Author Topic: Articles By Shri Pooran Chandra Kandpal :श्री पूरन चन्द कांडपाल जी के लेख  (Read 51714 times)

Pooran Chandra Kandpal

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Dear Kukreti ji, uttrakhand mein kumauni and garhwali bhashaon ki
abhi tak bhasha parishad nahi hai aur bhasha academy bhi nahi hai.
Rajniti wale vote mangne ke samay hi kumauni or garhwali bolte hain.
Baad mein we eng or hindi bolte hain.  Uttrakhand mein Kumauni and
Garhwali class vi se viii tak sanskrit ki tarah eak bhasha ke taur
par sikhayi jani chahiye.  Kurshi mein baithe log kahte hain 'achchhi
salah hai. is par sonchenge.  fir baad mein koi nahi sochta. ek sawal
seedha hai "yadi hamein Kumaouni aur Garhwali bolni -likhni nahi aati
to hamare paas kya hai jisse ham kah saken ki ham Uttrakhandi hain.
pooran chandra kandpal. (do kumauni kitabon ' ukao-horao' and
'bhal karau chyala tweel" ka lekhak)

Pooran Chandra Kandpal

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चारू जी जनपक्ष १६-३१ दिस  २००९ के अंक में दाता राम चमोली के कुम्भ  के बारे में
बेवाक टिपण्णी  बहुत अच्छी लगी. यह बात कोई नहीं सोच रहा कि आम उत्तराखंडी
या आम जन को इस कुम्भ से क्या मिला?  प्रिंट मीडिया वाले कहते हैं कि कुम्भ
स्नान से अमुक पुण्य मिलता है, पाप कट जायेगा, मोक्ष मिलेगा, सीधे स्वर्ग जायेगा
जैसी बातें जनसाधारण को भ्रमित करती हैं.  कुम्भ स्नान से वापस आने वाले किसी
भी व्यक्ति से मिलिए वह बताता है किस तरह जगह जगह पर उसे ठगा गया.  पाप
कटे या नहीं यह किसने देखा परन्तु जेब कटी वह भी धर्म और पूजा अर्चना के
नाम पर.  वहां चीलम भी खूब बिकी और पौवे, अद्धों, और बोतल तो एक आम बात
थी. यह बात भी चमोली ने ठीक लिखी है कि कमाई रुपी अमृत कोई और पी
गया और जनसाधारण के लिए विष छूट गया. पूरन चन्द्र कांडपाल. १३.०२.२०१०

Pooran Chandra Kandpal

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मित्रो , जनवरी २००७ में मेरी किताब "उत्तराखंड एक दर्पण" में मैंने लिखा है 'उत्तरांचल में रेल का सपना'.
इस मुद्दे को में उत्तरांचल पत्रिका, राष्ट्रीय सहारा, प्यारा उत्तराखंड आदि पत्र-पत्रिकाओं में भी उठा चुका
हूँ.  यदि उत्तराखंड की जनता मुह खोलने का साहस जुटा सके तो शायद कभी कोई भगीरथ
उत्तराखंड में रेलमार्ग रूपी भागीरथी को रह दिखा सकता है. वर्ष १९९४ के आन्दोलन जैसी एकता
दिखानी पड़ेगी तभी दिल्ली के तख़्त तक आवाज पहुंचेगी . आजादी के ६३ वर्ष बीतने के बाद
भी किसी ने रेल के बारे में uttrakhandiyon की आवाज नहीं सुनी.  सबने सब्जबाग दिखाए और
झूठे आश्वासन दिए. सीमान्त प्रदेश होने की वजह से भी प्राथमिकता नहीं दी. इस बात को भी
अनदेखा कर दिया की चीन ने उसपार से बोर्डर तक रेल लाइन बिछा दी है. अब तो आखें
खुलनी चाहिए.  पूरन चन्द्र कांडपाल.  १५.०२.२०१०

Pooran Chandra Kandpal

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      ' कुमाउनी गीत गंगा ' 
     कुमाउनी भाषा में एक कवि सम्मलेन का आयोजन २१ फ़रवरी २०१०  को हरदेवपुरी
     दिल्ली में कूर्माचल समाज की ऑर से किया गया. इस सम्मलेन में कुमाउनी मूल के
     कई कवि आये थे.  समाज के प्रधान श्री गिरीश मठपाल और महासचिव श्री चंद्रमणि
     चन्दन का इस सम्मलेन में अच्छा समन्वयन रहा.  कुमाउनी बोली भाषा को पुष्पित
     पल्लवित करने का यह एक अच्छा प्रयास था.  इस कवि सम्मलेन में सर्वश्री डा. उप्रेती,
     आचार्य फुलोरिया, गौर जी, दयाल पाण्डेय, नीरज बवारी, चन्दन, चारू दा और मैंने कविता
      पुष्प चढ़ाये. कुमाउनी भाषा को जीवित रखने के प्रयास के लिए डा. जी डी भट ने
      कूर्मांचल समाज को धन्यवाद दिया.  पूरन चन्द्र कांडपाल.

Pooran Chandra Kandpal

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                      १२६ वर्ष से हो रही है उत्तराखंड में रेल सर्वे 

 सीमान्त पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में १८८४ में काठगोदाम अंतिम रेलवे स्टेशन बना था.
  तब से १२६ वर्ष हो गए हैं और देश को आजाद हुए ६३ वर्ष हो गए हैं.  राज्य की जनता
 और कलमकार लगातार रेल के लिए पुकार लगाते रहे क्योंकि उत्तराखंड एक सीमावर्ती
 राज्य होने के कारण सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है.  उधर चीन ने १९५९ के बाद
 रेल को तिब्बत की भारत के साथ लगी सीमा के आखिरी छोर तक पहुंचा दिया है.
  रेल निर्माण का महत्व  सैन्य दृष्टि के साथ ही रोजगार और पलायन से भी जुडा हैं.
  प्रतिवर्ष उत्तराखंड कें एक ही आवाज सुनाई देती हैं कि 'सर्वे होने वाली है.'

 अंग्रेजों के ज़माने से सर्वे होते होते १२६ वर्ष में भी यह सर्वे पूरी नहीं हो सकी.
इसका मुख्य कारण था सभी विधायकों ,सांसदों ,बुद्धिजीवियों और ग्राम सभ                                           का एकजुट होकर आवाज बुलंद नहीं करना.  जनता भी इस पुकार को आन्दोलन                                       रूप नहीं दे सकी.  आन्दोलन नहीं होने का मुख्य कारण पलायन से पहाड़ में युवाओं
कि रिक्तता .  २०१०-११ के रेल बजट में ममताजी ने तीन परियोजनाओं --टनकपुर-
 बागेश्वर , टनकपुर-जौलजीवी तथा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग के आरंभ करने कि घोषणा
कर दी है.   देरी से ही सही काम आरंभ तो करो.  उत्तराखंड में तो रेल सपने में ही
रह गयी .  दृढ इच्छाशक्ति से कश्मीर,उधमपुर,शिमला,जोगिन्देरनगर, दार्जिलिंग, उटी,
 धरमनगर, अगरतल्ला सहित कई दुर्गम स्थानों तक रेल पहुँच गयी परन्तु उत्तराखंड
अधिक महत्वपूर्ण और कम दुर्गम होने के बावजूद भी रेल के लिए तरसता रह गया.
      पूरन चन्द्र कांडपाल.  ०१.०३.२०१० , मोबा ९८७१३८८८१५.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Very True Kandpal Ji.

It is really very sad that Indian Govt totally ignored Uttarakhand state as far as railway connectivity is concerned.

All other hilly states of India have got the rail connectivity only Uttarakhand is left.



                      १२६ वर्ष से हो रही है उत्तराखंड में रेल सर्वे 

 सीमान्त पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में १८८४ में काठगोदाम अंतिम रेलवे स्टेशन बना था.
  तब से १२६ वर्ष हो गए हैं और देश को आजाद हुए ६३ वर्ष हो गए हैं.  राज्य की जनता
 और कलमकार लगातार रेल के लिए पुकार लगाते रहे क्योंकि उत्तराखंड एक सीमावर्ती
 राज्य होने के कारण सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है.  उधर चीन ने १९५९ के बाद
 रेल को तिब्बत की भारत के साथ लगी सीमा के आखिरी छोर तक पहुंचा दिया है.
  रेल निर्माण का महत्व  सैन्य दृष्टि के साथ ही रोजगार और पलायन से भी जुडा हैं.
  प्रतिवर्ष उत्तराखंड कें एक ही आवाज सुनाई देती हैं कि 'सर्वे होने वाली है.'

 अंग्रेजों के ज़माने से सर्वे होते होते १२६ वर्ष में भी यह सर्वे पूरी नहीं हो सकी.
इसका मुख्य कारण था सभी विधायकों ,सांसदों ,बुद्धिजीवियों और ग्राम सभ                                           का एकजुट होकर आवाज बुलंद नहीं करना.  जनता भी इस पुकार को आन्दोलन                                       रूप नहीं दे सकी.  आन्दोलन नहीं होने का मुख्य कारण पलायन से पहाड़ में युवाओं
कि रिक्तता .  २०१०-११ के रेल बजट में ममताजी ने तीन परियोजनाओं --टनकपुर-
 बागेश्वर , टनकपुर-जौलजीवी तथा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग के आरंभ करने कि घोषणा
कर दी है.   देरी से ही सही काम आरंभ तो करो.  उत्तराखंड में तो रेल सपने में ही
रह गयी .  दृढ इच्छाशक्ति से कश्मीर,उधमपुर,शिमला,जोगिन्देरनगर, दार्जिलिंग, उटी,
 धरमनगर, अगरतल्ला सहित कई दुर्गम स्थानों तक रेल पहुँच गयी परन्तु उत्तराखंड
अधिक महत्वपूर्ण और कम दुर्गम होने के बावजूद भी रेल के लिए तरसता रह गया.
      पूरन चन्द्र कांडपाल.  ०१.०३.२०१० , मोबा ९८७१३८८८१५.


Pooran Chandra Kandpal

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                           रेल सुविधा के लिए तरसता उत्तराखंड 

     सीमान्त  पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में वर्ष १८८४ में काठगोदाम अंतिम रेलवे स्टेशन
    बना था.  इस बात को १२६ वर्ष हो गए हैं.  देश को आजाद हुए भी छः दशक से ज्यादा
    का वक्त गुजर चुका है.  राज्य की जनता और कलमकार लगातार रेल के लिए पुकार
    लगाते रहे  क्योंकि उत्तराखंड सीमावर्ती राज्य होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी
    महत्वपूर्ण है.  भारत के पडोसी देश चीन ने वर्ष १९५९ के बाद रेल को तिब्बत की
    भारत के साथ लगी सीमा के आखिरी छोर तक पहुंचा दिया है.  रेल निर्माण का
     महत्व  सैन्य दृष्टि के साथ ही रोजगार और पलायन से भी जुडा है.  प्रतिवर्ष
     उत्तराखंड में  एक ही आवाज सुनाई देती है कि सर्वे होने वाली है, रेल आने वाली है.

         अंग्रेजों के जमाने से सर्वे होते होते  १२६ वर्ष के लम्बे अंतराल में भी यह सर्वे  पूरी
     नहीं हो सकी.  इसके पूरा न होने का मुख्य कारण इस पहाड़ी राज्य के सभी विधायकों ,
     सांसदों , बुद्धिजीवियों और ग्राम सभापतियों का एकजुट होकर आवाज बुलंद नहीं
     करना था.  जनता भी इस पुकार को आन्दोलन का रूप नहीं दे सकी.  आन्दोलन न
     होने का कारण था पलायन से पहाड़ में युवाओं कि रिक्तता .

          कुछ दिन पहले आये वर्ष २०१०-११ के रेल बजट में केंद्रीय रेल मंत्री ममता
     बनर्जी ने तीन परियोजनाओं टनकपुर-बागेश्वर, टनकपुर-जोलजीबी तथा ऋषिकेश-
     कर्णप्रयाग को आरम्भ करने कि घोषणा कर दी है.  देर से ही सही, काम आरंभ
    तो करो.  उत्तराखंड में रेल सपना बन कर रही गयी.  दृढ इच्छाशक्ति से कश्मीर ,
    उधमपुर, शिमला, जोगीन्देर्नगर, दार्जिलिंग, ऊटी ,धरमनगर, अगरतल्ला, सहित कई
    दुर्गम स्थानों तक रेल पहुँच गयी, परन्तु उत्तराखंड अधिक महत्वपूर्ण और कम
     दुर्गम होने के बावजूद रेल सुविधा के लिए तरसता रह गया.

       ( यह लेख जनपक्ष आजकल मार्च १६-३१,२०१० में भी छपा है.)
                              पूरन चन्द्र कांडपाल. मोब ९८७१३८८८१५

hem

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इस विलम्ब के लिए एक सीमा तक उत्तराखंड से आये वे नेता भी जिम्मेदार  हैं जो केंद्र की सत्ता   में भागीदार रहे.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Thanks a lot Kandpal ji for providing exclusive information.

The facts are really eye opening. It is sad that after more 63 yrs of independence,we could not get rail connectivity in Hill area.

                           रेल सुविधा के लिए तरसता उत्तराखंड 

     सीमान्त  पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में वर्ष १८८४ में काठगोदाम अंतिम रेलवे स्टेशन
    बना था.  इस बात को १२६ वर्ष हो गए हैं.  देश को आजाद हुए भी छः दशक से ज्यादा
    का वक्त गुजर चुका है.  राज्य की जनता और कलमकार लगातार रेल के लिए पुकार
    लगाते रहे  क्योंकि उत्तराखंड सीमावर्ती राज्य होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी
    महत्वपूर्ण है.  भारत के पडोसी देश चीन ने वर्ष १९५९ के बाद रेल को तिब्बत की
    भारत के साथ लगी सीमा के आखिरी छोर तक पहुंचा दिया है.  रेल निर्माण का
     महत्व  सैन्य दृष्टि के साथ ही रोजगार और पलायन से भी जुडा है.  प्रतिवर्ष
     उत्तराखंड में  एक ही आवाज सुनाई देती है कि सर्वे होने वाली है, रेल आने वाली है.

         अंग्रेजों के जमाने से सर्वे होते होते  १२६ वर्ष के लम्बे अंतराल में भी यह सर्वे  पूरी
     नहीं हो सकी.  इसके पूरा न होने का मुख्य कारण इस पहाड़ी राज्य के सभी विधायकों ,
     सांसदों , बुद्धिजीवियों और ग्राम सभापतियों का एकजुट होकर आवाज बुलंद नहीं
     करना था.  जनता भी इस पुकार को आन्दोलन का रूप नहीं दे सकी.  आन्दोलन न
     होने का कारण था पलायन से पहाड़ में युवाओं कि रिक्तता .

          कुछ दिन पहले आये वर्ष २०१०-११ के रेल बजट में केंद्रीय रेल मंत्री ममता
     बनर्जी ने तीन परियोजनाओं टनकपुर-बागेश्वर, टनकपुर-जोलजीबी तथा ऋषिकेश-
     कर्णप्रयाग को आरम्भ करने कि घोषणा कर दी है.  देर से ही सही, काम आरंभ
    तो करो.  उत्तराखंड में रेल सपना बन कर रही गयी.  दृढ इच्छाशक्ति से कश्मीर ,
    उधमपुर, शिमला, जोगीन्देर्नगर, दार्जिलिंग, ऊटी ,धरमनगर, अगरतल्ला, सहित कई
    दुर्गम स्थानों तक रेल पहुँच गयी, परन्तु उत्तराखंड अधिक महत्वपूर्ण और कम
     दुर्गम होने के बावजूद रेल सुविधा के लिए तरसता रह गया.

       ( यह लेख जनपक्ष आजकल मार्च १६-३१,२०१० में भी छपा है.)
                              पूरन चन्द्र कांडपाल. मोब ९८७१३८८८१५

Pooran Chandra Kandpal

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    देशका मिली गीत kau
     अलग थकुली नि बजौ
     समाओ य देशेकें
     हिमाल धात लगूरौ
     बचाऊ य बगीचे कें
     जहर यमें बगैरौ ,
     उण निदियो य गाड़ कें
     बांध एक ठाड़ करौ,
     देशका मिली गीत कौ
     अलग थकुली नि बजौ.
          शहीदों कें याद करौ
          ghushkhoron dekhi नि darau ,
          kamchoron hain kaam करौ
          hak apan maagi be rau
          andhvishwashk gav ghoto
          aghil au pichhadi नि rau
          देशका मिली गीत कौ
          अलग थकुली नि बजौ.
           puran chandra kandpal

 

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