Author Topic: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari  (Read 10914 times)

धनेश कोठारी

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #20 on: January 11, 2011, 04:11:48 PM »
बादशाहत का आखिरी दिन साबित हुआ था 11 जनवरी
टिहरी आज भले ही अपने भूगोल के साथ उन तमाम किस्सों को भी जलमग्न कर समाधिस्थ हो चुकी है। जिनमें टिहरी रियासत की क्रुर सत्ता की दास्तानें भी शामिल थीं। जिनमें ‘राजा’ को जिंदा रखने के लिए दमन की कई कहानियां बुनी और गढ़ी गई। वहीं जिंदादिल अवाम का जनसंघर्ष भी जिसने भारतीय आजादी के 148 दिन बाद ही बादशाहत को टिहरी से खदेड़ दिया था। इतिहास गवाह है ‘भड़’ इसी माटी में जन्में थे।
टिहरी की आजादी के अतीत में 30 मई 1930 के दिन तिलाड़ी (बड़कोट) में वनों से जुड़े हकूकों को संघर्षरत हजारों किसानों पर राजा की गोलियां चली तो जलियांवाला बाग की यादें ताजा हो उठी। इसी वक्त टिहरी की मासूम जनता में तीखा आक्रोश फैला और राज्य में सत्याग्रही संघर्ष का अभ्युदय हुआ। जिसकी बदौलत जनतांत्रिक मूल्यों की नींव पर प्रजामण्डल की स्थापना हुई और पहला नेतृत्व जनसंघर्षों से जन्में युवा श्रीदेव सुमन को मिला। यह राजतंत्र के जुल्मों के खिलाफ समान्तर खड़े होने जैसा ही था। हालांकि, राजा की क्रूरता ने 25 जुलाई 1944 के दिन सुमन की जान ले ली थी। 84 दिनों की ऐतिहासिक ‘भूख हड़ताल’ के बाद क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन ‘बेड़ियों’ से हमेशा के लिए रिहा हो गये। जनसंघर्ष यहां भी न रुका। तब तक अवाम लोकशाही व राजशाही के फर्क को जान चुकी थी। फिर जुल्मों से जन्मीं जनक्रांति का झण्डा कामरेड नागेन्द्र सकलानी ने संभाला। यह नागेन्द्र और साथियों का ही मादा था कि, उन्होंने आखिरी सांसों तक 1200 साला हकूमत से टिहरी को रिहाई दिलाई।
सामन्ती जंक-जोड़ को पिघलाने वाले इस जांबाज का जन्म टिहरी की सकलाना पट्टी के पुजारगांव में हुआ था। 16 की उम्र में ही सामाजिक सरोकारों को समझने वाला नागेन्द्र सक्रिय साम्यवादी कार्यकर्ता बन चुका था। इसी बीच रियासत अकाल के दैवीय प्रकोप से गुजरी तो राजकोष को पोषित करने व आयस्रोतों की मजबूती के लिए भू-व्यवस्था एंव पुनरीक्षण के नाम पर जनता को ढेरों करों से लाद दिया गया। नागेन्द्र ने गांव-गांव अलख जगा आंदोलन को धार दी। इसी दौर में उनकी कार्यशैली व वैचारिकता के करीब एक और योद्धा दादा दौलतराम भी उनके हमकदम हुए। नतीजा, राजा का बंदोबस्त कानून क्रियान्वित नहीं हो सका।
राजशाही से क्षुब्ध लोगों ने सकलानी व दौलतराम की अगुवाई में लामगद्ध होकर कड़ाकोट (डांगचौरा) से बगावत का श्रीगणेश किया। और करों का भुगतान न करने का ऐलान कर डाला। किसानों व राजशाही फौज के बीच संघर्ष का दौर चला। नागेन्द्र को राजद्रोह में 12 साल की सजा सुनाई गई। जिसे ठुकरा सुमन के नक्शेकदम पर चलते हुए नागेन्द्र ने 10 फरवरी 1947 से आमरण अनशन शुरू किया। मजबूरन राजा को अनचाही हार स्वीकारते हुए सकलानी को साथियों सहित रिहा करना पड़ा। राजा जानता था कि सुमन के बाद सकलानी की शहादत अंजाम क्या हो सकता है।
तभी जनता ने वनाधिकार कानून संशोधन, बराबेगार, पौंणटोंटी जैसी कराधान व्यवस्था को समाप्त करने की मांग की। मगर राजा ने इसे अनसुना कर दिया। इसी दौर में प्रजामण्डल को राज्य से मान्यता मिली। पहले अधिवेशन में कम्युनिस्टों के साथ अन्य वैचारिक धाराओं ने भी शिरकत की। यह अधिवेशन आजादी के मतवालों के लिए संजीवनी साबित हुआ।
सकलाना की जनता ने स्कूलों, सड़कों, चिकित्सालयों की मौलिक मांगों के साथ ही राजस्व अदायगी को भी रोक डाला। विद्रोह को दबाने के लिए विशेष जज के साथ फौज सकलाना पहुंची। यहां उत्पीड़न और घरों की नीलामी के साथ निर्दोंष जेलों में ठूंस जाने लगे। ऐसे में राजतंत्रीय दमन की ढाल को सत्याग्रहियों की भर्ती शुरू हुई। मुआफीदारों ने आजाद पंचायत की स्थापना की तो इसका असर कीर्तिनगर परगना तक हुआ। क्रांति के इस बढ़ते दौर में बडियार में भी आजाद पंचायत की स्थापना हुई।
10 जनवरी 1948 को कीर्तिनगर में बंधनों से मुक्ति को जनसैलाब उमड़ पड़ा। राजा के चंद सिपाहियों ने जनाक्रोश के भय से अपनी हिफाजत की एवज में बंदूकें जनता को सौंप दी। इसी बीच सत्याग्रहियों की जनसभा में कचहरी पर कब्जा करने का फैसला हुआ। पहले ही एक्शन में कचहरी पर ‘तिरंगा’ फहराने लगा। खबर जैसे ही नरेन्द्रनगर पहुंची तो वहां से फौज के साथ मेजर जगदीश, पुलिस अधीक्षक लालता प्रसाद व स्पेशल मजिस्टेªट बलदेव सिंह 11 जनवरी को कीर्तिनगर पहुंचे। राज्य प्रशासन ने कचहरी को वापस हासिल करने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन जनाक्रोश के चलते उन्हें मुंह की खानी पड़ी। फौज ने आंसू गैस के गोले फेंके तो भीड़ ने कचहरी को ही आग के हवाले कर दिया।
उधर, प्रजामण्डल ने राज्यकर्मियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर इन्हें पकड़ने का जिम्मा सत्याग्रहियों को सौंपा। हालातों को हदों से बाहर होता देख अधिकारी जंगल की तरफ भागने लगे। आंदोलनकारियों के साथ जब यह खबर नागेन्द्र को लगी तो उन्होंने साथी भोलू भरदारी के साथ पीछा करते हुए दो अधिकारियों को दबोच लिया। सकलानी बलदेव के सीने पर चढ़ गये। खतरा भांपकर मेजर जगदीश ने फायरिंग का आदेश दिया। जिसमें दो गोलियां नागेन्द्र व भरदारी को लगी, और इस जनसंघर्ष में दोनों क्रांतिकारियों शहीद हो गये। शहादत के गमगीन माहौल में राजतंत्र एक बार फिर हावी होता कि, तब ही पेशावर कांड के वीर योद्धा चन्द्रसिंह गढ़वाली ने नेतृत्व अपने हाथ में लिया था।
12 जनवरी 1948 के दिन शहीद नागेन्द्र सकलानी व भोलू भरदारी की पार्थिव देहों को लेकर आंदोलनकारी टिहरी रवाना हुए। अवाम ने पूरे रास्ते अमर बलिदानियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलियां दी। 15 जनवरी को शहीद यात्रा के टिहरी पहुंचने से पहले ही वहां भारी आक्रोश फैल चुका था। जिससे डरकर राजा मय लश्कर नरेन्द्रनगर भाग खड़ा हुआ। ऐसे में सत्ता जनता के हाथों में आ चुकी थी। और फिर आखिरकार 1 अगस्त 1949 को टिहरी के इतिहास में वह भी दिन आ पहुंचा जब भारत सरकार ने उसे उत्तर प्रदेश में शामिल कर पृथक जिला बनाया। निश्चित ही नया राज्य ऐसे ही जनसंघर्षों का फलित है। जोकि ‘एक बेहतर आदमी की सुनिश्चिता’ के बगैर आज भी अधूरी हैं।

धनेश कोठारी

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #21 on: February 08, 2011, 04:07:42 PM »
बसंत

बसंत
हर बार चले आते हो
ह्‍यूंद की ठिणी से निकल
गुनगुने माघ में
बुराँस सा सुर्ख होकर

बसंत
दूर डांड्यों में
खिलखिलाती है फ्योंली
हल्की पौन के साथ इठलाते हुए
नई दुल्हन की तरह

बसंत
तुम्हारे साथ
खेली जाती है होली
नये साल के पहले दिन
पूजी जाती है देहरी फूलों से
और/ हर बार शुरू होता है
एक नया सफर जिन्दगी का

बसंत
तुम आना हर बार
अच्छा लगता है हम सभी को
तुम आना मौल्यार लेकर
ताकि
सर्द रातों की यादों को बिसरा सकूं
बसंत तुम आना हर बार॥

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #22 on: February 12, 2011, 06:58:22 AM »

अति सुंदर कविता सर..

ऋतू राज बसंत पर..

बसंत

बसंत
हर बार चले आते हो
ह्‍यूंद की ठिणी से निकल
गुनगुने माघ में
बुराँस सा सुर्ख होकर

बसंत
दूर डांड्यों में
खिलखिलाती है फ्योंली
हल्की पौन के साथ इठलाते हुए
नई दुल्हन की तरह

बसंत
तुम्हारे साथ
खेली जाती है होली
नये साल के पहले दिन
पूजी जाती है देहरी फूलों से
और/ हर बार शुरू होता है
एक नया सफर जिन्दगी का

बसंत
तुम आना हर बार
अच्छा लगता है हम सभी को
तुम आना मौल्यार लेकर
ताकि
सर्द रातों की यादों को बिसरा सकूं
बसंत तुम आना हर बार॥


धनेश कोठारी

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‘लोक’ संग ‘पॉप’ का फ्यूजन अंदाज है ‘हे रमिए’
इसे लोकगीतों की ही तासीर कहेंगे कि उन्हें जब भी सुना/गुनगुनाया जाय वे भरपूर ताजगी का अहसास कराते हैं। इसलिए भी कि वे हमारे मर्म, प्रेम द्वन्द और खुशी से उपजते हैं। युवा गायक रजनीकांत सेमवाल ने बाजार के रूझान से बेपरवाह होकर विस्मृति की हद तक पहुंचे ‘लोक’ को आवाज दी है। जिसका परिणाम है उनकी ‘टिकुलिया मामा’ व ‘हे रमिए’ संकलन। जिनमें हमारा ही समाज अपने ‘पहाड़ीपन’ की बेलाग पहचान के साथ गहरे तक जुड़ा हुआ है।
रामा कैसेटस् की हालिया प्रस्तुति ‘हे रमिए’ में रजनीकांत सेमवाल लोकजीवन के भीतर तक पहुंचकर एक बार फिर लाते हैं ‘पोस्तु का छुम्मा’ को। जिसे दो दशक पहले हमने लोकगायक कमलनयन डबराल के स्वरों के साथ ठेठ जौनपुरी अंदाज में सुना था। रजनीकांत की आवाज में सुनने के बाद फर्क सिर्फ इतना है कि पहाड़ी संगीत ने इस अंतराल में अपने कलेवर व मिजाज दोनों को बदला है। मधु मंमगाई के साथ रांसो की बीट पर यह गीत आज भी पैरों में वही थिरकन पैदा कर जाता है।
गीतकार राहुल सेमवाल व जगदीश शरण के उमदा शब्दांकन से सजे संकलन के शीर्षक गीत ‘हे रमिए’ वेस्टर्न पैटर्न में वायलियन व सैक्सोफोन के बेहतर प्रयोग के साथ खासा आकर्षित करता है। इश्क में पगी यह पेशकश विविध आयामों, रंगों, ऋतुओं, समयों, प्रतीकों को साथ रखकर ‘रमिए’ को फल-फुलने की दुआ देता है।
पहाड़ी भाषा में कहा जाता है ‘मिसै कि नाचण’ यानि एक रचे बसे अंदाज में तल्लीन होकर नाचना। ‘तुमारी याद मा’ गीत दिलों को कुछ इसी अंदाज में झंकृत करता है। इस गीत में भले ही प्रेमिका के विरह में ‘ग्रास’ न निगला जाये। लेकिन गीत रिझभिझ कर गले उतरता है। दीपक थपलियाल ने सुन्दर लिखा तो रजनीकांत के स्वरों से गीत अच्छा बना है।
पहाड़ों में सदियों से जारी कफू की संदेश वाहिकता सेमवाल के इस गीत ‘बासला म्यर कफू’ में सूदूर कांठियों से विवाहिता को एकुलास में भी तसल्ली बख्शती है। उसके उम्मीदों के जैसा ही मायके का प्यार उतना ही जीवंत आज भी है। जितना उसके वहां रहते था। यह गीत कर्णप्रिय श्रोताओं के मर्म को छुकर गहरे तक आनन्दित करता है। या कहें की ‘हे रमिए’ का यह सबसे खुबसूरत गीत भी है।
सूदूर वादियों में मेले प्रेमी प्रेमिकाओं के सबसे आसान मिलन केंद्र के रूप में प्रचलित ठिकाने रहे हैं। हालांकि हजारों की भीड़ में समाज का डर यहां भी जायज होता है। लेकिन बावजूद इसके मिलन की जुगत भी स्वाभाविक है। क्योंकि प्रेम का आशय समझने के बाद भला कौन इस अहसास से महरूम होना चाहेगा। ‘मुखे मिलदी’ जौनसार की सांस्कृतिक थाती में पगा प्रमिला जोशी द्वारा लिखा यह गीत सेमवाल से अधिक प्रमिला के ठेठ स्वरों में बेहद सुन्दर लगता है। प्रमिला जोशी के लिखे एक और सुन्दर गीत में ‘नीलू ऐ’ को भी शामिल किया जा सकता है। रजनीकांत ने विरह प्रदान इस गीत को अपने अंदाज में गाया है। जोकि औसत से कुछ ठीक है। गीत के मूड में जौनसारी के साथ ही नेपाली भाषा का हल्का सा टच अच्छा बन पड़ा है।
मुखबा क्षेत्र की वास्तविक घटना से जुड़ा कथात्मक गीत ‘ऐला चाचा’ को सेमवाल ने हिपहॉप स्टाईल में पेश किया है। नई पीढ़ी को माफिक रैप म्यूजिक के सामंजस्य से बना यह गीत युवाओं को खासा पंसद भी आयेगा। पुराने लोग इस गीत को इससे पहले ओम बधानी के स्वरों में भी सुन चुके है।
संकलन के आखिरी में पोस्तू का छुम्मा को सेमवाल ने रिमिक्स में प्रस्तुत किया है। लोक और पॉप से निकला यह फ्यूजन सॉन्ग का कमाल का है। तकनीकी का कमाल भी कह सकते हैं रिमिक्स पोस्तू का छुम्मा को।
सेमवाल के स्वरों में ताजगी के साथ वेरियेशन बड़ी खासियत है। अच्छा लगता है कि जब गीत के भावों के अनुरूप आवाज नशा पैदा करती है। मध्य तार सप्तकों में सजे रजनीकांत की ‘हे रमिए’ को सुनते हुए लगता है कि अब पहाड़ी संगीत अतीत के विरह से निकलकर युवापन में एक अलग पॉप फ्यूजन के लिबास में भी चहकने लगा है। रजनीकांत के इस एलबम में प्रमिला जोशी, मधु मंमगाई जहां स्वरों की ताजगी से रूबरू कराते हैं वहीं अमित विश्नोई व अमित वी कपूर का संगीत लोकसंगीत को नये अंदाज में प्रस्तुत करता है। यानि कि कुल जमा रजनीकांत पुराने लोक को साथ लेकर नई पीढ़ी के प्रतिनिधि गायक माने जा सकते हैं।

धनेश कोठारी

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नदी क्यों सिखाया मुझे

नदी !
तुने क्यों सिखा दिया मुझे
अपनी तरह बहने का पाठ
सब कुछ बहाने की आदत
 
क्यों ? प्रश्रय दिया
पहाड़ों से निकल
मैदानों में समतल होने को
अब, उतर आने के बाद

क्यों नहीं सिखा सकी
कहीं पत्थरों, गंगल्वाड़ों की ओट में
ठहरने का हुनर
हां
मुझे सिखाने से पहले भी तो
बन सकते थे बांध
जहां ठहरकर मैं वापस लौटता
चिन्यालीसौड़ या पीछे तक

समतल में तो तेरी तरह
गंदला गया हूं
न अर्घ्य के और न आचमन लायक

नदी !
मैं अपने दोष
मढ़ रहा हूं तुझ पर
क्योंकि, जी हलका करना है
यद्यपि
तुने तो सिर्फ
रास्ता भर दिखाया था
सच ही तो है कि
सिखने का उतावलापन तो
मेरा ही था

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

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बहुत सुंदर लिखा है सर.

नदियों ने हमें बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ सिखाया !

नदी क्यों सिखाया मुझे

नदी !
तुने क्यों सिखा दिया मुझे
अपनी तरह बहने का पाठ
सब कुछ बहाने की आदत
 
क्यों ? प्रश्रय दिया
पहाड़ों से निकल
मैदानों में समतल होने को
अब, उतर आने के बाद

क्यों नहीं सिखा सकी
कहीं पत्थरों, गंगल्वाड़ों की ओट में
ठहरने का हुनर
हां
मुझे सिखाने से पहले भी तो
बन सकते थे बांध
जहां ठहरकर मैं वापस लौटता
चिन्यालीसौड़ या पीछे तक

समतल में तो तेरी तरह
गंदला गया हूं
न अर्घ्य के और न आचमन लायक

नदी !
मैं अपने दोष
मढ़ रहा हूं तुझ पर
क्योंकि, जी हलका करना है
यद्यपि
तुने तो सिर्फ
रास्ता भर दिखाया था
सच ही तो है कि
सिखने का उतावलापन तो
मेरा ही था

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धनेश कोठारी

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #26 on: September 15, 2011, 03:57:40 PM »
डायरी के पन्ने
(१)
बारिश में भीगता दिन
बीती रात से ही मूसलाधार बारिश रुक रुककर हो रही थी. सुबह काम पर निकला तो शहरभर में आम दिनों जैसी हलचल नहीं थी. मित्रों के साथ त्रिवेणीघाट निकला. गंगा के पानी का रंग गाढ़ा मटमैला होने के कारण हम मान रहे थे कि जलस्तर में कुछ बढ़ोतरी हुई है. लेकिन जब वाटर लेवल पोल को देखा तो और दिनों के मुकाबिल १०-१२ सेमी की वृद्धि ही नजर आयी. सो बाढ़ के कयास धरे रह गए. साथी बता रहे थे कि पिछले साल इसी दिन से गंगा अपना रौद्र रूप दिखाने लगी थी. १८-१९ सितम्बर आते-आते गंगा २०१० के सबसे उच्चतर स्तर ३४१.५२ मीटर पर खतरे के निशान से करीब एक मीटर ऊपर बह रही थी. सो हम अनुमान लगा रहे थे कि क्या इस बार भी गंगा में बाढ़ के हालात पैदा होंगे. हालांकि अभी तक टिहरी झील भले ही लबालब यानि ८२० आरएल से ऊपर भर चुकी है. लेकिन बाढ़ के संकेत वहां से भी नहीं मिल रहे.
उधर, अखबारों में अगले ३६ घंटे तक राज्य में भारी बारिश के अनुमान की खबरे प्रकाशित हैं. शाम होते-होते खबर मिली कि ढालवाला के ऊपरी वार्ड में जंगल से अत्यधिक पानी का सैलाब आने के कारण कई घरों में मलबा भर चुका है. कोई कयास लगा रहा था कि शायद गांव से सटे जंगल में बादल फटा हो. यह कयास ही साबित हुआ. वार्ड में अफरातफरी मच चुकी थी. इसी दौरान क्षेत्र के वर्तमान व पूर्व विधायक भी मौके पर जायजा लेने पहुंच चुके थे. समाधान किसी के पास नहीं था सिवाय अफसोस जताने के. गांव के प्रधान ने बताया कि वे करीब दो साल पहले ही गांव के ऊपरी इलाके में तटबंध बनाने की मांग कर चुके हैं. लेकिन विधायक अपने तकिया कलाम "ह्‌वेजालु" को दोहराने को ही अपनी उपलब्धी मानकर चेले चपाटों के साथ चल दिए.
मित्रों ने दिन में एक बात पर भी ध्यान दिलाया कि जब पिछली बार भी मेजर जनरल खंडूरी सीएम बने थे तो राज्य को काफी आपदाओं का सामना करना पड़ा था. यह भी इत्तेफाक है कि इस बार भी जिस दिन से वे सीएम बने उसी दिन उनके गोपनियता की शपथ लेने के कुछ ही पलों के बाद नरेन्द्रनगर के डौंर गांव में दैबीय आपदा ६ लोगों को लील चुका था.
खैर रात में अन्य दिनों के मुकाबले न गर्मी थी न मुझे पंखा चलाने की जरुरत महसूस हुई. मैं सोच रहा था कि चलो बिजली बचाओ अभियान में मेरा कोई तो योगदान हो रहा है. भले ही यह प्रकृति के कारण हुआ है. काश प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के प्रति हमारी सोच में भी किसी तरह की जागरुकता बढ़े तो हमें गर्मियां भी शायद इसी तरह से सुहानी लगें.......

बुधवार १५ सितम्बर २०११

Bhishma Kukreti

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #27 on: January 07, 2012, 08:45:26 AM »
              Jyundal : Garhwali Poems Showing Aggravating State of Uttarakhand State

                 (Review of Poetry Collection Jyundal of Dhanesh Kothari )

                          Bhishma Kukreti

                        The readers know Dhanesh Kothari as the Garhwali language poet born because of Uttarakhand state movement and Kavita movement in Garhwal by Dhad organization. His poems in his first collection of poems Jyundal are the poems showing frustration, rage, sadness, irritation, hopelessness over the state of a decade old new Uttarakhand state .

The eminent Garhwali poet and critic Virendra Panwar says that the poems of Dhanesh are the poems of awakening to Uttarakhandi.

Dhanesh started the poetry journey when the separate Uttarakhand state movement was on its peak and Dhanesh categorically shows the need, aspiration points for separate Uttarakhand state in a couple of poems in this volume. However, most of the poems in this volumes are pin pointing the non fulfillment of aspirations, anticipates, wishes, needs, utmost necessities of people of Uttarakhand . The poet Dhanesh Kothari lambastes for presnt state of Uttaranchal not only to politicians and authorities but also the people and tell them in plain words to act upon against the politicians or villains with stern punishment:

Tin vote diyale

Tin neta bi binaural

Ab teri ni sundu

At/mar ek khaidai

Dhanesh deals with as many as hundred subjects in this poetry collection , which are burning issues of rural Garhwal and Kumaun. Those burning issues are the deceiving nature of political world, the corrupted administration, the deterring position of villages due to migration, faulty planning spoiling the basic of ecological preposition of Himalaya, increasing imbalances between the riches and living below poverty line , downfalls in the culture and love for own languages and many more. There poems related to social issues, issues related to formal education and informal education taken by the society, water shortage in the land of rivers as Alaknanda , Ganga, Jamuna, Nayar Hinwal etc too in this volume of poetry. Dhanesh uses different images, exclusive symbols and symbolic words or proverbs for narrating each subject differently that all poems become vibrant and compel the readers to read all in one sitting. Dhanesh believes that the job of river is flow and provide fresh water but be within the boundaries too. Same way, Dhanesh uses new symbols but does not hesitate older versions of symbols as “ Laga Khaidai ki”
Dhanesh is expert of describing bigger panorama in few words as famous Urdu poet Nazish Pratapgadhi describes a fearful condition in few words:

Ye bhukh ye jillat ke dere , ye mauto tabahi ke fere

Ab kaun bataye ye sab kuchh, kis samt ishara karte hain

Dhanesh just do not pleads for old orthodox way of thinking but appeal for taking modern ways for betterment of humanity and that is why he choose new style of creation poems in Garhwali. Dhanesh creates poems in all old lyrical style -Geet, non lyrical and atukant poems .
The narrating style of Dhanesh is simple and the readers can connect with the thought of the poet easily . His poems are so vibrant that readers start thinking for some kind of actions . Dhanesh involve readers by many means as emotional exploitation, by sharp satire, by inspirational style and wording . His main aim is to coerce the readers for thinking and be ready for taking some actions.

The present volume Jyundal speaks that the Garhwali language poems are taking new path for becoming competent enough to get recognition among all International languages . The poems of Jyundal provide assurances that very soon garhwali literature will get its due . Definitely , Dhanesh is one of the promising the jewel of Garhwali poetry who will take Garhwali poetry to its zenith.

Jyundal

A Garhwali poetry collection

By Dhanesh Kothari

Dhad Prakashan

74 A New Connaught Place

Dehradun 248001

Price Rs 50

Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai, India, 2010

धनेश कोठारी

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #28 on: November 12, 2012, 01:03:58 AM »
कब टूटलि जग्वा्ळ...

जुग जन्मूं बिटि छै जग्वाळ
ऐंसू आलि बग्वा्ळ, त
म्यूरा घौर बोण,
गौं गुठ्यार, मुल्क देश
बळै जाला रांका, छिल्ला
ओणा कोणों तक पौंछलू उज्याळु
नि जाणि, जब बि ऐ,
ऐ फेक्वांळ सि...
हमेसा मांगणा कू,
देणो कबि ना...
म्योरा अंधेरा दिनूं कू अबि बि जग्वाळ
कि, सैद ऐंसू त आलि बग्वाळ्
सैद, ऐंसू त ह्वेई जालू उज्याळु
सैद, अब नि रैलि जग्वाळ
पण, वा आलि कब...
यांकि बि त् जग्वाळ च........


कवि- धनेश कोठारी   
9412995168

धनेश कोठारी

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Re: Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari
« Reply #29 on: February 26, 2013, 09:46:08 PM »
हाइकू


सरकरी नौकरी
खुणि पाड़ी
वकै देसी


गैरसैंण मा
मजमा
देरादूण मा थौळ

 

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