Author Topic: Articles By Shri D.N. Barola - श्री डी एन बड़ोला जी के लेख  (Read 141393 times)

D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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काग 0 -   सुणौ गरुड़ यसलग सोचॉ धै, पाकी पकाई पकवान देखि उसिके मुखम पाणि ऐजॉ। जो तुमुहॉ खाओ जै कै द्यलो खाणै चाला! जब चारक्ला बिना लूणक बिना गूड़क भोजन कस लागल?। तसै मैल विचार करो। भगवान तो कौणे रई माङ - माङ कै। तू त भगती माङ। के कौणौ सरग पतावल!
कागकि - 3 हा-    प्रभुकि किरप जो पाइ, खोजिन मिलि सुर साधु मुनि।
अविचइ   भगती   दीण  प्रभु,  वेद  पुराणन  गाइ ।। 13।।
           प्रभु  दयालु  रघुराइ,   सियावर राम चन्द्र की  जै।।
कागकि - 4 पाई - तस्सै हौल ! कुनी रघुनाथा। अमिरत बचन सुणी सुख सॉथा।
सब सुख खाण भगति लिछ मॉगी। तेजस को दुसरो बड़-भागी।।
प्रगट - काग -   तब मै थे श्री रामल कौ- आब् ते कणि मेरि माया नि सतालि, मै कणि भगत सदा पियार छन। भगति ज्ञान वैरागक ज्ञान तुकै हौल। मै, अब तिकणि आपण भजन करणक नेम बतानू।
आकाशवाणी वटी - 4 पाई  श्री राम रिकार्ड पर

इज - बाबुक च्याल् कदुक प्रकारा। हुॅनि गुण कामाक् तौ सब न्यारा।
जो इज - बापुक सुख दुःख जाणू। तनरै सुख अपणै सुख मानूॅ।।

बापुक भगत बचन मन करमा। स्वींणा जाणुन दुसरो धरमा।
तो च्यल बापुक प्राण समाना। किलकि नि हो तौ सब सुॅ अयाना।।
मै सब संसारक मै - बापा। सबम बरोबरि छा म्यरि छापा।

100 रठा - जड़ चेतन हो कोइ, बाल-बुढव नारी पुरुष।
      मै सूॅ तो प्रिय तौइ, कपट छाड़ि सतभाव भजॅु।।14।।
      नौणि न, पाणि विलोइ, सियावर राम चन्द्र की जै।।

14
श्री राम प्रगट भाषा में रिकार्ड - यो सारै संसार। जॉ जॉ तक जीव जॉ, और देखॅू, तौ सब म्यरी मायाक उपजाई छा। किड़ किरमव तुकणि जै देखण में औं। जे देखण में - नि ओन उस जीव लग छन। हे काग! मेरि माया मेरि छाया और मेरि दाया, सबु परि बराबरि छु। एक बात और समज।
   भूख - तीस - रीष - डाह - काम - प्रेम - परवार, सन्तान पालणक सब जीवों में बरोबरि ज्ञान छ।
   देव गंर्धव भूत प्रेतों कणि, अपण कर्म फल भोगण तकै कैं, सुख दुःख मिलुं।
(गरुड़ और काग मुनव हलोवाल्) यैक कारण मैं कणि मनख जून अति प्रिय छा। और उन मनखों में जो धरमक मारग पर चलूॅ। औरन कणि चलॉ, उनुमें लग जो बैरागी छन, फिर उन बैरागीन में जो ज्ञानी छन। उन ज्ञानिन में जो विज्ञानी छ। जो म्यरि प्रकृतिकि खोज करुॅ। में तक पुजणकि धा पर रौछ।
   तनु मजि, म्यर तन मन धनल जो म्यर भगत छ। सेवा और म्यरि भगति कणि दुसरन कणि द्यूॅछ उ अति प्रिय छा।
(काग मुनव हलोवल)
2 हा -    मैं हुॅणि भगत छ प्राण प्रिय, कोंनूॅ तैहुॅणि काग।
      आस भरोसो छोड़ि सब, सेवा पर मन लाग ।।15।।
      मैं भजुॅ तौ बड़ भाग लाग काग चरणक शरणम्।
(काग ओर सब सिर नवाल)
कागभुसुण्ड़ि - हे गरुड़ मैं कणि भलि समजैबेर फिर खेल करण लागीं।
गरुड़ - हे काग! सुणाओ के खेल करीं फिर, श्री राम ज्यूल? म्यर मन मै सुणण हुॅ आतुरि लैरै।
15
काग0- श्री राम  लुटपुट भाजण लागछीं, गुटुर - पुटुर - जाणि के के बुलाछीं। फिर एकाएक डाड़ हालण लांगी।
गरुड़- फिर तुमुल चुपाणैतै उनन कै खेल नि लगायो?

काग0- श्री राम ज्यूक रुण सुणिबेर - कौंशल्या ज्यू दौंड़नै आई। कूण लागी, अरे म्यर भाउ कैल मारौं? कि घुरिगो? कि भुख लैगे? पकड़ि बेर, च् च् च्! भुक लैगे भुक!  अरे भौकैं भुख लैरै!
काग0- राग ललित - तीनलाल - गायन या वार्ता मैं:-
   भौ की भाज भुका अब कैं छो।
मयड़ी भुकिं ली, गोदिम धरिंछो, ढकि ऑचल दूध पिवें छो।।भ0।।
झुलकै  कनम  उठै धरिं  नाचीं।  आंगण दौड़ी नचै छो।
उमत्ति रुण उमति खित हैसण,  शैलज  मति भरमै छो।।भ0।।
सुणौ गरुड़! यसि प्रभु की लीला, शारद कणि शरमें छो।।भोवा।।
काग0- 4 पाई
4 पाई0-    गुपुत भेद सब तुमइ बतायो। मैं जस हरि मायाल नचायो।
      राम किरप बिन गरुड़ गुसाई। रामकि महिमा जाणि नि जाई।।
का0 3 हा-   बिन गुरु हूॅन न ज्ञान, ज्ञान निहॅुन बैराग बिन।
      बिन हरि भगति न सुख मिलुॅछ,  कोंनी वेद पुराण।।16।।
सैजन मिलिं भगवान, सियावर राम चन्द्र की जैं।।
 4 पाई0-  कौछ न मैं कुछ जुगुति बणाई। भुगती जो मैं तुमॅन सुणाई।
      हे गरुड़ जी! ,हरि माया, सिसूॅणक पात। उल्ट सुल्ट द्वियै भॉत!
16





गरुड़ -  हे कागभुसुण्डि ज्यू। मै परि यो कस रोग लाग -ः
एक कहावत छः- दुःख लाग कै कणि। पीड़ है कै कणि ।

गरुड़- 4 पाई - शंका स्यापल मै चटकायो। दुखकि लहर उठि कुतरक वायो।
         कसि अणकसि भइ समजि न पायो। हरसिंग डॅस बिरसीङ उसायो।।
तुम जसि गारुड़ि दी, मै कागा! उतर सगल बिष भयॅु धन - भागा।
      ज्ञान - ध्यान सब तुमरै पासा। श्री रामक छा तुम प्रिय - दासा।।
गरुड़ काग थे प्रगट-
हे काग भुसुण्ड़ि ज्यू! तुम इच्छा धारी छा, जब जस चॉछा उस रुप
धरि सकॅछा, पर पर तुमैल यो काग देह कसि पै? यो तुमन यतु प्यॉरि
किलकि छु? यो कथा सुणाओं, मै कन बड़ों अचरज है रौ।
मैल शिव ज्युक मुखल सुणौ कि - पर्ल्लय हॅूण पर लग नाश निहॅुन- तुमर!
काग 0 गरुड़ थें-4 पाई -
   सुन्दर पवितर  तै  छ शरीरा  ।   ज्यैल  मजी  जैसकिं  रघुबीरा।
   कारण तन छोडुॅ न इछि मरणा। भजन, बिना तन होइ न सकना।।

      छुटि न जून यसि जनम न जायो। मैल गरुड़ घुमि घुमि करि पायो।
      पैलि मोह पड़ि जनम बिताणी। राम विमुख सुख सिति न पराणी।।
100 रठा -    कोंनू सुणौ खगेश, पैल  जनम  म्यर  कसिक  बित।
नाशणि सगल कलेश, उपजि पिरिति हरिचरण मजि।।17।।
   साखी उमा महेश, सियावर राम चन्द्र की जैै।।!
17
काग प्रगट में - हे गरुड़! तुमरि मति हुॅणि धन्य छ। तुमरि बात बड़ि प्यारी लैगे, मैकणि आपणि, सब जनमों कि सुद ऐगे। आब् तुम मन लगैबेर सुणिया।
      कदु जन्मोक पछा मैकन मनखी जून मिलि। वि में लै पैली बेर शूद्रक घर में म्यर जनम भय। सुणौं पेलिक तुमकणि शूद्रक भेद- समजानू-
पद - गायन
   गारुड़! शूद्रक भेद बतानू।
सुणो! अपण मन गुणौ सभा सब, तुमरी शंक मिसानू।।टेक।।
मुख बामण  छा  हाथ  छ  छेत्री,  पेटइॅ  बणिया   जाणौ।
खुट छन  शूद्र सगल तन बोकणिं। सरग नरग को धाणौ।।गरुड़।।
वाणिक कपट, कुभोजन  खाणी,  मुख  निछ  ब्रह्म समाना।
तसै  हाथ  सब  हूॅन  न  छेत्री,  कदुकै  हो    बलवाना।।गरुड़।।
जो  न  बरोबरि  करुॅ  तन   पोषण, वणियॉ  पेट छ रोगी।
जो  खुट  कुवटॉ  पड़ी  सनातन।  तैछ शूद्र - नर भोगी।।गरुड़।।
हे गरुड़! और लग सुणौ!:-
-: -
दुसरो गरुड़! सुणोंनू भेदा!
सृष्टिक   चारै   जात   बणाई,   विधिक   विधान  अछेदा।।टेक।।
पिण्ड़ल, पिण्ड पराण- सिजानी,   क्वे छन   अण्ड  पराणा।
भियॉ फोड़ि जनमनि फिर बियुॅ बणि, उद्भिज सृष्टि तु जाणा।।दुसरो।।
अन्न  फूल  फल,  सब  वन्सापति,  धरतिक  जनमण  भाई।
जो  पराणि  जीवक  तन   जनमी।   स्वेदज  वेद  बताई।। दुसरो0।।
बामण -  क्षेत्री  बणिया  शूद्रछ,  तन  मन  करम  भितेरा।
इनर  भेद  को  आरोपण  करि,  समजूॅ  वीछ     चितेरा।।दुसरो0।।

काग - तब म्यर नाम छी दुर्दंम्भि - जस्सै म्यर नाम, उस्सै गुण काम।।
18
   हे गरुड़! अब तुमुकें आपणि आघिल कथा सुणानू।
गरुड़ - सुणाओ! हम सब पंछी - जात सुणहुॅ भैटी छन।
काग भुशूण्ड़ि

2 हा -    भौते  पैलिक  आछ  जब,  कलिजुग  पापक मूल।
धरमकि इछि, नारि न पुरुष, अधरम की बगि कूल।।18।। जैल - जैल - हिलै करम की चूल, सियावर राम चन्द्र की ।। जै।।
      राग देश- में  सारे ग मे प ध नि सो, सा नि ध प मे ग रे सा।
सारे सा ग मे रे नि सा, या पकड़ - रेग रे सा, नि सा ध नि रे सा।

4 पाई-    तै कलिजुग कोंशल पुर  जनमा।  शुद्र बिचारुॅक मनखक जनमा।
      मातौ धन जोभन  बैचाली। चन्ट   बुदिध  हिरदी  अति  काली।।
      तौ कलि कालम भइॅ कस हाला। कस करिं कुबुधिल म्यरा बिहाला।
3 हा-
      लोभ हड़पि शुभ कर्म, भई लोग कसि भोग बस। टेक। लोभ ह0।।
      ज्ञानवान तुम गरुड़ सुणौ, कस भई तौ कलि धर्म ।।19।।
      जै कणि सुणि ऐं शर्म। सियावर राम चन्द्र की जै।।
4 पाई0-    मारनि गै वादनि धरि भूखी। मति गोपालुॅ कि कसि ख्वरि रुखी।
      नामक केशव, करम कसाई । लोभि धनाक् सब - धरम नशाई।।

गरुड़ - राम राम हे रामः- हे काग! मैकणि माता बताई जॉ, तब के राजल कैल के परबन्ध निकरों?
काग0-  करो किलै निकर, उनल गोंरु - बाछाक। ।। व्यौपार पर रोक लगै। ताकि गैज्यान कसाई थे बचाई आवो।
गरुड़:-    फिर के जो काम कसाइ्र करछी। उॅ खुद वी है लै
      निर्दई किलै है - हुॅनाल? यो तौ महॉ पाप है गो-
राजक् - राजा तै लै, मनख तैं लग। के सन्त महात्मा लग चुप बैठी रयी?
19
काग0-    सब गैरक्षा पर लगी छी, पर सब विवश हैगों छी।
      पापकि मार भारि हे गेछी। पुण्य छींण हुॅण, वीक कारण लोग
   कॉ गना हुॅछि कॉ डाम, धरणाकाम करण रछी। यो छी असल कारण। कलिकालल - राजा परजा सवों की मत्ति हरण करि हालि छी। और - सुणौ:-
4 पाई0-   पप - पुण्य मजि समछी ज्ञानी। ईष्वर जीव ही एक बतानी।
      सुरा पान बामण लगिं करणा। हूॅन न करम सुरा बिन बरणा।।
नामकि भगतिछ मान इॅ पाणा। अन्ध पधानक बीच छ काणा।
      फोकनि  छार  लगानी  अंगा। जोगिक भेख कुगुरु कै संगा।।

गरुड़ - य तै बड़ै अज्ञानता है गे, लोगों में। फिर के हौ अघिल? उ कलिकाल में।
काग0 - गरुड़ तुम समजदार छा, मैं सबौक सार सार सुणॉल। कलिकालाक हाल
सुणण में जनम बितजाल् मनखियक्।

100 रठा-   तुम सूॅ हम ठुल जाणि, अबुझ कुनी तब, बूझ हुॅणि। ।।टेक।।
      ऑख दिखानी ताणि, जाणॅू ब्रह्म सो बामण ।।20।।
         वी बड़ ब्रह्मक ज्ञानि, सियावर राम चन्द्र की जै।।
4 पाई 0-    गिरस्थि गरीब छलरु धनवाना। गरुड़! खेल कलि गणीन जाना।
      जैकौ पाखण्डॅुक  निछ  अन्ता। सब कौनी तै हुणि बड़ सन्ता।।

गरुड़ -    राम राम हरे राम ! संन्त लग हराण भई। संन्तान बिगड़िगे हुॅनलि? राजा तो प्रजाकन धर्म पर चलान्? राजा संन्तरी मंतरी लग धर्मक विपरीत है, गोछिया? सब हाल सुणाऔ।
1 -   बैसी - छमासी यैक उदाहरण लेइ जै सकनी, जागर लगूॅण लग यै रुप मै देखी जै सकॅू ।
20


काग 0- छनद -    च्यल मानछिं बापु इजा तबलै। मुख देखि निभै तिय को जब लै।।
         राज् पावि भई करिं धर्म न तौं। करनी नित तंग प्रजाकन ´ौं।।

      यस तंत्र रचो मलि बै तलि कैं। सब  लींछि  चुहेड़ि  तवै - पुर बै।
      नत देखुॅन क्वे नत क्वे सुणनॉ। छॅन - ऑखिक अंध, भई कलि ऑ।।
      धन  लोभ  बढौ  उनमें  उतुकै।  राज्  दीछि  पगार बड़ै जदुकै।।
      पर अन्त  भलौ  हुॅन ना तिनकौ। यस  जाणि पछी, लत छूटि न तौ।

      मिठि बाणि छुरी धरि धार लगै। दुनि मै इनरो अपणौ न सगै।।
गरुड़ - हे राम! हे शिवौ! बाड़ै खाण लागि उज्याड़। किलै बगि इनरि मत्ति गाड़।
      फिर लै निमारी कैल डाड़?
काग0-    क्याप्प कोंछाहा गरुड़! मुक मारमेर मै डाड़। मनमनें खनने रगै खाड़।।
      उनर भरी मै लधौड़, चैनाचुपाड़, गुल्पिया ड्यौड़।।
-: -
2 हा0-    सुणौ गरुड़ कलि कपट छल, इरिछा बैर जलेष।
      लोभ मोह अर भोग मद, छाई कलिक कलेष।।29।।
         दॅूनि न मिलुछ हरेष, सियावर राम चन्द्र की ।।जै।।
छनद
मिलॅु आदर नें सुकवीन कथें। अकवी, कविता मिलु मान उथै।
कलि सालक साल अकाल पड़ी। बिन अन्न दुःखी मरी लोग सड़ी

गुड़ तेलक सागक दाम बड़ी। मिलॅु अन्न न पाणि तराहि पड़ी
वरसूॅ जल के सुक घोर पड़ुॅ। अति बर्खल कैं भुमि भ्योल रडॅू।

आखें होने पर भी जो अन्धे हो जाते है।
कान से बहरे यहॉ हो गये। खाल उधेड़ कर जैसे वे भी नीचे से उपर तक का तंत्र हो गया।
21
चलनै निछि वेदक मारग क्वे। करनी कणि देखि सुणि उछि र्वे ।। रु्वे।।
   पुजि भूत - मसाण उॅना हरि कै। बड़ भक्ता छिया उई तौं दुनि में।।

3 हा0-    जग्य हम बरत तप दान। करनी तामस धरम नर।
      बरषॅू सरग, न धरणि पर। बोई जामिं न धान।।22।।
      हला! यै छन कनि परमान, सियावर राम चन्द्र की ।।जै।।
गरुड़ -    हे काग! बड़ि लामि उमर हुॅनलि के कलजुग में उनार तै अकाव झेलण बड़ो कष्ट कारी हुॅनल, हे राम! गरीबों कि रच्छा करो! भगतों की रच्छा करो। अथवा - धर्मे कि रक्षा पापक नाष करो।

काग0-   हे गरुड़! जीव की अपणै करम पिड़ानी जो समजण रई हम पाप करबेर लग मौज में छॉ। यों के पाप निकरणाय? बड़ा दुःखी छैं विचार! यो लग हमन देखि यसै करलात् मौज कराल्। पर बात कुछ और छ। जो उनरै करमाक् फल छन।
छनद
   बचणों कदु वर्षक पॉच - दषा। जुगलै निमरुॅ छु गुमनि यसा।
   सुख शान्ति दया मन सॅू निकसी। रिष रोष गुमान मजी रकसी।।

   छन जेवर सैणिन की झॅकरी। बुझनी निछ पेट की भूख मरी।
   मनख्ींण भई तन नें सगता। कदु जॉत कुजात भई मंगता।।

   धनहीनॅन थे ममता अति भै। लिन गै कस गोबर पुच्छीड़ रै।
   मनखी कलि काल बिहाल भई। करनी पर जार गई सनकी ।।
1- पाठान्तर:- करनी पर जार उॅ सन्कि गई।।
22
   करि बौल कमानि रुपें जदुका। लटकी सुरपी टटकै उदुका।।
   घर नानुॅ तिना घरवालि भुकी। मुन फोड़ि ल्युछा करुॅ परवार दुःखी।
   
   तन पालण को बस धर्म रयो। बुड़ - बाड़िक -इज बापुक पेट त घुत्ति गयो।
   भलमेंसि गई, सुविचार गया। कलिकालक हाल बिहाल गया।
   गरुड़ - कलिजुग के भलिबात निहुॅनि के? यो लग बताओ।
100 रठा-   धरि अवगुण द्वी चार, बड़ बिगाड़ मनखक हुॅछो।
   लागुॅ थ्वड़इ में पार,गुण कलिजुग का मौत छन।।
   जो भगतिक ल्यॅूछ सधार, सियावर राम चन्द्र की ।।जै।।
2 हा0-   
   सत जुम त्रेता द्वापर, हुॅनी जग्य जय जोग।
   कलिफल मिलनी कलि हरि- नामल पानी लोग।।24।।
      - सुख सम्पत्ति करि भोग, सियावर राम चन्द्र की।।जै।।
गरुड़-   हे काग ! जुगौक् लच्छण लग बताते जाओ न?

काग0-   हे गरुड़ महॉराज! जुगौक परमाण आपुकणि बतानू। एक जुग समयाक् चक्कराक अनुसार लाखों वर्षो कि आयु हैं। पर मनखाक मन पर यों दिनमान में चार बेर घूमते रौनी।
      तुम समझो! जे दिन भरि, सत कामों में लागी रओ उदिन वीक सत जुग में बितिगो। समझो।
      जो दिन कुछ भल कामों में कुछ नक काम है पड़ी यानी येक चौथाई दिन के कि बुराई में न्है गो, वि तुम त्रेता समझो।
      जैक दिन आदु आद भलाई और बुराई में जॉ उथै द्वापर समझो।
1- अंगूठे में जावे! मता पिता ये भाव है। बड़े बूढों पेट भाड़ में जावे।
23
      जो दिन, क्वेलग भलकाम निहॅुन समझो घोर कलजुग ऐगो। नतर एक चौथाई सत रौछ। कलजुग में लै धरती सन्तहीन निहुॅनि। तीन चौथाई झूट कपट ठगण घूस खोरी खुलि आम हौलि समझो कलजुगक लछण छन
गरुड़ -    कलिजुग बढॅु जब पापक मारा मनख जून कसि लागलि पारा। कस करि मनख सेज सुख पाला। सो उपाय बतलाव द्याल।।
काग0-
राग0 -    जय जय वन्ती - तर्त्र अनहित तारे प्रिया के हि थीन्दर।
   आ0/ अब- सा ध नि रे रे ग म प नि सां। सा नि ध प ध ग रे सा पकड़- रे ग रे सा नि सा ध नि रे। अवराहे नि म वर्जिव।
कलिजुग ज्ञान न जग्य न जोगा। करि हरि भजन सुखी हॅुनि लोगा।
सब भरौस पलिख्याड़ि सिय रामा। धरि हिय भगत भजॅू हरि नामा।
समयानुसार: हरिकीर्तन
जय राम श्री राम जय जय राम ।।टेक।। 108-1008 नाम जप।
3 हा0-   जो नर करुॅ विष्वास, कलिजुग जस जुग दुसर निछ।
      राम भजन करि मनख सब, करि संसा दुःख नाष।।25।।
         वी करि पाप हरास। सियावर राम चन्द्र की।।जै।।
4 पाइ्र0-कलिभजि ज्ञान न जग्य न जोगा। करि हरि भजन सुखी हुॅनि लोगा।
     सब भरौस पलि ख्यड़ि, सिय रामा। धरि हिय भगत भजूॅ हरि नामा।।
100रठा-    सॉच दया तप दान, चार चरण छन धर्म का।   
      दान करुॅ कल्यान, जसिक तसिक जदु करि सकॅू।।26।।

गरुड़ -    हे काग! जो गरीब छ, भूख मरन् छ, वी दान पुण्य के करि सकुॅ!? उलग बताओ।
          कसिक वीक कल्याण हौल!
24
काग0- हे गरूड़ गरीब हुॅजाक कदु कारण छन,
    दुर्व्यसन- बेइमानी, कामक-निउज्जीपन, कम काम करिबेर सकर धन कामंणक मन हुण जस चोरी चारी लुट पाट मार काट करिबेर धन हड़पाण, अपु ऐसे करण परिवारक भुक मरण आदि पाप कामोक हुंछ। गरीबीक उपाय लग, यदि िहरिभजन जथा लाभ तथा सन्तोष में परिवार लगी हो तो भगवान वीक रक्षा करनी, (कहावत हेगरूड़!उॅभरमत्त!दुसरैकैलैभरमानी, उनुकैक्वेनिफुरम्यातउॅ आफीमर्जीजानी)
  चौपाई-
दुरिछ लोभ कलि काल सुभावा, मामुत मोहल ज्ञान नशावा।
श्री रामकि मायाबलवपना, धिरमि धरनि ज्ञानिक लग ज्ञना।।


राम हिरदं धरि कॅरू सब कामा, मन-मति-गति गुण जपुँ सिय रामा,।
जुगक धरम तैकणि भरमानी, जैकी लोभ-मोह-मति सॅानी।।
      गरूड़! ध्यानल सुणो!
जस मदारी खेल दिखॅा वि दगडि ववीक जमूरा हुॅछ.
      आब तुम समजो वीक जो कला छ, जैहै हम जाददू करिहै, या दिखा कॅानु, याहमारि डीढ मुनण करण बतौनूॅ, वीक बाता कणि वीक जमूरा भलिकै जाणु, तसै तुम समजौ।
  श्री राम मदारी छन, उनरि जो जादूगरनी कि जादूगी छ।
  उ माया छ, उ माया कणि उनर भगत जो जमूरा छ उ भली भॅात जांनु।।
   राग देश-
चौपाई.झ नट श्रीराम कि नटनि छ माया, भगत जमूरा जाणु सुभाया।
        डीठ मुनण करि हैं कुॅनि लोगा, जाणन निकू खेलक तौ जोणा।।

दोहा-झ
      रामकि माया विकट बड़ि, मोहि छ तपसी ज्ञानी।
      भरमें मन इन्द्रिन कणि, दीछ करम मजि सॉनि ‘‘27‘‘
              लेग सुएानि भुलि जानि, सियावर रामचन्द्र की जै
25
हे गरूड ! श्री राम माया ल बडी सुख दिणी हजैं, जब ?
        भगताक विगडी काम लग सिध हैं जानी। आघिल सुण
           गरूड- बीच में-
  ळे का! त्ुमन हूॅ धन्य छन! त्ुमल हमर अन्यार् मन में
   उज्जवल करिहालौ। पर एक बात बताओ, लोग समजि
 बरे फिर उल्ट-सुल्ट काम के करला- ? या फिर सुबहौ जाल।
यो बाज मैं मनखियॅाक विषय मै पुछणयूॅ।
            हम प्शु पंछी किड पिटुड. तो अपणै करमोंल परवस
      छॅन। हम, पर-जीव भक्षी, आपसै में गजोइ गयूॅ। हमन्तें चौरासी
    लाख जून मै कॉ मनख जून धरिराखी।
           ळे काग! हम चौरासी में फसियै रैजौलं भयॉ।
                    काग भुशुण्डि-
 चौपाई- रामकि माया हइछ सुखाली। कारज सिद्धि विधनदिहं टाली।
        श्री रामकि माया को खेला। भोगण विष-फल, अमिरत-बेला।।
     
        सदा-भत हित, पापिन सादी। कैकजिखोलीछ कैकणि बादी।
        यो सब अनुभव अपण सुणाई। नाचूॅ कस मायाक नचाई।।
काक0 पद- राग. बागेश्री तीन तक-हे गरूड़
 
सब सुख साज समावनि रामा!
सुख-दुख, माया-मामुत, झंजट, छोड़ि भजनि जो रामक नामा।। टेक
शम्भु भजनि, भजि जैकणि, गौरी, हिरदिम इष्ट थपाई।
गरूड़! देबुॅका देव महेश्वर  जाणनि राम-रमाई  ।।सब0।।
देव दैत नर नाग विवचारन, जैकणि राम नचानी।
‘‘शैलजा‘‘ तनुॅकणि भाजि तेरी, मति किलकी पगलानी।।
अबतो समझ समझ मन मुरूखा। त्यर सुखसाज समाइल रामा।
सब सुख साज समावनि रामा। सुख दुःख‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘।।
26
गरूड़- श्री राम और श्रीराम कि माया हुॅणि प्रणाम छ।
        हे काग। आब् आघिनें काथ् सुणाओं।।

                   
                         काग भुसुण्डि-

            काग भुसुण्डि.गरूड़ थें- प्रकटः-
हे गरूड़! जा मेजास। उस समयाक पापि रैला वॉ भेल जै केहला!
तबै तो उसालों साल अयोध्या में लग, भारी अकाव पड़िगो।
    लोगूॅकि आपण टोपुलि दकणि धे हैंगे।
  तब मैं लग आपण नानतिनाक् तें, उधर-पधर, ठगि-ठागि बेर धरि, दूर परदेश उजैनी में गयूॅ।
              वॉ मैल मेहनत मजूरी करि-अपुॅ खै निखैं, परवार हैलै भेजने रैयूॅ। और कु बचत ले करने रयूॅ तब म्यर पास कुछ धन लै जाम् हैं गोछी। हे गरूड़--
       जतुकै मुखक बडौ मिठ छी मनक उतुकै तित छी।
       मनमनें इरिछा जलेशी सुभावा कणि क्वे भापि नि पॉछी म्यर।
       जैल मै सब काम सबुहै आपण निकाइ लिछि।
गरूड़- यै मजि भलि बात मैं अवगुण दिखैं नि भया यो बड़ि तिख पनै बात मै। पर तबलै यो बात कैन के जरूर दिखॉ है छो तो सुणाओं।

काग-
 चौपाई- जब कुछ सम्पत ले जुडाई । शम्भु भजन मन लेछ रमाई।
         बामण एक करछि शिव पूजा। और काम मकी तिन निछि सुजा।।

         साधु सुभावा बड़ै उपकारी। शिव-हरि भगत, समान बिचारी।
         अति भल देखि सुभावा। मैकन च्यल कसि जजाणि बुझाावा।
27
मै रोज शिव मंन्दिर मैं जप करछी। शिव हैवेर दुसर कणि बिल्कुल निमानन
हरि ब्रहमा आदि दृप्ताकि बड़ाई सुणि बेर मै कणि जलड. दहा उठछी।                                                                    बिष्णुदेखि मेकणि खारै लागछी। कुलक नीचव मतिक छीन।
वच्छ विचार मै हरि भगतों-दयाखि जइ मरछी।
यो सब जाणिबै मगुयल मैं कणि भौत समजा, मै उनार पिछाड़ि बुराई करण मै नि चुकॅुछी उॅ गुरूदेव मै भें कोछी---
             
चौपाई- एक राम छछन असरण सरणा। सब मुमण खानि भगति, ददुख हरणा।।
       शम्भु भजति सिय रामइ ताता। को कॅरू देवॅन की बाता।।

       शिव कन हरि की भगत बतायो। म्यर हिय जलड़ दहा पड़ि आयो।
       यस कुजाति मै विद्या पाई। बड़ू स्याप जस दूध पिवाई ।
हे गरूड़ ! मैं यस कुबुद्धि कुजाति छी , कि जो गुय म्यर सदा हित चाछी, ममै उनरि काट करछी।
     गुरू यो सब जानते हुये लग। यैक कसी भल हवो। यै सोचि बेर मैं कणि सॉच् बाट पर चलॉछी। जबकि बुद्धिवान लोग मेजास लोगों कि संगत छाड़ि बुलाणैं निचान।। में पर लागण ििनचान।। कै यैक अवगुण हमु पर नि ऐं जों, कैं यैक अशुद्ध अशोच शरीराक किठाणु, यैक अशुद्ध विचार रूपी रेग फैलण निपावों।
    हे गरूड़ ! एक दिन मैं शिवज्यूक ध्यान में मगन छी मगर गुरू ऐगई योे बोध है गोछी मैल उठि बेर उनॅन प्रणाम निकर।
28
गुरू जीक न मै लग यस के भाव निछि.
   मैक ध्यान ममें दोखे सायद उनल लै यो के विचार निकट। पर शिव अन्तयार्मी जाणि गइ
   गुस्स में मै कन शराप दि दे। तब आकाष वाणी हैं गे।
4 पाई -    ओरे! मुरुख अंध अभिमानी। कपटी त्विल गुरु महिमा न जाणी।
      जब की त्यर गुरु मन न कुरोधा। अति द्यालु गुरु सम चित बोधा।।

   भैटि रयै अजगर जस पापी। होलैसरप कुमति कै च्यापी।
   जनम हजार नरक सड़ि जाकै। अपण कुकरणिक तू फल पालै।।

3 हा0-   सुणौ विखट षिव शाप, करनी हा हा कार गुरु।
      देखौ कॉपन गुरुल मै, दुखित भई तब आपु।।28।।
         कसिक कटनि त्यर पाप! सियावर राम चन्द्र की ।।जै।।
100 रठा -    करनी डण्ड प्रणाम, षिव सनमुख हाथन जोड़ि,
   गुरु दयालु, जस नाम, समजि कुगति म्यरि विनति करि।।29।।
      षिव! द्रिणि रति मति काम, सियावर राम चन्द्र की ।।जै।।
हे गरुड़! तब गुरु दयालुल, रुद्र कणि यो अइवाड़ि चढै,
      अस्तुति करी। मंतर रुप में - लग यो मनखों दुख
भुजंगप्रयातम् - हरणी छा।
29
पैली उपांषु मंत्र जाप करते हुये यो, भुजंग प्रथातम्
हाथ जोड़ि - तर्ज -शरण में सदा षिव के आये हुये हैं। करो नाथ रक्षा सताये हुये हैं।
उपांष मंत्र-       ऊॅ नमो, नमो! गुरु को आदेषा,
उपांषु    त्रिलोकी को डीठो धर्नी महेषा!।।
पाठ - नमस्कार शम्भू सदा मोक्ष मूलम्।
      तुमें वेद ब्रह्नमा,तुमें शान्त रुपम्।
   निराकार साकार ओम्कार रुपम्,
      महॉकाष वासम् बिनाषम्-त्रिषूलम्।।1।।
   अपॅू आप रुपी महॉदेव शम्भू। न भावो न भक्ति, जयूं नित्त शम्भू।

   बडै़ बिक्कराल्छा, महॉकाल भारी।
      तुमें तीन कालौक बन्धॉक हारी।।2।।
   सुकीलों हिंवालक् जसो छा शरीरा।
      कदू कोटि सूर्जोक ज्योति गॅभीरा।
   षिरोमथ्थि छाजीं जगत्मात गंगा।
      दुतीया - दुतीया कि चान्ना छजीं बाई अंगा।।3।।

   हलन् कुन्डला भौह ऑखी सुछाजीं।
      हॅसन् मुक्ख का नील कंठी बिराजीं।
   लपेटी छ बागम्बरी छाल न्यारी।
      जयूॅ नाम मैं नित्त कल्याण कारी।।4।।
   तुमें तीन लोकौक संहार कारी।
      रटॅू मै सदा शाम्ब शम्भू पुरारी
   कला सोल पूरण छन्यारै सरुपम्।
      सदा शान्त शम्भो छिमाषील रुपम्!!5।।
1-    वाक् - अम्बर ही जिनका वस्म- छाल आवरण - न्यारी विषेष है।
   यहॉ कही व्याध्र चर्म से अर्थ नहीं हैं।जो गलत किया हैं। जो उनके पशु पति होने को अर्थ का समूह विनाष करता है अर्थ लेना ठीक नहीं।
30
   करीकल्प को अन्त रौद्रावतारी।
      सदा सज्जनों का प्रभो मान धारी।
   तुमें सच्चिदानंन्द, मोहा विनाषी।
      महादेव रक्षा करो काषि वासी।।6।।
   भजॅू जोन गौरी पती भाव भीजी।
      नशौलोक पर्ल्लोक् करी पुण्य छीजीं।
   न ऊ हौं सुखी वीक संन्ताप नाषीं
      प्रषन्न प्रभो यैक् हरौ दुःक्ख राषी।।7।।
   न जाणू जपो जोग पूजा न भक्ति।
      नमस्कार शम्भू! नमस्कार शक्तिः।
   दुखी,यौक, दुक्ख प्रभु ताप भारी।
      करो रच्छ्य शम्भू कृपा डीठि मारी।।8।।
उपांषु भाव में हाथ जोड़ि बेर -
क्षेपक प्रसंग:-
   म्यरी छा य भक्ति गुरु की छ शक्ति।
         गई मत्ति फेरी, पड़ी आन तेरी।
   शब्द सॉचा पिण्ड़ काचा।
         सत्फुरो मंत्र इष्वरो वाचा।।
   ऊॅ ऊॅ ओम्कार सत्त नाम हरि ओम तत्सत्।।
-: -
श्लोका -    अठवाड़ी रुद्र भक्तिमा, जपला,तीर गंग-या-।
      शिवालया कि घर माजी, रक्तै व्यालकि सन्दिमा।।1।।
      भूत - बात सबै दोषा - छाया दुष्टकि- ऑखि की।
      निशंक नााषिला सब्वै, सो वेर सिद्व लै करी।।2।।
      नौ वेर भक्ति भावैल रोखाई करि रोगि की।
      साखी सदा षिव ज्यू छन, माजीं दोष सवै लगी।।3।।
-: -
   इति श्री विष्णु दत्त जोषी शैलज रचित रुद्राउठवाड़ी स्तोत्र काग-भुसुण्डि थापोछार मंत्र पुरो भययै।।
31
तिसरो दिन

Devbhoomi,Uttarakhand

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WOW GRATE SIR AND CONGRATULATION TO YOU

D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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                                             कुमाऊं   की वीरांगना जिया रानी

   कुमाऊं मैं कत्यूरी राजाओं का लम्बा इतिहास है  कुमाऊं मैं कई स्थानों मैं कत्यूरी राजा पूजे भी जाते हैं.  जिया रानी कत्यूरी वंश की लोकप्रिय रानी थी.
कुछ लोग कहते हैं की जिया मालव नरेश की पुत्री थी. उसकी माँ किसी पर्वतीय राजवंश की बेटी थी.  कुछ कहते हैं कि जिया मांडलिक राजा की
पुत्री थी. वैसे जिया खाती वंश की बताई जाती है.  खाती कुमाऊं के जुझारू राजपूत थे.  यह भी कहा गया है की जिया गढ़वाल के राजा अमरदेव
पुंडीर की संतान थी. जिया का नाम मौला भी बताया गया है. वह कुशाग्र बुद्धि व स्वाभिमानी कन्या थी तथा शास्त्र और शास्त्र  मैं निपुण थी. 
पिथोराशाही के राजा पृथ्वी पाल  की दूसरी रानी थी. कुछ कहते हैं की वह आठवी  रानी थी. पृथ्वीपाल बूढ़े थे.  जिया के पुत्र धामदेव का जन्म चित्रेश्वर
महादेव की मनौती से माना जाता है. ब्रह्मदेव को सौतेला भी बताया गया है.  जिया स्वयं भी निर्णय लेती थी.  गौलाघाट मैं जिया ने बाग लगवाया .  इस कारण उसका नाम  रानीबाग 
पड़ा.  जब जिया की प्रथ्वीपाल से अनबन हुई तो जिया गौलाघाट चली गई.

यह स्थान टनकपुर नैनीताल मार्ग पर गौला नदी के किनारे है.  कहा जाता है की यहाँ मार्कंडेय ऋषि (बागेश्वर वाले) का शीतकालीन आश्रम था. चित्रेश्वर महादेव उन्हीं ने बनाया था.  यहीं पर शार्दुल ऋषि की गुफा है.  जियारानी इसी गुफा मैं चिंतन मनन अराधना  करती थी.   यह घटनायें १४०० ईस्बी के आसपास की हैं.  जियारानी एक वीरांगना थी.  कत्युरी इतिहास मैं उनका बड़ा मान सम्मान है.
कुमाऊं के राजपूतों को जियारानी पर बड़ा गर्व है.  जिया अब भी उनकी अधिश्ठा थी.  कुलदेवी है.  अन्यत्र बसे राजपूत अभी भी जागरों के समय गाँव पहुचते है. पूजा मैं शामिल होते हैं तथा अपना हिस्सा भेजते हैं.

गर्मियों मैं जियारानी गौलाघाट पर मुक्त स्नान करती थी. उसके रूप की चर्चा चारों थी. यह चर्चा रूहेलखंड के सरदार तक पहुंची.  तुर्क एक बड़ी सेना लेकर कुमाऊं की ओर चल पडा. उसने पहला हमला रानीबाग पर किया. रानी व उसकी फौज ने तुर्कों का डट कर मुकाबला  किया. इस युद्ध मैं इस युद्ध मैं तुर्क भाग खड़े हुवे.  जीत की ख़ुशी मैं सतर्कता कम हो गई.  तुर्कों ने फिर आक्रमण किया.  इस बार चारों तरफ से आक्रमण किया. रानी के वीर सिपाहसलार मारे गए. स्वयं रानी भी लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुई.  कहते हैं की पहली विजय खेरिदास की चतुराई से मिली. उसे गुरु मान लिया गया. इसीलिए जागरों मैं जय जिया के साथ जय गुरु-जय गुरु के स्वर गूंजते हैं.
डगारिये  (नाचने वाले) उन्हें मान देते हैं.  जागरों मैं खोइये (पहरुए) वस्त्र इनाम मैं देते हैं. रानी की शरीर तुर्कों के हाथ नहीं आया जियारानी ने अपनी अस्मत व कुमाऊं के लिए बलिदान दिया.



एक जनश्रुति है. जिया ने नहा कर अपना लहंगा गौला नदी के किनारे स्थित चौरस पत्थर पर सूखने को फैलाया. उस पर बेशकीमती हीरे मोती जड़े थे  जिया के निधन के बाद लालची तुर्कों ने उसे उठाना चाहा. वह भी पत्थर हो गया.  आज भी बेल बूटेदार  लहंगा पत्थर पर चित्रित है. उसे चित्रशिला कहते हैं. इसी नाम से हाय स्थान कत्यूरियों   का पावन तीर्थ है. उत्तरायनी  (मकर संक्रांति) की पूर्व रात्रि को यहाँ जागर होती है. जिया ओर उसके मुंडे लोगों के शरीर मैं अवतरित होते हैं, नाचते हैं, गिले शिकवे दूर करते हैं.  मनौतियाँ पूरी करते हैं. आशीषें देते हैं. (D.N.Barola)

पंकज सिंह महर

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                                            कुमाऊं   की वीरांगना जिया रानी

  कुमाऊं मैं कत्यूरी राजाओं का लम्बा इतिहास है  कुमाऊं मैं कई स्थानों मैं कत्यूरी राजा पूजे भी जाते हैं.  जिया रानी कत्यूरी वंश की लोकप्रिय रानी थी.
कुछ लोग कहते हैं की जिया मालव नरेश की पुत्री थी. उसकी माँ किसी पर्वतीय राजवंश की बेटी थी.  कुछ कहते हैं कि जिया मांडलिक राजा की
पुत्री थी. वैसे जिया खाती वंश की बताई जाती है.  खाती कुमाऊं के जुझारू राजपूत थे.  यह भी कहा गया है की जिया गढ़वाल के राजा अमरदेव
पुंडीर की संतान थी.

dhanyavaad badola ji, is amulya jankari ke liye.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Priyanka frequently visits Haidakhan baba temple.

Exclusive photographs of  famous Bollywood Actress Priyanka Chopra, who had come to Baba Herakhan Temple Trust, Ranikhet on a 3 day sojourn. She participated in Navratra celebrations and Jagdamba Mahayagya. Some of her photographs of her private life, specially with children. - D.N.Barola

Priyanka participating in the Aarti


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sir, ... I become very nostalgic when i see the photos of Ranikhet. I have also spent there some and found the very peaceful. Really words fail to me to describe about the Ranikhet.

This is the very interesting information you have provided about the Ranikhet Club. 

Ranikhet Club, Ranikhet


Old Building of Ranikhet Club before 1987 Fire.

     Some hundred and fifty years ago a lone Englishman chanced upon a rhododendron hill  at Ranikhet, and spotted a lovely place. He set up a hill station. British loved the Club culture. A Club, the Ranikhet Club, a sprawling arcaded structure with a fine wood spring dance floor and a well-stocked bar, overhanging trophies of man-eating tigers came up in the gently curving Mall Road on the highest ridge. Sprawling over lush well manicured lawns the low height, conical roofed cottages constituted the Ranikhet Club. Thus Ranikhet Club was established as a European Club in 1868. However during the British era there were a few Indian members.   Ranikhet Club, it is said, used to be the abode of Queen Padmini , queen of Raja Sudhardev. Impressed with this celestial land that is blessed with God’s grace, she built a beautiful palace for her residence at Ranikhet. Outside the Clubhouse are the fascinating remnants of the Queen's residence. Scattered stone walls with arched openings are mostly what remain of it today.

    After independence the Club was being sold by the owners to a private party. Dr. Lt. Col. Frederic Noel Barwell, Bar-at-law, who was a permanent member of the Club filed a suit against the above sale in Allahabad High Court and won the case. Thus he became the saviour of the Club. Since then it has been functioning as a Civilian Club.

Dr.Lt.Col F.N.Barwell

 The Officers of the Army are also the Members of the Club. The strict rules for admission to the Club restricted its Membership to a few civil members. There were loud protests against this. The admission to the Club used to be held by putting Boxes in the Club premises which used to contain white-balls and black-balls. In order to get the admission into the Club, it was necessary that the member-candidate is not black-balled by any member entitled to exercise the right to vote. One black ball used to neutralize 7 white-balls.  The boxes used to be kept open for voting for a month.  Thus new entrants were hardly able to get admission into the Club. The civil candidates who aspired to become the Members of the Club protested against this. Sensing the mood of the people, the General Body decided to withdraw this method and vested the grant of membership to the Managing Committee. The Managing Committee in its wisdom granted membership to the civilian gentleman by a majority vote.

      The President of the Club used to be elected by the Annual General Body. The civil members invariably used to propose the name of the Commandant of the Kumaon Regimental Centre as the President. This was a healthy convention which was instrumental in establishing excellent rapport and relation ship between the civil and army. There has been a change in this. Now the Commandant of the KRC is the ex-officio President of the Club.
 
    In July, 1987, Ranikhet Club was engulfed by a devastating fire. The Office, Bar room, Dance Hall, Library etc. all were burnt. There was partial damage to the Lounge, Billiard room etc. Immediately after the Fire an Emergency General Body meeting was held, which had the uphill task of rebuilding the Club from almost a scrap. The General Body after due deliberations felt that in order to attract aid and donations etc, it was necessary that the Club be registered under the Societies Act 1860. After obtaining legal advice a Constitution Framing Committee was formed by the General Body. Sri D.N.Barola (Convener) and Sri B.S. Mehrotra, Sri Jagdish Chandra Pant, Advocate and Sri Chandan Singh Rautela, Advocate were the Members of the Constitution Framing Committee. The new Constitution was framed by recasting the prevailing old Constitution. Since the Army Members had discontinued its Membership of the Club prior to the Fire, a new provision of Block Membership was incorporated in the Constitution to facilitate the return of the Army Members into the Club. Special gestures were incorporated in the Club Constitution and it was provided that the provision of Screening, Interview, Admission fee, Donations etc. shall not be applicable in the case of Commissioned Officers of the Army and the Officers of the Civil in case they join the Club en-block. Not only that reduced Membership subscription was provided in case of Army Officers. It was also provided that such Members shall enjoy the Club Membership for the duration of their stay in Almora District. Thus the Constitution was passed by the General Body and was sent to the Registrar, Societies, Haldwani with the signatures of nine members, viz. S/Sri G.S. Mahara (President), D.N.Barola, Kashmiri Lal, Y.C. Joshi, A.K.Goel, Atul Kumar, J.C.Pant, B.S. Mehrotra and S.L. Goel. The Club was registered with the Registrar, Societies, Haldwani in January, 1989. Thus Ranikhet Club became a legal entity.
 
     In the meanwhile the Members contributed for the construction of the Club and with the donation and the Fire Insurance Claim money, the Bar, Office, Billiard room, Lounge etc. all were made habitable. During this period all the Members made it a point to visit the Club every evening without fail.  In order to raise the income of the Club four rooms were also constructed which boosted up the income of the Club considerably and the Club started running smoothly. The Members of the Army also joined the Club and Brig. B.C. Khanduri was elected as the President of the Club. Still more was required to be done. The Club needed finances to re-build the Bar-room, Dance Hall etc. The four rooms were leased out a private party, with the condition that the lessee would be construct the Club premises. The lessee constructed a large part of the Club and the renovated Ranikhet Club was thrown open to its members from Ist January, 2000. It was formally inaugurated  by it’s the then President Brig. Rajeshwar Singh VSM The four room Hotel also was thrown open to the public. It was also provided that any person staying in the Hotel would automatically become a Member of the Club, for the duration of his stay in the Hotel rooms of Ranikhet Club. This democratization, it is said was necessary to boost up the income of the lessee. Presently apart from the Members of the Army, the civil membership goes well above 120, whereas there are about 75 Members from the Army who enjoy the Club Membership for the duration of their stay at Ranikhet.


 
               Renovated building of Ranikhet Club

    Ranikhet Club is affiliated to nine reputed Clubs of India. The Club has reciprocal arrangements with Boat House Club, Nainital; Bareilly Club, Bareilly; Wheelers Club, Meerut; Mohmed Bagh Club, Lucknow; Dehradun Club, Dehradun; Dharwar Gymkhana Club, Dharwar; Arun Vihar Institute (Club); Noida, Umed Club, Judhpour and Jaiselmer Club, Jaiselmer.
 
    Ranikhet Club also boasts of Asia’s largest natural Golf Link. At the time of transfer of the Golf Link to the Kumaon Regimental Centre, it was resolved that the Members of Ranikhet Club would become the Members of the Golf Course, if they apply for the same. Now it is understood that Membership to the Golf Link has been restricted.
I had an occasion to talk to few senior Office-bearers of the Club, Dr. D.S. Bangari, who was a House Member (now designated as Hony. Secretary) of the Club for several years as also to Mr. Y.C. Joshi, who used to be Treasurer of the Club for nearly 30 years. I myself also had the privilege of serving the Club as a House Member (Hony.Secy.) of the Club for several years. I could gather lot of information from them on the matter. I would still love to receive suggestions to update this Blog.
   


Bahadur Singh, an old employee of Ranikhet Club

    Before finishing this article, I would like to make a mention of a young old man of 88 years, who has served the Club for more than 76 years. Bahadur Singh born in 1920 joined the Club as its employee in 1932. Now in 2008, he is still serving the Club. His wife expired some six months back. He has two sons. He has been a witness to the heydays as also to the difficult times which the Club had to face. Now his last wish is: ‘I was born in the Club and joined to serve it at the age of 12 and now I want to die in the Club itself, serving the Members of the Club. (D.N.Barola)
 


D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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With magnet on her hand, a woman looks for nails, which she would sell in the market, thus would earn some money for her livelihood.



D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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Cat under the shadow of umbrella.

D.N.Barola / डी एन बड़ोला

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Barn Swallow (Bird) on live electric wires.


You come to Sadar Bazar, at Himalaya Hotel, Ranikhet sharp at 7.00 PM and you will find thousands of beautiful birds known as Barn Swallow hovering over the Electric lines and within minutes you will find the entire bunch of electric wires studded with Barn Swallow. This has become a tourist attraction.   The speed of the birds is so electrifying that if you reach a few minutes latter you will miss the fantastic scene of the hovering and ultimately getting seated on the electric lines, in a grand queue. The electric poles have 5 lines and in each line the birds get seated in a disciplined queue. There are Telephone lines as well in the vicinity and you will find the birds sitting on these lines also. They are spread over at least in 100 meter area.  The birds fly away exactly at 5.0 AM. This is the daily routine of these birds. They make Ranikhet their habitat in Mid May and leave Ranikhet after nearly six months. These birds fly with fantastic speed, with open mouth and they devour insects which are caught while flying.



Barn Swallow (Hirundo rustica) is the most wide spread species of swallow in the world. A distinctive passerine bird with blue upperparts, a long, deeply forked tail and curved, pointed wings. It is found in Europe, Asia, Africa and the Americas. In Anglophone Europe it is just called the Swallow. In Northern Europe it is the only common species called a ‘swallow’ rather than a ‘martin’.


 

The Barn Swallow is a bird of open country which normally uses man-made structures to breed and consequently has spread with human expansion. It builds a cup nest from mud pellets in barns or similar structures and feeds on insects caught in flight. This species lives in close association with humans, and its insect-eating habits mean that it is tolerated by man; this acceptance was reinforced in the past by superstitions regarding the bird and its nest. There are frequent cultural references to the Barn Swallow in literary and religious works due to both its living in close proximity to humans and its conspicuous annual migration. The Barn Swallow is the national bird of Estonia.
But law of nature is survival of the fittest. A hawk sitting on a far of Tree, did fly at a tremendous speed pounced upon a Barn Swallow and made it her easy prey. This happened in spite of the fact that the Barn Swallows were in a group of thousands.(D.N.Barola)

 

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

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Dear Badola Sir.

Thanks a ton for posting these beautiful photos of Birds..

It is really interesting to see these birds sitting on hire in a very disciplined way. I am sure people must be appreciating this.

God bless you sir.


You come to Sadar Bazar, at Himalaya Hotel, Ranikhet sharp at 7.00 PM and you will find beautiful birds known as Barn Swallow hovering over the Electric lines and within minutes you will find the entire bunch of electric wires studded with Barn Swallow. This has become a tourist attraction.   The speed of the birds is so electrifying that if you reach a few minutes latter you will miss the fantastic scene of the hovering and ultimately getting seated on the electric lines, in a grand queue. The electric poles have 5 lines and in each line the birds get seated in a disciplined queue. There are Telephone lines as well in the vicinity and you will find the birds sitting on these lines also. They are spread over at least in 100 meter area.  The birds fly away exactly at 5.0 AM. This is the daily routine of these birds. They make Ranikhet their habitat in Mid May and leave Ranikhet after nearly six months. These birds fly with fantastic speed, with open mouth and they devour insects which are caught while flying.



Barn Swallow (Hirundo rustica) is the most wide spread species of swallow in the world. A distinctive passerine bird with blue upperparts, a long, deeply forked tail and curved, pointed wings. It is found in Europe, Asia, Africa and the Americas. In Anglophone Europe it is just called the Swallow. In Northern Europe it is the only common species called a ‘swallow’ rather than a ‘martin’.


 

The Barn Swallow is a bird of open country which normally uses man-made structures to breed and consequently has spread with human expansion. It builds a cup nest from mud pellets in barns or similar structures and feeds on insects caught in flight. This species lives in close association with humans, and its insect-eating habits mean that it is tolerated by man; this acceptance was reinforced in the past by superstitions regarding the bird and its nest. There are frequent cultural references to the Barn Swallow in literary and religious works due to both its living in close proximity to humans and its conspicuous annual migration. The Barn Swallow is the national bird of Estonia.(D.N.Barola)

 


 

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