Author Topic: Folk Stories - किस्से, कहानिया, लोक कथाये  (Read 38888 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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लघु कथा स  नीरज नैथानी

टैम नि............

हां हल्लौ......हल्लौ.....हां......हल्लौ...आवाज सुणैणी च। भैजी समन्या,
मि छौं घुत्तू, गौं बिटि बुन्नू। अच्छा....अच्छा......भुल्ला घुत्तू.....चिरंजीव।
क्या हाल छन गौं का? बरखा पाणि सब्बि धाणि ठीकि होलि।
भैजि ऐंसु बरखन् तबैहि मचैएलि। बिज्जां खण्ड भण्ड ह्वैगि। गांव
पड़ोस मां कतकौंकि पुंगड़ि बौगि गैनि, कतकौंकि पुंगड़ि बैठि गैनि, पाखा
डाण्ड्यूं मां रौला गौला बगणा छन्। हमरू चौक कू पुश्ता भि खिसक गै,
उबरा-पाण्डा मां तिरार पडीं च। अगर जल्दि मरम्मत नि करौंदा त सारि
कुड़ि भुंया बैठिदि।
अरे तू चिंता नि कैरि, मि यख बिटि रुपया भिजणू छौं। पुश्ता टुटदू तु
वे तैं बणौं अर कुड़ि बैठिदि त नई छवौं। पैंसों की चिंता कतई ना करि, अरे
अमेरिका ऐकि मिन पैसइ त कमैनि और क्या च? मि तुम लुगुं तै पैंसों कि
कइ कमि नि होण देलु। और सुणौं मां कन च? क्या हाल छन वै का? वैकु
स्वास्थ्य पाणि ठीक रौन्दु?
अरे भैजि, मां का बारा मां क्या बतौण, वै कि तबियत बौति खराब च।
भुला सुण मि और पैसा भिजलु, तु अच्छा सि अच्छा डाक्टर मा दिखैकि वैकु
बढ़िया इलाज करौ, पैंसों की बिल्कुल चिंता नि करि। भैजि, मां कि तबियत
बिण्डी खराब च, अर तु जणदि छै कि वा अब पिच्चासी से उब्ब पर पौंचि गै,
यै उमर मां दवाई भी कख लगदिन ठीक करि कि। बस्स भैजि इन जाणि लि
मां आजि क्या भोल हि क्या...........। अगर तु मां का अन्तिम दर्शन कन्न
चान्दि त आजि हि कैभि हाल मां हवाई जाज मां बैठिकि दिल्ली अर भोल
वख बिटिक गौं पौंच जा निथर.......।
भुला मेरु तख आण बौत मुश्किल च। मि कम्पनी का काम से भोल
बिटिक दस दिन टुर मां यूरोप जाणू छौं। मि कै भि हाल मा तख नि ऐ
सकदौं। भैजि मां की तबियत बौति खराब च, उ आजि क्या अर भोल.....।
भुला, असल बात या च कि कम्पनी मितैं बिजां तनखा देन्दि, अर यई कारण
च कि मिन पैसा बौत कमैनि, पर मैंमु टैम बिल्कुल नि.........

From (regional reporter)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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फ्यूंळी :  एक गढवाली लोककथा   -------------------------------संकलन : भीष्म कुकरेती------------------------------------------------ वै जमानो छ्वीं छन जै जमानो मा सतजुग  थौ . सतजुग की छ्वीं   छन बुबा ! एक नौनि छे बौण  मा जंगळ मा जेंक ब्व़े बाबू वींका हुन्द इ भग्यान ह्व़े गेन . इ राम दा !  वा जेंको  नाम फ्यूंळी थौ वा छुरे गे. पण भैरों ! सतजुग छौ. बौण का जानवरून   फ्यूंळी तैं  पाळ . खरगोश , घीड़-काखड़, वींकुण डंफू लांदा चया. क्वी अखोड़ लांदा छ्या, क्वी जानवर हिसर काफळ लांदा छ्या  चखुली , घिंडुड़ी भ्वींळ की दाणि , औंल़ा की दाणि लांद छ्या . कलू आम लान्दो छौ अर दगड मा पाठ बि पढान्दा  , सिखांदा छ्या . कळजिंड  (कोयल) फ्यूंळी तैं गीत सुणादी छे .कवा फ्यूंळी कुण  गौं बिटेन खाणक लांदा छया अर गुणी  बांदर मुंगरी लांदा छ्या . रिक्क फ्यूंळी तैं आपणी खुकली मा सिवाळदा छ्या अर पटाळ या घास मा उन्धारीखुण   रडान्दा  बि छ्या अर फ्यूंळी तैं घास या पटाळ मा रड़ण मा भौत रौंस  आंदी छे .   . बाग़ , गुलदार, सौलु फ्यूंळी की रक्छा करदा था. स्याळ बि कुछ कुछ सौ-सैता   , मौ-मदद  करदा छ्या. मिन्ध्क माछा वीन्का मनोरजन करदा छ्या . कीड़ा , पोतळ  फ्यूंळी कुण फुलू रस ल्हांदा छ्या. म्वार शहद  लांदा छ्या लुखंदर   कत्ति बीज लांदा छ्या. .कठब्वाड फ्यूंळी कुण धौल क  लीसा ल्हांदा छ्या . गौल, गुरौ, छिपड़ , किरम्वळ , सिपड़ी पौन पंछी सौब  वीन्का दगड़या  छ्या जंगळ /बौण का डाळ बूटु . जानवरूं    दगड वा छ्वीं लगान्दी छे सनै सनै कौरिक फ्यूंळी  जवान ह्व़े गे . दिखयाण मा फ्यूंळी बड़ी बांद छे, सुंदर बिगरैली छे  एक दिन वै बौण मा एक राजकुमार अयेडि खिल्दा खिल्दा आयी अर पैलि द्फैं फ्यूंळी न क्वी मनिख देखी . वीं तैं मनिख देखिक भलो लग . राजकुमार को दिल वीं बांद पर आयी गे अर वैन फ्यूंळी तैं समजाई  बुझाई अर ब्यौ कुण राजी कार. फ्यूंळी ब्यौ कुण राजी ह्व़े गे. सबी जानवर फ्यूंळी क ब्यौ होण  से पुळयाई बि छन/  खुस ह्वेन अर दगड मा वींक बिगळयाण/बिछुडणन से दुखी बि भौत ह्वेन.        राजकुमार फ्यूंली तैं अपण कोट/ क्वाठाभितर / महल मा लाये . राजकुमार बडो खुश थौ. एक दिन त फ्यूंळी तैं क्वाठाभितर ठीक लग पण दुसर दिन बिटेन प्राकृतिक माहौल  का बगैर वींकु स्वास्थ्य गिरण बैठी गे . दिनों दिन वा कमजोर होंदी गे. . अब जन कि वा राजकुमार से प्रेम करदी छे त व बौणजंगळ  बि नि बौडि सकदी छे  . वीं तै हर समौ फूल, पत्ता, डाळ बूट, , हरेक जानवर याद आंदा  छ्या. ना वा रवे सकदी छे ना वा क्वाठा भितर छोडि सकदी छे ना फ्यूंळी  खुस ह्व़े सकदी छे , फ्यूंळी ना त राजकुमार तैं छोडि सकदी छे  ना ही वा बौण का. अर आज तलक फ्यूं ळी  प्राकृतिक वातावरण  का बगैर ज्युंदी रै सकदी छे .अर इन्नी हुन्दा करदा वा इथगा कमजोर होई कि एक दिन वा भगवान मा चले गे , मोरी गे . फ्यूंळी न राजकुमार से बचन ल़े छौ कि जब वा मरली त वीं तैं वै इ बौण मा दफन करे जाऊ  जै बौण मा वा बड़ी ह्व़े .   राजकुमार न फ्यूंळी इच्छा मुताबिक़ फ्यूंळी  तैं वींई   जगा मा ख़ड़यार /दफनाई जखम  वो द्वी पैली दें मिली छया . कुच्छ समौ परांत वीं जगा मा एक सुन्दर बेंत जन तीन चार फीट कि डाळी उगी गे अर वीं डाळी पर पिंगळ पिंगळ फूल ऐन लोखुं वै डाळी क नाम फ्यूंळी धरी दे अर आज तलक फ्यूंळी क डाळी अर फूल प्रकृति प्रेम की निसाणि माने जांद
 Jugraj Rayan
Regards
Bhishma Kukreti

C.S.Mehta

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दोस्तों,
        में आप सभी साथी भाई और बहिनों से पूछना  चाहता हु ?
१.. हमारे पहाड़ में किसी अछी चीजों में एक प्रकार का बिश्वास मानते है अपने सुना होगा
                          आंख लगाना
एक कहावत बताना  चाहूँगा आप सभी को  एक बार एक गांव में एक बहुत अछा आड़ू का पेड़ था जिसमे  बहुत ज्यादा आड़ू लगे  थे  तो उसी गांव में एक  आंख लगाने वाला बुढ़ा आदमी रहता था तो एक दिन वह बुढ़ा आदमी उस पेड़ के सामने पंहुचा और उसने पेड़ की तरफ देखकर कहा ओह बा बारे इतने सारे फल लगे है तो बुढ़ा के इतने कहने पर ही पेड़ जड़  से ही उखर कर गिर गया  क्या आप मानते है की बूढ़े इन्सान के ऐसा कहने पर ही वह पेड़ गिरा होगा..... ?
तो दोस्तों आप  कितने लोग ऐसे बातो पर विश्वाश करते है....... ?   कृपया उत्तर देने का कष्ट कीजियेगा आपका आभारी रहूँगा
                                थैंक्स

Devbhoomi,Uttarakhand

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मेहता जी ये सब अंधविश्वास है जो की हम सबको अपनी ओर आकर्षित करता है !

C.S.Mehta

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सर
   मैं भी अन्धबिश्वास ही मानता हूँ हा हा हा  ओके

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आणे–किस्से
आणे–किस्से

एक कूछी बल : दिन भर काम करने के बाद समूह में बैठकर बातें चल रही है, गांव–पडोस में क्या हुआ इसकी बात हो रही है। टो खेती, त्योहार, गांव की समस्या, बीमारी, शादी–ब्याह, मानव व्यवहार का बिश्लेषण, गांव के रास्ते, धारे, खाले डाण्डे सब स्वतः ही इस अनौपचारिक बैठक के बिषय–बिन्दु ानते जाते है। जिसमें बच्चे, बूढ़े, जवान सब शामिल है। गर्मियों में आंगन में व सर्दियों में अंगीठी के इद—गिर्द होने वाली इन फासकों के माध्यम से बुजुगो का अनुभव बिना किसी जटिल प्रकि्रया के बच्चों तक पहुंच जाता है। जिसकी नींव पर खड़ी होती है विश्वास, सम्मन तथा मुल्यों की इमरत। किसी व्यिक्त पर टिप्पणी होगी, उसका समग्र विश्लेषण होगा, समूह से एक व्यिक्त कहेगा ‘‘ एक कूंछी बल – खाण बखत मुख लाल, दिण बखत आँ ख लाल” । फिर गप्पे लगेंगी। बीच–बीच में लोग मुहावरों से अपनी बात को पुष्ट करेंगे, अनवरत चलता यह सिलसिला अब कुछ शिथिल सा पड़ रहा है। गागर में सागर के अर्थ लिए ये लोकोक्तियां संवाद को सम्प्रेषणपरक तथा साथक बनाती है और रूचि पुर्ण भी। ये कहावतें बहुत लोकप्रिय होती हैं और जन समुह की वाणी में रहती है। तभी तो इनके बारे में कहा है कि ‘‘गुड़ उज्याव में खाओ मिठे, अन्यार में खाओ मिठे’’ परिवार में आधुनिक चकाचौंध से ग्रस्त बहु जब अनसुनी करती है, तो चुटकी लेते हुए कहते है कि ‘‘सासुल ब्वारि हुणि कै, ब्वारिल कुकुर हुणि कै, कुकुरैलि पुछड़ि हलै दी’’ दोगले व्यिक्त का चरित्र चित्रण करती है ये लोकोक्ति ‘‘सिसूणांक जास पात’’ ह्यसिसूण एक पौधा है, जिसका पता दोनो तरफ कटीला होता हैहृ । परिवार के मुखिया को आगाह करने के लिए कहा जाता है कि ‘‘जैक बुड़ बिगड़, वीक कुड़ बिगड़’’ ह्यजिसका सयाना बिगड़, उसका घर बिगड़हृ, नौकरी की मानसिकता की असलियत को यह कहावत स्वतः ही बताती है ‘‘नौकरीक रोटी, बज्जर जसि खोटि’’ दिखावे–भुलावे को स्पष्ट करने के लिए कहा जाता है कि ‘‘लिखै–जौख राज– दिवाने जसि, खवै–पिवै गुणी–बनार जसि’’। इसके अलावा रीति–रिवाज, मानव व्यवहार, जीवन दर्शन व प्रकृतिक विशेषता को व्यक्त करने के लिए तमाम कहावते यहां प्रचलित हैं, जो जीवन की गहरी अनुभूतियों को अत्यन्त स्वाभाविक रूप से व्यक्त कर देती है। किन्तु जब से बुजुगो व बच्चों का संवाद कम हुआ है, इन कहावतों का उपयोग तथा प्रसार भी कम हो गया है।

कहावतो से प्रकट होता समाज का जीवनः

चौमस क जर, राज कु कर
जेठ कि जैसि कैरुं, पूस जैसि पाऊँ ह्यपालकहृ
कार्तिक मैंहण कांस नी फूलि, त्वी जै फूलें
ह्यू पड़ों पूस, म्यूकि पड़ि धूस ह्यू पड़ों माघ, ग्यू धरू कां
चतुर चौमास बितो, लड़िलो ह्यन, रूड़ी घाड़ी बज्यून हेजो, धो काटन टैम
बाजैकी लाकड़ी केड़ी भलि, भलि जाती की चेलि सेड़ी भलि
हुण छा एक छपुक, नि हुण छा छाड़बड़ाट
दिल्ली मि सौ घर, म्यार ख्वार बनधार
काक्क सात च्याल, मैंके के द्याल
बान–बाने, बल्द हरै गो
हुणी च्यालक गणुवां न्यार
सांझा–मांझक पौढ़ भुख मरू

(Source-http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/2009/02/blog-post_167.html)



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आणे ह्यपहेलियांहृः लोक जीवन में जन साधारण के लिए ‘मनोविनोद’का साधन है ये पहेलियां। अर्थात मनोरंजनात्मक तरीके से बौद्विक परीक्षण। ‘आणों’ में जिस वर्ण्य वस्तु के गुण, रूपा, रंग, आकार, प्रकार, उपयोग अथवा स्वभाव के विषय में संकेत रहता है उसी को पकड़कर अर्थ या उत्तर की कल्पना की जाती है। इस पर बच्चों की सामुहिक कल्पना चलती है। आणे बुद्धि विलास का माध्यम बन जाते है। आणों में वर्णित वस्तुओं का गा्रमीण वातावरण एवं जन–जीवन से घनिष्ट सम्बन्ध हुआ करता है। जैसे– सौ घ्वाड़ाक एक्कै सवार ह्यसौ घोड़ों का एक सवारहृ यानी रूपया या ‘‘लाल बाकरि पाणि पी वेर ऐगे, सफेद बाकरि पाणि पीण हुणी जाणै’’ उतर – पूरी।

पहेलियों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ बुद्धि परीक्षण है। टी0वी0, अखबार, स्कूली शिक्षा के बढ़ते प्रचलन से भले ही आज की पीढ़ियां लोक जीवन की इन पहेलियों से वंचित हो रही हों और इनकी रचना का क्रम अवरूद्व हो गया है। अंकगणित के निर्जीव सवाल बच्चों के मस्तिष्क को खोखला कर रहे हों, स्कूल में उनकी रूचि को बदल रहे हों, फिर भी इन पहेलियों का अपना महत्व यथावत है। तभी तो आज भी जिन्दा है। जीवन अभ्यास में बरकरार है क्योंकि स्थानीय समाज में पहेलियां कई प्रकार की भूमिकाएं निभाती है। जिनमें शिक्षण, बुद्धि परीक्षा और मनोरंजन मुख्य है। उम्मीद तो यही है कि मनोरंजन के नये तरीकों से लोग जल्दी ऊब जायेंगे क्योंकि इनमें जीवंतता है नहीं। फिर खड़ी हो पायेगी आणों, कथाओं तथा गीतों की एक विस्तृत श्रंृखला। अबूझी इन पहेलियों में तक—वितर्क व तात्कालिक विचार मंथन का सार :

हाथ में अता कोरि मि नी अटान
ग्यू रवाट मडुंवक पलथुड़, देखो ज्याण ज्यूं जेठी ज्यूं लक्षण
तू हिट मि ऊ
हरी–चड़ी लम पुछड़ी
बिनू बल्द पुछड़ेल, पाणी प्यूं
भिुमुनिया–भिमुनी के कुछैं रूक जानी, गौ पन हकाहक हरै, त्वे खानी मैं खानी
एक सींगि बल्द सार परिवार पालूं
एक छोरी सार परिवार के रूला दी
बेत धमर–धुस्स, पात चकइयां, देखण क रंग–चंग, खाणंक तितइयां
लामकन बामुड़, चमकन धोति
लाल चड़ी बूटे दार, उसके अण्डे नौ हजार
बणह जाणी घर है मुख, घर हैं जाणी बणह मुख
जाण भगत फुस्यार हैरू, उण भगत चुपड़ि
जाण भगत सफेद, उण बखत लाल
एक उड्यार मि सफेद बरयात बाट लागि रै

द्वारा से : सिद्ध सोसाईटी
प्त्रिका : ‘‘भूमि का भूम्याला देव’’

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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"एक थी रूपा "

उत्तराखंड की पहाडियों पर बना एक सुन्दर गाँव था
और उस गाँव का नाम था रूप गाँव जहाँ चारो तरफ
हरियाली झरझर बहते झरने फूलों और फलों से लदे वृक्ष
जितना सुन्दर गाँव था उतने ही सुन्दर और निर्मल मन के वहां के वासी ,
उन्हे लगता जैसे उनक गाँव तक ही मानो सारी दुनिया हो, हर तरफ इमानदारी थी ख़ुशी थी
गाँव में ही एक छोटा सा स्कूल था बचे पड़ते थे और खेलते थे पुरुष और महिलाये खेतों पर मेहनत करती थी सभी लोग एक दुसरे क साथ ख़ुशी और अपने गम बाटते थे
ऐसा लगता मानो जैसे इस गाँव के लोग अपने भोलेपन और अपनी निश्चल छवी को अपने तक ही समेटना चाहते हो,
पास ही में एक नदी कलकल करती बहती थी ,
गाँव के लोग भोले भाले तथा सुन्दर थे इसी गाँव में कई किशोर किशोरी थी उन्ही में से एक थी रूपा
अत्यंत सुन्दर रूपमती म्रदुभाशी थी रूपा ..जब वो हस्ती थी तो मनो घुन्घ्रुवो की झंकार हुई हो
उसकी दन्त पंक्ति मानो अनार के दाने हो काले बाद्लूँ से उसके केश , गुलाबी मुख किसी चंचल हिरनी से नयन एवं भोलापन,
हमेशा कूदती फिरती थी एक घर से दुसरे घर सभी उसे अपना समझते थी बचपन में ही माँ मर गयी थी न उसकी तो उसक पिता जी अकेले पड़ गए थे कैसे संभालते वो रूपा को सभी गाँव वालो ने सहायता की रूपा की सभी देखभाल करते कुछ दिन बाद पिताजी ने दूसरी शादी कर ली वह दूसरी माँ भी रूपा से बहुत प्यार करती थी
धीरे धीरे रूपा बड़ी होने लगी , नाम के अनुरूप अत्यंत रूपवान अब वह जंगल भी जाने लगी पशुवो के साथ तथा घास व् लकड़ी लाने जंगल में वह अत्यंत खुश होती थी
उसे लगता वह चेह्चाहते पक्षी उससे बातें कर रहे है , फुल उसके साथ खेल रहे है और उसक साथ खिलखिला रहे है सरसराती हवा उससे बातें कर रही हो वह घंटों पेड़ों की छावं में बेठी रहती और उनमे वही खो जाती
वर्षों बीतते गए रूपा अब जवान हो रही थी रूप और भोलापन मानो उसे विरासत में मिला था
पिताजी भी अब उसकी शादी के लिए चिंतित होने लगे थे आखिर बेटी जवान थी घर पर कब तक बिठाते पर रूपा शादी की बात सुनकर सिहर जाती गाँव से जुदा होना मानो उसे लगता कोई उससे उसका जीवन मांग रहा हो धीरे धीरे दिन गुज़रने लगे एक दिन गाँव में चेहेल - पहेल थी रूपा वही पास के वनों में पेड़ों से फूलों से सरसराती हवाओं से बातें कर रही थी तभी उसकी किसी सहेली ने उसे बताया की गाँव में राजा आने वाला है राजा के आने की ख़ुशी में समारोह आयोजित किया जा रहा है , उस
समारोह में राजा की नजर रूपा पर पड़ी
वह उसक भोले सौन्दर्य पर मोहित हो गया और ये बात उसने मुखिया को बताई मुखिया से रूपा के पिता तक बात पहुची
वह खुद को भाग्यवान समझने लगे यह बात रूपा को भी बताई गयी वह सिहर उठी ,गाँव से विदा होना उसक लिए कठिन था वह दौड़ती हुई जंगल पहुची दुखी मन से उसके उस दुःख में खिल -खिलाते फुल हलकी हवा में तैरती पेड़ चेह्चाहते पक्षी बहते झरने सरसराती हवा सभी सामिल हो गए ..पर रूपा फुट फुट कर रो रही थी उसका दुःख उसकी सौतेली माँ और पिता समझ गए थे राजा साहब से विनती की गयी लेकिन राजा तो राजा
था वो बोला विवाह करो अन्यथा बलपूर्वक ले जाऊंगा
बडे बुजुर्गों ने पिताजी को समझाया महिलाओं ने रूपा और उसकी माँ को समझाया अब क्या करती रूपा वो तो मजबूर थी
रूपा का विवाह संपन्न हुआ डोली विदा हुई गाँव में हर किसी की आखों में आशु थे पशु चारा खाना भूल गये थे रूपा की आखों के आशु सुख चुके थे सुन्या को ताकती उसकी हिरनी जैसी झील सी आखें ,
पिताजी और भाइयो ने रूपा को डोली में बैठाना चाहा माँ और सहेलियां रूपा से लिपट पड़ी लेकिन रूपा न जाने क्यू चुप थी सबको टुकर टुकर देखती , कुछ ने कहा लड़की को रुलायो अपसगुन है उसका यूँ चुप रहना पर रूपा न रोई जैसे तैसे डोली पर विदा हुई गाँव भर में सुना पन छोड़ कर ..
अब आगे जंगल का राश्ता था उसी जंगल में जहाँ रूपा अपनी प्रकर्ति से बातें करती थी ...घने जंगल में चलते चलते शाम हो चली थी ..तब राजा ने थोड़ा बारात को रुकने का इशारा किया कहारों ने भी डोली नीचे रखी ..
शायद राजा रूपा को एक नज़र अपनी आखों से निहारना चाहता था ..उसने डोली का पर्दा उठवाया ..
ये क्या डोली में कोई नहीं था लाल फुलू का ढेर था सुन्दर अति सुन्दर फूलों का


"कहते है रूपा का रूप सारे जंगल में फुलू के रूप में फ़ैल गया था ,,,

बुरांश के लाल सुर्ख फुलून के रूप में,,और शायद इसी कारण से आज भी सम्पूर्ण उत्तराखंड की भूमि में बुरांस का फूल फैला हुआ है और हमे उस रूपा क अद्भुत रूप की याद दिलाता है .................
तभी तो आज भी उत्तराखंड में एक गीत गया जाता है उस रूप की परी "रूपा" की याद में
"चल रूपा बुरांश फुल बणी जौला"

यह कथा सत्य है या असत्य मुझे नहीं पता पर जैसा मैंने अपने बुजुर्गू से सुना था मैंने वही आप सभी के सामने अपने सब्दूं में प्रश्तुत करा है
आशा करता हु की अप सभी को पसंद आयगी..

योगेश सिंह भंडारी "दी" आवारा
गाँव कज्युली पोस्ट & थाना बैजनाथ
बागेश्वर

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 नारी के शक्तिस्वरूप की महिमा का वर्णन उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल के लोक आख्यानों में भी मिलता है। ऐसी ही एक कथा में बताया गया है कि एक दुल्हन के श्राप से सभी बाराती चीड़ का पेड़ बन गए थे और इस घटना के प्रमाण आज भी मौजूद हैं।
कहा जाता है कि कुमाऊं अंचल के गैवाड़ क्षेत्र में लगभग 100 साल पहले द्वाराहाट और भटकोट के बीच नैरपानी के जंगल में बारातियों ने एक नयी नवेली दुल्हन को मरने के लिए गहरी खाई में फेंक दिया था और उसने मरते समय उन्हें चीड़ के पेड़ बन जाने का श्राप दिया। तत्काल सभी बाराती वहीं चीड़ के पेड़ बन गए। यह भी कहा जाता है कि वे बाराती आज भी चीड़ के रूप में मौजूद हैं। (http://khabar.ibnlive.in.com)

 

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