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  • कर्क संक्रान्ति (हरेला): July 16, 2012

Author Topic: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)  (Read 110721 times)

Hisalu

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #110 on: July 16, 2012, 11:18:51 AM »
From Khyali Ram Joshi, Facebook

लाख हर्यावा, लाख बग्वाई, लाख पंचिमी जी रए जागि रए बची रए |
( भाव तुम लाख हरेला, लाख बग्वाली, लाख पंचिमी तक जीते रहना)
स्यावक जसी बुध्धि हो, सिंह जस त्राण हो|
(भाव लोमड़ी की तरह तेज बुध्धि हो और शेर की तरह बलवान हो )
दुब जैस पनपिये, आसमान बराबर उच्च है जाए, धरती बराबर चाकौव है जाए|
(भाव दुब की तरह फूटना , आसमान बराबर ऊँचा होजाना, धरती के बराबर चौड़ा हो जाना|)
आपन गों पधान हए ,सिल पीसी भात खाए|
(भाव अपने गांव का प्रधान बनना और इतने बूढ़े हो जाना की खाना भी पीस कर खाना|)
जान्ठी टेकि झाड़ी जाये , जी रए जागि रए बची रए |
(भाव छड़ी ले कर जंगल पानी जाना, इतनी लम्बी उम्र तक जीते रहना जागते रहना.|)

Hisalu

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #111 on: July 16, 2012, 11:22:57 AM »
Prayag Pandey, FB, Lokrang Community

मित्रो ! आज हरियाली का प्रतीक "हरेला " है | " हरेले " की आप सब को शुभ कामनाएं | देश और दुनियां के ताकतवर लोग प्रकृति प्रदत्त संसाधनों को निचोड़ लेने के बाद पिछले तीन - चार दशकों से पर्यावरण को बचाने के लिए संचार माध्यमों में गला फाड़ कर चिल्ला रहे हैं | जबकि आदि - अनादि काल से पर्यावरण संरक्षण हमारी परम्परा और लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा रहा है | पहाड़ के लोग आदि - अनादि काल से पर्यावरण के संरक्षण के लिए " हरेला " पर्व मनाते चले आ रहे हैं | यह पर्व पहाड़ के लोगों की पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का अनुकरणीय उदाहरण है |
मित्रो ! महंगाई की मार का असर हमारे रोजमर्रा के जीवन के साथ तीज - त्यौहार और लोक पर्वों पर भी पड़ा है | महंगाई ने लोक पर्वों और त्योहारों की रौनक फीकी कर दी है | लिहाज " हरेले " के इस सुअवसर पर महंगाई की मार से रोजमर्रा के जीवन में पेश आ रही परेशानियों को व्यक्त करता एक बहुत पुराना लोक गीत आपके लिए ढूढ कर लाया हूँ | सो लीजिये इस कालजयी लोक गीत का लुत्फ़ उठाईये ------

तिलुवा बौज्यू घागरी चिथड़ी , कन देखना आगडी भिदडी |
खाना - खाना कौंड़ी का यो खाजा , हाई म्यार तिलु कै को दिछ खाना |
न यो कुड़ी पिसवै की कुटुकी , चावल बिना अधियाणी खटकी |
साग पात का यो छन हाला , लूण खाना जिबड़ी पड़ छाला |
न यो कुड़ी घीये की छो रत्ती , कसिक रैंछ पौडों की यां पत्ती |
पचां छटटा घरूं छ चा पाणी , तै पर नाती टपुक सु चीनी |
धों धिनाली का यो छन हाला , हाय मेरा घर छन दिनै यो राता |
दुनियां में अन्याई है गई , लडाई में दुसमन रै गई |
सुन कीड़ी यो रथै की वाता , भला दिन फिर लालो विधाता |
साग पात का ढेर देखली , धों धिनाली की गाड बगली |
वी में कीड़ी तू ग्वाता लगाली ||

भावर्थ :
ओ तिलुवा के पिताजी , देखो यह लहंगा चीथड़े हो गया है , देखना यह फटी अंगिया |
खाने को यह भुनी कौणी रह गई , मेरे तिलुवा को कौन खाना देगा |
इस घर में मुट्ठी भर भी आटा नहीं , पतीली में पानी उबल रहा है , पर चावल नहीं हैं |
साग सब्जी के वैसे ही हाल है , नमक से खाते - खाते जीभ में छाले पड़ गए हैं |
इस घर में तो रत्ती भर भी घी नहीं है , अतिथियों को कैसे निभाऊ |
पाचवें - छठे दिन चाय बनाने के लिए पानी गर्म करती हूँ , पर घर में चखने भर को चीनी नहीं है |
वैसा ही हाल दूध - दही का है , हाय , मेरे घर तो दिन होते ही रात पड़ गई |
संसार में अन्याय बढ़ गया है , लडाई - झगड़ों में लोग एक - दुसरे के शत्रु बन गए हैं |
ओ कीड़ी , तुम मतलब की यह बात सुनो , विधाता हमारे अच्छे दिन फिर लौटा देगा |
तुम साग - सब्जी के ढेर देखोगी इस घर में , दूध - दही की नदियाँ बहेंगी ,
और कीड़ी तुम उसमें गोते लगाओगी ||

(कुमांऊँ का लोक साहित्य )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #112 on: July 16, 2012, 12:35:49 PM »





Lalit Sharma8 hours ago On your profile · Remove
उत्तराखण्ड की संस्कृति की समृद्धता के विस्तार का कोई अन्त नहीं है, हमारे पुरखों ने सालों पहले जो तीज-त्यौहार और सामान्य जीवन के जो नियम बनाये, उनमें उन्होंने व्यवहारिकता और विज्ञान का भरपूर उपयोग किया था। इसी को चरितार्थ करता उत्तराखण्ड का एक लोक त्यौहार है-हरेला।
 
 हरेले का पर्व हमें नई ऋतु के शुरु होने की सूचना देता है, उत्तराखण्ड में मुख्यतः तीन ऋतुयें होती हैं- शीत, ग्रीष्म और वर्षा। यह त्यौहार हिन्दी सौर पंचांग की तिथियों के अनुसार मनाये जाते हैं, शीत ऋतु की शुरुआत आश्विन मास से होती है, सो आश्विन मास की दशमी को हरेला मनाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत चैत्र मास से होती है, सो चैत्र मास की नवमी को हरेला मनाया जाता है। इसी प्रकार से वर्षा ऋतु की शुरुआत श्रावण (सावन) माह से होती है, इसलिये एक गते, श्रावण को हरेला मनाया जाता है। किसी भी ऋतु की सूचना को सुगम बनाने और कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण ऋतुओं का स्वागत करने की परम्परा बनी होगी।
 
 happy harela to all uk friends and fb friends

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #113 on: July 16, 2013, 08:28:23 AM »
पर्यावरण को सम्पर्पित उत्तराखंड का ' हरेला' त्यौहार की शुभकामनाये।

आज जहाँ सारा संसार पर्यावरण की चुनौतियों से जूझ रहा है  वही  जरूरत इस प्रकार के त्योहारों को और बढावा दिया जाय। मुझे याद है गाव में लोगो त्यौहार मनाने के बाद कहते है कि त्यौहार खाने के बाद कम से काम पांच पेड़ लगाने की जरुरी है। आइये सकल्प ले हरेला त्यौहार के शुभ अवसर पर जरुर वृक्षारोपण करे।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #114 on: July 16, 2013, 08:38:27 AM »
उत्तराखंड का आंचलिक पर्व --हरेला
 
-ज्योतिर्मयी पंत


उत्तराखंड में विविध त्योहार मनाये जाते हैं। हर पर्व की कुछ न कुछ विशेषता होती है। यहाँ सौर मास और चन्द्र मास दोनों के ही अंतर्गत कई त्योहार होते हैं। पारिवारिक, धार्मिक, सामाजिक उत्सवों और पर्वों से भरा पूरा है यहाँ के लोगों का जीवन। कुछ त्योहार ऋतु परिवर्तन के सूचक हैं तो कुछ कृषि आधारित। जब फसले बोई या काटी जाती है, उस समय कुछ त्यौहार यहाँ विशेष तौर पर मनाये जाते हैं जो अन्यत्र नहीं मनाये जाते। ऐसा ही एक अति महत्त्वपूर्ण त्यौहार है - हरेला, हर्याल या हरयाव।
 
 यह पर्व श्रावण संक्रांति अर्थात कर्क संक्रांति को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह सोलह जुलाई को होता है। यदा कदा ग्रहों की गणना से एक दिन का अंतर हो जाता है। इससे १० दिन पूर्व लोग घरों में पूजा स्थान में किसी जगह या छोटी डलियों में मिट्टी बिछा कर सात प्रकार के बीज जैसे- गेंहूँ, जौ, मूँग, उरद, भुट्टा, गहत, सरसों आदि बोते हैं और नौ दिनों तक उसमें जल आदि डालते हैं। बीज अंकुरित हो बढ़ने लगते हैं। हर दिन सांकेतिक रूप से इनकी गुड़ाई भी की जाती है दसवें दिन कटाई। यह सब घर के बड़े बुज़ुर्ग या पंडित करते हैं। पूजा नैवेद्य आरती का विधान भी होता है। कई तरह के पकवान बनते हैं। इन हरे-पीले रंग के तिनकों को देवताओं को अर्पित करने के बाद घर के सभी लोगों के सर पर या कान के ऊपर रखा जाता है घर के दरवाजों के दोनों ओर या ऊपर भी गोबर से इन तिनकों को सजाया जाता है। कुँवारी बेटियां बड़े लोगो को पिठ्या (रोली) अक्षत से टीका करती हैं और भेंट स्वरुप कुछ रुपये पाती हैं। बड़े लोग अपने से छोटे लोगों को इस प्रकार आशीर्वाद देते हैं।
 
 जी रया जागि रया
 आकाश जस उच्च, धरती जस चाकव है जया
 स्यावै क जस बुद्धि, सूरज जस तराण है जौ
 सिल पिसी भात खाया जाँठि टेकि भैर जया
 दूब जस फैलि जया...
 दीर्घायु, बुद्धिमान और शक्तिमान होने का आशीर्वाद और शुभकामना से ओतप्रोत इस गीत का अर्थ है- जीते रहो जागृत रहो। आकाश जैसी ऊँचाई, धरती जैसा विस्तार, सियार की सी बुद्धि, सूर्य जैसी शक्ति प्राप्त करो। आयु इतनी दीर्घ हो कि चावल भी सिल में पीस के खाएँ और बाहर जाने को लाठी का सहारा लेना पड़े। दूब की तरह सब जगह आसानी से फैल जाएँ (यशस्वी हों)।
 
 इस त्योहार की एक अन्य विशेषता यह है कि पूजा के लिए घरों की महिलाएँ या कन्याएँ मिट्टी की मूर्तियाँ बनाती हैं जिन्हें डिकार या डिकारे कहा जाता है। लाल या चिकनी मिट्टी से ये मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। इसमें शिव, पार्वती, उनके पुत्र यानि शिव परिवार के सदस्य और उनके वाहन भी शामिल होते हैं। माना यह भी जाता है कि इसी माह में शिव पार्वती का विवाह हुआ। दूसरा कारण यह भी है कि पारिवारिक सुख शांति त्रिदेवों में शिव शंकर के पास ही है और उनकी कृपा से सभी की मनोकामना पूरी होती है।
 
 डिकारे बनाने के लिए पहले मिट्टी को साफ कर उसे गूँध लिया जाता है फिर सभी की सुन्दर मूर्तियाँ बना कर सुखाया जाता है। फिर बिस्वार (चावल पीस कर बनाये गए घोल) से रँगने के बाद मनचाहे सुन्दर रंगों से उनके वस्त्र आभूषण बना दिए जाते हैं। हरेले की डलियों में उन्हें स्थापित कर पूजन होता है। पूजा के बाद विसर्जन किया जाता है। इस तरह त्योहारों में महिलाओं और लड़कियों को अपनी कलाओं का प्रदर्शन करने का अवसर भी मिलता है।
 
 तीज त्योहार यों तो आपसी मेल मिलाप, हँसी ख़ुशी से मनाये ही जाते हैं और लोगों को इसीलिए इनकी प्रतीक्षा भी रहती है लेकिन हरेले के त्योहार को मनाने का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष भी है। यह हमारे कृषि आधारित प्रदेश की उस सोच को उजागर करता है जब वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ नहीं होती थी और उपजाऊ बीज परीक्षण की सुविधा भी उपलब्ध नहीं होती थी। तब फसलों की बुआई से पहले हर घर में विविध बीज बो कर परीक्षा हो जाती कि फसल कैसी होगी ? फसल अच्छी हो इसलिए पहले मनोकामना की पूर्ति के लिए पूजा-पाठ आदि से कार्य का आरम्भ होता था। सब लोगों में मिलजुल कर काम करने कि प्रवृति होती थी। अच्छे बीजों, उपकरणों, हल- बैलों का मिलकर उपयोग करते थे। अभी भी उत्तराखंड के गावों में सब मिलकर बारी बारी से सब के खेतों में बुआई, रोपाई, गुड़ाई कटाई आदि कार्य संपन्न करते हैं। इस दिन लोग अपने खेतों ,बगीचों और घर के आस-पास वृक्ष भी लगाते हैं। हरेले के दिन पंडित भी अपने यजमानों के घरों में पूजा आदि करते हैं और सभी लोगो के सर पर हरेले के तिनकों को रखकर आशीर्वाद देते हैं। लोग परिवार के उन लोगों को जो दूर गए हैं या रोज़गार के कारण दूरस्थ हो गए हैं उन्हें भी पत्रद्वारा हरेले का आशीष भेजते हैं।
 
 कुमायूँ में हरेला साल में तीन बार मनाया जाता है- १- चैत्र: चैत्र मास के प्रथम दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है, २- श्रावण: श्रावन लगने से नौ दिन पहले अषाढ़ में बोया जाता है और १० दिन बाद काटा जाता है तथा ३-आशिवन: आश्विन नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे के दिन काटा जाता है। आजकल समय का अभाव, विचारों का बदलाव, शहरीकरण और पलायन की मार...। इन त्योहारों को भी विलुप्ति के कगार पर पहुँचा रही हैं। हमें अपनी उन परम्पराओं को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और वैज्ञानिक आधार को मज़बूत बनाती हैं।

www.abhivyakti-hindi.or

मेरा पहाड़ / Mera Pahad

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #115 on: July 16, 2013, 08:47:39 AM »
सभी उत्तराखंडियो को हरेला त्यौहार की हार्दिक शुभकामनाएँ।
इष्ट देव सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करे।

विनोद सिंह गढ़िया

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #116 on: July 16, 2013, 10:50:12 AM »
सभी मित्रो को लोक पर्व 'हरेला (हरियाव)' की हार्दिक बधाई एवं शुभकामना।
हरियाली के इस पावन पर्व पर आओ अधिक के अधिक वृक्षारोपण करें और अपनी धरा में वर्तमान में हो रही अनहोनी घटनाओं को रोकने में अपना योगदान दें।
(विनोद गढ़िया)





Harela- A folk festival of Uttarakhand

Tag- #Harela, #Plant_a_Tree, #Kumaon #Garhwal 

Raje Singh Karakoti

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Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #117 on: July 16, 2013, 10:58:36 AM »
I wish a very happy & prosperous "Harela" to all my brothers & sisters of Merapahad forum.

On this auspicious day, let we all pray for a minute for the people who lost their lives in one of the biggest tragedy in history of our beloved Himalyan region & take a OATH for protecting our "Mother Nature" so that this kind of disastrous should not be repeated in future.

JAI HIND..
JAI UTTRAKHAND...

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #118 on: July 16, 2013, 12:23:34 PM »
हरयाव की शुभकामनाएं मेरे सभी उत्तराखंडी दोस्तों को ! हैप्पी हरेला

हेम पन्त

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Re: Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)
« Reply #119 on: July 16, 2013, 12:45:12 PM »
“हरेला” लोकपर्व इस बात का परिचायक है कि हमारे पूर्वज वन संरक्षण और पर्यावरण को अत्यधिक महत्व देते थे. बरसात के इस मौसम में धरती की नमी के नये वृक्षों के उगने के लिये उपयुक्त होती है.
सभी लोगों से निवेदन है कि अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें और इस महत्वपूर्ण त्यौहार का सन्देश अगली पीढी तक पहुंचाने की कोशिश करें...
आप सभी साथियों को “हरेला पर्व” की सपरिवार बधाई.. 

 

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