Author Topic: Articles by Scientist Balbir Singh Rawat on Agriculture issues-बलबीर सिंह रावत ज  (Read 20356 times)

Dr. Balbir Singh Rawat

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पिछले लेख में त्रुटी सुधि:  तीन चार उपजों की सम्पूर्ण जानकारी ले कर ही अपनी पसंद की उपज का चुनाव करके ही आगे बढ़ना चाहिए.

Dr. Balbir Singh Rawat

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Parwateey krishi ki shikshaa
« Reply #21 on: October 15, 2012, 04:22:33 PM »
व्यावसायिक खेती एक हुनर है जिसे सीखना जरूरी होता है. हमारे देश में ऐसी शिक्षा कवक स्नातक स्टार की ही दी जाती है, जब की आवश्यकता किसी एक सम्बंधित उपज समूह के ज्ञान की होती है जो एक जूनियर हाइ स्कूल या मात्रिक के बाद एक साल के कोर्स से हासिल हो सकती है. ऐसी सिक्षा के स्थान पर कृषि विभाग या तो रथ यात्राएं निकलता है या कृषि विज्ञान केन्द्रों में दो या तीन हफ़्तों के कोर्स चलता है. ऐसे कोर्सों का कितना असर होता है यह एक शोध का विषय है, लेकिन इस प्रयाश के लाव कहीं नजर आते नहीं दीखते है.
इसलिए समय की मांग है की उत्तराखंड में vocational कोर्सों की शुरुआत की जाय और प्रारंभ में हर जिले में एक ऐसा वोकेशनल स्कूल खुले जिसमे कृषि, बागवानी, उन उद्योग, काष्ट उद्द्योग, खाद्य संरक्षण उद्द्योग, जड़ी बूटी उद्दोग, पुष्प उद्द्योग, पोध उत्पादन तथा बीज उत्पादन उद्द्योग के हुनरो की शिक्षा  विषय विशेषज्ञों द्वारा दी जाय. ऐसे शिक्ष एक  या दो साल की हो और इसमें जुनिएr high स्कूल पास लड़के लड़कियों को प्रवेश दिया जाय. शिक्षा लेने के बाद ये प्रशिक्षु अपना अपना व्यवसाय शरू कर सकते हैं. इसके लिए उनको साजो सामन और loans की सुविधा देना भी जरूरी है.
इस से एक और तो पारिवारिक आय बढ़ेगी और दुसरी और पलायन भी रुकेगा. 

Dr. Balbir Singh Rawat

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एक अछे व्यवसाय के लिए अछे प्लानिंग की जरूरत होती है. क्या  एक गाँव या गाँव समूह को एक इकाई मान कर विकास का प्लान बनाया ज सकता है?  हाँ बनाना भी चाहिए. कौन बनाएगा?  सरकार, या ब्लोक अधिकारी,  या जिअलाधिकारी या जिला पंचायत या ग्राम प्रधान? अवश्य ही ग्राम पंचायत स्टार पर, गाँव के अनुवावी लोग और ग्राम प्रधान मिलकर बनायेंगे तो ही सही प्लान बन पायेगा. जब ऐसे सभी गाँव के प्लान ब्लोक स्तर पर जुड़ेंगे तो ब्लोक प्लान, फिर जिला प्लान, और राज्य प्लान बनेगा जो सार्थक होगा. यह ऐसा होगा जैसे मकान न्नेव से ऊपर को बनता जाता है. क्या यह संभव है? फिलहाल तो नहीं, क्यों की budget की स्वीकृति उपरसे होती है, प्लान भी ऊपर से बनते हैं. जो पैसे देता है उसी की इच्छा से नाचना पड़ता है. इसीलिये अधिकाँश के प्लान ग्राम स्तर पर बेसुरे लगते है, सुन ने झेलने की मजबूरी होती है.
क्या जनता हमेशा मजबूर ही रहेगी या कभी अपनी आवाज़ भी सूना पायेगी? समय आ गया है, अपना लोकल प्लान बनाइये, चुने हुए प्रधानों, पंचों, विधायकों और सांसदों को दीजिये, उनसे  मांगिये की हमारा विकास इस प्रकार होना चाहिए नईं बात है, आजमा कर देखिये, दबाव डालिए, सुनाई अवश होगी एक दिन. .

Dr. Balbir Singh Rawat

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New AUdyanik vipanan parishad
« Reply #23 on: October 23, 2012, 08:50:07 AM »
गैरसैं की कबिनेट मीटिंग में एक नईं परिषद्, औद्यानिक विपणन परिषद्, के गठन की प्रबल संभावना जताई गए है. माना की जब एक  जीवंत, किस्सान मित्र उत्पाद बिक्री व्यवस्था होती है तो नए उत्पादक भी जुड़ते हैं और सब की उत्पादकता बढ़ती है, जैसे गुजरात में अमूल संस्था की. समझ से परे है की जब उत्तराखंड में दो मंडल विकास निगम हैं जिनके क्रियाकलापों में उत्पादन बढ़ाना और  बेचना भी है, तो एक नईं संस्था की क्या जरूरत है? क्या ये दोनों मंडलीय विकास निगम इतने vyast हैं की एक नईं परिषद् की आवश्यकता आन पड़ी है?  या जड़ में कुछ और ही उद्देश्य है? क्या अय्द्यानिक और अन्य कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए उत्पादकों की सहकारी संस्थाए नहीं बनायी जा सकती हैं? या हम में इतन! आत्मा विस्वाश और परस्पर भरोसा नही है की हम गुजरात डेरी फेडरेशन की तर्ज पर जिला सहकाई संघ बना कर विपणन व्यवस्था कर सकें, केवल उद्यानिक ही नहीं, सभी कृषि उत्पादों की पैदावार, संकलन, भंडार, प्रसंस्कनार्ण और बिक्री का काम उत्पादक्प्न के ही जिम्मे सोंप सकें?
सोचिये और आगे बढिए.

Dr. Balbir Singh Rawat

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aawaahan
« Reply #24 on: November 01, 2012, 06:29:48 PM »
 सभी पाठकों से निवेदन है की आपके पास अगर किसी ऐसे सफल व्यक्ति की सफलता की जानकारी है जिन्होंने अपनी स्र्जन्श्हेलता से अपने परिवार, अपने गाँव, अपने क्षेत्र, के आर्ह्तिक, सामाजिक विकास को नयी दिशा देकर सफलता प्राप्त की है तो उनकी और उनके सफल प्रयासों की जानकारी मुझे या मेहता जी को तुरंत भेजने का कष्ट करें. हम कुछ बुजुर्ग लोग उनकी सफलता गाथाओं को जन जन तक पहुचने का बीड़ा उठा रहे हैं, ताकि भावी स्मभावित उद्द्यामी और समाज सेवी प्रेरणा ले कर आगे बढ़ने को उत्साहित हो सकें..
निवेदन है की कुछ समय निकाल कर इस सामजिक प्रयास में योग्दान्न कर सकें. अपना और सफल व्यक्ति का पूरा पता भी दें.
धन्य्ना बाद,....dr.bsrawat28@gmail.com,  mob. 94589 11505 

Bhishma Kukreti

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मुर्गी पालन

                      Dr Balbir Singh Rawat

 

         

मुर्गी पालन एक ऐसा व्यवसाय है जो कम लागत से 3-4 महीनों में ही आमदनी देने लगता है। पर्वतीय गावों में इसे आय के पूरक की तरह अपनाया जा एकता है। शुरू करने से पाहिले कुछ आवश्यक जानकारियाँ जुटाना ठीक रहता है, जैसे :




1.आप कितने घंटे रोज इस काम के लिए, सुबह, दिन शाम को निकाल सकते है? यह जिन्दा पक्षियों की देखरेख का सवाल है तो उचित देखभाल बहुत जरूरी है।

2.आप कितनी आमदनी रोज करना चाहेंगे ?

3.आपके पास दडबा बनाने का पर्याप्त स्थान उचित जगह पर है?

4.आप को सही व्यावसायिक प्रशिक्षण लेंने के उपरांत ही यह काम शुरू करना चाहिए। अच्छी पुस्तक से पढ़ कर भी जानकारी मिल जाती है।

5.अंडा व्यवसाय के लिए, मुर्गी, बतख, तीतर जाती के पक्षी पाले जाते हैं, लेकिन मुर्गी के अंडे सब से अधिक पसंद किये जाते है।

6.सब से प्रचलित प्रजाति है व्हाईट लेग हॉर्न और र्होड रेड, अच्छी देखभाल से एक मुर्गी साल में 250 अंडे दे देती है और मुर्गी से 2 साल तक ही अंडे लेने चाहियें, इस लिए हर साल एक तिहाई नयी ला कर पुरानियों को बेच देना चाहिए।




अब सवाल है अंडे के दाम जो मिल सकते हैं और लागत इनका अंतर ही मुनाफा तय करेगा इसलिए अच्छी देखभाल की न्यूनतम लागत का ज्ञान आवश्यक है। जैसे, दडबा बनाने की, चुजों की', उनके खान पान, दवा दारु, रोजाना देखभाल और अंडे इकट्ठा करके बेचने का खर्च तथा आपका निर्धारित रोजाना की आमदनी। इसके लिए आप नजदीकी पशु पालन विभाग के कार्यालय से जानकारी लेंगे तो उचित होगा। उनकी द्युति इ ये आता है की वए नए उद्द्यामियों को साड़ी जानकारी और सुबिधा दें। यहाँ पर आपको लाभ के लिए आकर की जान कारी दी जा रही है।:

1. मान लीजिये आप 50 रुपये रोज कमाना चाहते हैं और प्रति अंड्डा 50 पैसे का लाभ होता है तो आप को रोज 100 अंडे औसतन बेचने होंगे , यानी साल में 36,500 अंडे। जो प्रति वर्ष 250 अण्डों के हिसाब से 150 अंडे देने वाली और एक तिहाई चूजे 50 भे पालन का प्रबंध करना होगा कुल छोड़े बड़े 200 पक्षियों का फार्म आपको सालाना 18,250 रुपये की आमदनी प्रति वर्ष कर सकते हैं

लगभग इसी अनुपात से उद्दयम को छोटा या बड़ा कर सकते है। 50 पक्षी रखेंगे तो सालाना आय इस लागत:बिक्री के अनुपात पर 4560 रपये हो जायेगी।

अगर लागल और बिक्री का अंतर एक रूपया प्रति अंडा हो सकता है तो शुद्ध आमदनी दुगुनी हो जाती है, यह आपके फार्म के बाजार से दूरी और लागता के घटते बढ़ते मुल्ल्यों पर तथा आपके व्यापार कौशल्पर निर्भर करेगा .

इस मार्ग दर्शन को प्रोजेक्ट रिपोर्ट न समझियेगा , ये केवल आप को वस्तु स्थिति का भान कराने के लिए है। अपनी परिस्थिति के अनुरूप पशुपालन विभाग के सम्बंधित विशेषग्य से सल्लाह लीजिये .         

 dr.bsrawat28@gmail.com


 

Bhishma Kukreti

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स्वरोजगार

 

         डा बलबीर सिंह रावत (देहरादून )

 

 

एक पुरानी कहावत है "उत्तम खेती (स्वरोजगार), माध्यम बाण (व्यापार), निख़त चाकरी (नौकरी) ख़त सुजान। उत्तराखंड में व्यापारिक स्तर पर खेती करना,गृह उद्द्योग से आजीविका कमाना अभी अभी शुरू हो रहा है तो कुछ तो नए का डर, कुछ रिस्क न लेने की भावना, कुछ कौशल का आभाव, कुछ अकेले पद जाने से लाभ दायक व्यवसाय न जैम पाने की प्रबल सम्भावना इत्यादि परिस्थितियाँ होती हैं जो हम्मरे युवा वर्ग को कूद पड़ने से हिच्किछाहत होती है। इस संदेह के बादलों को छटाने के लिए निम्न उपाय कारगर होते हैं:



1. स्वभाव और दिलचस्पी के अनुसार ऐसा व्यवसाय चुनना, जिसमे व्यक्ति सहज रहता है ही वोह कुंजी है जिस से व्यक्ति काम अच्छी तरह, कुशलता पूर्वक करता है।

2. चुने गए धंदे के हर पहलू को समझने के लिए प्रशिक्षण लेना, पुस्तकों से ज्ञान लेना, किसी सफल चलते धंदे में जा कर देख कर सीखना इत्यादि जरूरी है । प्रशिक्षण कहाँ लें,यह अभी उत्तराखंड में कुछ समस्या है की बहुत कम विषयों के प्रशिक्षण की सुविधाए है। कृषि क्षेत्रो के लिए कृषि विज्ञान केंद्र है कही कही , वे मार्ग दर्शन कर सकते हैं।

फ़िलहाल जिसमें प्रशिक्षण उपलबद्ध है उसी में से चुनना ठीक रहेगा। प्राशिक्षण के साथ साथ यह भी जानकारी लीजिये की जो भी उपकरण, साजोसामान,कच्चा माल इत्यादि निवेश की जरूरतें हैं वे कहाँ से

मिलेंगी , किस गुणवत्ता की होंगी . कृषि आधारित व्यवसाय में बीज का प्रकार, गुणवत्ता और भरोसे लायक होना जरूरी है।

3. क्या उत्पादित उपज/वस्तु की बाजार में प्रयाप्त मांग है? या माग पैदा की जा सकती है? अगर माँग है, तो कीमत उत्पादक को कितनी मिल रही है?

4. क्या उत्पाद की मात्रा का बिक्री और मुनाफे पर असर पड़ेगा, की कम मात्रा से खर्चे बढ़ेंगे ? अगर हाँ, तो क्या साथ साथ कई अन्य लोग भी उसी इलाके में यहे व्यवसाय करने के इच्चुक हैं? क्या वे भी एक साथ

यही धंदा शुरू करेंगे? हर धंदे का एक आकार स्तर होता है, जिस पर पहुँच कर लागत सब से कम होती है। ये ध्यान में रख कर ही धंदा पसंद करना उचित रहता है।

5. कई धंदे हैं जिन को अपनाने के लिए सरकार प्रोत्साहन देती है,यह जानकारी बी डी ओ से या सम्बंधित सरकारी कार्यालयों से, तथा समय समय पर सरकार द्वारा दिए गए अखबारों में विज्ञापनों से मिलती है।

6. धंदे के आकार पर निर्भर होगा की स्थापित करने के लिए कितनी जमीन , कितना अन्य साजो सामान, कितना तकनीकी ज्ञान, जरुरत होने पर मजदूर , कर्मचारी का आसानी से उपलब्धि इत्यादि भौतिक पहलू।

7. सबसे मुख्य पूंजी है, स्वीकारे गए आकर के लिए कितना धन आवश्यक है,क्या यह अपने पास उपलब्ध है या बेंक से कर्ज लेना होगा? कर्जे की शर्तें, सरकारी अनुदान, अगर कोई मिलता है, की जानकारी जरूरी है

8. इतना ही आवश्यक है अच्छी विपणन व्यवस्था। ऐसे बाजार को ढून्ढना ठीक रहता है जहाँ पर अच्छा मूल्य मिलता हो। जैसे उत्पादन के लिए एक उचित आकार होता है वैसा ही बिक्री के लिए भी उत्पाद का आकार भी होता है। कम होने पर प्रति किलो विपणन खर्च अधिक होता है, तो शुद्ध लाभ में कमी आ जाती है .अगर एक व्यक्ति उतना उत्पादन नहीं कर पाता तो एक ही क्षेत्र में कई उत्पादक इकठ्ठा हो कर लाभदायी व्यापार कर सकते हैं। अपनी सहकारी संस्था हो तो बिचौलियों से मुक्ति मिल जाती है।

9. स्वर रोजगार के लिए आकार इतना बड़ा तो हो कि सालाना कम से कम 100,000 रुपयों की शुद्ध आय हो सके। इसलिए शरू करने से पाहिले,पूरी जांच पड़ताल करना आवश्यक है। एक साथ खेती सम्बन्धी दो, तीन धंदे भी किये जा सकते हैं।

10 मेरा अनुरोध :

. . इस प्रयास से जुड़े सारे उत्तराखंडी विषय-प्रवीण लोग नए उद्द्यामियों की सहायता के लिए अपने अपने ज्ञान को निशुल्क?(या अगर यह ज्ञान देना उनका व्यवसाय है तो,न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध करायं) और अपनी इच्छा इन माध्यमो पर व्यक्त करें ताकि एक सलाहकार रजिस्टर बन सके। फिलहाल आप मुझ्से, भीष्म कुकरेती जी से, माहि मेहता जी से संपर्क करके संपर्क पता दर्ज करवा सकते हैं

धन्यबाद और शामिल हो जाईये। निवेदक, बलबीर सिंह रावत                 

dr.bsrawat28@gmail.com

 

Bhishma Kukreti

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पहाडी गावों में गोबर गैस से अनेक फायदे !


                              डा बलबीर सिंह रावत


    (उत्तराखंड में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, ग्रामीण उत्तराखंड में आधुनिक मानवीय सुविधाए;,  गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाएं; पौड़ी गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, रुद्प्रप्रयाग में आधुनिक मानवीय सुविधाए; चमोली में आधुनिक मानवीय सुविधाए; टिहरी गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाए; उत्तरकाशी में आधुनिक मानवीय सुविधाए; ग्रामीण देहरादून में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, नैनीताल में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, उधम सिंह नगर में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, अलोमोड़ा में आधुनिक मानवीय सुविधाए; चम्पावत में आधुनिक मानवीय सुविधाए; रानीखेत में आधुनिक मानवीय सुविधाए; द्वारहट में आधुनिक मानवीय सुविधाए; पिथोरागढ़ में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, पहाड़ो में आधुनिक मानवीय सुविधाए लेखमाला ]                   

 

                       गोबर को सड़ाने से ज्वलनशील, मीथेन (नेचुरल) गैस उत्पन्न होती है जिसके उपयोग सफलता से, कमरों में रोशनी के लिए, रसोई में खाना बना ने, डीजल या पेट्रोल के इंजन चलाने के लिए आसानी से किया जा सकता है। अब तो इसका महत्व और भी बढ़ता जाएगा जब तरल पेट्रोलियम गैस के दाम लगातार बढ़ते जायेंगे . एक परिवार की रसोई ईंधन की आवश्यक्ता के लये 55-60 किलो ताजे गोबर की आवश्यकता होती है। एक 450 किलो वजनी संकर गाय दिन में लगभग 25 किलो गोबर निकालती है। अगर दूध की बिक्री करने वाले परिवार अपनी गायों को खूंटे पर ही चारा खिलाते हैं तो 2 गायों से प्रयाप्त गोबर मिल सकता है। छोटी गायो से कम गोबर होगा तो 3 या 4 गायों के गोबर की जरूरत होगी। जहां जानवर चराने के लये जंगल ले जाए जाते हैं, वहाँ केवल रात का ही गोबर उपलब्ध होगा तो उसी हिसाब से 60 किलो गोबर प्रतिदिन हो या फिर कम गैस से ही काम चलाना होगा।

                            गैस बनाने के लिए एक संयंत्र लगाना होता है। 60 किलो गोबर को घोलने के लिये 250-300 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। यानि कुल 350 लीटर पति दिन, गोबर को पूरी तरह सड़ने के लिए 25-30 दिन लगते हैं तो गड्ढे में 11-12 हजार लीटर को रखने का आकर होना जरूरी है, इस को एक गोला कार टंकी की तरह सीमेंट से चुनाई करके, दो भागों में , बीच में दीवार से अलग अलग दो चैम्बर (ठन्डे पर्वतीय इलाकों में बीच में गोला कार चम्बर बनाना उचित रहता है क्योंकि गोबर के औक्सीजन रहित सडाव के लिए गर्माहट चाहिए जो सड़ने से पैदा होती रहती है, ओह सुरक्षित रह सके) यह प्लांट का डायजेशन चैम्बर होता है जिसने गोबर मिश्रण चैम्बर से पाइप द्वारा सीधे तल में, सबस से नीचे, छोड़ने का प्रावधान किया जाता है। दुसरे चैम्बर से सडे तरल की निकासी का पाइप, ऊपरी भाग से बाहर खाद के गढ़े में डाला जाता है।। गोबर मिश्रण चैम्बर गड्ढे से अलग, सट कर ऐसे ऊंचे पर बनाना होता है की प्लग खोलते ही सारा मिश्रण अपने आप डायजेशन चैम्बर में चला जाय। गोबर का मिश्रण हाथ से या एक हस्त चालित चरखी से किया जा सकता है।

बनती हुयी गैस तो जमा करने के लिए स्टील का बड़ा डोल9-10 हजार लीटर का बना कर गोबर सढाने वाले गड्ढे के उप उल्टा रखा जाता है। इस स्टील गुब्बारे के शिखर पर एक 1-1/2 इंच का कुहनी आकर का वाल्व युक्त पाइप वेल्ड करके रक्खा जाता है। इस पर प्लास्टिक, रबर की पाईप लगा कर गोबर गैस को उपयोग के स्थान ले जाया जाता है। चूंकि गैस के साथ साथ पानी की भाप भी उठती है और यह गैस पाइप में पानी बन कर जमा होती रहती है, तो सबसे निचले स्थान पर मैं पाइप लाइन पर एक वाटर ट्रैप , निकास वाल्व का प्रावधान भी करना उचित रहता है। गोबर गैस की रौशनी और चूल्हे की उपलब्धि तो है इसलिए प्रबंध समय से करलेना ठीक रहता है। नए संयंत्र से उपयोग के लिए गैस 15 दिनों में मिलने लगती है और फिर लगतार मिलती रहती अहि।

गोबर गैस संयंत्र को लगाने के लिए खादी और ग्रामीण उद्द्योग बोर्ड से मार्ग दशन, स्थापित करने में सहायता और सरकार से दी जाने वाली सब्सिडी का प्रावधान होता है। अपने ग्रामम प्रधान से सूचना लीजिये।




इस संयंत्र के लिए पर्याप्त जमीन की जरूरत होती है जो घर के नजदीक हो त्ताकी गैस के पाइप लम्बे (महंगे) न हों और गोबर को छानी से दूर तक उठा कर न ले जाना पड़े। जिनके पास ऐसी सुविध्हये हिएँ वोह इस संयंत्र को, जानकारों की देदेख रेख में अवश्य लग्वायं

सलाह कार :

डा बलबीर सिंह रावत। 


 --उत्तराखंड में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, ग्रामीण उत्तराखंड में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाएं; पौड़ी गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, रुद्प्रप्रयाग में आधुनिक मानवीय सुविधाए; चमोली में आधुनिक मानवीय सुविधाए; टिहरी गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाए; उत्तरकाशी में आधुनिक मानवीय सुविधाए; ग्रामीण देहरादून में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, नैनीताल में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, उधम सिंह नगर में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, अलोमोड़ा में आधुनिक मानवीय सुविधाए; चम्पावत में आधुनिक मानवीय सुविधाए; रानीखेत में आधुनिक मानवीय सुविधाए; द्वारहट में आधुनिक मानवीय सुविधाए; पिथोरागढ़ में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, पहाड़ो में आधुनिक मानवीय सुविधाए लेखमाला जारी 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ALTERNATIVES FOR REAL DEVELOPMENT OF UTTARAKHAND
                                                                                        Dr. Balbir Singh Rawat (Dehradun ) Since the creation of Uttarakhand, both the national parties have come to power taking turns, because people want some thing else than what these parties are doing, so they change them at every election. The painful problem of the State is, the lack of opportunities to carve out a living that allows all round development of the family by way of education, health, comfort, attractive returns in the productive activities, social interaction, entertainment and spiritual uplift. In other words development in real sense, means  economic progress and elevation of human qualities. In Uttarakhand the need is of a comprehensive approach to develop infrastructure, to provide basic amenities, to create opportunities, on a very large scale, for earning a  good living within the State itself, exploiting the local resources that can curb the excessive migration. At present all the stress is given to employment through jobs in the government and the industry concentrated at few places in the planes part of the State. So in a way it encourages migration from hills to planes of the same State. The alternatives are: 1.  Exploiting the local resources fully and systematically. These resources are our land capable of growing temperate climate      fruits, off season vegetables, medicinal herbs, aromatic oil plants, colourful flowers of a large number of varieties.      Uttarakhand is endowed with large lush meadows, grass lands where sheep raising for wool, dairy herds for milk and milk       products, can be established on commercial scale.      Bee keeping, poultry farming are many other land based village level activities that should be encouraged.2. The richness of our water resources is huge. It is being used to generate electricity but the power available should be      increasingly used for cottage and small industry units using electric powers machines for production and processing.     Electric power should also be used to provide rope ways for transport of  people goods up and down the slopes.      The use of water resources for fish rearing in the by-the-riverside man made ponds should be encourages. We have the     advantage of cold water fish rearing such as the prized trot fish, a delicacy at five star hotels.      Water sports is another area where Uttarakhand  can easily go beyond river rafting to water skiing, scuba diving, sail boat     and  motor boat racing  and even floating and roving boat hotels. 3.  Tourism is growing but on a slow scale and in the traditional way. Religious tourism is the main stay and, according to one estimate, 80% of the money spent by the devotees goes out of Uttarakhand to purchase buses, diesel-petrol, food preparing              items, materials to build hotels and beddings etc. Only the man power part is retained . The need is to hitch this tourism to cottage and small scale industry and make goods for sale to tourists. If every tourist      spends, on an average, 2,000 rupees each, the self employed ones will get an annual income of 200 crores.     We have not yet developed any any tourist town besides the British created Mussoorie and Nainital. 4. Cottage and small scale industries have immense potentialities, ranging from making fuel blocks from pirul to high class      furniture in knocked down packing, there are abundant local naturally growing raw materials waiting to be exploited. 5.  Wood industry is the least cared for in Uttarakhand. It is an unfortunate dilema that we have 65% of land under forests and we are selling the felled trees as such. Wood curing,world class furniture making industry on line with the Brand IKEA is a reality      not been even visited by our planners. Lack of innovative ideas and vision is the reason. This industry can alone providei                                         livelihood to more than one lkh families of Uttarakhand if properly and fully utilised. 6.  Adventure sports and health tourism are the future areas of development in the hills of Uttarakhand. We can have annual     motor car racing on our serpentine roads, we can have hang gliding sites all over our steep hills having deep warm valleys      and these sites can also be developed as health recouping resorts.7. Man power training in the vocations that are needed to cater to the human resource needs of the above alternative areas of     the development of Uttarakhand.    WE HAVE THE POTENTIALS, WHAT WE NEED IS DEDICATED, INNOVATIVE, COURAGEOUS AND FULL OF VISION     LEADERSHIP THAT CAN MAKE AND RUN A REAL UTTARAKHAND ORIENTED GOVERNMENT.                                                                                THANKS. dr.bsrawat28@gmail.com     

Bhishma Kukreti

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हस्तशिल्प और उत्तराखंड

                       - डा बलबीर सिंह रावत







भारत के हस्तशिल उत्पाद दुनिया में मशहूर हैं। उत्तराखंड में भी कई विशिष्ट उत्पाद हाथों से घर पर ही बनाये जाते रहे हैं . आज के व्यावसायिक युग में उन परंपरागत उत्पादों की सार्थकता समय की मांग के हिस्साब से असामयिक हो गयीं हैं और कोई नयी पद्धति नहीं उत्पन्न हो सकी। हस्तशिल्प को उद्द्योग के स्तर पर चलाने के लिए तीन बातें महत्वपूर्ण हैं: 1.वस्तु का आकर्षण और उपयोगिता, 2. उत्पादक का कौशल स्तर, और 3. उत्पादों की माँग।
 
शुरू करते हैं मांग से।हस्तशिल्प के बाजार स्थानीय होते हैं, क्षेत्रीय होते हैं और राष्ट्रीय/अन्तराष्ट्रीय होते हैं। हर बाजार की अपनी अपनी पसंद होती है और उसी पसन्द के अनुरूप उत्पाद बनाए जाते हैं। बर्तमान में उत्तराखंड में धार्मिक तथा सैलानी प्रयटकों की भारी संख्या (पंद्रह लाख के लगभग प्रति वर्ष) आती है , बड़े शहरों में क्राफ्ट मेले लगते हैं जिनमे सारे देश के शिल्पी भाग लेते हैं और लोग जम कर खरीद दारी करते हैं। बिडम्बना है की उत्तराखंड के अपने उत्पाद 10% भी नाहे होते इन मेलों में। तात्पर्य है की हमारे क्राफ्ट उद्दोग को प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना पड़ेगा तभी उद्द्योग पनपेगा।
 



उत्पादक का कौशल। मांग में केवल वस्तु ही नहीं होती है , उसकी उपयोगिता, गुणवत्ता,और आकर्षण ही क्रेता को लुभाता है, उपभोक्ता की क्या पसंद है और वोह कितना खर्च कर सकता है , यह जानना जरूरी है। फिलहाल ऐसे सर्वे हुए नहीं हैं, लेकिन बर्तमान क्राफ्ट मेलों में ग्राहक पसंद का अनुमान लगाया जा सकता है . पसंद आने वाले उत्पाद उन के है, लकड़ी के हैं, धातु के हैं, रुई और कृत्रिम धागों (नायलौन ) के हैं, स्ताहानीय रेशों, बांस रिंगाल के, और खाद्य पदार्थों से बने उत्पाद हैं। जब प्रतिस्प्र्धा का सवाल आता है तो उत्तराखंड के पदार्थ कुछ पिछड़े से नजर आते हैं। इसलिए आवश्यकता है उत्पादकों के कौशल बृद्धि की।
 



उत्पादों की मांग। जैसे जैसे लोगों की आमदनी बढ़ती है उनकी मांगे तरह तरह के उत्पादों के लिए भी बढ़ती जाती है। सैलानियों की मांग होती है, यादगार के वस्तुओं की। जैसे तीर्थ स्थानों के विशिष्ट प्रतीतात्मक फोटो,लकड़ी, धातु पर उकेरी गयी प्रतिछाया, स्थानीय विशिष्ट उत्पाद जैसे रिंगाल की खूबसूरत कंडी, पिटारी , फूलों की (बुरांस, प्यूलीं,हिन्सोले किन्गोडों के फूलौं की कढाई वाले रुमाल, दीवाल में लटकाने के कपडे जो ऊनी, सूतो, भंगुले, स्योलू के धागों से बने हों। इनही मोतिफों से कढाई/छपाई से सुसज्जित थुलमे, कम्बल,शौल, कमीज के कपडे,स्वेटरें, दस्ताने, इत्यादि इत्यादि। असीमित सम्भावनाएं है धातु में उत्तराखंडी शिल्पियों को ताम्बे, कांसे और लोहे के उत्पाद बनाने में माहिरता है, अगर कहीँ यह कौशल बचा हुआ है तो। धातु में वजन के कारण इसका डिजाईन और आकर्षक स्वरुप महता रखता है। इसके लिए शोध होना चाहिए।
 
कुछ नए क्षेत्र भी हो सकते है, जैसे बिजली (स्येल),चाभी से चलने वाले अद्भुत करतब दिखाने वाले महंगे खिलौने, तीर्थ स्थानों में होने वाली महापूजा/आरती के सी डी, पैगाम देने वाले बोलते ग्रीटिंग कार्ड, साहसिक खेलों के परिचयात्मक विडियो इत्यादि इत्यादि।
 
अंतिम आवश्यकता .सशक्त, सामर्थ वान, सक्रिय तंत्र की, जो इस क्राफ्ट उत्पादन की अपार सम्भावना को मूर्त रूप दे सके। उत्तरदायित्व तो सरकार का है, लेकिन सोये हुए हाथी को जगाना मुश्किल काम है। एक सम्भावना है की अगर कुछ समाज सेवी लोग एक सहकारी संस्था बना कर उसे एन जी ओ के रूप में चलाने की पहल करें तो शायद यह क्राफ्ट उद्द्योग घर घर में और लघु उद्द्योग इकाईओं के रूप में पनप सकता है। अगर हर आगंतुक टूरिस्ट औसतन 3000 रुपये का सामान खरीदने के लिए लुभाया जा सके तो हर साल उत्तराखंड में 450 करोड़ रुपये आ सकते हैं यहाँ के श्रम-संसाधन के मूल्य के रूप में।

 

 

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