Author Topic: Articles By Parashar Gaur On Uttarakhand - पराशर गौर जी के उत्तराखंड पर लेख  (Read 42269 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

Parashar Gaur Ji such a personality which do require any introduction. We have already conducted a live Chat session of Gaur Ji, where he has replied answers on various issuses of Uttarakhand, asked by our members. (Here is the relevent thread)

http://www.merapahad.com/forum/celebrity-online-!/live-chat-with-founder-of-uttarakhandi-cinema-!/


Gaur JI has very kindly agreed to write some aritcles on some of burning issues of Uttarakhand which i am sure these would inspire our Uttarakhandi brother and sisters to do something for their state as well as the Country.


जैसे कि मैंने पहले भी कहा गौर जी एक ऎसा नाम है, जिसे किसी परिचय कि जरूरत नही है। उत्तराखंड के सिनेमा कि नींव रखने वाले श्री गौर जी है जिन्होंने ने १९८३ मे पहली उत्तराखंडी फ़िल्म "जग्वाल"  बनाई थी।

गौर जी ना केवल एक फिल्मकार है बल्कि एक कवि भी है जिन्होंने उत्तराखंड पर कई कवितायें लिखी है।

आशा है आपको गौर जी के लेख पसंद आयेंगे।

एम् एस मेहता


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गौर जी का संक्षिप्त परिचय
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Mr Parashar Gaur Ji

Parashar Gaur was born on May 3rd 1947 in a small village Mirchora, Aswal Syun Garhwal (formerly in the state of UP) now in Uttarakhand. His father late Pt. Tika Ram Gaur was a well-known astrologer and was settled in Delhi. Later Mr. Parashar Gaur created ‘Garhwali Shahitya Purshkar” in memory of his father, a first ever award for literature in Garhwali dialect.
His Basic education was held in Retholi, sola and Mandaneshar in Garhwal. After Passing Middle his father called him to Delhi for higher education. He was admitted In Mata Sundari Higher Secondary School at Rouse Av., in Delhi, but he quit Day school to support his family by working day and educating himself at night as a private candidate. He did his 10th and 12th standard as a private candidate and got His BA degree from Lala Lajpat Rai Degree College Shahibabad, U.P.
At the age of 10 he made his theatre debut as a child actor “Rohtash” in a play called “Raja Harish Chander” organized by his village folk at his village. During his school days he participated in various cultural programs.

In 1967 when he was 20 years old he wrote his first Garhwali Full length Drama called “Aunsi Ki Raat” which was staged on theatre for the first time On 28th February 1969 under the banner “Pushpanjali Rangshala” . Since than he has written more than a dozens plays among them such as Choli, Gaway, Rehershal, Timla ka timla Khtya and were repeated more than 10 times in theatres in and around Delhi.

As a poet he has written more than 60 songs which were broadcast by AIR, Delhi. His has also written more 300 Garhwali poems which have been published in different newspapers and magazines.

After a long wait, he finally produced the first Garhwali Feature film “Jagwal” in 1983.
 

chattansingh

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dosto mai yaha per gaurji ek kavita jo unone abhi abhi lekhi hai perstut ker rahahun .Padker please batye ki kaise lagee
Thanks

chattansingh

पराशर गौड़ की एक कविताः पीड़ा
By Tarun • September 17, 2008

पराशर गौड़ उत्तराखंडी सिनेमा के जनक कहे जाते हैं, इनके द्वारा पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी पर निर्मित फिल्म गौरा अभी इस साल के शुरू में रिलीज हुई थी। इन्होंने फिल्मों के साथ साथ कई नाटक और कवितायें भी लिखीं हैं, आज इन्हीं की एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ जो इन्होंने कल-परसों शायद बम धमाकों से व्यथित होने के बाद लिखी होगी।

आज की शाम
वो शाम न थी
जिसके आगोश में अपने पराये
हँसते खेलते बाँटते थे अपना अमनो-चैन
दुःख दर्द, कल के सपने!
घर की दहलीज़ पर देती दस्तक
आज की सांझ, वो सांझ न थी … आज की शाम

दूर छितिज पर ढलती लालिमा
आज सिंदुरी रंग की अपेक्षा
कुछ ज्यादा ही गाडी लाल दिखाई दे रही थी
उस के इस रंग में बदनियती की बू आ रही थी
जो एहसास दिला रही थी
दिन के कत्ल होने का?
आज की फिजा, वो फिजा न थी …. आज की शाम

चौक से जाती गलियां
उदास थी …
गुजरता मोड़,
गुमसुम था
खेत की मेंड़ भी
गमगीन थी
शहर का कुत्ता भी चुप था
ये शहर, आज वो शहर न था… आज की शाम

धमाकों के साथ चीखते स्वर
सहारों की तलाश में भटकते
लहू में सने हाथ ……
अफरा तफरी में भागते गिरते लोग
ये रौनकी बाजार पल में शमशान बन गया
यहाँ पर पहले ऐसा माहौल तो कभी न था
ये क्या हो गया? किसकी नजर लग गयी … आज की शाम

वर्षो साथ रहने का वायदा
पल में टूटा
कभी न जुदा होने वाला हाथ
हाथ छुटा
सपनों की लड़ी बिखरी
सपना टूटा
देखते देखते भाई से बिछुड़ी बहिना
बाप से जुदा हुआ बेटा
कई माँ की गोदें हुईं खाली
कई सुहागनों का सिन्दूर लुटा
शान्ति के इस शहर में किसने ये आग लगाई
ये कौन है? मुझे भी तो बताओ भाई … २ … आज की शाम

- पराशर गौड़
[कनाडा १५ सितम्बर २००८ शाम ४ बजे]

Categories: व्‍यक्‍तिव, शायरी और गजल
Tags: hindi poetry, kavita, Parashar Gaur





Parashar Gaur

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सुन बे ह्र्दयबिहीन प्राणी   


        आदमी को गधा कहलो ,खोता कहलो ,सुआर कहलो , कुत्ता कहलो सब चालेगा और वो किसी हद तक इन शब्दों को अपने जीवन में एक नही कई बार सुन चुका है बल्कि उसे इन शब्दों से कई बार पुकारा और बुलाया भी जाता रहा है ! वो किसे हदतक इन को सुनकर अपना सयम नही खोता लेकिन , अगर कोई उसे किन्नर से जोड़ता है तो, वों, उसे अपने स्वाभिमान और मनुष्य जात होने पर चोट समझता है अब सवाल उठता है की क्या किन्नर आदमी नही  है ? इसका जबाब अगर कोई यु एन ओ से भी जाकर पूछे तो इसका उत्तर उनके पास भी नही होगा तो फिर बहा आप और मै किस खेत की मूली है ! कभी अगर इसपर चर्चा चलती है तो कोई कहता है बेचारे है  तो ,कुछ कहते है वकत के मारे है ! कहने वाले तो यहाँ तक कहते है की इनसे आदमी को ना तो कोई नुकशान ही है और ना ही कोई फायदा  !

        आज जब दुनिया मतलबी होगई है ! स्वार्थ सर चढकर बोलता है! भाई भाई का गला काट रहा है ! ज़रा ज़रा सी बात पर लोग एक दुसरे के खून के प्यासे है ! ये सब घटिया और घिनौने काम आदम ही करता है क्या कभी आपने सूना की किसी किन्नर ने अपने दुसरे किन्नर का खून किया हो ?उसने अपने भाई जात को मारा हो ? अरे ,समय ने जिसे पहिले मारा हो वों भला किसे को क्या मारेगा ?मरने मारने की बात तो वो करता है जिसकी कोई  चाह हो ! उसकी चाहा पर तो पैदा होते ही अंकुश लगादिये गए है ! वो तो आदम जात की किसे भी चीज़ से नफरत नही करता है और नही वो किसी पास पड़ोस वालो के लड़ाई झगडे से सरोकार रखता है ! उसकी तो कोई सुननेवाला ही नही ! जिसे कुदरत ने भी सांसारिक अधिकारों से बंचित रखा फिर इंसान का क्या कहना !

     सभ्यात के इस युग में उसे किसी भी क्षेत्र में कोई वोट देने या अपनी बात रखने का अधिकार नही  है ... हाँ अधिकार है तो , केवल लोगो की जिल्लत खाने का .....सरे अपमानित होने का

         अभी हाल में भारत की राजधान देहली आंतिकयों के आंतक से दहल ऊठी थी ! बम के धमाको से सडको में खून से लथ पथ बच्चे बुडे जवान स्त्री पुरूष दर्द से चीखते चिला रहे थे ! उनमे से कुछ इस दुनिया को छोड़ चुके थे तो कुछ जीवन और मौत से सघर्ष कर रहे थे ! हस्पतालों में डॉक्टर के सामने सबसे बड़ी समस्या ये थी इन  घायलों को कैसे बचाया जाय ! उन्हें खून की बहुत आवश्यकता पड़ रही थी ! इंसानियत के नाते
 उन्होंने जनता से अपील की की ओ आगे बढकर अपना खून दे ! इस मार्मिक अपील से हस्पतालों के आगे लोगो का जमघट लगने लगा !  इस मुसीबत की घडी में हर आदम आगे आया !  दयाभाव और हृदय तो सब में होता है चाहिए वो किन्नर क्यो ना हो  ?

        किन्नर लोग जब हस्पताल पहुचे तो देखा सब एक लाइन में लगे है उन्हें देखकर उनको थोडा चैन आया वरना अगर दो लाइने होती तो उनके सामने दुविधा होती की ओ किस लाइन  ( काश भारत के संबिधान में इनके लिए कोई स्पेशल रूल होता )  में जाकर खडे हो ! प्रभु ने यहाँ पर उनकी लाज बच्चा दी जैसे उन्होंने द्रौपधी की लाज बचाई थी महाभारत में ! खड़े खड़े ओ अपने बारी का इंतज़ार करने लगे ! जैसे ही उनका नम्बर आया

 डॉक्टर ने यहा कहकर उनका खून लेने से मना कर दिया की ओ किन्नर है .......... सूना था की डॉक्टर भगवान् का रूप होता है अगर भगवान् ही एसा करने लगे तो ये बेचार जाए तो जाए कहा !

        अब भला डॉक्टर को कौन समझाए की पहिले तो इंसान है ! आदमी की जात का है ! उसमे भी ओ सरे गुन भाव मौजूद है जो तुझ में ,हम में , हम सब में है ! उसके नशों में भी वही खून दौड़ता है जो तेरे की रागों में दौड़ रहा है !

 अब भला डॉक्टर को कौन समझाए की पहिले तो इंसान है ! आदमी की जात का है ! उसमे भी ओ सरे गुन भाव मौजूद है जो तुझ में ,हम में , हम सब में है ! उसके नशों में भी वही खून दौड़ता है जो तेरे की रागों में दौड़ रहा है !  और एक बात जिनका खून लेन से आप इनकार कर रहे है इनका एहशान तो आप दे ही नही सकते ! इनके बजह से जिस भारत में आज आप डॉक्टर बने हो , ये ही है जो इस भारत को उस महाभारत के युग से बचाकर लाये ! अगर इनका जात भाई शिखंडी ठीक समय पर अर्जुन के रथ में उसके सामने खड़े होकर उसकी सहायता न की होती तो ऊस समाये के अजय अमर अपारजय भीष्म पितामहा की बानू के आगे पांडव तो पांडव कोई टिकनेवाला था !ये ही लोग है जिनकी वजह से हम सब है वरना आज का इतिहास कुछ और ही होता !

         अगर गौर से सोचो तो ऐसा करके डॉक्टर ने इनके विषय पर एक बहस सुरु कर दी ! जिसे बहुत पहिले हो जानी चाहिए थी ताकि इनके मुदे की तपन सिहाशयत के गलिहारे तक जा कर उन्हें झनझोडती तो सही जो अपने अंदर के आदमी में झाककर इनके बारे में सोच पैदा करता ! जो राजनीती करते करते जिनका खून दोगला होगया है !काश कोई तो इनके बारे मे आवाज उठाता ! कोई तो ऐसा कानून बनता जो इन्हे किसी हाशिये पर लाकर खडा कर सकता 
 
 

Parashar Gaur

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टोरोंटो (कैनेडा) – जून 12, 2008 को यहाँ के कौंसलावास में पैनारोमा इण्डिया के तत्वावधान में एक हिन्दी काव्य संध्या का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में विशेष रूप से उत्तरी अमेरीका के प्रसिद्ध साहित्यकार अमरेन्द्र कुमार को आमन्त्रित किया गया। अमरेन्द्र कुमार यू.एस.ए. में रहते हुए हिन्दी साहित्य में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। “क्षितिज” नाम की पत्रिका के प्रकाशन व सम्पादन के बाद आज कल वह अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की इ-विश्वा के प्रकाशन में भी व्यस्त हैं। उनका कहानी संग्रह “चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ” की भी साहित्य जगत में प्रशंसा हो चुकी है। ऐसे साहित्यकार द्वारा इस काव्य संध्या की अध्यक्षता वास्तव में ही पैनारोमा इण्डिया के लिए गौरव की बात थी।

यह कवि सम्मेलन अन्य और टोरोंटो की परंपरा से थोड़ा हटकर था। इसमें केवल चौदह कवियों और कवयित्रियों को ही आमन्त्रित किया गया था और उन्हें काव्य पाठ करने का पर्याप्त समय दिया गया। श्रीमती अरुणा भटनागर ने सभी श्रोताओं और कवियों का स्वागत करते हुए अमरेन्द्र जी को ज्योति प्रज्जवलित करने के लिए आमन्त्रित किया। मानोषी चैटर्जी ने इस अवसर पर स्त्रोत गायन किया। सरस्वती वंदना के बाद कार्यक्रम का आरम्भ करते हुए कौंसलावास के अधिकार श्री एम.पी.एस. बेदी ने “पुष्प की अभिलाषा” की कुछ पंक्तियाँ सुनाते हुए इस संध्या के काव्य पाठ की भूमिका बाँधी। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में अमरेन्द्र ने कहा कि साहित्य जनमानस को संस्कृति से जोड़ता है और कविता इसका सेतु है। उन्होंने स्व. निर्मल वर्मा को भी उद्धृत किया कि “लिखना मेरे लिए प्रार्थना की तरह है”।

इस सम्मेलन में भाग लेते हुए – भगवत शरण श्रीवास्तव, शैल शर्मा, सुरेन्द्र पाठक, अचला दीप्ति कुमार, सुमन कुमार घई, राज शर्मा, अमरेन्द्र कुमार, आशा बर्मन, देवेन्द्र मिश्रा, श्याम त्रिपाठी, शैलजा सक्सेना, पाराशर गौड़ और मानोषी चैटर्जी ने काव्य पाठ किया।

अरुणा भटनागर जी धन्यवाद ज्ञापन के साथ ही सम्मेलन का अंत हुआ। इस अवसर पर सभी काव्य पाठ करने वालों को स्मृति चिह्न दिये गए।

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Parashar Gaur

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भारतीय काल गणना
 
सिद्धांत जोतिषी को एस्टानोमी कहा जाता है ! इसके ग्रंथो में सूर्य ग्रन्थ एक मह्तुवापूर्ण ग्रन्थ है ! इसके प्रथम अध्याय में काल गणना का विस्तार से वरण हुआ हे !   जों इस प्रकार से है !
      पृथ्वी सूर्य चंदर तथा नक्षत्रो की गति के अनुसार चार प्रकार के दिन होते है !
       २४ घंटे  के चाकर को ( एक नक्षत्र के चकार अगले दिन पुनः क्रम को )   
       आहोरात्र  कहते है  ! 
      सूर्य उदय से लेकर अगले सूर्य उदय होने तक को सावन आहोरात्र कहते है !
      ३० नाक्षित्रक आहोरात्र का  =  १ महीना
      ३० सावन आहोरात्र  का  =एक सावन मास
      ३० तिथीओ का = एक चंदर मास
      १२ नाक्षित्रक मास का = एक नक्षत्र मास
      १२ सावन मास का = एक सावन वर्ष
      १२ चंदर वर्ष का =  एक चंदर वर्ष
      १२ सौर मास का =  एक दिव्या आहोरात्र होता  है 
      ३० दिव्या आहोरात्र का = एक दिव्यमास होता है
     १२ दिव्यमास  का = एक दिव्या वर्ष होता है
      १ दिव्यवर्ष में जिसमे  ३६० सौर वर्ष होते है
     १२००० दिव्यावर्षो की ३६० चत्तुर्युगी होते है (
        चत्तुर्युगी  जो =  ४३ लाख २० हज़ार वर्ष क होती है
     ( १ चत्तुर्युगी / महायुग  में  ४ युग होते है ! वो है कलयुग द्वापर त्रेता और सतयुग  )
 
      युगों की गणना....
 
           कलयुग में १२०० दिव्यवर्ष होते है कलयुग क कुल  काल ४ लाख ३२ हजार
         वर्ष का होता है जिसमे
        ३६ हज़ार वर्ष आदि संधि और ३६ हज़ार वर्ष अंत की संधि के होते है !
        त्रेता में ३६०० दिव्यवर्ष  होते है
        सतयुग में ४८०० दिव्यवर्ष होते है
         हरयुग के सुरू  और अंत में एक संधी होते है ! इन सभी युग में क्रमशः     
        २०० ,४००,६००,तथा ८००  दिव्यवर्ष  होते है
        ७१ महायुगों का एक मनवंतर होता है ! इसके सुरू  और अंतमे एक संधि   
\       होती   है जो एक सतयुग के  बराबर होते है !
       १४ या १५  मनवंतर संधियो का एक कल्प होता है
       १ कल्प जो १००० महायुग के बराबर होता है
       १ कल्प में ४ अरब ३२ करोड़  वर्ष होते है
        ( एक कल्प की अबधि ब्रह्मा के एक दिन के बराबर होते है ब्रह्मा की उम्र १००   
         ब्रह्म वर्ष की है  )
        ३० ब्रह्म आहोरात्र  का एक ब्रम मास होता है
       १२ ब्रह्म मास का १ बह्म वर्ष होता है
       अभी ब्रह्मा की उम्र का आध भाग बिता है  अभी तो उनकी उम्र का पहला कल्प
       है  इस  कल्प में ६ मंवत्र
       संधीय बीत चुकी है ! अभी तो कलयुग का २८ वा महायुग कलयुग चल रहा   
        है ! कयुग ३१०२ इ पू सुरू
       होआ अभी वर्तमान कल्प का १,९७,२९,४९,१११ वर्ष चल रहा है !
 
        पृथ्वी की  रचना 
 
         ब्रह्मा को   रचना करना में ४७,४०० दिव्यवर्ष लगे थे ! तभी सबंत सुरू
         होआ था  उसके अनुसार अगेर गणना करे तो १,१५,५८,८५,१११ वा वर्ष चाल     
         रहा है
                                                          पराशर गौर

Parashar Gaur

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यह कविता मेरे पुस्तक "उकाल-उंदार" से है !

ये पहली पुस्तक होगी और है जो फॉरेन याने वेदेश में छापी गयी और जिसका विमोचन हिन्दुस्तान में गढ़वाल  भवन देहली में हुआ   !



खुशी

जब जब सुबरू घाम
मेरा पहाड़ की हुन्च्याली डाडियू थै छुंदी
वेकु तन मन खुश हवे जांद
तब
खिलिजंदी वेका रोम रोम
च्याखुली चुन्च्यान बैठी जन्दन
गाद गधिनी नचण बैठी जन्दन
तब मेरो  समूचा पहाड़ ....
जी उठद एक नई उमंग का साथ  !

        पुगडियुमाँ हैल लागौन्द हल्या   
     सियूँ का पिछनै -  पिछनै जांदी
     मेरी माँ बैणी , दीदी भुली
     लेकी हत्युमा नई बीज की पौध
     जब जब वो धरती माँ डल्द
     तब ...........
         मुल -   मुल हैन्सी धरती
     वे बीज थै माटी का दगड मिलिकी
     अपणी खुच्लीमा समोंद
      तब एक हैंकि किस्स्मो आनद आंद !

अररर धरती......
वीकी मुख्डिम उमंग उत्साह की
एक नई लहर डाली फिर औणु बुलद
जब ..धरतिम अंकुर फुटदिन
जब वो उगदन
तब विथै लगद की
म्यारो पाहाड,  मेरी धरती
कतका सुंदर चा , कतका बिगरैली चा 


परासर गौड़  4 जनवारी  सन २००४
 

Parashar Gaur

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किस्मत

अरै ......कुई सुण चा   ?
म्यारा पहाडै,   दहाड़ ....
हयली गाड़ी गाड़ी रूणूच वो
कि ....नगाँ हुणा छ्न बल, पहाड़ !

नाला पंदेरा, गाड़ गदिन्या सुखणा छ्न
जंगल का जंगल कटीणा छ्न
डांडी कांठी रूणी छ्न
अफू ,  अर अपणा जोग पर
जु छोडिगी वी ... अर
जु छोडन पर हुया छिन मजबूर !

मनीख .....
सहरो कि तरफ च दौडणू
पैथर रैगी ब्यटुला
वि,  अर वि जगह थै जग्वालु
कब तक देखि साकली
सै साकाली वा, विकी पीडा  !

फिर भी गाणीच वा
वैकी सुन्दरता का गीत
बोझ ठुल्द ठुल्द
उकाल उन्धार नपद नपद
ऐ डांडी बिट , हैंकि डंडी तक  !

ऐका अलावा  वो
कैरी भी क्य सकद......
यत,  वीकि नियती च
पहाड़ जन जीवन थै जीणों
वा ख़ुद भी,  पहाड़ बणिगे 
जैकु द्रर्द,   कुई नि समझी सकदू  !

पराशर गौड़
२५ अगस्त 1979

Parashar Gaur

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News from pahad

खतरे में हैं दस उत्तराखंडी  बोलियां
Garhwali, including Uttarakhand Kumaunni ten quotes and Rongpo also is in danger. Tolcha of these two quotes and then Rngks also have been extinct. Off the UNESCO Atlas Vlrds di Langyuejej of these Denjr in Sube these languages have added. United Neshns Educational, Saintifk and Cultural Organization (UNESCO) according to the atlas of the Pithoragarh district of Uttarakhand in the bid and Rngks Tolcha quotes are extinct. In addition, the Uttarkashi region Bangan Bangani approximately 12,000 people speak the dialect. It is on the verge of Vilupti. Darma and Byansi of Pithoragarh, Uttarkashi and Dehradun of Jad's Junsari is threatened in a serious bids. According to the 1761 Atlas bid Darma people, Byansi the 1734, 2000 and Jad Junsari the estimated 114,733 people speak understand. According to the atlas and Rongpo Kumaunni Garhwali dialects is also threatened. They have been kept in unsafe class. According to UNESCO, approximately 279,500 people in the world, Garhwali, 2003783 people Kumaunni and 8000 people live in the area of Rongpo bid, but it means living in these areas Nhinki all know people are quotes. Linguists study of 30 know that based on this language has been released on Friday atlas. According to UNESCO in the world with 200 languages Pidihyon last three have become extinct. 199 language in the world - which offers a mere 10-10 people speak. 178 to 10 to 50 people speak understand. The first bid in the country agreed on a PhD linguist who Sobaram Dr. Sharma says UNESCO Halnaki Pithoragarh and Champawat districts of the tribe's bid to persuade Atlas but it is not included in the language is on the verge of Vilupti. According to the 2001 Census in Uttarakhand Tribe agreed Vnrawat or just 217 people are left. According to Dr Sharma, the Hindi dialects of Uttarakhand - English domination, the unbalanced development of mountainous areas migration, development projects because of growing urbanization and the displacement are reeling. Anthropological Survey of danger, according to Superintendent Dr. Rizvi Sanac lying in the language of conservation is very important, otherwise bids mankind will lose its valuable heritage.[/

Dinesh Bijalwan

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This is really matter of great concern.   people , Uttrakhan Government and People organisation should take  steops so that out dilects are conserved.   Late Tota Kirshn Gairola ne kaha tha-   देसी बणऒ  देस की मेस देखी, पर घर की सादै पर प्रेम रखो, अन्ग्रेजी, फारसी भौतै भी जानी, पर स्वदेसी बोली पर प्रेम रखो

we shall have to raise an alarm and call the people to speak in the dialect whenever and wherever they meet  a uttrakhandi.

Parashar Gaur

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एक होली ये भी !

मलते ही गुलाल
हुआ मलाल
रंगना था चेहरा
रंग दिए गाल
मलना था किस पे
मला किसको
हंगामा हो गया
पकडो पकडो इसको !

बीच चोराहे में पकडा गया
ठुकम ठुकाई होते होते
भया ठुक गाया   !

मित्रो ....
जैसे ही उनसे छुटा
पत्त्नी ने आकर कुट्टा
पकड़कर कालर बोली ...
कौन थी वो .......???
जिस पर मलने गुलाल तुम
गली छोड़ , मोहला छोड़
यहाँ तक आये हो  !

मै बोला., अरी भागवान  ....
मै उसे जानता तक नहीं
पहिचानता तक नहीं
मेरा यकीन करलो
कसम खलालो ...
या मुर्गा बनालो   !

सच कहूँ तो ...
उपर से नीचे तक वो
रंगों में रंगी थी
बाल काले पीले हो रखे थे
मुह पर कालिख माली थी
कुछ देखी नही दे रहा था
इसे में मैंने सोचा तू ही थी
बस्स ...................
आओ  देखा न ताऊ
गुलाल मल दिया !

लगाते ही गुलाल
अहसाश हुआ
कही ना कही
धोखा हो गया
मेरी वो ...
वो तो इसी तो न थी
ये कौन है ?????
ये क्या होगया  !

जो होना था सो हो गया
उसपे रंग चदा  गया था
मेरा रंग उड़ गया 
क्या क्या ब्यान करू
क्या क्या हुआ नहीं
उसके बाद जो हुआ
वो तुम से छुपा नहीं  !
होली के रंग ने
एसे  रंग दिए
मुझो दिन में ही तारे दिखाई दिए !


पराशर गौर

 

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