Author Topic: Articles by Scientist Balbir Singh Rawat on Agriculture issues-बलबीर सिंह रावत ज  (Read 20432 times)

Bhishma Kukreti

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भेड़  पालन, एक लाभ दायक व्यवसाय

                                                     डा . बलबीर सिंह रावत  (देहरादून )

 देश के विकास के साथ साथ व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति भी सुधरती है तो आराम दायक वस्तुओं की मांग भी  बढ़ती है। ऊनी वस्त्र , और वह भी मुलायम, गुदुगुदा देने वाली ऊन के बने, अधिक मांग में होते हैं।  यह भी एक तथ्य है कि जब मनुष्य ने अपना अंग ढांकना शुरू किया तो पत्तों के बाद ऊनी वस्त्र से ही ढांकना शुरू क्या था। शुरू की उन, जैसी मिली वैसी ही , उसी प्राकृतिक रंग में प्रयोग में लाई जाती थी, जैसी वह उन देने वाले जानवरों में मिलती थी . धीरे धीरे मनुष्य ने पहिचाना कि भेड़ से ही सबसे अच्छी उन मिलती है, ऊंचाई वाले ठंडे इलाकों में बकरियों से भी बहुत ही मुलायम उन मिलती है. मनुष्य ने यह भी सीखा कि  पालतू जानवरों के नियंत्रित और निर्धारित प्रजनन से ऐसी नश्लें पैदा की जा सकती हैं जिन से मनचाही गुणवता का, बढा कर,उत्पादन लिया जा सकता है.  उसने रेशों के प्राकृतिक रंगों को मिटाने, और मन चाहे रंगों में रंगने की प्रणालियाँ ढूंढ निकालीं ,कतायी बुनाई के परिष्कृत तरीके और मशीनें बना कर वस्त्र उद्योग को ऐसी ऊँचाइयों पर पहुंचा दिया है जिसके उत्पाद  महंगे होते हुए भी , अपनी उपयोगिताओं के कारण , हमेशा मांग में रहते हैं. वास्तव में बिना ऊनी कपड़ों के तो आधुनिक जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। सारे अच्छे सूट, जिनको पहिनना एक पहिचान बन गयी है उन से ही बने होते हैं.

इसी उन को पैदा करने  लिए भेड़ पालन किया जाता है।  एक ज़माना था जब गौचर में मेला लगता था और उसमे स्थानीय और  तिब्बती व्यापारी तरह तरह  ऊनी सामान लाते थे और देश भर के व्यापारी इन्हें खरीदने इस मेले में पहुँचते थे , पैदल , तब मोटर सड़कें नहीं थीं . उत्तराखंड के उत्पाद भी  होते थे, स्थानीय भेड़ पालकों के घरों में बने हुए। देश की आजादी के बाद, स्थानीय  भेड़ों की नस्ल सुधरने के लिए भी और उन्नत किस्म की भेड़ों की संख्या बढाने के लिए भी, विदेशों से मरीनो नस्ल की भेड़ों को आयात किया गया,  इनकी लोकप्रियता बढी, भेड़ पालकों    ने उत्साह दिखाया . काफी समय बाद, तिब्बत से महीन उन वाली  हजारों बकरियों को ले कर कई तिब्बती उत्तराखंड में आये , इन दुर्लभ बकरियों की प्रजाति को बढाने के लिए सरकार ने जिमा उठाया.  साथ साथ अंगोरा खरगोशों की रेशम सी मुलायम उन ने भी उन उद्द्योग को आकर्षित किया। इस प्रकार कच्ची उन के उत्पादन के लिए उत्तराखंड के पास तीन जानवर नस्लें उपलब्ध हुईं।
लेकिन ऊन उत्पादन का व्यवसाय उस गति से नहीं फ़ैल पाया कि भेड़, खरगोश और बकरी पालकों तथा जानवरों  की संख्या तेजी से बढ़ पाती। इसका मुख्य कारण रहा कि कच्ची उन को उन्नत वस्त्रों, धागों में परिवर्तित करने की एक भी आधुनिक तकनीक वाली इकाई कहीं भी इस प्रदेश में आज तक भी नहीं लगी है.  सारा उद्द्योग हस्त करघा और कुटर उद्द्योग के हवाले कर दिया गया, और इस लघु उद्द्योग क्षेत्र के लिए कोइ ऐसी नयी तकनीकी, नया हुनर, नहीं लाया गया जो अन्य जगहों में मशीनों से बने ऊनी  उपभोक्ता उत्पादों की गुणवता और मूल्यों की बराबरी कर सकते। इसका यह प्रतिफल  मिला भेड़ पालन इतना लाभ न दे पाया जितना उसकी संभावनाओं में था। और यह प्राचीन उद्द्योग प्राचीन ही रहने दिया गया।
 किसी भी कृषि/पशुपालन के काम को अगर व्यवसायिक स्तर पर पहुंचाना है तो तीन महत्वपूर्ण काम एक साथ करने जरूरी होते हैं,  यह हैं :   १. उत्पादन और उत्पादकता को निरंतर बढाते रहने का वातावरण,  २.   उपलब्ध कच्चे माल का इतना आकर्षक मूल्य  जो उत्पादकों को प्रोत्साहित करता रहे , और ३.  बढ़ती आपूर्ति की खपत के लिए  आधुनिक तकनीकी से लैस, ऐसा उद्द्योग  जो श्रेष्ट बाजारों में गुणवता और मूल्य के क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जीत सके.  जो कच्चे माल की बढ़ती आवक के साथ साथ अपनी क्षमता को भी बढाता रहे.
 
उन के सन्दर्भ में ऐसी पहल कौन करेगा? क्या अकेला भेड़ पालने वाला गडरिया ?, मुनाफे के उद्देश्य वाला निजी क्षेत्र का उद्द्योग पति?, खादी और ग्रामीण उद्द्योग बोर्ड , जिसके साधारण  सी गुणवता वाले उत्पाद केवल गांधी जयंत्री के अवसर पर भारी रियायत दे कर बिक पाते हैं?  या एक ऐसी सम्वेदनशील सरकार, जो इस महत्वपूर्ण व्यवसाय को वास्तव में आधुनिक और उन उत्पादक हितैषी बना कर उत्तराखंड को दुनिया की उने वस्त्र उद्द्योग के नक़्शे में लाने की इच्छुक हो? पहल तो सरकार को ही करनी पड़ेगी लेकिन भेडपालकों को साथ लेकर.
 
सब से पहिले, पारंपरिक भेड़ पालन क्षेत्रों के भेडपालकों को सन्गठित करके, उनको अच्छी नस्ल की भेड़ों से प्रजनन सुविधा दे कर, चरागाहों को पुनर्जीवित करके, उन्नत नस्ल के भेड़ों, उन वाले बकरियों और अंगोरा खरगोशों के बृहद स्तर पर पालने को प्रोत्साहित करने के सारे उपाय  सघन रूप से उपलब्ध किये जांय ताकि प्रति गाँव से इतनी अच्छी किस्म की उन मिल सके जिस से एक मध्य आकार की आधुनिक ऊनी कपड़ा मिल  लाभ कमाते हुए चल सके.   यह मिल अगर उन उत्पादकों की सहकारी समिति की, खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड की  या फिर भेड़ पालकों को  भी शेयर धारक बना कर बनी हो तो उन उत्पादन हमेशा लाभ दायक व्यवसाय बन सकता है.
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Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड में रेशा उद्द्यम   की संभावनाएं
 
                                                                                   डा. बलबीर सिंह रावत
मनुष्य को ईश्वर ने सबसे बुद्धिमान प्राणी बनाया तो उसने ईश्वर की रची बसाई दुनिया की उन सभी वस्तुओं को अपने उपयोग में लान शुरू कर दिया जिससे उसे कुछ भी लाभ मिलता दिखा . बनस्पति और पशु जनित रेशों का प्रयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है.

आज के अनुमान से विश्व में प्राकृतिक रेशा उद्यम के आंकड़े इस प्रकार हैं (आभार -ब्रेट .सी . सुडेल, इंडस्ट्रियल फाइबर्स -रीसेंट ऐंड करंट डेवलपमेंट, 2011)
रेशा ------------------देस ---------------------------------वार्षिक निर्माण हजार टनों  में
लकड़ी ------------अधकतर देस -----------------------1,750,00
बांस ----------------मुख्यतया चीन ------------------10,000
कनेत ----------------भारत , चीन ------------------970
जुट -----------------भारत , बंगलादेस --------------2,861
क्वाइर  /नारियल -------भारत, वियतनाम . श्री लका --931
फ्लैक्स -----------चीन , यूरोप -------------------830
सिसल/रामबांस   -----------ब्राजील, केनिया, तंजानिया --378
रेमी -----------------चीन -------------------------------249
भांग --------------चीन, यूरोप ----------------------214
घीकंवार वार। ---------लैटिन देस ------56
अबाका -   फिलीपाइन ,युकेडर ----------------98
(यद्यपि कपास , रेशम  व उन भी इसी कर्म में आते हैं ) इसके अलावा केलों के तने से, अननास से भी र्सेहे प्राप्त होते हैं
आंकड़े बताते हैं की दुनिया में प्रतिवर्ष तीन सौ लाख टन प्राकृतिक रेशों  का निर्माण  होता है
आज प्राकृतिक रेशों से बने पदार्थों काकई उद्योगों में उपयोग होता है , जसे ऑटोमोबाइल , भवन निर्माण , सडक निर्माण, मनोरंजन उद्यम,आदि में होता है।
प्राकृतिक रेसों  से गिफ्ट पैकिंग, पैकिंग, बिछौने , चटाईयां , टेबल कवर ,बीच चटाई , टेबल रनर , कोस्टर , पर्दे, बोल्स्टर , थैले, बटुवे , सिक्के रखे ने बटुवे, किताब रखने के होल्डर , कटलरी ट्रे, चायदानी की ट्रे , फ्रूट ट्रे, टोकरियाँ , बीन्स , गिलाफ , व अन्य  दिखलावटी क्राफ्ट वस्तुएं बनाई जाते हैं
उत्तराखंड में पशुओं से  केवल उन ली जाती है। बन्सपतियों के रेशों में सबसे परचलित है, भांग के पौधे की खाल, भीमल (भ्युंल) की टहनियों खाल, बनों में उगी हुई बबुलू घास की महीन और लम्बी, बालों के आकार की घास, बनो में उगती बेल -माल्हू- की खाल , रामबांस के पत्तों के रेशे, बांस और रिंगाल की छाल, और गेहूं तथा जौ के पौधों के तनों के (बाल और पहिली गाँठ के बीच का) अगले भाग. पारंपरिक उपयोग हर प्रकार के रेशों का अलग अलग कामों के लिए होता था . जैसे:-
भीमल  की टहनियों से पत्तियां तो जानवरों के चारे के लिए उपयोग में ली जाती हैं, टहनियों को सुखा कर,  स्थिर जल कुंडों में सिजाने रखते हैं, जहाँ हफ्ते दो हफ्ते में बाहरी छाल सड़ जाती है, पानी से बाहर निकाल कर, इस छाल  से रेशे निकाल कर सुखाये जाते हैं, रेशों को  पत्थर पर  पटकने और झटकने से छाल के अवशेष हट जाते हैं और मुलायम से एक मीटर के लगभग लम्बे, भूसे के रंग के रेशे, प्राप्त होते है। स्थानीय भाषा में यह रेशा स्योल्ल्हू के नाम से जाना जाता है।  जिन्हें उँगलियों से कंघी करके बारीक रेशों को अलग करके, बट कर पतली रस्सियां बनाई जाती हैं। इन पतली रस्सियों की तीन लड़ों को बट कर लम्बी मोटी रस्सियाँ बनाई जाती हैं, जिनका उपयोग जानवरों को खूटों से बांधने के लिए होता है. भीमल की रस्सियों मुलायम, मजबूत और नमी  रोधक होती हैं। ये जानवरों की गर्दनों को कोइ हानी नहीं पहुंचाती हैं इसके अलाव, जहाँ भी मजबूत, मोटी रस्सियों के आवश्यकता होती है, यह रासी उपयोग में लाई जाती है .
खेतों की मेंड़ों पर उगाये जाने वाले भीमल के पेड़, जाड़ों भर दुधारू जानव्रों के लिए हरे चारे का भरोसेमंद जरिया हैं, रेशा, और रेशा निकालने के बाद बची सूखी बारीक टहनियां  चूल्हे में आग जलाने के लिए, और जब सेल वाली टोर्चें नहीं होती थीं , तब बाहर जाने के लिए रोशनी करने के काम आती थीं।  कृषि और पशुपालन के ह्राश के साथ साथ इस इस रेशे की उपलब्धि कम होती जा रही है . दुग्ध उत्पादन बढाने के प्रयासों में अगर भीमल को बढ़ावा दिया जाता है तो यह रेशा उद्द्योग अच्छी आय देनेवाला कुटीर उद्द्योग बन साकता है .
भांग के रेशे भांग के पौधे की छाल से लिए जाते हैं। भांग का पौधा ठंडी जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है. इस पौधे की जड़ों के अलावा, बाकी सारे अंग अपनी अपनी उपयोगी खासियत रखते हैं . हरी पत्तियों से, दूध बादाम के साथ, शीतल मादक पेय बनाया जाता है, सूखी पत्तियों को अकेले या तम्बाकू, सिगरेट में मिला कर भी मादक धुंवा लिया जाता है जो साधुओं का मनपसंद, ध्यान केन्द्रक, मादक पदार्थ है. इसके फूलों के अन्दर, बीज बनने से पाहिले, जो गोंद नुमा चिप चिपा  पदार्थ  मिलता है उस से भी, निकाल कर कई लोग, अवैधानिक रूप से, तेज मादक की तरह उपयोग में लाते हैं भंग के पके हुए बीज, मादकता रहित होते हैं और वे उत्कृष्ट प्रोटीन और ओमेगा ३ के समृद्ध स्रोत हैं। पार्वतीय गाँवों में इसके बीज भून कर,चेवड़ों और भुने गेहूं के दानो के साथ मिला कर स्नेक्स की तरह लिए जाते हैं बीजों को पीस कर और छान कर साग सब्जियों के रस की गाढा कने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है, विशेष कर पर्वतीय गोल मूली की सब्जी में तो इसके मिलाने से सवाद बहुत ही बढ़ जाता है. .
जब बीज पकते हैं तो पौधे, जो ८ -१० फीट लम्बे होते हैं, सूख जाते हैं। तब इनकी छाल उतार कर रस्सी बनाने के लिए ली जाती है. रेशो को सुखा के उनसे झटक कर छिलके उतार कर रखे जाते हैं . पौधे के बचे भाग को तो जलाने के लिए उप्योफ़ में लाया जा सकता है, अन्यथा फेंक दिया जाता है. बहुत कम लोगों को मालूम है टी इस बेकार भाग से सबसे अधिक असरदार साउंड अब्सोर्विंग टाइल्स बनारी जा सकती हैं, तो ध्वनि को सोश कर आवाज को गूजने से बचाती हैं जैसी सिनेमा हॉलों में लगाने की जरूरत होती है. लेकिन इसके लिए बड़े आकार पर भांग की खेती करनी पड़ती है और सरकार से लाइसेन्स भी लेने की जरूरत होगी .
भंग के रेशे १ १/२ मीटर  तक लम्बे मुलायन और चमकीले होते हैं तो इससे बनी रस्सियां मजबूत, एक सी गोलाई की और चिकनी फिसलन दार होती हैं इसलिए इसकी गांठे भी विशेष प्रकार से लगानी होती हैं और तब वे खुलती नही हैं। रस्सियों के अलावा भांग के धागों से हैण्ड बैग, थैले , क्वथ्ले (लम्बे थैले, जिन में अनाज रख कर बीच में खाली करके , घुमा कर , १० - १२ किलो के दो भार दोनों तरफ और बीच में कंधे में रखने का घुमावदार गददा )भी बनाए जाते थे जिनका अब चलन नहीं है. आज के उपयोग के लिए भांग के रेशे से रंगीन डिजाइनों वाली दरियां, थैले , बोरे  और मैट्स बनाए जा सकतें है.
भांग एक बहु उपयोगी पौधा है , जिसके मादक तत्वों को अगर नियंत्रण में रख कर , बड़े स्तर पर खेती की जाय तो रेशा, अति पौष्टिक बीज और  उत्कृष्ट किस्म के अत्यंत ध्वनि शोषक , हल्की, अग्नि रोधक द्रव्य से उपचारित टाईलें बनाई जा सकती हैं. यह टेक्नोलोजी नर्सरियों में से एक हो सकता है. इसकी पहल सरकार को हे करनी होगी .
मालू  की बेल पर्वतीय बनो में, ४, ००० - ५,००० फीट की ऊंचाई पर प्राकृतिक तौर से उगी मिलती है. इस बेल  के पत्ते और रेशे पर्वतीय खेती के अभिन्न अंग थे. पत्तों से छत्री आकार के छंतले और ५ -६ x ८-१० फीट के पल्ले बनते थे जो, खेतों में जानवरों की गोठ में पानी,पाले से बचाने का काम करते थे . पत्तों  और सख्त बारीक, सींक नुमा   तने वाले घास की परतों को बांस के फ्रेम में बाँधने के लिये मालू के पत्तों और रेशे का ही प्रयोग किया जाता अहि. इस रेशे की विशेषता यह है की यह पानी/ नमी से सद्द्ता नहीं और बजाय फूल कर ढीला होने के और भी कस जाता है . मालू के रेशे की रस्सियाँ अति मजबूत होती है और सूखने पर भी लचीली रहती हैन. मालू के पत्ते ६ से १० इंच लम्बे चौड़े होते हैं, इनसे पत्तलें  और दोने बनाए जाते हैं। सामाजिक भोजों में पके भात को, गुंदे आटे को ढकने के काम आते हैं इसकी पत्तियों की एक अपने प्रकार की खुशबू होती है, जो मीठे भात के स्वाद को दुगुना कर देती है। इन  पत्तों को पान और एनी इसी आकार के खाद्य सामग्री को लपेटने के काम भी लाया जाता है.  मालू की फलियाँ भी लम्बी होती हैं और हर फली में ४ से लेकर ८ तक, पुराने एक रुपये के सिक्के के आकार के, बीज होते हैं , कच्चे बीज खाए भी जा सकते हैं .
भीमल और भांग की तरह मालू भे बहु उद्द्येश्हेय है, और किसी जमाने में य तीनो पर्वतीय जीवन के अभिन्न अंग थे .
राम बांस   भी एक रेशे दार पौधा है जो जंगलों में, खेतों की रक्ष के लिए छरो और दीवार के रूप में लगाया भी जाता है. यह शुष्क जमीन में भी उगता रहता है, इसकी पर्रियाँ गूदेदार, , ३ फीट तक लम्बी होती हैं, परिपक्व पत्तिओन को सुखा कर उनसे रेशा लिया जाताहै, इसका रेशा, मोटा और खुरदरा होता है तो इस से  मोटी छातियाँ और इसी तरह का, बिछाने ढंकने का सामान बनाया जा सकता है.  रस्सियों के लिए रामबांस का रेशा अनुपयुक्त है .
बांस और रिंगाल  भी पार्वती क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी पौधे हैं, बांस के झुरमुट, आम तौर से नालों के आस पास जहां हमेशा नमी रहती है , लगाए जाते रहे हैं, इसके ताने से कई काम लिए जाते हैं, परिपक्व ताने गो बाल्लियों के रूप में कई कामों में आते हैं, हरे पक्के बांस से पतली आधा, पौअना, या एक इंच चौड़ी , बहुत पतली और कई फीट लम्बी पट्टियां ली जाती हैं , इनसे अनाज फटकने के सुप्पों से ले कर अनाज रखने के सौ दो सौ किलो क्षमता के ड्वारे,छोटी बड़ी टोकरिया, इत्यादि  बनाई जाती हैं,  रिंगाल,बांस  से भिन्न होता है, छोटा और पतला , रिंगाल के रेशों से  हाथ में लेजाने के लायक कंडिया खूबसूरत  अटेची के आकार के संदूक, बनाए जाते हैं और इनकी आयु  सालों दर साल लम्बी होते है. किसी जमाने में रिंगाल का ऐसा घरेलू सामान शान ओ शौकत का प्रतीक माना जाता था .
 
गेहूं , धान , मंडुआ , झंगोरा , और जौ  की नलियां   भी बड़े काम की होती हैं , इनसे , किसी जमाने में , हर गृहणी, रोटियान और एनी खाद्य वसुओं को रताजी आयर नाम रखने के लिए विविन्न्य आकारों की,ढक्कन दार रंगीन टोकरिया स्वयम बनाती थीं  और अपनी कला का प्रदर्शन करती थीं . अब इने जगह कसेरोलों ने ले ली है , लेकिन अब भी इसे कुटी उद्द्योग के रूप में, समुचित विक्सित टेक्नोलोजी के साथ, पुनर्जीवित किया जा सकता है. 
                                                    रेशे उद्यम में डिजाइन का महत्व

रेशे उद्योग को बढाने के लिए सामयिक डिजाइनिंग   होना आवश्यक है।
                                                   वस्तु निर्माण में  नई तकनीक
आज समय आ गया है की रेशे उद्योग अन्वेषण , निर्माण, निर्माण प्रशिक्षण  में नई तकनीक का समुचित उपयोग हो
                                                 विपणन /मार्केटिंग व्यवस्था

विपणन विधि व मार्केटिंग चैनलों का होना भी आवश्यक है

आज के युग मे, उप्रोक्त कुटीर उद्द्योग समाप्त प्राय हो गए हैं , आधुनिक  टेक्नोलोजी से उद्द्योहोंन्द्वारा बनाए गएप्रर्यायों ने इन्हें पीछे धकेल दिया है, . दुर्भाग्य से हमारी प्रयोगशालाओं ने इन जमीनी उपलब्धियों पर किसी भी प्रकार का न तो शोध ही किया है और न ही कोइ ऐसी उत्कृष्ट टेक्नोलोजी का अविष्कार करने की सोची है की ये प्रकृति की अमूल्य देने किस प्रकार से बढाई जान और कैसे इनके उपयोग किये जांय कि इनकी बहुउद्द्येशीयता  से पूरे लाभ लिए जा सकें। हमारे कृषि और बन अनुसंधान और शिक्षा संस्थाएं और विश्वविद्यालय इस पहलू पर पहल करें तो पर्वतीय रेशा उद्य्यम रोजगार का बड़ा जरिया बन सकता है.                                   .    .         
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Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड के भोजन
                                                 डा. बलबीर सिंह रावत
भोजन, यानी खाने की वे वस्तुएं, जो स्वादिष्ट हों , पौष्टिक हों, आसानी से उपलब्ध हों, और आसानी से पचाई भी जा सकें। ज़रा सोचिये  की मानव जाति के पूर्वजों ने, प्रकृति में पैदा हुए  नाना प्रकार की बनस्पतिओं को चख कर, थल /जल के जानवरों, पक्षियों, से मांस, दूध, अंडे लेकर, उन्हें चखा होगा , उनके अच्छे बुरे , पौष्टिक/जहरीले असर को भुगता होगा और कई पीढ़ियों के अनुभव के बाद छांट कर चुना होगा की यह खाने लायक हैं और वह नहीं हैं . आग को बस में करने की कला सीखने के बाद तो मनुष्य के भोजन में आमूलचूल परिवर्तन आया होगा . जो वस्तुएं कच्ची हालत में अपाच्य थीं वे पकाने के बाद सुपाच्य हो जाती हैं, यह उस जमाने का एक युगपरिवर्तक आविष्कार था. आज हमारे लिए यह सब एक ऐसी साधारण सी बात है की इस पर कोइ सोचता भी नहीं।  मानव जाती के प्रसार के साथ साथ , उसकी यह भोजन के लिए उपयुक्त पदार्थों की ढूंढ उसके साथ साथ चलती रही क्योंकि जहां से ए दल,  पूरे परिवारों के साथ आगे बढे , उन्हे नईं बन्स्पतियो से, नईं जलवायु से अन्य प्रकार की भोजन सामगियाँ ढूंढनी पडीं .जब ये दल स्थाई रूप से कहीं बस गए तो इनके भोजन में उन स्थानीय वस्तुओं का अमिट प्रभाव रहा जो वहाँ पाई जाती थीं .तब खेती भी पूरी तरह प्राकृतिक आपदाओं से, परिवर्तनों से , ऒखे, या अतिब्रिष्टि से प्रभावित होती थी तो मानुष ने वनों में उपलब्ध खाद्य योग्य पदार्थों को भी पहिचाना और उनका उपयोग करना शुरू किया .
उत्तराखंड के सन्दर्भ में जब यहाँ के निवासियों के भोजन की बात आती है तो इसमें  बहुत विभिन्नताएं हैं।  इन विभिन्न्ताओं का कारण यहाँ के जलवायु में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ हैं। नदी घाटियों की नम और गर्म हवाएं, ऊंचे पर्वतों की ठंडी आबोहवा , हर दिशा के ढलानों की अपनी विशेषताएं  हैं जिनमे हजारों प्रजातियों की बनस्पतिया उगती हैं।  इन में से कई की खेती की जाती है और बहुत सारी जंगलों से ही प्राप्त हो जाती हैं, बस मौसम में बीन कर, तोड़ कर , खोद कर ले आओ।  उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भोवाली में स्थित नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज के क्षेत्रीय स्टेशन ने इस विषय पर शोध किया . उनके वैज्ञानिकों, मेहता , नेगी, और ओझा, ने पाया की कृषि क्षेत्र में कुल ९७ प्रजातियों की फसलें उगाई जाती हैं  जिनमे अनाज की ८ , मोटे अनाज की ६ ,दालों की १५, साग-सब्जियों की २८, तिलहनों की ११, फलों की १९ और मसालों की १० प्रजातियों की फसलें उगाई जाती हैं .
इस विविधता के भोज्य सामगियों की उपलब्धता में पौष्टिकता का संतुलन भी है। जहां अनाज (कार्बोहाइडरेट) की कुल १४ किस्में उगाई जाती हैं, वहीं दालों (प्रोटीन ) की १५, तिलहनों (वसा ) की ११,  फलों की १९ और साग सब्जियों( खनिज, विटामिन , ऐंटीऔक्सीडेंट) की २८ किस्में पैदा की जाती हैं।
इन खेती से उगाई जाने वाली भोज्य सामग्रियों के साथ साथ वनों में प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले और खाए जा सकने वाले फलों की ६७ किस्में है और साग सब्जी बनाने लायक फूलों, पत्तियों और कंद मूलों की २७ प्रजातियाँ हैं जिन्हें उत्तराखंड के निवासी सदियों से उपयोग में लाते रहे हैं।
 उपरोक्त वैज्ञानिकों ने यह भी पाया की इतने सारे भोज्य पदार्थों की उपलब्धि ने ही यह संभव किया कि उत्तराखंड के लोग कुल १२५ से अधिक प्रकार की  भोजन बनाते हैं . अकेले रोटियों और नाना प्रकार के भातौं की संख्या २१ है, दालें १५ किस्म की बनती हैं,, ६ प्रकार के फाणे-चैसे, १९ प्रकार के मीठे भोजन,
११ प्रकार की विशेष सब्जियां, ८ प्रकार के झोल, १० प्रकार की चटनियां , ५ प्रकार के रायते, १० प्रकार की बड़ियाँ और पकोडियां बनाई जाती हैं
यह तो रहा एक संकलन, कि कितनी सामगियाँ उपलब्ध हैं और उनसे क्या क्या बन सकता है। यह सारी खोजें और विधियां हमारे पूर्वजों ने खोजी/स्थापित/प्रचलित कीं थीं, उन्होंने ने ही इतने सारे प्रकार के भोजन बनाने की रेसिपियाँ भी विकसित की थीं। जो अब प्रयोग में कम ही लाई जाती हैं। आज के सन्दर्भ में देखें तो अब न तो इतने किस्म के पदार्थ उगाये जा रहे हैं , न ही बनो में वह सब उपलब्ध है जो कभी था.७५ साल पाहिले हम स्कूल से घर आते हुए लिंगडे, खुन्तड़े तोड़ कर ले आते थे, सगोड़े के पुश्ते के बेडू के पेड़ से नए लगे कच्चे फलों की झुम्पिया तोड़ कर सब्जी के लिए ले सकते थे, अब यह सब कई कई कारणों से दुर्लभ होता जा रहा है.
शिक्षा और जीवन शैली का शहरीकरण होने के कारण खान पान भी बदल गया है. मंडुए के बाडी और कन्डली की धबड़ी को हमारे ही बच्चे छी छी  के नाम से पुकारते हैं, गाँवों में भी। माँ बाप भी लाचार . लेकिन  एक बार मैंने अपने ही बच्चों को अखबार दिखाया की मंडुए को कर्नाटक में रागी  कहते हैं, वहा से आये भारत के प्रधान मंत्री रोज रागी बाल्स  (बाडी के पिंड) खाते हैं,  और मंडुये का आटा, गेहूं के आटे से अधिक स्वास्थ्यवर्धक है. अब अखबार में लिखा था तो वे राजी हुए की वे भी काली रोटी में घी और भुने तिल,मूंगफली, हरे धनिये, लहसुन के हरे पत्ते और कलियाँ, हरी मिर्च, अदरख की नमकीन, चटपटी चटनी के साथ खाने लगे. दो दिनों बाद दूकान में गया, मंडुए का आटा माँगा, तो उत्तर मिला "अब अगले जाड़ों में ही मिलेगा". शहर की अन्य दुकानों में खोजा , महँगा पेट्रोल जलाया, तो एक दूकान में मिला,  बोला "मेरे यहाँ हर समय आपको मिलेगा " भाव जाड़ों में हर पहाडी पंसारी के यहाँ से चार रूपये अधिक.  कहने का अर्थ यह है की केवल प्रकृति ने ही इतनी पौष्टिक सामग्रियों को दुर्लभ नहीं बहाया है , हम मनुष्यों के लालच ने और दुर्लभ बना दिया है , मंडुये का आटा गेहूं के आटे से ६ रूपये महँगा? इसी मंडुये के बीज, कई विदेशों में रहने वाले कर्नाटकी परिवार, अंकुरित करके, उनका माल्ट बना कर शिशुओ का अन्न प्राशन भी कराते हैं, मेरे एक कर्नाटकी सहयोगी ने मुझे मंडुए का मीठा सत्तू भे ला कर दिया था। बहुत स्वादिष्ट था .       
आज की पढी लिखी गृहणियों को तो पहाडी व्यंजन बनाना नहीं आता।  जब इनकी माताएं बनाती थीं तो ये बालिकाएं पढाई में व्यस्त, पका पकाया खाना खाती थीं, बाद में कुछ बनाना सीखा तो बड़े बड़े होटलों के पसिद्ध श्येफों द्वारा लिखी गयी ( या उनकी लिखी किताबों की नक़ल मार कर, प्रवीण गृहणियों द्वारा लिखी रविवारीय स्तंभों में छपी) रेसिपियों को सामने रख कर।  अपनी कोइ पर्वतीय व्यंजनों को बनाने के अधिकृत, परिस्कृत, मानकीकृत रेसिपियां तो किसी ने अभी लिपि बद्ध करने की सोची भी भी नहीं होगी। फिर प्रवासियों के लिए पर्वतीय खाद्य सामग्रोयों की निरंतर उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है   .                                      उपरोक्त संस्थान  ने भी केवल संकलन के लिए शोध किया है. और न तो  वस्तुओं  के पर्वतीय ,प्रचलित नाम ही दिए हैं और नहीं उगने/उगाये जाने के स्थान का कोई  विवरण है. यह काम किसी अन्य अन्वेषक दल को  और अन्य संस्थानों  को भी करना चाहिये.  वैसे अगर विश्वविद्द्यालयों और महाविद्द्यालयों के वनस्पति शाश्त्र विभाग ऐसा अनुसंधान करें तो उनका उताराखंड में स्थापन सार्थक हो जायेगा. अभी अल्मोड़ा में जो हुनर विकास का नया पाक शाश्त्र केंद्र खुलने वाला है वहाँ  अगर एक अन्वेषण कोष्ठ भी खुले और यह कोष्ठ उन सारे १२५ व्यंजनों की ,जिनका संकलन उपरोक्त संथान ने किया है, की सारी पारंपरिक रेसिपियों का संकलन, आंकलन, परीक्षण और  मानकीकरण करके,  पुस्तक रूप में उपलब्ध करा दे तो यह इस प्रदेश की सरकार का उत्तराखंड की भोजन विरासत को लोकप्रिय बनाने की दिशा में एक अनूठा कदम होगा।
इसके साथ साथ अगर अब भी कोइ जानकार लोग, जिनके घरों में, जान पहिचान में , ऐसी प्रवीण महिलायें, और सामाजिक भोज बनाने वाले सरयूल परवारो के जानकार हैं,  तो उनसे उनकी रेसिपिया ले कर भी प्रकाशित की जा सकती है।  यहाँ पर एक चेतावनी भी मैं देना कहता हूँ , चूंकि अब पर्वतीय खाद्य सामग्रियों का चलन बढ़ रहा है, तो इनका व्यापारिक महत्व भी बढ़ रहा है. ऐसे में जो पर्वतीय भोज्य प्रसंस्करण और पाक शाश्त्र की  असली टेक्नौलोजी है, उसे ताक पर रख कर, कई नकलची भी उभर रहे हैं, जैसा मन में आया, जैसा भी उनकी समझ में आया वैसे ही ऊटपटांग बनाया और बेच दिया। ऐसे लोग   सब को धोखा दे कर  फलफूल रहे है। इस लिए राज्य सरकार का यह फर्ज है की वोह अपने समाज कल्याण विभाग में एक विरासत सरंक्षण उपविभाग खोले और इन विलुप्त होती विरासतों का मूल रूप  में संकलन करके, उच्च कोटि के शोध संस्थानों में इनका परीक्षण, मानकीकरण और प्रकाशन कराने की व्यवस्था करे . हमारे भोजनों में से काफी पदार्थ है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो सकते हैं, केवल दो उदाहरण काफी हैं, खूब फेंट कर बनाई गयी उड़द-भुजेले की मसालेदार बडियां और जिंजर हुए अरसे . और भी कई पदार्थ हैं कोइ इन्हें आगे तो बढायं। 
 
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Bhishma Kukreti

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कंडाळि   धपड़ी /कापिलु   और अन्य उपयोग
( उत्तराखंड के भोज्य पदार्थ , गढ़वाल के भोज्य पदार्थ , कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, उधम सिंह नगर कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, पिथौरा गढ़ कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, द्वारहाट कुमाऊं के भोज्य पदार्थ,बागेश्वर कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, चम्पावत कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, अल्मोड़ा कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, नैनीताल कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, पौड़ी  गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, चमोली  गढ़वाल के भोज्य पदार्थ,  रुद्रप्रयाग   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, टिहरी  गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, उत्तरकाशी   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, देहरादून   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, लैंसडाउन   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ लेख माला )
 
                                                       डा. बलबीर सिंह रावत
कंडली, ( Urtica dioica), बिच्छू घास , सिस्नु , सोई , एक तिरिस्क्रित पौधा, जिसकी ज़िंदा रहने की शक्ति और जिद  अति शक्तिशाली है.क्योंकि यह अपने में कई पौष्टिक तत्वों को जमा करने में सक्षम है, हर उस ठंडी आबोहवा में पैदा हो जाता है जहाँ थोडा बहुत नमी हमेशा रहती है. उत्तराखंड में इसकी बहुलता है, और इसे मनुष्य भी खाते हैं, दुधारू पशुओं को भी इसके मुलायन तनों को गहथ  झंगोरा, कौणी , मकई , गेहूं, जौ मंडुवे के आटे के साथ पका कर पींडा  बना कर देते है।
      कन्डालि में जस्ता, ताम्बा सिलिका, सेलेनियम , लौह  , केल्सियम, पोटेसियम, बोरोन, फोस्फोरस  खनिज, विटामिन ए , बी १ , बी २ , बी ३ , बी ५ , सी ,और के, होते हैं , तथा ओमेगा ३ और ६ के साथ साथ कई अन्य  पौष्टिक तत्व भी होते हैं .इसकी फोरमिक ऐसिड से युक्त, अत्यंत पीड़ा दायक , आसानी से चुभने वाले ,सुईदार रोओं से भरी पत्तियों और डंठलों की स्वसुरक्षा अस्त्र के और इसकी हर जगह उग पाने की खूबी के कारण, इसकी खेती नहीं की जाती।
धबड़ी ठेट पर्वतीय शब्द है, जिसका अर्थ होता  है  किसी भी हरी सब्जी में आलण डाल कर, भात के साथ , दाल के स्थान पर, खाया जाने वाला भोज्य पदार्थ . हर हरी सब्जी का अपना अलग स्वाद होता है तो, धबड़ी के लिए पालक, पहाड़ी पालक, राई और मेथी तो उगाऎ जाने वाली सब्जिया है, स्वतः उगने वालियों में से कंडली सबसे चहेती है. प्राय:  इसकी धबड़ी जाड़ों में ही बनती है, क्योंकि तब इसकी नईं कोंपलें बड़ी मुलायम और आसानी  से पकने वाली होती है. चूंकि इसके रोयें चुभते ही तेजी  से जलन पैदा करते हैं, तो इसे तोड़ने के लिए चिमटे और चाकू का, तथा हाथ में मोटे कपड़े का आवरण या दस्ताने का होना जरूरी होता है . केवल शीर्ष की मुलायम नईं कोंपलें ही लेनी चाहियें .एक बार के लिए जितना भात पकाया जता है उसी के हिसाब से कंडली की मात्रा ली जाती है , चार जनो के लिए ३५० ग्राम ताजी कंडली काफी रहती है  इसे खूब धो लेना चाहिए, क्योंकि  जहां से तोडी गयी है वहाँ की धूल और अन्य गन्दगी के कण इस पर जमा हो सकते हैं .
आलण के लिए प्रयोग में लाई जाए वाली वस्तुएं नाना प्रकार की होती हैं , जैसे गेहूँ/जौ का आटा, बेसन, गहथ भिगोये हुए झंगोरा, कौणी , चावलों को पीस कर बनाया गया द्रव्य इत्यादि. इनका  अलग अलग सब्जियों के साथ का जोड़ा होता है. कन्डली के लिए आटा ही उपयुक्त होता है,  इसके स्थान पर बेसन भी  लिया जा सकता है। .इन वस्तुओं की मात्रा, तैयार धबड़ी के ऐच्छिक गाढे पन पर निर्भर करता है , बहुत पतली या गाढी ठीक नहीं होती। घोल को पहिले से तैयार करके रखना ठीक रह्ता है। कढाई में सरसों का तेल गरम करके, कटे प्याज को गुलाबी भून के आंच हल्की कर देनी चाहिए। फिर हींग और मसाले और तुरंत कंडली  डाल कर और नमक मिर्च  मिला कर , थोड़ा चला कर ढँक कर पकने रखते है. १० मिनट बाद, आलण के घोल को डाल कर चलाते रहते हैं ताकि आलण ठीक से मिल जाय. अब इसे चलाते रहना चाहिए  जब तक पक न जाय . बस स्वादिष्ट और पौष्टिक धबड़ी तैयार है.

                                                                         कंडाळि के अन्य भोज्य प्रयोग
सूखी पत्तियों से कपिलु या धपडि:कंडाळी की पतियों और डंठल को सुखाकर रख दिया जाता है और फिर आवश्यकता अनुसार  गहथ आदि के फाणु बनाने के काम आता है।
पेस्टो:  कंडाळी की पत्तियों को मसाले , नमक , तेल, मूंगफली , चिलगोजा  में मिलाकर  पीस कर  पेस्ट बनाया जाता और किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ के साथ मिलाकर भोज्य बनाया जा सकता है।
सूप:कंडाळी की पत्तियों को पानी में उबाला जाता है फिर छाने पानी में घी , नमक , काली मिर्च व थोड़ा सा आटा  डालकर ग्राम करने से सूप भी बनाया जाता है।
ठंडा पेय: कंडाळी की पत्तियों को चीनी  की चासनी में मिलाकर छोड़ देते हैं जिससे चीनी में छोड़ देते हैं, फिर कंडाळी की पत्तियों को बाहर निकाल देते हैं। नीम्बू आदि मिलाकर पानी के साथ ठंडा पेय स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है।
बियर  : कंही कंही कंडाळी की पत्तियों की सहायता से बियर भी बनती है।

                                                                                कंडाळी  का औषधि उपयोग 

  कंडाळी का विभिन्न देशों में औषधीय उपयोग भी होता है . गढ़वाल कुमाऊं में शरीर के किसी भाग में सुन्नता हटाने के लिए शरीर पर कंडाळी स्पर्श से कंडाळी का उपयोग होता है। भूत भगाने के लिए भी कंडाळी स्पर्श किया जाता है। हैजा आदि की बिमारी ना हो इसके लिए सिंघाड पर कंडाळी /कांड भी बांधा जाता था  .
जर्मनी में गठिया के रोग उपचार में  कंडाळी उपयोग होती है।
यूरोप में कुछ लोग इसे कई अन्य औषधियों में प्रयोग करते थे.
कई देशों में , कहा जाता है कि कंडाळी को जेब में रखने से बिजली गिरनी का भय नही रहता है।

                                                           रेशा उपयोग
     यूरोप में कंडाळी के द्न्थल से रेशा निकाला जाता है। जर्मनी में एक कम्पनी  कंडाळी के रेशों का व्यापार भी करती है।
  कंडाळी की जड़ों से पीला रंग भी निर्मित होता है। पत्तियों से पीला और हरा मिश्रित रंग भी बनता था
ताम्र युग में कंडाळी रेशा उपयोग प्रचलित था .                                                               
                                                           
                                                         कंडाळी और भाषाओं , साहित्य में  अलंकार

कंडाळी का भाषा को अलंकृत करने में भी उपयोग होता है। गढवाली में कहते हैं , ज्यू बुल्याणु च त्वै तैं कंडाळीन  चूटि द्यूं। या तै तैं कंडाळीन चूटो
प्राचीन रोमन साहित्य में  कंडाळी के मुहावरे मिलते हैं। शेक्सपियर के कई नाटकों में  कंडाळी संम्बन्धित मुहावरे प्रयोग हुए हैं। जर्मनी में और हंगरी भाषा में कई मुहावरे कंडाळी समन्धित हैं
स्कॉट लैंड आदि जगहों में कंडाळी सम्बन्धित लोक गेट पाए जाते हैं
स्कैंडीवियायि लोक साहित्य में कंडाळी सम्बन्धी लोक कथाये मिलती हैं 
 
अत: कहा जा सकता है कि कंडाळी पौधा मनुष्य का सच्चा मित्र है
 
                                                   
                                                               
BSrawat         .       .,

Bhishma Kukreti

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पत्यूड़
                                                              डा. बलबीर सिंह रावत
                        घर घर में बनाया जाने वाला पत्यूड़, खुद अपने नाम से ही अपना परिचय देता है : पत्तों से बनी हुई, स्वादिष्ट  पकौड़ी। पकौड़ी कई पदार्थों से बनाई जाती हैं , आलू की, प्याज की , पिसी हुई दालों की, और नाना प्रकार के पत्तों की। पत्तों की पकोदीयों से पत्यूड भिन्न हैं . जहा पकौड़ी के लिए मेथी इत्यादी के पत्ते काट कर बेसन में मिला कर पकौड़ी बनती है, वहीं पत्यूड़ बनाने के लिय साबुत, पूरे, या, अगर पत्ते बड़े हैं , या छोटे छोटे पयूद बनाने हैं तो बीच से  दो भागों में कटे पत्ते लेते हैं। पत्यूड़ बनाने की विधि अपने में अनूठी है. इसके लिए उपयुक्त वे मुलायम पत्ते होते है जो खाद्य हैं, जैसे गीन्ठी के, तैडू के और पिंजाड़ के। पिंजाड़ एक अपने आप, सगोडों ( किचेन गार्डेन) में  उगने वाला पौधा है जो जमीन पर ही रेंक कर बढ़ता है . इसकी खूबी यह है कि तलने पर इसके पत्ते फूल जाते हैं , छोटे छोटे गुब्बारों की तरह और बड़े ही कुरमुरे हो जाते है.
पत्यूड़  बनाने के लिए ताजे और  मुलायम पत्ते ही लिए जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह से धो कर ही उपयोग में लाते हैं। अलग से वेसन या गेहूं , मक्की , चावल का आटा लिया जा सकता है, अलग अलग या मिला कर। इस आटे में मन पसंद मसाले ,नमक , मिर्च, हल्दी और हींग मिला कर पानी डाल कर दपदपा घोल बनाया जाता है। इस घोल की,   पत्तों के दोनों तरफ, हल्की परत लगाई  जाती है और तब पत्तों को डेढ़ X तीन इंच के चौकोर आकार में मोड़ा जाता है . घोल का गाढापन ही गोंद का सा काम करता है तो पत्ते खुलते नहीं। इन की मोटाई चौथाई इंच से अधिक नहीं होनी चाहिये. इन लपेटे पत्तों को गरम तेल में, बादामी रंग होने तक  तलते हैं। पीली सरसों के तेल में तेल हुए पत्यूड्यों का स्वाद अपने में निराला होता है।
वैसे तो गरम गरम पत्यूड़े और चाय का आनन्द अनूठा होता है , लेकिन पत्यूडों को सेंडविच में, परांठों के साथ ,
साधारण रोटी में रोल बना कर  बच्चों के स्कूल के लंच बोक्स में या यात्रा के लिए रखे सूखे भोजन के साथ, सब्जी के स्थान में रख कर निराले स्वाद का आनंद लिया जा सकता है. एक बार बना कर देखिये।
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Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड में सौर ऊर्जा
                                  डा. बलबीर सिंह रावत
सौर ऊर्जा, धूप की गर्मी से आती है और  ग्रीष्म ऋतु में तो इसकी प्रचुरता होती है, लेकिन जाड़ों में , अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, उत्तराखंड की सूरज से दूरी बढ़ जाती   है, तो  केवल दक्षिण  तथा दक्षिण-पश्चिम के ढालों में ही इसका उपयोग ऊर्जा के रूप में किया जा सकता है. सूर्य की गर्मी को एकत्रित करके उससे खाना बनाने के सोलर कुकर, और पानी गरम करने के संयंत्र और सूर्य के प्रकाश से बिजली बनाने के यंत्र अब आसानी से उपलब्ध हैं। पहाड़ों में चूंकि बरसात के चार  महीनों में बादल घिरे होते हैं तो न तो पर्याप्त गर्मी और न ही प्रकाश मिल पाता है, तो इसी कमी के कारण यह ऊर्जा का स्रोत लोकप्रिय नहीं हो पाया है. फिर भी खाना पकाने के लिए  लकड़ी और गैस की दिक्कतों के कारण, तथा बिजली का कई कई दिनों तक न आने के कारण, सौर चूल्हा और सौर लालटेन एक अच्छा विकल्प हैं जिन्हें स्टैंड बाय के रूप में रखना सुविधाजनक है. हाँ इसमें अच्छी खासी रकम लग जाती है .जो लगा सकते हैं , उन्हें यह दोनों विकल्प रखने चाहियें। यह सारे उपकरण वैकल्पिक ऊर्जा विभाग से प्राप्त हो सकते हैं। .
सौर ऊर्जा का उपयोग बहुत जगह होता है यथा -
प्रकाश व्यवस्था
जल गर्मीकरण
भोजन बनाना
बहुत सी जगह ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल होता है
कार ऑटो में ऊर्जा इस्तेमाल
सौर बैटरी
सोलर पंखे, एयर
सोलर पम्प अदि  आदि
सोलर ऊर्जा का बाज़ार प्रति वर्स तीस प्रतिशत से बढ़ रहा है
  फोटोवोल्टिक सोलर उद्योग सन  2009  में  $ 38.5 बिलियन डौलर का था और   सन  2014 में $96.8 बिलियन डॉलर का होने का अनुमान है अमेरिका में सन 2012 में यह मार्किट अडतीस प्रतिशत बढ़ा।  2012 में अमेरिका में 3.3 गिग वाट्स  के उपकरणों में 76% की वृद्धि हुयी
भारत का स्थान सोलर ऊर्जा उपभोग में विश्व में पांचवां है ,  और भारत में इन्स्टाल्ड कैपेसिटी  144912MW है. सन 2022  तक 20000 MW निर्माण योजना है
आज सारे  उत्तराखंड में भारत का केवल 00.5 प्रतिशत सौर ऊर्जा उपभोग होता है जब की यह प्रतिशत गुजरात में 66.9  है राजस्थान क का उपभोग प्रतिशत 20.2 % है
यहाँ पर मेरा आशय सौर चूल्हे और लालटेन का प्रचार करने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लघु उद्द्योग में इन चूल्हों के निर्माण का और सोलर सेल बनाने के, सोलर लालटेने बनाने, शुष्क बैटरियां  बनाने के संयन्त्र लगाने का सुझाव व देने का है। अगर कोइ उत्तराखंडी व्यक्ति इन उद्द्योगों से परिचित हैं और वे इन की स्थापना में, विशेषग्य/सलाहकार के रूप में, पराशिक्षण/मार्ग दर्शन  दे सकते हैं तो कृपया संपर्क करें। सरकार का लघु उद्द्योग विभाग भी इसमें मार्ग दर्शन दे साकता है।  सोलर सेल बनाने के लिए सरकार के उद्द्योग विभाग को ऐसे उद्द्यामियों को पर्वतीय क्षेत्रों में स्थापित करने के लिये पहल करनी चाहिए।  सब से उचित होगा कि उत्तराखंड के ही सामर्थवान लोग इन नए उद्द्योगों को लगाने के लिये आगे आयं , वे अकेले या कुछ जने मिल कर ऐसे उद्द्योग स्थापित कर सकते हैं आसानी से. आशा है इस सुझाव को आपका व्यापक समर्थन मिलेगा.
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Bhishma Kukreti

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Ethnic Food of Uttrakhand                                       

                                         दालों का फाणा/चैंसा 
                                                 डा. बलबीर सिंह रावत
 [Food of Garhwal, Food of Kumaon, food of Hardwar, Food of Dehradun, Ethnic Food of Uttarkashi ;Ethnic Food of Gangotri;Ethnic Food of Yamnotri;Ethnic Food of Chamoli Garhwal ;Ethnic Food of Tihri Garhwal ;Ethnic Food of Rudraprayag ;Ethnic Food of Pauri Garhwal;Ethnic Food of Pithauragarh ;Ethnic Food of Bageshwar;Ethnic Food of Jageshwar;Ethnic Food of Champawat;Ethnic Food of Almora ;Ethnic Food of Nainital;Ethnic Food of Udham Singh Nagar series ]
पर्वतीय लोगों को एक ही तरह  खाने से जल्दी ही "विखलाण " पड़ जाती है तो उन्होंने उन्ही दानो से दाल के अलावा दुसरे अलग ही स्वाद की डिशें खोज निकालीं . फाणा  और चैंसा, दालों के ऐसे विकल्प हैं  जो चावलों, झंगोरे और कौणी के भात के साथ अलग ही स्वाद देते हैं। अगर इस की सही रेसिपी की ढूंढ की जाय और उस पर किसी अच्छे किचेन में , प्रवीन रसोइयों द्वारा  नाना तरह के , घटक अनुपातों के मिश्रणों का परीक्षण हो और विभिन्न उम्र, शिक्षा और लिंग के , कम से कम २५  के  दलों द्वारा स्वाद परीक्षण से हर व्यक्ति द्वारा तुलनात्मक, १ से १० के पैमाने से अंकन हो और जो अनुपात सर्व प्रिय सिद्ध होता है , उसका मानकी करण  करके उपयोग में लाया जाय तो, यह दोनों पदार्थ देश विदेश में लोकप्रिय हो सकते हैं।
फाणा बनाने के लिए भिगोई छिलकेदार  दाल पीसी जाती है। ( बिना छिलके वाली डालें भी ली जाती हैं ). फाणे के लिए दाल को भिगोया जाता है. साबुत दाल रात भर और दली दाल  ३-४ घण्टे . उड़द की और मूंग की  छिलकों वाली दली  दाले ली जा सकती हैं ,मसूर, गहथ (कुलिथ ) साबुत, तथा चना , मटर बिना छिलके वाली दली दालें ली जा सकती हैं।
  दालों में वसा कम होता है किन्तु प्रोटीन 20-25 %)(काफी होता है। फाइबर  , लवण  व विटामिन्स भी प्रचुर मात्रा में मिलता है। गहथ (कुल्थी, कुल्थिकलाई, कोलू, हडथि , हरुले ) (वैज्ञानिक नाम माइक्रोटाइलोमा युनिफ्लोरम ) का फाणु अधिक लोकप्रिय है और गहथ में ऊर्जा (321, ecals),, लवण (3gm) , प्रोटीन (22gm) , विटामिन्स, फाइबर (5gm), कर्बोहाइद्रेट्स  (57gm),फोस्फोरस (311mgm) , कैल्सियम (287mgm), लोहा (7 mgm ) होता है
कुछ दाले अकेले ही ठीक रहती हैं जैसे उड़द, गहथ, और कुछ के अपने साथी होते हैं जैसे मलका की दाल  मूंग, चने और मटर के साथ खप जाती है।  जिन्हें गहथ का फाणा ज्यादा ठरठरा लगता है वे उसमे उड़द मिला कर बना सकते हैं।
भीगी दाल को सिल में बट्टे से पीसने पर, और मिक्सी में पीसने पर फाणे के स्वाद में बड़ा अंतर होता है. सिल वाला अधिक स्वादिष्ट होता है क्योकि सिल में दाल के कण चपटे रहते हैं और मिक्सी में गोल। . सिल में दाल के कणों का आकार नियंत्रित करना आसान होता है , लेकिन मिक्सी में , उसकी तेज गति के कारण मुश्किल . अगर सिल उपलब्ध न हो तो  मिक्सी में पाहिले धीमी गति से, और फिर मद्धम गति से ही, पानी की समुचित मात्रा के साथ  पीसना चाहिए। पिसे पीठे में कुछ खुरदरापन, याने दाल के कण थोड़ा सा खुरदरे रहने ठीक रहता है। तेज गति से कण इतने बारीक हो जाते हैं की फिर इस से फाणा नहीं दाल का रस बन जाता है.
फाणे का स्वाद उसमे पड़े मसालों पर बहुत निर्भर करता है , धनिया, जीरा  पिसा हुआ, काली मिर्च , लॉन्ग कुटी हुई, लह्सुन की सोलियाँ कुचली हुई, तथा प्याज कटा हुआ, हल्का भुना हुआ, प्राय हर तरह के फाणों में उपयोग में लाया जाता है. हींग को कुछ लोग घोल कर , जब  फाना अधपका होता है , तब डालते हैं, कुछ लोग प्याज भुन जाने पर , जब मसाले डालते हैं, तो उसक साथ ही हींग  के बारीक कण,डाल कर, तुरन्त पिसी दाल का घोल  डाल देते है . एक अवधारणा है की लोहे की कढ़ाही  का फाणा अधिक स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है, हो सकता है कि इसमें , दाल, मसालों के अम्ल से कुछ लौह घुल कर , जैविक रूप में फाणे में आ जाता है. शायद इसी कारण, अलुमीनिय और स्टील की कढ़ाई के  मुकाबले लोहे की कढाई का फाणा अधिक गहरे रंग का और अधिक स्वादिष्ट लगता है. कढ़ाई के चहरों और जमी गाढी कोरनी के लिए तो संघर्ष करना पड़ता है की किसके भाग्य में आयेगी ( गाँव में सब से छोटी ब्वारी के लिए छोड़ा जता था, कढाई माजने  के प्रोत्साहन के रूप में ). तो आप कही भी हों फाणा अवश्य खायं और खिलायें , तभी तो यह प्रसिद्धि पायेगा ?
चैंसा, कोरी दाल,( सिल में  बढ़िया पिसती है ) को पीस कर छोटे कण दार बनाया जाता है, और कोरा ही मसालों में मिलाकर तब पानी दाल कर बनाया जाता है,  बाकी विधि एक सी है .
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Food of Garhwal, Food of Kumaon, food of Hardwar, Food of Dehradun, Ethnic Food of Uttarkashi ;Ethnic Food of Gangotri;Ethnic Food of Yamnotri;Ethnic Food of Chamoli Garhwal ;Ethnic Food of Tihri Garhwal ;Ethnic Food of Rudraprayag ;Ethnic Food of Pauri Garhwal;Ethnic Food of Pithauragarh ;Ethnic Food of Bageshwar;Ethnic Food of Jageshwar;Ethnic Food of Champawat;Ethnic Food of Almora ;Ethnic Food of Nainital;Ethnic Food of Udham Singh Naga to be continued....

Bhishma Kukreti

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बाड़ी , एक त्वरित भोजन
                                          डा. बलबीर सिंह  रावत
पर्वतीय भोजन में मंडुये का बड़ा महत्व रहा है. मंडुआ खरीफ में पैदा होने वाला अनाज है , यह गोल, गहरे भूरे रंग का दाना है , जिसे पीस कर उपयोग में लाया जाता है. इसके आटे  से चाहे शुद्ध मंडुए की रोटी बना लो, या गेहूं/जो के आटे के साथ मिला कर ढबडी रोटी बना लो या फिर , गेहू के आटे की रोटी बेल कर उसके बीच  में मंडुए के आटे  का गोला रख फिर से गोला बना कर लिस्स्वा रोटी बना लो . अगर घर में कुटा  हुआ  चावल, झंगोरा खत्म हो  गया हो या जल्दे हो तो तुरंत बाड़ी बना कर , रोटी और भात , दोनों के विकल्प के रूप में, दाल या फाणे / चेंसे, जो भी उपलब्ध हो , के साथ चाव से खा लो.
मंडुये में प्रोटीन (7.6gm ); वासा (1.5gm )  , कार्बोहाइड्रेट (88 gm ), कैल्सियम (370 mg ) , विटामिन A ( 0.48mg), थियामिन बी1(0.33mg) , रिबोफ्लेविन B 2 (0.11mg ), नियासिन (1.2mg ) और फाइबर (3g) होता है
बाडी बनाना एक लम्बे अभ्यास के बाद प्राप्त हुनर है, इसे  न तो अति गीला, और न ही अति सख्त होना चाहिए, इसमें कोई भी किसी भी आकार की गुठलियाँ( गुर्मुलियाँ) कतई नहीं होनी चाहिये. और इसके गोले इतने बड़े होने चाहिएं की एक गरम गरम गोले को दाल / फाने से लपेट कर तुरंत मुहं में रख कर निगला जा सके। बाडी चबाया नहीं जाता, यह निगला जाता है. त्वरित भोजन जो ठहरा , असली फ़ास्ट फ़ूड।
बाड़ी बनाने की सही विधि जानने के लिए या तो किसी जानकार से सीखना पड़ता है या मार्गदर्शन ले कर कुछ अभ्यास करना पड़ता है।  पाहिले सारी सामग्री इकठ्ठा करनी होती है, जैसे सही आकार की कढाई ,, एक दबला जो या तो सवा/डेढ़ इंच व्यास की लकड़ी से दो फीट लंबा हो, न हो तो लकड़ी के बेलन से भी काम चलाया जा सकता है,या फिर स्टील की मोटी करछी, मंडुये का छाना हुआ आटा  ( मोटा पिसा हुआ ठीक रहता है ) प्रति व्यक्ति १५० ग्राम के हिसाब से, कढाई पकड़ने के लिये ओवन ग्लब या कई तहों में मोड़ा हुआ मोटे कपडे का हन्बेड़ा। कढाई में, प्रति व्यक्ति २०० एम् एल के हिसाब से पानी खौलाइये, जब उबलना शुरू होने वाला हो तो कुछ आटा उसके ऊपर बुरकिये., आटा  एक पतली तह में फ़ैल जाएगा और जैसे ही इस परत को फाड़ कर बुलबुले उठने लगें , तुरन्त आंच धीमी कर दीजिये और एक हाथ से आट़ा  धीरे धीरे डालते रहिये दुसरे से घुमाते राहिये. जब सारा आटा डल जाय , तुरंत कढाई को मजबूती से पकड़ कर खूब जोर जोर से घोटिये, ताकि बाडी समरस हो जाय और उसमे कोरे आटे  की कोए गुठली न रह जांय , इसी लिए लकडी का दबला सबसे उपयुक्त होता है। बाडी तभी बनाना चाहिए जब खाने वाले तैयार हों, बना कर रखने पर इसका स्वाद में अंतर आने लगता है .
परोसने के लिए , कभी बनाने वाली गृहणी एक कटोरे में पानी ले कर पूरी हथेली गीली करके गरम गरम बाडी के पिंड बना कर परोसती थीं , बाद में पानी में डुबोई करछी से पिंडे बनाए जाते रहे, अब आइस क्रीम स्कूप से काम लिया जाता है जो एक ही आकार के गोले बना सकता है , इन्ही गोलों को जब रागी बॉल्स कहते हैं तब यह पांच सितारी भोजन बनने की क्षमता रखता है।
कुछ लोग आटे को भून कर बाडी बनाना पसंद करते हैं , तो कई जगहों पर मीठा बाडी भी बनाता है. मंडुए का मीठा सत्तू भी बनाया जाता है , जिसे उबलते पाने में मिला कर बाडी बना कर शौक से खाया जाता है।
                          मंडुआ के आटे से बच्चों के भोजन
बच्चों के लिए मंडूये के आटे से कई व्यंजन  बनते हैं
  मंडुये से रोटी , डोसा , खिचड़ी, केक , पराठे ,    बनाये जाते हैं                       
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Bhishma Kukreti

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 बड़ियाँ : एक प्राचीन खाद्य वस्तु
                                                  डा. बलबीर सिंह रावत
मानुष ने अपने बुद्धि कौशल से प्रकृतिदत्त पदार्थों को हर मौसम में उपयोग करने के लिए, सुरक्षित रखने के लिए कई विधियां ढूढ़ निकालीं , इसलिए की उसे अपने भोजन के लिए आसानी से बेमौसमी वस्तुएं भी भे उपलभ होती रहें .  ऊष्ण प्रदेशों में , जहाँ खाद्द्य  सामग्रियों को साल भर के लिए सुरखित रखने के लिए आज कल के शीत भण्डार और घरेलू फ्रिज नहीं थे, तब  पदार्थों को सुखा कर ही रखा जाता था.  दालों  से और उनके पीठे में साक- सब्जियों को मिला कर  बड़ियाँ बनाना भी  इसी श्रृंखला का सुखाया हुआ खाद्य पदार्थ है.जो सब्जी और फल , इस काम के लिए उपयुक्त पाए गए वे हैं, भुजेला (पेठा) और पिंडालू (अरबी ) के पत्तों के डंठल जिन्हें नाल कहते हैं और  हरी मेथी।  उड़द के साथ भुजेला और गहथ के साथ नाल  तःथा मेथी का मेल खपता है।  बड़ी बनाने के लिए साबुत दाल को भीगने के लिए रात भर रखना होता है। भीगी उड़द को छलनी में मसल कर   उसके छिलके उतारने होते हैं, छलनी को पानी भरे गहरे बर्तन में डुबो कर जब छिलके तैर कर ऊपर आते हैं तो इन्हें हटा लिया जाता है. कुछ छिलके रह जाय तो कोइ हर्ज नहीं,  गहत के छिलके नहीं उतारे जाते।  इस भिगोई, साफ़ की गयी दाल को सिल में बारीक पीसा जाता है, जब तक वह महीन, एक रस न हो जाय. ध्यान रखना होता है की यह मसेटा जितना सख्त हो सके उतना रहे। अब इसे किसी परात में लेकर उसमें मसाले , जैसे भुना साबुत जीरा, काली मिर्च, पिसा धनिया, अदरख की सोंठ ,दालचीनी , मोटी इलायची के साबुत बीज  और कोरा हुआ ( रेंदा किया हुआ ) भुजेले का गूदा। इन सब को मिला कर पूरे मसेटे को खूब फेंटा जाता है. फेटने से इसमें हवा के बुलबुले समाते हैं, और बड़ी  सूखने पर भी फूली हुई रहती है। इसे सही तरह से पूरा  फेंटने पर ही इसका  ठीक से पकने का गुण निर्भर करता है। अब इस मिक्सचर के छोटे छोटे गोले, एक दुसरे से अलग किसी साफ़ कपडे के ऊपर, या साफ़ टिन की चादर के ऊपर,या मकानों की छत केसाफ़ से धुले पठालों के ऊपर डाले जातें हैं  और तब सुखाने के लिए धूप में रखे जाते हैं। चूंकि भुजेले पहाड़ों में अक्टूबर में ही उपलब्ध होते हैं तो धुप में गर्मी कुछ कम हो जाती है, इलिए २-३ दिन में ही सूख पाते है। सूखने पर इन बड़ियों को किसी ढक्कन दार बड़े बर्तन में सुरक्षित रखा जाता है. गहथ की बड़ी में मसाले कम डाले जाते हैं और नाल के या हरी मेथी के  छोटे छोटे टुकड़े कर के डालना ठीक रहता है।
उपरोक्त विधि, परचलित विधियों में से एक है, और केवल  घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनायी गयी है . चूंकि  कई मैदानी इलाकों में बड़ी बनाना और बेचना एक बहुप्रचलित कुटीर उद्द्योग है, तो उत्तराखंड में भी इस हुनर को  संवार कर, जितना हो सके उतना इसका मशीनी करण करके, जैसे दाल पीसने के लिए, फेंटने के लिए, और एक आकार की गोलिया बनाने के लिए, और विधियों के परीक्षण, सुधार और मानकी करण  करके,लिज्जत पापड स्तर का बड़ी उद्द्योग गाँव गाँव में  शुरू किया जा सकता है.
बड़ी का साग -बड़ियों का केवल बड़ियों का साग भी बनाया जा सकता है तो अन्य भोज्य पदार्थों जैसे आलू, हरी सब्जियों के साथ मिलकर भी बड़ियों का साग बनाया जाता है।
आलू बड़ियों  का साग
बड़ियाँ -आधा कप
आलू -मध्यम कटे दो आलू
टमाटर  -दो टमाटर कटे  हुए
तेल या घी - चार चमच
छौंके के लिए कुछ दाने जीरे, राय व जख्या
बारीक कटा  प्याज, लहसुन , अदरक , हरा धनिया , एक कटी हरी मिर्च
मसाले - एक चमच धनिया पौडर, एक चमच  लाल मिर्च पौडर, गर्म मसाला अपने स्वास्थ्य , अपने सहूलियत या स्वाद के हिसाब से। नमक स्वादानुसार
बड़ियों को कुछ देर भीगा दें और फिर उनका पानी निचोड़ दे
कढाई को आंच में चढ़ाएं , गर्म कडाही में तेल या घी गर्म करें फिर गर्म तेल में जख्या, राय और जीरा लाल होने तक भूने ,अब कटे प्याज , लहसुन और अदरक डालें और थोड़ा भुने , फिर बड़ियों को भूने, इसके बाद आलू डालें , कटे टमाटर व नमक सहित  मसाले भी डालें और कुछ देर तक भूने,कटी हरी मिर्च भी डालें। भूनने के बाद पानी डालें और ढक क दें और पकने तक बर्नर पर रखें . जब साग पक जाय तो कटा हरा धनिया छिडक दें। गरमा गर्म परोसें   
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Bhishma Kukreti

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      उत्तराखंड की झीलें (Lakes of Uttrakhand)
                                                                         (गढ़वाल क्षेत्र )
            [Lakes of Uttrakhand ;lakes of Chamoli Garhwal; lakes of Rudraprayag;lakes of Kedar valley;lakes of Tihri Garhwal ; lakes of Uttarkashi ; lakes of Dehradun; lakes of Haridwar ;lakes of Pithoragarh;lakes of Dwarhat; lakes of Champawat ; lakes of Udham Singh Nagar; lakes of Nainital;lakes of Bageshwar; lakes of Almora series]
                                                                       डा. बलबीर सिंह रावत
शुद्ध , साफ़, शीतल जल की झीलें किसी भी क्षेत्र की सुन्दरता को पूर्ण करती है. पर्वतीय क्षेत्रों की बदलती दृश्यावलियों में नीले, कांच सी साफ़, पारदर्शी, पानी वाली छोटी बड़ी झीलें तो इन दृश्यावलियों को स्वर्गीय आनद देने वाली  बना देती हैं. उत्तराखंड के उत्तरी भाग को प्राकृति ने झीलों से भरपूर बनाया है. अकेले उत्तरकाशी, चमोली और टेहरी जिलों में १८८० मीटर  से ५३५० मीटर  की ऊचाइयों पर १२ छोटी बड़ी झीलें स्थित हैं। इन में से सबसे बड़ी झील रूप कुण्ड है जो चमोली जनपद में, समुद्र ताल से ५३५० मीटर की ऊचाई पर स्थित है और इसका क्षेत्रफल ७० वर्ग किलोमीटर है. इस झील का पौराणिक और ऐतिहासिक
महत्व है. इसका अधिकांश भाग बर्फ से जमा रहता है, केवल एक छोटे से हिस्से में जल एक कुंड के रूप में दिखता है। यह झील हिमालय क्षेत्र के सौन्दर्यम स्थलों में से एक है। इस के किनारे सैकड़ों वर्ष पुराने नर कंकाल बिखरे पड़े हैं जिनके बारे में कुछ सटीक पता नहीं है की किनके है और वे यहाँ क्यों आये थे। यह स्थान नंदा जात यात्रा की पूजा का यह एक केंद्र बिंदु भी माना जाता है।पर्यटन की दृष्टि से  रूप कुंड एक ऐसी ट्रेल पर स्थित है जो बेदनी बुग्याल, ब्रह्म ताल, और भैन्कल ताल का क्षेत्र बनाता है। 
भैंकल  ताल २५०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित है। इस ताल का नाम नागदेव राजा भेन्क्ल के नाम पर रखा गया है और इसी लिए इसका पौराणिक महत्व भी है. झील के चारों और सघन बन हैं जिनमे भोज पत्र के , बुरांस के , देवदार के और रागा-थुनेर के बृक्ष खड़े हैं। पक्षियों का कलरव, शीतल हवा, नयनाभिराम दृश्यावलियां सुध बुध खोने की लिए इतनी अधिक हैं की मनुष्य अपने को भूल कर प्रकृति में खो जाने को विवश हो जाता है। इस झील के चारों और टूटे तीरों के असंख्य टुकड़े आज भी पड़े हुए दिखाई देते हैं, कई पेड़ों पर चुभे तीर भी देखे जा साकते हैं। . इस से यह साबित होता है की यहाँ पर कभी कोइ भीषण युद्ध लड़ा गया होगा जिसके बारे में कोइ जानकारी नहीं है। इस ताल में मछलिया हैं, पास में एक मंदिर भी है और एक पेड़ पर मनोती की घंटिया भी टंगी हैं।. इन सब से यह साबित होता है की यह स्थान प्राचीन काल से ही पूजा का स्थान रहा है। इस रमणीक झील से आगे तेलंगी बुग्याल है और उससे आगे बेदनी बुग्याल। इन बुग्यालों के मखमली घास, रंग बिरंगे फूल,औषधीय जड़ी -बूटियाँ प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं।
इस क्षेत्र में आने के लिए र्हिषिकेश , कोटद्वार और रामनगर से करणप्रयाग  होकर नंदप्रयाग अना होता है। यहाँ से आगे कनौल , सुतौल और मूना हो कर पहुंचा जा सकता है. अल्मोड़ा से ग्वालदम , बाण , मुन्दौली होकर तथा करण प्रयाग से थराली , देवाल बाण हो कर भी यहाँ पहुचा जा सकता है. मूना नमक स्थान पर एक डाक बँगला भी है जिसे अंग्रेज जिलाधीश श्री मर्नौड ने बनवाया था
इतने  सुन्दर प्राकृतिक दृश्यावलियों  और ऐतिहासिक - धार्मिक स्थलों के बारे में इतने कम जानकारी का होना हमारी सरकार और विश्वविद्यालयों की उदासीनता को उजागर करता है। आशा है की इस लेख को पढने के बाद इन स्थलों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन होगा और सही ऐतिहासिक जानकारी जुताई जा सकेगी . साथ ही इस प्रकार पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा की स्थलों की सुन्दरता और प्राकृतिक परिवेश पर कोइ हानिकारक प्रभाव नहीं पडेगा। ( इस लेख को लिखने के लिए डा. रणबीर सिंह चौहान जे की पुस्तक "गढ़वाल के गढ़ों का इतिहास  एवं पर्यटन के सौन्दर्य स्थल " से जानकारी, साभार , ली गई है)
dr.bsrawat26@gmail.com      .

-- Lakes of Uttrakhand ;lakes of Chamoli Garhwal; lakes of Rudraprayag;lakes of Kedar valley;lakes of Tihri Garhwal ; lakes of Uttarkashi ; lakes of Dehradun; lakes of Haridwar ;lakes of Pithoragarh;lakes of Dwarhat; lakes of Champawat ; lakes of Udham Singh Nagar; lakes of Nainital;lakes of Bageshwar; lakes of Almora series to be continued...

 

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