Author Topic: Jagar: Calling Of God - जागर: देवताओं का पवित्र आह्वान  (Read 201123 times)

rajsha0222

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जागर का मतलब होता है जगाना। उत्तराखण्ड तथा नेपाल के पश्चिमी क्षेत्रोँ मेँ कुछ ग्राम देवताओँ की पूजा कि जाती है, जैसे गंगनाथ, गोलु, भनरीया, काल्सण आदि। बहुत देवताओँ को स्थानीय भाषा मेँ 'ग्राम देवता' कहा जाता है। ग्राम देवता का अर्थ गांव का देवता है। अत: उत्तराखण्ड और डोटी के लोग देवताओँ को जगाने हेतु जागर लगाते हैँ।

जागर मन्दिर अथवा घर मेँ कहीं भी किया जाता है। जागर "बाइसी" तथा "चौरास" दो प्रकार के होते हैँ. बाइसी बाईस दिनोँ तक जागर किया जाता है। कहीँ-कहीं दो दिन का जागर को भी बाईसी कहा जाता है। चौरास मुख्यतया चौधह दिन तक चलता है। पर कहिँ कहिँ चौरास को चार दिनोँ मेँ ही समाप्त किया जाता है। जागर मेँ "जगरीया" मुख्य पात्र होता है। जो रामायण, महाभारत आदी धार्मीक ग्रंथोँ की कहानीयोँ के साथ ही जीस देवता को जगाया जाना है उस देवता का चरित्र को स्थानीय भाषा मेँ वर्णन करता है। जगरीया हुड्का (हुडुक), ढोल तथा दमाउ बजाते हुए कहानी लगाता है। जगरीया के साथ मेँ दो तीन जने और रहते हैँ. जो जगरीया के साथ जागर गाते हैँ और कांसे की थाली को नगडे की तरह बजाते हैँ. जागर का दुसरा पात्र होता है "डंगरीया" (डग मगाने वाला) डंगरीया के शरीर मेँ देवता चढता है। जगरीया के जगाने पर डंगरीया कांपता है और जगरीया के गीतोँ की ताल मेँ नाचता है। डंगरीया के आगे चावल के दाने रखे जाते हैँ जिसे हाथ मेँ लेकर डंगरीया और लोगोँ से पुछा गया प्रश्न का जवाफ देता है। कोही कोही डंगरीया आदमी का भुत भविष्य तथा वर्तमान सटिक बताते हैँ. जागर का तीसरा पात्र होता है स्योँकार (सेवाकार) स्योँकार उसे कहा जाता है जो अपने घर अथवा मन्दिर मेँ जागर कराता है और जगरीया, डगरीया लगायत अन्य लोगोँ के लिए भोजन पानी का पुरा व्यवस्था करता है। जागर कराने से स्योँकार को इछ्छीत फल प्राप्ती का विश्वास किया जाता है।

उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है, कहा जाता है कि इस पवित्र धरती पर हिन्दू मान्यताओं के अनुसार समस्त ३३ कोटि

देवी-देवताओं का वास है। इन सभी देवी-देवताओं का हमारी संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है और उत्तराखण्ड में देवी-देवता हर कष्ट का निवारण करने के लिये हमारे पास आते है, किसी पवित्र शरीर के माध्यम से और इसी प्रक्रिया को कहा जाता है- जागर।

जागर का अर्थ है एक अदृश्य आत्मा (देवी-देवताओं) को जागृत कर उसका आह्वान कर उसे किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित करना और इस कार्य के लिये जागरिया जागर लगाता है, देवता की जीवनी और उसके द्वारा किये कार्यों का बखान करता है। इसमें हमारे लोक वाद्य हुड़्का और कांसे की थाली का प्रमुख रुप से प्रयोग किया जाता है।

“मूल में जागर क्या है?…….कि सिद्धिदाता भगवान गणेश, संध्याकाल का प्रज्जवलित पंचमुखी पानस, माता-पिता, गुरु-देवता, चार गुरु चौरंगीनाथ, बारगुरु बारंगी नाथ, नौखण्डी धरती, ऊंचा हिमाल-गहरा पाताल, कि धुणी-पाणी सिद्धों की बाणी-बिना गुरु ग्यान नहीं, कि बिणा धुणी ध्यान नहीं, चौरासी सिद्ध-बारह पंथ-तैंतीस कोति देवता-बावन सौ बीर-सोलह सौ मशान, न्योली का शब्द-कफुवे की भाषा, सुलक्षिणी नारी का सत, हरी हरिद्वार कि, बद्रीकेदार, पंचनाम देवताओं का सत, इन सभी के धीर-धरम, कौल करार और महाशक्ति को साक्षी करके बजने लगा……शंख…कांसे की थाली और बिजयसार का ढोल और ढोल के बाईस तालो के साथ जगरिया बजाने लगा हुड़्का- भम भाम, पम पाम और पय्या के सोटे से बजने लगी कांसे की थाली……..।”

जागर कई प्रकार की होती है,

जागर- एक दिन की होती है।

चौरास- चार दिन के इस कार्यक्रम को चौरास कहते हैं।
बैसी- बाईस दिन के कार्यक्रम को बैसी कहते हैं।
इसमें मुख्य रुप से तीन लोगों की आवश्यकता होती है,

१- जगरिया या धौंसिया
२- डंगरिया
३- स्योंकार-स्योंनाई

जगरिया या धौंसिया- उस व्यक्ति को कहा जाता है जो अदृश्य आत्मा को जागृत करता है, इसका कार्य देवता की जीवनी, उसके जीवन की प्रमुख घटनायें व उसके प्रमुख मानवीय गुणों को लोक वाद्य के साथ एक विशेष शैली में गाकर देवता को जागृत कर उसका अवतरण डंगरिया से शरीर में कराना होता है। यह देवता को प्रज्जलित धूनी के चारों ओर चलाता है और उससे जागर लगवाने वाले की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध करता है। यह कार्य मुख्यतः हरिजन समाज के लोग करते हैं और यह समाज का सम्मानीय व्यक्ति होता है, इसके लिये जागर लगवाने वाला व्यक्ति नये वस्त्र और सफेद साफा लेकर आता है और यह उन्हें पहन कर यह कार्य करता है। जगरिया को भी खान-पान और छूत आदि का भी ध्यान रखना होता है।

डंगरिया- डंगरिया वह व्यक्ति होता है, जिसके शरीर में देवता का अवतरण होता है, इसे डगर (रास्ता) बताने वाला माना जाता है, इसलिये इसे डंगरिया कहा जाता है। जब डंगरिया के शरीर में देवता का अवतरण हो जाता है है तो उसका पूरा शरीर कांपता है और वह सभी दुःखी लोगों की समस्याओं के समाधान बताता है, उसे उस समय देवता की तरह ही शक्ति संपन्न और सर्वफलदायी माना जाता है। डंगरिया को समाज में मह्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है और सभी उसका आदर और सम्मान करते हैं। इस व्यक्ति की दिनचर्या हमारी तरह सामान्य नहीं होती, उसे रोज स्नान ध्यान कर पूजा करनी होती है, वह सभी जगह खा-पी नहीं सकता। यहां तक कि चाय पीने के लिये भी विशेष ध्यान उसे रखना होता हैआ उसे हमेशा शुद्ध ही रहना होता है अन्यथा देवता कुपित हो जाते हैं और उस व्यक्ति को दण्ड देते हैं ऎसी मान्यता है। उसकी दिनचर्या को चरची कहा जाता है। जागर के वक्त भी डंगरिया गो-मूत्र, गंगाजल और गाय के दूध का सेवन कर, शुद्ध होकर ही धूणी में जाते हैं।

स्योंकार-स्योंनाई- जिस घर में जागर या बैसी या चौरास लगाई जाती है, उस घर के मुखिया को स्योंकार और उसकी पत्नी को स्योंनाई कहा जाता है। यह अपनी समस्या देवता को बताते हैं और देवता के सामने चावल के दाने रखते हैं, देवता चावल के दानों को हाथ में लेते हैं और उसकी समस्या का समाधान बताते हैं।

जागर के लिये धूणी- जागर के लिये धूणी बनाना भी आवश्यक है, इसे बनाने के लिये लोग नहा-धोकर, पंडित जी के अगुवई में शुद्ध होकर एक शुद्ध स्थान का चयन करते हैं तथा वहां पर गौ-दान किया जाता है फिर वहां पर गोलाकार भाग में थोड़ी सी खुदाई की जाती है और वहां पर लकड़ियां रखी जाती हैं। लकड़ियों के चारों ओर गाय के गोबर और दीमक वाली मिट्टी ( यदि उपलब्ध न हो तो शुद्ध स्थान की लाल मिट्टी) से यहां पर लीपा जाता है। जिसमें जागर लगाने से पहले स्योंकार द्वारा दीप जलाया जाता है, फिर शंखनाद कर धुणी को प्रज्जवलित किया जाता है। इस धूणी में किसी भी अशुद्ध व्यक्ति के जाने और जूता-चप्पल लेकर जाने का निषेध होता है।

जागर का मुख्य कार्य करता है जगरिया और वह जागर को आठ भागों में पूरा करता है।
१- प्रथम चरण – सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
२- दूसरा चरण- बिरत्वाई गायन (देवता की बिरुदावली गायन)
३- तीसरा चरण- औसाण (देवता के नृत्य करते समय का गायन व वादन)
४- चौथा चरण- हरिद्वार में गुरु की आरती करना
५- पांचवा चरण- खाक रमाना
६- छठा चरण- दाणी का विचार करवाना
७- सातवां चरण- आशीर्वाद दिलाना, संकट हरण का उपाय बताना, विघ्न-बाधाओं को मिटाना
८- आठवां चरण- देवता को अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत और हिमालय को प्रस्थान कराना

जागर के प्रथम चरण में जगरिया हुड़्के या ढोल-दमाऊं के वादन के साथ सांझवाली का वर्णन करता है, इस गायन में जगरिया सभी देवी-देवताओं का नाम, उनके निवास स्थानों का नाम और संध्या के समय सम्पूर्ण प्रकृति एवं दैवी कार्यों के स्वतः प्राकृतिक रुप से संचालन का वर्णन करता है।

जै गुरु-जै गुरु
माता पिता गुरु देवत
तब तुमरो नाम छू इजाऽऽऽऽऽऽ
यो रुमनी-झूमनी संध्या का बखत में॥
तै बखत का बीच में,
संध्या जो झुलि रै।
बरम का बरम लोक में, बिष्णु का बिष्णु लोक में,
राम की अजुध्या में, कृष्ण की द्वारिका में,
यो संध्या जो झुलि रै,
शंभु का कैलाश में,
ऊंचा हिमाल, गैला पताल में,
डोटी गढ़ भगालिंग में

जागर एक पवित्र और लम्बा अनुष्ठान है।

मित्रो ॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥
सादर नमन, वंदन एवं अभिनन्दन
आप का आने वाला प्रत्येक नया दिन मंगलमय हो
नमस्कार ... जी पं.-श्री प्रकाश चंद्र तिवारी जी १- १० - २०१४

Bhishma Kukreti

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          झाली माली देवी  जागर या कैंतुरा पूजा वार्ता

इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

( रणवीर सिंह चौहान , चौरस की धुंयाल से साभार जिन्होंने द्युसी , मन्यार्स्युं केजागरी से यह जागर प्राप्त किया )
 झाली माली देवी
पहली ओंकार पैदा होइहुंकार से फुंकार
जै से धौं धौं कार -धौं धों कार से जलंकार
जलंकारम शक्ति पैदा होइ
अष्ट भुजा चार नेत्र हातमा शक चक्र अर गज शक्ति
हल -हल नुस्ल खटक खपर -हे भगवती कुमाऊं
माँ झाली कुण्ड पर ये देवी पैदा ह्वाया हे मेरी माता
ये झाली कुण्ड मा चमोलों का वंश मा पैदा ह्वाया
हे देवी कैंतुरा की झाली माली जैका साथ में
अष्ट भैरों चौसठ काली और नौ बीर नारसिंग
खैकदास -उदास गुरु शाकम्बरी युकु जमाण चलद
सोलह भाई सौड़ बारह भाई पड़ियारी ई झाली
माली की डोली चलदना

Bhishma Kukreti

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 Jagar /Folk Ritual Song of Bharadi Devi  from Garhwal

              भराड़ी देवी जागर

 इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

( रणवीर सिंह चौहान , चौरस की धुंयाल से साभार  )

नाम लेंदो तेरो माता भराड़ी -बुद्धि देंदा मा तू मैंने अग्वाड़ी

तेरा कुण्ड कु छंद बणौलु -माता भराड़ी तै मैं चढ़ौलु

कुंड का डांडा नैर थुनैर - नैर थुनैर का वासीना

देवतौन छोड़े ओ प्यारु स्वर्ग - आसन लिने भराड़ी योन

कुण्ड का डांडा छणी च झाडी - देखेंदी यनि जनि बगीचा बाड़ी

कुण्ड का डांडा बड़ा बड़ा रयाल -पशु और पक्षी खूब नयाला

कुण्ड का डांडा शेर को डेरो -दिन भर मार्दो जंगल को फेरो

भराड़ी ढंग का ऐंच भराड़ी मंदिर -रयाला की ध्वज लांदी सुंदर

छनियों का पाछे आंछरी को डेरो -काफी लम्बो चौड़ौ कुण्ड को डेरो

औजार एक छेंड़ा बेड़ताल -भड़ छौ यख ग्याडू घलवाल

शेर बागो से सेरखदा छया साथ -खुस छ यीं यों पर भराड़ी माता

से पड़ रया वै प्यारा कुण्ड -शेर भालो का जख रंदा छया झुण्ड

कुण्ड का सहारा पर सारी औण रैका -धन चैन सहारा पर जैका

माता भराड़ी यख बड़ी पर्चा धारी -निर्भय से जाँदा यख नर नारी

पट्टी फैगुल वख जात्रा औंदा -माता भराड़ी के जस बढोंदा

कुण्ड को रास्ता दैंत खाल बिटि -कखी वली काख कखी पल्य पीठी

दैंत खाल बिटी सिदो हिटैंदो -पण गोदा बिटी चढ़ाई चढेंदी

जोगी की चौंरी को डाँडो भी ऊंचो -भैल उन्दो पावा सगीचो


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Bhishma Kukreti

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         ढोल सागर का   अगला भाग (4 ) जिसमे ब्रह्मा विष्णु , महेश का वर्णन है
                                     इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती
 
           इति ढोल उत्पति बोलिजे रे आवजी II करिबना कठिन चन्द्र बिना दाताररघुपति जजर फुलम स्याम फुलं जैगंधी नाम अर बल छाया अरत परत संज्या गुनि हो गंधबर माल घोपिरस भीरुदूत चोबि फनू साख बोमंदे देवता बड़ा हश्ती गंगा पात्र पचंडे को देवता अरे आवजी अगवान बोलिजे। पैलि धरती की आकास।  पैलि स्त्री की पुरुष। पैलि रात की दिन। पैलि गुरु की चेला। पैलि धूत की सिक। पैलि माई की पूत। कौन नाम असगर  लिन्या कौन नाम फसगर लिन्या II ईश्वरोवाच II परथमे धरती पीछे आकास II परथमे स्त्री पीछे पुरुष।  पैले रात पीची दिन।  पैले गुरु पीछे चेला।  पैले सिक पीछे धूत। पैले माई पीछे पूत। अरे गुनिजनम महादेव जी ने असगर लिन्या विष्णु जी ने नारायण परखंड चढ़ाई तकस्य पुत्रगजाबलम IIअरे कुण्डली वसना IIपार्वत्युवाचII  अरे गुनीजनम गजाबलम गनारपति पुत्रंच आदि नामकंडीसणा सुरतनाम कुंडली वसना। सुनहो ब्रह्माजी  सदाशिव जटामुकुटम शारदाकामस टकीटिइक जहिरा का खंड ब्रह्माण्ड।  कहो गुनीजनम शारदा विचारम। सवता डीत पंत हो विष्णु। नव खंड ब्रह्माण्ड चार विचारम ।   बारा वाजी त शारदा नौखंडम चैव II  ईश्वरोवाच II सुन रे वादी विवादी कहाँ बैठे तेरी अष्ट अंगुल आत्मा जीऊ।  आदि नवाति अनादि नवाति पनावति आसण तेरो कौन ठौऊ। कहाँ स्वर्ग इंद्र।  कहाँ पाताल वासुकी। कहाँ गुरु तुमारा II पार्वत्युवाच II अरे आवजी बुंदकार बसे बादी  बिबादी सुनकार बैठी मेरी आत्मा जिऊ। आदि नवाति पृथ्वी अनादि नवाति आसण आसण मेरो गुणठाऊं।  गुणठाई से प्रक्षत राजा इंद्र पातले जात बासुकी राज कहाँते। मनेच्छा काया निरंजन हमारी नाऊँ हम जल में प्रकट इष्ट घड़ी बिना जोड़ी बिना मढ़ी। फजरीमड़ी द श य रा ली गो स मां ई पू फु मे धे म मि ग ध कौन उपाई। ईश्वरोवाच।  अरे गुनीजन बिन पौन हमारी मड़ी अ र द स हु र लि गो मेथरम समीजी स्यामी में धे गंगा जो पौन उपाई। पार्वत्युवाच।  कौन घट माता कौन घट पिता कौन घट बोलिजो छाजा  II जो दिन आफु शम्भु निरंजन उतपन तै दिन दुनिया मा क्या बाजन्ति बाजा  II ईश्वरोवाच  II अरे गुनीजनम घटमाता अनिलघट पिता अनिलघट बोलिजे छाजा।  जै दिन शंभु निरंजन उत्पन्न भयो तै दिन दुनिया त्रिभुवन में परथमे जियो बाजेत्र बजे।  अथ  चा र चका चासणे लिख्यते। पार्वत्युवाच।  चह चह चह चस चस चस चस चासण बाजी सत्तगुरुजी ने उपाया ओंकार तुम कौन गुरु पढ़ाया।  तुमसे ज्ञान उपाऊँ रैदास किन मुख बोले चास। अरे गुनीजन ऊँकार च मुष चास घासणी बाजी त्रि ख टि त्रि खटि भेण सुरत्य किरणि भानु मुख वा माता सुख बाजी चासणी।  चस मेरी गजामुखबाजन्ति बारामुखबाजन्ति बारबेलवाले।  च स चंद सूर्य दीपक बाजी वेद पुराण बाजे। जुग चार रात दिन दुई कथम बाजी धुरम कुरम पाताल बाजे श्रिष्टि संसार। च ह चार खूंट बाजन्ति। चह चोद्ध् भुवन बाजन्ति च ह धुरम तीन बार बाजन्ति।  च ह गढ़ चावरंगी बाजन्ति। चह बाजन्ति मेरु मंडिल बावन बीर। चह चंदन को सारंग जमौली मरु तो मंदिरम सागरा सप्त द्वीप वसुंधरा।  चह कुरुक्षेत्र बाजन्ति।  च ह चार जुग बाजन्ति। चह चौरासी लक्ष जीवन बाजन्ति चार वेद बाजन्ति कालदंडबाजन्ति। गजा शब्द बाजन्तिघटा घुंगरू नकतालु को धोका पीछे। चावर छत्रडंडक मण्डलु डांडी घोड़ा पीछे में अगवान दास आगे आऊ रे आवजी।



 -- (ब्रह्मा नन्द थपलियाल द्वारा संपादित )

ढोल सागर का अगला खंड  भाग -5 में पढिए

rajsha0222

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Helooo ms mehta sir plz upload any jagar video if u have plz bhot din ho gaye koi jagar nhi dekha plz koi jagar video kijiyw

 

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