Author Topic: Articles By Shri Pooran Chandra Kandpal :श्री पूरन चन्द कांडपाल जी के लेख  (Read 49471 times)

Pooran Chandra Kandpal

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दिल्ली बै चिठ्ठी ऐ,१५.१२.१६

पुज क सच और भगवान कैं घूस

     पुज क सच हम जाणि बेर लै छिपूनू | पूजालयों में मूर्तियों क सामणि धूप- अगरबत्ती जलै बेर और भेंट आदि खिति बेर अक्सर हम समझनू कि पूजा –अर्चना क द्वारा हम ईश्वर कैं ख़ुशि करण क प्रयास करै रयूं पर य सांचि बात न्हैति | सांचि बात त य छ कि हम मात्र आपण भौतिक सुखों क खातिर ईश्वर कैं याद करनू ताकि हमार घरों में लक्ष्मी क बाट खुली रो, परिवार में सुख-शांति बनी रो और जीवन में दुःख और परेशानियों क कभै लै सामना नि करण पड़ो | अन्यथा क्ये आज तक कैलै मंदिरों में मूर्तियों क सामणि कैकणी य कौण सुणछ कि – “हे भगवान्, तुम ख़ुशि रया, और सुखल रया ?’
     हम भगवान कैं घूस लै दिनू | भ्रष्टाचार हमार देश में एक आम बात छ जमें हमुकैं क्ये लै ताजुब नि हुन बल्कि य हमरी जीवन में एक शैली बनि गे | हम भ्रष्टों कैं सुधारण  क बजाय उनुकैं सहन करण फै गोयूं | हम आपण भगवान कैं कएक किस्म कि भेट चढूनू और बद्याल में भगवान हैं बै कृपा चानू | यसिक हम कर्मसंस्कृति क त्याग करि बेर भगवान हैं बै आपण लिजी पक्षपात चानू | आम जीवन में सौदेबाजी हैं ‘रिश्वत’ कई जांछ | धनी लोग पूजालयों में नकद भुगतान कि जाग पर सुन क मकुट या आभूषण चढूनीं | यास किस्माक  करोड़ों रुपै क मुकुट- दान क समाचार हम आये दिन सुणनू या पढ़ते रौनू |
     हमार देशा क कुछ मंदिरों में यतू धन चढ़ाव में औंछ कि मंदिरों वाल य समझि निपान कि उ धन क्ये करीजो ? अरबों रुपै कि सम्पति तहखानों में पड़ि रैछ | हम देशा क क्वे लै कुण में जौ, ग्रामीण भारत हो या शहर, हम धन क उपयोग मंदिर बनूण में ई करनूं | अकूत धन हुण पर लै हम क्वे स्कूल, पुस्तकालय या वाचनालय, अतिथि गृह अथवा सर्वजन उपयोग कि क्वे सुविधा संबंधी निर्माण करण कि नि सोचन | हमार इस्कूलों में बुनियादी चीज जस कि अल्मारि, कुर्सि, डेस्क, ब्लैक बोर्ड, कंप्यूटर कम्र आदि न्हैति | हम इनार बार में नि सोचन बल्कि नजीक क मंदिर में घंटी, छत्र या गुम्बद बनूण पर जोर दिनू और वाह-वाही लुटण क चक्कर में रौनू |  हमुकैं लागूं कि भगवान लै कुछ भल करण क लिजी  चढ़ाव स्वीकार करनीं और हम य रिश्वत लेन-देन क भ्रष्टाचार में शामिल है जानूं |

     मन में एक बात उठीछ कि हमूल य भगवान दगै सौदेबाजी कि संस्कृति क्यलै अपनै  ?  हम अगर नैतिक आचरण करना, कर्मसंस्कृति पर विश्वास करना, ईमानदारी ल गुजार करना तो हम सबूंकि उन्नति हुनि | हम धर्म क आधार पर पूजालयों में बांटी बेर रै गाय | हम आपूं कैं भारतीय कई जाण क बजाय हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि कई जाण में विश्वास करण फै गाय | हम भुलि गाय कि कुछ वर्ष पैली तक हम सब एकै पंथ छी | हमार बंटवार लै धर्म कै अधार पर हौछ | हम भुलि गाय कि हम सब एकै ईश्वर कि संतान छ्यूं |

     आज हम अध्यात्म में अंधविश्वास कैं मिलै बेर परोसै रयूं | अध्यात्मिकता लै एक दुकानदारी बनि गे | ग्राहकों कि क्वे कमी न्हैति, विशेषकर महिला ग्राहकों कि | हमरि  जिन्दगी में भौतिकवाद ल भौत तनाव पैद करि है जैक वजैल हम तथाकथित अध्यात्मवादियों कि शरण में जा रयूं जनार पास चिकनी- चुपड़ी बातों और पाखण्ड क और क्ये न्हैति | हम य भौतिकता कि प्राप्ति कि खोज में कएक किस्माक बीमारियों क शिकार लै है गोयूं | हमरि य कमजोरी क वाकपटुता क विशेषज्ञ खूब लाभ उठूनीं | इनार चक्कर में हम समय और धन द्विनों कि बर्बादी करै रयूं | इनार खुट छुंगण कि लै होड़ लै रीं | हमूल यथार्थ कैं समझते हुए इनार परपंच कैं जाणण- समझण क प्रयास करण चैंछ |

      जिन्दगी कैं जीण लै एक कला छ | सफल जीवन उ ई छ जो कर्मसंस्कृति क पायदानों में चलते हुए, मुसीबतों देखि नि घबराते हुए और दुसरां क अनुभवों ल सिखनै अघिल बढूं, आपणि पछ्याण बनूं | उ ई मनखी सफल छ जो अंधश्रद्धा अथवा अंधविश्वास क भंवर बटि आपूं कैं बचूनै जनहित क काम में आपण धन क सदुपयोग करूं | भगवान कभै लै कै हूं क्ये नि मांगन जबकि ऊँ कर्मसंस्कृति क राहगीर पर सदैव और सर्वदा आपणि कृपा करनीं | भल काम करण ल हमुकैं सुकून मिलूं, हमर मनोबल माथ उठूं जैल हम कर्मसंस्कृति क बटौव बनि जानूं जैहूं दुसार आखंरों में भगवान कि कृपा लै कै सकनूं ताकि हम अहंकार है दूर रै सकूं |

पूरन चन्द्र काण्डपाल, १५.१२.२०१६   


Pooran Chandra Kandpal

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बिरखांत -१३८ : अति-आत्मविश्वास

     बिरखांत १३७ (१४ दिसंबर २०१६ ) में भ्रम (वहम, भैम) की एक संस्मरणात्मक बिरखांत पर कई मित्रों ने मेरे शब्दों पर अपनी अमूल्य टिप्पणी/ प्रतिक्रिया की थी जो सोसल मिडिया में बहुत अच्छी बात है | लेखक को इससे अधिक और चाहिए भी क्या ? स्नेही सोसल मिडिया मित्र हयात जी जो हमेशा ही यथार्थ टिप्पणी/ प्रतिक्रिया के अलावा मूल लेखन भी करते रहते हैं, ने अति-आत्मविश्वास के बारे में अगली बिरखांत की मुझ से अपेक्षा जाहिर की है | हयात जी को जानता तो नहीं हूँ परन्तु पढ़ते रहता हूँ और महसूस करता हूँ की वे एक अच्छे, सधे हुए गूढ़ रचनाकार हैं | मैं उनकी अपेक्षा पर खरा उतरूंगा ऐसा मैं नहीं सोचता |

     भ्रम वाली बिरखांत में तिवारी जी का मुझ पर अत्यधिक यकीन कर  लेना भी एक अति-आत्मविश्वास था | उन्होंने मुझ से कभी यह पूछने की जरूरत भी नहीं समझी कि अचानक इन सबको मेरा एक पैर छोटा क्यों नजर आने लगा ? यदि वे मुझे कुरेदते तो शायद मैं उन्हें सच्चाई बता देता | उन्होंने कुरेदा नहीं और मैं भी चुप रहा | उनका मुझ पर चुपचाप इतना अति-आत्मविश्वास हो गयाकि ‘मैं उनसे मजाक नहीं कर सकता और झूठ नहीं बोल सकता |’ आत्मविश्वास के बाद ही अति-आत्मविश्वास पनपने लगता है जब व्यक्ति स्वयं के भरोसे को गंभीरता से नहीं लेता |

     आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास में बहुत अंतर है | आत्मविश्वास होना ठीक है जबकि अति-आत्मविश्वास होना ठीक नहीं है | आत्मविश्वास जहां सृजनात्मक होता है वहीं अति-आत्मविश्वास घातक होता है | इसके अनेकों उदाहरण हैं | विष्णु शर्मा अपने पुस्तक ‘पंचतंत्र’ में हमें खरगोश और कछुवे की कहानी बता गए | खरगोश अति-आत्मविश्वास के कारण स्वयं को बहुत तेज धावक और कछुवे को फिसड्डी समझ कर आराम करते हुए सो गया और अचानक जागा तो कछुवा जीत चुका था |

     उड़न सिक्ख प्रख्यात धावक मिल्खा सिंह के बारे में भी लोग ऐसा ही कहते हैं | उन्हें अति-आत्मविश्वास हो गया था की १९६० रोम ओलम्पिक में उनका पदक पक्का है और वे पदक के नजदीक पहुँच भी गए थे | इसी बीच उन्होंने पीछे गर्दन घुमाकर अपने प्रतिद्वंदी को देखना चाहा और इसी पल ने उन्हें सेकेण्ड के दसवें हिस्से से पदक से वंचित कर दिया | उनके बाद वाला खिलाड़ी इसी पल पदक ले गया | अति-आत्मविश्वास में क्रिकेट के कएक खिलाड़ी भी अनायास ही विकट गवांते देखे गए हैं या विकेट लेने में असफल रहे हैं |

     वर्ष १६६२ में मेरे विद्यालय की आठवीं की वार्षिक बोर्ड परीक्षा में मेरे एक आत्मविश्वासी सहपाठी को गणित के अध्यापक ने परीक्षा समाप्त होते ही एक जोर का थप्पड़ रसीद कर दिया जिससे वह चौदह वर्षीय छात्र धड़ाम से नीचे गिर गया | गणित के प्रश्न पत्र को वह परीक्षार्थी मात्र एक घंटे में हल करके बाहर आ गया | अध्यापक को यह अच्छा नहीं लगा क्योंकि वह छात्र कक्षा में गणित में सर्वोत्तम था और उससे उन्हें बड़ी उम्मीद थी | प्रश्न पत्र कुछ कठिन लग रहा था | अध्यापक को लगा कि इतनी जल्दी दस सवाल हल नहीं हो सकते | छात्र के जल्दी बाहर आने पर उन्हें क्रोध आ गया और उस क्रोध को थप्पड़ के रूप में छात्र पर उतार दिया | छात्र ने खड़े होकर रोते हुए उत्तर दिया, “सर मुझे आत्मविश्वास है की मेरे सभी सवाल सहीं होंगे | परीक्षा परिणाम में उसके गणित में सौ प्रतिशत अंक थे अर्थात सभी दस सवाल सही | अध्यापक ने उसके आत्मविश्वास की सराहना करते हुए उसे गले लगाकर खेद जताया परन्तु इनाम का वह थप्पड़ उसे आज भी याद है |

     मुझे नहीं मालूम की हयात जी मेरी इस बिरखांत पर क्या टिप्पणी करेंगे ? मुझे आत्मविश्वास है कि मैंने अपनी क्षमता के अनुसार अति-आत्मविश्वास के बारे में कुछ शब्दों का सृजन इस बिरखांत में किया है | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल, २१.१२.२०१६   

Pooran Chandra Kandpal

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दिल्ली बै चिठ्ठी ऐ रै

ब्यानों में नई रिवाज और कीर्तन में देवि,२२.१२.१६

     हम सब कौनूं कि ज़मान बदलि गो | पैली कौ जमान में यस हुंछी, उस हुंछी | सांचि बात त य छ कि जमान नि बदलन बल्कि वक्त गुजरण क साथ कुछ न कुछ बदलाव होते रौंछ | य बीच कएक ब्यानों क न्यौत में गोयूं और कएक क़िस्म क बदलाव देखौ | माठू- माठ कै कैमराबाजी क दखल ल भौत कुछ बदलते जारौ | कएक ता ब्यौल- ब्योलि कैं दुबार पोज दीण क लिजी कई जांछ | मस्ती क दौर में दोस्त उनुहें हंसण कि फर्मेंस करते रौनी | आखिर क्वे कतू देर तक हंसण कि एक्टिंग करि सकूं, य त मेकअप ल लतपती ब्योलि बिचारि समझि सकीं |

     एक रिवाज जो नई चलि रौछ उ मीकैं भल लागौ | ब्यौल हैं वीक दोस्त कौनी, “अरे उठ यार, उ मंच पर औं रै तिकैं फांसैं हैं | तू सीढ़ी बै मुड़ि उतर और ब्योलि क हाथ पकड़ण क ड्रामा कर और उकैं माथ खैंची ल्या |” ब्यौल  मानो उतकै प्यार क समुद्र में उत्तीकैं डुबि गो और उछ्याव मारनै न्है जांछ ब्योलि क हाथ पकड़ण हूं | मिलि हुई मौक क भरपूर फैद उठूनै उ ब्योलि क हाथ दबूण है लै नि चुकन | एक जागि त ब्यौल बिन कईये न्है गोय, वीक दोस्त ज़रा कम मौडरन छी | वी कैल रुकी नि गोय और उ सबूं है मुणी कि सिढ़ि तक कुदि गोय | वील कैमरेवालों क और्डर खूब मानौ और फोटोग्राफी बंद हुण क बाद लै वील ब्योलि क हाथ नि छोड़ जसै कि क्वे चुम्बक ल ऊँ बादी गा हुनाल | ज्ये लै हय य देखि सबू कैं भल लागौ | जब प्यार जै करण हय तो डर क्ये बात कि ? हमार जमान में य ड्रामाबाजी नि हुण क थ्वाड़ मलाल लै हौछ | तब जयमाला त छोड़ो ब्योलि क मुखड़ देखण क मौक लै पौण क जाण बाद मिलछी |

     आब बात अच्याल कि जयमाला कि करनू | य सीन में अच्याल ज्ये हूँरौ उ मीकैं भल नि लागन | मंच क य सीन में ब्यौल दोस्तों कि मंडलि ल घ्येरी रांछ ( उनूं में कुछ शराबि लै हुनी ) और ब्योलि आपण भैनूं और सहेलियों क घ्यार में रैंछ | ब्योलि कैं कैमरा वाल पैली इशार करनी कि जयमाला ब्यौल कैं पैरै दै | जसै उ एक कदम अघिल बढ़ि बेर ब्यौल कै जयमाला पैरूंण चैंछ ब्यौल क दोस्त ब्यौल कैं माथ उठै दिनी | ब्योलि क पैल चांस मिस है जांछ और उ टैंसन में ऐजींछ जबकि कैमरा चलिए रौंछ | तुरंत भैनूं क हाथों में उठी हुयी ब्योलि ल दुसर प्रयास करौ और जसी- तसी दोस्तों द्वारा माथ उठायी, पिछाड़ी तरफ हुणि ट्यड़ तनी हुयी ब्यौल कि गर्दन जयमाला ठोकि दी जसै घर में घुसी हुयी गुलदाड़ क गाव में बड़ी मुश्किल ल रस्सी डायी दी हुनलि | यसिक्ये ब्यौल कैं लै द्वि ता कोशिश करण पर सफलता मिली | ब्योलि क आर्टिफीसियल जेवर लै हिलि गोय और मेकअप क डिजैन लै बिगड़ि गोय | एक ब्या में त य धक्कामुक्की में ब्यौल कि कुर्सी लै पल्टी गेइ | मी द्वियै तरफा क कबड्डी खेलणियां हैं कौण चानू कि य माथ उठूण कि ड्रामाबाजी बंद करो और द्विनों कैं असज- परेशानी है बचौ | यस नि हो कि जयमाला डाउण क चक्कर में द्विनूं में बै एक मुणि घुरी जो | प्यार ल नजाकत के साथ हसन -बलानै उनुकैं जयमाला पैरूण क मौक द्यो | य क्षण कैं कभैं लै नि भुलणी बनौ | ब्योलि- ब्यौल हैं टैंनसन भरी मुर्ग खेल नि करौ |

     ब्यानों में महिला संगीत और कीर्तन लै द्वि विधा अच्याल देखादेखी खूब रंग में छीं | महिला संगीत में स्थानीय भाषाओं पर सनिमा क गीतों ल मौय लगै है | ‘चिकनी चमेली..., बदतमीज दिल...., जास सनिमा क गीतों कि भरमार हैरै | कैसेट- सी डी या डीजे लगौ और आड़- त्यारछ है बेर नाचो, है गोय महिला संगीत | झणी कां गयीं ऊँ ‘बनड़े’ जास परम्परागत गीत ? कीर्तन में लै पैरोडी दगै नांच हूँरौ | सनिमा गीतों कि धुन में शब्दों का लेप लगै बेर माता रानी कैं रिझूण क एक अणकसै अंदाज बनि गो |
 
     अच्याल हरेक कीर्तनों में कएक स्यैणियों क आंग ‘देवि’ ऐ जारै जो कीर्तन करौणियाँ हैं बै हाथ जुड़वै बेरै मानी | पत्त नै दुसरा घर में बिन बुलैइये य ‘देवि’ क्यलै ऐजीं ? औण छ त उनार घर में आ जां त्येरि पूछ-गौंछ नि हूं रइ, उनू कैं बाट बता | दुसार क घर में य सबू क सामणी तमाश क्यलै करण हय ? कीर्तन में य शोभा लै नि दिन जबकि ‘देवि’ नाचणी फलाणि आंटी चर्चा में ऐ बेर भविष्य में गणतु बनि सकीं | जो कीर्तन में आपणी संस्कृति कि झलक हो उहैं भल कीर्तन कई जाल | एक सांस्कृतिक आयोजन में एक कलाकार मंच बै गायन कि ‘जागर’ विधा लगूं रय और बाज लै बाजैं रय | य ई बीच दर्शकों में बैठी एक स्यैणि क आंग में ‘देवि’ ऐ गेइ | चप्पल पैरिये, बिन हाथ-मुंख धोइये, न दुलैंच, न हाथ जोड़ाइ,  दर्शकों कि भीड़ में य ‘देवि’ पत्त नै क्यलै ऐ ? ‘य द्यप्त क्वे नि हय, त्यारै आंग आय |’
पूरन चन्द्र काण्डपाल, २२ .१२.२०१६
 

   

Pooran Chandra Kandpal

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बिरखांत -१३९ : फ्री फंड का चक्कर, 

     समाज में व्याप्त समस्याओं पर नजर रखने वाले चनरदा जब भी मिलते हैं, पूछने पर अपना विचार प्रकट कर देते हैं | हमारे समाज में कुछ भी मुफ्त में मिलता है तो लोग उस ओर दौड़ पड़ते हैं | इस फ्री प्राप्ति की दौड़ पर चनरदा बोले, “समाज में जब कुछ भी खैरात बंटती है लोग उसे पाने के लिए दौड़ पड़ते हैं चाहे यह डिटरजेंट का सैम्पल हो, साबुन हो, चाय हो या टूथपेस्ट या भूसा ही क्यों न हो | इस फ्री के चक्कर में मनुष्य यह नहीं सोचता कि यह अपरिचित व्यक्ति हमें फ्री में चीजें क्यों बाँट रहा है ?

     चनरदा बोलते गए, “फ्री का प्रसाद देकर कुख्यात अपराधी चार्ल्स शोभराज कुछ वर्ष पहले तिहाड़ जेल से भाग गया | वह जानता था की गेट के पुलिस वाले भी फ्री के प्रसाद को खाने में देर नहीं करेंगे | उसने प्रसाद में बेहोश होने का नुस्खा मिला कर पुलिस को खिला दिया और चकमा देकर  भाग गया जो बाद में नेपाल में पकड़ा गया | न्यूतेर (विवाह की पूर्वसंध्या पर फ्री का दारू स्वागत ) में फ्री की दारू मिलती है | रिसेप्शन में भी मिलती है | फ्री की है तो बिना ब्रैंड पूछे लोग औकात से अधिक गटक लेते हैं और डिनर होने तक उनकी भाव- भंगिमा और चाल का कचूमर हो जता है | बाद में उस मुफ्त- गटकू को उसके कुछ हमसफर उसके ठौर तक घुरका आते हैं | “

     “नवरात्री में मिली फ्री की पूरियां भी कंचक बने बच्चे पार्कों- सड़कों में फैंक जाते हैं | कोई हमें फ्री में किसी धार्मिक यात्रा या दर्शन के लिए ले जाये तो हम चल पड़ते हैं | फ्री की मौज- मस्ती कोई नहीं छोड़ता भलेही बाद में पछताना पड़े | सड़क दुर्घटना में पेट्रोल का टेंकर पलट गया | देखते ही देखते लोग बर्तन लेकर पहुँच गए गिरे-बहते पेट्रोल लेने | इसी बीच किसी ने बीड़ी सुलगाई और आग लग गयी | कई लोग झुलस गए | यह घटना कुछ ही दिन पहले की है | मुफ्तियों ने पेट्रोल के पीछे जान की भी परवाह नहीं की |”

     चनरदा ने उत्तराखंड के फ्री फंड की बस यात्रा के बारे में भी बताया | वे बोले, “उत्तराखंड सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों को जीरो टिकट पर फ्री यात्रा सुलभ करा रखी है | सभी सीनियर सिटिजन इसका भोग कर रहे हैं | इनमें वे भी हैं जिनकी पेंशन हजारों में है | वे किराया देने में सक्षम हैं पर फ्री राइड क्यों छोड़ें ? मेरा एक परिचित पिथौरागढ़ से हल्द्वानी आ रहा था | लगभग तीन सौ रुपये का टिकट था और पांच घंटे की यात्रा | वह सीनियर नहीं था | उसने बताया, “सभी सीनियर सिटिजन खड़े- खड़े चार-पांच घंटे की फ्री यात्रा जीरो टिकट पर कर रहे हैं | पीछे से के एम् ओ की बस खाली चल रही थी | टिकट लेने के कारण उसमें कोई नहीं जाता |

       सरकारी बसें भी कम हैं | यात्रा में टिकट नहीं लगने से कुछ सीनियर सिटिजन गैर- आवश्यकीय यात्रा भी करते हैं जिससे बस में भीड़ हो जाती है | अधिकांश सीनियर सिटिजन बस में टिकटधारी यात्रियों से सीट देने की उम्मीद रखते हैं | टिकटधारी अपनी सीट इसलिए नहीं देते क्योंकि टिकट लेकर वे पांच घंटे खड़ा रहना नहीं चाहेंगे जबकि वे आरम्भ स्थान से सीट होने पर ही बस में टिकट लेकर बैठे हैं |”

     चनरदा बोलते गए, “ अब सवाल उठाता है कि भलेही उम्र का आदर होना चाहिए परन्तु यात्री पांच घंटे खड़े- खड़े यात्रा करने में दुखित तो होगा | इसलिए वह आरम्भ से सीट होने पर ही टिकट लेता है | रेलवे में सीनियर सिटिजन को साठ प्रतिशत किराया देना पड़ता है | सरकार की अपनी सोच है | सरकार को तो वही करना है जो उसके हित में हो | फ्री का बहुत कुछ देकर देश के एक हिस्से में मरने के बाद भी ‘अम्मा- अम्मा’ हो रही है | एक वो गांधी था जो आपातकाल के अलावा किसी भी मुफ्त खैरात के पक्ष में नहीं था | उनका कहना था ‘जो लोग बिना काम किये कुछ खाते हैं या लेते हैं वे किसी चोर से कम नहीं हैं |’ मुफ्त में खैरात बांटने के बजाय काम दिया जाना चाहिए |’ हम ‘मुफ्त का चन्दन, घिस मेरे नंदन’ के प्रेम दीवाने हैं | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल, २८.१२.२०१६

     


Pooran Chandra Kandpal

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दिल्ली बै चिठ्ठी ऐ रै

 भैम, या वहम

     मी काल्पनिक भौत कम लेखनू | ज्ये देखौ या ज्ये है सकूं या ज्ये करी जै सकूं, मी उई लेखनू | अंधविश्वास क विरोध मी अक्सर करनू | अंधविश्वास क एक रूप भैम लै छ | भैम या वहम भौत नकि चीज छ | यैक इलाज लै क्ये नि हय | जो भैम क शिकार है जांछ वीक चैन- सुकून सब उड़ि जांछ, यां  तक कि उ रोगिल लै है सकूं | म्यर मानण छ कि भैम कैं मन में नि पनपण दिई जाण चैन | य सम्बन्ध में एक पुराणि याद यां बतूण चानू |

      बात १९७१ कि छ जब मी आपण सैनिक दगड़ियां दगै पंजाब क हुसैनीवाला बॉर्डर पर सतलज नदी क किनार एक छोटि बैरेक में रौंछी | हम आठ लोग छी उ बैरेक में | तब मेरि उम्र मात्र २३ वर्ष छी और मैं बैरेक में सबूं है नान छी | नान हुण बावजूद लै सब म्येरि भौत कदर करछी, म्ये पर विश्वास करछी | ब्याव क टैम पर जब बैरेक में सब ऐ जांछी तो खूब हंसी- मजाक- चुट्कुल और आपसी बहसबाजी हिंछी | कभैं घर कि बात, कभैं ड्यूटी कि बात और कभैं यथां- उथा कि अंजड़ि- कंजड़ि बात | कभैं- कभैं आपस में खुराफात या जुमलेबाजी लै करछी | क्वे ज्यादै बुलांछी क्वे कम पर बलाण या एक -दुसरै दगै छेड़खानी या चुहुलबाजी चलते रैंछी |

      हमार बीच एक त्याड़ि ज्यू लै छी जो सबूं है कुछ अलग छी पर उं भौत शरीफ छी |  उं भौत कम बलांछी पर म्ये दगै उनर बलाण- च्वलाण औरों है ज्यादै छी | उं म्येरि हरेक बात कैं भौत संजीदगी क साथ लिछी | उं नै-ध्वे बेर बदन पर दैण क तेल कि मालिश करछी | बिलकुल सौम्य प्रकृति छी उनरि | उं भगवान कि फोटो क सामणी रोज अगरबत्ती लै जलूँछी | उं बारि-बारि कै एक एक खुट कैं खाट में धरि बेर तेल मालिश करछी | सब लोग उनुकैं टकिटकि लगै बेर चै रौनेर हाय और क्ये न क्ये कैते जनेर हाय |

     एक दिन एक दगड़ी कैं खुराफात सुझि | त्याड़ि ज्यू तब नांहैं जै राय | खुराफाती दगड़ी बलाय, “भई आज जता त्याड़ि ज्यू मालिश कराल तो उनुहैं कै दियो कि उनरि एक टांग छोटि छ | देखो त सही क्ये रिऐक्सन करनी उं |” दुसर दगड़ी बलाय, “उ यकीन तबै करल जब यौ (म्यर नाम ल्हीबेर ) उहैं कौल, वरना हमरि त उ सुणा लै ना और यकीन लै नि करा |” म्यार कएक ता मना करण पर लै उं नि मान और मीकैं राजि हुणा क लिजी मजबूर करि दे | जस्सै त्याड़ि ज्यू नै-ध्वे बेर आय और बारि- बारि कै टांगों कि मालिश करण लाग, मी ल उनरि उज्यां चै बेर कै दे, “त्याड़ि ज्यू तुमरि हौ बौं टांग मीकैं ज़रा छोटि जसी लागैं रै |” सबूं ल एकसाथ हां में हां मिलै दी, “होय देखिण त रैछ |” त्याड़ि ज्यू आपण द्विये टांगों कैं जोड़ि बेर देखैं फै गाय |

     त्याड़ि ज्यू कैं म्यार कौण पर यकीन है गोय कि उनरि बौं टांग छोटि छ  | एक दिन एकांत में गंभीर है बेर उं मीहूं पुछण लाग, “यार यौ छोटि क्यले है हुनलि ?” मी ल उनुकैं समझा कि टांग ठीक है जालि | त्याड़ि ज्यू कैं भैम है गोय की उनरि बौं टांग छोटि छ | लगभग एक महैण बाद तब भौत दुःख हौछ जब देखौ कि त्याड़ि ज्यू कि उ टांग सचमुच आदू इंच छोटि हैगे | मीकैं यस लागौ कि मजाक- मजाक में हमूल भौत ठुलि गलती करि दी | त्याड़ि ज्यू भौत उदास रौण फै गाय और मी आपूकैं एक मसमारि जस देखण फै गोय क्यलै कि त्याड़ि ज्यू समझनेर हाय कि मी क्वे लै किस्में कि घटिय खुराफाती मजाक नि करि सकन | मीकैं हिम्मत नि हइ कि मी त्याड़ि ज्यू हैं सांचि बात कसी कौं ताकि उनर भैम मिट जो |

     अघिल ऐतवार हैं मौक देखि बेर मी त्याड़ि ज्यू कैं यूनिट क नजीक  सतलज नदी क किनार पर ल्ही गोय | वां मी ल त्याड़ि ज्यू कैं शुरू बटि  आखिर तक कि पुरि कहानि बतै दी और उनार कोखि में आपण मुनव धरि बेर कतू ता माफि मांगी | जब उनुकैं म्येरि बात क यकीन है गोय तो हाम वां बै वापस ऐ गाय | कुछ दिन बाद त्याड़ि ज्यू कि टांग ठीक है गेइ हो और उं पैलिका बजाय आब थ्वड़- भौत बलाण और मजाक लै करण फै गाय | टांग छोटि हुण क कारण भैम छी | जब हम भैम क शिकार है जानू तो सबूं है ज्यादै हमार ग्रंथी तंत्र (glandular system) पर असर पडूं | कएक ग्रंथि त काम करण बंद करि दिनी और कएक ज्यादै सक्रीय है जानी | त्याड़ि ज्यू कि एड़ी कि मसल यौ भैम क वजैल कुछ सिकुड़ ग्ये और उं ट्यड़ हिटण फै गाय क्यलै कि उं मानि गाछी कि उनरि एक टांग छोटि हैगे | त्याड़ि ज्यू क भैम मिटते ही सब ठीक है गोय पर मी आपूं कैं माफ़ नि कर सक | जो मनखी म्ये पर भौत यकीन करछी उ दगै मील यस मजाक नि करण चैंछी | अंत में कूण चानू कि यस क़िस्म क मजाक कै दगै लै नि हुण चैन और मैंसों कैं कभैं लै भैम क शिकार नि बनण चैन क्यलै कि भैम क क्वे इलाज लै न्हैति |

पूरन चन्द्र काण्डपाल, २९ .१२.१६   
 


Pooran Chandra Kandpal

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बिरखांत -१४० : ध्वनि प्रदूषण बहुत खतरनाक समस्या 

     ध्वनि प्रदूषण अर्थात शोर (जोर की आवाज) समाज में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है | कुछ वर्ष पहले सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मनोज कुमार ने इस समस्या पर ‘शोर’ नमक फिल्म भी बनायी थी जिससे लोगों का ध्यान इस समस्या के प्रति आकर्षित किया गया था और जनजागृति करने का प्रयास किया था | शोर से हम बहरे तो हो ही सकते हैं, इससे याददाश्त में कमी, अवसाद, सिरदर्द और तंत्रिका तंत्र में खलबली भी मच सकती है | ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति नपुंसकता और कैंसर का शिकार भी हो सकता है | चिकित्सकों का मानना है कि ध्वनि प्रदूषण से स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति भी हो सकती है |

     समाज में शोर करने वाले अर्थात ध्वनि प्रदूषण के कई कारक हैं | आये दिन हमारी इर्द- गिर्द कई धार्मिक कार्यक्रम होते हैं जैसे जगराता या जागरण अथवा धर्म संबंधी आयोजन | दीपावली में पटाखों का शोर और रासायनिक प्रदूषण के साथ ही शादी के सीजन में बारातघरों के पास पटाखों का शोर | बारातघर अक्सर आवासीय कालोनियों के पास होते हैं और बरात किसी न  किसी कारण से हमेशा ही देर रात तक पहुँचती है | बरात पहुँचते ही पटाखों के बॉक्स धड़ाधड़ खाली होने लगते हैं | शहरों में यह एक आम समस्या है | जागरण- जगरातों में तो पूरी रात बहुत जोर का शोर सहन करना पड़ता है | उस रात उस क्षेत्र के आस-पास कोई अपने घर में भी सो नहीं सकता चाहे वह वृद्ध हो या रोगी  |

    वाहनों के हौर्न के शोर से भी लोग बहुत दुखित हैं | रात को हौर्न बजाना मना है परन्तु अक्सर लोग बहुत जोर से हौर्न बजाते हैं | दुपहियों पर लोगों ने ट्रकों- बसों के हौर्न लगा रखे हैं ताकि लोग उस हौर्न के शोर से कम्पित होकर सड़क छोड़ दें | पुलिस को यह सब दिखाई –सुनाई देता है परन्तु वह देखे का अनदेखा करती है | जागरण के ऊँचे शोर और बारातघर में बजने वाले डी जे – पटाखों के शोर के बारे में पुलिस से शिकायत करने पर परिणाम कुछ भी नहीं  होता | पहले पुलिस आयेगी नहीं और आयेगी भी तो शोर मचाने वालों से समझौता करके चली जायेगी | ऐसा अक्सर देखा गया है | इसके अलावा रिहायसी क्षेत्रों में कल- कारखानों का शोर भी लोगों को बहुत दुखी करता है |

     कानून के हिसाब से शहरों में रात दस बजे के बाद पटाखे चलाना मना है | रात दस बजे से सुबह छै बजे तक ७५ डेसिबल (अर्थात एक कमरे में साधारण आवाज ) ( कान में धीरे से बोलने की आवाज १५ डेसिबल होती है ) से अधिक का शोर गैर कानूनी है | इस क़ानून का उल्लंघन करने पर एक लाख रुपये का जुर्माना या पांच साल तक की जेल अथवा दोनों सजा एक साथ हो सकती हैं | इसके लिए पुलिस में रिपोर्ट करनी पड़ेगी और मुकदमा दर्ज करना पडेगा |

     यदि पुलिस में रिपोर्ट की जाय तो जागरण, डी जे, हौर्न और कल-कारखानों के शोर से मुक्ति मिल सकती है | समस्या यह है कि लोग पुलिस का सहयोग नहीं मिलने और कानूनी पेचदगी से डर कर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं करते जिसकी वजह से ध्वनि प्रदूषण निरोध कानून की खुलेआम अवहेलना होती है | कौन पहल करेगा ? हम सब तो मसमसाते रहते हैं | घर में बैठे बैठे अपनी बेचैनी बढ़ाने के बजाय इसके विरोध में पुलिस को सूचित करने का प्रयास तो हम कर ही सकते हैं | गली बिरखांत में कुछ और ...

पूरन चन्द्र काण्डपाल, ०४.०१.२०१७


Pooran Chandra Kandpal

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दिल्ली बै चिठ्ठी ऐ रे ,

ज्यादै आत्म-विश्वास लै भल नि हुन

     २९ दिसम्बर २०१६ कि ‘भैम’ वालि चिठ्ठी जो एक संस्मरणात्मक चिठ्ठी छी उ पर कएक मितुरों ल आपणि कीमती टिप्पणी/ प्रतिक्रिया करी जो मिडिया में एक भलि बात हइ | लेखक कैं यहै ज्यादै और चैंछ लै क्ये ? तुमु बिचरां क भल हो जो तुमुल म्यर पुठ थपथपा | यसिक्ये थपथपूनै रया तब चिठ्ठी टैम पर भेजुल और दगाड में यौ लै कै दिनू की पैली आपण देह कि रक्षा शराब- धूम्रपान- गुट्क है करला तब हमरि खूस-खबर कि याद रौलि |
     भैम वाइ चिठ्ठी में त्याड़ि ज्यू क म्ये पर ज्यादै यकीन करण एक अति-आत्मविश्वास छी | उनूल मी हैं कभैं यौ पुछण कि जरवत नि समझि कि अचानक यूं सबूं कैं म्यर बौं खुट छ्वट क्यलै नजर आछ ? अगर ऊँ मीकैं कुरेदें छिया तो शैद मी उनुकैं सांचि बात बतै दिछी | उनूल कुरेद ना और मी लै चणी रयूं | उनर म्ये में चुपचाप यतू अति-आत्मविश्वास है गोय कि ‘मी उनुहैं मजाक नि करि सकन औ झुटि लै नि बलै सकन |’ आत्मविश्वास क बाद में अति-आत्मविश्वास पनपण लागूं जब क्वे लै आपण खुद क भरौस कैं लै गंभीरता ल नि ल्हीन |

     आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास में भौत फरक छ | आत्मविश्वास हुण ठीक हय जबकि अति-आत्मविश्वास हुण ठीक बात नि हइ | आत्मविश्वास जां सृजनात्मक हुंछ वै अति-आत्मविश्वास घातक हुंछ | यैक कएक उदाहरण छीं | विष्णु शर्मा आपणी किताब ‘पंचतंत्र’ में हमुकैं खरगोश और कछुवे कि कहानि बतै गईं | खरगोश अति-आत्मविश्वास क कारण खुद कैं भौत तेज दौड़णी और कछु कैं फिसड्डी समझि बेर ऐराम करनै स्ये गोय और अचानक जब वीकि नीन खुली तो कछु तब तली जिति गोछी |

     उड़न सिक्ख प्रख्यात धावक मिल्खा सिंह क बार में लै  लोग कुछ यसै कौनी | उनुकैं अति-आत्मविश्वास है गोछी कि १९६० रोम ओलम्पिक में उनर  पदक पक्क हैगो और ऊँ पदक क नजीक पुजि लै गाछी | यौ ई दौरान उनूल पिछाड़ि गर्दन घुमै बेर आपण प्रतिद्वंदी कैं देखण चाछ और यौ ई पल ऊँ सेकेण्ड क दसूं हिस्स ल पदक है वंचित रै गईं | उनर बाद वाल खिलाड़ि यौ ई पल पदक ल्हीगो | अति-आत्मविश्वास में क्रिकेट क कएक खिलाड़ि लै  अनायास विकट गवै भैटनी या विकेट ल्हींण में असफल रौनी |

     वर्ष १६६२ में म्यार इस्कूल कि आठूँ दर्ज कि सालाना बोर्ड परीक्षा में म्यर मेरे एक आत्मविश्वासी सहपाठी कैं गणित क मासैपों ल इम्त्यान ख़तम होते ही एक जोर का थप्पड़ रसीद करि दे जैल उ चौद वर्ष क छात्र धड़ाम सै मुणि पड़ि गोय | गणित क प्रश्न पत्र कैं उ छात्र मात्र एक घंट में हल करि बेर भ्यार ऐ गोय | मासैपों कैं भल नि लाग क्यलै कि उ छात्र कक्षा में गणित में सबू है भल छी और उहैं बै मासैपों कैं भौत उम्मीद छी | प्रश्न पत्र कुछ कठिन लागैं रौछी | मासैपों कैं लागौ कि यतू जल्दी दस सवाल हल नि है सकन | छात्र क जल्दी भ्यार औण पर उनुकैं गुस्स ऐ गोय और उ गुस्स कैं थप्पड़ क रूप में छात्र पर उतारि दे | छात्र ल ठाड़ हुनै जबाब दे, “मासैप मीकैं आत्मविश्वास छ कि म्यार सब सवाल सही ह्वाल | परीक्षा परिणाम मंा वीक गणित में सौ प्रतिशत अंक छी अर्थात सबै दस सवाल सही | मसैपों ल वीक आत्मविश्वास कि तारिफ करि बेर उ दगै अंग्वाव किटनै दुःख जता पर इनाम क उ थप्पड़ उकैं आज लै याद छ |

     बस आखिर में यतुक्वे कौण चानू कि आत्मविश्वास हुण चैंछ और अति-आत्मविश्वास है बचन चैंछ |

पूरन चन्द्र काण्डपाल, ०५.०१.२०१७

Pooran Chandra Kandpal

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बिरखांत -१४१  : पौरुषत्व के लिए खतरनाक है मोबाइल ,११.०१.२०१७

     (शुक्राणुओं पर असर डालने वाले मोबाइल फौन की यह बिरखांत कुंवारे युवाओं को समर्पित है | ) मोबाइल फौन का अविष्कार वर्ष १९७३ में अमेरिका के मार्टिन कूपर ने किया | हमारे देश में इसका प्रचलन १९९५ में हुआ | वर्तमान में हमारे देश में मोबाइल फौनों के संख्या लगभग दो सौ करोड़ से अधिक बताई जाती है जो दिनोंदिन बढ़ते जा रही है | मोबाइल के फायदे तो हम सभी जानते हैं | आज मोबाइल फौन एक नितांत आवश्यक वस्तु बन गया है | हम अपने देश में एक साधारण आय वाले व्यक्ति के पास भी मोबाइल फौन देखते हैं | अब तो मोबाइल से अनेकानेक कार्य हो रहे हैं, यहाँ तक कि ‘मेरा बटुवा मेरा बैंक’ भी मोबाइल को बताया जा रहा है |

     किसी भी उपयोगी वस्तु का यदि दुरुपयोग हो तो वह हानिकारक भी होती है | ‘अति सर्वत्र वर्जेत’ भी कहा गया है | अत्यधिक मोबाइल के प्रयोग से स्पोंडिलाइटिस सहित कई बीमारियाँ बताई जाने लगी हैं | बच्चों की आँखों पर भी इसका दुष्प्रभाव बताया जा रहा है | इन सबसे भी बड़ी हानि प्रजनन चिकित्सा विशेषज्ञों ने मोबाइल उपयोग से पुरुषों में नपुंसकता (इन्फरटिलिटी) का खतरा बताया जा रहा है | मां बनने वाली महिलाओं को भी मोबाइल फौन का अधिक उपयोग गर्भ शिशु के लिए हानिकारक हो सकता है |

      एक समाचार के अनुसार डेड़ सौ से अधिक चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस पर गहन चर्चा के बाद यह तथ्य बताया है | विदेश में की गयी एक सर्वे और शोध के आधार पर उन्होंने बताया है की प्रतिदिन चार घंटे से अधिक समय तक मोबाइल फौन का इस्तेमाल करने वाले पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या और उनकी गतिशीलता सामान्य से कम पायी गयी | इस बात का समर्थन ‘फर्टिलिटी एंड स्टर्लिटी’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी किया | उन्होंने स्पष्ट किया कि मोबाइल फौन के कारण सेमिनल फ्लूड (बीर्य) की गुणवता में भी कमी आयी है | 

     ब्रिटेन में एक्सेटर विश्वविद्यालय में भी एक अध्ययन किया गया जहां एक शोध में पाया गया कि पतलून की जेब में मोबाइल रखने पर शुक्राणुओं की गुणवता में कमी आती है | भारत में इस कारण चालीस प्रतिशत मामलों में दम्पतियों में गर्वधारण में कठिनाई हुयी जिसे विभिन्न चिकित्सा के माध्यम से दुरुस्त किया गया |

     एक स्वस्थ युवा में शुक्राणुओं (स्पर्म) की संख्या चार करोड़ से तीस करोड़ प्रति मिली लीटर सेमिनल फ्लूड होनी चाहिए | इससे नीचे की संख्या कम अर्थात अस्वस्थ मानी जायेगी | सेमिनल फ्लूड का वौल्यूम भी ढाई मिलीलीटर होना चाहिए | यदि ये दोनों कम हैं तो युवाओं को पिता बनने के लिए चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यकीय है | बचाव के बतौर कहा जा सकता है कि कुंवारे युवाओं को मोबाइल फौन पतलून की जेब में नहीं रखना चाहिए और स्वयं को स्वस्थ वैवाहिक जीवन से गुजरने देना चाहिए | कहा भी है (‘prevention is better than cure’ ) उपचार से बचाव उत्तम है | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल,११.०१.२०१७ 


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बिरखांत – १४२ : कबूतरों से श्वसन रोग, १८.०१.२०१७

     अक्सर लोग पक्षियों को दाना- पानी डाल कर पुण्य कमाने की बात करते हैं | प्रकृति का एक नियम है कि यहाँ सबके लिए प्राकृतिक तौर पर भोजन- पानी उपलब्ध है | चिड़िया किसी से कुछ नहीं मांगती, खुद अपने लिए दाना- दुनका चुग लेती है | बाज किसी से नहीं मांगता, अपना शिकार ढूंढ लेता है | चील, उल्लू, चमगादड़ से लेकर कबूतर, गौरैया और हमिंग बर्ड तक सब अपना- अपना भोजन ढूंढ ही लेते हैं | इनकी संख्या प्रकृति से ही संतुलित रहती है | यदि कभी –गौरैया कम हुयी है तो वह भोजन की कमी से नहीं बल्कि मनुष्य द्वारा दवा के नाम पर शिकार हुयी है | गिद्ध कम हुए तो किसी ने मारे नहीं बल्कि दवाओं के जहर से मृत पशु को खाने से मर गए | केवल आपदा को छोड़कर कर कुदरत में संख्या संतुलन हमेशा बना रहता है |

     शहरों में विशेषतः महानगरों में कबूतरों को देखा- देखी दाना- पानी डालने की होड़ सी लग गयी है | फलस्वरूप इनकी संख्या तेजी से बढ़ गयी है | इतिहास में भलेही कबूतर कभी डाक पहुंचाने का काम करते होंगे परन्तु आज कबूतर मनुष्य को बीमारी फैला रहे हैं | इनसे प्यार- दुलार मनुष्य के लिए दुखदायी हो सकता है | कबूतरों द्वारा घरों के आस-पास डेरा जमाये जाने से लोग दमा, ऐलर्जी और सांस सम्बन्धी लगभग दर्जनों बीमारियों के चपेट में आ सकते हैं | कबूतर के बीट जिसमें से बहुत दुर्गन्ध आती है, और हवा में फ़ैली उनके सूक्ष्म पंखों (माइक्रोफीदर्स) से जानलेवा श्वसन बीमारियाँ हो सकती हैं |

     दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित ‘पटल चैस्ट इन्स्टीट्यूट’ के अनुसार कबूतर की बीट से ‘सेंसिटिव निमोनाइटिस’ होता है जिसमें बीमार को खांसी, दमा, सांस फूलने की समस्या हो सकती है | कबूतरों के पंखों से ‘फीदर डस्ट’ निकलती है जो कई बीमारियों की जड़ है | यह समस्या कबूतरों के सौ मीटर दायरे तक गुजरने वाले व्यक्ति पर पड़ सकती है | इसके बीट और फीदर डस्ट से करीब दो सौ किस्म की ऐलर्जी होती है | इनके पंखों की धूल से धीरे- धीरे फेफड़े जाम होने लगते हैं और छाती में दर्द या जकड़न होने लगती है |

     पर्यावरणविदों का मानना है कि कबूतरों की संख्या बढ़ने और इनसे जनित रोग लगाने के लिये इंसान ही जिम्मेदार है | जगह- जगह पुण्य के नाम पर दाना डालने से कबूतरों की प्रजनन शक्ति बढ़ रही है जो पर्यवरण  के लिए बेहद खतरनाक है | उनका मानना है कि पक्षियों को दाना खुद ढूढ़ना चाहिए | जब पक्षी अपना भोजन खुद ढूंढ रहा होता है तो उसकी प्रजनन क्षमता संतुलित रहती है | कबूतरों के लिए रखे गये पानी से भे बीमारियाँ फैलती हैं |

     अतः पक्षियों को अपना काम स्वयं करने दें तथा पर्यावरण के प्राकृतिक संतुलन में दखल न दें | कुछ लोग पेड़ों के तने के पास चीटियों को भी आटा डालते हैं | इससे पेड़ उखड़ते है क्योंकि चीटियाँ आटे को जमीन में ले जाती और बदले में मिट्टी बाहर लाती हैं | ऐसे पेड़ हल्के तूफ़ान से ही गिर जाते हैं  | चीटियाँ हमारे दिए भोजन की मोहताज नहीं हैं | वे अपना भोजन खुद तलाश लेती हैं | अबारा कुत्तों को भी लोग बड़े दया भाव से खाना डालते हैं परिणाम यह होता है कि वे भोजन की खोज में नहीं जाते और एक ही स्थान पर उनकी संख्या बढ़ते रहती है जिससे कुत्ते काटने के केस बढ़ते जा रहे हैं | कबूतर, चीटी या कुत्ते के बजाय किसी जनहित संस्था, वृक्ष रोपण, अनाथालय या असहाय की मदद पर खर्च करके भी पुण्य कमाया जा सकता है | अगली बिरखांत में कुछ और..

पूरन चन्द्र काण्डपाल, १८.०१.२०१७   


Pooran Chandra Kandpal

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बिरखांत- १४३ : ऐसा अखबार वाला ,२५.०१.२०१७

     जिन लोगों को प्रतिदिन अखबार पढ़ने की लत (आदत) लग चुकी हो  उन्हें सुबह होते ही कुछ मिले या न मिले अखबार जरूर चाहिए | यदि अखबार समय पर नहीं आया तो समझो बेचैनी बढ़ गयी | अड़ोस- पड़ोस में पूछताछ होने लगती है कि उनके पास अखबार पहुंचा कि नहीं ? अखबार का नशा लगना बहुत अच्छा नशा समझा जाता है | बच्चों में भी अखबार की आदत डाली जानी चाहिए | प्रत्येक पाठक के लिए अखबार का अपना महत्व है |

     मुझे भी अखबार पढ़ने का क्रोनिक( लाइलाज) नशा है | बिना अखबार के ऐसा लगता हे जैसे आज दिन ही नहीं निकला | रबर बैंड में गोलाई से लिपटा हुआ मेरा अखबार प्रतिदिन सुबह सात बजे हमारे दरवाजे पर टकराते हुए अपने पहुँचने की दस्तक देता है | टकराने की दस्तक (ठाssक.. ) सुनते ही मैं उस ओर तेजी से लपक कर जाता हूँ | जब तक में अखबार उठाता हूँ अखबार वाला दूसरी जगह अखबार सटकाते हुए नजर आता है | करीब बाईस- तेईस वर्ष का है वह | तेज- तर्रार- चटक- स्मार्ट पर बोलता कम है | बाज –चील जैसी आखें हैं उसकी और निशाना तो इतना सटीक कि जिस ओर अख़बार सटकाता है ठीक उसी जगह गिरता है | क्या जजमेंट है उसका, वाह !

     वह करीब पिछले चार –पांच वर्ष से अखबार ला रहा है | तब वह बारहवीं में पढ़ता होगा | पहले कोई और लाता था | उसकी चुस्ती-फुर्ती देख उससे बात करने की जिज्ञासा कई दिन से मन में पनप रही थी | एक दिन अपनी छटपटाहट शांत करने के लिए मैं उस जगह पर चला गया जहां वह करीब तीन सौ अखबारों का चट्ठा मोटर साइकिल में बाँध कर लाता है | मैंने एक साथ कई सवाल पूछ लिए उससे, जिनका उत्तर उसने बड़ी तेजी से बिना रुके हुए इस तरह दिया –

     “सर सुबह चार बजे उठाता हूँ और पांछ बजे अखबार डिस्ट्रीब्यूसन सेंटर पहुंचता हूँ | होलसेलरों से अपने अखबार उठाता हूँ और आठ बजे तक अखबार बांट कर वापस घर पहुँच जाता हूँ | सर, मैं गरीब घर से हूँ | बारहवीं के बाद आगे पढ़ना चाहता था पर घर की हालात सही नहीं होने से पढ़ नहीं सका | अखबार बांट कर कुछ पैसे कमा लेता हूँ | बी कौम कर लिया है अब एम कौम कर रहा हूं | दिन में एक सी ए के पास काम करता हूँ और सीखता भी हूँ | घर आकर पढ़ाई करता हूँ | एम कौम के बाद एस सी डी एल से एम बी ए करने की ठान रखी है |” सबकुछ बता कर “अच्छा सर देर हो रही है” कह कर किस्तों में उधार ली गयी सेकेण्ड हैण्ड मोटर साइकिल पर किक मार कर वह आँखों से ओझल हो गया |

     हमने सुना था कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति क्लिंटन के बेटी चेल्सिया भी अपनी पाकेट मनी (खुद कमाकर खर्चना चाहती थी ) के लिए घर- घर अखबार पहुंचाती थी | हमारे पूर्व राष्ट्रपति कलाम (भारत रत्न) का आरंभिक जीवन भी धनुषकोटी (तमिल नाडू) में अखबार बाँटते हुए गुजरा | अपने अखबार वाले की कहानी सुनकर मैं उससे बहुत प्रेरित हुआ और उसकी तुलना उन परिवारों के बच्चों से करने लगा जो अत्यधिक सुविधा संपन्न होने के बावजूद भी उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाते या नहीं कर पाए बल्कि स्कूली शिक्षा भी बमुश्किल नक़ल मार कर ही उत्तीर्ण होते हैं | जाड़ा- गर्मी –बरसात, आंधी- तूफ़ान का प्रखर प्रहार इस अखबार वाले के मार्ग को अवरुद्ध नहीं करता | वह निरंतर अपने निर्धारित गति से काम करता है, एक खुद्दार की तरह आगे बढ़ता है | इस कहानी की चर्चा घर के नौनेहालों से की जाय तो शायद कुछ प्रेरणा मिले | अगली बिरखांत में कुछ और...

पूरन चन्द्र काण्डपाल, २५.०१.२०१७

 

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