Author Topic: House Wood carving Art /Ornamentation Uttarakhand ; उत्तराखंड में भवन काष्ठ कल  (Read 13229 times)

Bhishma Kukreti

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तिमली में  वाड़  (मचान  ) में  काष्ठ कला : याने सरलतम सरलता में खुबसूरती , सुंदरता 

गढ़वाल, कुमाऊं , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार मकान , बाखली , , मोरियों , खोलियों,  कोटि  बनाल  , छाज    ) काष्ठ कला, नक्कासी   - 143-
 संकलन - भीष्म कुकरेती
तिमली   (द्वारीखाल ब्लॉक ,पौड़ी गढ़वाल ) में आधुनिक वाड़ छोप (मचान ) देख कर सहर्ष ही बोल निकल जाते हैं सरलतम को ही सबसे सुंदर कला कहते हैं क्योंकि सरल निर्माण सबसे कठिन होता है। 
  वाड़ वास्तव में कोई एक छपरा या भवन का  अपितु वाड़ धरण  का अर्थ है खेतों की जंगली जानवरों से बचत करना।  वाड़ बिना किसी छोप .shed  के भी हो सकता है , आदमी एक दो घंटे खेतों में खड़ा रहे व आवाज देता रहे या कनस्तर या डमरू बजाते रहे।  अधिकतर  वाड़  धरण में  छाया या छोप के लिए पुराने पल्ल  प्रयोग होते थे।  इस लेखक ने बहुत कम देखा कि वाड़ धरण  के लिए   छाया /छोप हेतु कोई विशेष अलग से  मचान या झोपड़ी बने।  किन्तु आज  परिश्थितियां  बदल गयीं हैं।  विस्तृत खेती हेतु मचान बनवाने आवश्यक हो गए हैं और उदाहरण है तिमली में बने आधुनिक मचान .
तिमली के वाड़ छोप (मचान ) बहुत ही सरल है इसीलिए त्वरित आकर्षित करने में सफल है यह वाड़ .   
तिमली में इस वाड़  /मचान  को उठाने  हेतु  चार स्थंलों में कुल आठ दस खाम  या खम्बे  भूमि में गाड़े गए हैं , फिर इन खामों /ख्म्भों में  लकड़ी का  बैठ्वाक तल  (पहली मंजिल ) धरा गया है। बैठ्वाक तल के बाहर नीचे  खम्बो के ऊपर सुंदर मजबूत  लकड़ी के कड़ियाँ भी है।  बैठ्वाक तल लकड़ियों की  बारीक  कड़ियों से बना है।  बैठ्वाक को छाया  देने हुतु  ऊपर  छप्परिका है , छप्परिका भी लकड़ियों की  लट्ठों से बनी है व  बैठ्वाक के ऊपर दीवारें  हैं, दीवारों में खोली/झांकने हेतु छेद  भी है ।  दीवारों के ऊपर छप्परिका  आधार स्थापित है व छप्परिका शानदार बनी है। मचान बनाने में केवल ज्यामितीय कला का उपयोग हुआ है।  भूमि से बैठ्वाक  म  जाने  हेतु लकड़ी की ही सीढ़ियां हैं। 
वाड़ सीधा साधा बना  इसकी सरलता ,  सीधी साधी बनावट ही इस मचान की सुंदरता का जड़ है।
 तिलमि में खेतों के ऊपर  जंगली जानवरों से  फसल की रक्षा हेतु निर्मित इस मचान  को देखकर बिलकुल कहा जा सकता है कि सुंदरता सरलता /सरलतम बनावट में होती है ना कि जटिल बनावट में।  तिमली का वाड़ /मचान सरलता का दूसरा नाम सुंदरता होता है। 
 इस  वाड़   /मचान  बनाने वाले शिल्पकारों के नाम  की सूचना  आनी   बाकी है .

सूचना व फोटो आभार :  आशीष डबराल, तिमल
* यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी . मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं .
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Wood Art in Machan of Timli Dabralsyun 
गढ़वाल, कुमाऊं , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार मकान , बाखली i , मोरियों , खोलियों,   कोटि  बनाल  , छाज    ) काष्ठ कला, नक्कासी   अगले अध्याय में 
  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , नक्कासी , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , नक्कासी , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला  , नक्कासी 

Bhishma Kukreti

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बागोरी गाँव (नेलांग घाटी ) में एक मकान में काष्ठ  कला

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , कोटि बनाल )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 144

 संकलन - भीष्म कुकरेती
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उत्तरकाशी में स्थित नेलांग घाटी को उत्तराखंड का लद्दाख भी कहा जाता है।  टीबत सीमा पर नेलांग घाटी में बागोरी गाँव है जो छह महीने   नीति  माणा  तरह  बीरान रहते हैं  और रहवासी सर्दियों में निचली जगहों में स्थानन्तरित हो जाते हैं।  बागोरी  को यात्रियों के लिए  2015 में ही खोला गया  भी विदेशियों के लिए यहां  नही आ सकते हैं  व भारतीय भी परमिट ले कर ही यहाँ यात्रा कर सकते हैं।
  बागोरी में लगभग 150  घर हैं जो लकड़ी से ही बने हैं। यद्यपि  कंक्रीट सीमेंट ने बागोरी पर कब्जा शुरू कर दिया है फिर भी अधिसंख्य मकान  तिब्बती शैली में काष्ठ भवन ही हैं।   ऊंचाई , अत्तयधिक शीत व भुकम्प संवेदनशील क्षेत्र होने से बगोरी  में मकान लकड़ी के निर्मित होते थे व  मकानों के तल मंजिल जानवरों या भंडार  सुरक्षित होते हैं व मनुष्य पहली मंजिल पर ही रहते हैं।   जौनसार , रवाईं क्षेत्र के काष्ठ भवनों व बागोरी के काष्ठ भवनों में अंतर् है कि बागोरी के भवन अधिकतर एक  दुपुर हैं जबकि   पारम्परिक  जौनसारी  भवन  बहु मंजिले होते हैं।  जहां जौनसारी भवनों में लकड़ी के बौळी व कड़ियों के मध्य रोड़ी  से दीवालें बनती हैं  बागोरी के लकड़ी के  दीवारों के निर्माण में  पत्थर व मिट्टी  प्रयोग नहीं होते हैं , बागोरी में हिन्दू व बौद्ध दोनों पंथ के परिवार रहते हैं। 
  आज बागोरी के एक विशेष   डेढ़ पुर भवन में काष्ठ कला , अलंकरण , लकड़ी नक्कासी पर चर्चा होगी।  भवन भूतल से चार  पांच फ़ीट ऊपर कड़ियों के आधार पर टिका है।    फर्श  है व तीनों  दीवारें लकड़ी की   हैं।  पहली मंजिल  आधा   मंजिल  की सामने की दीवार  भी लकड़ी की है।      तीनों दीवारोंकी लकड़ी पर ज्यामितीय कटान हुआ है   जिन्हे आम गढ़वाली भाषा में   मजबूत टिला  पटिला कहते हैं से बनी हैं। मकान की छत ढलान वाली है पहले  तो छत  लकड़ी की ही बनी थी किन्तु  अब चद्दर  स इच्छा दिया गया है।
   भवन के पहली मंजिल में सामने की ओर  भव्य तिबारी है जो चार स्तम्भों /सिंगाड़ों  से बनी है।   तीन स्तम्भ में शानदार ,  कशिश दार नक्कासी हुयी है और एक सिंगाड़  सपाट  स्लीपर नुमा बौळी /कड़ी है।  प्रत्येक नक्कासीदार सिंगा ड़ के  आधार चौखट डौळ  का है  जिसके ऊपर ड्यूल  (wood ring  plate  ) है , जिसके ऊपर एक चौखट नुमा आकृति है जिस पर प्रतीकात्मक आकृति अंकित हुयी है। यहां से सिंगाड़ /स्तम्भ /खम्बा की गोलाई कम होती जाती है व जहाँ सबसे कम गोलाई है वहां एक ड्यूल है व  ड्यूल के ऊपर  उर्घ्वगामी  / सीधा कमल   फूल है. कमल फूल से स्तम्भ ऊपर की ओर  मुरिन्ड /शीर्ष कड़ी या बौळी  से मिलने से पहले थांत  की शक्ल अख्तियार कर लेता है।  थांत के ऊपर वनस्पति व प्रतीकात्मक  (देव चक्र आदि )  का अंकन है।  प्रत्येक  सिंगाड़  के थांत  में अलग अलग ढंग से अंकन हुआ है।  कमल फूल के बगल से ही मेहराब का चाप शुरू होता है।  मेहराब  की   चाप कटान तिप्पत्ति  नुमा  है।   मेहराब के त्रिभुज में किनारे पर  बहुदलीय फूल खुदे हैं व  शानदार खूबसूरत प्राकृतिक अलंकरण की नक्कासी हुयी है।
 मेहराब व स्तम्भ के ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड  /शीर्ष कड़ी   या बौळी पर भी  पर्ण -लता आकृतियां खुदी है।
   डेढ़ पुर की दीवारें लकड़ी के  सपाट पटिलों  से बनी है। 
 तीखी ढलान वाली  छत  के  आधार  के बाह्य पट्टिका /कड़ी में पर्ण -लता -पुष्प का सम्मिलित अलंकरण  उत्कीर्णन हुआ है व बेजान लकड़ी में जान डालने में सफल हुए हैं।  बीच बीच में  एक या दो जगह प्रतिकात्मक  चिन्हों ९संभ्वतया शगुन हेतु )  की नकासी भी मिलती है।
लगता है भवन किसी हिन्दू परिवार का है क्योंकि कुछ प्रतीक  अंकन हिन्दुओं से मिलते हैं।
निष्कर्ष निकलता है कि  बगोरी  (नेलंग घाटी )  के इस विशेष मकान में नक्कासी शानदार हुयी है व भवन तिब्बत्ती व गढ़वाली शैली का संगम है।  आम तिब्बती भवन शैली में नक्कासीदार  तिबारी स्तम्भ कम ही देखे  गए है। 
   
सूचना व फोटो आभार : नेलांग ट्रैवेल ट्रैक

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
 Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of   Bhatwari , Uttarkashi Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Rajgarhi ,Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Dunda, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Chiniysaur, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   

Bhishma Kukreti

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बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान के  भव्य मकान में रोचक काष्ठ  कला , अलंकरण / लकड़ी पर नक्कासी

गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार , बखाली , कोटि बनाल , खोली , मोरी    ) में  काष्ठ अंकन लोक कला  अलंकरण, नक्कासी    - 146 

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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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  देहरादून व उत्तरकाशी  के जौनसार व रवाईं क्षेत्र अपने काष्ठ भवनों के लिए 800 -900  सैलून से प्रसिद्ध हैं।  देवदारु की लकड़ी की उपलब्धता व भूकंप संवेदनशीलता ने    मकानों को मंजिलों में बढ़ाने की शैली को प्रश्रय मिला बनिस्पत भूतल के समानंतर जैसे कुमाऊं में बाखली . जौनसार , नेलंग व रवाईं क्षेत्र  . में बहुमंजिले लकड़ी के मकानों का प्रचलन है. अब धीरे धीरे सीमेंट गारे ने लकड़ी को घेरना शुरू कर दिया है जैसे प्रस्तुत   बृनाड  त्यूणी ,  चकराता , देरादून ) में चार बार  विधायक रह  चुके   वर्तमान विधायक प्रीतम सिंह चौहान का  आधुनिक नया आलिशान मकान है।  प्रस्तुत भव्य आलिशान मकान की विशेषता है कि मकान आधुनिक है किन्तु पारम्परिक जौनसारी स्वरूप लिए है।  आधुनिकता व जौनसारी परम्परा का मिलन है प्रीतम सिंह चौहान  का भव्य मकान। 
  बृनाड  ( त्यूणी , चकराता , देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान  का भव्य मकान तिपुर (1 +2 ) है  व काष्ठ  कला अलंकरण विवेचना हेतु  तीनों मंजिल  में काष्ठ  कला को अलग अलग मंजिल में जांचना आवश्यक है।
  बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान के भव्य मकान के तल मंजिल में काष्ठ कला दृष्टि से  खिड़कियों के दरवाजे व मुख्य प्रवेश द्वार (खोली )  पर ध्यान देना होगा।  तल मंजिल में खोली के दोनों  ओर    दो दो क खिड़कियां  है जिनके दरवाजों का कटान ज्यामितीय स्वरुप में हुआ है व कहीं भी  बेल बूटे  व मानवीय अलंकरण नहीं है। 
  बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान   के तल मंजिल में खोली भव्य है , सुंदर है. मेहराब युक्त खोली पर शानदार ज्यामितीय नक्कासी हुयी है व  रंगों के विशेष प्रयोग ने खोली को बेहद  दिलकश बना दिया है। खोली /प्रवेशद्वार के मुरिन्ड /मथिण्ड  के ऊपर दोनों त्रिभुजों में प्रतीकात्मक खुदाई हुयी है जो संभवतया  सौभाग्य व नजर न लगे का द्योत्तक हैं।
  बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान के  भव्य मकान  की बनावट जौनसारी शैली लिए हैं व कोई छज्जा पहले व दूसरे  मंजिल पर नहीं है।  मकान के पहल मंजिल में 14 स्तम्भ  लगे हैं , जिन्होंने 13  खोली या मोरी बनाई हैं।  इन मोरियों या खोलियों के ऊपरी भाग में  तिपत्ति  आकर के तोरण/मेहराब /arch   निर्मित हुए हैं जो खूबसूर्रत नजारा पेश करते हैं।   पहली मंजिल में बाकी  स्थलों में काष्ठ अलंकरण में ज्यामितीय नक्कासी हुयी है।
  बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान   के भव्य मकान के  दूसरे मंजिल में भी छज्जा , बुर्ज , बालकोनी नहीं है या बालकोनियाँ ढकी हैं , इस मंजिल में कोई मोरी या खोली भी नहीं दिखती हैं किन्तु इस खंड में खिड़कियों का आभास  होता है व यहां लकड़ी पर केवल  इल्म -ए - हिंदसा नक्कासी  (ज्यामितीय कल अलंकरण ) के दर्शन होते हैं.  लकड़ी पर नक्कासी उमदा  है सब जगह। 
  निष्कर्ष निकलता है कि  बृनाड  (देहरादून ) में  प्रीतम सिंह चौहान के भव्य मकान कला   दृष्टि  व दर्शनीय दृष्टि से भव्य है  और  लकड़ी पर ज्यामितीय अलंकरण ही  हावी रहा है बेल बूटों  (प्राकृतिक अलंकरण ) का सर्वथा उपेक्षा की गयी है। 
सूचना व फोटो आभार : अनिल कांडपाल

यह लेख कला संबंधित है न कि मिल्कियत संबंधी ,. सूचनाये श्रुति माध्यम से मिलती हैं अत:  मिल्कियत  सूचना में व असलियत में अंतर हो सकता है जिसके लिए  संकलन कर्ता व  सूचनादाता  उत्तरदायी नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
देहरादून , गढ़वाल में तिबारी , निमदारी , जंगलेदार, बाखली , कोटि बनाल  मकानों में काष्ठ कला , अलंकरण , नक्कासी  श्रृंखला जारी रहगी
 Traditional House Wood Carving of Dehradun Garhwal , Uttarakhand , Himalaya  will be continued -
  House Wood Carving Ornamentation from Vikasnagar Dehradun ;  House Wood Carving Ornamentation from Doiwala Dehradun ;  House Wood Carving Ornamentation from Rishikesh  Dehradun ;  House Wood Carving Ornamentation from  Chakrata Dehradun ;  House Wood Carving Ornamentation from  Kalsi Dehradun ; 

Bhishma Kukreti

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खमण (द्वारीखाळ  ) में घनश्याम कुकरेती की निमदारी में काष्ठ कला     अलंकरण अंकन,  नक्कासी      
 
गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली , खोली  , कोटि बनाल  ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन,  नक्कासी  -  145
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   खमण   (ढांगू , द्वारीखाल ,पौड़ी ग ) की  कुछ तिबारियों , निमदारियों  की विवेचना पिछले अध्यायों में हो चुकी है। आज  घनश्याम कुकरेती की निमदारी में लकड़ी पर नक्कासी की चर्चा होगी।
 घनश्याम कुकरेती की निम दारी भी गढ़वाल की सामन्य निमदारी जैसे ही दुखंड /तिभित्या व दुपुर मकान में  जंगला बिठकार निर्मित हुयी है। है।पहली मंजिल पर बिठाई गयी     निमदारी आठ से अधिक स्तम्भों (खम्भों ) से निर्मित हुयी है।  प्रत्येक स्तम्भ आधार पर  दोनो  ओर पट्टिकाएं कगायी गयी हैं जिससे स्तम्भ में कल अंकन आभास व मोटाई बढ़ जाती है।  स्तम्भ के मुरिन्ड। मथिण्ड शीर्ष कड़ी से मिलने से पहले कुछ ज्यामितीय कटान से स्तम्भ की सुंदरता बधाई गयी है , रेलिंग धातु की है।
खमण में घनश्याम कुकरेती की निमदारी में  ज्यामितीय अलंकरण अंकन के अतिरिक्त अन्य कोई  अलंकरण नहीं हुआ है।  खमण की यह निमदारी  सामन्य किस्म की निम दारी की श्रेणी में आती है। 
सूचना व फोटो आभार : बिमल कुकरेती , खमण
यह लेख  भवन  कला,  नक्कासी संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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 Traditional House wood Carving Art of West South Garhwal l  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ),  Uttarakhand , Himalaya   
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलियों  ,खोली , कोटि बनाल  में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण,  नक्कासी  श्रृंखला  -
  गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान ,  बाखली , खोली, कोटि बनाल   ) काष्ठ अंकन लोक कला , नक्स , नक्कासी )  - 
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   
  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , नक्कासी  , हिमालय की  भवन काष्ठ कला  नक्कासी , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला , लकड़ी पर नक्कासी , नक्स , नक्कासी  dhaangoo me nkkasi , Wood carving Folk Art Khaman

Bhishma Kukreti

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 चिटगल   (गंगोली हाट , पिथौरागढ़ )  में  पंतों   द्वारा निर्मित  महर लोगों के  मकान में   काष्ठ  कला ,  अलंकरण  , लकड़ी  में इल्म -ए  -हिंदसे नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , हरिद्वार उत्तराखंड , हिमालय की भवन  ( बाखली  ,   तिबारी , निमदारी , जंगलादार  मकान ,  खोली  ,  कोटि बनाल   )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 147
 संकलन - भीष्म कुकरेती

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  गंगोलीहाट  पिथौरागढ़ का एक छोटा कस्बा है व   शक्ति पीठ हट कालिका देवी  हेतु प्रसिद्ध है व ।  गंगोलीहाट के निकटवर्ती पातळ भैरवी गुफाएं भी है व चोक्तिया की पहाड़ियां .भी हैं। .  इसी तहसील के एक गाँव चिलगट में यक मकान है।
  गंगोलीहाट से कुछ  विशेष बाखलियों व मकानों की सूचना मिली हैं जो कुमाऊं की अन्य बाखलियों से  विशेष है exclusive  हैं। 
चिटगल में इस  मकान  को   पन्त परिवार ने निर्मित किया था , प्रवास में चले गये तो  पंत परिवार के सदस्यों ने महर परिवार को घर  दे   दिया .
    पंकज सिंह महर    द्वारा  भेजे गए यह मकान भी कुमाऊं में आम बाखलियों के मुकाबले कुछ अलग ही है।  मकान का डिजाइन तो बाखली जैसा है किन्तु आकार    बहुत  ही छोटा है और काष्ठ कला भी बाखली के अनलिखे नियमों से हठ कर ही है।
चिटगल के इस मकान  ढैपुर शैली का है व तल मंजिल भंडार या गौशाला रूप में इस्तेमाल होता रहा होगा     पहली मंजिल में या ऊपर कोई छज्जा /छाज नहीं है। पहली मंजिल या ऊपर कोई छज्जा /छाज नहीं है। पहली मंजिल में सात  लकड़ी के स्तम्भ/सिंगाड़ /खम्बे  हैं जो छह खोली या मोरी बनाते हैं। मकान में  सिंगाड़ों  से बने खोली /द्वार को लकड़ी की  पट्टियों  से ढक दिया गया है।  एक  मोरी के दरवाजा लगाकर  प्रवेश द्वार बना लिया गया है।  एक खोली  के पट्टी को आधा काटकर मोरी बना दिया गया है।
मोरी को  ढकने वाले पत्तियों में ज्यामितीय कला ही उत्कीर्ण हुयी है  जो कि  कुमाऊं की बाखलियों से भिन्न है।  आम बाखलियों की मोरी के दुंळ  (खोह ) को ढकने वाले  पट्टियों  में कई थर की नक्कासी मिलती है जैसे हमने बिंतोली  व  जीजार की बाखलियों में देखा कि  मोरी ढकने की पट्टी  में न सही सिंगाड़ में कला उत्कीर्ण होती है।
   मुरिन्ड /मथिण्ड  (खोलियों के ऊपर शीसरह की कड़ी ) की कड़ी में  ज्यामितीय कटान  छोड़ कोई कला उत्कीर्ण नहीं है  व मुरिन्  के  ऊपर छत आधार पट्टिका में भी ज्यामितीय कला / याने इल्म  -ए - हिंदसे नक्कासी ही मिली है।
मकान की शान इसकी गोलकार सीढ़ियां हैं जो पहाड़ों में कम ही देखने को मिलते हैं।
 निष्कर्ष है कि   चिटगल  गंगोली हाट  (पिथोरागढ़ )  की इस  लघु बाखली में ज्यामितीय  काष्ठ  कला अलंकरण उत्कीर्णित हुए है याने बस  इल्म -ए - हिंदसे  फन  के  ही  दीदार होते हैं। 

सूचना व फोटो आभार :  पंकज सिंह महर 

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली, कोटि  बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन, लकड़ी पर नक्कासी   
अल्मोड़ा में  बाखली  काष्ठ कला  , पिथोरागढ़  में  बाखली   काष्ठ कला ; चम्पावत में  बाखली    काष्ठ कला ; उधम सिंह नगर में  बाखली नक्कासी ;     काष्ठ कला ;; नैनीताल  में  बाखली  नक्कासी  ;
Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of Garhwal , Kumaun , Uttarakhand , Himalaya  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Almora Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in Nainital   Kumaon , Uttarakhand ; House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Pithoragarh Kumaon , Uttarakhand ;  House wood  carving Art in Bakhali Mori, chhaj   in  Udham Singh  Nagar Kumaon , Uttarakhand ;    कुमाऊं  में बाखली में नक्कासी ,  ,  मोरी में नक्कासी , मकानों में नक्कासी  ; कुमाऊं की बाखलियों में लकड़ी नक्कासी ,  कुमाऊं की बाखली में काष्ठ कला व   अलंकरण , कुमाओं की मोरियों में नक्कासी  श्रृंखला स्स्गे भी   ...


Bhishma Kukreti

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किमसार  (यमकेश्वर ) में जय कृष्ण कंडवाल की निमदारी में काष्ठ कला अलंकरण  , लकड़ी पर  नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , बखाई ,  खोली  ,   कोटि बनाल   )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 148
 संकलन -भीष्म कुकरेती
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  जैसे कि  पहले कई अध्याओं  में  बताया गया है  कि किमसार   (यमकेश्वर ,पौड़ी गढ़वाल )  एक पुराना स्थल है व यहाँ कई तिबारियां व निमदारियां , जंगलेदार  मकान थे।  आज  किमसार   के जय कृष्ण कंडवाल के भव्य निमदारी में लकड़ी पर नक्कासी की चर्चा होगी।
मकान  दुखंड/ तिभित्या  एवं ढैपुर  (तल मंजिल + पहली मंजिल +  आधा  मंजिल )   शैली का है।   मकान वर्तमान में ही बना है। 
किमसार में जय कृष्ण कंडवाल  की निमदारी /जंगला   पहली मंजिल पर  छज्जे पर टिका  है। छज्जा व निमदारी का मुरिन्ड /ऊपरी भाग लकड़ी के ही हैं।    निमदारी में  सामने  की ओर कुल  14 स्तम्भ हैं  व  लकड़ी के छज्जे पर  टिके   है व ऊपर काष्ठ
मुरिन्ड /शीर्ष से मिलते हैं।     स्तम्भों के आधार पर दोनों ओर  पट्टिकाएं लगी हैं जिससे स्तम्भ की  मोटाई  बढ़ा हुआ आभास  होता है।  इसके बाद  चौकोर स्तम्भों की मोटाई समान है। शीर्ष में कुछ कटान है बस।  मुरिन्ड की कड़ियों व पटलों   में ज्यामितीय  अलंकरण कलाके अतिरक्त  कोई अन्य अलंकरण नहीं हुआ है।   स्तम्भों  के आधार  में स्तम्भों को  लकड़ी की कड़ी से जोड़ा गया है जिसके नीचे धातु रेलिंग /जंगला  बंधा है।   
निष्कर्ष निकलता है कि  किमसार में जय कृष्ण मकान बड़ा है व खूबसूरत है व सुंदरता की दृष्टि से उच्च श्रेणी में आता है।   मकान में केवल ज्यामितीय कटान हुआ है प्राकृतिक  या मानवीय अथवा रुहानी नक्कासी  जय कृष्ण कंडवाल के मकान में नहीं  दीखते हैं।
सूचना व फोटो आभार :  विकास बडोला
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत संबंधी  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , कोटि बनाल   ) काष्ठ  कला अंकन, लकड़ी पर नक्कासी   
  यमकेशर गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;  ;लैंड्सडाउन  गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;दुगड्डा  गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ; धुमाकोट गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला ,   नक्कासी ;  पौड़ी गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;
  कोटद्वार , गढ़वाल में तिबारी , निम दारी , जंगलेदार  मकान , बाखली में काष्ठ कला , नक्कासी ;


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    कंडारगढ़ी (चंद्रपुरी) में महेशानन्द  गैरोला की तिबारी  में काष्ठ कला

कंडारगढ़ी  (चंद्रपुरी , उखीमठ ) में महेशानन्द  गैरोला की तिबारी  स्तम्भों/सिंगाड़ों  में काष्ठ कला , अलंकरण अंकन , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली   , खोली , छाज  कोटि बनाल  ) काष्ठ अंकन , नक्कासी   -   152
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती

   रुद्रप्रयाग गढ़वाल क्षेत्र में तिबारियों  के लिए सबसे समृद्ध क्षेत्र  है. इस क्षेत्र में तिबारी को तिबार नाम से पुकारा जाता है।   प्रसिद्ध नाट्य शिल्पी   डा राकेश भट्ट ने  रुद्रप्रयाग की कुछ तिबारियों व मंदिरों की सूचना भेजी हैं जो काष्ठ कला हेतु नायब उदाहरण हैं।  आज इसी क्रम में  कंडारागढी ( कंडारा।, चंद्रपुरी , ुख्यमठ ब्लॉक ) रुद्रप्रायग  में महेशानन्द  गैरोला की तिबारी के स्तम्भों में काष्ठ कला अंकन की चर्चा होगी व विवेचना  की जाएगी कि  किस प्रकार का अलंकरण इन स्तम्भों में है। 
कंडारागढ़ी   (चंद्रपुरी , कंडारा , उखीमठ ) में   महेशा नन्द  गैरोला की तिबारी  मकान के पहली मंजिल में स्थित है व लकड़ी के छज्जे /स्लीपर में टिके  हैं।  संरचना बताती है कि तिबारी में नक्कासीदार चार स्तम्भ /सिंगाड़  (Column ) हैं जो तीन खोली /ख्वाळ /द्वार बनाते हैं।  स्तम्भ छज्जे के ऊपर पत्थर के चौकोर डौळ ऊपर स्थित हैं जहां पर अधोगामी  पद्म पुष्प दल  (उल्टा  कमल पुष्प ) आधार पर कुम्भी ( घड़ा या पथोड़ /दबल आकर ) आकृति बनता है।  कुम्भी /पथोड़ /पथ्वड़  के ऊपर लकड़ी का ड्यूल  ( Wood Ring  plate ) है व ड्यूल के ऊपर उर्घ्वगामी  कमल दल  है जहां पर यह आकार समाप्त होता है , स्तम्भ /सिंगाड़  की गोलई कम होती जाती है। व शाफ़्ट कड़ी बनता जाता है (shaft of  Column )  जहां पर सिंगाड़ /स्तम्भ की सबसे कम गोलाई है वहां पर उल्टा कमल दल है जिसके ऊपर ड्यूल है व फिर सीधा खिला  कमल फूल है  . कमल पंखुड़ियों (पद्म पुष्प दल ) में व कड़ी में पत्तीदार  (जैसे फर्न पत्तियां हों ) .  फर्न पत्ती अंकन बड़ी  बारीकी से हुआ हाइवा कलाकार की प्रशंसा आवश्यक हो जाती है। खान पर ऊपरी कमल दल की पंखुडिया खिली हैं  वहां से ऊपर की  ओर  सिंगाड़  थांत (bat blade type ) में बदल जाता है व यह थांत   मुरिन्ड  /शीर्ष / abacus से मिलता है।  यहीं से स्तम्भ / सिंगाड़  से मेहराब की छाप भी निकलती हैं व दूसरे  स्तम्भ की चाप से मिलकर पोर्न मेहराब बनता  है।   मेहराब की आंतरिक पटल  के छापें नुकीले हैं।  थांत व मेहराब में   फर्न पत्तियों का अंकन हुआ है।  थांत  में ज्यामितीय कला का भी अंकन हुआ है।
पहली मंजिल क इक कमरे के दरवाजों के सिंगाड़ों  में ज्यामितीय व प्राकृतिक  अलंकारों का अंकन हुआ  है।
 निष्कर्ष निकलता है कि  कंडारागढ़ी  ( कंडारा , चंद्रपुरी ) में महेशानन्द  गैरोला की तिबारी  स्तम्भों/सिंगाड़ों  की    जो भी    कसूचना मिली है उनमे प्राकृतिक व ज्यामितीय अलंकराओं का    अंकन ं प्रभावशाली ढंग से हुआ है।   
सूचना व फोटो आभार : प्रसिद्ध नाट्य शिल्पी डा राकेश भट्ट
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  * यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी . मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं .
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 Traditional House wood Carving Art of  Kandargarh , Chandrapiuri Ukhimath Rudraprayag    Garhwal  Uttarakhand , Himalaya   
  रुद्रप्रयाग , गढवाल   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलीयों   ,खोली, कोटि बनाल )   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण , नक्कासी  श्रृंखला 
  गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya ; Traditional House wood Carving Art of  Rudraprayag  Tehsil, Rudraprayag    Garhwal   Traditional House wood Carving Art of  Ukhimath Rudraprayag.   Garhwal;  Traditional House wood Carving Art of  Jakholi, Rudraprayag  , Garhwal, नक्कासी , जखोली , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  ; उखीमठ , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला अंकन, नक्कासी  , खिड़कियों में नक्कासी , रुद्रपयाग में दरवाजों में नक्कासी , रुद्रप्रायग में द्वारों में नक्कासी ,  स्तम्भों  में नक्कासी     , कंडारा गढ़ी  (चंद्रपुरी ) में महेशानन्द  गैरोला की तिबारी  स्तम्भों/सिंगाड़ों  में काष्ठ कला , अलंकरण अंकन , नक्कासी


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खमण  ( द्वारीखाल पौड़ी  गढ़वाल ) में  राम प्रसाद कुकरेती की निमदारी में काष्ठ कला  ( Wood Railing  in  Balcony  ) , अलंकरण , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली , खोली  , कोटि बनाल  ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन,  नक्कासी  -  150
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 खमण तिबारियों , निमदारी  ( जंगलेदार मकान Wood Railing  in  Balcony  ) , के मामले में समृद्ध गाँव है।  आज  राम प्रसाद कुकरेती की निमदारी  ( Wood Railing  in  Balcony  ) , की चर्चा होगी।  मकान  दुखंड /तिभित्या  व ढैपुर   (1  + 1  + 1 /2 ) शैली का है।  निमदारी (wooden railing  in  balcony ) पहली मंजिल पर  स्थापित है।  खमण के राम प्रसाद कुकरेती  की निम दारी  (wooden railing  in  balcony  ) में चौदह स्तम्भ कसे गए है जो कंक्रीट के छज्जे पर स्थापित है।  स्तम्भ बिलकुल सपाट हैं व  ज्यामितीय अलंकरण हुआ है। स्तम्भों के मध्य ढाई फ़ीट की उंचाईमे धातु जाली की रेलिंग लगी है। कोई विशेष काष्ठ कला के दर्शन इस निमदारी में नहीं होते हैं।
 निष्कर्ष निकलता है कि कला व अलंकरण दृष्टि   से खमण  में राम प्रसाद कुकरेती की  निम दारी  (wooden railing  in  balcony  ) साधारण हैं किन्तु अपने समय में रामप्रसाद कुकरेती की  निम दारी  (wooden railing  in  balcony  )  की डबरालस्यूं में एक पहचान थी  गाँव व राम प्रसाद कुकरेती परिवार वालों के लिए एक शान थी।  खमण के कई सामाजिक  कार्यों  में राम प्रसाद कुकरेती की  निम दारी  (wooden railing  in  balcony  ) काम आती थी। 

सूचना व फोटो आभार : बिमल कुकरेती , खमण
यह लेख  भवन  कला,  नक्कासी संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत:   वस्तुस्थिति में अंतर      हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
 Traditional House wood Carving Art of West South Garhwal l  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ),  Uttarakhand , Himalaya   
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलियों  ,खोली , कोटि बनाल  में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण,  नक्कासी  श्रृंखला  -
  गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान ,  बाखली , खोली, कोटि बनाल   ) काष्ठ अंकन लोक कला , नक्स , नक्कासी )  - 
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   
  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , नक्कासी  , हिमालय की  भवन काष्ठ कला  नक्कासी , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला , लकड़ी पर नक्कासी , नक्स , नक्कासी 

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  नावदा  (देहरादून ) में   पुराणी धर्मशाला  की   निमदारी में काष्ठ कला ,  अलंकरण , नक्कासी 

गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार , बखाली , कोटि बनाल , खोली , मोरी    ) में  काष्ठ अंकन लोक कला  अलंकरण, नक्कासी    -  151
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of  Dehradun , Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 जब यह लेखक पहले पहल 1965   में देहरादून  गया तो निमदारी जैसे  वाली शैली  शायद भोगपुर , डोईवाला अदि में देखा होगा।  देहरादून शहर में  निमदारी  या जंगलेदार  शैली के मकान निर्मित होने बंद हो गए थे।  फेसबुक मित्र विजय  भट्ट  ने  नवादा गांव के अतीत इतिहास  साथ यह  फोटो  भेजी।  विजय भट्ट अनुसार नवादा बहुत पुराना गाँव है  व गाँव का संबंध रानी कर्णावती  (नाक  कटी , )से है , . कभी नवादा 1750 - 80  तक देहरादून का  मुख्यलय भी था।   नवादा में  . यहां एक प्राचीन शिव मंदिर  भी है जिसकेलिए यह धर्मशाला बनी थी आज तकरीबन उजाड़ ही है। 
धर्मशाला की संरचना देखते कहा जा सकता है धर्मशाला का यह भवन /निमदारी  1955 -60  के मध्य ही निर्मित हुआ होगा जब तक देहरादून वासियों पर गढ़वाल  स्थापीय शैली का प्रभाव रहा होगा।  मकान कंक्रीट का है ,
छत चद्दर की है व आधुनिक है बस निमदारी  संरचना पर पर गढ़वाली प्रभाव है।  पहली मंजिल पर निम दारी स्थापित है।  निमदारी  में  छह स्तम्भ है व कंक्रीट की छोटी दीवार पर आधारित एक कड़ी पर टिके हैं।  स्तम्भ सपाट हैं। व ऊपर मुरिन्ड की कड़ी भी कला दृष्टि से सपाट है।  भवन में कमरों के ध्वजों , खड़कियों के दरवाजों पर ज्यामितीय खुदाई ही हुयी है।  , कोई  बेल बूटों , पशु पक्षियों की कोई नकासी प्रस्तुत नवादा की धर्मशाला में नहीं मिली।
 नवादा   मंदिर धर्मशाला  का यह भवन वास्तव  में देरादून वाश्तु शैली परिवर्तन का गवाह है व आगे आने वाले दिनों में जब देहरादून के वास्तु /स्थाप्य  इतिहास लिखा जायेगा तो  अवश्य ही नवादा धर्मशाला की निम दारी  कड़ी साबित होगी। 
सूचना व

Bhishma Kukreti

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किमोठा(चमोली गढ़वाल ) में स्व . इच्छाराम किमोठी के क्वाठा भितर /किले में काष्ठ  कला , अलंकरण , लकड़ी नक्कासी   

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , मोरी , कोटि बनाल   ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन, नक्कासी   -  149

(अलंकरण व कला पर केंद्रित)   

संकलन - भीष्म कुकरेती

 चमोली गढ़वाल  भवन शैली में   केदारखंड (गढ़वाल ) में सबसे उन्नत क्षेत्र है।  भवन शैली व काष्ठ  कला शैली में चमोली गढ़वाल में कई भिन्नताएं व  विशिष्टतायें  मिलती है।  आज  किमोठा , नागनाथ  के जिस क्वाठा भितर  या लघु किले की चर्चा की जाएगी  व भी विशेष व विशिष्ठ है। यह  क्वाठा / किला  स्व इच्छाराम किमोठी ने किमोठा में  दक्छिनेश्वर    काली  स्थापित करने के बाद  टिहरी महाराज , स्थानीय लोगों के सहयोग से निर्मित किया गया था।  स्व इच्छाराम के पड़ नाती (  छठी पीढ़ी ) ऐस किमोठी की बातों व सूचना से साफ़ लगता है कि  स्व इच्छाराम किमोठी वैष्णवी पंडिताई , ज्योतिष में ही पारंगत न थे पितु  मांत्रिक व तांत्रिक भी थे व  राजा, प्रभावशाली लोग  व सामंतो पर उनका बड़ा प्रभाव था। 

 किमोठा  में स्व इच्छाराम किमोठी के  तिपुर क्वाठा  की फोटो से  जो सूचना मिली है उससे इस भवन में काष्ठ कला समझने के लिए  मंजिल दर मंजिल अध्ययन करना होगा।

किमोठ में इच्छाराम किमोठी के    तिपुर क्वाठा  के तल मंजिल /उबर में   ऊपर मंजिल में जाने वाले प्रवेश द्वारों  में एक प्रवेश द्वार में दरवाजा है एक में दरवाजा नहीं है , ऐस किमोठी अनुसार अंदर चोर रस्ते भी थे।   कमरों के व मुख्य प्रवेश द्वार (खोली ) के दरवाजों पर केवल ज्यामितीय  कलाकृति है।  खोली के ऊपर मुरिन्ड पट्टिका (शीर्ष ) मोठे लकड़ी की बौ ळी है।  और बौळी से नीचे दोनो ओर  लकड़ी के दीवालगीर हैं जो पत्थर की दीवाल   पर स्थापित हैं।  दीवालगीर   (bracket ) में  या चौकी  (lower Impost ) में  पत्थर के चिड़िया गला व फूल आभासी  अथवा कोई काल्पनिक अलंकरण  उत्कीर्ण हुआ है।  दीवालगीर  के  ऊपरी  चौकी  (upper impost  ) में  पत्थर के हाथी  की आकृति खुदी है।  ऊपरी चौकी के बगल में एक चौकोर आकृति में भी नक्कासी हुयी है।  मुरिन्ड बौळी  से हाथी के ऊपर शंकु लटक रहे हैं।

 तल मंजिल के छज्जों के दास (टोड़ी ) भी लकड़ी के हैं व ज्यामितीय कला से सजे हैं।   दासों के कटान  भी आकर्षक हैं।

  पहली मंजिल  पर तिबारी है  जो वैसे गढ़वाल की आम तिबारियों जैसी ही है किंतु  चमोली व कुमाऊं की विशेष शैली भी इस तिबारी में दिखती है।  तिबारी चार सिंगाड़ों /स्तम्भों से बनी है जिस पर तीन ख्वाळ /खोली /मोरी /द्वार हैं।   दो  स्तम्भ  चार चार उप स्तम्भों  से मिलाकर निर्मित हुए हैं तो दो स्तम्भ दो उप स्तम्भों को मिलाकर निर्मित हैं।  प्रत्येक उप स्तम्भ पत्थर के चौकोर डौळ  के ऊपर स्थापित हैं।  डौळ  के बिलकुल ऊपर  स्तम्भ की कुम्भी है जो  उल्टे कमल  (अधोगामी पद्म दल ) फूल से बनी है।  कुम्भी के  ऊपर ड्यूल ( wood ring plate ) है व उसके ऊपर सीधा कमल  ( उर्घ्वगामी पद्म दल ) है व तब स्तम्भ की गोलाई कम होती जाती है।  सभी उप स्तम्भ एक जैसे हैं।  कमल पंखुड़ियों के ऊपर भी प्राकृतिक अंकन हुआ है।  जहां पर  स्तम्भ की मोटाई /गोलाई सबसे कम रह जाती है वहां पर अधोगामी पद्म  पुष्प अवतरित होता है जिसके ऊपर ड्यूल है व फिर सीधा कमल फूल (उर्घ्वगामी पद्म पुष्प दल ) है व कमल फूल के ऊपर  चौखट (impost ) है  जहां से मेहराब  की चाप शुरू होता है जो दुसरे स्तम्भ की चाप से मिलकर मेहराब बनाते हैं। 

मेहराब तिपत्ति (trefoil ) नुमा  है।  दो मेहराबों के मध्य त्रिभुजों में  आयताकार आकृति खुदी है व दो दो  तीर नोक या  आले  जैसे गड्ढे भी हैं  .  मेहराब कई  परतों का है व बेल बूटे  की नक्कासी युक्त हैं।  मेहराब के ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड  /abacus दूसरी मंजिल के छज्जे का आधार बन जाता है।  शीर्ष पर कोई कला उत्कीर्ण नहीं हुयी दिखती है।

पहली मंजिल में तिबारी के बगल में मुख्य  परवश द्वार (खोली ) के ऊपर एक बुर्ज है जैसे   मुगल  कालीन  किलों में पाया जाता है  व इड़ा (एकेश्वर ) में नेगियों के क्वाठा  प्रवेश द्वार में भी पाया गया है।  बुर्ज या बालकोनी   चौड़े पत्थर के छज्जे  ऊपर है व जिसके चरों कोनों में एक एक स्तम्भ (जो   तिबारी  के स्तम्भों की नकल हैं ) . चरों स्तम्भ से मेहराब भी वैसे ही बनते हैं जैसे तिबारी के मेहराब।  मेहराब के ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड  में कई पट्टिकाये   (पटिले ) हैं जिन पर  पर्ण -लता (बेल बूटे ) की सुंदर बारीक नक्कासी हुयी है। अंदर से बुर्ज में आने के लिए द्वार है व दरवाजे पर कोई विशेष नक्कासी नहीं है। बुर्ज के ऊपर शीर्ष में सिलेटी पत्थरों की चिनाई से छत बनाई गयी है।

 दूसरी मंजिल अथवा  तिपुर में तिबारी के ऊपर का हिस्सा गिर गया है और  सूचना मिली है है कि इस भाग में जंगला ही था।   सूचना आना बाकी है. पहली मंजिल के बुर्ज के ऊपर एक और बुर्ज है जिस के स्तम्भ ऐसे ही जैसे गढ़वाल में आम निमदारी के जंगलों के स्तम्भ होते हैं। आधार पर स्तम्भ के दोनों ओर पट्टिकायें हैं जो स्तम्भ को  सूचना मोटाई देते हैं व ऊपर  स्तम्भ /खम्बे गोल न हो  चौकोर  से हैं।  आधार के ढाई फिट ऊंचाई पर रेलिंग /जंगल है व नीचे भी लकड़ी के  त्रिभुजकर रेलिंग हैं। 

 ऐस किमोठी जो स्व इच्छाराम किमोठी के उत्तराधिकारियों में से एक  उत्तराधिकारी हैं ने सूचना दी है कि  अंदर कई गुप्त रास्ते थे व स्वतन्त्रता सेनानी  नरेंद्र किमोठी ( सुनील किमोठी  के दादा जी  )  को जब  सरकारी अधिकारी  नरेंद्र किमोठी पकड़ने आयी तो वे इसी किले में कईं छुप कर बाहर आ गए थे (हालाँकि बाद में उन्हें पकड़ लिया गया व जेल भी हुयी ) .

इस  किले के शिपलाकरों के गांव  की जानकारी आज के पीढ़ी के पास नहीं है।  क्वाठा  निर्माण काल 1900  ई   के आस पास होना चाहिए। 

 किमोठा(नागनाथ  चमोली गढ़वाल )  में स्व इच्छाराम किमोठी का क्वाठा भितर   वास्तव में एक धरोहर है व स्थाप्य कला  का उम्दा उदाहरण है व यह बताने में भी सक्षम है कि  मकान /क्वाठा  निर्माण  शैली  कैसे  एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र  में सर्कि व क्वाठा  कला मार्ग कौन सा था (शैली के फैलने का मार्ग ) .

 किमोठा(नागनाथ  चमोली गढ़वाल )  में स्व इच्छाराम किमोठी का क्वाठा भितर   में  काष्ठ  अलंकरण विवेचना से साबित   होता है कि  स्व इच्छाराम निर्मित किमोठी भवन में   ज्यामितीय , प्राकृतिक ,  व मानवीय (पशु पक्षी व रूहानी या  काल्पनिक  )  अलकंरण उत्कीर्ण हुआ है।  जब तकनीक , औजार , शिल्पकार उपलब्ध न थे तब यह लघु किला निर्मित हुआ तो  स्व इच्छाराम व शीलकारों की जितनी प्रशंसा हो काम ही पड़ेगी। 

सूचना व फोटो आभार :  सुनील किमोठी   ,किमोठा

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत:  वस्तुस्थिति में  अंतर   हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली , मोरी , खोली,  कोटि बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन , लकड़ी नक्कासी श्रंखला जारी    ...   -

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