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Articles On Environment by Scientist Vijay Kumar Joshi- विजय कुमार जोशी जी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:

वैज्ञानिक विजय कुमार जोशी जी के पर्यावरण पर लेख


अल्मोड़ा में ३० सितम्बर १९४१ को जन्मे श्री विजय कुमार जोशी ने १९६४ में लखनऊ विश्विद्यालय से भूविज्ञान में परास्नातक डिग्री लेने के बाद भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण में भूवैज्ञानिक पद पर कार्य किया और निदेशक उत्तरी क्षेत्र के पद से सितम्बर २००१ में सेवानिवृत्त हुए.

सेवाकाल में जोशी जी ने पूरे देश में भिन्न पदों पर विभिन्न स्थानों पर कार्य किया, पर आपका लगाव हिमालय से अधिक रहा. भूविज्ञान में आपको धरा के पर्यावरण के अध्ययन का मौका मिला.

अपने अपार अनुभव को जोशी जी ने सेवानिवृत्ति के बाद फ्रीलांस पत्रकारिता की सहायता से निखारा और अब तक आपके ९०० से अधिक लेख हिंदी तथा अंग्रेजी में देश-विदेश के समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं. उत्तराखण्ड के पर्यावरण एवं विकास पर आप अक्सर लेख लिखा करते हैं।

 मेरापहाड़ के लिए जोशी जी अब क्रमिक लेख लिखने को राज़ी हैं. हम उनका स्वागत करते हैं।


M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:

More About Joshi ji

Born in Uttarakhand in September 1941, Vijay Joshi worked as a geologist with the Geological Survey Of India for 36 years. During this period he covered the length and breadth of the country searching for ground water, mapping the Himalayas for mineral wealth, studied the environments of the pre-historic eras and finally retired as Director, Northern Region, GSI at Lucknow and settled there.

Post retirement in September 2001 Vijay Joshi has taken up free lance journalism and using his experience he normally writes about environment and nature related topics. However, sometimes he does pen down satires too. He writes both in English and Hindi and has published more than 800 articles in all the leading newspapers of India and some leading environmental magazines like Down To Earth and Journal of United Nations Environmental Program.

'Geo-diversity is the cradle of bio-diversity' and he attempts to convey this motto.

Josh Ji has written Articles on following topics.

A Collision of Creativity
A Country Deluged 
Air Microbes Gnaw the Buildings
Alluvium: Nature's Store of Water
Ancient Mangroves in the Womb of the Present 
Ancient Sands Modern Stories   
And, the Clock Stopped !
Anger of Varunavrat
Antiquity of Global Warming
Avalanche Safe Township for Holy Shrine 
Bathymetry Helps to Fathom Tsunami Power
Beware: Coasts are My Territory
Beware! The Land Slides
Biological Black Boxes Carry Tales of Past
Bolt from the Blue 
Bygone Communities Faced Ire of the River   
Catching the Water 
Climate Change and Mothers' Health
Climate History Uncovered from Lake Sediments
Coal Mines: Wardrobes of Carbon Dioxide!
Convert Wasteland into Water Sanctuaries
Cyclones: A Bane for the Coasts
Cyclones Ravage Land of Black Pagoda
Damned by Dam
Death Lurks in White
Delhi's Woes of Water 
Denuded Himalayas
Distressed Habitation 
Do We Have a Roadmap to Seismic Safety?
Dusty Records of Past Climates
Earthquakes Threaten Obelisks of Culture   
Echoes of Tsunamis from the Earth's History
Eco-friendly Habitats to Combat Climate Vicissitudes
Ecological Plunder of Doab Under Colonial Rule
Engulfed by the Sea
Environmental Biomarkers
Fizz in the Soil Carries Mysteries of Past Climates
Fury of Brahmaputra
Ganga Expressway: A Road to Prosperity or Doom?
Ganga Plains: World's Largest Flood Plains 
Ganga: The Soul of India 
Geo Hazards: Are we Prepared?
Giants of the Cold
Gift from the Skies
Groundwater: Manage or Perish   
Heaven on Earth Ravaged
Helpless Against the Nature's Ire   
Highway Dust: An Environmental Hazard
Himalayan 'Hot Spot' Needs Attention
Himalayan Rivers Reflect Climate Shift
Himalayas Versus Plains
How High was the Ancient Sea Level?
How Safe is Nuclear Power?
Hydroelectric Projects in the Shadow of Avalanches
Is Gangotri Glacier in Real Peril?
Is Mumbai Safe from Tremblers?   
Know the Age of Thy Groundwater
Know Your Ganga
Know Your River
Ladakh: A Treasure Trove of Past Climates
Lakes of the Yore have Great Clues
Lakes that Vanished
Land of Sixty Lakes Obscured by Landslides! 
Landforms Reveal Antiquity of Environment
Landslide Spells Doom for the Land of Seven Sisters
Lasting Architecture
Let us Not Redraw the Geography
Life of the Yore has Signatures of Environment
Life on Ambers
Mega Floods of the Past 
Monsoon Woes Recorded in the Caves
Mountain Slides of Tista
Mysteries of the Land of Dead
Narmada: A River on an Unstable Basin
Natural Disaster: A Concern for Security 
Natural Filters for Poison in Water
'Nor'Westers' Usher in the New Year   
Oil Spills: Perils of Development
On the Footsteps of Kautilya! 
On the Trail of Retreating Glaciers
Pages of Past Environment Entombed in a Mine
Parched Throats on the Coasts
Perished on the Coast
Play Safe while Catching Raindrops
Poison in Water: Population in Peril
Poop Holds Secrets of the Past!
Raindrops on the Roof Top
Rainwater Harvesting: What's New About It? 
Reducing the Ravages of Floods
Retreating Glaciers: Nature's Warning 
Return of the Ice Age! 
Revenge of Kosi
Riasi Rocked as Indus Civilization Waned   
Rice Bowl of Andhra Pradesh In Peril
River from the Land of Mystique Spells Doom
River Tourism: A Socio-Environmental Hazard!
Sands of Thar: Key to Past Climates
Save Forests, Save Turbines
Saved by a Canal 
Saved by 'Kat-Ki-Kunni' 
Secrets of Past Monsoons from sediments in Gujarat
Secrets of the Mystery Caves!
Shaky Foundations
Soils: A Graveyard for Carbon
Submerged Towns of the Past: Was it a Tsunami?
Tales from the Lakes
Taming the Silent Killer
Terrible Temblors 
Terror from the Skies
The Art and Science of Water
The Frozen Continent
The Road to Heaven is Too Dark!
The Vanishing Springs
Thermal Springs as Vaults of Nuclear Waste
Today's Development could be a Curse in Future!
Toothless Voters and Crippled Soldiers
Towers of Sand Userp Sands of Time
Tsunami Havoc: Mangroves or Ground Beneath!
Tsunami Unveiled Mystery of Undersea Temple
Tsunamis: The Movers and Shakers
Urban Centers or Aquariums!
Urban Floods: Bane for the People
Urbanization: Threat to Himalayas
Uttaranchal Developing on Shaky Grounds
Vanishing Forests of Tropical Asia
Vijayanagara: The Empire that Vanished!
Was King of Kalinga the Lord of the Ocean?
Water for People and People for Water
Water Harvesting: Let's Do It
Water Tower of Asia Heaves as Ground Shakes
West Bengal Needs Better Disaster Management
When a ship was almost grounded!
When Death Danced on the Sea Coast 
When Earthquakes Rocked the Ice!
When Glaciers were Galore at Badrinath!
When it Poured Over the Thar
When the Earth Trembles!
When the Earth Warmed Up!
When the Sea paid Obeisance to Kanyakumari
Whirlwind Along Andhra Coast
Who is going to be the Next!
Why Kosi Tore the Shackles?

Source : http://www.boloji.com/writers/vijayjoshi.htm

VK Joshi:
पाठकों का अभिनन्दन है. आज मैं अपना फोर्मल लेख तो नहीं दे रहा हूँ, पर पर्वतीय क्षेत्र के पर्यावरण पर कुछ जमीनी विचार आपके सामने रख रहा हूँ. अपने क्षेत्र के पर्यावरण के बारे में आपके और मेरे नजरिये में कुछ अंतर रहेगा-क्योंकि आप में से अधिकांश लोगो की सोच कुछ वर्ष पूरानी या कुछ सौ वर्ष या फिर कुछ हजार वर्ष पुरानी घटनाओं तक सीमित होगी. जबकि मैं आज बात कर रहा हूँ एक करोड़ २० हजार वर्ष पुरानी उस घटना (दुर्घटना) की जब दो महाद्वीप आपस में टकराए. जी हाँ-यह सत्य है-कोई होली पर भंग चढ़ा कर लिखी गई गप्प नही. हाँ यह हो सकता है की एक करोड़ २० लाख में कुछ सौ वर्ष अधिक या कम हों जब वो टक्कर हुई थी-पर हुई अवश्य थी.
तो मित्रों जब भारतीय 'प्लेट' (महाद्वीप) टेथिस के सागर में तैरता हुआ आया और एक जोर की टक्कर से तिब्बती 'प्लेट' या एशियाई महाद्वीप से जा टकराया तो जन्म हुआ हमारे पर्वतों का. यह कोई कार या मोटरसाइकिल की टक्कर तो थी नही-महाद्वीपों की टक्कर थी और इतनी वेगवान थी की आज भी उनका टकराव (कृ राजनीतिक अर्थ न लगायें) सतह से नीचे पृथ्वी की गहराईयों में जारी है. आप कहेंगे तो होने दो-'हमको क्या फर्क पड़ता है'! पर फर्क तो पड़ता है. आप बचपन में ताश के महल अवश्य बनाया करते होंगे! जब पूरा बन जाता था तो आप नाचते थे खुशी से-पर अचानक छोटा भाई आकर सबसे नीचे वाले एक ताश को हिला देता और बस भरभरा कर महल ढह जाता था. कुछ उसी प्रकार हमारी स्थिति है पृथ्वी की सतह पर-विशेष कर हिमालयी क्षेत्र में. विश्व के सबसे कम आयु के पर्वत के हम वासी हैं-आप जानते हैं युवावस्था में जोश होता ही है-कुछ कर डालने का. हमारे हिमालय भी अभी युवा हैं और सर उठाने को बेताब हैं. क्या होगा यदि अचानक हिमालय ने तय कर ही लिया कि इस बार तो एवरेस्ट को १ से मी और उठा हे देना है-बाप रे ऐसी आपदा कि तो कल्पना भी नही करनी चाहिए-क्योंकि उसका अर्थ होगा भयंकर भूकम्प.
कितना सुरक्षित है हमारा पर्यावरण प्राकृतिक आपदाओं से इसी विषय पर अब क्रमशः आप मेरे लेख पढ़ते रहेंगे. आपकी प्रतिक्रिया मुझे लेखों को रोचक बनाने में मदद करेगी.
जै हिंद.

पंकज सिंह महर:
हमारा सौभाग्य है कि अब जोशी जी अपने अतुलित ज्ञान भण्डार से फोरम को अभिसिंचित करेंगे। जोशी जी के लेख मैंने बोलोजी डाट काम पर पढ़े और अभी हाल ही में सृजन से पत्रिका में भी उनका एक लेख पढा था। जोशी जी ने उस लेख में पहाड़ की दुर्दशा को जिस प्रकार से अपने यात्रानुभव के जरिये अभिव्यक्त किया है, वह वास्तव में अतुलनीय है।
भविष्य में और भी सारगर्भित लेख हमें पढ़ने को मिलेंगे, जिनसे अवश्य ही हमारा ज्ञानार्जन होगा।
जोशी जी का हार्दिक स्वागत।

VK Joshi:
प्रिय पाठकों अपना प्रथम लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ-कैसा लगा खुलासा बताईएगा. अब अगला लेख कुछ दिनों बाद हे संभव होगा-तब तक के लिए

'टेक केयर'.

डोलती धरती पर विकास

पिछली पोस्ट में मैने लिखा था कि युवा हिमालय यदि फिर सर हिला दे तो...! दरअसल हिमालय कि अवस्था टीनेज बालिका कि भांति है. देखने में सयानी पर मन उसका गुडिया खेलने में ही लगता है. वैसे ही २० लाख वर्ष पूर्व जन्मे हिमालय कि अवस्था है.  महाद्वीपों कि टक्कर के बाद से एक करोड़ वर्ष तक तो हिमालय आकाश को चूमने के प्रयास में ही लगे हुए थे. उसके पश्चात् २० लाख वर्ष और लगे उनको वर्तमान रूप में आने में. इस बीच इन पर्वतों ने अनेक उतार-चढाव देखे. पर्वतों के बन जाने से दो बातें हुई-एक तो यह पूरे एशिया महाद्वीप के क्लाईमेट कंट्रोलर बन गए, दूसरे ने ढलान पैदा हो गए. जल धाराएँ भ निकली. जल जो प्रकृति का सबसे बड़ा मूर्तिकार और चितेरा है अपने साथ पर्वतों कि चट्टानों को काट-काट कर बहा कर ले जाने लगा. उधर चूंकि हिमालय ऊपर उठते ही जा रहे थे, जल धाराओं को काटने के लिए काफी 'मसाला' मिलने लगा. घाटियाँ गहरी और दर गहरी होती गयी. यह सिलसिला समाप्त नही हुआ है-अभी चल ही रहा है. जितनी बार भारतीय प्लेट एशियाई प्लेट से टकराती है उतनी बार सतह पर भूकंप के झटके महसूस होते हैं. ऐसा नही है कि यह झटके अभी कुछ साल से ही आ रहे हैं-यह तो सदियों सदियों से पर्वतीय क्षेत्र झेलता आ रहा है. आज की तारीख में भारतीय प्लेट तिब्बती प्लेट के अंदर औसतन २० मि मी प्रति वर्ष की डॉ से धंसती जा रही है.
ऊपर से शांत दिखने वाली हिमालय की इस डोलती धरती पर उभर कर आया है हमारा न्य राज्य अपना उत्तराखंड. नवोदित राज्य को सभी कुछ चाहिए, जिनमे बिजली मकान और सडक प्रमुख हैं. इन सबका अर्थ है निर्माण. दुर्भाग्य की बात है किसी भी क्षेत्र में निर्माण एवं पर्यावरण का ३६ का आंकड़ा रहता है. हमारे दक्ष अभियंता तकनीकी का प्रयोग कर दीर्घकालीन निर्माण कर लेते हैं. पर यह मात्र जल-विद्युत् परियोजनाओं तक ही सीमित होता है-क्योंकि इस प्रकार के निर्माण की लागत बहुत अधिक होती है.
भूकंप विज्ञानियों का दावा है की मध्य कुमाऊँ एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारतीय 'प्लेट'  एशियाई 'प्लेट' में लगातार धंसने से काफी दबाव में है. इस बात को समझने के लिए एक लोहे की प्लेट (मोटी चादर) की कल्पना कीजिये जिसका एक सिरा मजबूती से जकड़ा हुआ हो. अब यदि दूसरे सिरे से लगातार दबाव डाला जाये तो एक अवस्था के बाद प्लेट चटखने लगेगी-तभी वः अपना तनाव कम कर सकेगी. कुछ यही हाल भारतीय 'प्लेट' का हिमालय के गर्भ में हो रहा है. जब-जब 'प्लेट' दबाव कम करने में सफल होती है तब-तब भूकंप आते हैं.
उत्तराखंड में पिछले २०० वर्षों में ११६ भूकंप आये जिनमे २८ विध्वंसकारी थे कहते हैं भैरतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के सुप्रसिद्ध भूकम्पविद डा प्रभास पांडे. इनके अनुसार उत्तराखंड एवं पड़ोसी राज्य नेपाल को भूकंप की आपदा के अनुसार चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पश्चिम नेपाल का क्षेत्र अत्यंत अधिक आपदा का क्षेत्र है. इसमें मर्केली स्केल के अनुसार एम् ६ तीव्रता के भूकम्पों की प्रति दस वर्ष में आने की संभावना है. इसके बाद उत्तराखंड का लगभग ३६% भूभाग जिसमें उत्तरकाशी, चमोली, बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, एवं चम्पावत जनपदों के अधिकाँश भाग सम्मिलित हैं अधिक आपद क्षेत्र एमिन आता है. ऐसे क्षेत्र में एम् ६ से अधिक व एम् ७ से कम तीव्रता के भूकंप प्रति १०० वर्ष में आ सकते हैं. उत्तराखंड का ४१% भूभाग जिसमे पुरौला, टेहरी, रुद्रप्रयाग, ग्यारसैन एवं हरिद्वार क्षेत्र आते हैं, मध्यम आपद क्षेत्र है-जिसमे एम् ५ से अधिक किन्तु एम् ६ से कम तीव्रता के भूकंप प्रति १०० वर्ष में आ सकते हैं. राज्य के बचे हुए २३% क्षेत्र अर्थात रूडकी, पौड़ी, नैनीताल एवं उधमसिंहनगर कम आपद वाले क्षेत्र हैं.
किसी भी क्षेत्र के लिए इस प्रकार की सूचना पूर्व में आए भूकम्पों के आंकलन पर आधारित होती है तथा उसका समय-समय पर आंकलन आवश्यक होता है.
भूकंप की विशेषता होती है की उससेलोई मरता नहीं. लोग तो अपने ही आशियाने तले तब कर बेमौत मारे जाते हैं. विकसित देशों में इसीलिए भूकंप रोधी भवन बनाने का चलन है. इस समय उत्तरखंड में रिहायशी भवन, स्कूल एवं अस्पताल आदि का निर्माण चरम सीमा पर है-इसलिए यही समय है इन सब प्रकार के निर्माणों को सख्ती के साथ भूकंपरोधी करवाने का. माना की इसमें लगभग २५% अतिरिक्त लागत आयेगी, पर सोचिये कितने प्रतिशत लोग अकाल काल के गाल में जाने से बच सकेंगे!
अमरीका की 'वर्ल्ड एजेंसी ऑफ प्लेनेटरी मॉनीटरिंग एंड अर्थक्वेक रिडक्शन' के मैक्स वाईस के अनुसार आबादी का घनत्व देखते हुए ८.१ रिक्टर परिमाण का भूकंप मात्र देहरादून में ९६,००० १,१९,००० जाने ले सकता है, तथा २१० से ४३३ हजार लोगों को घायल कर सकता है. कुछ ऐसा ही अनुमान है आई आई टी रूडकी के प्रो ऐ एस आर्य का भी. उनके अनुसार अधिक परिमाण के भूकंप से देहरादून में १००००० से १५०००० जाने जा सकती हैं.
उत्तराखंड में १८००० मेगावाट पनबिजली उत्पादन की सामर्थ्य है. फिलहाल इसका मात्र १०% ही उपयोग हो पाया है. भावी परियोजनाओं को बनाते समय भूकंप की सम्भावनाओं एवं उससे घनी आबादी वाले मैदानी नगरों पर सम्भावित खतरों के दूरगामी प्रभावों को भी मद्देनजर रखना होगा. भूकंप से बाँध न टूटने पायें इसका प्रावधान तो हमेशा रहता है, पर कठिनाई आती है बाँध के पीछे बनी झील से आने वाले भूकम्पों के जोखिम को आंकने की. दुसरे शब्दों में पं बिजली जितनी सस्ती समझी जाती है उतनी ही जोखिम भरी भी होती है.
उत्तराखंड की लगभग २२% आबादी छह सर्वाधिक जोखिम वाले भूकंप आपद जनपदों में बस्ती है. अच्छाई यह है की प्रदेश का आपदा प्रबंधन तन्त्र काफी जागरूक है. पर उसकी सक्षमता संदेह से प्री नही है. अन्यथा मध्यमाहेश्वर, धारचूला एवं उत्तरकाशी में भूकंपरोधी मानकों की खुले आम अवहेलना करते हुए हाल के वर्षों में बहुमंजिले भवन न बन पाते. गो की यह भी सम्भव है की आपद प्रबंधन तन्त्र को इस प्रकार के निर्माण पर रोक लगाने का अख्तियार ही न हो!
डोलती धरती पर विकास के लिए उत्तराखंड की सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे. आँख मूँद कर नक्शे पास करने वाले आधिकारियों को  यह भी सोचना होगा की उन मकानों में से कुछ उनके अपने सगों के भी होंगे.
भूकम्प की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती अतएव 'चलेगा' वाले रवैय्ये से काम नहीं चलेगा. इस रवैय्ये कच्चे पहाड़ों पर बने पक्के मकान खतरे से खाली नहीं रहेंगे.


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