Author Topic: Articles by Scientist Balbir Singh Rawat on Agriculture issues-बलबीर सिंह रावत ज  (Read 20432 times)

Bhishma Kukreti

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पहाड़ों  में उत्पादन की  अपार सम्भावनाएं
                                                                             
                 डा . बलबीर सिंह रावत   


                  आर्थिक गतिविधियों को सामूहिक रूप से चलाने के लिए अब तक दो प्रकार की संस्थाएं मान्य थीं: उद्योगों के लिए जॉइंट स्टॉक कंपनिया और किसानो तथा उपभोक्ताओं के लिए सहकारी सन्स्थाये.
सहकारी संस्थाओं में प्रावधान है  की एक सदस्य का एक मत होता है, चाहे उनसे कितने भी शेयर खरीद रक्खे हों . और जॉइंट स्टोक कंपनी में एक शेयर का एक मत होता है , तो सबसे अधिक् शेयर धारक की अधिक सुनी जाती है. कृषि और लघु उद्द्योग, उपभोक्ता तथा बैंकिंग  क्षेत्रों में सहकारिता को प्रोत्साहित तो किया गया लेकिन उनके संचालन में सरकारी हस्तक्षेप की बहुत अधिक गुजाइश रक्खी गयी। समितियों के कर्मचारियों की नियुक्ति में सरकार/रजिस्ट्रार का पूरा हस्त्क्षेप होता है। बोर्ड के सदस्यों के चुनावों में भी सरकारी हस्तक्षेप के कारण इनका राजनीतीकरण होता रहा है। बोर्ड में विशेषज्ञों को शामिल करने का कोइ प्रावधान नहीं है। चूंकि बोर्ड में सरकारी प्रतिनिधि के मनोनीत करने का प्रावधान है, तो प्राय: असरदार राजनीतिक लोगों ने इन संस्थाओं पर, अपना सही गलत असर डालने में कोइ कोर कसर नहीं छोड़ते। यहाँ तक की राजनैतिक दलों ने भी इनकी प्रबंधक समितियों पर कबजा ज़माना शुरू कर दिया।


                       पिछले दशक में जब कृषि  और अन्य ग्रामीण  उत्पादन गतिविधिया बढ़ने लगीं तो  सरकारी बंदिशों वाली सहकारी प्रथा विकास के गति में अवरोधक साबित होने  लगीं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने कंपनी एक्ट में संसोधन कर के, पार्ट IX A  के अंतर्गत, उत्पादकों की कंपनी का गठन करना सम्भव बना दिया है।इस नए नियम के अंतर्गत संगठित की जाने वाली कम्पनियों से उपरोक्त बाधाएं हटा दी गयी हैं और कम्पनी के सिद्धांत लगभग वही हैं जो अंतरराष्ट्रीय सहकारी महासंघ ने अपनाये हुए हैं, इन सिधान्तो को इस नए नियम में शामिल किया गया है. इस नए केन्द्रीय एक्ट  में यह  सुनिश्चित किया गया है की ऐसी कंपनियों पर राजनीतिक और सरकारी प्रशासनिक प्रभाव न्यूनतम हो और इन कंपनियों को निजी क्षेत्र की कम्पनियों  की तरह कार्य करने की स्वतंत्रता और सुविधा हो। उत्पादक कंपनी बनाने के लिए कोइ भी दस उत्पादक व्यक्ति, या दो और अधिक उत्पादक संस्थायें, या उपरोक्त दोनों मिल कर अपनी उत्पादक कंपनी बना सकते हैं। इसके अलावा वर्तमान की सहकारी संस्था भी ऐसी कंपनी में स्वयम को परिवर्तित कर सकती है। इन उत्पादक कंपनियों में और पारम्पॉरिक कंपनियों में भी अंतर रखा गया है.  इन में केवल उत्पादक ही सदस्य बन सकते हैं, इनके शेयर वही रख सकते हैं जो स्वयम उत्पादक हैं। शेयरों का व्यापार नहीं किया जा सकता है। एक सदस्य एक मत का अधिकार होता है।सक्रिय सदस्यों के लिए विशेष उपयोग कर्ता अधिकार होते हैं। लाभ में भागीदारी का अनुपातिक अंश होता है। डिविडेंड को निर्धारित करने की सुविधा है।     

                      उत्तराखंड के परिपेक्ष में इस नए नियम का महत्व अत्यधिक है। सब से बड़ा महत्व तो यह है की छोटे छोटे उत्पादक मिल कर एक व्यावसायिक स्तर की उत्पादक इकाई की स्थापना कर सकते हैं , जिसके उत्पादों की मात्रा के आधार पर विपणन सुविधा जनक हो सकता है. दूसरा महत्व पूर्ण लाभ है की स्वय की कम पूंजी मिला कर कंपनी की बड़ी पूंजी हो सकती है तो सरकारी सहायता की  प्रतीक्षा में "बूढ़े" हो जाने के खतरे से छुटकारा मिल सकता है। तीसरा लाभ यह है की विशेषज्ञों की सेवाए अपेक्षाकृत अधिक आसानी से ली जा सकती है। चौथा लाभ यह है कि उत्पादन मे काम आने वाली सारी सामग्रियों की आपूर्ति के लिए गुणवता युक्त सामान थोक भाव से खरीदे जा सकते है। कालान्तर में , अगर राज्य सरकार चाहे तो इस नियम में यह भी आयाम जुड़ा सकती है की चकबंदी के लिए  एक ही स्थान पर के खेत मालिकों को ऐसी उत्पादक कंपनिया बना कर व्यावसायिक खेती करने के लिए प्रोत्साहित करे ।

                                 शुरू में ऐसी  उत्पादक कंपनिया, ऐसे जाने माने लाभ कारी उत्पादों क क्षेत्र में आ सकती हैं जैसे मशरुम , दूध , ताजा सब्जिया , फल और फल उत्पाद, मत्स्यपालन , जडी बूटी उत्पादन, पुष्प और सुगन्धित तेल उत्पादन,  नाना प्रकार के बीज उत्पादन, व्यावसायिक पौध उत्पादन, इत्यादि। कालान्तर में हर वह उत्पादन गतोविधि शामिल की जा सकती है जिसे लिए कच्चे माल उत्तराखंड में उत्पादित किये जा सकते हैं। सम्भाअनाये असीम हैं, कल्पनाशील और कर्मठ उत्पादकों की प्रतीक्षा में है। नव युवा वर्ग आगे आय , सरकार सही हुनर कौशल के प्रशिक्षण की व्यवस्था करे और नई तकनीकियों के स्थापन, प्रचार प्रस्सर्ण के लिए नर्सरिया  स्ताह्पित करे. न कर सके तो बहु प्रचलित PPP मोड को लगाय की यहाँ दिखाओ अपने करतब तो जाने की वास्तव में PPP (पूरा प्रभावशाली प्रावधान) हो.                 .         .               
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Dr Balbir Singh Rawat.

पर्वतीय  औद्योगीकरण की बात न जानने वाली क्रान्ति . अगर ऐसा है तो यह क्रान्ति का नाम लेने वाले क्या भ्रान्ति में जी रहे हैं ?
दुनिया के इतिहास में नाना प्रकार की क्रांतियाँ हुई हैं। जैसे : राजनीतिक, सामाजिक , औद्योगिक , वैज्ञानिक और सब से नयी सूचना क्रान्ति।  भारत का इतिहास भी हर प्रकार की क्रांतियों और क्रांतिकारियों से भरा पडा है।  इन सारी क्रांतियों की एक बात सामान्य है की, इसके संचालक, त्यागी, कर्मठ , हठी , जुझारू और नैसर्गिक नेतृत्व दे सकने वाले व्यक्ति होते है, जिनका स्वहित ,देश-स्वदेश , राष्ट्र , समाज या मानवता के हित में पूर्णत: निहित रहता है , और इसी कारण सारी जनता इनके इशारे पर मरने मारने पर उतारू हो जाती है। क्रांतियाँ हिंसक , अहिंसक , एक व्यकि की या एक समुदाय/देश की जनता की होती रही हैं.और होती रहेंगी क्योंकि क्रान्ति की ही इसलिए जाती है की जो असामयिक होगई व्यवस्था को नष्ट करके नयी प्रभावशाली व्यवस्था को ला कर सब कुछ सही कर सके।    .   
उत्तराखंड के परिपेक्ष में, इस राज्य को अस्तित्व में लाने वाली क्रान्ति और इस जनक्रांति को नेत्रित्व देने वाले कुछ लोग जो एक दल के रूप में संगठित हुए, और चले तो थे पूरे प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया को अपने ( जनता के ) हाथों में लेने के लिए, लेकिन वे न तो अपने विपक्षियों को भांप पाए, और नहीं अपने सिपहसालारों की महत्वाकांक्षाओं को। राष्ट्रीय दलों ने इनसे "क्रान्ति "हाई जैक करली। .   
उत्तराखंड राज्य बनाने पर, UKD को या तो भंग करके इसके नेताओं को अपनी अपनी सोच के अनुरूप, राष्ट्रीय दलो में शामिल हो कर अन्दर से विकास की बात आगे बढानी चाहिए थी, या फिर पर्वतीय विकास के लिए जगह जगह सक्रीय बुद्धिजीवियों को अपना सलाहकार बना कर, अपनी ठोस विकास नीति बना कर, जनता को विश्वास दिलाना था कि  वही एक मात्र दल है जिसके पास सही विकास नीति है, ऐसी नीति जो राष्ट्रीय दलों की नीतियों से श्रेष्ठ है तो जनता अलग राज्य की स्वीकृति देने वाले दल की और ना झुक कर इन क्रांतिकारियों को ही समर्थन देती। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जो हुआ और हो रहा है वह सब के सामने है और किसी को अच्छा नहीं लग रहा है।
आज सही मौक़ा है, राष्ट्रीय दल पर्वतीय विकास में फेल हो चुके है. बिखर चुका उक्रांद एक होता नजर आ रहा है। संसद के चुनाव दूर नहीं हैं . बुद्धिजीवी  सही पर्वतीय विकास का रोड मैप लिए खड़े हैं। क्या उक्रांद का शीर्ष नेतृत्व "दीवाल पर प्रकट सन्देश " पढ़ पा रहा है ? अगर है तो ठीक, आगे बढे , अगर नहीं तो मैदान औरों के लिए खाली करे. वैसे भी जनता अब के मैदान उसी को सौंपने वाली है जो उसके सही विकास का उसे विश्वास दिला सकेगा. अब सच झूठ वादों का ज़माना लद गया है और हर दल के हर नेता की जन्मपत्री जनता ने भली भाँती पढ़ना सीख लिया है.  सही  राजनीतिक नेतृत्व ही पर्वतीय क्षेत्र का  सम्पूर्ण बहुमुखी विकास कर पायेगा . इस लिए दलों , नेताओं सहित उत्तराखंड के मतदाताओं को भी सचेत करने का समय आ गया है और हर स्तर के बुद्धिजीवी का यह स्वदेश के प्रति कर्तव्य है की वह अपने अपने दायरे में, स्वय एक मत हो कर ( जी हाँ एक मत हो कर ) सब में सटीक चेतना जगायं।   BSR           

Bhishma Kukreti

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पर्वतीय क्षेत्र का सर्वांगीण विकास
                                                  डा. बलबीर सिंह रावत   (देहरादून )
                        आज के काल में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की मूल समस्या है: सक्षम युवा श्रम शक्ति का अतिशय पलायन।  इस क्षेत्र के विकास के लिए अभूतपूर्व आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं, और सभी बुनियादी ढांचों को यथासंभव सशक्त भी  किया जा रहा है। लेकिन विकास का मॉडल क्षेत्र विशिष्ट  न हो कर, वही पुराना , मैदानी इलाकों के विकास वाला है,कि मूलभूत सुविधाएं दे कर उत्पादक कार्यों के लिए समय बचाओ, इंफ्रास्ट्रक्चर सुदृढ़ कर दो, लोग अपने आप अपना रास्ता ढूंढ लेंगे।
पर्वतीय क्षेत्र में केवल कठिन श्रम  से  बचाने वाली  मूलभूत सुविधाओन के अलावा और कुछ न दे पाने से कर लोगों को वहाँ नहीं रोका जा सकता है. जितना अधिक मोटर सड़कोँ  का जाल बिछा है, रोजगार के अभाव में , उतना ही अधिक गति से पलायन बढ़ा है। बढ़ती शिक्षा ने शारीरिक श्रम करने की इच्छा को समाप्त कर दिया है। समुचित मशीनीकरण के अभाव में , कृषि का ह्राष हुआ है, खाद्यान्य और सभी आवश्यक वस्तुओं का आयात बढ़ा है। मनीआरडरों से, मनरेगा से और अन्य स्रोतों से जितना पैसा आता है , वह सारा का सारा जीवन यापन के संसाधनों के आयात के लिए वापस बाहर चला जाता है। स्थानीय उत्पादन घटता जा रहा है।  यह समस्या देश की आजादी के समय से और अब अपना राज्य बनने के वावजूद भी बढती जा रही है।
कागजों में बड़ी लुभावनी नीतियाँ बनी हुई हैं , बन रही हैं , प्रयाप्त पैसा भी आरहा है , धरातल में क्या हो रहा है? हर साल एक लाख से अधिक नए  बेरोजगार युवा जुड़ रहें हैं आज के रोजगार तलाशने वाले 6 लाख बेरोजगारों के समूहों में। रोजगार, सालाना 40 - 50 हजार को भी नहीं मिल पा रहा है।
                        इस भीषण समस्या से निपटने के लिए  विकास के ऐसे सारे आयामों को प्रोत्साहित करना नितांत आवश्यक है जिनसे यह युव शकित उत्पादन बृद्धि  के स्वरोजगारी धन्दों में लग सकें।
वर्तमान में दो केंद्र पोषित योजनाएं:  स्किल  डेवलपमेंट  और टेक्नौलौजिकल नर्सरियों की स्थापना की इसी विशेष उद्द्येश्य के लिये लाई गयी हैं। यह सही समय है कि यहाँ, प्रदेश में,  स्वरोजगार और नौकरी के हुनरों  के प्रशिक्षण देने का उर प्रशिक्षितों को काम परलगाने के लिए, पहिले से ही कार्यरत जितनी भी संस्थाएं और विभाग हैं, उन्हें और इन नयी दो योजनाओं को, एक छत्र के नीचे लाकर, सशक्त बनाया जाता, लेकिन ऐसा कुछ  भी होता  दिख रहा है। केवल  ITIs को ही प्रशिक्षण का पूरा भार दिया जारहा है। पर्याप्त साजो सामान और प्रशिक्षकों  के अभाव में, यह संस्था ITI केवल 5 - 6  हजार रुपये प्रतिमाह की नौकरी पाने के गिने चुने परम्परागत हुनरों की अधकचरी दक्षता दे रही  हैं।
क्या कभी यह तय करने का प्रयास हुआ है की पलायन रोक सकने लायक  न्यूनतम पारिवारिक आय प्रतिवर्ष  कितनी होनी चाहिए? क्या कभी किसी ने ऐसा सोचा है कि, पलायन रोकने के लिए अधिक असरदार तरीका स्वरोजगार का है और कि स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण का लक्ष्य एकल व्यक्ति  भी और पूरा परिवार भी, एक साथ, होना चाहिए?  एक ऐसे प्रदेश में  जहां केवल नौकरी से  ही रोजगार पाने की परम्परा रही है, वहाँ स्वरोजगार की पहिली पीढी का प्रशिक्षण उन्ही  स्थान-विशिष्टताओं के अनुरूप ही दे कर  फली भूत होगा, जिनका स्थानीय उत्पादन और आपूर्ति लगातार सुनिश्चित किया जा सकेगा और सारे उत्तराखंड के विकास के लिए, पूरे प्रदेश में स्वरोजगार इकाइयों की उत्पादक कंपनियों का जाल फैला कर और इनके सफल संचालन तथा  उत्पादों की लाभदायक बिक्री के लिए विपणन सस्थाओं का गठन करने की सहूलियत भी आवश्यक समझी जाएगा  ?
                          अगर वास्तव में गंभीरता से पर्वतीय क्षेत्रों को पुनर्वासित करना है तो सारी विकास नीतियों और प्रणालियों को इस उद्द्येश्य की पूर्ती करने के लायक बनाना होगा।
कैसे?  इसके लिए बुद्धिजीवियों से  और  स्थानीय लोगों से सुझाव मांग कर और विषय विशेषज्ञों की कमेटियों से सुझाओं का विश्लेष्ण करा के, संसाधनों और आवश्यकताओं की प्रार्थमिकताओं के अनुरूप, एक मार्ग जीवंत नीति तैयार करके सरकार पर्वतीय विकास को सार्थक बनाने का काम शुरू करे .
-- डा . बलबीर सिंह रावत   
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Bhishma Kukreti

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Fisheries in Uttarakhand

                                    Dr.Balbir Singh Rawat (Dehradun)

It was very encouraging to learn that the Government of Uttrakhand has got a separate big budget for fisheries development in the State. What is special about this project is that it is being looked at as a regular supplier of much needed protein in the food of the inhabitants, specially in hilly areas.
Some facts about  Fisheries in India are -

India is third in Fisheries in global prospective
Contribution of Fisheries to Indian GDP is 1.07
Contribution to Agriculture GDP is 5.30
The Fisheries production(FP) is 6.4 MMT
Inland FP- 3.4 MMT
Marine FP- 3.0 MMT
Potentiality -8.4 MMT
       

                          Inland Resources for Inland Fisheries

 

Rivers and irrigation Canals

Ponds and Tanks

Artificial Created Ponds and Tanks

Reservoirs

Upland Lakes

Brackish Water

Flood Plain wetland

Estuaries 

 

                          Some Facts about Fisheries Potentiality in Uttarakhand

Rivers are available-2686K.M.

Big Reservoirs- 20075

Natural Lakes-297

Ponds and Tanks in rural regions-676

 

               Fish Production in Uttarakhand

Year ------------Fish Productions (‘000Tons)---------------Fish Seeds Production (Million Fry)

2004-5----------2.57------------------------------38.52

2005-6------------2.79-------------------------------31.69

2006-7-----------3.0----------------------------------28.21

2007-8-----------3.09------------------------------37.42

2008-9------------3.169-------------------------------38.32

2009-10---------3.488-------------------------------34.47

 
                                       Actions Requirement for Fisheries Growth in Rural Uttrakhand

1. The cold water fishery (TROTS) in glacial rivers and high altitude lakes, if launched proficiently, can get a boost and become highly commercially successful venture run by local Panchaayats/ Fish Producer Companies of local persons, specially organized by the Department for this purpose.
2. The river valleys can be made major fish production areas, if large artificial ponds of commercial fisheries sizes are set up and adequate cold storage and transport facilities  for successful marketing, are provided as a  package with production activities.
3. All the lakes and hydro power reservoirs have a great potential for fisheries development as commercial and fishing sports activities, therefore, the potentials need to be fully exploited on commercial scales. There is a huge market for good quality fishes all over the country.  If the displaced population is trained and organised for this activity, it will have a high social impact too.
4. Private fish ponds can too be encouraged in the plains as well as hilly areas of the State, provided these are of economic sizes  enabling to have a daily supply of fish for family food at a cost of not more than 30/- a kilo.  Such private ponds in the hills have great risk factors. These will be away from the homes of willing people, fish poaching will be a  highly discouraging reality,  grazing animals will have easy access into the ponds and affect the BOD of the pond water. Regular and  all the year round supply of fresh water will be a great restraining factor to be faced. Therefore selection of suitable sites will determine the success rate. 
 .
5. The Break Even point of the private fishery ponds in  areas high up in the hills, may be too high to attract sufficient persons, therefore a realistic feasibility study is essential before starting these ventures over there.
6. Adequate training facility and  sufficient and efficient supply of  fingerling, fish feeds, ponds' maintenance, harvesting, grading, chilling and packaging is essential before launching the entrepreneurs into these ventures, which will be totally new to the activity.
I hope my submissions will get sufficient attention.
Sincerely yours,
Dr. B S Rawat,  ARS, retd. Principal Scientist (ICAR)
45, Garh Vihar, Phase 1, PO  IIP Mohkampur, Dehradun 248005.
Mob 94 58 91 15 05, dr.bsrawat28@gmail.com


Bhishma Kukreti

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ग्रामीण उत्तराखंड में सामूहिक आलू खेती से आर्थिक क्रान्ति

                                                     डा. बलबीर सिंह रावत   

आलू एक अति साधारण खाद्य पदार्थ है जो हर मौसम में हर जगह उपलब्ध रहता है. इसी कारण इसे  हास्य का माध्मय भी बना दिया है। पूर्वी भारत में  जब किसी साधारण जने को साधारण बुद्धि वाला कहना होता है तो कहते हैं "तू तो यार आलू है ".यह बेचारा अपनी हर जगह, हर घर में उपलब्धि के कारण, विशेषता हासिल करने से चूक गया . लेकिन केवन सर्वसाधारण के विचारों में। आलू के गुण जानने के बाद  हमें लगता है की यह तो बड़ा ही काम का पदार्थ है। आलू सुपाच्य है तो खाने से थकान और कमजोरी को भगाता है. इसमें विटामिन सी , बी6, पोटासियम  और कार्बोहाइड्रेट  तथा फाइबर  पाए जाते है। विटामिन सी से मसूढ़े स्वस्थ रहते हैं,बी 6 से नईं कोशिकाओं के बनने में सहायता मिलती है और दिमाग की कार्यक्ष्म्ता बनी रहती है. आलू के नियमित सेवन से बुरे प्रकार के कोलेस्ट्रोल में कमी आती है
लेकिन कोई आलू का कैसे सेवन करता है, उस से  इसके सारे गुणों पर इसका असर पड़ता है। जलते कोयले युक्त राख में या भट्टी ( ओवन ) में भुने आलू में पूरी पौष्टिकता सुरक्षित रहती है. तले हुए और मसालों के साथ पकाने से इसके पौष्टिक तत्व कम हो जाते है।.
आलू की किस्में उसके उपयोग पर निर्भर करती हैं। जैसे खुश्क सब्जी के साथ पकाने के लिए जल्दी  गलने वाली किस्म, रसेदार आलू की सब्जी के लिए सख्त, पकने पर अपने आकार को रख पाने वाली किस्म, आलू टिक्की वाली, समोसे वाली, फिंगर फ्राई वाली,  साधारण आलू चिप्स वाली, एक आकार के बड़े चिप्स वाली किस्में,और अब सेंक या भून कर खाने वाले किस्मे इत्यादि.  औद्योगिक खेती के लिए इस बात का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है। आलू की खेती के लिए जह भी जानना जरूरी है की आलू की खुदाई कब की जाय की उसकी छाल काफी सख्त हो गयी हो और  इसके कारण संरक्षण में आसानी  हो।.   ,    .

चूंकि आलू जल्दी खराब होंने वाली उपज है , तो मंडी में किसान को उपभोक्ता के खरीद मूल्य का ३ ० % भी नहीं मिलता है. उसे आढतियों द्वारा निर्धारित मूल्य पर ही बेचना पड़ता है। आढतियों,  शीत गृहों के  मालिकोँ और रेढी-ठेली वालों से पूछिए की उनके लिए आलू कितना महत्वपूर्ण है ? उनके ठाठ बाट केवल आलू के माहात्म्य के कारण है।.आपने अपने बच्चों के लिए कभी किसी अच्छी कम्पनी के आलू चिप्स का पाकेट तो लिया होगा . कभी उसका वजन और कीमत पढी है? १३ ग्राम के पेकेट का दाम ५ रुपया . यानी ३८५/- का एक किलो आलू  चिप्स, जिसे बनाने में ८  से १ ०  किलो आलू लगा होगा।

कल्पना कीजिये की ये सारे काम, आलू उगाने से लेकर, भंडारन  और कारखानों में उपभोगता के पसंद के उत्पाद , जैसे चिप्स, और स्टार्च इत्यादि बनाने का प्रबंध हमारे उत्तराखंड के आलू उत्पादक अपने स्वयम के स्वामित्व में , सम्पूर्ण आलू व्यवसाय करें तो उन्हें किता लाभ हो सकता है? यह करना अब संभव है। अब सरकार ने कृषि क्षेत्र में उत्पादक कंपनियों के गठन के लिए सहकारिता और  औद्योगिक कंपनियों के गठन/संचालन  के नियमों को मिला कर नये नियम बनाए हैं . इन नए नियमों के अनुसार हर उत्पादक कंपनी में कम से कम १० सदस्य होंगे, हर सदस्य का वोट एक होगा या  होगा चाहे वोह कितनी ही पूंजी लगाय. हाँ लाभ वितरण के लिए कम्पने की सफलता में हिस्सेदारी का अनुपात भी आधार माना जाएगा . शेयरों की बिक्री नहीं हो सकती । कंपनिया अपने प्रबंधक बोर्ड में विशेषज्ञों की भी नियुक्ति कर सकती हैं।  यह उत्पादक कंपनिया मिल कर अपना संघ बना सकती हैं और उद्द्योग स्थापित कर सकती है। सहकारी  संस्थाओं के रजिस्ट्रार का इनसे कोइ लेना देना नहीं है. 

औद्योगिक उत्पादन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति पति दिन एक निश्चित मात्रा में , और लगातार साल भर होनी चाहिए। चूंकि आलू की फसल पर्वतीय इलाकों में साल में दो बार ली जा सकती है, तो सालाना मांग का सटीक अनुमान लगाने से, उत्पाद, भंडारण के लिए शीत-भण्डार और गराहक की पसंद के उत्पाद बनाने के उद्द्योग के आकार का सटीक आकलन किया जा सकता है. फिर भी लभ दायक आकार के छोटे उद्द्योग को १० टन आलू रोज, यानी ४,००० टन आलू साल भर के लिए चाहिए . याने एक फसल में २,००० टन आलू बह्न्दारण के लिए शीत्ग्ढ़ की भी आवश्यकता होती हैं परवतीय क्षेत्रों में शीतग्रहों की संचालन पूंजी अपेक्षकृत कम होती है.
चूंकि अपने उद्द्योग लगाना , हम पर्वतीय लोगों के लिए नयी बात है तो इसके लिए सम्बंधित अनुभवी विशेषज्ञों की सेवा लेना भी अनिवार्य है, जो सही मार्ग दर्शन दे सकेंगे. सरकार भी प्रोत्सान देती है। इस लिए सबसे पाहिले आलू उत्पादन क्षेत्रों के उत्पादाकों को समझाने, और सदस्य बनाने के लिए उन्ही क्षेत्रों के/ अन्य इच्छुक हमारे अपने युवा बीड़ा उठायं,. एक बार, एक स्थान पर एक सफल उद्द्योग स्थापित हो पाय्र्गा तो फिर , उसकी सफलता को देख कर अन्य जगहों के उत्पादक भी आगे आयेंगे
dr.bsrawat28@gmail.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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---------- Forwarded message ----------
From: <Rashtra1947@aol.com>
Date: Sat, Jul 13, 2013 at 4:57 AM
Subject: BROAD DAYLIGHT BETRAYAL OF HINDUSTHAN
To: rashtra1947@aol.com


THIS BEGGARS BELIEF!
The news below of 1500 ILLEGAL Rohingya MUSLIMS from Myanmar having arrived in Hyderabad, should wake up even the most useless Rashtrapati and the sleeping Prime Minister.
India since the surrender of PAKISTAN is a HINDU country. Yet the Hindus are afraid of mentioning the fact, or to utter the word "PARTITION". The Government of India is, therefore, themselves 'Party to Partition' and ought to be KICKED OUT of office. Can anyone think of bigger TRAITORS ("Hindu bashers")?
The local officer in the area does point out that "most of the Rohingya Muslims are staying illegally in India."
 
So, what is going on? Is Sonia Maino Gandhi, with her heart in ITALY, the "Government" of India?  Is there complete breakdown of law and order in Bharat, or open collaboration with the ILLEGAL Muslims to secure their "vote bank", or something MUCH WORSE (that is not difficult to guess)?
 
Do the Hindus have a stake in Hindusthan, the very LAST place of "safety, refuge and shelter" in rapidly shrinking world?
 
As the PRESSURE on the Hindu nation increases, the natives have to put into action at least some measures to ensure their own survival in the future when the INEVITABLE happens.
 
There MUST be someone in "Broken" Bharat to confront the Rohingyas and ask, "HOW IS IT THAT YOU DID NOT SEEK ASYLUM IN ISLAMIC BANGLADESH or PAKISTAN, or IRAN, or MALAYSIA or INDONESIA, or even SAUDI ARABIA where your Kafir-hating Prophet was born? Did nobody check your passports or visa at the border? Or, were you just waved in with a Gandhian smile?
 
"Will the sight of Buddhist and Hindu temples and so many INFIDELS and PIGS in the open around you, and the sight of women without burka in Hindusthan not provoke or infuriate you?"
 
Kuru
13 Jul 13.
 ==============
Around 1,500 Rohingya Muslims take refuge in Hyderabad
July 12, 2013

Ashadh Shuklapaksha 4, Kaliyug Varsha 5115
The Andhra Pradesh government
will soon have to deal with the Rohingya Muslims
living in the old city of Hyderabad; many of them illegally.


Sources in the Andhra Pradesh government say that there are about 1,500 Rohingya Muslims in Hyderabad who came to the city a couple of months ago to take shelter in the wake of the violence in Myanmar.

Many of them have taken refuge in the old City of Hyderabad, which has a dominant Muslim population. An officer with the Hyderabad city intelligence unit said they are keeping a watch on the movement of these people.

With little money and no aid from the government most of them are struggling to meet day-to-day expenses. However, some locals have decided to help them as a goodwill gesture, says Lateef Mohammad Khan, the convenor of the Civil Liberties Monitoring Committee, India, an NGO in Hyderabad.

Khan says that migration was an issue in 2012, but the population of the Rohingya Muslims has reduced considerably now and most of them are planning to return to Myanmar.

In Hyderabad, many of them have found odd jobs to do. They do petty jobs in small shops to earn their livelihood. Most of them are, however, extremely uncomfortable with the environment in India since they do not find anything common between them and the Indian Muslims.

Their food habits and culture is completely different. They do not eat the rice or roti and cannot even converse with the local Muslims. They are keen on getting back to their country, says a Hyderabad police officer.

After the Bodh Gaya blasts, a probe by the Hyderabad Police found no link between the attack and the Rohingya Muslims in Hyderabad. “They are only interested in their safety and not violence. There is nothing to show they are linked with any terrorist activities,” the officer said.

The officer, however, pointed out that most of the Rohingya Muslims are staying illegally in India.

Source: rediff.com

Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड में औषधीय पौधों की पेशेवर खेती
                                                    डा. बलबीर सिंह रावत
                                   पेशेवर खेती, अर्थात, व्यावसायिक आकार की खेती। लाभ दायक व्यवसाय के लिए उपज, यानी पैदावार की इतनी मात्रा होनी चाहिए की उसके पैदा करने और बेचने के खर्चे तथा यथोचित लाभ भी अर्जित हो सके।
यथोचित लाभ की न्यूनतम मात्रा इतनी तो होनी ही चाहिए की सम्बंधित उपजों के उत्पादन में उत्पादकों को प्रोत्साहन मिलता रहे। उत्तराखंड में, परिवारों की कृषि भूमि का आकर इतना छोटा है, और खेत इधर उधर ऐसे निखरे हुए हैं की उनमे, एक अकेले परिवार को,  लाभ दायक, पेशेवर खेती करना सम्भव नही है। इसलिए एक साथ लगे खेतों के मालिक, एक मत हो कर, अगर एक ही  प्रकार की फसल को इतने मात्रा  में उगांय कि उपज का औद्योगिक स्तर पर प्रसंस्करण  हो सके, तो ही वांछित लाभ प्राप्त किया जा सकता है। . चूंकि उद्द्योगों के  कारखाने तो हर रोज चालू रखने पड़त हैं, और खेती की उपजें मौसमी, होने के कारण कुछ अंतराल में ही प्राप्त हो पाती है,.इसलिए यह जानना जरूरी है कि, पसंद की गयी उपज की प्रति मुट्ठी/नाली, प्रति कटाई कितने किलो ताजी उपज प्राप्त होती है, और लगाये गए उद्द्योग के, प्रति दिन कितने कच्चे मॉल को खपाने की क्षमता है. इस से यह मालूम किया जा सकता है की फसल को कितने बड़े क्षेत्र में उगाना चाहिए। यह वाँछित क्षेत्र कितने लोगों के खेतों से प्राप्त हो सकता है। 
 दुसरे, औषधीय उपजें कई प्राकार  की होती हैं। एक प्रकार तो खेतों जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगती रहती हैं, उन्हें बीन का एकत्रित करने की जरूरत होती है. जैसे बन्स्फा, गिलोय, , हर्र , बहेड़ा, आँवला', बेल के फल इत्यादि। दूस्र्रा प्रकार है जिनकी खेती करनी होती है, जैसे पुदीना,, पिपरमिंट,गुलाब के फूल ,अनार  इत्यादि। अच्छी किस्म और स्वस्थ उपज लेने के लिए, बेल, आंवला, अनार , तेजपत्ता/दाल चीनी, गिलोय इत्यादि की खेती भी की जा सकती हैं। सही चुनाव के लिए क्षेत्र के जानकार वैद्यो से, सरकारी उद्द्यान/आयुर्वेद विभागों से,निझी क्षेत्र की दवा उत्पादक कंपनियों से व्यापारिक/व्यावसायिक सम्बंध स्थापित करने से मार्ग दर्शन लिया जा सकता है.
                         पेशेवर खेती का अर्थ हुआ ऐसे आकार और प्रकार की खेती जिस की उपजें बेच कर पर्याप्त  धन कमाया जा सके. और धन कमाने के लिए बड़ी मात्रा में उपज पैदा  की जानी होती है कि उनसे मशीनों के द्वारा इच्छित दवाएं, पर्याप्त मात्रा में बनाना भी लाभ दायक हो. इसके लिए पूरे गाँव और साथ लगे कई गाँव के खेत मालिकों एक साथ, एक सी ही उपजें उगानी पड़ेंगी, एक बड़े फ़ार्म की तरह व्यावसायिक स्तर की खेती, वैज्ञानिक ढंग से करनी होती है। इसके लिए सब की एक राय होना आवश्यक है. और यही प्रारम्भिक कदम उठाना हे सब से मुश्किल काम है.  सौभाग्य से कई प्रवासी सज्जन , जो अपने हमेशा अपने गावों में लगातार जाते  रहते हैं, ऐसे प्रयासों के लिए सक्रीय रूप से प्रयत्नशील है. इसके लिए ग्राम प्रधान और ग्राम सभा का सह्योग, तथा प्रवासी खेत स्वामियों का साथ भी आवश्यक है.  कई गाँव के प्रवासियों ने अपने खेत  सालाना/फसली किराए पर वहां  के फसल उगाने वालों को दे कर पहल शुरू की हुई है.और यह तरीका संभव तथा सरल भी है, कि व्यावसायिक खेती के लिए बड़े आकार के क्षेत्र  उपलब्ध हो.
एक अन्य तरीका  भी है, ठेके की खेती. इस में किसी उद्द्योग के साथ, जैसे डाबर, वैद्यनाथ इत्यादि से ठेका  जाय की उनकी आवश्यकता के हिसाब से उत्पाद उगा का  लगातार आपूर्ति होती रहेगी . जब सुनिश्चित और सुरक्षित बिक्री का प्रबंन्ध हो जाता है तो खेत स्वामी खुद ही जुड़ने को उत्सुक होंगे , बस उन्हें सूचित और प्रेरित करने के आवश्कता होती है. अगर यह कम ग्राम सभा/उत्पादक कम्पनी की पहल से होगा तो नामी उद्योग जुड़ने को इच्छुक होंगे।       
अगर औषधीय फसलों के चयन में दिक्कत आती हो तो स्थानीय वैद्यों, उस क्षेत्र में सक्रीय दवा कम्पनियों के विशेषज्ञों, सरकार के बागवानी तथा आयुर्वेद विद्यालयों के  सम्बन्धित विभागों के वेशेषज्ञों की साहायता ली जा सकती है. यह परम आवश्यक है की स्थानीय आबहवा के अनुरूप ही पादपों का चयन किया जाय.  इस काम में ग्राम सभा स्वयम  और उसके द्वारा सरकारी तन्त्र आसानी से सक्रिय किया जा सकता है .
एक बार पर्याप्त भूमि और वांछित उपजों का चयन हो जाय  तो अगले कदम में  बीज/ पौध की व्यवस्था भी उतनी ही महत्व पूर्ण बात है. औषधीय पौधों के बीज/पौध आसानी से, एक ही जगह नहीं मिल सकते। इस के लिए विशेष प्रबंध , समय पर करना उचित है. इस कार्य में सरकार का उद्द्यांन विभाग, कृषि विश्व विद्द्यालय, पतंजलि योगपीठ इत्यादि विशिष्ठ संस्थाएं  अवश्य सहायक हो सकते है.
लेकिन पहल कौन करेगा ? पहल करने वाले , प्रवासियों में से कोइ उत्साह से भरपूर व्यक्ति, गाँवो में रहने वाले जोशीले युवा, युवतियाँ, स्कूलों-कोलेजो के गुरुजन , जिनकी साख, एक संयोजक के रूप में स्थापित हो रक्खी हो. अगर कुछेक एक से  विचारों वाले लोग आपस में मिल कर ऐसे व्यवसाय शुरू करने का बीड़ा उठायं तो सफलता मिल सकती है. यह व्यवसाय सारे प्रवासी उत्ताराखंडीयों के हित में है. जो वहाँ स्वयम व्यवसाय नहीं कर सकते , वे अपनी भूमि, उनको  आपस में तय किराए पर दे सकते हैं, जो वहां पर व्यावसायिक रूप से जडी बूटी / आयुर्वेदिक दवा, अवलेह, अचार, मुरब्बा  का उत्पाद शुरू करने  इच्छुक हो. ऐसे छोटे या मध्यम स्तर के उद्द्य्मियों के लिए अब उत्पादक कंपनी बना कर व्यवसाय चलाने की सुविधा  संभव है. केंद्र सरकार ने कम्पनी क़ानून के भाग IX A के अंतर्गत, सहकारी संस्था
और कंपनी के उपनियमों को मिला कर उत्पादकों के हितों को ध्यान में रख कर, उन्हें अपने उद्दयम बिना सरकारी नियन्त्रण/हस्तक्षेप के, स्वयम ही चलाने की सुविधा भी दे दी है .इन कम्पनियों का संचालन  और लेखा जोखा , आय वितरण भी सदस्यों के कंपनी के कार्य में भागी दारी के आधार पर ही हो सकता है , न की उसमे  शेयरों के आधार। इस का लाभ  हर नए स्वरोजगारी उद्द्य्मी को लेना चाहिय़े.
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Bhishma Kukreti

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           उत्तराखंड में गेंदे की खेती करना लाभदायक है।

                                                                                         डा. बलबीर सिंह रावत


गेंदे का मूल स्थान  मेक्सिको,मध्य और दक्षिण अमेरिका है , लकिन यह भारत के हर क्षेत्र में आसानी से उगाया जाता है. इसके फूलों का सब से अधिक उपयोग पूजा में मालाएं बनाने में होता है। चूंकि इसके फूल प्रायः हर मौसम में उपलब्ध रहते हैं तो इस की खेती करना कितनी लाभदायक हो सकती है यह इस बात पर निर्भर करता है की आसपास में इसकी कितनी मांग है , यानी मंदिर कितने हैं, पूजा के लिए कितने लोग वहां आते है और किन किन त्योहारों और उत्सवों में आते हैं।  चार धाम यात्रा  मार्गों  और शहरों के आस पास के किसान इसकी व्यावसायिक खेती से अच्छा लाभ कमा सकते हैं। गेंदा फूल के दो मुख्य वर्ग हैं, एक अफ्रीकन और दूसरा फ्रेंच।  अफ्रीकन फूल बड़े आकार के होते हैं और फ्रेंच कुछ छोटे।  दोनों में ही नींंबुई पीला , सुनहरा पीला और नारंगी रंग के फूल अधिक पसंद किये जाते हैं।

गेंदे की खेती के लिए दोमट गहरी मिट्टी वाले खेत सर्वोत्तम होते है, मिट्टी में न तो अम्लीयता हो न ही क्षारिता, पी एच ६.५  और ७.५  के बीच का होना सही है।  जल निकासी भी उचित होनी चाहिए।  जलवायु सुहावनी  १५ से  और ३० डिग्री से. का तापमान और हल्की नमी वाली हवा सर्वोत्तम होती है। ३५ डिग्री तापमान पर पौधे मुरझाने लगते है।  गेंदा हर मौसम में उगाया जा सकता है , लेकिन हर मौसम के लिए अलग अलग जातियां होती है। पहिले पौध तैयार  की जाती है , फिर रोपण किया जाता है।  पौध उगाने के लिए ६ X १.२ मीटर  क्यारियाँ जमीन से कुछ ऊंंची रखनी चाहियें उसमे ३० किलो अच्छे सड़े गोबर की खाद तथा आधा किलो १५ १५ १५ उर्वरक डाल कर अच्छी तरह मिला देना चाहिए। क्यारियों को  कृमि नाशक कप्तान द्रव्य,२ ग्राम प्रति लीटर पानी के घोले से और मिट्टी को फफूंदी मुक्त बनाने के लिए २% फोर्मलीन के घोल से तर करके छोड़ देना चाहिए।  इस से चींटियाँ बीज को ले जाने नहीं आएंगी। जब मिट्टी  में बत्तर आ जाय तो ६ -८ सेंटी मीटर की कतारों में,  बुआई २ सेंटी मीटर गहरे में करनी चाहिये । बोये बीज को  गोबर की खाद या पत्तियों की खाद से ढंक देना चाहिए। 

गर्मियों की फसल के लिए पौध बोने का समय जनवरी से लेकर फ़रवरी तक का होता है, रोपण फ़रवरी से लेकर मार्च तक किया जाता है , यानी एक महीने की पौध रोपण के लिए उचित रहती, बरसात की फसल के लिए पौध की बुवाई मई जून में, और जाड़ों की फसल के लिए मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबर तक। की जानी चाहिए।  बरसात के मौसम के गेंदे के लिए अफ्रीकन जाइंट टॉप येलो , जाफरी और लड्डू गेंदा प्रजातिया और जाड़ो के लिए पूसा नारंगी, पूसा बसंती , अफ्रीकन जाइंट डबल येलो और टाइगर ( पीला और लाल ) प्रजातियां उचित रहती हैं।  बीज की मात्रा गर्मी और बरसात की फसलों के लिए २००-३०० ग्राम  और जाड़ों की फसल के लिए १५० से २०० ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से बोनी चाहिए। एक माह की हो जाने पर पौध का रोपण करना चाहिए।

खेत की जुताई ठीक से होने चाहिए. प्रति एकड़ ८० -१०० क्विंटल गोबर की खाद, ११५ किलो नाइट्रोजन २४ किलो P२ O५ और २४ किलो K२O उर्वरक डाल कर अच्छी तरह मिला देने चाहियें। रोपण कतारों में, अफ्रीकन नस्ल के लिए ४५ सेंटीमीटर की दूरी पर और फ़्रेंच नस्ल के लिए ३० सेमी दूरी पर करना उचित रहता है। रोपण के तुरंत बाद सिंचाई और फिर हर ७ - ८ दिनों में। गर्मी में कुछ जल्दी और जाड़ों में कुछ देरी से।  रोपण के ३०- ३५ दिनों बाद पौधौं की पिंचिंग से  , यानी शीर्ष की कली को तोड़ देने से, अधिक कल्ले फूटते हैं तो फूल अधिक लगते हैं. पिंचिंग के तुरंत बाद और फिर महीने महीने के अंतराल में नाइट्रोजन वाले उर्ववृक सिंचाई के साथ डालना चाहिए, इस से पौधे स्वस्थ रहते हैं और अधिक फूल देते हैं।

गेंदे के पौधों को बीमाररियों से बचाने के लिए समुचित उपाय समय पर कर लेने चाहियें। पौधों की जड़ों  तनो और कोंपलों  को काटने वाले कीड़े, पतियों का कोंपलों का रस चूसने वाले जंतुभरी नुक्सान पहुंचा सकते हैं , इनके रोक थाम के लिए कृमि नाशक घोल , जैसे कुणालफॉस ०.०५ % ,, डाइकोफोस ०.१ % या केलथें घोल २ एमएल प्रति लीटर पानी में, छिड़कने से ये कृमि नष्ट हो जाते हैं।  कीटों के अलावा फफूंदी भी पौधों के तनों, जड़ो, पत्तियों और फूलों को नुक्सान पहुंचा सकती हैं. फफूंदी उपचार के लिए कई प्रकार के फफूंदी नाशक रासायन मिलते हैं, किसी एक का उपयोग करके इस रोग से भी छुटकारा पाना सही रहता है।

रोपण के ढाई महीने में फूल तुड़ाई के लिये तैयार होने लगते हैं. तुड़ाई से पहिले सिंचाई कर देने से तोड़ने के उपरान्त फूल अधिक समय तक ताजा रहते है। फूलों को   थोड़े लम्बे डंठल समेत तोड़ना चाहिए। पहिली तुड़ाई के बाद २ से २ १/२  महीनो तक पौधों में फूल लगते रहते हैं। स्थानीय या कुछ दूरी के बाजार के फूल बांस की टोकरियों में या जूट के बोरो में भरे जा सकते हैं , लम्बी दूरी के लिए पैकिंग और अधिक अच्छी और इतनी मजबूत होनी चाहिए की लदान और ढुलाई के दबाव से फूल बचे रहें।

गेंदे के उपज काफी अच्छी होती है। अफ्रीकन नस्ल की उपज औसतन ४,५०० किलो प्रति एकड़, और फ़्रन्च नस्ले की ३५०० किलो  के लगभग होती है। बाजार की  दैनिक और सामायिक मांग के अनुरूप खेतों का साइज तय करना चाहिए ताकि साल भर , घटती बढ़ती मांग की आपूर्ति ठीक से होती रहे।  इसके लिए बुवाई, तुड़ाई का सालाना चक्र बना लेना चाहिए।   गेंदे की खेती का लाभ , इसके फूलों की कीमत पर निर्भर करता है, अगर उत्पादक सीधे फटका विक्रेता को ही  अपनी उपज बेच सकता है तो लाभ अधिक होगा ,जीते अधिक बिचौलिये होंगे उतना ही लाभ की मात्र घटती जाएगी। 

पूजा, माला , सजावट के अलावा गेंदे के फूलों से आयर्वेद और होमेओपेथी की दवाएं भी बनती है, इसकी पंखुड़ियों से मुर्गीयो के दाने में मिलाने का चूर्ण भी बनता है , जिस से अण्डों में पीलापन बढ़ता है। गेंदे के बीज बेचने का व्यवसाय भी लाभ दायक व्यवसाय हो सकता है , इसके लिए नस्लों की शुद्धता  और बीमारी रहित उपज लेने की व्यवस्था का प्रमाणीकरण करवाना अच्छा रहता है।           
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कंडळी के बहुउपयोग

                 डा..बलबीर सिंह रावत


Nettle, Urtica dioica, कंडळी  एक ऐसा सर्वतोमुखी पौधा है जो दुनिया के ठन्डे इलाकों में  सर्वत्र आसानी से उग जाता है।  यह पौधा जहां उगता है वहा से ढेर सारे रे खनिज इत्यादि अपने में ले लेता है, जिस से इसकी उपयोगिता अनमोल हो जाती है। इस अकेले एक पौधे में कई कई पोषक तत्व पाये जाते हैं जो शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाते हैं,यह रक्त संचार प्रणाली को तंदुरुस्त रखता है और रक्तशोधन भी करता है।   कंडली में भिटामिन  A ,C, K, B १-३ , B ५, कैल्सियम ,फॉस्फोरस, मैग्नीशियम , पोटासियम ,लौह , ताम्बा, बोरोन, सिलिका , जिंक , फॉर्मिक अम्ल , सेराटोनिन ,और ओमेगा ३ , -६ इत्यादि तत्व पाये जाते हैं। 
कंडळी को बर्फीले िाकों में बसंत ऋतु का टॉनिक भी कहते हैं। इसकी चाय बनाकर ठंडी करके पीने से हाजमा ठीक रहता है , बीमारी के बाद के कमजोरी को भगाने में यह चाय सहायक होती है। कन्डली की धबड़ी और साग तो हर उस पहाड़ी जन ने खाया होगा जिसने जीवन के  कुछ साल पहाड़ों में गुजारे है , आजकल  शहरों में पर्वतीय जानो की शादी व्याह की दावतों में पहाड़ी भोजन में कन्डली ऐज ए मस्ट पदार्थ का दर्जा पाती जा रही है। कन्डली शकरकंद का मीठा हलुवा घर पर बनाइये और एक नए व्यंजन का आनंद लीजिये।  इस से सूप, और नीम्बू के रस के साथ  ५-१० मिनट उबाल  कर, स्वादानुसार मसाले वाला नमक या चीनी डाल कर ठंडा पेय भी स्वादिष्ट होता है।
कण्डळी की मुलायम कोंपलों को, सुबह ओस सूखने के बाद कैंची से काटना चाहये, इसके सुक्से भी बनाये जा सकते हैं, और कंडली की कोंपलों से सुक्से बनाकर १०० ग्राम के पैकेटों में पैक करके बेचना एक अच्छा रोजगार हो सकता है। कोँपलों से नीचे के तने से, रेशे निकाल कर बाकी बची पत्तियों और डंठलों से दुधारू गायों के लिए पौष्टिक पींडा  भा बनाया जा सकता है। कंडाली शीत जलवायु वाले क्षेत्रों के रहने वाले इन्सानों और पशुओं के लिए प्रकृति की अनूठी भेंट है, बस इसके काँटों की चुभन और लम्बे समय तक रहने वाली पीड़ा से बचने की कला आनी चाहिए। झापाक लग ही जाय तो खाने के सौदे से ढोते रहिये जल्दी राहत मिल जाती है।
कंडाळी का सुक्सा श्री सुरमान सिंह रावत ( 0976146148) , घंडालू , वाया सिलोगी , मल्ला ढांगू से प्राप्त हो सकता है।

Bhishma Kukreti

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                                                     तिमला और बेडू की व्यावसायिक खेती
                                                                       
                                                                               डा. बलबीर सिंह रावत

तिमला , यानी अंजीर , और इस का रिश्तेदार बेडू , उत्तराखंड के हर क्षेत्र में अपने आप उगने वाले फल दार पेड़ हैं। लोग इसके फलों को चाव से खाते हैं , लेकिन इसकी खेती नहीं करते। तिमला , जिसे हिन्दी नाम अंजीर से जाना जाता है, एक लाभ दायक फल है जो सूखा मेवा की तरह बेचा जाता है , जिसका सेवन पेट को  तन्दुरुस्त रखने के लिए किया जाता है।
सन 2007 में विभिन्न मुख्य पांच उत्पादक देसों मे अंजीर का उत्पादन इस प्रकार था
देस ------------------हजार टन
मिश्र -------------------2 62
टर्की -------------------210
ईरान -----------------88
अल्जीरिया ---------64
मोराको -----------63

यह फल प्रकृति की अनूठी रचना है की यह तना भी है और फूल भी , बाहरी आवरण तने का हिस्सा होता है और इसके शूक्ष्म फूल इसके अन्दर होते हैं जो दिखाई नहीं देते। भारत में अंजीर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडू , उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होता है, लेकिन भारत की भागीदारी विश्व उत्पादन स्तर पर बहुत कम है।  विश्व भर में १० लाख टन के लगभग अंजीर का उत्पादन होता है , और इसमें अकेले तुर्की से, ३० % आता है।  ताजा अंजीर की बाजार में मांग बहुत कम है,इस लिये इसके सकल उत्पादन  का ८०% भाग सुखाकर बेचा जता है   सुखा कर सूखे मेवों के रूप में बेचा जाता है।  अंजीर में ऊर्जा, प्रोटीन, केल्सियम  और लौह  प्रचुरता मे पाया जाता है और यह रेचक भी है तो  इसका उपयोग पाचन तंत्र को ठीक रखने के लिए किया जाता है।
बाजार में सूखे मेवे के रूप में अंजीर की कीमत  साढ़े तीन ,चार सौ रूपये प्रति किलोग्राम के आस पास रहती है  जो ताजे ७-८ किलो ग्राम के लगभग होता है और करीब ५० रूपये प्रति किलो  होती है . अगर इसका आधा भी उत्पादक को मिलता है तो अंजीर की खेती लाभ दायक हो सकती है।
अंजीर के लिए नम लेकिन अच्छी जल निकासी वाली दोमट  और क्षारीय मिट्टी वाली भूमि उपयुक्त होती है, जिसमे ऊपरी सतह में लगभग ४ फीट मिट्टी हो, जड़ों के सही विकास के लिए । चट्टानी जगहें उपयुक्त नहीं होतीं।
जिस भूमि में अंजीर का बाग़ लगनो हो , उसमे मई के महीने में , १५ फीट x  १५ फीट की दूरियों पर डेढ़ फीट व्यास के दो फीट गहरे गड्ढे खोद कर  दो हफ्तो के लिए खुला छोड़ दें , फिर उनमे खाद, हो सके तो नीम की खली, और  नाइट्रोजन , फॉस्फोरस और पोटाश वाले उर्वरक और मिट्टी मिला कर गढ़े भर दें। प्रति एकड़ करीब १६० गड्ढे बनेंगे (प्रति नाली ८ )
अंजी के पौधे , पुराने पेड़ो से ५ -६ आँखों वाली, १० इंच ( २५ सेंटीमीटर ) लम्बी , पिछले साल निकली टहनियों से काट कर ली जाती हैं।  रोपण के लिए बरसात का समय सबसे अच्छा रहता है।
तीन साल की उम्र में पेड़ फल देना शुरू करता है, प्रति पेड़ ३ किलो फल मिलते हैं , ४ साल के पेड़ से ६ किलो, ६ साल वाले से १२ किलो और ८ साल से १८ किलो प्रति किलो , या २८०० -३००० किलो प्रति एकड़ फल मिलते  हैं।  समुचित विक्री प्रबंध हो तो क्रेट में भरे फल ५० रूपकये प्रतिकिलो के हिसाब से बिक सकते हैं। चूंकि अब स्थानीय बाजारों में फलों की मांग बढ़ रही है तो ताजी अन्जीरें आसानी से बिक सकती हैं।  अंजीर के पेडो की छाया कम होती है, इसलिए इसके बगीचों में मौसमी सब्जिया , मूंग, मसूर जैसे दलहनी फसलें भी ली जा सकती हैं।   
अंजीर के फलों की गुणवता तो ग्राहकों को ज्ञात है , लेकिन फल जल्दी ही ख़राब हो जाते हैं। अगर स्थानीय बाजारों में मांग कम है  तो इन्हें सुखा कर बेचना ही उचित है। सुवे अंजीर बनाने के लिए अलग से प्रबंध करने होते हैं , तो एक ही क्षेत्र में पर्याप्त बाग लगें तो ही यह सम्भव है ।         
                                                                                                                      ---------------------

 

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