Author Topic: House Wood carving Art /Ornamentation Uttarakhand ; उत्तराखंड में भवन काष्ठ कल  (Read 14577 times)

Bhishma Kukreti

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रामडा तल्ला (चमोली ) में स्व उमराव सिंह नेगी की तिबारी में काष्ठ कला  , अलंकरण , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , मोरी , काठ बुलन ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन, नक्कासी   - 126
(अलंकरण व कला पर केंद्रित )   

 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 रामडा (गैरसैण , चमोली गढ़वाल ) के स्व उपरान सिंह नेगी ब्रिटिश सरकार में  बूंगीधार क्षेत्र में पटवारी थे व पुस्तैनी पधान  भी थे।   आज स्व उमराव सिंह नेगी के  दुपुर /दुखंड /तिभित्त्या मकान में पहली मंजिल पर स्थापित तिबारी की  कायस्थ कला , नक्कासी पर चर्चा होगी।  स्व उमराव सिंह  नेगी बूंगीधार क्षेत्र के पटवारी थे।   नरेंद्र  बारमोला ने सूचना दी है कि इस मकान हेतु तूण ही नहीं अपितु कारीगर भी बूंगीधार पौड़ी से रामडा   आये थे।
  पहली मंजिल में स स्थापित  स्तम्भों वाली तिबारी में तीन खोली बनती हैं व किनारे के दोनों स्तम्भ दीवार से जोडू कड़ी से जुड़ते हैं। जोडू कड़ी में  सर्पिल नुमा पर्ण लता अलंकरण हुआ है , अर्थात बेल बूटों की नकासी हुयी है। 
स्तम्भ का आधार कुम्भी अधोगामी पुष्प दल ( downward lotus petals ) से बना है फिर ऊपर नक्कासी दार ड्यूल  (ring type wood plate ) हैं व उसके ऊपर उर्घ्वगामी पद्म दल (upward lotus petals ) हैं व इसके बाद स्तम्भ की मोटाई कम होती जाती है याने स्तम्भ  कड़ी रूप लेने लगता है। इस कड़ी भाग में भी ज्यामितीय कला से सुंदरता आयी है।  जहां  स्तम्भ की मोटाई सबसे कम है वहां अधोगामी पद्म दल है फिर नक्काशीयुक्त ड्यूल है व फिर उर्घ्वगामी पद्म दल है। ध्यान रखने वाली बात है कि कमल दल /पद्म दल के ऊपर भी पर्ण -लता समान  अलंकरण अंकन हुआ है।  जहां उर्घ्वगामी पद्म  दल समाप्त होता है वहां से सीधा ऊपर स्तम्भ का थांत (bat blade type ( शुरू होता है जो  चौकोर शीर्ष /मुरिन्ड /मथिण्ड से मिल जाता है।  जहां से थांत बनना शरू होता है वहीं से तिबारी के अर्ध मेहराब /half arch  भी शुरू होती है व दूसरे स्तम्भ के arch  से  मिलकर अर्धवृताकार मेहराब बनाता है।  मेहराब में कोई तीखापन खिन नहीं है।  मेहराब कई तल का है। मेहराब /तोरण के बाहर त्रिभुज में बेल बूटों   का अलंकरण हुआ है।  थांत व मुरिन्ड /मथिण्ड  की पट्टियों  में भी  बेल बूटों का अंकन हुआ है। आश्चर्य है कि  रामडा  तल्ला के  स्व उमराव सिंह नेगी की तिबारी में मेहराब के बाहर त्रिभुज में कोई पुष्प उत्कीर्ण नहीं हुआ है अन्यथा गढ़वाल की सभी तिबारियों में त्रिभुज आकृति में पुष्प अवश्य उत्कीर्ण हुए होते हैं।
रामडा तल्ला (चमोली ) के इस   तिबारी में स्तम्भ के मध्य  खवाळ  खाली न होकर दो फोट ऊंचाई का पट्टा है जिसपर  नयनाभिरामी  ज्यामितीय  अलंकरण उत्कीर्ण हुआ है।
    निष्कर्ष निकलता है कि रामडा तल्ला (गैरसैण ) में स्व उमराव सिंह नेगी की  भव्य तिबारी की दो मुख्य विशेषताएं सामने आयी हैं कि मेहराब के बाह्य त्रिभुजों में फूलों का अंकित न ाहों अवा स्तम्भ आधार में ख्वाळ को  ढाई फिट तक पट्टी से भरण व उन पत्तियों पर जायमितीय अलंकरण /नकासी होना। तिबारी आज भी भव्य है व देखरेख के कारण सही सलामत व शान के साथ खड़ी है।  एक और विशेषता ध्यान देने योग्य है की तू ण की लकड़ी बूंगीधार  पौड़ी से आयी व काष्ठ शिल्पकार  भी बूंगीधार पौड़ी के थे । 
सूचना व फोटो आभार : नरेंद्र प्रसाद बारमोला , रामडा
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली , मोरी , खोली  ) काष्ठ  कला अंकन , लकड़ी नक्कासी  - 
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   House Wood Carving Ornamentation from  Chamoli, Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   House Wood Carving Ornamentation/ Art  from  Joshimath ,Chamoli garhwal , Uttarakhand ;  House Wood Carving Ornamentation from  Gairsain Chamoli garhwal , Uttarakhand ;     House Wood Carving Ornamentation from  Karnaprayag Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   House Wood Carving Ornamentation from  Pokhari  Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   कर्णप्रयाग में  भवन काष्ठ कला, नक्कासी  ;  गपेश्वर में  भवन काष्ठ कला, नीति में भवन काष्ठ  कला, नक्कासी   ; जोशीमठ में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  , पोखरी -गैरसैण  में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  ,


Bhishma Kukreti

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  कांडई (द्वारहाट ) में स्व. हरी दत्त कांडपाल की शनदार बाखली 

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , काठ बुलन ) काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 120 
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 कुमाऊं  व गढ़वाल में मकान निर्माण शैली में  सबसे बड़ा अंतर है कि कुमाऊं में मकान चिपके होते हैं जो कभी गढ़वाल में एक मंजिला मकान   ( उबर )  युग में भी था।  कुमाऊं के  बाखलियों  में  छज्जों को महत्व नहीं दिया जाता व छज्जे छोटे होते  हैं।  गढ़वाल में मकान में पहली मंजिल पर छज्जा होना एक  आवश्यक शर्त है।  अधिकतर गढ़वाल के पहली मंजिल का मकानों (दुपुर ) में सीढ़ी बाहर से होती हैं व तिबारियों में सीढ़ियां अंदर से खोली के रास्ते होते हैं।  कुमाऊं में भी पहली या दूसरे  मंजिल में जाने हेतु खोली होती हैं।  दोनों  प्रकार के भवनों में खोली का बड़ा महत्व होता है व सजावट होती है।  गढ़वाल में दो कमरों या तीन कमरोंको  बरामदे  में तब्दील कर  बाहर  स्तम्भों से तिबारी प्रयुक्त होते हैं।  गढ़वाल में छज्जा आने जाने का काम आता है जबकि  बाखलियों में बाहर झाँकने हेतु झरोखेनुमा मोरी /खोल होती है। अधिकतर खोल या झाँकने का रिक्त स्थान अंडाकार होता है
 प्रस्तुर  बाखली  कांडई गांव (द्व्राह्ट अल्मोड़ा, कुमाऊं ) में भूतपूर्व  विधायक  स्व हरी दत्त   कांडपाल   की  है।    कुमाऊं के बाखलियों से हटकर मकान में  बाह्य सीढ़ियों से पहली मंजिल जाया जाता है।  मुख्य द्वार  में  स्तम्भ /सिंगाड़ हैं।  कुमाऊं शैली की  विशेषता है कि  दो दो तीन तीन स्तम्भ चिपकाकर एक स्तम्भ बनाया जाता है।  कांडई में  स्व  हरी दत्त कांडपाल  के मि पहली मंजिल में मुख्य द्वार में व मोरियों  में भी कुमाऊं शैली अनुसार दो दो या अधिक स्तम्भों को चिपकाकर स्तम्भ निर्मित किये गए हैं।   पहली मंजिल के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्तम्भ  चार  गौण स्तम्भों को चिपकाकर निर्मित हैं व  गौण स्तम्भ के आधार में कुम्भी , ड्यूल , फिर कमल दल (लगभग गढ़वाल की  तिबारियों के स्तम्भ  जैसा साँचा /स्वरूप (पैटर्न ) है.) . सभी गौण स्तम्भ ऊपर जाकर मुरिन्ड / मथिण्ड  शीर्ष से मिलते है व शीर्ष /मुरिन्ड /मोर /मथिण्ड चौखट है।  मुख्य द्वार के शीर्ष याने मुरिन्ड पट्टीकाओं में  ज्यामितीय अलंकरण के अतिरिक्त कोई विशेष अलंकरण दृष्टिगोचर नहीं होता है।  स्तम्भ को दीवारों से जोड़ने वाली कड़ियों में बेल बूटे /पर्ण लता अलंकरण हैं। 
 मोरी  के खोल (जहां से  बाहर झाँका जाता है ) , कुमाऊं में  अधिकतर अंडकार होते हैं किन्तु  कांडई  (द्वारहाट  )  में  पूर्व विधायक स्व . हरी  दत्त कांडपाल की बाखली में अंडाकार खोल नहीं दीखता है।   तीन मोरियाँ हैं व प्रत्येक मोरी के स्तम्भ भी चार चार गौण  स्तम्भों को चिपकाकर निर्मित हुए हैं। मोरी के खोल ऊपर  शीर्ष मुरिन्ड पट्टिका ओं  में कोई  मानवीय /देव प्रतीक अलंकरण    दृष्टि में नहीं  हो रहे हैं किन्तु बेल बूटे  साफ साफ़ दृष्टिगोचर होते हैं।  पहली मंजिल में बांये किनारे की खड़िकी के दरवाजों व एक सिंगाड़   में पर्ण लता /बेल बूटे  नक्कासी दिखती है।   .
कांडई (द्वारहाट ) में भूतपूतव विधायक   ह्री दत्त कांडपाल की  बाखली  शानदार है और  उनके उत्तराधिकारियों  ने उचित देखरेख का परिचय दिया है कि  अभी भी बाखली में रौनक व् ठसक है। 
दिनेश कांडपाल अनुसार प्रस्तुत बाखली 1910  के लगभग निर्मित हुयी थी व स्थानीय शिल्पकारों ने  उपलब्ध स्थानीय माल से बाखली निर्मित की थी।

सूचना व फोटो आभार : दिनेश कांडपाल , कांडई

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली   ) काष्ठ  कला अंकन  - 
अल्मोड़ा में  बाखली  काष्ठ कला  , पिथोरागढ़  में  बाखली   काष्ठ कला ; चम्पावत में  बाखली    काष्ठ कला ; उधम सिंह नगर में  बाखली    काष्ठ कला ;; नैनीताल  में  बाखली  काष्ठ कला ;
Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of Garhwal , Kumaun , Uttarakhand , Himalaya
 House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Almora Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Nainital   Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Pithoragarh Kumaon , Uttarakhand ;  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Udham Singh  Nagar Kumaon , Uttarakhand ;    कुमाऊं  में बाखली में नक्कासी ,  ,  मोरी में नक्कासी , मकानों में नक्कासी  ;
 


Bhishma Kukreti

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बैंजी कांडई   (दशज्यूला  , रुद्रप्रयाग ) में कांडपाल परिवार की तिबारी में काष्ठ कला , अलंकरण /नक्कासी
(गढ़वाळ  से अलग विशेष शैली )

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली   , खोली , छाज   ) काष्ठ अंकन   -  128
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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सर्वेक्षण से पता चलता है कि   उत्तरकाशी के बाद चमोली व  रुद्रपयाग  भवन काष्ठ   कला के मामले में अधिक समृद्ध  रहा है।  रुद्रप्रयाग के दशज्यूला क्षेत्र  में  कांडई गाँव में कांडपाल परिवार की तिबारी दार  मकान यह सिद्ध करने में सफल है कि रुद्रप्रयाग भवन काष्ठ कला के मामले में भाग्यशाली क्षेत्र है। 
दश ज्यूला कांडई  में कांडपाल परिवार के  दुपुर , दुखंड /तिभित्या मकान के  हर स्तर पर काष्ठ  कला उत्कीर्णन या नक्कासी के दर्शन होते हैं  , नकासी या काष्ठ कला अलंकरण  विवेचना से कांडपाल परिवार के मकान को निम्न भागों में  विभक्त करना आवश्यक है -
मकान के तल मंजिल में  खोली व खोली  के  अगल  बगल में दोनों ओर काष्ठ कला उत्कीर्णन /नक्कासी
 तल मंजिल में अन्य कमरों के द्वारों  तथा   खिड़कियों में काष्ठ कला अलंकरण
पहली मंजिल में तिबारी में काष्ठ कला अलंकरण /नक्कासी
पहली मंजिल में खोली या झरोखों में काष्ठ नक्कासी
      प्रवेश द्वार में  उत्कृष्ट  काष्ठ कला अलंकरण या  आमद रास्ते में उमदा नक्कासी:-  कांडपाल परिवार की खोली  प्रवेश द्वार /आमद रास्ता  में नकासी उत्कृष्ट किस्म की है।  प्रवेश द्वार के दरवाजों के स्तम्भों में लाजबाब नक्कासी हुयी है।  मुख्य स्तम्भ दो अधोलम्भ वर्टिकल  स्तम्भों को मिलकर बना है।   स्तम्भों के  आधार में घुंडी , कमल दल आदि अलंकरण दृष्टिगोचर होते हैं व ऊपर स्तम्भों में वानस्पतिक  कला उत्कीर्ण हुयी है।  खोली के मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष में प्रतीकात्मक याने  देव मूर्ति खुदी है व मुरिन्ड पट्टिकाओं में प्राकृतिक (लता , पत्ती ) अलंकरण /नक्कासी हुयी है।  छज्जे से शंकुनुमा आकृतियां लटक रही है।
खोली के अगल बगल में दो दो अलग तरह के स्तम्भ  खड़े हैं।  प्रत्येक स्तम्भ के तल भाग में ज्यामिति कला अलंकरण उत्कीर्ण है व ऊपर चौखट है जिसमे बहुदलीय  फूल है।  फिर ऊपर के चौखट में एक मानव आकृति व ऊपर के चौखट में फिर बहुदलीय फूल है।  फिर ऊपर  ज्यामितीय  दो चौकियां व बीच में ड्यूलनुम आकृति कटान हुआ है।  इन impost /चौकियों के ऊपर  दो दो S  (अंग्रेजी का एस ) नुमा आकृति खुदी हैं व ऊपर एक आकृति के ऊपर शेर व दूसरी आकृति के ऊपर हाथी की नक्कासी हुयी है।  कहा जा सकता है कि खोली के दरवाजे के अगल बगल कुल चार फूल , दो मानव , दो शेर व दो हाथियों की आकृति खुदे है।  नक्कासी दिलकश है। 
कांडई (दश ज्यूला ) तल मंजिल  में अन्य तीन कमरों के दरवाजों  के सिंगाड़ /स्तम्भ में आधार से व ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड  तक उम्दा किस्म की नक्कासी  हुयी है।  स्तम्भ के आधार में उल्टा कमल दल (कुम्भी आकृति ) है व ऊपर लता पर्ण व ज्यामितीय कला का मिश्रण है जो लुभावना है।  मुरिन्ड /शीर्ष में भी प्राकृतिक व ज्यामितीय कला अंकन है।  मुरिन्ड के मध्य प्रतीकात्मक देव आकृति खुदी है।  दरवाजों पर भी मन भवन ज्यामितीय कला अलंकरण उत्कीर्णनन दर्शन होते हैं।
  दशज्यूला कांडई  में कांडपाल परिवार की इस तिबारी की बिलकुल अलग विशेषता है जो गढ़वाल की अन्य किसी भी तिबारी में अब तक नहीं मिली।  तिबारी  छज्जे के ऊपर देहरी /देळी के ही ऊपर है किन्तु  कांडई दशज्यूला के इस तिबारीमें मुख्य  चार स्तम्भ के प्रत्येक स्तम्भ वास्तव में चार चार स्तम्भों से मिलकर एक स्तम्भ निर्मित हुए हैं। 
चारों मुख्य स्तम्भों में प्रत्येक स्तम्भ में आधार पर उल्टा कमल दल , फिर ड्यूल फिर सुल्टा कमल दल , फिर स्रम्भ की मोटाई कम होना व फिर उल्टा कमल दल , ड्यूल व फिर सुल्टा (upward () कमल दल है।  अब प्रत्येक सुलटे कमल दल से उप स्तम्भ आकृतीयना निकलती है जो अंत में ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष से मिल जाते हैं।   इन उप स्तम्भों से ही मेहराब बनते हैं।  मेहराब के बाहर त्रिभुजाकार आकृति में प्राकृतिक अलंकरण उत्कीर्ण हुआ है   सुंदर नक्कासी हुयी है।  मुरिन्ड में प्रत्येक मेहराब के ऊपर  एक देव या प्रतीकात्मक  आकृति खुदी है।  छत  आधार पट्टिका से कई शंकुनुमा आकृतियां नीचे लटकी हैं।
एक और विशेषता दशज्यूला कांडई में  कांडपाल परिवार के मकान की है कि  मकान के पहली मंजिल पर खड़की का काम बाहर झांकना नहीं अपितु झंकन अहइ , इस खोली में अंडाकार खोल है जिसके बाहर की तो में ज्यामितीय ालकरण हुआ है व अंडकार खोल के अंदर झरोखा बना है जो अलग शैली का ही है और गढ़वाल में कम  देखने  को मिलता है। 
जय वर्धन कांडपाल ने सूचना दी कि मकान सन  1941  में निर्मित हुआ व  1600   चांदी के सिक्के silver  coins  सिक्के व्यय हुए थे व बल्कि काम श्रमदान से पूर्ण हुआ था।  डिजाइन प्राणी दत्त का था व शिल्पकार थे क्वीली के कोली धुमु व धामू।   

   निष्कर्ष है निकलता है कि  कांडपाल परिवार (जगदीश कांडपाल, त्रिलोचन  कांडपाल, भगवती कांडपाल, देवेंद्र कांडपाल, विनोद कांडपाल ) के मकान में काष्ठ कला व् अलंकरण उत्कृष्ट किस्म का ही नहीं अपितु कुछ अलग व विशेष किस्म  का है , उम्दा नक्कासी का नमूना इस मकान में मिलता है , मकान के काष्ठ में सभी प्रकार के प्राकृतिक , मानवीय, प्रतीकात्मक  व ज्यामितीय अलंकरण /नक्कासी मिलता है।  दशज्यूला कांडई के इस मकान में  गढ़वाल से अलग विशेष कला के दर्शन भी होते हैं जैसे  खोली  के बाहर अगल बगल में अलग  किस्म  की आकृतियों का अंकन , तिबारी के चारों स्तम्भ अलग अलग चार स्तम्भों से मिलकर निमृत हुयी है जो गढ़वाल में अन्य जगह नहीं दिखी है अब तक व  इ सभी स्तंभसीधा मुरिन्ड  से नहीं मिलते अपितु इनके उप फिर से उप स्तम्भ नुमा आकृतियां है वे आकृतिया मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष से मिलते हैं।  मकान में खड़की भी  अंडे से झाँकन हेतु है। 

सूचना व फोटो आभार : जय प्रकाश कांडपाल

   * यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी . मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं .
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 Traditional House wood Carving Art of  Rudraprayag    Garhwal  Uttarakhand , Himalaya   
  रुद्रप्रयाग , गढवाल   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलीयों  ,खोली  में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण , नक्कासी  श्रृंखला 
  गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखई  ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya ; Traditional House wood Carving Art of  Rudraprayag  Tehsil, Rudraprayag    Garhwal   Traditional House wood Carving Art of  Ukhimath Rudraprayag.   Garhwal;  Traditional House wood Carving Art of  Jakholi, Rudraprayag  , Garhwal, नक्कासी , जखोली , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  ; उखीमठ , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला अंकन, नक्कासी  , द्वार में नक्कासी , खिड़की में नक्कासी , खम्बों में नक्कासी

Bhishma Kukreti

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    फल्दाकोट मल्ला (यमकेश्वर )  में आलम सिंह  पयाल की तिबारी /डंड्यळ  में काष्ठ कला /नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , काठ बुलन )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 129

 संकलन -भीष्म कुकरेती
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 पिछले अध्याय में  सूचित किया ही गया है कि फल्दाकोट  मल्ला कृषृ समृद्ध गाँव तो था ही 90  %  लोग ब्रिटिश पुलिस विभाग  में नौकरीरत  थे  और यह संस्कृति आज भी है।  समृद्धि  की अभिव्यक्ति होती है मकान की भव्यता।  फल्दाकोट में भी समृद्धि  तिबारियों , जंगलेदार मकानों में अभिव्यक्त हुयी है।
आज फल्दाकोट में आलम सिंह पायल की तिबारी - डंड्यळ  की चर्चा करेंगे। दुखंड /तिभित्या  मकान की  पहली  मंजिल पर यह डंड्यळ  है जिसमे केवल तीन  ही स्तम्भ या  सिंगाड़ हैं, ये सिंगाड़ दो ख्वाळ /खोली बनाते हैं।   व सिंगाड़  व मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष  में कोई विशेष नक्कासी /खुदाई नहीं हुयी है। केवल ज्यामितीय अलंकरण हुआ है।  मकान की सीमेंटेड छत  साक्षी है कि मकान 1960  के बाद ही निर्मित हुआ होगा।  मकान में खोली /प्रवेश द्वार तल मंजिल में है उसके सिंगाड़ों  में भी कोई उलेखनीय कल नक्कासी नहीं हुयी है।  एक समय बिन नक्कासी के   भी इस डंड्यळ  की इलाके में हाम थी। 
निष्कर्ष निकलता है कि फल्दाकोट (यमकेश्वर ) के आलम सिंह पायल के डंड्यळ  में काष्ठ  कला सामन्य किस्म की है व कोई विशेषता चर्चा योग्य नहीं है।   
सूचना व फोटो आभार :  सी .पी.कंडवाल व पूर्व प्रधान  फल्दाकोट  बालम  सिंह पयाल
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली   ) काष्ठ  कला अंकन, लकड़ी पर नक्कासी   
अल्मोड़ा में  बाखली  काष्ठ कला  , पिथोरागढ़  में  बाखली   काष्ठ कला ; चम्पावत में  बाखली    काष्ठ कला ; उधम सिंह नगर में  बाखली नक्कासी ;     काष्ठ कला ;; नैनीताल  में  बाखली  नक्कासी  ;
Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of Garhwal , Kumaun , Uttarakhand , Himalaya  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Almora Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Nainital   Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Pithoragarh Kumaon , Uttarakhand ;  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Udham Singh  Nagar Kumaon , Uttarakhand, नक्कासी , काठ खुदाई  ;    कुमाऊं  में बाखली में नक्कासी ,  ,  मोरी में नक्कासी , मकानों में नक्कासी  ;


Bhishma Kukreti

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फल्दाकोट मल्ला (यमकेश्वर ) में केशर सिंह - छप्पन  सिंह पयाल की निमदारी  में काष्ठ कला अंकन  , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , बखाई ,  खोली  ,   कोटि बनाल   )  काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 135
 संकलन -भीष्म कुकरेती

जैसे पहले अध्यायों में  लिखा गया है कि   उदयपुर पट्टी  में फल्दाकोट ब्रिटिश काल से ही कृषि समृद्धि व  ग्रामवासियों  के पुलिस बल में शामिल होने के लिए प्रसिद्ध था।    अधिकतर समृद्धि का प्रतीक मकान होते जाते हैं।  फल्दाकोट में तिबारियों से अधिक निमदारी या जंगलेदार मकान अधिक पाए गए हैं। व अधिकतर निमदारी /जंगलेदार मकान 1946  के पश्चात ही निर्मित हुयी हैं।   पहाड़ी गढ़वाल में  खिड़कीयों लम्बाई चौड़ाई बता सकने में सक्षम होती हैं कि मकान कितना आधुनिक है।  मोरी में केवल  छेद हो तो समझा जाता है प्राचीन व लोहे की छड़ियाँ व बड़ी खिड़की मतलब आधुनिक मकान।
सम्प्रति  आधुनिक श्रेणी  के फल्दाकोट मल्ला के केशर सिंह - छप्पन सिंह पयाल के ढैपुर या  तिपुर  मकान के जंगल में लगी लकड़ी में कला, अलंकरण उत्कीर्णन  व नक्कासी  की विवेचना होगी।   मकान दुखंड /तिभित्या  है व तल मंजिल में आगे के कमरों  को ढका नहीं गया है अपितु बरामदे में बदल दिया गया है , तल मंजिल पर  गारा सीमेंट   के पिलर्स भी मकान के आधुनिकता का बोध कराते हैं।  पहली मंजिल पर छज्जे  (संभवतया सीमेंट का ही ) के ऊपर जंगल बंधा है।   वास्तव में छज्जे को बरामदे में तब्दील किया गया है।
फल्दाकोट मल्ला के  केशर सिंह -छप्पन सिंह पयाल की निमदारी  (जगंले )  में कुल आठ स्तम्भ हैं जो सात  ख्वाळ /खोली बनाते हैं।  स्तम्भ के आधार में ढाई फिट तक दोनों ओर काष्ट पट्टिका लगी हैं जिससे स्तम्भ /खम्बे मोठे दीखते हैं व ऊपर कीओर स्तम्भ सीधी सपाट हैं।
 पहली मंजिल में स्तम्भ , मुरिन्ड। मथिण्ड की कड़ी , छत आधार काष्ठ पट्टिका , कमरों के दरवजों , खिड़की के दरवाजों के  सिंगड़ -मुरिन्ड  में केवल ज्यामितीय  कला , अलंकरण उत्कीर्णन (नकासी ) के ही दर्शन होते हैं , मकान के कसी बगी काष्ठ भाग    में प्राकृतिक , प्रतीकात्मक , मानवीय अलंकरण (motifs ) के दर्शन नहीं होते हैं।
मकान के डिजाइन व बड़े होने के कारण मकान भव्य दीखता है।  ज्यामितीय अलंकरण में कटान सफाई है। 
  निष्कर्ष निकलता है कि फल्दाकोट मल्ला के  केशर सिंह -छप्पन सिंह पयाल की  तिपुर  वाले मकान की निमदारी  में केवल ज्यामितीय कला के सर्शन होते हैं।

सूचना व फोटो आभार : सी पी कंडवाल व बलवंत सिंह पयाल (फल्दाकोट )

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , कोटि बनल  ) काष्ठ  कला अंकन, लकड़ी पर नक्कासी   
  यमकेशर गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;  ;लैंड्सडाउन  गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;दुगड्डा  गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ; धुमाकोट गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला ,   नक्कासी ;  पौड़ी गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;
  कोटद्वार , गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ; फल्दाकोट मल्ला में काष्ठ कला , नक्कासी ; उदयपुर पट्टी में काष्ठ कला , नक्कासी


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  बग्वाली पोखर (अल्मोड़ा ) में मोहन सिंह बिष्ट की 110  साल पुरानी बाखली में काष्ठ  कला 

बग्वाली पोखर (अल्मोड़ा ) मे मोहन सिंह बिष्ट की 110  साल पुरानी बाखली में काष्ठ  कला  , अलंकरण , लकड़ी नक्कासी

कुमाऊं , गढ़वाल,  हरिद्वार ,  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  ( बाखली  तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान  , खोली  ,  कोटि बनाल  )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 134
 संकलन - भीष्म कुकरेती
 -
प्रोफेसर मृगेश पांडे अनुसार बाखली का अर्थ होता है  कि ---  एक जाति बिरादरी के लोग  एक  दूसरे  से जुड़े  एक कतार में घर बनाते है तो उसे बाखली  कहते हैं व  बाखली  के सभी घरों की धुरी  एक ही सीध में होती है।  अधिकतर मकान दो मंजिले  दोपुर या तिपुर होते हैं व  घर एक बराबर ऊँचाई  में होते हैं।  मोहन बिष्ट अनुसार बाखली का पर्यायवाची शब्द बखाई भी है। 
    भैया दूज के दिन  धार्मिक मेले हेतु प्रसिद्ध बग्वाली  पोखर में कई बाखली या बखाई थीं।  सम्प्रति , आज अल्मोड़ा के द्वारहाट क्षेत्र में बग्वाली पोखर में मोहन सिंह बिष्ट परिवार का 110 साल से अधिक पुराने दुपुर (1 +1 ) बखाली  में  काष्ठ  कला व काष्ठ अलंकरण अथवा लकड़ी में नक्कासी की विवेचना होगी। सन  1915  में इस बाखली के मध्य पोस्ट ओफिस था व आज भी पोस्ट ओफिस इसी स्थान में बगल वाले मकान में स्थानन्तरित हुआ  है। 
बाखली /बखाई  दुखंड /दुभित्या (एक कमरा अंदर व एक कमा बाहर ) है व  लगता है  या तो गौशाला रूप में प्रयोग होता था या भंडारीकरण  हेतु  उपयोग होता रहा होगा /है।  काष्ठ कला या काष्ठ अलंकरण उत्कीर्णन दृष्टि से तल मंजिल में कोई विशेष काष्ठ  वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती है।  पहली मंजिल में भी स्तम्भ छोड़कर दास (छज्जा को आधार देने वाली संरचना) , छत आधार पट्टिका में सीधा सपाट  कटान ही है । 
दोनों मकानों में कुल  32  या अधिक स्तम्भ /सिंगाड़ /खम्भे हैं व उनसे 31  ख्वाळ /खोली बनते हैं।  ख्वाळ /ख्वाल  के निचले भाग में ढाई फिट तक स्तम्भ के दोनों ओर काष्ठ पट्टिकाएं लगीं है जिससे स्तम्भ मोटा दीखता है व यहीं से स्तम्भ ऊपर की ओर बढ़कर सीधे मुरिन्ड /मथिण्ड   या छत के नीचे पट्टिका के नीचे शीर्ष  वाली कड़ी से मिल जाते हैं।  शीर्ष कड़ी से नीचे स्तम्भों में कटान नुमा आकृति उत्कीर्ण हुयी है।   छज्जे से ढाई फिट ऊपर तक  रेलिंग व निम्न भाग पर पट्टिका लगी हैं। , इन पट्टिकाओं में ज्यामितीय ढंग से  आयताकार आकृति  उत्कीर्ण (carved ) हुयी है।   कुश ख्वाळ  पूरे के पूरे लकड़ी की पट्टिका से ढके हैं जैसे दरवाजे होते हैं।  इन ख्वाळों  /खोलियों की पट्टिकाओं में त्रिभुजाकार या आयताकार अंकन /कटान हुआ है व अंकन नयनाभिरामी हैं।  सभी ख्वाळों  के पपोरे पट्टिकाओं या आधार पर ढाई फिट तक की पट्टिकाओं में सभी में एक सामंता है।
कला दृष्टि से पूरे  बाखली या मकान में लकड़ी के काम में सामंजस्य है, एकरुपता, एकरसता से छुटकारा , अनुपूचारिक  व औपचारिक संतुलन ;  कटान में अनुपात का ध्यान ,  गति , कुछ भागों का  अनायास ही ध्यान खिंचाऊ होना , आकार व डिजाइन सिद्धांत  का प्रयोग बखूबी हुआ है।
  कुमाऊं  के अन्य भागों की तुलना में मोहन सिंह बिष्ट की बाखली में प्राकृतिक व मानवीय अलकंरण  /नक्कासी नहीं है किन्तु  मकान बड़ा होने व स्तम्भों के कटान ने मकान की सुंदरता में चाँद लगा दिए हैं। 

सूचना व फोटो आभार : दीपक मेहता , अल्मोड़ा

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली, कोटि बनल    ) काष्ठ  कला अंकन, लकड़ी पर नक्कासी   
अल्मोड़ा में  बाखली  काष्ठ कला  , पिथोरागढ़  में  बाखली   काष्ठ कला ; चम्पावत में  बाखली    काष्ठ कला ; उधम सिंह नगर में  बाखली नक्कासी ;     काष्ठ कला ;; नैनीताल  में  बाखली  नक्कासी  ;
Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of Garhwal , Kumaun , Uttarakhand , Himalaya  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Almora Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Nainital   Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Pithoragarh Kumaon , Uttarakhand ;  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Udham Singh  Nagar Kumaon , Uttarakhand ;    कुमाऊं  में बाखली में नक्कासी ,  ,  मोरी में नक्कासी , मकानों में नक्कासी  ;


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  कोटि बनाल   गांव  में    300 साल पुराने मकान में काष्ठ कला

कोटि बनाल  ( बड़कोट उत्तरकाशी  ) में कोटि बनाल  शैली में निर्मित  300 साल पुराने मकान में काष्ठ कला , अलंकरण  ( नक्कासी )

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  ( कोटि बनाल    , तिबारी , बाखली , खोली  )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 132
  (लेख अन्य पुरुष में हैं जी श्री है प्रयोग हुए हैं )   
 संकलन - भीष्म कुकरेती
 -
 
  इस मकान की कला देख कर कहा जा सकता है कि  कला की परिभाषा 1 +1 = 2  या 1  +1  =11  वाले सिध्दांत से नहीं अपितु  कला की परिभाषा 1 +1  = अनंत से   परिभाषित होनी  चाहिए
इस मकान का  चित्र की सूचना भेजते समय हिमालयी संस्कृति वेत्ता राजेंद्र बडवाल       ने  लिखा  कि उत्तरकाशी जिले के  राजगढ़ी  तहसील में  बड़कोट में मकान की कोटि बनाल शैली   के कारण ही गांव का नाम  कोटि बनाल पड़ गया है। कोटि बनाल के निकटवर्ती गांव हैं गैड , बखरेती , घंडाला आदि।   मकान 300  साल पुराना है व कभी यहां सात आठ  परिवार रहते थे अब पूरा गाँव बस गया है।  मकान को देखने देश विदेशों से सैलानी आते रहते हैं।  कोटि बनाल शब्द वास्तव में  संस्कृत जोड़ शब्द काष्ठ  कोण   से निकला है जिसका अर्थ होता है लकड़ी का कोना। कोटि बनाल का सीधा अर्थ है दीवार के कोने में  लकड़ी  का ही प्रयोग।  यह मकान सात मंजिला है (1 +6  ) .
    ऐसे भवन 900 साल तक भी खड़े रह सकते हैं व जलवायु रोधी तो हैं ही भूकंप रोधी भी हैं।  यही कारण कि कुछ सालों पहले तक उत्तरकाशी व जौनसार बाबर में कोटि बनाल शैली के मकान ही निर्मित होते थे।  देवदारु की लकड़ी १००० साल तक जलवायु को झेलने में सक्षम होती है व मकान की दीवारें देवदारु लकड़ी की बलि या कड़ी व रेड़ी  हैं तो जलवायु व भूकंप दोनों के रोधी बन जाते हैं।  मकान आयताकार प्लेटफार्म पर बनाये जाते हैं व एक तह  देवदारु की  लकड़ी की व दूसरी तह रेडी (पत्थर ) की होती है।  ऐसे बहु मंजिले मकान में गीली मिट्टी का मस्यट  प्रयोग नहीं होता है तो जलवायु के प्रभाव से अछूते रह जाते हैं ऐसे  मकान।  मकान जैसे जैसे ऊँचा होता जाता है पत्थर की मात्रा कम होती  जाती है व लकड़ी बढ़ता जाता है।  या पत्थर का भार अधिक हो तो  लकड़ी का भार  कम हो जाता है।  अंदर की दीवारों व नीचे    फर्श में मिट्टी  से  /लिपाई प्लास्टरिंग होती है । 
   अधिकतर मकान दुखंड या दो इकाईयाँ वाले होते हैं।  कोटि बनाल बनाते समय अधिकतर  तल मंजिल में खड़कियाँ नहीं होती और एक प्रवेश द्वार होता है ,  कोटि बनाल शैली के मकान गढ़वाल    के चार -छह खम्बों के ऊपर  आधार में चौकोर  बुसुड़ /मचान नुमा आकृति के होते हैं।
 इस प्रस्तुत मकान में  चार मंजिल तक सपाट  ज्यामितीय कला अंकन है व  विशेष नक्कासी के दर्शन ही होते हैं।  तल मंजिल में दो   द्वार हैं व सिंगाड़ व मुरिन्ड में  ज्यामितीय कला  छोड़कर  कोई  अन्य प्रकार का अलंकरण नहीं है।  यही हाल   चौथी   मंजिल  तक है।  बीच में दूसरे व तीसरे मंजिल में  झरोखे हैं।   छटी   सातवीं मंजिल में वास्तविक कला दर्शन होते हैं।   छटा  व सातवें  मंजिल नीचे वाले भाग से चौकोर में बड़े हैं व ूपी मंजिलों में कई प्रकार  की कला दृष्टिगोचर होते हैं। मकान के ऊपरी भाग कला दृष्टि से अपने उच्चतर स्तर पर पंहुचता है।   मंजिलों में ज्यामितीय कला व अनंत निराकारी  (abstract ) धरातल पर पंहुच जाता है कला है किन्तु दर्शक इसका वर्णन   करने में  अपने को असक्षम पाता  है। छटे  मंजिल में दरवाजों के बाहर दीवालगीर /ब्रैकेट हैं जो  कलायुक्त   हैं।  ऊपरी मंजिलों के मध्य बिभाजिय लकड़ी की कड़ियों व झालरों व जंगले नुमा आकृतियां है जो  नक्कासी  की लाजबाब मिसाल हैं।  कोई जटिलता  नहीं   है  तब भी  काष्ठ कला दर्शक को आश्चर्य में डालने में सक्षम  है।
 एक मत है कि उत्तरकाशी का यह इलाका  प्राचीन समय में  गढ़वाल को  काष्ठ  कला निर्यात  (concept  and  Material ) करने  हेतु प्रसिद्ध था।  एक अनुमान अनुसार उत्तरकाशी का प्रभाव जौनपुर काष्ठ कला पर पड़ा व जौनपुर का प्रभाव टिहरी पर व टिहरी का प्रभाव इतर क्षेत्रों में पड़ा।  हाँ इसमें बिबाद हो सकता है कि  यदि उत्तरकाशी की मकान कला का प्रभाव गढ़वाल के  अन्य क्षेत्रों में पड़ा  होता तो  प्राचीन काल में क्यों नहीं गढ़वाल के अन्य भागों में लकड़ी के मकानों का प्रचलन हुआ।
   निष्कर्ष निकलता है कि राजगढ़ी  के कोटि बनाल गाँव के इस बहु  मंजिला मकान की कला  अविस्मरणीय  है व  शब्दों की जगह देखने   में ही लाभ है या शायद अभी तक   विशेष शब्दावली  प्रकाश में नहीं  आयी जो आम पाठकों के  से रूबरू करा सके।   आशा है कि  यह लेखक  धीरे धीरे इन स्थानीय  शब्दावली बटोरेगा व स शब्दावली को पर्थकों के सामने लाएगा।   

सूचना व फोटो आभार :  हिमालयी संस्कृति प्रचारक  राजेंद्र बडवाल

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 Koti Banal House Wood carving art in Jaunsar Dehradun ; Koti Banal House Wood carving art in Jaunsar , Uttarkashi;  Koti Banal House Wood carving art in Jaunsar, Chakrata;     Koti Banal House Wood carving art in Jaunsar, Kalsi;  Koti Banal House Wood carving art in Jaunsar Devdhar;  Koti Banal House Wood carving art in Jaunsar , Bharam ;  Koti Banal House Wood carving art in  Tyuni, Jaunsar ;   कालसी जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ;    त्यूणी जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ;     चकरोता जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल बनाल ;  बड़कोट   जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ;     भरम जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ;   जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ;  हनुमानचट्टी   जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ;  यमुनोत्री   जौनसार में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  कोटि बनाल ; 


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  तिमली में  विद्वान बद्री  दत्त  डबराल   परिवार की तिबारी व जंगलेदार निमदारी  में काष्ठ  कला , नक्कासी

गढ़वाल, कुमाऊं , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार मकान , बाखली , , मोरियों , खोलियों,  कोटि बनाल , छाज    ) काष्ठ कला, नक्कासी   - 131
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

  पहले ही कहा जा चूका है कि पौड़ी गढ़वाल के द्वारीखाल ब्लॉक के तिमली  गाँव के बारे में प्रसिद्ध था कि वहां के गोर बछर भी संस्कृत में बचियाते हैं।  इस  लोक कथ्य का साफ़ अर्थ था कि १८८८ के लगभग संस्कृत स्कूल खलने से तिमली में संस्कृत विद्वानों की झड़ी लगती गयी।  प्रस्तुत दो भवनों के मालिक भी संस्कृत के प्रकांड विद्वान् परिवार था यथा  -बद्री  दत्त डबराल , आचार्य ललिता प्रसाद डबराल , ईश्वरी दत्त डबराल व डा. गोवर्धन  प्रसाद डबराल से संबंधित है।  आज की पीढ़ी के हिसाब से आशीष डबराल के परिवार का यह पुरातन घर है जिसमे तिबारी व जंगलेदार निमदारी है।  अब इस जगह पर बिलकुल न्य भवन खड़ा हो गया है किंतु कोशिस की गयी कि प्राचीन कला तंतु बरकरार रहें।
विद्वान बद्री दत्त डबराल परिवार के मकानों में काष्ठ कला याने लकड़ी  पर नक्कासी समझने हेतु मकानों को तीन भागों में बाँटना होगा
१- तिबारी वाले मकान में खोली व तिबारी में काष्ठ कला /लकड़ी पर नक्कासी
२- इसी तिबारी के ऊपर तीसरे मंजिल  में जंगले में लकड़ी पर खुदाई
३- बिन तिबारी वाले भवन में जंगले में काष्ठ कला अलंकरण /लकड़ी पर नक्कासी
      -: तिबारी वाले मकान में काष्ठ कला , लकड़ी में नक्कासी :-
 खोली /प्रवेशद्वार  में काष्ठ कला:-  विद्वान् बद्री दत्त डबराल परिवार के तिपुर (1 =2 ), दुखंड /तिभित्या  मकान  में तल मंजिल में खोली दर्शनीय थी जिसे अब नए रंगों से उसी अवस्था में लाने का प्रयत्न किया गया है।  खोली के आंतरिक सिंगाड़ /स्तम्भ व आंतरिक रिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष  में केवल ज्यामिति अंकन /नकासी  हुआ है।  जबकि बाह्य सिंगाड़ों व मुरिन्ड के बहरी वाली पट्टियों में पर्ण -लता व  ज्यामिति कला का अंकन हुआ है।  मुरिन्ड /मथिण्ड  के मध्य बहुदलीय शगुन प्रतीक पुष्प विराजमान है।
मध्य मंजिल में तिबारी में कष्ट कला अंकन या नक्कासी:-   विद्वान् बद्री दत्त डबराल के मकान के मध्य मंजिल में चार स्तम्भ व तीन ख्वाळ /खोली /द्वार की तिबारी स्थापित हैं।  छज्जे पर स्थित तिबारी के प्रत्येक स्तम्भ में कला अंकित  है व ढांगू उदयपुर की अन्य तिबारियों के स्तम्भों जैसा  ही है ।  आधार पर उलटा कमल फूल से कुम्भी आकर निर्मित होता है फिर  ड्यूल है , इसके ऊपर सीधा खिला कमल फूल की आकृति अंकित है व यहाँ से स्तम्भ की मोटाई गोलाई में  धीरे धीरे कम होतो जाती है व एसबीएस एकम मोटाई स्थल पर ड्यूल है व उसके ऊपर खिला कमल फूल है ज जहां से स्तम्भ में थांत (bat blade type ) के ऊपर नयनाभिरामी नक्कासी दार दीवालगीर (ब्रैकेट ) हैं। 
 दीवालगीर में नक्कासी :- विद्वान बद्री दत्त डबराल परिवार की इस तिबारी के दीवालगीर में उम्दा नक्कासी हुयी है। दीवालगीर में फूल की  नली  व मोटी  कली का अग्र   भाग की आकृति में पक्षी की चोंच भी है एक एक पक्षी भी अंकित हुआ है
चिड़िया के शरीर पर भी नक्कासी हुयी है।  दूसरी मंजिल के छज्जे के लकड़ी के आधार से शंकु नुमा आकृतियां लटक रही हैं।
विद्वान् बद्री दत्त डबराल परिवार के इस मकान में दूसरी मंजिल पर जंगला बंधा था जो कि  दुसरे बिन तिबारी के मकान  जैसा ही है  तो उसी पर चर्चा निम्न तरह से होगी। 
विद्वान बद्र दत्त डबराल परिवार के दुसरे मकान के दूसरी मंजिल में लकड़ी के जंगले पर नक्कासी:-  विद्वान डबराल परिवार के दुखंड , दुभित्या ,  तिपुर  वाले दूसरे मकान के दूसरी मंजिल पर उसी तरह का जंगला बंधा है जैसे तिबारी युक्त मकान के दूसरी मंजिल में है।   
 जंगला लकड़ी के छज्जे पर स्थापित है व इस जंगले  में आठ स्तम्भ है जिनके शीर्ष /मुरिन्ड में मेहराब हैं याने कुल आठ स्तम्भ व सात मेहराब /तोरण हैं।   प्रत्येक स्तम्भ का आधार मोटा है व उस पर सांतर कटान से नक्कासी हुयी है।  दो ढाई फिट तक स्तम्भ के दोनों ओर पट्टिकाएं फिट की गयीं हैं।  ध्यि फिट पर ही लकड़ी का रेलिंग है।  स्तम्भ जब मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष के निकट पंहुचता है तो स्तम्भ में  ड्यूल व कमल दल की न्यूना छवि की खुदाई है (कम महत्वपूर्ण ) . यहां से स्तम्भ का थांत भी शुरू होता हिअ व मेहराब का एक भाग /अर्ध चाप भी शुरू होता है।  मेहराब में नकासी हुयी है व त्रिभुजों के किनारे पर एक एक बहुदलीय सत्य मुखी नुमा पुष्प खुदा है।  मेहराब के लकड़ी वाले हिस्से में प्राकृतिक कला /अलंकरण के चिन्ह दिख रहे है किन्तु क्या थे मिट गए हैं।  विद्वान् बद्री दत्त परिवार के मकान के  दूसरी मंजिल का काष्ठ जंगला  (निमदारी ) शानदार रहा होगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती व अवश्य ही तिमली ही नहीं डबरालस्यूं की शान  रहे होंगे ये दोनों मकान। 
निश्सकर्ष निकलन सरल है कि  विद्वान बद्री दत्त दरबाल परिवार के दोनों मकानों में भव्य काष्ठ कला अंकन / नक्कासी  हुयी है व तीनों किस्म का अलंकरण हुआ है ९प्रकृतिक, ज्यामितीय व मानवीय ) . दोनों मकान अपने नकासी के लिए प्रसिद्ध थे। 
आशीष डबराल की सूचना  अनुसार अब दोनों मकान ध्वस्त कर दिए गएँ है लगभग इसी तर्ज पर नए मकान बने हैं

सूचना व फोटो आभार : जग प्रसिद्ध संस्कृति  फोटोग्राफर बिक्रम तिवारी
सहयोगी सूचना : आशीष  डबराल
* यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी . मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं .
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गढ़वाल, कुमाऊं , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार मकान , बाखली i , मोरियों , खोलियों,   काठ बुलन, छाज    ) काष्ठ कला, नक्कासी   अगले अध्याय में 
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         -: 130 वीं कड़ी:

 हेरवाल  ( टिहरी गढ़वाल ) में मुकुंद सिंह रावत  परिवार की भव्यतम  जंगलेदार  निमदारी में काष्ठ कला अंकन  , नक्कासी

 
गढ़वाल, कुमाऊं , देहरादून , हरिद्वार ,  उत्तराखंड  , हिमालय की भवन  (तिबारी, जंगलेदार निमदारी  , बाखली , खोली , मोरी , कोटि बलान  ) काष्ठ , अलकंरण , अंकन , लकड़ी नक्कासी  )    130   


संकलन - भीष्म कुकरेती
कुछ समय पहले टिहरी गढ़वाल के प्रतापनगर ब्लॉक में उपली  रमौली में  हेरवाल गाँव मुकंद सिंह रावत के भव्य जंगलेदार निमदारी के करां प्रसिद्ध था व आज ग्रेन  मेन्टोरिंग  के संस्थापक  वीरेंद्र रावत के कारण भी प्रसिद्ध है।  वीरेन्द ररावत मुकंद सिंह रावत के सुपुत्र हैं।
   हेरवाल गांव के मुकुंद सिंह रावत का जंगलेदार निमदारी दुपुर है दुखंड / तिभित्या है।  इस मकान में  पहली मंजिल पर आने के लिए बाहर से सीढ़ियां हैं।  मकान 24 कमरों का भव्य मकान है।  तल मंजिल में 5   काष्ठ से बंद बरामदे हैं व काष्ठ पर सलीकेदार ज्यामितीय कला अंकन /नक्कासी के साफ़ साफ़ दर्शन होते हैं।  इसी तरह  पहली मंजिल पर भी 5 काष्ठ/लकड़ी   से बंद बरामदे या डंड्यळ /बैठक हैं व उन दरवाजों में लकड़ी की ज्यामितीय नक्कासी बार बार आँखों को आकर्षित करती है।
  पहली मंजिल में  छज्जे में निमदारी फिट है।  छज्जे के ऊपर 21 स्तम्भ खड़े हैं जो सीधे  छत आधार पट्टिका से मिलते हैं।  निमदारी के 21  के 21 स्तम्भ वास्तव में आम तिबारियों के स्तम्भ से लोहा लेते हैं।  प्रत्येक स्तम्भ के आधार में ऊँचा लम्बा लटका कमल फूल जैसा है , इस आधार के ऊपर ड्यूल है फिर कुछ कुछ सीधे खिले कमल फूल की आकृति में स्तम्भ है, यहां  से  स्तम्भ की गोलाई में मोटाई कम होती जाती है व जहां पर सबसे कम मोटाई है वहां फिर ड्यूल है व सीधा लघु पद्म दल आकृति है व वहां से स्तम्भ दो भागों में बंट सा जाता है।  स्तम्भ का सीधा भाग स्तम्भ थांत (bat blade type ) की आकृति धारण कर ऊपर शीर्ष /मुरिन्ड /मथिण्ड  से मिल जाता है।  दूसरी ओर मेहराब के एक चाप का हिस्सा बनता है जो आगे जाकर दुसरे स्तंम्भ के अर्ध चाप से मिलकर पूरा मेहराब या तोरण  (arch ) बनता है।  मेहराब तिपत्ति (trefoil ) नुमा है व मेहराब के बाहर त्रिभुज आकृति में पर्ण -लता (पत्तियां -लता या फूल /बेल बूटे ) की नक्कासी हुयी  है। संभवतया त्रिभुजा कार आकृति के किनारों पर एक एक फूल भी खुदा था।  मेहराब व स्तंभ थांत  ऊपर छत आधार पट्टिका से मिलते हैं।  छत आधार पट्टिका व भर की ओर  वर्षा बचो पट्टिका में भी कलाकारी हुयी है व मकान की सुंदरता बढ़ाने में कामयाब हुए हैं।
 स्तम्भ के दो दो फिट ऊंचाई तक लकड़ी की ही रेलिंग लगी है। व आँखों को आकर्षित करने वाला ज्यामितीय जंगला भी सधा है।
 निष्कर्ष निकलता है कि  टिहरी गढ़वाल के हेरवाल गांव में मुकुंद सिंह रावत परिवार की निमदारी भव्यतम निमदारियों में गिनी जाएगी जो आकर में बड़ी तो है ही स्तम्भों में नक्कासी  की  दर्शनीयता  से भी नायब  से नायब निमदारी  मानी जाएगी। 
  शिल्प का नयनाभिरामी नमूना है मुकुंद सिंह रावत परिवार की भव्यतम निमदारी।  मकान के शिल्पी व लकड़ी के शिल्पकार किस गाँव के थे के बारे में अभी तक सूचना नहीं मिल सकी है। 


  सूचना व फोटो आभार :  वीरेंद्र रावत , हेरवाल

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 गढ़वाल, कुमाऊं , देहरादून , हरिद्वार ,  उत्तराखंड  , हिमालय की भवन  (तिबारी, जंगलेदार निमदारी  , बाखली , खोली , मोरी कोटि बालन   ) काष्ठ , अलकंरण , अंकन लोक कला ( तिबारी  - 
Traditional House Wood Carving Art (in Tibari), Bakhai , Mori , Kholi  )  Ornamentation of Garhwal , Kumaon , Dehradun , Haridwar Uttarakhand , Himalaya -
  Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of  Tehri Garhwal , Uttarakhand , Himalaya   -   
घनसाली तहसील  टिहरी गढवाल  में  तिबारी , भवन काष्ठ कला , नक्कासी ;  टिहरी तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला , तिबारी ,नक्कासी ;   धनौल्टी,   टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, लकड़ी तिबारी ,नक्कासी ;   जाखनी तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला तिबारी , , नक्कासी ;   प्रताप  नगर तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, नक्कासी ;   देव प्रयाग    तहसील  टिहरी गढवाल  में तिबारी , भवन काष्ठ कला, नक्कासी ; House Wood carving Art from   Tehri;     


Bhishma Kukreti

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       100  वीं  कड़ी     
ईड़ा   गाँव (एकेश्वर ) में सिपाई नेगियों  के गौरवपूर्ण   क्वाठा  में काष्ट  कला विवेचना
(  वीरांगना तीलू रौतेली  का सगाई भवन   )

पौड़ी गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला  श्रृंखला
  गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखई, खोली , छाज   ) काष्ठ अंकन लोक कला -100

(लेख अन्य पुरुष में है जी श्री का प्रयोग नहीं है )     
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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    (उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला अंकन   श्रृंखला का यह 100 वीं  किस्त  है।  तो कुछ त्यौहार मनाना चाह रहा था।  दो तीन दिन पहले ही फेसबुक मित्र उमेश असवाल के चार पांच  फोटो  व सूचना भेजी थीं जिसमे एक फोटो में  प्रसिद्ध गाँव इड़ा   गाँव के सिपाई नेगियों के क्वाठा का बिलकुल भग्न  प्रवेश द्वार व इसी क्वाठा  का अंदरूनी भाग की फोटो भी भेजी थी।  भग्न प्रवेश द्वार के बारे में उमेश ने सूचना दी कि  लकड़ी के द्वारों को दीमक खा गयी है तो ...  ।  साथ में  उमेश असवाल सूचना दी थी कि इसी घर में तीलू रौतेली की मंगनी हुयी थी।
मुझे  लगा कि भवन काष्ठ कला  100 वीं  क़िस्त में इसी तिबारी भवन  विवेचना से बड़ी बात क्या हो सकती थी।  किन्तु दो समस्याएं थीं एक तो  सिंह द्वार फोटो पर कोई ऐसी निशानी न थी कि  क्वाठा भितर   लगे व मुझे तीलू रौतेली का ससुराली  गाँव की कोई जानकारी  न थी।    इस पर मनोज इष्टवाल याद आये कि कभी तीलू रौतेली संबंधित  ट्रैवलॉग सर्कुलेट किया था।  मैं   गूगल बाबा  की शरण में गया व ईड़ा , तीलू रौतेली व इष्टवाल की शब्दों से खोज आरम्भ की और और बांछित फल भी मिल गया   कि  जिस क्वाठा  के द्वार का अब पता नहीं केवल खंडहर है उसकी तस्वीर इष्टवाल के इंटरनेट लेख में मिल गयी। इष्टवाल  का लेख तो बड़ा खजना है पौड़ी गढ़वाल के वास्तु इतिहासकारों के लिए। यदि मनोज इष्टवाल समय रहते इस क्वाठा प्रवेशद्वार का दस्तावेजीकरण  नहीं करते तो पता ही न चलता कि  इड़ा  में इतना बड़ा किला था।  यही मैं   सबसे प्रार्थना  कर रहा हूँ कि  पहाड़ों की तिबारियां , बखाई , खोली , छाज सभी एक दिन समय की मांग  के कारण  या साझी मिल्कियत के कारण ध्वस्त हो जाएँगी यदि फोटो व विवरण से इंटरनेट में दस्तावेजीकरण हो जाय तो आगे किपीढ़ियों के लिए पहाड़ी भवन संस्कृति समझने में सरलता होगी।  इष्टवाल के लेख में फोटो ने यह सिद्ध कर दिया कि  मैं सही पथ पर हूँ।
   चूँकि मैं ना तो  कला  जानकार हूँ न ही वास्तु इतिहासकार कि महलों /किलों आदि की वास्तु कला पर हाथ आजमाऊँ ना ही मेरी उम्र इतनी है कि मैं अपने लिए दस बीस साल के लिए काम सजा के रखूं . इसलिए मैं इड़ा के इस ऐतिहासिक क्वाठा के महल नुमा आकृति पर आज नहीं  लिखूंगा अपितु केवल अंदर मकान के अंदर तिबारी या निमदारी नुमा आकृति पर ही  'की बोर्ड पुश' करूंगा  (कलम चलाऊंगा  )  . इड़ा सिपाई  नेगियों के क्वाठा  प्रवेश द्वार पर फिर कभी प्रकाश डालूंगा जब  मैं कुछ महलों की कला भाषा /परिभाषिक शब्दों को समझ लूंगा . )
   सिपाई नेगियोंके क्वाठा भितर  के अंदरूनी निमदारी /तिबारी में काष्ठ कला :-
मकान अंदर से हवेली नुमा है याने तीनों और कमरे व बीच में आँगन व सामने द्वार।  अंदर सामने के  भाग में पहली मंजिल में बड़ी निमदारी या तिबारी है , जो  तीनो ओर  है। 
सामने तेरह या चौदह स्तम्भ हैं व पड़े (90 अंश ) में दोनों ओर   चार चार स्तम्भ हैं।  स्तम्भों में प्राकृतिक कला  अलंकरण के छाप  दीखते  तो है किंतु क्या थे उनका फोटो में अभी पता चलना कठिन है। उबर के कमरों के दरवाजों पर भी कला अंकित है और फोटो में साफ़ दिखाई नहीं देती हैं।
वास्तव में सिपाई नेगियों के क्वाठा  में काष्ठ  कला बाह्य प्रवेश द्वार पर अधिक उभर कर आयी है बनिस्पत अंदरूनी भाग के।   
मकान चूँकि किला है  तो भवन का बड़ा होना लाजमी है।  किला कब निर्मित हुआ की कोई सूचना नहीं है।  बड़े भवन होने से ही भव्यता आयी है। 
चूँकि भवन का नाम सिपाई नेगी के नाम  से है तो निश्चित है कि भवन  1886   से पहले तो नहीं निर्मित हुआ है क्योंकि  गढ़वाल में वास्तव में सिपाई नाम लैंसडाउन छावनी  स्थापना 1886 के बाद  ही अधिक प्रचलित हुआ।  1857  के बाद में सिपाई शब्द भारत में प्रचलित हुआ। 
 भविष्य अगली किसी कड़ी   में क्वाठा  के प्रवेश द्वार पर पकाश डाला जायेगा।   

सूचना व फोटो आभार :   उमेश असवाल व  मनोज इष्टवाल
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
 Traditional House wood Carving Art of  Pauri   Garhwal  Uttarakhand , Himalaya   to  be  continued
  पौड़ी गढ़वाल  तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बखाइयों ,खोली  में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण  श्रृंखला  जारी
  गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखई  ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन ) श्रृंखला जारी   - 
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya  to  be  continued   


 

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