Author Topic: Poems By Vikam Negi 'Boond"- विक्रम नेगी "बूंद" की कवितायें तथा लेख  (Read 6817 times)

पंकज सिंह महर

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साथियो,
 मैं आज आपका परिचय उत्तराखण्ड के एक ऐसे नैजवान कवि से करा रहा हूं, जिसकी सोच परिवर्तनकामी है, जिसकी सोच में नास्टेलजिया से ज्यादा कुछ कर गुजरने की तमन्ना है। खैर ये सब तो आप उनकी कविताओं से समझ जायेंगे, मैं आपको उनका परिचय दे दूं।
 
श्री विक्रम नेगी जी "बूंद" उपनाम से कवितायें लिखते हैं, मूलरुप से बागेश्वर जनपद के निवासी नेगी जी की पढ़ाई पिथौरागढ में ही हुई है और वह शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। अपने व्यस्ततम क्षणों में भी उन्हें समाज और साहित्य की फिक्र है, जो उनको औरों से जुदा करती है। श्री नेगी "विहान" नामक एक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन भी करते हैं।

 नेगी जी की कविताओं में आप अपना "धौंकार" पायेंगे, जो आपके दिल में है, लेकिन आप व्यक्त नहीं कर पाते नेगी जी उन्हें आसान से शब्द देकर हमारे दिल की आवाज को साहित्य बना देते हैं। तो फिर उनकी कविताओं में खोया जाय.....

विक्रम नेगी

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मुझे फोरम में अपनी कविताओं को पेश करने के लिये आपका धन्यवाद, मेरी एक रचना

आओ
पहाड़ आओ,
अपने कैमरे साथ ले आना
झोड़ा-चांचरी, छोलिया नृत्य,
सातूं-आठूं, जागर,
सब कैद कर ले जाओ,
दो-चार बूढ़ी हड्डियां तुम्हें हर गांव में मिल जाएँगी,
जिनके साथ तुम थोड़ी देर हुक्का गुडगुडा सकते हो,
दो-चार मडुवे की रोटियां तोड़कर उनके साथ
तुम वो सब उगलवा सकते हो
जो तुम्हें अपनी किताबों में लिखने के लिए चाहिए

आओ,
मंचों पर अपनी बेबसी की गाथा सुनाते
लोककलाकार तुम्हारे कानों को तरस रहे हैं.
और वो भी
बैठे हैं तुम्हारे इंतज़ार में
जिन्हें भ्रम है कि वो लोककलाओं को बचाने का बहुत बड़ा काम कर रहे हैं...

आओ
पहाड़ की आखिरी पारंपरिक शादी को कैद कर ले जाओ,
डोली में बैठकर ससुराल जाती आखिरी दुल्हन की तस्वीर समेट लो
तुम्हारी किताबों के मुख्य पृष्ठ पर
बहुत सुन्दर लगेगी वो तस्वीर....

आओ
पहाड़ आओ
बूढ़ी हड्डियां अब गलने लगी हैं,
मकड़ियों के जाल तुमसे पहले पहुच गए हैं,
पहाड़ के पुराने घरों की दीवारों में,
जल्दी आओ,
वरना तुम्हें निराशा के सिवा कुछ नहीं मिलेगा,
दौडाओ अपने गणों को
पूछो-
कौन, कहाँ, किस गाँव में अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है,
आने से पहले
अपने कैमरे की वोईस क्लीयरिटी चेक कर लेना
मसकबीन पुरानी हो तो आवाज़ साफ़ सुनाई नहीं देती....

आओ
खत्म होती साँसें तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं...!
......

विक्रम नेगी

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पहाड़ एक ही था,
तुमने दो कर दिए,
सीधे-सादे पहाड़ के ऊपर तुमने
अपना पहाड़ खड़ा कर लिया,
हमारे पहाड़ के कपड़े उतारकर
तुमने अपने पहाड़ को पहना दिए,
तुम्हारा पहाड़ मोटा होता गया
हमारा पहाड़ सिर्फ हाड़ रह गया
तुम्हारे पहाड़ के बोझ से
हमारे पहाड़ ज़मीन में धंस रहा है
तुमने खूब मजे किए
हमारे पहाड़ की बेचैनी को रिकॉर्ड करके
तुमने खूब मोटी-मोटी किताबें लिखी
हमारे पहाड़ के आंसुओं पर

याद रखना
हमारा पहाड़ अभी मरा नहीं है
वो जिंदा है...
हमारा पहाड़ पलटकर तुम्हें जवाब देगा....
इंतज़ार करो...

विक्रम नेगी

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आओ,
पहाड़ आओ,
टूटी-फूटी सड़कों ने अपने ज़ख्म भर लिए हैं,
तुम्हारी गाड़ियों के टायरों को अब थकान महसूस नहीं होगी,
पहाड़ इतना भी बेशर्म नहीं है
कि तुम्हारा ख्याल न रखे

आओ,
पहाड़ बेचैन है,
तुम्हारी यात्राओं का वर्णन सुनने के लिए,
न जाने कितनी बार तुम पहाड़ की छाती पर टहलते हुए निकले,
अस्कोट से आराकोट

आओ,
पहाड़ जानना चाहता है
अपनी कीमत,
जो तुम्हारी किताबों में प्रिंट है,
उसे सिर्फ इतना पता है
कि लकड़ी, पत्थर, मिट्टी, रेता, बजरी से बना
उसका जिस्म रोज बिकता है,

वो समझना चाहता है कि
उसकी आबरू, उसकी संवेदनाओं की कीमत कैसे तय होती है,
पहाड़ देखना चाहता है,
तुम्हारी मोटी-मोटी किताबें,
उसे मालूम नहीं तुम्हारा अर्थशास्त्र,
पहाड़ की गणित कमज़ोर है,

उसे पता नहीं था,
कि वो इतना कीमती है,
पहाड़ अनपढ़ है,
उसे तुम्हारी तरह लिखना नहीं आता,
पहाड़ सुनना चाहता है,
अपना दर्द
तुम्हारी जुबानी,
आओ,
घाट का पुल तुम्हारे इंतज़ार में आँखें बिछाए खड़ा है.....!
...
"बूँद"
२३ मई २०१२

विक्रम नेगी

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नेताओं ले देश मेरो बुकै हैलो
भारत माताक शीश झुकै हैलो

धर्म, जाति आड़ लिबे, दंग यो करुनी
एक भै कैं दूसर भैक दगाड यो लडूनी 
मारकाट करी दिल दुखै हैलो
भारत माताक शीश झुकै हैलो

महंगाईक मार हैगे, जनता बीमार रैगे
पाणी लै बेचाण भैगो, प्यास आब प्यास रैगे
जनताक धन क्वाड लुकै हैलो
भारत माताक शीश झुकै हैलो

किसान बेहाल छन, मजूर छन निराश
लौंड बेरोजगार भैरी, लिबे खाली आस
देशक विकास यसी रुकै हैलो
भारत माताक शीश झुकै हैलो

लट्ठी-डंड थमेबेर लौंडों कै भड्कूनी
आपुण फैद लिजी फिर शराब पिलूनी
लौंड-मौडूंक सारै खून सुखै हैलो
भारत माताक शीश झुकै हैलो
___
विक्रम नेगी “बूँद”
२००५, पिथौरागढ़

विक्रम नेगी

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आओ
इस बार काफल खूब पके हैं,
हिसालू-किलमोड़े,
तुम्हारी राह देखे हैं,
मिलम, पोंटिंग, दारमा, व्यास घाटियां,
तुम्हारे क़दमों के निशां याद कर रही हैं,
बहुत अरसा हो गया,
तुम नहीं आये,
हिमालय की बर्फ पिघलने लगी है

रोज बच्चे आ जाते हैं,
सडकों पर
काफल बेचने के लिए,
उन्हें एक लंबी सी कार का इंतज़ार है,
रोडवेज की पुरानी बसें
और धूल उड़ाती हुई जीपें देखकर वो बोर हो गए हैं,

आओ
पहाड़ आओ
मैदानों की तपती गर्मी में तुम्हारा हाल बुरा होगा,
पहाड़ एक वैश्या की तरह
आज भी तुम्हें ठंडक देने के लिए बड़े-बड़े रिजोर्ट्स की बालकोनी से झांक रहा है,

तुम्हारे आते ही,
सब कुछ भूल जाता है पहाड़,
अपना दर्द, अपनी चोटें, अपना दुःख,
बस मुस्कुराके फोटो खिंचाने के लिए खड़ी हो जाती हैं,
दूर जंगल से घास लाती हुई औरतों की टोली,

आओ,
पहाड़ आओ,
इस गर्मी में तुम्हें राहत मिलेगी,
हमेशा की तरह,
इस बार भी तुम्हें पहाड़ मीठा ही लगेगा,
ये पहाड़ का वादा है तुमसे...
......
"बूँद"
२२ मई २०१२

विक्रम नेगी

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एक उम्र बीत गयी
सापों को गाली देते हुए,
गिरगिट घूर रहे हैं,
कौवे उड़ रहे हैं सर के ऊपर,
सांप हमेशा सभ्य थे,
नगर कभी नगर था ही नहीं,
जंगल ही था,
और है...

गिरगिट
यों ही रंग नहीं बदलते,
ऐसा करना पड़ता है उन्हें,
जिंदा रहने के लिए

कौवे की कांव-कांव
हमें हमेशा ही बुरी लगी,
इसमें कौवों का कोई दोष नहीं,
हमारे कानों में ही कुछ दिक्कत है,

हम कुत्ते पालने के शौक़ीन हैं,
और पालतू जानवर गुलाम होते है,
कुत्तों का भोंकना,
हमें लफ्फाजी लगता रहा,
हमें पसंद नहीं कि
गुलाम ऊंची आवाज़ में बात करें
इसलिए हम हमेशा
कुत्तों को गाली देते रहे,

रोटी देखकर पूँछ हिलाना,
कुत्ते की आदत है,
और किसी की आदत को बदलने का
ठेका हमें अब तक नहीं मिला है,

जानवरों को गाली देना हमारी सभ्यता है,
क्योंकि हम समझते हैं
जानवर असभ्य होते हैं,
सभ्य होने का लाईसेंस हमारे ही पास है,
इसलिए हम केवल कविता लिखते हैं,

हमें नहीं पता कि
कितने जानवरों के सम्मान को ठेस पहुचाई है हमारी कविता ने,
लेकिन बावजूद इसके
हम पाक-साफ़ अहिंसा के पुजारी हैं...

ऐसा लिखने से कोई बदलाव नहीं आना है
क्योंकि सभ्य लोगों के लिए
अंडा फोड़कर आमलेट बनाना हिंसा नहीं है..... !
............
(बूँद)
२२ मई २०१२

विक्रम नेगी

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कभी-कभी जो कुछ चीज़ें बड़ी-बड़ी किताबें नहीं समझा सकती, वो चीज़ें, बातों-बातों में जीवन के अनुभव आसानी से समझा जाते हैं.... एक बार एक मित्र से काफी देर तक सपनों को लेकर बातें हुई....उसने कहा :-

आदमी के जीवन में हम अब तक की सारी व्यवस्थाओं को देख सकते हैं....

०१- आदिम युग में इंसान नग्न घूमता था, उसे चीज़ों की समझ और जानकारी कम थी, वो मिट्टी, पत्थर, घास, कीड़े-मकौड़े हर चीज़ को खाकर देखता था, पत्थरों से चिंगारी पैदा हुई, आग का आविष्कार हुआ, आदिमानव आग से भी नहीं डरा, आग देखकर वो अक्सर जिज्ञासावश या फिर अनजाने में अपना हाथ जला दिया करता था- यह आदमी का बचपन है....(आदिम युग है)

०२- उसके बाद कबीलों का दौर आया, लड़ाई-झगड़ा, तेरा-मेरा, संसाधनों पर कब्ज़ा जमाने की होड़ शुरू हो गयी- किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक आदमी अपने दोस्त बनाता है, अलग-अलग किशोरों के अलग-अलग गुट बनते हैं, कभी-कभी छोटी-छोटी बातों को लेकर गुटों में लड़ाईयां भी हो जाती हैं, जो ताकतवर होता है, उस किशोर से सभी किशोर डरते हैं.....- (यह कबीलाई दौर है, इसे हम राजशाही से लेकर सामंतवादी दौर और उसके बाद अंग्रेजों के उपनिवेशिक काल तक देख सकते हैं)

०३- फिर दौर शुरू होता है- पूंजीवादी व्यवस्था का, हर चीज़ पूँजी की गिरफ्त में है, रिश्ते-नाते, संस्कृति, भाषा, यहाँ तक कि सारा जीवन पूंजीवादी व्यवस्था का गुलाम है, यह जवानी का दौर है, जहाँ आदमी अपनी उम्र पैसा कमाने के लिए दौड़ता-भागता है, आर्थिक संसाधनों को जुटाने की जुगत में वो बहुत हद तक अपने परिवार और पड़ोस से दूर होता जाता है, यह दौर एक उम्र तक ही चलता है......(यह पूंजीवादी व्यवस्था है)

०४- उसके बाद आने वाला दौर है, समाजवाद + साम्यवाद- यह आदमी की अंतिम जरुरत है.....उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुँचने के बाद आदमी को जिस चीज़ की कमी सबसे ज्यादा खलती है, वो है अपनों का साथ, परिवार, पड़ोस.....उम्र के इस पड़ाव में वह चाहता है कि कोई न कोई हर वक्त उसके साथ बैठा रहे....जिससे वो अपने दिल की बातें कह सके.........उसे सबका साथ चाहिए.......वो अपने जीवन की तमाम छोटी-बड़ी लड़ाईयों को भूलना चाहता है, सारी उम्र उसके जितने भी दुश्मन बने, वो उन सबको गले लगाना चाहता है, वो हर किसी से प्यार से पेश आने की सोचता है......यही सुकून उसे चाहिए......(यह दौर है समाजवादी व्यवस्था का दौर, साम्यवादी व्यवस्था का दौर)

आपको कैसा लगा मेरे मित्र का यह चिंतन/विश्लेषण, अपनी राय दीजियेगा....

विक्रम नेगी

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मुझे नाव चलाने का शौक था, बारिश में नालियां भर जाया करती थी, नाली को नदी समझकर मैं अक्सर कागज़ की कश्ती बना लिया करता था, मुझे हवाई जहाज़ उड़ाने का शौक था, बचपन में हवाई जहाज़ को उड़ते देखकर मैं कागज के हवाई जहाज़ बना लिया करता था, मुझे बादलों तक जाना था, मुझे जादुई कालीन बनाना था, पतंगें मेरे ख्वाबों का कालीन बन जाया करती थी, कागज़ मुझे बादलों तक पंहुचा दिया करते थे, मैं छोटा था, कल्पनाओं में एक नई दुनियां बसाकर जीता था, मेरे ख़्वाब कागज़ों में बैठकर उड़ा करते थे, बचपन से ही मुझे राजा बनने का शौक था, रामलीला मंचों पर होती थी, आमा के साथ मैं भी देखने जाया करता था, कभी पूरी रामलीला देखी नहीं, रामलीला देखते-देखते मुझे नीद आ जाती थी, मैं ख्वाबों में राजा बनकर राज किया करता था, एक अलग किस्म की रामलीला मेरे ख्वाबों में मंचित हुआ करती थी, जिसमें मैं राजा होता था, मेरे दोस्त मेरे सैनिक हुआ करते थे, कभी रावण को देखकर अच्छा लगा, तो बस पूरा दिन रावण की तरह हंसना, कभी हनुमान पसंद आ गया तो उस दिन मैं ही हनुमान हुआ करता था, हमें रामलीला देखने से ज्यादा मज़ा लकड़ी के धनुष-बाण बनाकर खेलने में आता था...मैं थोड़ा बड़ा हुआ, ज़मीनी हक़ीक़त के सामने मेरे ख़्वाब टूटकर बिखरने लगे, राजा बनना सचमुच सपने में ही संभव था, कागज़ों में पले-बढ़े मेरे ख़्वाब कागज़ों में ही दफ़न होने लगे, डायरी के पन्ने काले होते रहे...थोड़ा और बड़ा हुआ....दुनियां सपनों के बिल्कुल उलट थी, कुछ साथी मिले, मेरी निराशा को आशा मिली, उनके साथ जो बातें होती थी, वो सपनों को सच करने की बातें थी, मेरे सपनों की दुनियां इस बार भी मुझे कागज़ों में ही मिली, नई दुनियां का सपना भी कागज़ों में दफ़न था.....![/size


 

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