Author Topic: प्रसिद्ध लेखक डा. दिनेश चमोला “शैलेश” जी की रचनाएं  (Read 2805 times)

हेम पन्त

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यह हमारे लिये गर्व का विषय है कि प्रसिद्ध लेखक डा. दिनेश चमोला “शैलेश” जी ने अपनी रचनाएं “मेरा पहाड़ फोरम” पर उपलब्ध कराने की सहर्ष सहमति दी है।
हम  डा. दिनेश चमोला “शैलेश” जी का आभार व्यक्त करते हैं। सभी साथियों से निवेदन है कि डा. चमोला की लेखनी पर अपनी प्रतिक्रियां व्यक्त करें।

हेम

हेम पन्त

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डा. दिनेश चमोला “शैलेश” जी का परिचय
नाम: डाॅ0 दिनेश चंद्र चमोला
साहित्यिक नाम: डाॅ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’
जन्म: 14 जनवरी, 1964
पिता: पं. चिंतामणि ज्योतिषी
माता: स्व0 श्रीमती माहेश्वरी देवी
पत्नी: डाॅ. अलका चमोला, एम. ए. (हिंदी), पी-एच. डीजन्म
स्थान: कौशलपुर, रुद्रप्रयाग, (उत्तराखंड)
पता: प्रभारी, राजभाषा अनुभाग,
भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून-248 005 (भारत)
स्थायी पता: ‘अभिव्यक्ति’, 157, गढ़ विहार, फेज-1,
मोहकमपुर, (आइ आइ पी), देहरादून-248 005
दूरभाष: 0135-2660414 (आवास), 2525871 (कार्यालय)
शैक्षिक अर्हता: एम. ए. (अंग्रेजी), प्रभाकर,
एम. ए. हिंदी (स्वर्णपदक प्राप्त)
पी-एच. डी., डी. लिट्.
शोध प्रबंध: ‘हिंदी के साठोत्तरी खंडकाव्यों में नायक
परिकल्पना’(पी-एच.डी)
‘राजभाषा हिंदीः अनुवाद एवं अनुप्रयोग’ (डी. लिट्.
)
भाशा ज्ञान: ‘हिंदी, गढ़वाली, अंग्रेजी तथा पंजाबी
संव्यावसायिक - 1982 से 1987 तक ‘दैनिक रणजीत’ सामाचार पत्र में
अंशकालिक अनुवाद का
कार्य।
तथा प्रशासनिक - जुलाई 1985 से मार्च 1987 तक नैशनल गल्र्स डिग्री
कालेज, पातड़ां, पटियाला,
अनुभव पंजाब में अंग्रेजी के प्रवक्ता के रूप में कार्य।
- जुलाई 1987 से दिसंबर 1988 तक इसी कालेज में हिंदी
प्रवक्ता के रूप में कार्य।
- दिसंबर 1988 से अप्रैल 1991 तक दि न्यू इंडिया एश्योरेंस कंलि.
(साधारण जीवन बीमा निगम), पटियाला पंजाब में हिंदी
अनुवादक के रूप में कार्य।
अप्रैल 1991 संे जून 1994 तक राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड,
कृषि मंत्रालय, भारत सरकार में वरिष्ठ हिंदी अनुवादक के
पद पर कार्य।
- जून 1994 से 2005 तक भारतीय पेट्रोलियम संस्थान,
देहरादून में हिंदी अधिकारी (सहायक निदेशक) एवं
संपादक ‘विकल्प’ के रूप में कार्य।
- जून 2005 से वर्तमान तक भारतीय पेट्रोलियम संस्थान,
देहरादून में वरिष्ठ हिंदी अधिकारी (उप निदेशक) एवं
संपादक ‘विकल्प’ के रूप में कार्य।
- संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय,भारत सरकार 1 नवंबर,
2012 से 7 फरवरी, 2013 तक संयुक्त निदेशक (हिंदी) के
पद पर कार्य ।

संप्रतिः
प्रभारी, राजभाषा अनुभाग,
भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून-248 005 (भारत)
सम्मान: 26 अक्टूबर 1997 को अखिल भारतीय साहित्य कला मंच ,
मुरादाबाद द्वारा
‘साहित्यश्री’ सम्मान से सम्मानित।

- भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर द्वारा 07 मार्च 1999
को ‘बाल साहित्यकार
सम्मान’से सम्मानित।
- उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा 16.04.2011
को ‘डाॅ. गोविंद चातक
सम्मान’ प्राप्त।
- साहित्यिक संघ वाराणसी द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सृजन हेतु 9
दिसम्बर 2010 को ‘सेवक स्मृति सम्मान 2010’ से सम्मानित।
- साहित्य समिति देहरादून द्वारा हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय
योगदान के लिए 14 सितम्बर 2003 को ‘हिंदी साहित्य शिखर
सम्मान’ से सम्मानित।
- डाॅ. रा.नि.मा. समिति हिसार द्वारा 1 अक्टूबर 2005 को
‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’ से सम्मानित।।
- अखिल भारतीय बुद्धिजीवी संगठन, मेरठ द्वारा अक्तूबर 2005
में ‘उत्तरांचल रत्न सम्मान 2005’ से सम्मानित।
- विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ कुशीनगर, बिहार द्वारा 5 अप्रैल
1993 को ‘विद्यासागर (डी.लिट्.) की उपाधि से सम्मानित।
- जीवन विकास संस्थान ,बस्ती द्वारा 14.12.1997 को ‘साहित्य
भाष्कर’ सम्मान’ से सम्मानित।
- संस्कार भारती, हापुड़ उत्तर प्रदेश द्वारा ‘महेश चंद्र
गुप्त स्मृति सम्मान’ से सम्मानित।
- उत्तराखण्ड शोध संस्थान द्वारा 13 अप्रैल 2003 को
‘‘उत्तराखण्ड शोध संस्थान सम्मान’ से सम्मानित।
- हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 31 मार्च 2010 को हरिद्वार
में ‘सम्मेलन सम्मान’ से सम्मानित।
- हिंदी सभा, सीतापुर से 12-14 फरवरी 2005 को ‘बाल
साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित।
- महावीर सेवा संस्थान, प्रतापगढ़ द्वारा 14 सितम्बर 1999 को
‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’ से सम्मानित।
- नागरिक परिषद्, देहरादून द्वारा 2 अक्टूबर 1997 को ‘श्री
चन्द्रावती लखनपाल साहित्यश्री पुरस्कार 1997’ तथा ‘दून
रत्न’ से सम्मानित।
- भाऊराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा मथुरा में ‘युवा
साहित्यकार सम्मान 2002’ से सम्मानित।
- हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा 14 सितंबर, 2003 को
‘साहित्यमहोपाध्याय की सम्मानोपाधि’ प्राप्त।
- राष्ट्रीय हिंदी अकादमी, कलकत्ता द्वारा 2-4 अक्तूबर 2004
‘राष्ट्रीय राजभाषा शील्ड सम्मान’ से सम्मानित।
- राष्ट्रीय हिंदी परिषद, मेरठ द्वारा 14 सितंबर 2003 को
‘हिंदी भूषण सम्मान’ से सम्मानित।
- साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा 16 फरवरी 2005 को ‘संपादक
शिरोमणि’ सम्मान से सम्मानित।
- कमला चैहान स्मृति ट्रस्ट, देहरादून द्वारा अक्तूबर 1997
में ‘उत्कृष्ट बाल साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित।
- बाल साहित्य पुरस्कार संस्थान, उन्नाव द्वारा 24 फरवरी 1999
को ‘पं. शिव शंकर दुवे स्मृति पुरस्कार’ से सम्मानित।
- अखिल भारतीय साहित्य कला विकास संस्थान, बस्ती द्वारा 20
फरवरी 1999 को ‘बाल काव्य रत्न सम्मान’ से सम्मानित।
- राष्ट्रीय हिंदी परिषद्, मेरठ द्वारा 14 सितंबर 1998 को
‘हिंदी गौरव सम्मान’ से सम्मानित।
- मैसूर हिंदी प्रसार परिषद्, बैंगलौर द्वारा 28-29 अक्टूबर
1995 को ‘विज्ञान भवन में परिषद् सम्मान से सम्मानित।
- बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र, भोपाल द्वारा 14
नवंबर 2009 को भोपाल में ‘बाल साहित्यकार सम्मान
2009’ से सम्मानित।
- विज्ञान परिषद,् प्रयाग द्वारा ‘गाएं गीत ज्ञान विज्ञान के’ पुस्तक
पर ‘श्री तुरशन पाल पाठक स्मृति बाल विज्ञान लेखन पुरस्कार
2010’ प्राप्त।
- 12 अप्रैल 2010 को ‘श्री श्याम सुधा परिमार्जन ‘बाल साहित्य
सम्मान’ प्राप्त।
- साहित्यिक एवं सांस्कृति कला सगम,अकादमी प्रतापगढ़ द्वारा 4
मई 2003 को ‘विवेकानंद सम्मान’ से सम्मानित।
राष्ट्रभाषा विकास सम्मेलन, गाजियाबाद द्वारा 29 अप्रैल 2001
को ‘राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान’ से सम्मानित।
- हिंदी विचार मंच, देहरादून द्वारा 22 सितम्बर 2002 को
‘हिंदी गौरव सम्मान’से सम्मानित।
- अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद की ओर से 24
नवंबर 2001 को ‘श्री लक्ष्मण प्रसाद अग्रवाल बाल साहित्य शिखर
सम्मान 2001’ से सम्मानित।
- अखिल भारतीय स्तर पर पत्रिका के उत्कृष्ट सृजन हेतु गृह
मंत्रालय,भारत सरकार द्वारा 14 सितंबर 2009 को भारत के
परम,श्रेष्ठ राष्ट्रपति से ‘विकल्प’ पत्रिका को द्वितीय राष्ट्रीय
पुरस्कार।
- अखिल भारतीय स्तर पर पत्रिका के उत्कृष्ट सृजन हेतु गृह
मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 14 सितंबर 2011 को भारत के
परमश्रेष्ठ राष्ट्रपति से ‘विकल्प’ पत्रिका के लिए विज्ञान भवन,
दिल्ली में प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार।
- अखिल भारतीय हिंदी सेवी संस्थान, इलाहाबाद द्वारा
‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’ से मई 2011 में सम्मानित।
- देश की चालीस से अधिक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा
उत्कृष्ट सृजन हेतु सम्मानित/पुरस्कृत।

हेम पन्त

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- आकाशवाणी, दिल्ली, चंडीगढ़ तथा दूरदर्शन दिल्ली
एवं लखनऊ में साहित्यिक साक्षात्कारकर्ता के रूप में कार्य।
- राष्ट्रीय समाचार पत्रों यथा-‘जनसत्ता’, ‘नवभारत टाइम्स’,
‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘दैनिक ट्रिब्यून’, ‘पंजाब केसरी’,
‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’, ‘जनसंदेश’, ‘हिंदुस्तान’,
‘आजकल’, ‘जागृति’, ‘हरियाणा संवाद’, ‘हरिगंधा’ तथा
‘विकल्प’ आदि दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक
पत्र/पत्रिकाओं के राष्ट्रीय साक्षात्कारकर्ता परिचर्चा
संयोजक।
- विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यिक संकलनों, अभिनंदन
ग्रंथों व विशेषांकों के आमंत्रित सम्मानित रचनाकार
एवं संपादकीय सलाहकार (अवैतनिक)।
- डाॅ. जय सिंह व्यथित अभिनंदन ग्रंथ (गुजरात) के
साहित्यिक संपादक।
- श्री राजदेव प्रियदर्शी अभिनंदन ग्रंथ के संपादन मंडल के
सदस्य।
- पंजाब की ‘सर्वोत्तम हिंदी कविता’ के चयनित कवि।
- राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका ‘विकल्प’ के विविध विषयों पर
प्रकाशित विशेषांकों के संयोजक/संपादक।
- वै. त. श. आयोग की प्रशासनिक शब्दावली के संपादन व
परामर्श समिति के विशेषज्ञ/सदस्य।
- विभिन्न विषयों यथा- कंप्यूटर, गणित, मानविकी आदि
की शब्दावली निर्माण हेतु नामित भाषा विशेषज्ञ।
- विश्वस्तरीय वेबसाइटों पर रचनाएं तथा परिचय सम्मिलित।
- देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, मंत्रालयों, सरकारी
प्रतिष्ठानों एवं उपक्रमों में अनुवाद एवं राजभाषा
विषयक शताधिक व्याख्यान प्रदत्त।

हेम पन्त

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डाॅ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’ की प्रकाशित पुस्तकें
काव्य-संग्रह
1. मौसमी खुदेडू (गढ़वाली) पटियाला 1982
2. यादों के खंडहर पटियाला 1989
3. मर्थ आॅफ साॅलिट्यूड (अंग्रेजी)
गुड़गांव 1991
4. कि भोर हो गई दिल्ली 1996
5. क्षितिज के उस पार दिल्ली 1997
6. गंतव्य की ओर दिल्ली 2002
7. काया के फूल दिल्ली 2002
8. स्मृतियों का पहाड़ देहरादून 2005
9. कान्हा की बांसुरी (दोहा संग्रह) देहरादून
2008
10. विदाई (चंपू काव्य) देहरादून
2008
11. बौगलु माटु त... देहरादून 2008
कहानी संग्रह
12. माटी का कर्ज़ दिल्ली 1998
13. मिस्टर एम डेनी एवं अन्य कहानियां देहरादून
2008
अनुवाद
14. समकालीन बर्मी कविताएं (अंग्रेजी) दिल्ली
1994
15. बिखरे मोती (पंजाबी) दिल्ली 1994
शब्दावली/शब्दकोश
16. पेट्रो-प्रशासनिक शब्दावली देहरादून
1997
17. व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश दिल्ली
1998
बाल कविता संग्रह
18. बोलो चिडि़या-बोलो मैना दिल्ली
1994
19. हम हैं सूरज चंदा मां के दिल्ली
1994
20. प्रतिनिधि बालगीत दिल्ली
मुद्रणाधीन
21. आओ मीत, गाओ गीत दिल्ली 2003
22. एक सौ एक बाल गीत देहरादून 2005
23. गाएं गीत ज्ञान विज्ञान के देहरादून 2010
बाल कहानी संग्रह
24. दूर के पड़ोसी दिल्ली 1994
25. चंपा का राजकुमार दिल्ली 1994
26. प्रतिनिधि बाल कहानियां दिल्ली 1998
26. अंहकारी लकड़हारा दिल्ली 1998
28. फूलों का देवता दिल्ली 1998
29 ईमानदार गडेरिया दिल्ली 1998
30. चंपा का राजकुमार दिल्ली 1998
31. खुशियों का गांव दिल्ली 1998
32. सोन चिरैया के देश दिल्ली 1998
33. भिखारी की अंगूठी दिल्ली 1998
34. फूलों का राजकुमार दिल्ली 1998
35. स्वप्न परी का महल दिल्ली 1998
36. सांच को आंच नहीं दिल्ली 1998
37. चोर की दाढ़ी में तिनका दिल्ली
1998
38. उपकार का बदला दिल्ली 1998
39. स्वप्न देश की राजकन्या दिल्ली 1998
40. माता पिता की सीख दिल्ली 1998
41. टीनू की सूझ-बूझ दिल्ली 1998
42. सत्यमेव जयते दिल्ली 1998
43. ईमानदार देवदास दिल्ल 1998
44. नामदेव की निष्ठा दिल्ली 1998
45. सत्य की परीक्षा दिल्ली 1998
46. लालची बुढि़या दिल्ली 1998
47. दादी की कहानियां दिल्ली 2006
48. नानी कीे कहानियां दिल्ली 2006
49. श्रेष्ठ बाल कहानियां दिल्ली 2001
50. सच्चा पाठ दिल्ली 2000
51. सच्ची मेहनत दिल्ली 2000
52. यह जंगल मेरा है दिल्ली 2000
53. सच्ची साधना दिल्ली 2000
54. आलसी टुन-मुन दिल्ली 2000
55. नटखट बादल दिल्ली 2000
56. सूझ-बूझ दिल्ली 2000
57. अनोखी मित्रता दिल्ली 2000
58. रूपकुुंड का बगुला दिल्ली 2000
59. बुद्धि का चमत्कार दिल्ली 2001
60. नटखट लोमड़ी दिल्ली 2000
61. दोस्ती बंदर की दिल्ली 2000
62. भालू दादा दिल्ली 2000
63. बिल्लू की सूझ-बूझ दिल्ली 2000
64. सच्चा विश्वास दिल्ली 2000
65. देश प्रेम दिल्ली 2000
66. सच्चा सम्मान दिल्ली 2001
67.मेरी इक्यावन बाल कहानियां दिल्ली 2011
68. बाल कहानियां पंचकूला 2013
उपन्यास
69. टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष देहरादून
2001
70. एक था राॅबिन देहरादून 2002
अन्य
71. कंप्यूटर......हिंदी अनुप्रयोग देहरादून 1999
एकांकी
72. पर्यावरण बचाओ देहरादून 2004
अनुवाद
73. अनुवाद और अनुप्रयोग देहरादून 2006
74. प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी देहरादून 2007
व्यंग्यः
75. झूठ से लूट देहरादून 2011
अनुवाद के क्षेत्र में अनुभव-
पिछले 30 वर्षों से अनुवाद, अनुवाद पुनरीक्षण, तथा
शब्दावली के कार्य में संलग्न।
- साहित्यिक अनुवाद के क्षेत्र में पंजाबी कवि प्रकाश साथी
के कविता संग्रह ‘रूल्दे मोती’ का हिंदी में, ‘विखरे
मोती’ नाम से अनुवाद तथा इरावदी प्रकाशन नई दिल्ली
द्वारा 1994 में प्रकाशन।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बर्मा की 200 वर्ष की कविताएं
ष्ब्वदजमदचवतंतल ठनतउमेम च्वमउेष्ए का ‘सम्माकालीन बर्मी
कविताएं’ नाम से अनुवाद तथा इरावदी प्रकाशन नई दिल्ली
द्वारा 1994 में प्रकाशन।
- प्रसिद्ध बर्मी-हिंदी कहानी संग्रह ‘काला जवाहर’ तथा
उपन्यास ‘नफरत करती रहो’ का अंग्रेजी अनुवाद।
- डाॅ0 अंबेडकर प्रतिष्ठान, कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
द्वारा प्रकाशित संपूर्ण बाबा साहेब डाॅ0 अंबेडकर वांग्मय
के खंड-6 के राष्ट्रीय हिंदी अनुवादक।
- केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार की 34 भाषाओं
में प्रकाशित पत्रिका ‘यूनेस्को दूत’ का हिंदी अनुवाद।
- ‘अनुवाद और अनुप्रयोग’ अनुवाद चिंतन संबंधी
प्रकाशित पुस्तक, 2006 (राष्ट्रीय नाताली पुरस्कार प्राप्त)
- ‘प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी’ ‘अनुवाद तथा प्रशासनिक
हिंदी’ से संबंधित प्रकाशित पुस्तक, 2007
- विभिन्न भारतीय भाषाओं के कवियों की रचनाओं
का अंग्रेजी अनुवाद
- लेखक की स्वयं की रचनाआंे का पंजाबी, गुजराती, कन्नड़,
मलयालम, तमिल, नैपाली तथा अंग्रेजी आदि विभिन्न
भारतीय/विदेशी भाषाओं में अनुवाद।
- ‘टुकड़ा टुकड़ा संघर्ष’ उपन्यास कन्नड़ भाषा में
अनूदित तथा बैंगलौर से प्रकाशित।
- व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश 2001 में आत्माराम एंड
संस द्वारा प्रकाशित।
- पिछले 20 वर्षोंं से वैज्ञानिक तथा तकनीक शब्दावली
आयोग भारत सरकार के शब्दावली विशेषज्ञ।
भ््रामण - यूके तथा यूएसए
पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशनः (3000 से अधिक)
पिछले 30 वर्षों से राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर लेखनः-
-

हेम पन्त

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डाॅ0 दिनेश चमोला ‘शैलेश’ द्वारा राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं
में प्रकाशित समीक्षाएं

1. ‘लंबे शीर्षकों की छोटी
कहानियां’ (पुस्तकः ‘मानस चंदन’-ब्रजभूषण)
अमर उजाला 4 जून, 1995

2. ‘साहित्यिक निबंध’
(पुस्तकः ‘देश धर्म और साहित्य’-डाॅ0 विद्यानिवास मिश्र
राष्ट्रीय सहारा
7 अक्टूबर, 1993

3. ‘वेदना का सैलाब-तीसरे पहर गुलाब’
(पुस्तकः तीसरे पहर गुलाब’-गोविंद नीराजन)
राष्ट्रीय सहारा
28 जनवरी, 1993

4. ‘जिंदा मुहावरे मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति’
(पुस्तकः ‘जिंदा मुहावरे’- नासिरा शर्मा)
राष्ट्रीय सहारा
15 अप्रैल, 1993

5. ‘मानवीय मूल्यों का परिरक्षण करती कहानियां’
(पुस्तकः ‘विवेक के आनंद से’-हंसराज रहबर)
अमर उजाला 23 अक्टूबर, 1994

6. ‘प्रेम व यथार्थ का जीजा जागता दस्तावेज’
(पुस्तकः ‘नफरत करती रहो’-टेक्तौं फौं नांई)
अमर उजाला 10 अक्टूबर, 1993

7. ‘वेदना के मीतः ‘खत खुशबुओं के गीत’
(पुस्तकः ‘खत खुशबुओं अमर उजाला 22 अगस्त, 1993
के’-डाॅ0 राम सिंह)

8. ‘उद्वेगों का साज-एक और आवाज’
(पुस्तकः ‘एक और आवाज’-शिव रामन)
अमर उजाला 19 दिसंबर, 1993

9. ‘बाल मनोविज्ञान को उजागर करती कविताएं’
(पुस्तकः ‘आजू-राजू’-सं. महेश दिवाकर)
राष्ट्रीय सहारा
10 जनवरी, 1994

10. ‘संघर्ष व मानवता का पाठ पढ़ाती पुस्तकें’
(पुस्तकः ‘महात्मा फूले’-डाॅ0 मू. व. साह)
अमर उजाला 13 जून, 1993

11. ‘बर्मी परिवेश की कहानियां’
(पुस्तकः ‘काला जवाहर)
राष्ट्रीय सहारा
25 फरवरी, 1993

12. ‘यथार्थ की पीड़ा के कपाट खोलता काव्य संग्रह ‘मन्यू’
(पुस्तकः ‘मन्यु’-डाॅ0 बलदेव वंशी)
राष्ट्रीय सहारा
26 नवंबर, 1992

13. ‘नारी अस्मिता की महा गाथा’
(पुस्तकः ‘अर्ध नारीश्वर’-विष्णु भाकर)
राष्ट्रीय सहारा
16 सितंबर, 1993

14. ‘बिसरते दर्द की कहानियां’
(पुस्तकः ‘चंद सतरें और’-अनीता केश)
राष्ट्रीय सहारा
16 सितंबर, 1993

15. ‘अनुभूतियों के यथार्थ का फानः जहाज और तूफान’
(पुस्तकः ‘जहाज और तूफान’-डाॅ0 रामविलास शर्मा)
हिमालय दर्पण
16 जून, 1996

16. ‘वैज्ञानिकों के वैज्ञानिक’ हिंदुस्तान 10 जुलाई, 2007
(पुस्तकः वैज्ञानिकों के ज्ञानिकः डाॅ0 आत्मा राम)

17. (पुस्तकः ‘मोरचे’ डाॅ0 सुसम वेदी)
जनसत्ता 18 अप्रैल, 2006

18. ‘मानवीय सरोकों को स्वर देती हानियां’
(पुस्तकः ‘एक आदमी की मौत’-चंद्र मौली)
अमर उजाला 8 अगस्त, 1998

19. ‘प्रेम की तलाश’
(पुस्तकः सूत्रधार सोते हैं’-सुनीता जैन)
हिंदुस्तान 31 अगस्त, 1997

20. राजभाषा प्रचार, प्रयोग व व्यवहार  भाषा’
(पुस्तकः राजभाषा विविधा’-डाॅ0 माणिक मृगेश)
अमर उजाला 15 अगस्त, 1993

21. भारतीयता के मूल्यों को तलाशती पुस्तक
(पुस्तकः आशा और आस्था’-डाॅ0 आरसू)
कदंबिनी दिसंबर, 2011

22. बोलो चिडि़या बोलो
मैना-डाॅ0 दिनेश चमोला
(समीक्षाः डाॅ0 मंजरी)
नवभारत टाइम्स
18 सितंबर, 1994

23. हिंदी भाषा में कंप्यूटर पर भिनव पुस्तकः
सं. डाॅ0 दिनेश चमोला,
(समीक्षाः डाॅ0 वीरेंद्र र)
बरहमासा अंक-7 अगस्त, 001

हेम पन्त

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डा. दिनेश चमोला ‘शैलेश’ की कहानीः

इंतजार

इमरती पफूल परी सी घर के आंगन में ठुमकती, गौरैÕया सी पुफदकती, अपने छोटे भाई नरेंद्र के साथ चुला भन्नि ;घर-घर का खेल खेलती रहती। दुख-दारिद्रय भरे संसार से कोशों दूर ये अपने बालपन के स्वार्गिक संसार में हरिण शावकों से कुलांचे भरते थे। उदास मां अरुणा ओखली में धन कूटती रहती। अपने दोनों बच्चों का सुख ऐश्वर्य भरा संसार देखती तो पहाड़ के डगमग लाल बुरांश की तरह खुशी से महक उठता मन।
नैणी डांडा के घटाटोप आकाश की ओर दृष्टि जाती तो भीतर तक टूट जाती मां। गहरी श्वास छुई-मई की तरह खुशियों की कुमड़बत्ती को दरका देती। ऐसा ही
मनहूस अंध्ेरा काला दिन था वह, जब उसके पफौजी पति ज्वाळमुखी देवी के पूजा के उपरांत देश सीमा पर लड़ने व अगले पनौऊं के कोथी ;पांडव नृत्यद्ध तक अपनी जन्मभूमि लौटनेका आश्वासन देकर विदा हो चले थे।
तब से कितनी बार पनौ नाचे ;पांडव नृत्य हुआद्ध बड्वाल नाचे, कुल देवताओं, ग्राम देवताओं के थानों में पूजा-अर्चनाएं हुईं। लोग परदेश जा-जाकर लौट गए .........लेकिन नहीं लौटे तो इमरती के पफौजी पिता।
जब भी परदेश से सिपाही की वर्दी में कोई गांव की सीमा या सड़कों पर आता दिखाई देता- दोनों बच्चे अपने परदेश गए पिता के स्वागत के लिए पलक पांवड़े बिछाते ..................... लेकिन गांव की सरहद से अपलक उसे राह बदलते देख गहरे कष्ट में मन मसोस कर रह जाते। कभी-कभार गांव के ऊपर से कोई हाॅलीकाॅप्टर गुजरता तो छोटा नरेंद्र दीदीसे कहता- ‘दीदी पिताजी हमारी कुशलक्षेम जानने के लिए हैलिकाप्टर से रोज हमें देखा करते हैं ................. लड़ाई में पफुर्सत नहीं मिलती होगी ................. हमारी ही तरह पिताजी को भी हमारी याद तो आती होगी न ................. क्या उन्हें बाडुली ;हिचकीद्ध नहीं लगती होगी?’ ‘जरूर लगती होगी भुला ......... उन्हें हमें देखने का मन भी करता होगा ......... .. लेकिन .......’ कुछ न कह पाती इमरती ......... बस आंखें डबडबा जातीं।
‘दीदी कैसा नियम है भगवान का ............. जिस बात को मुंह नहीं कह पाता आंखें सब कुछ कह जाती हैं .................. क्या हमारे ये आंसू खुद पिताजी को वापस नहीं लौटा सकती? जब-तब उनके सामान्य प्रसंग भी पिताजी से जुड़ जाया करते।
कितने उत्सव, तीज-त्योहार, दीपावली-बैसाखियां बीत गईं। लेकिन न देश सीमा पर गए पिता लौटे न उनकी कोई कुशलक्षेम ही। बसुकेदार स्कूल जाते समय बग्ड्वाल देवता के मंडले ;मंदिरद्ध में माथा टेकते दोनों भाई-बहन, शिव मंदिर में रोट व गांव के घंडियाल, जाख, सिंघलास नगराजा-धरीदेवी के मंदिरों में पूजा-अर्चना करने की मनौतियां मानते कि यदि लड़ाई में गए पिताजी की कोई संत-खबर कहीं से मिल जाए या पिफर वे स्वयं लौट आए ........... तो मैती देवी के धान में चांदी का छतर चढ़ा देगी मां।
उचाणों ;मनौतियोंद्ध से पूरा काकर भरा रहता। जहां जो कुछ जांचने-पूछने की बात करता कोई .............. मां व सगे-संबंध्ी वहीं पहुंच जाते बक्या ;भविष्यवाणीकर्ताद्ध से पूछने . ........ लेकिन वही ढाक के तीन पात ................ चारों ओर हाथ लगती तो केवल निराशा।
मां गऊशाला व खेतों के कामकाज से थकी-हारी लौटती तो आग की सरसराहट पर पिताजी की स्मृतियां ताजी हो आतीं। पिताजी के जाने की बात जब वे जानना चाहते, तो पहले पल्लू को दांत से दबाए मां कष्ट में स्वयं दुखी होती .......... पिफर ढाढ़स के स्वर में कहती- ‘नरेंद्र दो माह तेरह दिन का था तब .............. और इमरती तीन साल की ...... सन् अड़सठ की बात है ........... दो महीने की छुट्टी काट कर गए थे वे ......। तेरह साल में शादी हुई थी मेरी ............. 102 सिपाहियों का जहाज लाहौल-स्पफीति दर्रे में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था ............ किसी ने कहा कि जहाज दुश्मनों के कब्जे में है ..... ...... किसी ने कहा विमान लापता हो गया है ............ किसी ने कहा अन्य पफौजियों के साथ वे भी मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं ..........।
मृतक के संस्कार भी संपÂ हुए लेकिन मैं वर्षों तक इसी आश-विश्वास में रही कि दुश्मन की कैद से मुक्त होकर अवश्य लौटेंगे वे एक न एक दिन, अपने गांव के पांडव नृत्य ;पनौ के कोथीद्ध देखने ..........। कई-कई सालों बाद कई पफौजी लौटे थे सकुशल अपने देश वापस ............ लेकिन नहीं लौटे वे .............। कुछ समय पश्चात पफौज ने उन्हें मृतक मानकर मेरी पैन्शन लगा दी इक्यावन रुपये मात्रा ............।’
निर्मोही दुनिया मारे को और मारती है ..................... जब-तब पुरानी स्मृतियों को कुरेद कर तोड़ देना चाहती अरुणा को। लेकिन देश पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले पफौजी पति के देशप्रेम की लहर थी उसकी रगों में। दुर्दिन व गहरे संकटों में ही तो समय व ईश्वर परीक्षा लेते हैं मनुष्य के पौरुष की। इस परीक्षण काल में जो खरा उतर गया। उससे पिफर कौन जीत सकता है? .......... कोई नहीं ..............।
अपने बुरे दिनों में अपनों व सरकार से दिवंगत शहीद की विध्वा होने की गुहार भी लगाई अरुणा ने .......... लेकिन सब कुछ व्यर्थ। न उसे कोई मदद मिली न बेटे की पढ़ाई-लिखाई, नौकरी का आश्वासन व न बेटी की शादी या अपनी गृहस्थी की सुख- सहायता ही। लेकिन इस सबसे भी टूटी नहीं अरुणा।
वह सोचा करती कि उसके स्वामी ने देश के लिए प्राणों की बाजी लगा दी .......... और वह विपरीत परिस्थितियों में छोटी सी गृहस्थी का भार भी न उठा पाए .......... तो दिवंगत वीर शहीद की पत्नी कैसी? जीवन भी तो किसी संग्राम से कम कहां है। उससे पीठ दिखाना तो निरी कायरता है। कभी-कभी इमरती मां से कहती- ‘मां .............. यह दुनियां कितनी विचित्रा है ............. हमें दया का पात्रा क्यों समझती है ............. हर बार हमसे सहानुभूति के शब्दों यरां ;अरेद्ध!, बेचारे आदि का प्रयोग कर क्यों बात करती है ................ राष्ट्र के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले सिपाहियों व देशभक्तों के परिजनों को तो नमन करना चाहिए बार-बार सबको, .......उन्हें दया के पात्रा नहीं .......... बल्कि औरों के लिए प्रेरणा का स्रोत मानना चाहिए .......।’
‘ठीक कहा है बेटी तुमने ............... इतिहास उन्हें ही याद करता है ........ जिन्होंने अपना सर्वस्व देश, जाति व समाज की खातिर अर्पित किया है ......... ऐसे वीर सैनानियों, देशभक्तों के वंशज होना भी तो पुण्य का ही पफल है बेटी .........। ईश्वर बडे़-बड़े संकट व उत्तरदायित्व उनको ही सौंपता है ........... जिनके लिए उन्हें सत्पात्रा समझता है .......।
इस सबसे प्रेरणा ले मैं विपरीत स्थितियों में भी जीवन की गाड़ी को ईमानदारी से खींच रही हूं .............। इंतजार व परिश्रम कठिन जरूर होता है लेकिन इसका पफल बहुत सुखकारी व मीठा होता है। जीवन की परीक्षा में पास ;उत्तीर्णद्ध होना भी किसी बड़ी लड़ाई जीतने से कम नहीं होता।
बस, यही गुरु मंत्रा था अरुणा का ............ अपनी टूटी गृहस्थी को कुशलतापूर्वक चलाने का। कितने कष्ट, झंझावत आए ............ कितने बुरे दिन भी ........... लेकिन मेहनत, ईमानदारी व कर्तव्यपरायणता का पल्लू कब छोड़ा उसने। अनाज, दूध् व घी बेचकर पढ़ाए-लिखाए बच्चे ............ जो भी दो पैसे मिलते उसे अपने दिवंगत पति का कृपा प्रसाद मानती।
समय ने लंबी उड़ान भरी। दुखों का पासा पलट गया .......... देखते ही देखते चार दशकों का समय चरखी के मांनिद घूम गया .............. अनाथ बच्चे बड़े हो गए समर्थ व अपने पैरों पर खड़े ............. बेटी अच्छे घर में ब्याही गई .............. दिवंगत पति की भावुक देखरेख में संपन्न हुआ सब कुछ।
पूरे चालीस साल बीत गए। ढाई महीने का नरेंद्र अब इकतालीसवें में हैं ..... चैखंभा से कार्तिक स्वामी व मौण से नैणी डांडा की पहाडि़यों बर्पफ की चादर ओढ़े गुमसुम हैं। आंगन में पोते-पोतियों के साथ खेलती है अरुणा। गांव में पिफर नाचने लगे हैं पनौ व बग्ड्वाल .............? और पूरे चालीस साल बाद अपने चिर युवा हंसमुख चेहरे में तिरंगे में लिपटा उसका वीर पफौजी पति पहुंच रहा है अपने गांव के पनौ के कोथी ;पांडव नृत्यद्ध देखने को ............ एक युग पूर्व अपने किए गए वायदे को पूरा कर मृत रूप में ...............। और एक दिन लौट आया उसका पफौजी देश प्रेमी पति जन्मभूमि वापस लाहौल-स्पफीति की हिम शिलाओं में अपने चालीस वर्ष पूर्व के यौवन को उसी तरह सुरक्षित रखते हुए।
एक युग का इंतजार समाप्त हुआ अरुणा का ..............। पूरी गमगीन ध्रती व नम नेत्रों से हजारों हिमपुत्रा गर्व से ‘भारत माता का जयनाद’ करेंगे जब मंदाकिनी के तट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ दाह संस्कार कर शहीद का रग-रग गंगा की कल-कल में प्रवाहित हो जाएगा ................ तब अरुणा व उसके परिवार का महकालजयी इंतजार इतिहास के पृष्ठ की अमिट ध्रोहर बन हर दृष्टि से मिला अरुणा को..... नई पीढ़ी की प्रेरणा का स्रोत होगा।
दर्शन मात्रा से पूरे चालीस वर्षों के दुख-कष्ट पुफर्र हो गए......... मानो इस जीवन के बहुत बड़े )ण से उ)ण हुई हो अरुणा। देश की रक्षा के साथ-साथ उसके साथ की वचनव(ता का अक्षरशः पालन किया देवतुल्य पतिदेव ने....... सोच-सोच भीतर तक पसीज जाती अरुणा। इस लंबे इंतजार का प्रतिपफल हर दृष्टि से मिल अरुणा को?..... आ£थक रूप में भी मिला सुकून के रूप में भी। ऐसे वीरों को शत-शत नमन।

हेम पन्त

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कहानीः-
घरौंदे की तलाश
डा. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, डी. लिट्.
इंटर का परीक्षापफल निकलने तक विशु के दोस्तों ने देश-परदेश की यात्राएं कर दी थीं। कइयों ने शहरों में नौकरी कर रहे अपने संबंध्यिों से परामर्श कर कई-कई जगह डिग्री, पाठ्यक्रमों के फार्म मंगवा दिए थे। न केवल फार्म बल्कि यह भी तय कर लिया था कि अब इसके बाद उनके जीवन का अगला पड़ाव कौन सा होगा ....... उसका गंतव्य क्या होगा .........। कई मित्रा अभी दो-दो नावों में पैर रखे हुए थे ......... कि यदि
इसमें उनका चयन हो तो अच्छा है .......... और यदि उसमें चयन हो तो उससे भी अच्छा।
कुछ संशय के मझधर में हिंडोले खा रहे थे जबकि कुछ अभी भी प्रतियोगिताओं की तैयारी कर ही रहे थे। जीवन में प्रगति तथा दुर्गति की बहुमंजिला इमारत की मैट्रिक अथवा इंटर की परीक्षा मूलभूत सोपान है। किन्हीं की जीवन दिशा की नींव मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही पड़ जाती है जबकि किसी की निर्भर रहती है इंटर के परीक्षापफल पर।
मार्ग सुनिश्चित होते ही जीवन का गंतव्य व मंतव्य भिन्न-भिन्न हो जाता है। पिफर अपनी-अपनी जीवन नदी के प्रवाह में सभी अपनी-अपनी दिशाओं की ओर तैरते चले जाते हैं।
विशु इंटरमीडिएट कालेज का न केवल होनहार छात्रा था बल्कि पिछले तीन वर्षों से विद्यालय का निर्विरोध् चुना जा रहा ‘जनरल मानीटर’ ;जी.एम. भी था। खेल से लेकर सांस्कृतिक गतिविध्यिों तक में जिले से प्रदेश स्तर का प्रतिनिध्त्वि कर चुका था वह। जब भी कभी कालेज के स्टाफ रूम में अध्यापकों के बीच अथवा खेल के मैदान में सुस्ताते हुए कैरियर की बात चलती तो सपफलता की तालिका में ग्रापफ सबसे ऊपर जाता विशु का।
बात सी पी एम टी की हो या हो आइ.आइ.टी. या अन्य किसी बड़े कंपीटीशन की ......... .... उसमें शत्-प्रतिशत सपफलता के लिए विशु की गारंटी अध्यापक से लेकर कोई भी होनहार विद्यार्थी पूरी विश्वास से देता। इस सबकी विशु न कभी सोच करता न चिंता ही।
लेकिन जंगलों में जब मवेशियां चरती रहतीं ............. आकाश में चीलों का समूह गोलाकार परिध्यिों में बराबर चक्कर काटता रहता .......... धूप की तपन से ऊब पपीहा ‘प्याऊ-प्याऊ’ कह कराहता रहता ........ सुदूर नीचे पहाड़ की तलहाटियों में मच्छर सी गाडि़यों का हुजूम हरकतें करता व चीड़ के जंगल की हवा की सांय-सांय कानों में गुपचुप भविष्य के सपनों की आहट के प्रश्न घोल जाती ................ तो विशू चीड़ की छांह में पल दो पल के लिए आंखें मूंद कल्पना के आकाश में उड़ने को उतावला हो जाता।
कल्पना की अंधेरी व दुर्गम, गुपफाओं तथा चोटियों पर सफलतापूर्वक आरोहण कर जब वह वापस यथार्थ के ध्रातल पर लौटता तो स्वयं को कहीं भी न पाकर ठिठक जाता। उसे लगता कि कल्पना व यथार्थ के इस काल्पनिक चित्रा का संबंध् सीधे-सीधे उसके वास्तविक जीवन से भी है।
संसार में प्रतिभाओं की असंख्य व असीमित संभावनाएं होती हैं अनगिनत बालक-बालिकाओं व युवाओं में। लेकिन इन प्रतिभाओं को संभावनाओं के उत्कर्ष व निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए आवश्यक होती हैं बहुत सी चीजें........ जिनमें सहयोग, प्रेरणा, परामर्श, प्रोत्साहन के साथ-साथ आर्थिक पहलू भी गहराई से जुड़ा
होता है। यदि सहयोग प्रेरणा, परामर्श, प्रोत्साहन शरीर रूपी गंतव्य के हाथ-पांव, बुद्धि व मन हैं तो धन इस शरीर की रीढ़।
विशु मां-बाप की बुढि़माई उम्र की संतान है। विशू की पढ़ाई का कुछ-कुछ खर्च उसनके वजीफे से मिली धनराशि से हो जाता है बाकी मां द्वारा गाय-भैंस के दूध् को बेचकर या पिफर पिताजी द्वारा जंगल की सूखी लकडि़यों की भारी गट्ठर पास के बाजारों में बेचकर मिली ध्नराशि से चलता है। विशू को अपने गरीब घर में जन्मे होने का दुख भी नहीं खलता ............ वह मानता है कि ईश्वर अपने किसी नियंत्रित संविधान के तहत ही इन्सानों को बड़े व छोटे घरों में जन्म देता है..........।
हां, यह बात कभी-कभार किसी तेज सुई की नोक की तरह अवश्य कचोटती है उसे कि जीवन के बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति में बड़ी सुविधएं आवश्यक व सहायक होती हैं। जबकि बौद्धिक क्षमताओं के होने पर भी छोटे घर के बड़े सपने संजोए बच्चे अभाव की चैखट पर दम तोड़ देने के लिए जबरन बाध्य हो जाते हैं। कभी-कभी विशू को लगता कि उसकी बौद्धिक पराकष्ठा का यही अंतिम गंतव्य स्थल है।
बड़ी-बड़ी सेवाओं में जाने का वह स्वप्न भर देख सकता है, उन स्वप्नों को व्यावहारिक रूप से साकार करने का साहस अभी उसमें नहीं है। यद्यपि अपने परिश्रम व संघर्ष के बल पर वह किसी भी कंपीटीशन में कामयाब हो जाने का शत-प्रतिशत विश्वास भी रखता है लेकिन इस सबका आर्थिक बोझ उठा पाने के लिए अपने परिवार को सर्वथा असमर्थ पाता है।
वही जानता है कि सरकारी स्कूल की सीमित पफीस को भी उसके बूढ़े पिता कैसे लंगड़ाते-लगड़ाते अदा करते रहे हैं। पाठ्यक्रम की संपूर्ण अवधि में खर्चा जुटाने की बात तो दूर केवल पफार्म भरने आदि के लिए भी उसे दिन में तारे दिख जाते हैं। फिर भी साध्नों की झोपड़-पट्टी में उसके पिता महलों का सा साहस जुटाए रहते हैं। एक दिन विशू को खिन्न देख कहा था बूढ़े पिता ने-
‘बेटा! मैं सांसारिक गरीब हूं ........... मन का बहुत अमीर हूं ......... तुम जहां जाना चाहो ............. जाओ ............. एडमिशन के खर्चे के लिए बकरियों का गोठ आध बेच दूंगा ............... रही बात माहवारी तुम्हें खर्चा भेजने की ................... वह भी जब तक जंगल में लकडि़यां रहेंगी व घर में बकरियां तथा ब्याही गाय व भैंस ......... ईश्वर की कृपा से पूरा होता रहेगा ..............। कभी बकरी या उसका बच्चा बिक गया, कभी घास-दूध् या फिर लकडि़यां ....... तो कुछ न कुछ बिकता ही रहेगा ........ इससे तुम्हारी फीस का जुगाड़ तो हो ही जाएगा .......... रहा हमारे खाने-पीने का ................. उसके लिए भी भगवान कुछ न कुछ साध्न अवश्य जुटा देंगे ............ जिसने सिर दिया है ......वह अवश्य सेर भी देगा ............ इसलिए जब तक मेरी बूढ़ी हड्डियों में ताकत है बेटा! तुम्हें रत्ती भर भी चिंता करने की आवश्कता नहीं है।
विशू पिता के साहस को दाद देता भीतर से, कि इतनी कमजोरी में भी कितना कुछ करने को तैयार हैं बूढ़े पिता। लेकिन शहर व होस्टल के खर्चों में इस सबकी क्या विसात? वहां तो तीस तारीख का मतलब तीस होता है .............. एक दो दिन ऊपर हुए नहीं कि तीसरे दिन हाथ में कमरा छोड़ने व मैस में खाना न खाने की क्लीन चिट थमा दें। इध्र पिताजी की बकरी समय पर न बिके, दूध् व घी की खरीद किसी ने भर मौके पर न की .................. व किसी महीने जंगल में एक साथ इतनी लकडि़यां न सूखें .......... या जंगलात विभाग ने कभी सूखी लकड़ी के काटने पर प्रतिबंध् लगा दिया ............ तो कैसे जुट पाएगी समय पर परदेश की बंधी-बंधाई फीस?
यह तो केवल विशू के मन का डर था। बूढ़े पिता को नीली छतरी वाले पर असीम आस्था थी। जैसे आज तक निभाया है सब कुछ ......... वैसे आगे भी नीभेगा। डर था तो केवल यह कि नीचे रोड वाली दुकानों में लोग लकड़ी के बदले गैस से भरे सिलिंडर प्रयोग करने लगे थे। कहीं ऐसा न हो कि सभी लोग सिलिंडरों का ही प्रयोग करने लगें व लकड़ी खरीदने का सिलसिला बिल्कुल बंद ही न हो जाए।
अब चूंकि विशू को घर से बाहर जाना ही था, यहां नहीं तो कहीं और इसलिए वह चाहता था बूढ़े माता-पिता के लिए साल भर की लकडि़यों की व्यवस्था कर के रख दे।
बूढ़े पिता कई बार लोभ-लालच में आकर सामथ्र्य से बाहर के कार्य में हाथ डाल बैठते हैं जिसके साथ जीवन के अनेकानेक खतरे जुड़े रहते हैं। विशू को किसी कंपीटीशन में निकलना कठिन नहीं लगता........कठिन लगता है उसकी प्रशिक्षण अवधि में ....... नियमित रूप से खर्चे का भार झेलना। पिता अनपढ़ व गंवार जरूर थे लेकिन थे विशाल हृदयी व उदारचेता।

कहानी अगली पोस्ट में जारी रहेगी

 

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