Author Topic: Journalist and famous Photographer Naveen Joshi's Articles- नवीन जोशी जी के लेख  (Read 58142 times)

नवीन जोशी

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[JUSTIFY]श्री नंदादेवी राजजात से कुमाऊं गढ़वाल दोनों के राज परिवार संतुष्ट नहीं
नवीन जोशी, नैनीताल। माता नंदा देवी उत्तराखंड राज्य के दोनों अंचलों-कुमाऊं व गढ़वाल में समान रूप से पूज्य एवं दोनों अंचलों को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने वाली देवी हैं, और उनकी कमोबेश हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाला और विश्व का अनूठा हिमालयी सचल महाकुंभ कही जाने वाली श्री नंदा देवी राजजात यात्रा मूलतः यहां के दोनों राजाओं की यात्रा है। अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में यूपी सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया, और राजाओं के वंशजों को ही यात्रा कराने दी। लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार और पिछले वर्ष आई आपदा के कारण टलने के बाद 14 वर्षों के बाद हो रही यात्रा को प्रदेश सरकार ने अपने हाथ में लिया है। यात्रा पर सरकार करीब एक करोड़ रुपए खर्च कर रही है, लेकिन सरकार द्वारा इसके आयोजन को हाथ में लिए जाने से यात्रा राजाओं के वंशजों और उनकी प्रजा तथा पारंपरिक व धार्मिक स्वरूप की कम सरकारी स्वरूप की और सरकार द्वारा खर्ची जा रही करीब एक करोड़ रुपए को खपाने-कमाने की जुगत अधिक नजर आने लगी है। इससे दोनों राजाओं के वंशज भी संतुष्ट नहीं हैं।
उल्लेखनीय है कि माता नंदा कुमाऊं के चंदवंशीय शासकों की कुल देवी कही जाती हैं, जबकि गढ़वाल के राजा सम्वत् 745 में राजा कनकपाल के जमाने से माता नंदा की बेटी के स्वरूप में मायके से ससुराल भेजने के स्वरूप में इस यात्रा का आयोजन करते हैं, और इसीलिए इस यात्रा को नंदा राज जात यानी राजा की यात्रा और विश्व की सबसे पुरानी यात्रा कहा जाता है। 280 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान 5333 मीटर ऊंची ज्यूंरागली चोटी को भी पार किया जाता है, लिहाजा यह कैलास मानसरोवर यात्रा की तरह दुनिया की सबसे कठिनतम यात्रा भी होती है। इस वर्ष यह यात्रा प्रदेश सरकार की अगुवाई में 18 अगस्त से 6 सितम्बर के मध्य आयोजित होने जा रही है। इधर नैनीताल में यात्रा की तैयारियों के लिए आयोजित हुई बैठक के बीच जहां कुमाऊं की राजजात समिति के अध्यक्ष शिरीष पांडे ने कहा भी कि यह यात्रा मूलतः कुमाऊं व गढ़वाल के राजाओं की यात्रा हैं, लिहाजा उन्हीं के सानिध्य मंे यात्रा आयोजित की जानी चाहिए। साफ था कि वह एक तरह से कुमाऊं के राजा पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा का पक्ष ही रख रहे थे। उनका कहना था कि अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि उत्तराखंड सरकार द्वारा इसके आयोजन में आगे आने से इसके स्वरूप पर फर्क पड़ सकता है। हालांकि राजजात यात्रा की अनुश्रवण समिति समिति के अध्यक्ष विधानसभा के उपाध्यक्ष डा. अनुसूइया प्रसाद मैखुरी अपने संबोधन में कहते रहे कि यात्रा कुमाऊं व गढ़वाल दोनों राजाओं के वंशजों निर्देशन में ही हो रही है, और सरकार की भूमिका केवल सहयोग करने की है लेकिन बैठक में अधिकांश लोगों का ध्यान सरकार द्वारा खर्च किए जाने वाले एक करोड़ रुपयों से ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेने पर ही दिखा। अन्य लोग मान रहे थे जहां पैंसा आ जाता है, वहां धार्मिक भावना व श्रद्धा भी प्रभावित हो जाती है। पूछे जाने पर गढ़वाल के राजा एवं गढ़वाल की राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष कुंवर डा. राकेश सिहं ने बैठक में उपस्थित विधायकों की ओर इशारा करते हुए कहा, अब तो ये ही राजा हैं। यानी साफ था कि वे यात्रा की तैयारियों एवं राजाओं को मिली भूमिका से खुश नहीं हैं। वहीं कुमाऊं के चंद वंशीय राजाओं के वंशज पूर्व सांसद बाबा ने भी साफ तौर पर कहा, जितना हो रहा है व काफी नहीं है। सरकार से और सुविधाओं की दरकार है। ऐसे में लगता है कि प्रदेश सरकार ने यात्रा को धार्मिक व पारंपरिक स्वरूप से बाहर निकालकर इसे सरकार में शामिल व अन्य चुनिंदा लोगों के लिए अपनी ओर से ‘आर्थिक आर्शीवाद’ प्रदान करने का माध्यम बना लिया है। अब लोग यात्रा से अब तक के स्वतः स्फूर्त धार्मिक भावना व श्रद्धा के जरिए अपना ‘परलोक’ सुधारने के बजाए तात्कालिक तौर पर ‘इहलोक’ सुधारने के प्रति ही प्रेरित होते जा रहे हैं।

कुमाऊं का राजजात में प्रतिनिधित्व
नैनीताल। श्री नंदा देवी राजजात में इस वर्ष कुमाऊं मंडल का प्रतिनिधित्व कमोबेश सीमित रहा है। इससे पूर्व वर्ष 2000 की यात्रा में भी कुमाऊं की नंदा डोलियों व छंतोलियों ने नंदा देवी राजजात में प्रतिनिधित्व किया था। कुमाऊं मंडल की आयोजन समिति के अध्यक्ष शिरीष पांडे ने बताया कि कुमाऊं को 1925 के बाद लंबे समय के बाद 1987 की श्री नंदा देवी राजजात में में शामिल होने का न्यौता मिला था, लेकिन तब कुमाऊं की ओर से अपेक्षित तैयारी नीं हो पाई थी। हालांकि उन्होंने बताया कि चंद वंशीय शासक बाज बहादुर चंद (1638-78 ई.) के दौर में भी कुमाऊं से राजजात यात्रा की छंतोली (नंदा का छत्र) भेेजे जाने के प्रमाण मिलते हैं।
यह भी पढ़ेंः कौन हैं दो देवियां, मां नंदा और सुनंदा


मूलतः मेरी नयी वेबसाइट नवीन जोशी समग्र पर @ http://navinjoshi.in/ पर देखें:

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[justify]टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का सर्वे पूरा, रिपोर्ट रेल मंत्रालय को सोंपी

-लखनऊ और मथुरा-मुंबई से नवंबर तक कुमाऊं के जुड़ने की संभावना
नैनीताल (एसएनबी)। प्रदेश के कुमाऊं मंडल में दशकों से लंबित बहुप्रतीक्षित व महत्वाकांक्षी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजना में शामिल टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का प्रारंभिक इंजीनियरिंग व ट्रेफिकिंग सर्वेक्षण (Preliminary Engineering and Trafficking Survey-PETS) कार्य पूरा कर लिया गया है। पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक केके अटल ने बताया कि इस सर्वेक्षण में बागेश्वर की रेल लाइन को सामाजिक जरूरतों के लिए जरूरी बताया गया है। रेल लाइन पर 50 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान है।
श्री अटल ने यह बात सोमवार को रेलवे होली-डे-होम में पत्रकारों से वार्ता करने हुए की। बताया कि काठगोदाम को लखनऊ व मथुरा से सीधे बड़ी लाइन से जोड़ने में अब काफी कम कार्य ही बचा है। बरेली में जंक्शन व स्टेशन को जोड़ने का कार्य अक्टूबर तक पूरा कर लिया जाएगा, इसके बाद बजट में पहले से स्वीकृत लखनऊ से काठगोदाम के लिए नॉन प्रीमियम गाड़ी चलानी प्रारंभ कर दी जाएगी। इसी तरह कासगंज के पास कथला पुल के इस (अगस्त) माह के अंत तक बन कर तैयार होने की संभावना है, और इस मार्ग के जरिए नवंबर तक कुमाऊं के सीधे जुड़ जाने की संभावना है।
उल्लेखनीय है कि तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने वर्ष 2010 में लोकसभा चुनाव के पहले नैनीताल, कौसानी व बागेश्वर भ्रमण के दौरान नैनीताल में सर्वप्रथम पत्रकारों (जिसमें लेखक भी शामिल था) के यह कहते हुए औचित्य समझाने पर कि उनके प्रदेश बिहार और उत्तराखंड एक जैसी पलायन की समस्या से ग्रस्त हैं। पलायन के कारण उत्तराखंड का चीन से लगा सीमावर्ती क्षेत्र खाली होता जा रहा है। रेल लाइन बनने से लोग यहां रुकेंगे, और देश की सीमाएं मजबूत होंगी, बताने पर ही सर्वप्रथम बागेश्वर-टनकपुर रेल लाइन के बारे में पहला सकारात्मक बयान दिया था, और आगे केंद्रीय रेल बजट में ११० किलोमीटर लंबी इस रेलवे लाइन बिछाने की स्वीकृति प्रदान की थी। और आगे रेल बजट में घोषित इस रेल लाइन का अक्टूबर 2010 में सर्वे किया गया था। गौरतलब है कि इससे एक दिन पूर्व रामनगर में उन्होंने इस रेल लाइन को औचित्यहीन ठहराया था। आगे रेलमंत्री मुकुल रॉय ने वर्ष 2012 में टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित करने का ऐलान किया था। बताया जा रहा है कि इस परियोजना के पूरा होने से बागेश्वर के साथ ही ट्रेकिंग के शौकीन सैलानियों के स्वर्ग पिंडारी, कफनी व सुंदरढूंगा ग्लेशियरों के लिए 142 किमी का फासला कम होगा।
गौरतलब है कि वर्तमान में उत्तराखंड के कुमाऊं मण्डल के काठगोदाम, रामनगर और टनकपुर और गढ़वाल मण्डल के कोटद्वार और ऋषिकेश तक ही रेलमार्ग हैं। यह सभी स्टेशन मैदानी इलाकों के अन्तिम छोर पर हैं, अर्थात पहाड़ों में एक किलोमीटर का भी रेलमार्ग नही है। आश्चर्यजनक बात यह है कि इन स्थानों तक भी रेलमार्गों का निर्माण आज से लगभग 70-80 साल पहले ब्रिटिश शासन काल में ही हो चुका था। स्वतन्त्र भारत में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में रेल पहुंचाने की कोशिश के अन्तर्गत एक मीटर भी रेल लाइन नहीं बिछ पाई। टनकपुर-बागेश्वर रेललाइन का सर्वे सन् 1912 में ही हो चुका था। पुन: सन् 2006 में इस मार्ग का सर्वे करवाया गया है। वर्ष 1960-70 के दशक में पद्मश्री देवकी नंदन पांडे ने पहाड़ों में रेलमार्ग बनाये जाने की मांग पहली बार उठाई थी, उसके बाद कई संघर्ष समितियां इस मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक, हर मंच पर पहाड़ की इस मांग को उठा चुकी हैं। बागेश्वर-टनकपुर रेलमार्ग संघर्ष समिति के सदस्य जन्तर-मन्तर में दो बार आमरण अनशन कर चुके हैं। प्रस्तावित टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन के मार्ग में धौलीगंगा, टनकपुर और पंचेश्वर जैसी वृहद विद्युत परियोजनायें चल रही हैं। इसके अतिरिक्त इस मार्ग में पड़ने वाले अत्यन्त दुर्गम और पिछड़े इलाके जैसे-बागेश्वर के कत्यूर, दानपुर, कमस्यार, खरही अल्मोड़ा के रीठागाड़ और चौगर्खा, पिथौरागढ़ के घाट, गणाई और गंगोल और चम्पावत के गुमदेश और पंचेश्वर इलाके की लगभग 10 लाख जनता इस सुगम परिवहन से जुड़ सकेगी। कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के डा. जीएल साह ने टनकपुर से बागेश्वर तक तीन माह के अथक परिश्रम के बाद भूगर्भीय सर्वेक्षण करते हुए एक रिपोर्ट रेल मंत्रालय को भेजी थी। इस सर्वे में कंप्यूटर, उपग्रह चित्र और भौतिक सर्वेक्षणों को आधार बनाया गया था।
इस प्रस्तावित योजना में कुल 137 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन बिछाई जानी है, जिसमें से 67 किमी लाइन अंतराष्ट्रीय सीमा (भारत-नेपाल) के समानान्तर बननी है। पंचेश्वर के बाद यह रेलमार्ग सरयू नदी के समानान्तर बनना है। इस रेल लाइन के बिछाने पर विस्थापन भी नहीं के बराबर होना है, क्योंकि महाकाली और सरयू दोनों नदियां घाटियों में बहती हैं। ये घाटियां भौगोलिक स्थिति से काफी मजबूत हैं। इस प्रस्तावित योजना में सिर्फ चार बड़े रेल पुलों का निर्माण करने की जरूरत पड़ेगी। पर्वतीय रेल व सड़क योजनाओं में मुख्य तकनीकी पक्ष ऊंचाई ही है, लेकिन इस लाइन को टनकपुर (समुद्र तल से ऊंचाई 800 मीटर) से बागेश्वर तक पहुंचने में 137 किमी की दूरी में मात्र 610 मीटर की ऊंचाई ही पार करनी होगी। अन्य पर्वतीय रेल योजनाओं की ऊंचाई की तुलना की जाये तो कालका से शिमला तक से 98 किमी की दूरी तय करने में 1433 मीटर की ऊंचाई पार करनी पड़ती है। इससे स्पष्ट है कि तकनीकी रूप से भी टनकपुर से बागेश्वर रेलमार्ग का निर्माण करना इस युग में कोई दुष्कर कार्य नहीं है।
मूलतः मेरी वेबसाइट "नवीन जोशी समग्र" पर यहाँ पढ़ें : http://navinjoshi.in/2014/08/25/railway/
यह भी पढ़ें: खुशखबरी: पहाड़ चढ़ेगी रेल @ http://uttarakhandsamachar.navinjoshi.in/2011/10/blog-post.html
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नवीन जोशी

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[justify]दो अक्टूबर के कुछ अलग मायने हैं उत्तराखंड वासियों के लिए

दो अक्टूबर का दिन जहां देश-दुनिया में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती के रूप में एवं दुनिया में विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है, वहीं उत्तराखंड राज्य इससे इतर इस दिन को काले दिन के रूप में मनाता है। इस दिन से उत्तराखंड वासियों की बेहद काली व डरावनी यादें जुड़ी हुई हैं।
पृथक उत्तराखण्ड राज्य का आन्दोलन पहली बार एक सितम्बर 1994 को तब हिंसक हो उठा था, जब खटीमा में स्थानीय लोग राज्य की मांग पर शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे थे। जलियांवाला बाग की घटना से भी अधिक वीभत्स कृत्य करते हुए तत्कालीन यूपी की अपनी सरकार ने केवल घंटे भर के जुलूस के दौरान जल्दबाजी और गैरजिम्मेदाराना तरीके से जुलूस पर गोलियां चला दीं, जिसमें सर्वधर्म के प्रतीक प्रताप सिंह, भुवन सिंह, सलीम और परमजीत सिंह शहीद हो गए। यहीं नहीं उनकी लाशें भी सम्भवतया इतिहास में पहली बार परिजनों को सौंपने की बजाय पुलिस ने `बुक´ कर दीं। यह राज्य आन्दोलन का पहला शहीदी दिवस था। इसके ठीक एक दिन बाद मसूरी में यही कहानी दोहराई गई, जिसमें महिला आन्दोलनकारियों हंसा धनाई व बेलमती चौहान के अलावा अन्य चार लोग राम सिंह बंगारी, धनपत सिंह, मदन मोहन ममंगई तथा बलबीर सिंह शहीद हुए। एक पुलिस अधिकारी उमा शंकर त्रिपाठी को भी जान गंवानी पड़ी। इससे यहां नैनीताल में भी आन्दोलन उग्र हो उठा। यहां प्रतिदिन शाम को आन्दोलनात्मक गतिविधियों को `नैनीताल बुलेटिन´ जारी होने लगा। रैपिड एक्शन फोर्स बुला ली गई और कर्फ्यू लगा दिया गया। इसी दौरान यहां एक होटल कर्मी प्रताप सिंह आरपीएफ की गोली से शहीद हो गया। इसकी अगली कड़ी में दो अक्टूबर को दिल्ली कूच रहे राज्य आन्दोलनकारियों के साथ मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर में ज्यादतियां की गईं, जिसमें कई लोगों को जान और महिलाओं को अस्मत गंवानी पड़ी।

तीन अक्टूबर : जिसे याद कर आज भी कांप जाती हैं नैनीताल वासियों की रूहें
  • 20 वर्ष पूर्व बेकाबू आरएएफ की गोलियों ने आज बरपाया था कहर, प्रताप सिंह हुआ था शहीद
    राम देव, देवेंद्र व राम सिंह को भी लगी थीं गोलियां
    कूड़ेदान से सटाकर बनाया गया शहीद स्मारक
नवीन जोशी, नैनीताल। वह 20 वर्ष पूर्व तीन अक्टूबर 1994 का दिन था, जिसे याद कर आज भी नैनीताल वासियों की रूहें कांप जाती हैं। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की जयंती के अगले ही दिन बेकाबू, बदहवास हुऐ रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने अमानवीयता और हिंसा का यहां नंगा नाच किया था। आरएएफ की गोलियों से एक आंदोलनकारी प्रताप सिंह शहीद हो गया, जबकि तीन अन्य लोग रामदेव, देवेंद्र व राम सिंह गोलियों से गंभीर घायल रूप से घायल हुए। लेकिन अफसोस कि आज तक आंदोलनकारियों की मांग के अनुरूप मामले की सीबीआई जांच में दोषी पाये गये शहीद के हत्यारों को कोई सजा मिली। बमुश्किल बीते वर्ष चिड़ियाघर रोड पर शहीद स्मारक बना भी है तो शहीदों को मुंह चिढ़ाते हुऐ बिल्कुल कूड़ा घर से सटा कर बनाया गया। कूड़ा घर यहां से कब हटेगा, यह बड़ा यक्ष प्रश्न है।
दो अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा और मुजफ्फरनगर में दिल्ली कूच करते राज्य आंदोलनकारियों के साथ हुऐ पुलिस के दुव्र्यवहार की खबर जैसे ही नैनीताल पहुंची थी, लोग आक्रोशित हो सड़कों पर उतर पड़े थे। नगर में आरएएफ की उपस्थिति ने माहौल को बेहद तनाव पूर्ण बना दिया था। दोपहर बाद ढाई बजे तल्लीताल डांठ पर लोग पुलिस के दमन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। एक ओर रैफ, और दूसरी ओर तीन चार सौ प्रदर्शनकारी। रैफ ने उकसाया तो प्रदर्शनकारियों ने पथराव से इसका जवाब दिया। फिर दोनों ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। रैफ ने रबर की गोलियां भीड़ की ओर चलाईं। यहां तक तो ठीक था, लेकिन इसके बाद जो हुआ उसे नगर के डेढ़ सौ वर्ष के इतिहास में नगरवासियों ने अपनी सुरक्षा के लिए तैनात सिपाहियों को करते पहली बार देखा। अचानक रैफ ने हवा में गोलियां दागनीं प्रारंभ कर दीं। इस पर भीड़ तितर-बितर हो गई, लेकिन फौजी बूट अराजक होकर मानवता को कुचलते चले गऐ। जवान कई किमी तक नगर में आंदोलनकारियों के पीछे जानवरों की तरह दौड़े। महिलाओं, छात्रों को घरों से निकाल-निकाल कर मारा गया। घटनास्थल से करीब एक किमी दूर और डेढ़ घंटे बाद चिडि़याघर रोड पर अल्मोड़ा जनपद के मिरौली ग्राम निवासी 33 वर्षीय होटल कर्मी प्रताप सिंह को रैफ के दरिंदों ने गोली मार दी। शहीद के खून से लतपथ शरीर को जीवन बचाने की प्रत्याशा में प्रशांत होटल के स्वामी अतुल साह नजदीकी जिला अस्पताल लेकर दौड़े। उधर तीन किमी दूर मल्लीताल में पोस्ट आफिस रोड व अन्य जगह राम देव, देवेंद्र व राम सिंह को गोलियां लगीं। इसके बाद जनांदोलन और तेज हुआ, जिसके दबाव में सरकार मामले की सीबीआई जांच कराने को मजबूर हुई, लेकिन जांच बेनतीजा समाप्त हुई। कारण हर व्यक्ति जहां आंदोलनकारी था, वहीं नेतृत्वकारी नेता एक भी नहीं था। सीबीआई के अफसरों के समक्ष किसी भी व्यक्ति ने गवाही नहीं दी, और शहीद के हत्यारे आजाद घूमते रहे। तब से आज तक चिडि़याघर रोड पर तमाम नेताओं के आश्वासनों के बाद ‘कूड़ेदान” से सटे और इसी तिथि को पुतने वाले शहीद स्थल पर आज सुबह से ही शहीद को श्रद्धांजलि देने वालों का मेला लगता है। इस वर्ष शहीद स्थल पर शहीद स्मारक भी स्थापित कर दिया गया, लेकिन गंदगी से बजबजाता कूड़ेदान नहीं हटाया गया है।[/size][/color][/justify]

Originally @ http://navinjoshi.in/2014/10/01/2-3-october/

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[JUSTIFY]कुमाऊं में ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप में मनाई जाती थी परंपरागत दीपावली

-ऐपण और च्यूड़ों का होता था प्रयोग
नवीन जोशी, नैनीताल। वक्त के साथ हमारे परंपरागत त्योहार अपना स्वरूप बदलते जाते हैं, और बहुधा उनका परंपरागत स्वरूप याद ही नहीं रहता। आज जहां दीपावली का अर्थ रंग-बिरंगी चायनीज बिजली की लड़ियों से घरों-प्रतिष्ठानों को सजाना, महंगी से महंगी आसमानी कान-फोड़ू ध्वनियुक्त आतिषबाजी से अपनी आर्थिक स्थिति का प्रदर्शन करना और अनेक जगह सामाजिक बुराई-जुवे को खेल बताकर खेलने और दीपावली से पूर्व धनतेरस पर आभूषणों और गृहस्थी की महंगी इलेक्ट्रानिक वस्तुओं को खरीदने के अवसर के रूप में जाना जाता है, वैसा अतीत में नहीं था। खासकर कुमाऊं अंचल में दीपावली का पर्व मौसमी बदलाव के दौर में बरसात के बाद घरों को गंदगी से मुक्त करने, साफ-सफाई करने, घरों को परंपरागत रंगोली जैसी लोक कला ऐपण से सजाना तथा तेल अथवा घी के दीपकों से प्रकाशित करने का अवसर था। मूलत: ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप से मनाए जाने वाले इस त्योहार पर कुमाऊं में बड़ी-बूढ़ी महिलाएं नई पीढ़ी को सिर में नए धान से बने च्यूड़े रखकर आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने जैसी शुभाशीषें देती थीं।

 विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद प्रकृति एवं पर्यावरण से जुड़ी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला पूरा उत्तराखंड प्रदेश और इसका कुमाऊंं अंचल अतीत में धन-धान्य की दृष्टि से कमतर ही रहा है। यहां आजादी के बाद तक अधिसंख्य आबादी दीपावली पर खील-बताशों, मोमबत्तियों तक से अनजान थी। पटाखे भी यहां बहुत देर से आए। बूढ़े-बुजुर्गों के अनुसार गांवों में दीपावली के दीए जलाने के लिए कपास की रुई भी नहीं होती थी। अलबत्ता, लोग नए खद्दर का कपड़ा लाते थे, और उसकी कतरनों को बंटकर दीपक की बातियां बनाते थे। दीपावली से पहले घरों को आज की तरह आधुनिक रंगों, एक्रेलिक पेंट या डिस्टेंपर से नहीं, कहीं दूर-दराज के स्थानों पर मिलने वाली सफेद मिट्टी-कमेट से गांवों में ही मिलने वाली बाबीला नाम की घास से बनी झाड़ू से पोता जाता था। इसे घरों को ‘उछीटना” कहते थे। घरों के पाल (फर्श) गोबर युक्त लाल मिट्टी से हर रोज घिसने का रिवाज था। दीपावली पर यह कार्य अधिक गंभीरता से होता था। गेरू की जगह इसी लाल मिट्टी से दीवारों को भी नीचे से करीब आधा फीट की ऊंचाई तक रंगकर बाद में उसके सूखने पर भिगोए चावलों को पीसकर बने सफेद रंग (विस्वार) से अंगुलियों की पोरों से ‘बसुधारे” निकाले जाते थे। फर्श तथा खासकर द्वारों पर तथा चौकियों पर अलग-अलग विशिष्ट प्रकार के लेखनों से लक्ष्मी चौकी व अन्य आकृतियां ऐपण के रूप में उकेरी जाती थीं, जो कि अब प्रिटेड स्वरूप में विश्व भर में पहचानी जाने लगी हैं। द्वार के बाहर आंगन तक बिस्वार में हाथों की मुट्ठी बांधकर छाप लगाते हुए माता लक्ष्मी के घर की ओर आते हुए पदचिन्ह इस विश्वास के साथ उकेरे जाते थे, कि माता इन्हीं पदचिन्हों पर कदम रखती हुई घर के भीतर आएंगी। दीपावली के ही महीने कार्तिक मास में में द्वितिया बग्वाल मनाने की परंपरा भी थी। जिसके तहत इसी दौरान पककर तैयार होने वाले नए धान को भिगो व भूनकर तत्काल ही घर की ऊखल में कूटकर च्यूड़े बनाए जाते थे, और इन च्यूड़ों को बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं अपनी नई पीढ़ी के पांव छूकर शुरू करते हुए घुटनों व कंधों से होते हुए सिर में रखते थे। साथ में आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने तथा इस दिन को हर वर्ष भोगने जैसी शुभाशीषें देते हुए कहा जाता था-लाख हरयाव, लाख बग्वाल, अगाश जस उच्च, धरती जस चौड़, जी रया, जागि रया, यो दिन यो मास भेटनै रया। इसी दौरान गोवर्धन पड़वा पर घरेलू पशुओं को भी नहला-धुलाकर उनपर गोलाकार गिलास जैसी वस्तुओं से सफेद बिस्वार के गोल ठप्पे लगाए जाते थे। उनके उनके सींगों को घर के सदस्यों की तरह सम्मान देते हुए तेल से मला जाता था। नवीन जोशी, नैनीताल। वक्त के साथ हमारे परंपरागत त्योहार अपना स्वरूप बदलते जाते हैं, और बहुधा उनका परंपरागत स्वरूप याद ही नहीं रहता। आज जहां दीपावली का अर्थ रंग-बिरंगी चायनीज बिजली की लड़ियों से घरों-प्रतिष्ठानों को सजाना, महंगी से महंगी आसमानी कान-फोड़ू ध्वनियुक्त आतिषबाजी से अपनी आर्थिक स्थिति का प्रदर्शन करना और अनेक जगह सामाजिक बुराई-जुवे को खेल बताकर खेलने और दीपावली से पूर्व धनतेरस पर आभूषणों और गृहस्थी की महंगी इलेक्ट्रानिक वस्तुओं को खरीदने के अवसर के रूप में जाना जाता है, वैसा अतीत में नहीं था। खासकर कुमाऊं अंचल में दीपावली का पर्व मौसमी बदलाव के दौर में बरसात के बाद घरों को गंदगी से मुक्त करने, साफ-सफाई करने, घरों को परंपरागत रंगोली जैसी लोक कला ऐपण से सजाना तथा तेल अथवा घी के दीपकों से प्रकाशित करने का अवसर था। मूलत: ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप से मनाए जाने वाले इस त्योहार पर कुमाऊं में बड़ी-बूढ़ी महिलाएं नई पीढ़ी को सिर में नए धान से बने च्यूड़े रखकर आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने जैसी शुभाशीषें देती थीं।
विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाला पूरा उत्तराखंड प्रदेश और इसका कुमाऊंं अंचल अतीत में धन-धान्य की दृष्टि से कमतर ही रहा है। यहां आजादी के बाद तक अधिसंख्य आबादी दीपावली पर खील-बताशों, मोमबत्तियों तक से अनजान थी। पटाखे भी यहां बहुत देर से आए। बूढ़े-बुजुर्गों के अनुसार गांवों में दीपावली के दीए जलाने के लिए कपास की रुई भी नहीं होती थी। अलबत्ता, लोग नए खद्दर का कपड़ा लाते थे, और उसकी कतरनों को बंटकर दीपक की बातियां बनाते थे। दीपावली से पहले घरों को आज की तरह आधुनिक रंगों, एक्रेलिक पेंट या डिस्टेंपर से नहीं, कहीं दूर-दराज के स्थानों पर मिलने वाली सफेद मिट्टी-कमेट से गांवों में ही मिलने वाली बाबीला नाम की घास से बनी झाड़ू से पोता जाता था। इसे घरों को ‘उछीटना” कहते थे। घरों के पाल (फर्श) गोबर युक्त लाल मिट्टी से हर रोज घिसने का रिवाज था। दीपावली पर यह कार्य अधिक गंभीरता से होता था। गेरू की जगह इसी लाल मिट्टी से दीवारों को भी नीचे से करीब आधा फीट की ऊंचाई तक रंगकर बाद में उसके सूखने पर भिगोए चावलों को पीसकर बने सफेद रंग (विस्वार) से अंगुलियों की पोरों से ‘बसुधारे” निकाले जाते थे। फर्श तथा खासकर द्वारों पर तथा चौकियों पर अलग-अलग विशिष्ट प्रकार के लेखनों से लक्ष्मी चौकी व अन्य आकृतियां ऐपण के रूप में उकेरी जाती थीं, जो कि अब प्रिटेड स्वरूप में विश्व भर में पहचानी जाने लगी हैं। द्वार के बाहर आंगन तक बिस्वार में हाथों की मुट्ठी बांधकर छाप लगाते हुए माता लक्ष्मी के घर की ओर आते हुए पदचिन्ह इस विश्वास के साथ उकेरे जाते थे, कि माता इन्हीं पदचिन्हों पर कदम रखती हुई घर के भीतर आएंगी। दीपावली के ही महीने कार्तिक मास में में द्वितिया बग्वाल मनाने की परंपरा भी थी। जिसके तहत इसी दौरान पककर तैयार होने वाले नए धान को भिगो व भूनकर तत्काल ही घर की ऊखल में कूटकर च्यूड़े बनाए जाते थे, और इन च्यूड़ों को बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं अपनी नई पीढ़ी के पांव छूकर शुरू करते हुए घुटनों व कंधों से होते हुए सिर में रखते थे। साथ में आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने तथा इस दिन को हर वर्ष भोगने जैसी शुभाशीषें देते हुए कहा जाता था-लाख हरयाव, लाख बग्वाल, अगाश जस उच्च, धरती जस चौड़, जी रया, जागि रया, यो दिन यो मास भेटनै रया। इसी दौरान गोवर्धन पड़वा पर घरेलू पशुओं को भी नहला-धुलाकर उनपर गोलाकार गिलास जैसी वस्तुओं से सफेद बिस्वार के गोल ठप्पे लगाए जाते थे। उनके उनके सींगों को घर के सदस्यों की तरह सम्मान देते हुए तेल से मला जाता था।
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Originally with Pictures @ My Website नवीन जोशी समग्र @ http://navinjoshi.in/2014/10/22/kumaon-diwali/

नवीन जोशी

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प्रकृति के स्वर्ग सरोवरनगरी को अब कुदरत का सबसे बड़ा ‘विंटर लाइन” का तोहफा
[justify]-दुनिया में केवल स्विटजरलैंड की बान वैली और मसूरी के लाल टिब्बा से ही नजर आती है कुदरत की यह अनूठी नेमत
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रकृति के स्वर्ग कही जाने वाली सरोवरनगरी पर कुदरत एक बार फिर नया तोहफा लेकर मेहरबान हुई है। यह तोहफा ऐसा है जिसे प्रकृति प्रेमी ‘विंटर लाइन” के नाम से जानते हैं। कुदरत की इस अनूठी नेमत ‘विंटर लाइन” के बारे में कहा जाता है कि यह दुनिया में केवल स्विटजरलैंड की बान वैली और मसूरी के लाल टिब्बा से ही नजर आती है। मसूरी में बीते वर्ष से इस अवसर पर ‘विंटर लाइन महोत्सव’ मनाने की शुरुआत भी हुई थी, जबकि नैनीताल अभी इस बारे में भाग्यशाली साबित नहीं हुई है। नगर में भी ऐसे महोत्सव की खासकर शरदोत्सव से जोड़ते हुए अच्छी संभावना बनती है।

ऐसा नहीं है कि सरोवरनगरी नैनीताल में ‘विंटर लाइन’ पहली बार नजर आई हो, वरन यह यहां हमेशा से नजर आती है लेकिन अब तक इसे नगर व प्रदेश के पर्यटन कैलेंडर और पर्यटन व्यवसायियों से ही मान्यता नहीं मिल पाई है। प्रकृति प्रेमियों के अनुसार ‘विंटर लाइन” की स्थिति सर्दियों में मैदानों में कोहरा छाने और ऊपर से सूर्य की रोशनी पड़ने के परिणामस्वरूप शाम ढलते बनती है। नैनीताल में यह सैकड़ों किमी लंबी सुर्ख लाल व गुलाबी रंग की रेखा के रूप में नजर आती है। नैनीताल में इसका सबसे शानदार नजारा हनुमानगढ़ी क्षेत्र से लिया जा सकता है लेकिन नगर के चिडि़याघर क्षेत्र, लेक व्यू प्वाइंट सहित अनेक स्थानों से भी इसे शाम को तथा सुबह सूर्याेदय से पूर्व भी हल्के स्वरूप में देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि हनुमानगढ़ी से सूर्यास्त के भी अनूठे नजारे देखने को मिलते हैं। प्रकृति प्रेमी बताते हैं कि इस दौरान डूबते हुए सूर्य में कभी घड़ा तो कभी सुराही जैसे अनेक आकार प्रतिबिंबित होते हैं। पूर्व में इन्हें देखने के लिये यहां बकायदा व्यू प्वाइंट स्थापित थे, जो बीते वर्षाे में हटा दिये गये हैं।

नेपाली फिल्म ‘विरासत” में भी दिखती है नैनीताल की ‘विंटर लाइन’

नैनीताल। देश-प्रदेश के पर्यटन विभाग और पर्यटन व्यवसायी भले विंटर लाइन की खूबसूरती का नगर के पर्यटन उद्योग को बढ़ाने में उपयोग न कर रहे हों लेकिन नगर में वर्ष 2012 में इन्हीं दिनों फिल्माई गई नेपाली फिल्मों के निर्देशक गोविंद गौतम की नायक समर थापा व नायिका सोनिया खड़का अभिनीत फिल्म ‘विरासत’ में नैनीताल की ‘विंटर लाइन’ को फिल्माया गया है। इस फिल्म के एक गीत में नायक-नायिका के बीच हनुमानगढ़ी के पास विंटर लाइन को दिखाते हुए प्रणय दृश्य फिल्माए गए हैं।
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नवीन जोशी

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इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2017: उत्तराखंड में 66 नहीं महज 46 फीसद हैं वन

-इनमें भी उथले वनों को हटा दें तो महज 34 फीसद में हैं 40 फीसद से अधिक घनत्व के वन
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड में देश में सर्वाधिक 66 फीसद भूभाग पर वन होने की बात बहुप्रचारित की जाती है, किंतु भारतीय वन संरक्षण विभाग की जिस ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2017’ के हवाले से यह बात कही जाती है, उसका बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि वास्तव में उत्तराखंड में केवल 46 फीसद क्षेत्रफल में ही वन हैं। निराशाजनक बात यह भी है कि इस इसमें से 12 फीसद भूभाग में उथले यानी अवनत वन हैं। इस प्रकार सही मायने में उत्तराखंड में महज 34 फीसद क्षेत्रफल में ही 40 फीसद से अधिक घनत्व के वन हैं।
भारतीय वन संरक्षण विभाग की देश के वनों के संबध में जारी ताजा द्विवार्षिक रिर्पोट के अनुसार राज्य के कुल 53483 वर्ग किमी भू भाग में से 4969 वर्ग किमी यानी कुल भू भाग के 9.29 फीसद क्षेत्रफल में अत्यधिक घने वन, 2884 वर्ग किमी यानी 24.08 फीसद भूभाग पर सामान्य घने वन, 6442 वर्ग किमी यानी 12.04 भूभाग में खुले वन, 383 वर्ग किमी यानी 0.71 फीसद में झाड़ी झंकार हैं। इस प्रकार 28805 वर्ग किमी यानी 53.83 फीसद क्षेत्रफल में वन नहीं हैं, एवं कुल 46.17 फीसद क्षेत्रफल में ही वन हैं। इसमें से यदि 12.04 फीसद खुले या अवनत वन क्षेत्र को हटा दें तो राज्य का कुल वन केवल 34.13 फीसद पर ही हैं। राष्ट्रीय वन नीति में भी कुल भूमि के 33 फीसद पर वन होने चाहिये, इस तरह उत्तराखंड ठीक सीमा रेखा पर ही है, जबकि राज्य में 66 फीसद में वन बताये जाते हैं।

23 वर्ग किमी में वन बढ़े, पर भ्रमपूर्ण स्थिति

नैनीताल। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वन सर्वेक्षण की 2015 की रिपोर्ट के मुकाबले 2017 की रिपोर्ट में अत्यधिक घने वन क्षेत्र में 165 वर्ग किमी, खुले वन में 636 वर्ग किमी, झाड़ी झंकार में 87 वर्ग किमी तथा गैर वन क्षेत्र में 110 वर्ग किमी की वृद्धि हुई है, जबकि सामान्य घने वन क्षेत्र में 778 वर्ग किमी की कमी आई है। इससे साफ पता चलता है कि सामान्य घना वन क्षेत्र 778 वर्ग किमी घट कर 636 किमी खुले वन में बदल गया और इसी तरह झाड़ी झंकार और गैर वन क्षेत्र भी बढ़ गया है। यह स्थिति गंभीर है यानी वनों का बड़ा भाग उथला या अवनत हो रहा है। हालांकि इसी रिर्पोट में एक जगह यह भी बताया गया है कि आरक्षित वन भूमि 49 वर्ग किमी घट गयी है वहीं वनों के बाहरी क्षेत्रों में 72 वर्ग किमी वन बढ़ गये हैं और इसे प्रचारित भी किया गया है कि हमारे यहां इन दोनों का अंतर यानी 23 वर्ग किमी जंगल बढ़ गये हैं। यह भी हो सकता है कि बाहरी क्षेत्र में बढ़ा वन क्षेत्र केवल कृषि आदि की हरियाली भी हो सकती है।

यह है सर्वेक्षण रिपोर्ट में वनों की परिभाषा

नैनीताल। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार किसी क्षेत्र में 70 फीसद से अधिक वृक्ष होने पर उसे अत्यधिक घना वन, 40 फीसद से 70 फीसद के मध्य वृक्ष होने पर सामान्य घना वन, 10 फीसद से 40 फीसद के मध्य वृक्ष होने पर   खुला वन एवं 10 फीसद से कम वृक्ष होने परगैर वन कहे जाते हैं। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि यह रिपोर्ट धरातल के अध्ययन के बजाय उपग्रह से प्राप्त चित्रों के आधार पर तैयार की जाती है। जिसके कारण इसके संकलन व व्याख्या में कई त्रुटियां रह जाती हैं। रिपोर्ट की प्रस्तावना में भी यह स्पष्टीकरण दिया गया है कि घने बादलों के कारण पड़ने वाली परछायियां वनों की सघनता का आभास दे सकती हैं, तो वृक्षारोपण, गन्ने के खेत, फलों के बगीचे, लैंटाना जैसी झाड़ियां व खरपतवार आदि की लंबे क्षेत्र में फैली हरीतिमा भी वनों के रूप में ही चित्रित हो सकती हैं। लिहाजा यह रिर्पोट पूर्णतः जमीनी सच्चाई के बजाय एक अनुमान ही है।

पौड़ी में सर्वाधिक बढ़े-नैनीताल में सर्वाधिक घटे वन क्षेत्र

नैनीताल। रिपोर्ट का उत्तराखंड के जिले वार अध्ययन करने पर पता चलता है कि वर्ष 2015 से 2017 के बीच पौड़ी जिले में सर्वाधिक 76 वर्ग किमी में वन बढ़े हैं, जबकि नैनीताल में सर्वाधिक 35 वर्ग किमी वन क्षेत्र में कमी आई है। इन जिलों के अतिरिक्त रुद्रप्रयाग में 37, अल्मोड़ा में 17, टिहरी गढ़वाल में 7 व देहरादून में 5 वर्ग किमी में वन क्षेत्र बढ़े हैं, जबकि हरिद्वार में 3, पिथौरागढ़ में 5, बागेश्वर में 10, चंपावत में 11, ऊधमसिंह नगर में 14 चमोली में 15 व उत्तरकाशी में 26 वर्ग किमी में वन क्षेत्र की कमी आई है। इस प्रकार राज्य में 23 वर्ग किमी में वन क्षेत्र की नेट वृद्धि बतायी गयी है। इस संबंध में वन निगम के पूर्व अधिकारी एवं वन विशेषज्ञ विनोद पांडे का कहना है कि जिस पौड़ी जिले में वन क्षेत्र में सर्वाधिक वृद्धि बतायी गयी है, वहां अधिकांशतया चीड़ जैसी पर्यावरण के लिए प्रतिकूल बताई जाने वाली प्रजाति के वनों की अधिकता है, यानी वनों में वृद्धि भी पर्यावरण प्रतिकूल वनों की हो सकती है, जबकि मिश्रित वनों के लिए पहचान रखने वाले नैनीताल जिले में सर्वाधिक 35 वर्ग किमी की कमी भी चिंताजनक है।

वन विभाग में अफसरों व फील्ड कर्मचारियों की कमी

वन सांख्यिकी उत्तराखण्ड की वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड वन विभाग में उच्चाधिकारियों के पदों पर जहां स्वीकृत पदों से भी अधिक अधिकारी कार्यरत हैं, वहीं नीचे के स्तर पर कर्मचारियों की भारी कमी है। बताया गया है कि राज्य में 3 स्वीकृत पदों के सापेक्ष 11 प्रमुख वन संरक्षक के, 4 के सापेक्ष 15 अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक, 14 के सापेक्ष 24 मुख्य वन संरक्षक और 12 के सापेक्षे 18 वन संरक्षक हैं, जबकि फील्ड  स्तर पर  33 के सापेक्ष 24 उप वन संरक्षक, 90 के सापेक्ष सहायक वन संरक्षक, 2445 के सापेक्ष 1987 राजि अधिकारी, उपराजिक व वन दरोगा तथा 3650 के सापेक्ष 2634 वन आरक्षी ही कार्यरत हैं। इससे वनों के संरक्षण के प्रति विभागीय प्रतिबद्धता भी साफ नजर आती है।

rbrbist

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नमस्कार
अति सुंदर

अति ज्ञानवर्धक जानकारी
वन्देमातरम ll
ओम हर हर महादेव ll जय माँ ll

 

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