Author Topic: Bhitauli Tradition - भिटौली: उत्तराखण्ड की एक विशिष्ट परंपरा  (Read 27893 times)

Risky Pathak

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Hem Jee + Karma for you for these historical story.

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Thanks Hem ji for the story.

भिटौली के सम्बन्ध में एक दंत कथा (लोक कथा) प्रचलित है :

एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे | उनमें बहुत प्यार था | १५ वर्ष की उम्र में देबुली की शादी हुई ( जो उस समय के अनुसार बहुत  बड़ी उम्र थी ) |शादी के बाद भी दोनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा | दोनों ही भिटौली के त्यार की  प्रतीक्षा करने लगे | अंततः समय आने पर नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर  खुशी - खुशी बहन से मिलने चला | बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी | पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया | देबुली तब गहरी नींद में सोई थी | थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया | सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी | देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी | अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा | शनिवार को देबुली के घर जाने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था | नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस  अपने गाँव चला गया |
देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी |  नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं |वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी | लेकिन भाई नहीं मिला | वह पूरी बात समझ गयी |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये | कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' बन गयी और चैत के महीने में आज भी गाती है :


                       भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती           

पंकज सिंह महर

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भिटौली के सम्बन्ध में एक दंत कथा (लोक कथा) प्रचलित है :

एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे | उनमें बहुत प्यार था | १५ वर्ष की उम्र में देबुली की शादी हुई ( जो उस समय के अनुसार बहुत  बड़ी उम्र थी ) |शादी के बाद भी दोनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा | दोनों ही भिटौली के त्यार की  प्रतीक्षा करने लगे | अंततः समय आने पर नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर  खुशी - खुशी बहन से मिलने चला | बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी | पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया | देबुली तब गहरी नींद में सोई थी | थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया | सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी | देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी | अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा | शनिवार को देबुली के घर जाने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था | नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस  अपने गाँव चला गया |
देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी |  नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं |वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी | लेकिन भाई नहीं मिला | वह पूरी बात समझ गयी |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये | कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' बन गयी और चैत के महीने में आज भी गाती है :


                       भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती           


हेम दा, इस लोककथा से हमें अवगत कराने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। +१ आपको इस उत्कृष्ट कार्य हेतु।

हेम पन्त

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महेन्द्र सिंह मटियानी जी की "हिया रे! उदास किलै?" पुस्तक से "भिटौली" शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां. भिटौली के इन्तजार में व्याकुल स्त्री की मनोस्थिति को मटियानी जी ने बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी है...

धार में टाङिये रै, रात्तै बै नजर,
ब्याल भई इन्तजार, आख्यों बै नितर,

अन्यार क्वाङन टोप मारि, चार आँसु बगै!
अपनि डाङ छातिन छातिन पै चेपि, मन कै ठगै....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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महेन्द्र सिंह मटियानी जी की "हिया रे! उदास किलै?" पुस्तक से "भिटौली" शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां. भिटौली के इन्तजार में व्याकुल स्त्री की मनोस्थिति को मटियानी जी ने बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी है...

धार में टाङिये रै, रात्तै बै नजर,
ब्याल भई इन्तजार, आख्यों बै नितर,

अन्यार क्वाङन टोप मारि, चार आँसु बगै!
अपनि डाङ छातिन छातिन पै चेपि, मन कै ठगै....

very good lines.. by महेन्द्र सिंह मटियानी ji.

हेम पन्त

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भिटौली का महीना (चैत्र) शुरू हो चुका है.... आशा है आप सभी लोगों ने अपनी बहनों से मिलकर भिटौली देने का कार्यक्रम बना लिया होगा?

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Friends,

The Bitoli month is already going on. This is special month for women of Uttarakhand where their visit this month to her with some gifts. This is called Bitoli / bhitola.

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ओ सुवा मैं जै ऊनू मैता रे, भिटोली मैहण एगो छौ चैता रेMar 29, 01:48 am

अल्मोड़ा: नव संवत्सर के अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की शुरुआत मां शारदे की वंदना से हुई। गोष्ठी में मोहन लाल टम्टा ने नए वर्ष का स्वागत अपनी कुमाऊंनी कविता में कुछ इस प्रकार किया- नयी सालेकि तुमनकौ बधाई हो, तुम सबनौ घरों में सुख समृद्धि आई हो। काव्य गोष्ठी की आयोजक लीला खोलिया ने चैत्र मास की भिटोली को कुछ इस भाव में कहा - ओ सुवा मैं जै ऊनू मैता रे, भिटोली मैहण एगो छौ चैता रे। विपिन जोशी कोमल ने अपनी हिन्दी कविता में कुछ यूं कहा- कश्तियां उबर आती हैं भंवर से, गर तूफां से टकराने की ठान लें। विनोद जोशी ने कहा - संक्रांति मसांति के पुछ छा, साररै संवत्सर उननकैं पैट जैरौ। यो साल लै च्यूड़ उनर ख्वर पुज्यिल, हरयाव लै उननकै दैड़ जैरौ।

रमेश चंद्र मिश्र ने अपनी कविता कुछ इस अंदाज में पढ़ी- मजहब तो कल की चीज है, इंसान था पहले। इंसानियत से बढ़के नहीं है कोई धरम।

Lalit Mohan Pandey

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पहले जब किसी के घर मै भिटोली आती थी तो उस दिन उनके घर मै रात को त्यार होता था (जिसे भिटोली पकाना बोलते है ) और फ़िर पूरे गाव मै पूरी बाटी जाती थी, आज ये बहुत सीमित हो गया है क्युकी ज्यादा तर लोग भिटोली देने के बदले पैसे भेज देते है. शायद यह जानकारी सभी को ना हो की भिटोली कुवारी लड़कियु  ko भी दियी जाती थी (मतलब शादी से पहले भी दियी जाती थी) ..
 देली (दरवाजा) पूजन का जो तैय्हार होता है उसमे लड़किया हर घर मै जा के डेली पूजती है, और घर वाले उन्हें चावल, गुड (आजकल मिताई ) और पैसे देते है, उन्ही चावलू से लड़की के लिए उसके घर वाले एक दिन पकवान बनाते है ज्यादातर चावलू का सया , उसे ही लड़की का भिटोला कहते है. 
इसीलिए शादी के बाद भी जब भिटोली आती थी तो लड़की के मायके वाले कुछ पका हुआ पकवान जरुर लाते थे.

हेम पन्त

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भिटौली का महीना यानी चैत 14-15 मार्च से शुरु हो रहा है.

हमारी मुख्य साइट पर आप ’भिटौली’ पर्व के बारे में एक लेख पढ सकते हैं


http://www.merapahad.com/bhitauli-a-unique-tradition-in-uttarakhand/

Lalit Mohan Pandey

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Meri wife ki to pahli Bhitauli thi isliye last month hi aa chuki hai.

भिटौली का महीना यानी चैत 14-15 मार्च से शुरु हो रहा है.

हमारी मुख्य साइट पर आप ’भिटौली’ पर्व के बारे में एक लेख पढ सकते हैं


http://www.merapahad.com/bhitauli-a-unique-tradition-in-uttarakhand/

 

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