Author Topic: Ceremonial Songs Of Uttarakhand - फ़ाग/मंगल गीत/संस्कार गीत/शकुन आखर  (Read 40522 times)

पंकज सिंह महर

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कन्यादान के उपरांत का गीत

को ए उ जुहरा जुवा खेलिये?
को ए उ जुहरा जुवा जीतिये?
को ए उ जुहरा जुवा हारिए?
को ए उ जुहरा जुवा जीतिए?

जनक जुहरा जुआ हारिए,
रामीचंद्र जुहरा जुवा जीतिए।
तौलिन हारौ, सैयां मेरो कसेरिन हारो।

मेरि ललनिंया, दुदुवा पिलनियां,
गोद खेलनियां कै तुम हारो?
थालिन हारो पिया मेरो कटोरिन हारो,

मेरि ललनियां गोद खेलनियां,
गुड़िया खेलनियां कै तुम हारो?
गडुवन हारो, सइयां मेरा लोटन हारो।

मेरि ललनियां. गुड़िया खेलनियां,
छाजो बैठनियां कै तुम हारो?
तौसक हारो, पिया मेरे तकियन हारो,
लिहाफन हारो सइयां मेरे गददन हारो॥



कन्यादान के उपरांत यह गीत गाया जाता है, पत्नी पति से रोष में पूछती है कि उन्होंने उसकी लाडली बेटी को दांव पर क्यों लगा दिया।

पंकज सिंह महर

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विदाई गीत

काहे कि छोडूं मैं एजनि पैंजनि,
काहे की लंबी कोख ए?
बाबु कि छोडूं मैं एजनि पैंजनि,
माई की लंबी कोख ए।
काहे को छोडूं मैं हिल मिल चादर,
काहे को राम रसोई ए।
भाई कि छोडूं मैं हिल मिल चादर,
भाभि की राम रसोए ए।
छोटे-छोटे भाइन पकड़ि पलकिया,
हमरि बहिन कहां जाइ ए।
छोड़ो-छोड़ो भाई हमरि पलकिया,
हम परदेसिन लोक ए।
जैसे जंगल की चिड़िया बोले,
रात बसें दिन उड़ि चलै।
वैसे बाबुल घर हम छिप सोयें,
रात बसैं दिन उड़ि चलैं।
बाबुल घर छाड़ि ससुर का देस,
छाड़ो तुम्हारो देस ए।
भाइन घर छाड़ि जेठ का देस,
छाड़ो तुम्हारो देस ए।
माइन कहे बेटि नित उठि अइयो,
बाबु कहैं छट मास में,
भाई कहे बैना काज पड़ोसन,
भाभि कहे क्या काज ए॥



यह गीत लड़की के विदा होते समय गाया जाता है, इसमें मां-बाप, भाई-बहिन को छोड़ ससुराल जाती हुई बेटी और उसके संबंधियों का दुःख व्यक्त  होता है।

Vidya D. Joshi

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(जय बम्ब या विजय ब्रह्म (सन १४२०) पहले सोर का राजा था. पनेरु की चैत से मलुम पडता है कि ये शायद ये बझांग (नेपाल) से सोर पहुचा था. इस चैत मे जय बम्ब ने कालुखेति (बझांग) के धानुक, पुरचुंडीहाट के काल गोरा बिष्ट, गंगोली के भागी पन्त को साथ लेकर किस तरह पनेरु से धौलकांणा छिन और सोर कब्जा किया उस्का वर्णन है . )

पनेरु की चैत


पैल की उल्पात क्या मा भै छ ?
लाली का सेरा मा धजा पडि गै छ
दुसरी उल्पात क्या मा भै छ
चौंसेरा नालि की उत्पात भै छ
तीसरी उत्पात क्या मा भै छ
घीय की चौंठ पनेरु ले खायी छ
वांगि चिचिण्डी पनेरु ले खयी छ
भिंडेलो विगुनो पनेरु ले खायी छ
जै बम्ब पहाड का हिय खट्की गै छ
कालुखेती धानुक हम वलु द्यान
धौलकांणा जान्या हौं लोक ल्यायी द्यान
ल्यायी दिउंलो लोक वाग जायी दिउंलो आफू
तां है राजै बम्ब भै गै छ चलाइ
पुरचुंडीहाट चौंण बैसेकी लेक छ
काल गोरा बिष्ट मॆरै वलु द्यान
धौलकांणा जान्या हौं लोक ल्यायी द्यान
ल्यायी दिउंलो लोक वाग जायी दिउंलो आफू
तां है राजै बम्ब भै गै छ चलाइ
तल देहिमाणौं थैं बैसेकी लेक छ
तल देहि का धामी मॆरै वलु द्यान
अल्लै की काली माल विंडा  वसि द्यान
चली छ दुर्गा छाडी़ हाली हांक
तेरी मेरी छ्त्तरी काल की भाग
तां है राजै बम्ब भै छ चलायी
झुलाघाट गांव झाइ वासा पड़ी गै छ
ताइ पड़ी रात ताइ खयो भात
ता है राजै बम्ब भै छ चलाइ
गंगोली हाट बैसेकी लेक छ
गंगोली का भागी पन्त घर छौ कि बन
क्या को आदेश हुन्छ घरै छु गुसाईं
धौलकांणा जान्या हौं लोक ल्यायी द्यान
ल्यायी दिउंलो लोक वाग जाइ दिउलो आफ़ू
लै जाऊ जै वम्ब काली कुमाउं
लै जाऊ जै वम्ब कटारीया सोर
कटारीया सोर भ्वींवाटि कोर
लै जाऊ जै वम्ब खवरान्त कुमाउं
तां है राजै बम्ब भै छ चलायी
ढीक कुल्लेक बैसेकी लेक छ
ढीक हरि जोशी मेरो वलु द्यान

धौलकांणा जान्या हौं दिन हेरि द्यान
दिन तकि दिउंलो जैसन सांची
वाउली पड़ी झाआ धुलौटी राखी
दिन भलो जुड्यो मांगल की रात
धौलकांणा मत्थीर फुली गयो वुको
तांइ रये पनेरु तेरो वुवा पुग्यो
धौलकांणा मत्थी हुक्कल ओड़
पैली उनाइ काट्यो कलुवा ओड़
धौलकांणा मत्थी चिफ़ला लोड़ा
दुसरी उनाइ काट्यो पनेरु का घोड़ा
धौलकांणा मत्थी तुड़तुड्या पानी
तीसरी उनाइ काट्यो पनेरु की रानी
धौलकांणा मत्थी मुगरैला केला
चौथी उनाइ काट्यो पनेरु का चेला
वीशा पनेरु का सुननाले नौला
पुरी पनेरु का बौं तिर खौला
वीशा पुरी पनेरु भागी जा बुन
भागी जा पनेरु भागी जा बुन
तेरो पिठि घाउ लाग्यो भागी जा बुन
भागन्या को चेलो नै भागी नै जानो
पिठि घाउ लै भागी नै जानो
कै को रौतेला छई ला कै को नाति
पुरी को रौतेला छुं गजु को नाति
तेरा कोट धावा पड्यो भागी जा बुन
दिन ढोया लायी थी कोटै र मथि
एइ ! भागी पन्ज्यु के छई मनडॊ
जै कोट धाड़ पड़्यो तांइ मनडॊ
तेरो कोट तोई दिउंलो हां हरिलो
एइ ! भागी पन्ज्यु के छई मनडॊ
जां रानी धाड़ पड़ी तांइ मनडॊ
तेरी रानी तोई दिउंलो हां हरिलो
एइ ! भागी पन्ज्यु के छई मनडॊ
जां चेलो धाड़ पड़्यो तांइ मनडॊ
तेरी चेलो तोई दिउंलो हां हरिलो
एइ ! भागी पन्ज्यु के छई मनडॊ
जां घोड़ा धाड़ पड़्यो तांइ मनडॊ
तेरी घोड़ो तोई दिउंलो हां हरिलो
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=#b00000][/color]

mu_cool

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gr8 work.!!!.....sakun na aakhar....aapni grand mom ka mhu sa suna hai. Yaha fir sun kar aacha laga. Thanx karna kafi nahi hoga es work ka liya ku ki aap logo na humari varasat ko next genration tak lana ka prayas keya ....Hat's off for U all.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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This is one of the most famous Ceremonial Song of uttarakhand is sung on every auspicious occasion-

Daiya Hoya, Kholi Ka Ganesha

[youtube]http://www.youtube.com/watch?v=2pg3ZhF24wE

राजेश जोशी/rajesh.joshee

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मेह्ता जी
अगर कुमाऊनी और गढ़्वाली मांगल के लिए अलग-अलग थ्रेड बनायें तो सदस्यों और पाठकों को ज्यादा सुविधा होगी और दोनो का फ़र्क भी स्प्ष्ट हो पायेगा।  मैं दोनो ही तरह के परंपरागत विवाह देखे है और दोनो ही में रस्में एक सी होने के बावजूद उनकी प्रक्रिया बहुत ही भिन्न हैं, अभी तक यहां पर  मुख्यत: कुमाऊनी मांगल का ही विवरण इस थ्रेड में हुआ है तो उसे ही आगे बढायें और गढ़वाली मांगल गीतों के लिये अगर एक अलग थ्रेड बनायें तो बेहतर होगा।

Devbhoomi,Uttarakhand

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JOSHI JI NAMSKAAR APNE SAHI KAHA HAI UTTARAKHANDI MANGAL GEETO KA TOPIK YE BHI HAI

http://www.merapahad.com/forum/music-of-uttarakhand/listen-super-hit-uttarakhandi-maangal-geet/


मेह्ता जी
अगर कुमाऊनी और गढ़्वाली मांगल के लिए अलग-अलग थ्रेड बनायें तो सदस्यों और पाठकों को ज्यादा सुविधा होगी और दोनो का फ़र्क भी स्प्ष्ट हो पायेगा।  मैं दोनो ही तरह के परंपरागत विवाह देखे है और दोनो ही में रस्में एक सी होने के बावजूद उनकी प्रक्रिया बहुत ही भिन्न हैं, अभी तक यहां पर  मुख्यत: कुमाऊनी मांगल का ही विवरण इस थ्रेड में हुआ है तो उसे ही आगे बढायें और गढ़वाली मांगल गीतों के लिये अगर एक अलग थ्रेड बनायें तो बेहतर होगा।

राजेश जोशी/rajesh.joshee

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मित्रो
श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी के मांगल गीतों की एल्बम हल्दी हात नीचे दिये गये लिंक पर सुनें:-
हल्दी हात पार्ट - १
http://www.4shared.com/play/12431863/7e8ef901/Haldi_Haath_I.html
हल्दी हात पार्ट - २
http://www.4shared.com/play/15247694/e9590338/Haldi_Haath_II.html

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता, उत्तराखण्ड में देवता आराध्य तो हैं ही, इसके साथ ही उनसे लोगों की एक विशेष आत्मीयता जु्ड़ी रहती है। अपने काज-बार में वे देवताओं को भी आमंत्रित करना नहीं भूलते...प्रस्तुत शकुनाआंखर में घर की महिला देवताओं से साथ काज में सहभागी सभी कारकों को बुला रही है।

समाये, बंधाये न्यूतिये,
प्रातहि न्यूतू में सूरज, किरणन को अधिकार,
सन्ध्या न्य़ूतू में चन्द्रमा, तारन को अधिकार।
ब्रह्मा-विष्णु न्यूतूं, मैं काज सों, ब्रह्मा-विष्णु सृष्टि रचाय,
गणपति न्यूतुं मैं काज सों, गणपति सिद्धि ले आय।
ब्राह्मण न्यूंतूं मैं काज सों, ब्राह्मण वेद पढ़ाये,
कमिनी न्यूतूं मैं काज सों, कामिनी दीयो जगाय,
सुहागिनी न्यूतूम मैं काज सों,सुहागिनी मंगल गाय,
शंख-घंट न्यूतूम मैं काज सों, शंख-घंट शबद सुनाय,
मालिनि न्यूतूं मैं काज सों, मालिनि फूल ले आय,

कुम्हारिनि न्यूतूं मैं काज सों, कुम्हारिनि कलश ले आय,
अहिरिनी न्यूतूं मैं काज सों, अहिरनी दूध ले आय,
धिवरनी न्यूतूं मैं काज सों, धिवरनी शकुन ले आय,
गुजरिनी न्यूतूं मैं काज सो, गुजरिनी दइया ले आय,
बहिनिया न्यूंतूं मैं काज सों, बहिनिया रोचन ले आय,
बान्धव न्यूतूं मैं काज सों, बान्धव शोभा बढ़ाय,
बढ़इया न्यूतूम मैं काज सों, बढ़इया चौकी ले आय,
बजनिया न्यूतूम मैं काज सों, बजनिया बाजा ले आय,
समाये बधाये न्यूतिये,
आंगनी धाई बढ़ाई, सब दिन होवेंगे काज, दिन-दिन होवेंगे,
काज, समाये बधाये न्य़ूतिये।
 
कूर्मांचल में अवधी और ब्रज भाषा को सहज रुप से अंगीकार किया गया है, चाहे होली हो या मांगल गीत, दोनों में आपको उनकी छवि मिलेगी। इसके पीछे यह कारण रहा होगा कि इन गीतों को तैयार करने वाले बुजुर्ग और विद्वान शाष्त्रीय विधाओं में पारंगत थे, जिनकी बैद्धिक परवरिश अवधी और ब्रज भाषा में हुई। जिस कारण इनमें भी इन भाषाओं का समावेश हो गया।

पंकज सिंह महर

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इस शकुन आंखर में एक नारि एक तोते के माध्यम से सीता, राधा और सुभद्रा को अपने काज में आमंत्रित कर रही है। तोते को घर और गांव का नाम मालूम नहीं है, सो महिला कुमाऊनी बोली में ही उसे महिला, उसके पति का नाम, उसके घर की पहचान और गांव का नाम बता रही है।
 

शुवा रे शुवा, वनखण्डी शुवा,
जा शुवा नगरिन न्यूत दि आ।
हरिया तेरो गात, पिंगली तेरो ठून,
ललांगि तेरी खाप, रतनारी आंखी,
नजर तेरि बांकि, तू जा रे शुवा नगरिन न्यूत दि आ॥

नौं नी जाणन्यू मैं, गौं नी जाणन्यू,
कै घर, कै नारि न्यूत दि ऊं?

सीतादेई नौ छ, जनकपुर गौंछ,
तैक स्वामि कणि रामीचन्द्र नौं छ।
अघिल अघिवाड़ी, पछिल फुलवारी,
तू तै घर तै, नारि न्यूत दि आ।

नौं नी जाणन्यू मैं, गौं नी जाणन्यू,
कै घर, कै नारि न्यूत दि ऊं?

राधादेई नौं छ, मथुरा तैं को गौं छ,
तैक स्वामि कण, श्रीकृष्ण नौं छ।
अघिल अघवाड़ी, पछिल फुलवाड़ी,
तू तै घर, तै नारि न्यूत दि आ॥

नौं नी जाणन्यू मैं, गौं नी जाणन्यू,
कै घर, कै नारि न्यूत दि ऊं?

सुभद्रादेवी नौ छ, हस्तिनापुर गौं छ,
तैक स्वामि कणि अर्जुन नौं छ,
अघिल अघवाड़ी, पछिल फुलवाड़ि,
तू तै घर, तै नाति न्यूत दि आ॥

 

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