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House Wood carving Art /Ornamentation Uttarakhand ; उत्तराखंड में भवन काष्ठ कल

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Bhishma Kukreti:
 
भीष्म कुकरेती  ग्रामीण उत्तराखंड में लोक कलाओं विशेषकर तिबरियों , निमदारियों, जंगले दार मकानों , बाखली में काष्ठ कला का विश्लेष्ण करेंगे

Bhishma Kukreti:
मूळी माई : याने ढांगू की ब्वान वळि  माई
ढांगू की लोक कला व कलाकार  - 1
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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  माई शब्द हमारे क्षेत्र में मंदिर या मठ में स्त्री महंत को कहते हैं या जिस स्त्री ने संन्यास ले लिया हो।  ऐसी ही माई थीं  कौंदा (बिछला  ढांगू ) की मूळी माई।  बाल विधवा होने के बाद मूळी ने सन्यास ले लिया था याने तुलसी माला ग्रहण कर लिया था किन्तु कोई मंदिर ग्रहण नहीं किया था।  मूळी माई तिमली डबराल स्यूं के प्रसिद्ध व्यास श्री वाणी विलास डबराल की बहिन थीं या  मुंडीत  की थीं  व कुकरेती ससुराल।  मूळी नाम शायद विधवा होने या मूळया होने के कारण पड़ा  होगा। 
 पूरे ढांगू (मल्ला , बिछले , तल्ला ) में वे मूळी से अधिक ब्वान वळी माई से अधिक प्रसिद्ध थीं।  ढांगू के हरेक गाँव में उनकी जजमानी थी।  वे बबूल (गढ़वाली नाम ) का ब्वान (झाड़ू ) बनाने में सिद्धहस्त थीं व हरेक गांव में कुछ ब्वान लेजाकर बेचतीं भी थी।  ब्वान से लोग उन्हें चवन्नी या दो आना या बदले में अनाज  दाल  आदि देते थे।  अन्य माईयों  की तरह वे भीख नहीं मांगती थीं।  जनानियां उन्हें प्रेम से भोजन पानी देतीं थीं व अपने यहाँ विश्राम करने में धन्य समझतीं थी।  उनके बनाये ब्वान में कला झलकती थीं याने उनकी अपनी शैली /वैशिष्ठ्य होता था । 

कल पढ़िए एक मंगळेर  के बारे में ढांगू की कला व कलाकार   -2 में

Bhishma Kukreti:
खंड बिछला ढांगू की लोककलाएं कला व कलाकार

 ढांगू गढ़वाल की लोककलाएं व भूले बिसरे कलाकार - 2
(श्री व जी नहीं लगाए हैं समाहित समझिये )
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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  खंड गंगा तट पर दाबड़ , कांडी , अमोला से घिरा गाँव है।  आज मुख्यतया बड़थ्वालों का गाँव कहा जाता है।
   खंड की मुख्य कलाएं इस प्रकार हैं -
संस्कृति - संस्कारो से संबंधित कला अभिव्यक्ति में - विवाह में जन्मने , नामकरण , मुंडन  आदि के वक्त पंडितों द्वारा गणेश निर्माण , चौकी सजावट सामन्य संस्कारी कलाएं कन्हड में जीवित है , शादी में हल्दी हाथ ,
भी सामन्य सांस्कृतिक कला आम गढ़वाली गांव की भांति खंड गांव की संस्कृति  का अंग है। स्त्रियां  लोक गीत गातीं  थीं व कई गीत स्थानीय घटनाओं पर आधारित रच कर  बौण  व पुंगड़ियों  में गति ही थीं।  लोक खेल भी गढ़वाल जैसे ही थे। 
   पहले चैत  में नाट्य व गीत कला खंड के सांस्कृतिक कला अंग थे।  जंतर -मंतर कला  भी गढ़वाल को प्रतिनिधित्व करते थे।  बादी बादण  नाच गीत के लिए प्रसिद्ध थे ही।
   औजी - ढोल बादक दाबड़ बिछले ढांगू के थे पीतांबर दास परिवार से थे व दूसरी तीसरी साखी में सिंकतु , सैना , चमन लाल , पंकज हुए
   मंदर , चटाई निर्माण - सन 60 -65  तक गाँव में ही बनते थे।
 ब्वान - खंड में ही निर्मित होते थे , कौंदा की मूळी माई भी आती थीं
दबल -ठुपरी = भ्यूंळ  की खंड में ही निर्मित होते थे।  किंतु बांस की ठुपरी , दबल हेतु हथनूड़ व बागी (बिछले ढांगू ) पर निर्मभर थे।
मिटटी के दिए ,हिसर  , मृदा बर्तन - पहले (शायद स्वतन्त्रता से पहले व कुछ समय बाद भी ) - हथनूड़ के कलाकारों पर निर्भर थे।
दर्जीगिरी - पहले औजी ही थे बाद में सिमाळु  खंड  के उमानंद बड़थ्वाल प्रसिद्ध दर्जी हुए ।  देहरादून के प्रसिद्ध टेलर रोशन बड़थ्वाल इसी परिवार के हैं।
  टाट -पल्ल -नकपलुणी - बिछला ढांगू में घने जंगल होने के कारण गोठ प्रथा न थी।  बिछला ढांगू वाले हर्मियों , वर्षा ऋतू में अपने जानवर मल्ला ढांगू भेज देते थे अतः  टाट -पल्ल -नकपलुणी  कला ना के बराबर थी।  घर या गौशाला के आगे हेतु   छपर हेतु पल्ल बागी वाले या हथनूड़  वाले कलाकार थे
उरख्यळ।  छज्जे के दास - ठंठोली (मल्ला ढांगू पर निर्भर  )
मकान के पत्थर गांव के पास या कलसी कुठार (मल्ला ढांगू ) पर निर्भर
भवन निर्माता /ओड - बागी के
सुनार - जसपुर व पाली (मल्ला ढांगू )
लोहरगिरि व टमटागिरी - बड़े कार्य हेतु जसपुर पर निर्भर छोटे कार्य टंकयाण , अदि हेतु गाँव के लोहार गबुल थे।
तिबारियां थी।  पूरी जानकारी हासिल न हो सकी
पहले लगभग हर परिवार से कर्मकांडी पंडित व जंतर मंतर के  पंडित थे। 
पंडित मुकंद राम बड़थ्वाल , दैवेज्ञ (1887 -1979 खंड के ही थे जिन्होंने कई ज्योतिष पुस्तकें रचीं
( खंड के उद्यान कृषि पुरोधा सत्य प्रसाद बड़थ्वाल की दी सूचना पर आधारित )

Bhishma Kukreti:

   खमण में जनार्दन कुकरेती के डंड्यळ  में काष्ठ कला /अलंकरण

खमण में तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण  -2
House Wood  Carving art in Khaman , Dhangu (Garhwal )  - 2
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   35
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   -35
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  61
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    61
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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  खमण एक विशेष गाँव है जो भौगोलिक हिसाब से डबरालस्यूं में है किन्तु राजनैतिक सीमारेखा अनुसार मल्ला ढांगू में है।  चक्रधर कुकरेती (कुकरेती वंशावली प्रसिद्ध ) खमण डाबरालों द्वारा दान में कुकरेतियों  को दिया गया था तो खमण को मल्ला ढांगू याने कुकरेती गाँव माना जाता रहा है। गुरु राम राय दरबार , देहरादून के  महंत  स्व इंदिरेश चरण दास (श्रीधर कुकरेती ) की जन्म स्थली भी खमण ही है। 
सूचना व फोटो आभार :  बिमल कुकरेती व राजेश कुकरेती  खमण
सम्प्रति जांदरदन कुकरेती के डंड्यळ  पर चर्चा हो रही है।  खमण में कुछ इस मकान को 'तिबारी' कह कर भट्याते हैं तो कुछ  डंड्यळ '.  जनार्दन कुकरेती  का यह  तिबारी / डंड्यळ वाला मकान तिभित्या मकान याने दुखंड (एक कमरा अंदर व एक बहार की और ) मकान है व पहली मंजिल पर  दो कमरों के मध्य दीवार न रख बाहर काष्ठ स्तम्भ लगाकर तिबारी रूप दे दिया गया है।
चार सम्भव वाले इस तिबारी में केवल ज्यामितीय काष्ठ  कला दृष्टिगोचर होते हैं।  यहाँ तक की स्तम्भ शीर्ष पट्टिका भी आयताकार व अलकंरण विहीन है।  निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पहली मंजिल पर बरामदा /डंड्यळ  निर्माण हेतु ही काष्ठ स्तम्भ प्रयोग हुए हैं और स्थानीय काष्ठ कलाकारों ने ही स्तम्भ बिठाये होंगे। 
ढांगू , उदयपुर , डबराल स्यूं में कला या अलंकरण बिहीन तिबारियों का होना सामन्य बात थी क्योंकि बरामदा को आकार देने हेतु स्तम्भ बिठाये जाते थे व पहली मंजिल का बरामदा बैठक /conferences / या शादी वविवाह में पौणो /मेहमानों  को ठहराने हेतु काम आता था।  जनार्दन कुकरेती की यह तिबारी /डंड्यळ  भी बैठक   थी  विशेषतः जब जनार्दन कुकरेती ग्राम प्रधान थे।   
   
सूचना फोटो आभार - बिमल कुकरेती , राजेश कुकरेती, खमण
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
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Bhishma Kukreti:
अमाल्डू  में जगदीश प्रसाद  उनियाल की तिबारी में विशेष काष्ठ कला /अलंकरण

  House Wood carving art/Ornamentation in Tibari of Jagdish Uniyal , Amaldu 
 अमाल्डू  (डबरालस्यूं  में भवन काष्ठ अलंकरण कला/अलंकरण  -2
House Wood Carving art/ornamentation, Amaldu -2
डबरालस्यूं , गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 5
House Wood  Carving  ornamentation art    of  Dabralsyun  -5
गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -36
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   -36
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  62
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    612
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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उनियालों की बसाहत  कारण अमाल्डू  डबरालस्यूं  का  महत्वपूर्ण गांव है।  अशोक उनियाल ने सूचना दी कि अमाल्डू में तिपुर/दो मंजिला  मकानों का रिवाज रहा है और वह  भी राजराजेश्वरी देवलगढ़ दरबार की तर्ज पर।  सम्प्रति भी एक तिपुर  के पहली मंजिल पर बिठी तिबारी की विवेचना ही है।  अमाल्डू  डबरालस्यूं  में   जगदीश प्रसाद  उनियाल की यह तिबारी  कई मायनों में विशेष तिबारी कहलायी जायेगी। सबसे  पहलि  विशषता है कि दक्षिण गढ़वाल में    तिपुर  (दो मंजिला ) मकान में बहुत कम तिबारी देखने को मिलती हैं , अब तक के  सर्वेक्षण में तो नहीं मिली है।   जगदीश प्रसाद  उनियाल की तिबारी की अहम विशेषता तिबारी कटान  व तोरण (मंडल , arch , मेहराब  अर्ध गोल मुरिन्ड )  तिपत्ती   रूप।  स्तम्भ व मेहराब मिलन के थांत पर कहीं भी छिलपट्टी /ब्रैकेट  नहीं है।
  चार स्तम्भों वाली तिबारी भी आम तिबारियों जैसे ही तीन मोरी /द्वार , खोळी  वाली तिबारी है। तिबारी पहली मंजिल के  पाषाण छज्जे  पर ही आधारित है।   दक्षिण गढ़वाल या गढ़वाल की अन्य तिबारियों भांति इस तिबारी के स्तम्भ में  आधार पर कुम्भी , फिर  डीला /round wooden  bracket , फिर उर्घ्वगामी पदम् दल , फिर शाफ़्ट  की मोटाई कम होना व  फिर डीला , उर्घ्वगामी कमल दल व फिर तोरण का अर्ध मंडल जो दूसरे  स्तम्भ के अर्ध तोरण से मिल पूरा तोरण बनता है।  दक्षिण गढ़वाल की अधिकतर तिबारियों में उर्घ्वगामी कमल दल के बाद जब शाफ़्ट कम मोटा जाता होता है तो स्तम्भ गोलाई लिए होता है किन्तु  जगदीश प्रसाद  उनियाल की तिबारी में स्तम्भ के शाफ़्ट गोलाई में न हो चौकोर हैं जो एक विशेषता है। शाफ़्ट के ऊपर डीले भी गोल नहीं अपितु चौकोर ही हैं।  यद्यपि तोरण तिपत्ती  आयकर का है किन्तु दीखनेमे कच अलग ही लगता है। 
 तोरण के बाम व दायं  पट्टिकाओं में में अष्टदल पुष्प अंकित है व वानस्पतिक अलंकरण है।  टॉर्न के ऊपर शीर्ष (मुरिन्ड ) आयताकार पट्टिका की है।  ज्यामितीय व प्राकृतिक कला /अलंकरण का नयनाभिरामी नमूना है।  मानवीय अलंकरण इस तिबारी में नहीं हुए हैं।
  निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि अमाल्डू  म ेजगदीश प्रसाद  उनियाल के  तिपुर मकान की तिबारी कई दृष्टि से दक्षिण गढ़वाल की तिबारियों से भिन्न भी है व विशेष विशेष्ता लिए है।   

सूचना व फोटो आभार  :  अशोक उनियाल , अमाल्डू
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
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