Author Topic: Articles By Shri D.N. Barola - श्री डी एन बड़ोला जी के लेख  (Read 141520 times)

D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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Marriages in Olden times in the hills.   

In the olden times, finding a girl for marriage was also a great but sacred task in the hills. For the purpose a party consisting of the Father of the boy, the prospective bridegroom, a Pandit (Priest), some relatives and specially a Nai (Barber) used to start on a Bride finding mission. The Nai used to play an important role, as he was considered to be a pleasantly talkative person, a good conversationalist and above all a good bargainer.  On many occasions the Party used to go to the bride’s house and would settle all the formalities as also would get the marriage solemnized by blowing a conch shell and return home with the bride. This used to be a simple and economical marriage.

The Panditji used to fix the sacred and auspicious time of marriage called the Lagna.  There used to be no watches during those times. Hence Panditji used to prepare a Jal Ghari (water watch). He would put sufficient water on a large utensil, in which a wooden bowl with a small whole was kept. Since the bowl used to be with a small hole, it would drown down in the large utensil after a specified time, as water would get inside the bowl through the small hole gradually. Pandatji would arrange to provide the small whole in such a way that it would drown down in the utensil only after one Ghati (Two and a half hour). The moment the bowl would get drowned in the utensil, the Lagna time was declared and the marriage ceremony would start. Thus the marriage used to be solemnized in this way in many cases.

Things have now changed drastically. In nineteen fifties, the bridegroom used to wear Dhoti. Photography was rare. Even if a photograph was taken, it was not possible to photograph the face of the bride. A photograph of the late fifties is attached. Yet another photograph of the modern times is also attached just for the sake of comparison.  (D.N.Barola).


Bridegroom and the Bride in nineteen fifties



A modern Bride and the Bridegroom







D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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गणतुआ -   आ निनुरी आ सिनुरी, भोल  तेरी मौत
Ganatua - Aa ninuri aa sinuri, bhol teri maut.

यह एक पुरानी कहानी है. एक गाँव मैं एक गणतुआ रहता था. वह लोगों की समस्याओं का समाधान गणना करके किया करता था और अपना तथा अपने परिवार का जीवन यापन करता था. लोगों को उसके पर्चे लगते भी थे परन्तु गणना हमेशा तो सही नहीं हो सकती इस कारण कभी उसका धंधा ठीक चलता और कभी नहीं चलता. लोग उसके पास पशुवों के  खोने तथा चोरी आदि के बारे मैं पूछते थे. कभी कभी अपना धंधा चलाने के लिए पशुवों  को गलत दिशा मैं भेज देता था तथा जिसका पशु खोया होता तो उसका आसानी से समाधान कर देता. इस प्रकार उसका जीवन यापन हो रहा था.
एक बार उस गाँव के राजा का जेवर चोरी हो गया. राजा के दरबारियों ने जेवर बहुत खोजा पर जेवर नहीं मिले. इस बीच गणतुआ की भी ठीक ठाक चल रही थी. किसी ने राजा को उसके बारे मैं बतलाया. गणतुआ को राज दरबार मैं हाज़िर होने का फरमान मिला. राजा ने कहा की यदि कल सुबह तलक जेवर नहीं मिले तो गणतुआ का सर कलम कर दिया जायेगा.
परेशान गणतुआ रात को सोने की कोशिस मैं लगा था और चिल्ला रहा था- आ निनुरी आ सिनुरी, भोल तेरी मौत.
अर्थात निद्रा देवी आ जा, कल तो मरना ही है.  राजा की दो रानियाँ उधर से गुजर रहीं थीं. उन्होंने गणतुआ की बात सुन ली. इत्तफाक से उन रानियों का नाम निनुरी और सिनुरी था. दोनों ने समझा की गणतुआ को उनका भेद मालूम हो गया है. डर की मारी  वे गणतुआ के घर के अन्दर चली गईं और उन्होंने गणतुआ को सही बात बतला दी. उन्होंने बतलाया की जेवर उन दोने ने छुपा रक्खे हैं. उन्होंने ने उस स्थान का नाम भी बतलाया जहाँ पर जेवर छुपाये गए थे  गणतुआ की चल पड़ी  उसने रानियों को अभय दान दिया तथा दूसरे दिन राज दरबार मैं हाज़िर हो गया. तथा गणना का बहाना कर जेवर का स्थान बता दिया. जेवर मिल गए और एक बार फिर गणतुआ की चल पड़ी. गणना करने का पर्वतीय समाज मैं आज भी प्रचलन है तथा अपनी समस्याओं के   समाधान हेतु लोग आज भी गणतुआ के पास जाते हैं तथा बहुत से मामलों मैं गणतुआ के पर्चे सही लगते हैं. गणतुआ को पुछ्यारी आदि कई नामों से पुकारा जाता है  (D.N.Barola)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Woh... Very interesting..

Sir.. Actually, there many such stories which needs to preserved. I are lucky that we are coming to know about these stories from you.

Thanks.. a ton once again.

गणतुआ -   आ निनुरी आ सिनुरी, भोल  तेरी मौत

यह एक पुरानी कहानी है. एक गाँव मैं एक गणतुआ रहता था. वह लोगों की समस्याओं का समाधान गणना करके किया करता था और अपना तथा अपने परिवार का जीवन यापन करता था. लोगों को उसके पर्चे लगते भी थे परन्तु गणना हमेशा तो सही नहीं हो सकती इस कारण कभी उसका धंधा ठीक चलता और कभी नहीं चलता. लोग उसके पास पशुवों के  खोने तथा चोरी आदि के बारे मैं पूछते थे. कभी कभी अपना धंधा चलाने के लिए पशुवों  को गलत दिशा मैं भेज देता था तथा जिसका पशु खोया होता तो उसका आसानी से समाधान कर देता. इस प्रकार उसका जीवन यापन हो रहा था.
एक बार उस गाँव के राजा का जेवर चोरी हो गया. राजा के दरबारियों ने जेवर बहुत खोजा पर जेवर नहीं मिले. इस बीच गणतुआ की भी ठीक ठाक चल रही थी. किसी ने राजा को उसके बारे मैं बतलाया. गणतुआ को राज दरबार मैं हाज़िर होने का फरमान मिला. राजा ने कहा की यदि कल सुबह तलक जेवर नहीं मिले तो गणतुआ का सर कलम कर दिया जायेगा.
परेशान गणतुआ रात को सोने की कोशिस मैं लगा था और चिल्ला रहा था- आ निनुरी आ सिनुरी, भोल तेरी मौत.
अर्थात निद्रा देवी आ जा, कल तो मरना ही है.  राजा की दो रानियाँ उधर से गुजर रहीं थीं. उन्होंने गणतुआ की बात सुन ली. इत्तफाक से उन रानियों का नाम निनुरी और सिनुरी था. दोनों ने समझा की गणतुआ को उनका भेद मालूम हो गया है. डर की मारी  वे गणतुआ के घर के अन्दर चली गईं और उन्होंने गणतुआ को सही बात बतला दी. उन्होंने बतलाया की जेवर उन दोने ने छुपा रक्खे हैं. उन्होंने ने उस स्थान का नाम भी बतलाया जहाँ पर जेवर छुपाये गए थे  गणतुआ की चल पड़ी  उसने रानियों को अभय दान दिया तथा दूसरे दिन राज दरबार मैं हाज़िर हो गया. तथा गणना का बहाना कर जेवर का स्थान बता दिया. जेवर मिल गए और एक बार फिर गणतुआ की चल पड़ी. गणना करने का पर्वतीय समाज मैं आज भी प्रचलन है तथा अपनी समस्याओं के   समाधान हेतु लोग आज भी गणतुआ के पास जाते हैं तथा बहुत से मामलों मैं गणतुआ के पर्चे सही लगते हैं.(D.N.Barola)


Risky Pathak

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Very well said Barola Jee.

Even today in UK, people first go to puchhari, gantua for their issues
गणतुआ -   आ निनुरी आ सिनुरी, भोल  तेरी मौत

यह एक पुरानी कहानी है. एक गाँव मैं एक गणतुआ रहता था. वह लोगों की समस्याओं का समाधान गणना करके किया करता था और अपना तथा अपने परिवार का जीवन यापन करता था. लोगों को उसके पर्चे लगते भी थे परन्तु गणना हमेशा तो सही नहीं हो सकती इस कारण कभी उसका धंधा ठीक चलता और कभी नहीं चलता. लोग उसके पास पशुवों के  खोने तथा चोरी आदि के बारे मैं पूछते थे. कभी कभी अपना धंधा चलाने के लिए पशुवों  को गलत दिशा मैं भेज देता था तथा जिसका पशु खोया होता तो उसका आसानी से समाधान कर देता. इस प्रकार उसका जीवन यापन हो रहा था.
एक बार उस गाँव के राजा का जेवर चोरी हो गया. राजा के दरबारियों ने जेवर बहुत खोजा पर जेवर नहीं मिले. इस बीच गणतुआ की भी ठीक ठाक चल रही थी. किसी ने राजा को उसके बारे मैं बतलाया. गणतुआ को राज दरबार मैं हाज़िर होने का फरमान मिला. राजा ने कहा की यदि कल सुबह तलक जेवर नहीं मिले तो गणतुआ का सर कलम कर दिया जायेगा.
परेशान गणतुआ रात को सोने की कोशिस मैं लगा था और चिल्ला रहा था- आ निनुरी आ सिनुरी, भोल तेरी मौत.
अर्थात निद्रा देवी आ जा, कल तो मरना ही है.  राजा की दो रानियाँ उधर से गुजर रहीं थीं. उन्होंने गणतुआ की बात सुन ली. इत्तफाक से उन रानियों का नाम निनुरी और सिनुरी था. दोनों ने समझा की गणतुआ को उनका भेद मालूम हो गया है. डर की मारी  वे गणतुआ के घर के अन्दर चली गईं और उन्होंने गणतुआ को सही बात बतला दी. उन्होंने बतलाया की जेवर उन दोने ने छुपा रक्खे हैं. उन्होंने ने उस स्थान का नाम भी बतलाया जहाँ पर जेवर छुपाये गए थे  गणतुआ की चल पड़ी  उसने रानियों को अभय दान दिया तथा दूसरे दिन राज दरबार मैं हाज़िर हो गया. तथा गणना का बहाना कर जेवर का स्थान बता दिया. जेवर मिल गए और एक बार फिर गणतुआ की चल पड़ी. गणना करने का पर्वतीय समाज मैं आज भी प्रचलन है तथा अपनी समस्याओं के   समाधान हेतु लोग आज भी गणतुआ के पास जाते हैं तथा बहुत से मामलों मैं गणतुआ के पर्चे सही लगते हैं.(D.N.Barola)


D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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जंवाई (दामाद) जी चले सौरास (ससुराल) को.
Son-in-law goes to his sasural

ब्या (शादी) के बाद पहली दफा सौरास (ससुराल) जाना हर दुल्हे का हसीन सपना होता है.  दुल्हे राजा जंवाई या दामाद के रूप मैं जब पहली बार ससुराल जाते हैं तो उनके घर मैं उन्हें अनेकानेक सलाह दी जाती हैं. पुराने ज़माने मैं  पक्का भोजन एक बड़ी बात होती थी. ससुराल मैं  जंवाई जी का स्वागत लगड़ (पूरी) दौड़ लगड़ (कचौरी), बड़ा, सिंगल, पूवा, हलवा , खीर, लड्डू  आदि पकवानों से किया जाता था. ऐसे मैं दुल्हे राजा की राल न टपक जाये अतः इजा (माता)  व बौज्यू (पिता) की तरफ से ख़ास हिदायतें दी जाती थी. खाना कम खाना है. लालच मत करना नहीं तो ससुराल वाले पेटू समझेंगे आदि आदि. क्योंकि दुल्हा काफी कम उम्र का होता था.
हमारी कहानी   के नायक जंवाई जी ससुराल पहुंचे. उनका स्वागत नाना प्रकार के लजीज पकवानों से किया गया. जंवाई जी की लार टपक रही थी परन्तु इजा की बात बार बार स्मरण हो आती थी. अतः खाना खाते वक्त बार बार ना नकुर करते रहे.नतीजतन जंवाई जी ने बहुत ही कम खाना खाया और पानी का पूरा लोटा गटक कर भोजन समाप्ति की घोषणा कर बैठे.
रात्रि को जब सोये तो नींद नहीं आई. भूखे पेट  सोना वह भी ससुराल मैं. जंवाई जी अपने हाथों अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे थे. अचानक उन्हें छत पर एक मटकी लटकी हुई दिखाई दी. उन्होंने मटकी के अन्दर हाथ डाला तो उसमें शहद सा पदार्थ मिला. जंवाई जी खुश.बस फिर क्या था. उन्होंने शहद चाटना शुरू कर दिया. नीद भी जोर की लगी थी. अतः उन्होंने मटकी के नीचे एक छोटा सा छेद  कर डाला. उस छेद से बूंद बूंद शहद निकलने लगा. जंवाई जी लेटे लेटे शहद की बूदों का आनंद लेने लगे. इस बीच उन्हें भूख  से कुछ राहत मिली तो उन्हें निद्रा देवी ने आ घेरा. वह टुप्प सो गए .रात भर शहद की बूंदे उनके चेहरे पर पड़ती रहीं तथा बदन की तरफ भी बहती रहीं, परन्तु जंवाई जी तो घोड़े बेच सो चुके थे. प्रातः जब नीद खुली तो उन्हें अपने चेहरे व बदन पर चिपचिपा लगा. उन्हें रात की बात याद आ गई. खताड़ी (लिहाफ) के एक कोने से उन्होंने रुई निकाली और अपने चेहरे व बदन को साफ़ करने लगे. परन्तु यह क्या रुई से शहद साफ करते समय उनके चेहरे व बदन पर रुई चिपक गई तथा उनका चेहरा विभीत्स दिखने लगा. परन्तु कमरे मैं आरषी (शीशा)  न होने के कारण उन्हें यह बात पता नहीं चली.
सुबह सास जी जब जंवाई  जी को चाय देने के लिए आई तो उन्हें एक सफ़ेद रुई के चेहरे वाला भयानक स्नोमैन दिखाई दिया. वह चिल्लाई और बेहोस हो गईं. जंवाई जी  भी डर के मारे कुंवे की तरफ नहाने को दौड़े, परन्तु उनके साले, साली व  ससुर ने उन्हें घेर लिया. उनकी पिटाई की नौबत आने को ही थी कि जंवाई जी  चिल्लाये - मैं तुम्हारा जंवाई हूँ. वस्तुस्थिति मालूम होने पर उन्हें स्नान करवाया गया. परन्तु ससुराल मैं  जंवाई राजा की जो फजीहत हुई वह कभी न  भूल पाए. गाँव वाले तो इस किस्से को सुन कर चटखारे लेते हुए कई  दिन तक हंसी के मारे  लोट पोट  होते रहे.(D.N.Barola)



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sir,

Really interesting.. Hasi tham nahi rahi hai..


thanx a ton... Main bhi is kahani ko bachpan mai suna tha .. lekin bhool gayaa....

जंवाई (दामाद) जी चले सौरास (ससुराल) को.

ब्या (शादी) के बाद पहली दफा सौरास (ससुराल) जाना हर दुल्हे का हसीन सपना होता है.  दुल्हे राजा जंवाई या दामाद के रूप मैं जब पहली बार ससुराल जाते हैं तो उनके घर मैं उन्हें अनेकानेक सलाह दी जाती हैं. पुराने ज़माने मैं  पक्का भोजन एक बड़ी बात होती थी. ससुराल मैं  जंवाई जी का स्वागत लगड़ (पूरी) दौड़ लगड़ (कचौरी), बड़ा, सिंगल, पूवा, हलवा , खीर, लड्डू  आदि पकवानों से किया जाता था. ऐसे मैं दुल्हे राजा की राल न टपक जाये अतः इजा (माता)  व बौज्यू (पिता) की तरफ से ख़ास हिदायतें दी जाती थी. खाना कम खाना है. लालच मत करना नहीं तो ससुराल वाले पेटू समझेंगे आदि आदि. क्योंकि दुल्हा काफी कम उम्र का होता था.
हमारी कहानी   के नायक जंवाई जी ससुराल पहुंचे. उनका स्वागत नाना प्रकार के लजीज पकवानों से किया गया. जंवाई जी की लार टपक रही थी परन्तु इजा की बात बार बार स्मरण हो आती थी. अतः खाना खाते वक्त बार बार ना नकुर करते रहे.नतीजतन जंवाई जी ने बहुत ही कम खाना खाया और पानी का पूरा लोटा गटक कर भोजन समाप्ति की घोषणा कर बैठे.
रात्रि को जब सोये तो नींद नहीं आई. भूखे पेट  सोना वह भी ससुराल मैं. जंवाई जी अपने हाथों अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे थे. अचानक उन्हें छत पर एक मटकी लटकी हुई दिखाई दी. उन्होंने मटकी के अन्दर हाथ डाला तो उसमें शहद सा पदार्थ मिला. जंवाई जी खुश.बस फिर क्या था. उन्होंने शहद चाटना शुरू कर दिया. नीद भी जोर की लगी थी. अतः उन्होंने मटकी के नीचे एक छोटा सा छेद  कर डाला. उस छेद से बूंद बूंद शहद निकलने लगा. जंवाई जी लेटे लेटे शहद की बूदों का आनंद लेने लगे. इस बीच उन्हें भूख  से कुछ राहत मिली तो उन्हें निद्रा देवी ने आ घेरा. वह टुप्प सो गए .रात भर शहद की बूंदे उनके चेहरे पर पड़ती रहीं तथा बदन की तरफ भी बहती रहीं, परन्तु जंवाई जी तो घोड़े बेच सो चुके थे. प्रातः जब नीद खुली तो उन्हें अपने चेहरे व बदन पर चिपचिपा लगा. उन्हें रात की बात याद आ गई. खताड़ी (लिहाफ) के एक कोने से उन्होंने रुई निकाली और अपने चेहरे व बदन को साफ़ करने लगे. परन्तु यह क्या रुई से शहद साफ करते समय उनके चेहरे व बदन पर रुई चिपक गई तथा उनका चेहरा विभीत्स दिखने लगा. परन्तु कमरे मैं आरषी (शीशा)  न होने के कारण उन्हें यह बात पता नहीं चली.
सुबह सास जी जब जंवाई  जी को चाय देने के लिए आई तो उन्हें एक सफ़ेद रुई के चेहरे वाला भयानक स्नोमैन दिखाई दिया. वह चिल्लाई और बेहोस हो गईं. जंवाई जी  भी डर के मारे कुंवे की तरफ नहाने को दौड़े, परन्तु उनके साले, साली व  ससुर ने उन्हें घेर लिया. उनकी पिटाई की नौबत आने को ही थी कि जंवाई जी  चिल्लाये - मैं तुम्हारा जंवाई हूँ. वस्तुस्थिति मालूम होने पर उन्हें स्नान करवाया गया. परन्तु ससुराल मैं  जंवाई राजा की जो फजीहत हुई वह कभी न  भूल पाए. गाँव वाले तो इस किस्से को सुन कर चटखारे लेते हुए कई  दिन तक हंसी के मारे  लोट पोट  होते रहे.(D.N.Barola)




पंकज सिंह महर

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सुबह सास जी जब जंवाई  जी को चाय देने के लिए आई तो उन्हें एक सफ़ेद रुई के चेहरे वाला भयानक स्नोमैन दिखाई दिया. वह चिल्लाई और बेहोस हो गईं. जंवाई जी  भी डर के मारे कुंवे की तरफ नहाने को दौड़े, परन्तु उनके साले, साली व  ससुर ने उन्हें घेर लिया. उनकी पिटाई की नौबत आने को ही थी कि जंवाई जी  चिल्लाये - मैं तुम्हारा जंवाई हूँ. वस्तुस्थिति मालूम होने पर उन्हें स्नान करवाया गया. परन्तु ससुराल मैं  जंवाई राजा की जो फजीहत हुई वह कभी न  भूल पाए. गाँव वाले तो इस किस्से को सुन कर चटखारे लेते हुए कई  दिन तक हंसी के मारे  लोट पोट  होते रहे.(D.N.Barola)

ऎसी ही एक घटना पर शेर दा अनपढ ने भी कविता बनाई थी, जिसमें ज्यादा खाने से दामाद जी को दस्त लग जाते हैं।   बहुत अच्छे बड़ोला जी।

D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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Kaphal ( Myrica esculenta ) Pako - Meil ni chakkho
काफल पाक्को, मैल नि चाक्खो
 



     Kaphal  pakko, meil ni chakkho (Kaphal has ripened, but I have not yet tasted the same) is the pathetic explanation of a little girl who died of severe beating by her mother.  The story goes that once a Woman picked up Kaphals from the Kaphal tree. After toiling hard for the whole day, she could pick up a basket-full of Kaphals. At home she asked her daughter to look after the Kaphal basket and not to eat Kaphal. The little girl kept a strict vigil on the basket and slept for a while. When her mother reached home, she observed that the  basket of Kaphal has lost some weight. She suspected that the little girl must have eaten away the Kaphals. In fact she wanted to sell the Kaphals next day to cater to the daily needs of the house. But when she felt that the Kaphals were eaten away by her daughter, she gave her a severe beating. The girl was continuously crying and was saying that the she had not tasted the Kaphals. Due to excessive beating the girl died. It was the month of May. In fact due to the scorching heat of the summer the Kaphals had dried up, hence the basket full of Kaphals lost weight.  But in the afternoon there was a severe downpour and the Kaphals became juicy once again. The mother observed that the Kaphal basket had once again regained weight. Kaphals had become juicy due to rains. She repented, but the little girl had expired.She cried 'ke karoon pothi, utkai utkai' के करुँ पोथी, उत्कै उत्कै  After her death the girl took birth as a bird Magpie. After her birth as a Magpie the bird known as Kaphua in the local language, chatters, Kaphal Pakko, meil ni chakkho. People of the hills instinctively receive the pathetic message which the bird delivers through her above song and remember the little girl.


I was discussing this story with one of my friends Sri Ramesh Joshi of Mission Inter College, Ranikhet. He related another storey about Kaphal Pakko. He said that it was not this Kaphal which lost its weight. There is an specie of Kaphal called, Ghun Kaphal. This Ghun Kaphal loses its juicy content within a few hours. Thus the girl was asked to look after the Ghun Kaphal that was meant for distribution amongst the children of the house. The Ghun Kaphal lost weight after few hours and the girl was mercilessly beaten by her mother suspecting that she had eaten away some Ghun Kaphals. Since it rained in the evening, the Ghun Kaphal regained the juicy content. But there was nothing but repentance in store for the mother. The mother cried and said ' I utkai cheli I utkai'. आई उतकै चेली आई उतकै   It is the same quantity of Ghun Kaphal, which was before. The mother continue to repent, but there was no altlernative.The girl, after her death, thus sings Kaphal Pakko. Mail ni chakkho.


Ghun Kaphal

    Yet another story says that a young bride says to her mother-in-law: "O! My mother-in-law Kaphal has ripened. Burdened by the unending cycle of reaping, winnowing, sowing, weeding, wood cutting and fetching water from long distance, shall I ever have enough of leisure to taste Kaphals in the jungle while traversing the trail that leads to my mother's home?" So sang a Kumaoni bride ages back and trapped in a vicious circle of hard life when she lost her life untimely, she became a Magpie, a beautiful bird who, when the Kaphal ripens in Himalayan jungles in the month of May and June often sings, "Kaphal pakko, meil ni chakkho" (kaphal has ripened but I couldn't taste it yet). 

A small poem on Kaphal reads:
 
  The 'kaphal' fruit is ripe Come dear friend - Let us go to the forest To eat the fruit of the 'kaphal' bush   The leaves of the Oak tree have turned green   There is water in the roots of the Oak. Come, quench your thirst.

   A myth associated about Kaphal is that during the 14 year exile of Lord Rama, Sita tasted this fruit while in the forest. Since then Kaphal is also called the 'Gauri Phal'

     Kaphal finds an important place in the folk songs also. The famous Kumaoni song Beru Pako also is sung highlighting Kaphal. Bedu pakko barah masa narain Kaphal pakko chaita meri chhaila
बेडू पाको बारह मासा नरैन काफल पाको चैता मेरी छैला 

      Kaphal, Kafal or Kaiphal (Myrica Esculenta) is a sub-temperate moderate-sized ever green tree varying from 3 to 15 Metre from place to place is found throughout the mid-Himalayas, between heights of 900 metre to 2,100 metre above sea level. The tree yields a fruit of the cherry size are reddish or cheese coloured when ripe and is one of the tastiest wild fruits of the sub-Himalayan region. It is a wonder fruit with high medicinal value. The fruits are edible. They are considered pectoral, sedative, stomachic and carminative. They have pleasant sourish sweet taste and used in preparing refreshing drink. The fruits are eaten raw not only in India but in China, Japan and Europe as well. It is a small fruit with a bigger seed than the part that matters. You can eat it all day long (or till your tongue goes sore) as it does no harm and actually. Kaphal helps your digestive system. Kafal has male and female trees. Only Femal trees bear the Kafal fruit.

In Kumaon the fruit is famous with the name of Kafal. In sanskrit, it is called Katfal, in Hindi, Marathi and Gujarati it is known as Kayphal or Kaychhal, In Arabi, Anjari-Kandul and in Farsi, it is called Darashi Swan

     The bark of Kaphal is said to possess many medicinal properties. It is heat stimulating and useful in catarrhal fever, cough and in the affections of the throat. Oil prepared from it is dropped into ears. The small, seedy fruits are sweet, with a pleasant blend of acid. They are very attractive. The overall fruit quality is excellent. It normally yields 15 to 25 Kg. Kaphals per tree depending upon the size of the tree. The small seedy fruits of Kaphal are very much liked by all for their taste and juiciness. With the onset of summer, the Kaphal starts ripening and the villagers start picking the Kaphals from the forests and sell it in towns. Sometimes they have to face the wrath of the Forest Guards, who however normally lets them go in exchange for a pocket full of Kaphals. In the adjoining towns, the fruits easily sell @ 40 to 50 rupees a kg. Every year the fruit of this tree, worth thousands of rupees, is sold in towns. It is a good source of extra income for the villagers, which in peak season fetches 200 to 250 per day or so. The major problem in the case of this fruit is that the harvesting period is too long and fruits from a single tree have to be harvested in many pickings. However, this is the only cost involved in the case of this fruit as there are numerous trees bearing which are growing wild in the forests. This cost can, therefore, be overlooked. Yet another problem is that the harvest from the Kaphals tree is not the same every year. It is dependant upon good rains. If it rains at the time of ripening, the fruit becomes juicy but if it does not rain the juicy content is lost. In any case the Kaphal gives some sort of employment to the villagers at least for 2-3 months.The fruits, unfortunately, are not good keepers and their shelf-life does not exceed 2-3 days. As already mentioned under chemical composition, these fruits are fairly juicy and the percentage of extractable juice is about 40 per cent. The juice has a very attractive sparkling red colour. If the juice of Kaphal is prepared it would be an additional source of income for the people. Further it has medicinal properties especially in Ayurveda. Uttarakhand Government should make efforts to standardize a technique for its utilization.

 


     
To finish the article, I would like to relate an interesting story of a tourist about Kaphal sometimes jokingly narrated by the people. A tourist coming from the plains  asks   the Kaphal selling boy - Ye ka   phal hai? (What’s this fruit?)     ये का फल है ? The Kaphal seller boy said ye Kaphal hai. ये काफल है ? (This is Kaphal). He again put the same question, ye ka phal hai, the reply was again - ye kaphal hai. Humiliated tourist again asked strictly-Ye Ka Phal hai? The cool reply again was Ye Kaphal hai. Hot talks between the got converted in to a squabble. The matter ended when someone intervened and told the tourist that the name of this fruit is Kaphal and the tourist and the kaphal boy both started smiling.(D.N.Barola)

D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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लछिया कोठ्यारी के किस्से - 1(Lachhiya Kothar's stories-1)

लछिया कोठ्यारी  के किस्से पूरे इलाके मैं प्रसिद्ध हैं. (शायद यह एक काल्पनिक पात्र है) पुराने  समय मैं शाम को चौपाल मैं उसकी मूर्खता के किस्सों को चटकारे लेकर सूना व सुनाया जाता था.  उसके सात पुत्र थे. उनकी मूर्खता के किस्से भी प्रसिद्ध हैं. पुराने समय की बात है पहाड़ से लोग बैलगाडियों  के काफिले मैं जाड़ा प्रारंभ होते ही मय बिस्तर  व  साजो सामान के भाभर को प्रस्थान करते थे. बीच मैं कई पड़ाव होते थे. बैलों के पैरों मैं घंटियों की घुन घुन तथा लालटेन की रोशनी मैं बैलगाडियों के साथ पूरा काफिला बस्ती के नजदीक जंगल मैं  सुरक्षित स्थान तलाश कर रात्रि विश्राम किया करता था.

हमारी कहानी के नायक सातों भाइयोँ को उनके पिता ने भाभर जाने से पहले हिदायत दी थी की जहां भी रात्रि पड़ाव हो सातों भाई गिनती कर पुरी तरह आश्वस्त हो जाना की सातों के सात भाई साथ हैं. पहला पड़ाव आया. भाईयोँ ने गिनती  शुरू की, पर यह क्या गिनती मैं कुल छै भाई ही  निकले. दुसरे भाई  ने गिनती की  परन्तु नतीजा फिर वही  छै ही निकला. इस प्रकार सभी भाइयोँ ने गिनती की पर नतीजा वही निकला.सच बात यह थी की जो भी भाई गिनती करता वह अपने को नहीं गिनता था. अतः कुल ६ की  ही संख्या निकलती थी. सातों भाई दहाडें मार कर रोने लगे तथा एक भाई की मौत का गम मनाने लगे.परन्तु प्रश्न यह था की सातवां भाई जिसे वह मरा समझ रहे हैं, वह कौन था और वह कहाँ गया. उसकी लाश भी तो नहीं मिली.

इसी पशोपेश मैं रात गुज़री. उन्होंने अपने पिता को सन्देश भेजा. दुसरे दिन उनके पिता लछिया कोठ्यारी  उनके पास  पहुंचे.   भाईयोँ  ने रोना  धोना  शुरू  किया. लछिया  कोठ्यारी  ने उन्हें  डाटा    और     सबसे  बड़े भाई से फिर से गिनती  करने को कहा . गिनती  करने पर फिर 6 भाई ही  निकले. उन्होंने बारी बारी हर लड़के से गिनती करने को कहा. पर यह क्या गिनती मैं तो ६ ही  भाई पाये गए. क्योंकि गिनने  वाला  भाई खुद को नहीं गिनता  था. नतीजतन लछिया कोठ्यारी सहित सभी भाई विलाप करने और जोर जोर से रोने लगे.  परन्तु प्रश्न यह था की किस भाई की मौत हुई है. आखिर किसका किर्या कर्म किया जाय. महामूर्ख लछिया कोठ्यारी ने स्वयं लड़कों को गिनने की जहमत नहीं उठाई. यदि वह ऐसे करते तो महामूर्ख की पदवी से कैसे नवाजे जाते. (D.N.Barola)
 


dayal pandey/ दयाल पाण्डे

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Dayal Pandey

 

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