण्डार है  जिसके अंग अंग में लोक संस्कृति का वास है !  जिसमे बिभिन प्रकार कि बोली भाषाऐ बोली जाती है जो भारत की आन बाण व शान में अपना सहयोग दे रही है भले ही यहा सहयोग मौखिक रहा हो , लिखित नही ! ब़स यही पर मार खा गए ! काश आज वो लिखित होता तो हमें ये सब लिखने और उसकी वकालत करने कि कोई ज़रूरत नही आन पड़ती !
 
  स्वतंत्रता प्राप्ती की बाद लोक साहित्य व संस्कृति प्रति विद्वानों ,सामाजिक , कार्यकर्ताओं, राजनैतिक पार्टियो व राज नेताओं का ध्यान अवशय गया लेकिन हुआ क्या ?   इसके नाम पर कमेटिया अवशय बनाई गयी जिसमे  उसमे अपने चहेते व चाहनेवालों को इसका अध्यक्ष बनाकर उनको कार ,कोठी ,बँगला, नौकर चाकर देकर इसकी  इती श्री कर दी गई, ! नतीजा ये हुआ जो काम हो भी रहा था वह रोक गया ! लुप्त होत  लोकसंस्कृति , साहित्य को अंधेरे के गुमनामो के ओर धकेल दिया गया  ! 

    आज आलम ये है सरकारे चाहे वो केंदर की हो या प्रान्तों की  वो लोक गीतों व लोकसंस्कृति के नामों पर  केवल सांस्कृतिक या मनोरंजन तमाशों का आयोजन करती आ रही है ! लोक गीत व लोक संस्कृति दूर दूर तक तो दिखाई नही देती हां अलबता मुम्ब्या फिल्मी डांस और आइटम डसो के सिवा कुछ भी नजार नही आता  !  एक और बात जब सरकार ही जिसके आधीन रख रखावा के साधन है जैसे आकाशवाणी दूरदर्शन विश्व विद्यालय  तथा साहितिक संस्थाए होने के बाबजूद वो उसको रखने अथुवा सँभालने में असमर्थ है तो वहा चाँद एक व्यक्ति   kese rakh payegaa !
 
      लोक तंत्र में वर्गगत अहम का अंत नहीं जिसका परिणाम यह होवा की लोक संकृति उनकी नजरो में गंवारों की भाषा मणि जाने लगी और लोकगीत और लोकसाहित्य का मजाक उडाया जाने लगा !  समाज में समय समय पर बदलाव आया प्रगति और उन्नति नई दिशाए खुली ! समाज और व्यक्ति विकास की ओर अग्रसर हुआ ! नई और ऊँची  संस्कृति ने जनाम लिया पर ध्यान रहे ऊँची संस्कृति भी नीची कहा जाने वाली संस्कृति से ही पैदा   होती है ! और जो अपने को उच्च वर्ग बतलाने की कोशिश करते वे यह क्यूँ भूल जाते है की वो भी इसी निम्न वर्ग की दें है ! सचाई तो ये है की सहर का सहरी और ग्राम का ग्रामीण संस्कृति की नजर में दोनों एक  दुसरे के पूरक है ! कोइ छोटा बड़ा नहीं है ! 
 
    हमारी संस्कृति व सभ्यता आज दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है क्यो की  समाज का पडा लिखा वर्ग वो अपनी लोक साहित्य , लोक संस्कृति से अपना पीछा छोड़ता जा रहा है ! अपनी आँखों में पासचता की संस्कृति का आएना लगाकर अपने  अपनी संस्कृति को अनदेखा कर रहा है !  अखीर संस्किति क्या है  वो किसी एक व्यक्ति की भी हो सकती और एक समाज की भी !  आवश्कता इस बात की है की सब मिलकर चले , अपने  विचारो का   आदान प्रदान करे  जिस से उनका ही नहीं बल्कि राष्ट्र का चौमुखी विकाश हो सके !

 

Parashar Gaur

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गडवाल से पहला काम किसने किया और कौन था  और कब  ?



१..एवरेस्ट पर चडनेवाली पहली  गड्वाली महिला थी  ..   बचेंद्री पाल  !
2. गडवाल से पहला एम् एल सी थे  ...     ..................मुक्न्दिलाल बैरिस्टर !
३. गडवाल के पहले जिला बोर्ड  के अध्यक्ष थे .. ...  ......सक्लानंद सकलानी  !
४. गडवाल से पह्ल्ला सूबेदार मेजर बने  थे ..       ........पधाम्म सिंह रावत !
५. गदाल्ली बोली के पहले गीतकार का  एच एम् भी से रिकार्ड बनना .. जीत सिंह नेगी !.
६. गडवाल का पहला विक्टोरिया क्रास मिला था ..      ....... दरवान सिंह नेगी को   !
७. पहली  दफा  कोर्ट माँ ,  किसने गड्वाली माँ बयां दिये   .. नागपुर १९६८ माँ  !
८. गडवाल माँ सबसे पहली सराबे दूकान खुली    ...       ......जोशीमठ माँ १८९० माँ १
९.  सबसे पहली नेशन पेपर में गड्वाली में चिठ्ठी छपपी गई .. १९७५  नव भारत टाइम्स माँ !
१०. सबसे पहली गद्वालियो  की भारती होई थी    ................ १८५८  पिथोरागड में !
११. गडवाल की सबसे पहली फिल्म थी   .............................. जग्व्वल  सन १९८४  !
१२ गड्वाली फिल्म में सबसे पहला स्वर दिया  ........... ........  अनुराधा पोडवाल / उदित नारायण
 ..............................................   ....................  ..... ........    कुसुम बिस्ट/ सत्येंदर फ्रारंदियाल ने  !
१३. पहली गड्वाली  फिल्म के निर्माता है          ....... ......  पराशर गौड़ !
१४ पहली गड्वाली  फिल्म के हीरो/ हिरोइन है  ...........     .......बिनोद बलोदी / कुसुम बिष्ट !
१५ गड्वाली फिमो में  पहले संगीत दिनेवाली संगीतकार है ....     नरेंदर नेगी  !
१६ दावाल का पहला राजा था  .........................................  ...... आज्यपाल
१७  सबसे पहले  गड्वाली में  हैण्ड बिल  छापा था ......... ........   सन १९६० में
१८ गडवाल / हिन्दोस्तान से पहले डी लिट  थे .................. .........डाक्टर पीताम्बर दत्त बर्थवाल
१९ पहली दफा ब्रिटश गडवाल बना  .........................   .................सन १८१४ में 
२०. गडवाल का अंतिम राजा थे ....................................   .........   राजा मानवेन्द्र साह !
२१ गडवाल का अंतिम डिप्टी कमिसनर  थे  .............................   मिस्टर स्स्तव   !
२२ सबसे पहले गडवाल को  कुमाओं  से अलग किया गया ........    सन १८३९ में !
२३. गडवाल में पहलीबार बंदोबस्त सुरु हुआ  ................................ सन १८८० में !
२४ गडवाल से सबसे पहला व्यक्ति सी एम् बना  ...........................  हेम्वंती नंदन बहुगुणा   !
२५ गडवाल सबसे पहली चिको आन्दोलन सुरु हुआ          ......... रैणी से गौरा देवी आदि  ! 
                   
                                                                                                                               पराशर  गौड़





Parashar Gaur

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"एक सोच  "

अब नि बगदी वा कुर्रे ...
ज्वा करदी छै  गैत थेँ ऐड़ी
झणी कख लुकिगे बण की फूलू गंध 
ज्वा मह्कादी छै मी अर चहेरा  थेँ  !

ओ अकासा भी झणी कख छिपिगे
जैकी नीली गहरी  खुचली माँ
बिना कै रोक टोक का घुमदा छा
मिलों मिल ... अपना आप  !

व रात भी नजानि कख चंलिगे
जैमा हम सीदा छा शांत चुप चाप
बिल्म्या रेंदा छा  स्वीणो  माँ
छुई लागोंदा छा अपणा बे-माता से !

अभी भी मी तलास दू छौ
वो बाटा .., जू पहुन्चदी त्वेतक
व आसा अभी भी जींदा चा म्यारा दगड
एक दोस्त अर दोती का रुप माँ  !

                                    17 may 09
             पराशर गौड़
 


Parashar Gaur

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"पछ्य्ण"

जब
मी अपनी परछाई से
रूबरू हुइयु...

अर जब मिन...
कोशिश करी अफु थै
जण्णा की  ... कि ,

तभी ......
म्यार छैल -ल  मयारू हत पकड़ी
बोली ... दोस्त ....
मे त्वै  थेँ  जण्दु / पछ्य्णदू  छौ !

         पराशर गौड़  may  १६ 2009

Parashar Gaur

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गडवाल पर कब.. किसने क्या लिखा  ?

९६              गड्वाली पवण            सल्किरम वैष्णव                 गड्वाली मैण/अखण
१९५२           जैनंद गरुव गान           शान्ति प्रकाश                       गुण गान
१९५३            नौबत                    चक्क्र्धर बहुगुणा                 गीत/मंगल
१९६५            बुरांस                     गणेश शर्मा                       कविता
१९७३            दो नाटक                 अबोधबंधू बहुगुणा                   नाटक
 "                गड्वाली लोक-गीत        डाक्टर गोविन्द चातक            शोध किताब
१९७४            गड्वाली लोक न्रत्य        डा सिबानंद नौटियाल              गीत/ न्रत्य
१९७६            घोल                         अबोधबंधू बहुगुणा                पुराने गीत /मंगल
१९७६            गाद मेटी गंगा               अबोधबंधू बहुगुणा               ड्वाली लेख
१९७७            फंची                          लोकेसा नवानी                     कविता
  "               बटोई को रैबार                पूरनचंद पथिक                      कविता
१९७८            हिमाला को देश               दीनदयाल बन्दुनी                  ''   
  "                     अन्ज्वाल                स्व  कनह्यालाल डन्ड्रियल           "
१९८०            ` धै                         ७ कबियो की रचना
                           (    पराशर/नेत्र सिंह/ उनियाल कनह्यालाल डन्ड्रियल आदि  )      ''     
                                                       
"                  वीरबधू देवकी                 भजनसिंह                                     
 १९८१            शैलवाणी (१७५० से लेकर आज तक कबियो की रचना)                    कबिता
  "                गारी                           दुर्गेश घिदियाल             कहानी
१९८२             खिल्दा फूल -हंसदा पात     ललित केसवान                   कबिता
  "                 रमछोल                       चंदरसिंह राही                  ''           
   "                गडवाल  राइफल्स             योगेश पंथारी                  दस्तेबाज
  १९८३             बुग्याल                        सरस्वती शर्मा                 मागाजिन
                                                              "                 
                      गुठ्यार                       रघुबिरसिंह अयाल              कबिता
 "                    धुयाल                       अबोधबंधू बहुगुणा            गीत /मंगाल
 "                    जग्वाल                     पराशर गौड़       फ़िल्मी कहानी /पटकथा
 "                    जंगलमाँ -मंगल               वान सिंह अकेला           कबिता
    ८४               कांठा माँ आन से पैली       देवेंदर जोशी                                                                                                    गद्गुन्जन                                                                 
१९८५              इल्मातुदादा              जीवानंद खुगशाल                             ''           
 "                 गायत्री की बोई            सुदामा प्रसाद प्रेमी            काहानी
१९८६              हरी हिन्द्वान               ललित केसवान               नाटक   
 "                 शेरू                     भीमराज कटैत               उपनयास
 ''                मुवारी                     दुर्गा प्रसाद घरिद्याल         काहानी
१९८८             मन्डाण                             
१९८९             पाराज                     मुम्बई                  मैगजीन 
 "                मयारू ब्वाडा               पूरनचंद पथिक           कविता
१९९४             दिक्या दिन, तपया घाम      ललित केसवान              "
 "                            कंठुमा आण से पैली         देबीप्रसाद जोशी             "
१९९६             दैहसत                 अबोध बंधू बहुगुणा             "
 "                कणखिला                     "                                   "
१९९८             कुयेडी                 कन्हयालाल दौन्द्रियाल           "
 "               उत्तराखंड या उत्तराँचल    केदारसिंह  फोनिया            दताबेज
२००१            आंदी जांदी सांस          मदन दुक्लान                  "
२००२            ग्वाथ्नी गौ  बैटी         सपादक  मदन दुक्लन           "
२००३            उत्तराखंड की प्रतिभाये     चन्दन डांगी               शोध स्नाग्रह
 "                पीठी पैरोलू बुरांस         बीणा पाणी जोशी           कविता
२००५            गड्वाली आणा पखाणा    सुदाम प्रसाद प्रेमी            दस्ताबेज 
२००६            अपडास का जलुडा        पूरनचंद पथिक             कविता 
२००७        उकाल- उंदार          पराशर गौड़  (टोरंटो कनाडा से )     कविता


  ये सब किताबे मेरे पास यहाँ कनाडा में है !     
  नोट : छापने से पहले  संग्रहकर्ता से अनुमति लेनी आवश्यक है.  या नाम देना जरुरी है
                                                                                      संग्रहकर्ता   ; पराशर गौड़
 

Parashar Gaur

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 नतीजा

इस चुनाऊ में देखकर , समझ में है आता
पड़े है जिसपर  जिसे जूते ,   है वही जीता
अडवानी पर पडा न जूता,  पडा है खडाऊ
इसीलिए तो जीत न पाया पी एम् वेटिग बुडाऊ !
                       
                               परशरर गौड़ 

Parashar Gaur

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                        त्रिया चरित्र  
 
   खेती पाती सभला का बाद,   अक्स्स्रर गौ माँ,   लोग बाग़ गौ का पंचैत चोकमाँ  ,  क्वी    तासम त   ,  क्वी  चोपड त,   क्वी   गप-सपमाँ  बिल्म्या रैदा छा !  बाजा बाजा खडा ह्वे की , तमसागेर बणी ,   खिलड़यु थै अप्णि अप्णि रिया   दिंदा थकदा नि छा   ....
 " अअबे - ब्बै...,   तै ना , तै चुलौ----  तै  ......    अब्बै ---,  तै फेक तै .. हां.....!  "
 बाजा बाजा  उकी हरकतों देखी ,  तासु थै  गुस्स्म फेकी  बुल्दान  "  हम नहीं खेलते .. ये.. इन्ही भी देखता और उन्ही भी ..!"
 एक कुणम  फजित्यु   ,  जैकी उम्र लगभग ५० का करीबन राइ होली वो ,  आगै भुव्वडमाँ और दगड आग  छो  सिकुणु !  वी चक्डैत मंडलिमा , गौकु हि ,   एक भारी छटियु चक्डैत इन्दुरु भी छौ बैठियुँ !    बातु बातुमा वेंन फज्युतु से बोली   " बुवाड़ा जी आपै उम्र क्या होली "?

" कनु ?"   क्युओ छै पुछुणू ....  फज्युतुल बोली  !

 "  न ना .. इनी  सुदी छौ पुछ्णू .."    इन्दुरुल  फिर पूछी  .."  फिर भी ६० -६५ त, हवेल्या हि  !   "

 "   ४९सओ पुरु हवैगि ,  ५०सो लग्यु  च  "   तभी आगै चिंगारी उतडेकी फजित्यु का कच्छा पेट घुसिगे  !  चम्म खाडू ह्वेकि  वो ,   दुई हत्थोंन कच्छा थै झड़दा झड़दा  बोली  ''  ह्या पडी बैईइ का  ..., फुकेगे छो रै....?
" सुकर च बोडा ... सरकारी भांडा बचिगिनी ....निथर ,   बोडिल कयाली छो त्यारु भैर  निकाल ..   इन्दुरुल चुस्सकी  लेकी  बोली ...  !"  
ये सुणी सबी हैसण बैठी गिनी !   जनि फजित्यु बैठी  इन्दुरल फिर सवाल कारी ...

 " अछ बोडजी य बतावा .. आपो ब्यो कयात ,  २५ ३० साल त हवे गे होला .... "

 फजित्यु बोली .."--- हां"

" त तुमुल , कभी , त्रिया  चरित्र भी देखी या सूणी  "  

" न  भै .. मिनत नत सूणी  अर ना कभी देखी ..." फजित्युल जबाब दे !

" त एक काम करया , घोर जान्द्ये  बोडीकु बुलया ... "  मिल खाणु तब खाण,   जब तू , मिथै   , त्रिया  चरित्र देखैली !"   बस अप्णि बात पर अडि जाण ..  क्या बिग्या ...! "    खैर .. फजित्यु जनी घोर गे  बोडिल  बोली ...

" चला ,  हत खुटा धवा   .. रसोई सिलैणी चा ! "
वैथै इन्दुरु का बोल याद ऐनी .."  खाणु तब खैनी जब बोड़ी तिरया चरित्र देखैली ! "
 चुलै साम बैठी वेल बोली ..... " मिन खाणु तब खाण जब तू  मी थै  तिरया चरित्र देखैली ... !"
जनि वींल सुणी .. वा खोली सी रैगी , कि , ये बुड्य थै आज क्या होइगी !  कन  छुई च यु कनु ?
वीं बोली ..." चला खाणु खा ...! "
फजित्यु ,   अपणी जिद पर अकडी बैठी फिर बोली ..  "  पैली मी त्रिया चरित्र देखो तब खोलू खाणु "
वा बोली ..   " अछू.... 2..,  भोल बतोलू !  अबरी  खाणु  खेल्या ...!
फजित्यु बोली .." सच ! "!  
" --- हां भै हां " -- भोल जरूर बतोलू .. चला खाणु खा !"        सियु साब ,  वैल खाणु खाई अर सिग्या !
 ,    नौनी कु ससुरु याने समधी जू गाड़ का छा ,  वो  दिन मनी  , खबर सार लिणु आज ही पहुंचा !  गाड़ का पास हुणा से चार पांच माछा लेकी आया ! रामा रूमी हवे !   बोडिल याने सम्धणील २ माछोकु  छोल बाणाई अर ३ अलग रखी देनी  !  खाण का बाद  समधी त गया अपण गौ !  
     बोड्ल , बोडी कु बोली .. " भोल मथी डांड का पुगडो कुव्वादु बोतूणु जाण सब सामान धेरिदे  ,  अर हां ... " याद राखी...,   भोल  मिन तब खाणु खाण , जब तू त्तिराया चरित्र  देखैली   ! "  
 बोड़ील बोली   '---- अछु अछु .....दिखौलू दिखौलू ! "

       वा बिनसिरिम उठी,   डाँडा गे ,  अर बाकी माछो थै वख खडे एग्या  !   फजित्यु सुबर उठी !  बल्दु लेकी डाँडा गे !   उ थै  औरी भी गौका ह्ल्या छा... हैल लगाणा !  एक पुगडा बौणा का बाद ,  जनी घाम आन बैठी ,  बोड़ी क्ल्याऊ रुवाटी लेकी वख पौंची !  जनी वेल पुग्ड्म हैलै सियु लगाई ......, सियु का दगड घप  एक माछु भैर  .....  वो चिल्लाई     " .---. हे बीरू, .. हे रामू ..  हे दर्शुनु  अरे ,   म्यारा पुगडओ माछा निकला छी  ... माछा ! "  
 बोडिल सया माछु लुछी लुकाई चदरा पेट ध्रौरि बोली " ---  हैल लगावा हैल  ! "  
   फजित्यु हैल लगोण लगी ! कुछ देरा बाद गप हैकू माछु भैर !,    दिखदै वे ,  वो बोली ... " ----अरे हैकू ??.."    वेल समणी क ह्ल्यौ  थै  आबाज दे
 " ---हे राजू ,  हे दर्शुनु अरे यख आवदी यखअ  ....!"
जब तक वो  आंदा ...,  वे से पैली बोडिल ,  फिर वो माछु लुछी लुकै दे  !   फजित्यू चिलै चिलै बुनू राई  "   -- ऐ म्यारा पुगड़ोमा माँ  माछा निकलणा छन माछा  ! "
 ह्ल्युन हैल छोडी ,  सीधा वेका पुगडौमा पोची पूछी  "----  कखछिन भै ... माछा ???? "
       वो  कुछ बुलुदु ,  वे से पैली बोडी बोली  " -- अरे .. हुँदा त,  मी नि दिखुदु ... , कख छा लगया !  वो राजू से बोली ......" '-- दुयुराजी ..., तुमारा  भैजी ,  सुबरलेकी यख ऐनी ,  सैद .. हर्पणा लगी गे  !"  
तभी ..दर्शुनुल बोली .. "--- हे भै  सच बुनू छै..?   माछा छाया की कुछ औरी ...  "
फजित्युलू बोली  " -- हां भै हां .. माछा छा माछा  "
'-- पर , कख छना ! हम भी त दिखा ! "  
      तभी बोडिल  बोली  ''--- बेटा ...,  फिर द्याखा ...,  सी छन माछा - माछा लगया ..  मेरी माना त यू थै ,  घोर ....  ली चला ! रओखली वोखाली करला तब जैकी  सैद कखी .....!."    
        सुऊ , तौन बल्द ख्वाला अर फजित्यु थै पकड़ी घोर लेकी आया !  बोडिल रखोलया बुलाऊ !  वेल सबसे पैली  क्न्डली का  मोट्टा मोट्टा टैर मगैनी ,   फजित्यु थै नगु कै अर दे दना दन २...  क्न्डलील सडको !   अर हरबेर  बुनू .. "---अब वोल ....,, क्या छाया ? "
फजित्यु बोले  ' ---  माछा छा...,  माछा ..... औरी क्या ? "  

 फिर बुनु   " ...     माछा छा माछा ...  !"     फिर दे क्न्ड्ली .,    क्न्ड्ली वेकी पीट पर दम्मला उप्डि गैनी !  वो पीडा क मारी जब कररहाण  बैठि त ,   बोडी बोली  "--- अब बस कारा .. बाकि भ्वोल दिखला ..1"      
       रात जब फजित्यु सीण बैठि त बोडी बोली   "--- पीडा हुणीच त ,तेल लगे दियू !"
            '--हां" लगे दे "
    तेल लगाद ल्गाद व बोली .."------  तुमल अभी भी तिररया चरित्र  नि द्याख ..  कि  औरी दिख्न्णै!
बोड़ा बोली " ---- समझिग्यु ...समझिग्यु // "   जर्रा  उन्कुवाई  लगो तेल ! तेल लगाना बाद कन्दली का उठया दमला बैठण लगी ! वे थै आराम आण लगी !

 पराशर गौड़

Parashar Gaur

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" पंच्या उंगली बराबर नि हुन्दी "
 
      चुनो जनि ऐनी  उमीद्वार कुकर जानी  घर - घरु ,  दैलि दैलूमाँ रिंगण बैठा ! बाजा   बाजा अपना दगड लनग्यात लेकी पौंचा गौ गौ ....  एक उमिद्रार  एक बुड्डी क पास जोकि क्या बुन बैठी ...
 
' -- बोडी ..समन्या .. खूब छाई "
 
 वींन कपाल पर हाथ लगैकी,  अप्णि याद दासता पर जोर डाली ,  देखि भाल्ली उत्तर दे  " ___  ब़बा ..., मी  पछ्यणू नि छो,  कखी   कु  छे तू  ???? "  
 
" --मी , मी यख बिटि चुनो छौ लणु  ..   अर तिल ... ,  इबरी दा अपणु वोट मिथैई दीण  "   मी अगर जीती जौलना.... त,   वख जैकी तेरी पन्सन लग्वाई दयुलू  अर ,  जत्गा भी तेरी परेसानी चं वो दूर कै  दयुलु ! "
 
बुड्दिल बोली ..... " -----  बबा ... ,  आज से ५ साल पैल एक ई छौ !   वैल भी इनी बोली छौ  ! जितणा बाद  उ  आज तक कखी  नज्जर नि आयु  "
 
 
उमीदवार  बोली ...'---- बोडी ........., पंच्या उंगली बराबर नि हुन्दी  ....ईईईईईई  ...?"
 
बोडील तपाक से उत्तर दे .... " ----- पर बाबु ...  खांदी दों त,  उ भी, सब्या एक हुये जन्दिनी  ! "
 
पराशर गौड़
 

Parashar Gaur

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अरेंज मैरेज

बहुत सालो से बाहर हूँ
कहने को एन आर आई  हूँ
मेरे तमाम मित्रो की शादिया होगई
पर मै अभी तक कुंवार हूँ !

यहाँ एक दो के साथ 
डेटिग करके देख लिया है
है कौन कितने पानी में ए दो चार
मुलाकातों में पहिचान लिया हो !

यहाँ की कन्याये , दिखने में सुंदर
अंदर से आव्वाज नहीं
हिर्दय से .. हिर्दय बिहीन
भाबनाये तो इनमे दूर तक दिखती नही !

कोई देखे जबे
कोई डालर देखता है
कोइ देखे बैक बैलंस
तो कोई घर को देखता है !

सबकी एक ही बात
सबकी एक ही धेय है
इसके पास क्या है? कितना है ?
ए स्टेट है ,  या गे है ?

अबतो आदत सी होगई
आटैची सदा साथ रखता हूँ
जाने कब कौन , रात को  कह दे   
"निकल " ए मान के चंलता हूँ  !

सोचा भारत से भारतीय कन्या से
शादी करके आता हूँ  ................
पति को परमेश्वर जो  माने 
उस कन्या को  बरता  हूँ !


कुंवारा रहना भी,   एक बात है
न शादी होना भी एक राज है !
थी मन में जिज्ञासा  भारत से ही शादी करूंगा
इसीलिए अभी तक कुंवार हूँ
बिचार आया मन में अब तो शादी कर लू  !


भारत में चाची  को  फोन किया
चाची भारत आता हूँ !
मन बना लिया है अब तो
आ कर शीघ्र ब्याह रचाता हूँ !

चाची बोली.. आ-हो भाग्य हमारे
जो , तुने ऐसा सोच लिया
पुरखो का नाम करेगा रोसन
जो, तुने ऐसा कर लिया !

वे बोली .. बोल कैसे चाहिए
माडर्न ,  एक्स्ट्रा माडर्न या एल्त्रा मार्डन
या शीधी साधी  ...........
दाहेज में क्या चाहिए बता
कार. बंगला  या पैसा - फैक्ट्ररी 1

मै बोला ... नहीं नहीं ..
भागवान  का दिया सब कुछ है .. ए जान लो
मुझको तो आप लोग
बस एक सुंदर शुशील कन्या दिलवा दो !

पहुँचते ही देस अपने
अपने  अपने के रिस्तो को लेकर
लाइन लगी थी
कोई अपने माँ/बाप के साथ
तो कोइ अपने बोया फिरेंद के साथ खडी थी

जब देखा मैंने सब को
देख उन्हें , आँखे चौन्ध्या गई थी
ड्रेस देखकर उनकी , थी आंखे फटी फटी
अक़ल मेरी दंग थी
उपर से कमीज तंग , तो
निचे से स्कर्ट जरा ज्यादा ही कम थी !

मैंने चाची से कहा ... ये  क्या है ?
ये है भारतीय कन्याये ?   ऎसी होगी
ये तो मैंने कभी सोचा ही नहीं
बोली चाची ..... बेटा ..
ये तो  सिर्फ कट  पीसे  है
अभी तुने .. थान तो देखे ही नहीं !

वे बोली... पुत्तर  ज़माना बदल गया है
इन्स्संको बदलते देर नही लगती
ये तो मैंने इन्हें है रोका  बरना
ये सब बिकनी पहन के आती !

दूर खडी एक लडकी
जो साधारण आम सी लगती थी 
वो मुझको पसंद थी आई
जाकर पास उसके मैंने परिचय दिया
आगे बात बडाई .................. !

जैसे ही मैंने कहा हेलो   
उनसे तपाक से हाथ बढाया
बोली . हाउ यु  डूईंग , हाउ आर यु
मेरा हाथ पकड वो हिलाती बोली   
टाक टू मी , आई एम् टाकिंग टू यू
बिना रुके  वो शुरू होई
मुझ से वो  मेरा इन्टरब्यू  लेती रही !

क्या करते हो ? कितना कमाते हो ?
एच आर १ में हो ? या पि आर में हो ?
दारु सिगरेट और कोई बिसन है तो बत्ताओ
लाइफ पार्टनर बाना है कोई खेल नहीं
तुम्हे डाएबिटीज  है भी है ,  या  नहीं समझाओ  !

मम्मी  पापा  साथ है
या इकेले रहते हो  तिनिक बत्ताए
मै स्वतंत्र प्रवर्ति की हूँ
मुझे किसे की रोक टोक नहीं पसंद
ऐसा वर चाहिए  !
शादी से पहले सारी बात खुलके होजये तो
बात अच्छी हो जाएगी
शादी के बाद लगेगा पता तो
हमारी तो ऐसी की तैसी होजायेगी !
वो बोली... बोलो,   `क्या कहते हो
कोर्ट चले ,  या यही  शादी करते हो ?

ये सब पूछने के बाद वो रुकी .. बोली
मैं ने जो पूछना था पूछ लिया
अब है तुमाहरी बारी पूछो ....

मै बोला ..
सुनकर आपकी बाते
मैंने ये निर्णय ले लिया है
देबी....,
फिलहाल तो मैं शादी का
निर्णया त्याग लिया है !

पराशर गौड़

दिनाक १४ जून २००९ १०.२२ रात को



Parashar Gaur

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सिकैत



प्रेमिक्ल
प्रेमी से कै सिकैत
मी देखिकी , तुमाहरा मन माँ
केउजी  नि उटदी  तरंग ....
क्यों नि धड्कुदु वो ,  श्याम  सुबेरा



प्रेमी बोली .....
धड्कुदु च .. धड्कुदु च  डियर
पर महसूस कंक्वे कारी
आर्टिफ़िसियाल  जू  ठैरा ... !! 


२. पद्मा श्री



एक कबिल..
दुसरा कवी से बोली ...
हे भै,  सुण्ण्म आई की तुम थै
पद्मा श्री मिलण वाली चा ............   
अबत बही मुह मिट्टू करवा दो



दुसुरु बोली ... भया..    ..../////
एक काम कारा
आप श्री थै रखा
मैथै,  पद्मा दिलवाई दो  !


 

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