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घुघुती,(BIRD FROM UTTARAKHAND)

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Devbhoomi,Uttarakhand:



प्यारे दोस्तों घुघुती के बारे मैं आपने सुना भी होगा और घुघुती को देखा भी होगा,
घुघुती उत्तराखंड मैं पाए जाने वाला एक ऐशा पक्षी है जो कि- इस देवभूमि को सायद कभी किसी युग मैं, समिद्र मंथन में से निकला हुआ एक अमिर्त कि तरह है ,घुघुती कि आवाज सुनने के लिए लोग तरस जाते हैं, जो एक एक बार कि घुघुती के सुरीली घुरून सुन ले वो कभी भी घुघुती को भूल नहीं सकता है! और इसकी उस सुरीली आवाज को सुनने के लिए बार बार जी करता है,
घुघुती बहुत ही प्यारा पक्षी है और इसकी सुरीली आवाज भी उतनी ही सुहावनी लगती है जितनी कि ये घुघुती अप्निआप मैं सुन्दर है!
घुघुती अस्धिक्तर उत्तराँचल कि पहाडियों मैं पायी जाती है और ये  घुघुती इन पहाडियों मैं कम से कम ८ महीने तक यहीं रहती है और इसकी सुरीली आवाज आप केवल चैत के महीने से सुननी सुरु हो जाती है और चैत महीने मैं तो इसकी कुधेड़ आवाज को बार बार सुनने को जी करता है
,घुघुती कि सुरीली आवाज ज्यादा तर पड़ी महिलाओं को बहुत सुन्दर और प्यारी लगती है,इसकी घुरून को सुनानते है महिलायें रो उठती हैं उन्हें भी अपने माईके कि याद आ जाती है वे इस खुदेड़ आवाज को बार बार सुनने के लिए गाँवों एकत्र  होकर अपनी खुद भरी कहानियां एक दुसरे को सुनाती हैं और जब कभी कहीं उन्हें घुघुती कि घुरून सुनाई देती है तो वे महिलायें चुप्छाप घुघुती घुयूं को सुनकर आपस मैं एक दुसरे कि आँखों मैं देखकर रो पड़ती हैं
इस घिघुती पक्षी के ऊपर उत्तरांचली गायकों ने भी कई सुरीले, खुदेड़ गीत भी गाये हैं जिनमें नरेंद्र सिंह नेगी जी और गोपाल बाबू गोस्वामी जी का गीत बहुत है प्रशिध है

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ये गीत श्री नेगी जी ने एक गढ़वाली बेटी की भावनाओं की कल्पना की है की वो शादी के बाद कैसे अपने मैत के यादों मैं ये कल्पना करती है जब फाल्गुन का महिना ख़तम हो जाता है और चैत का महिना शुरू हो जाता है तब घुघूती की सुरेली आवाज उन डांडी कांठियों मैं गूंजती है उस घुघूती की सुरीली अवाज्को सुनकर बेटी ब्वारियों को अपने मैत की खुद लगाती हैं वो अपने मैत से आने वाले रैबार का इन्तजार करती रहती हैं और उस चैत के महीने मैं गाँव मैं बेटी ब्वारियों को कहीं दूर जब घुघूती की सुरीली आवाज सुनाई देती है तो तब उनें इस गाने को गाया गया है
घुगुती  घुरोण  लागी म्यार  मैत  की
बौडी  बौडी आयी गे  ऋतू , ऋतू चेत  की
डांडी   कांठियों  को हूए, गौली  गए  होलू
म्यारा मेता को बोन , मौली  गए  होलू
चाकुला  घोलू  छोडी , उड़ना  हवाला
बेठुला  मेतुदा  कु , पेताना  हवाला
घुगुती  घुरोण  लागी हो ......................

घुगुती  घुरोण  लागी म्यार  मैत  की
बौडी  बौडी आयी गे  ऋतू , ऋतू चेत  की
ऋतू, ऋतू चैत की, ऋतू, ऋतू चेत की
डान्दियुन खिलना  होला , बुरसी का  फूल
पथियुं  हैसनी  होली , फ्योली  मोल मोल
कुलारी  फुल्पाती  लेकी , देल्हियुं  देल्हियुं जाला
दग्द्या  भग्यान  थडया, चौपाल  लागला
घुगुती  घुरोण  लागी म्यार  मैत  की
बौडी  बौडी आयी गे  ऋतू , ऋतू चेत  की
ऋतू, ऋतू चैत की, ऋतू, ऋतू चेत की
तिबरी  मा  बैठ्या  हवाला, बाबाजी उदास
बतु  हेनी  होली  माजी , लागी  होली  सास
कब म्यारा मैती  औजी , देसा  भेंटी  आला
कब म्यारा भाई बहनों  की राजी खुशी ल्याला
घुगुती  घुरोण  लागी म्यार  मैत  की
बौडी  बौडी आयी गे  ऋतू , ऋतू चेत  की
ऋतू, ऋतू चैत की, ऋतू, ऋतू चेत की
ऋतू, ऋतू चैत की, ऋतू, ऋतू चेत की
ऋतू, ऋतू चैत की, ऋतू, ऋतू चेत की
ऋतू, ऋतू चैत की, ऋतू, ऋतू चेत की


[youtube]http://www.youtube.com/watch?v=WWXBvVVjXio&feature=related

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ये गीत स्वर्गीय गोपाल बाबू गोस्वामी जी ने अपनी सुरीली आवाज मैं गया है और घुघुती आम के पेड के ऊपर बैठकर बासती  हैं घुघुती ना बासा, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।
तेर घुरु घुरू सुनी मै लागू उदासा
स्वामी मेरो परदेसा, बर्फीलो लदाखा, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।
रीतू आगी घनी घनी, गर्मी चैते की
याद मुकू भोत ऐगे अपुना पति की, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।
तेर जैस मै ले हुनो, उड़ी बेर ज्यूनो
स्वामी की मुखडी के मैं जी भरी देखुनो, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।
उड‌ी जा ओ घुघुती, नेह जा लदाखा
हल मेर बते दिये, मेरा स्वामी पासा, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।



[youtube]http://www.youtube.com/watch?v=tz2KJcqzYVE

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उत्तराखण्ड की हर विवाहित महिला चैत माह में अपने मायके वालों से भिटौली का इंतजार करती है, जिसे पूरे गांव में बांटा जाता है। यह त्यौहार हमारे सामाजिक सदभाव का भी प्रतीक है। इस माह का महिलाओं के लिये कितना महत्व है, हमारे लोकगीतों के माध्यम से सहज ही जाना जा सकता है। स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी का यह गीत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है:
"ना बासा घुघुती चैत की, याद आ जैछे मैके मैत की"

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[youtube]http://www.youtube.com/watch?v=yCo-7M8lIXg

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