Author Topic: Marriages Customs Of Uttarakhand - उत्तराखंड के वैवाहिक रीति रिवाज  (Read 87072 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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IN NUTSHELL

Almost same tradition are followed in marriage of kumoani & garwali except for a few. Please go through this article .

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GARHWALI WEDDING
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India is the land of 28 beautiful States and 7 Union Territories. Each state is different from another in many ways. Each state has its own language,

traditions, customs, rituals etc. In short and snappy terms, unity in diversity is one of the finest features of India. India is distinguished for its proud

culture and customs and one of them is Indian Wedding. Each state has its own style, own style even own wedding ways.

One of the beautiful states of India is Uttarakhand. This state has two regions Garhwal & Kumaon. Garhwal is a beautiful region surrounded by stunning hills,

picturesque vistas and scenic beauty on all sides. Furthermore, it is also well known for its superb wedding traditions as well as anti dowry approach. Today

the time has been changed but some customs are still the identical in the region such as pre-arranged marriages are preferred, matching the horoscopes of the

future bride and bridegroom, status of the family, rigid caste system etc.

After following all the above steps engagement ceremony is the next pivotal step of Garhwali wedding. By tradition, the marriage procession is led with a

white flag known as ��~Nishan ��~(representing the bridegroom) along with traditional band that are shehnai, piper, a pair of drummers and a nagara. The last man

of the marriage procession carries red flag that represents the bride. On arrival at the brides residence like any other Indian wedding food is served along

with flawless services and ethnic style. Nose ring ceremony also known as ��~nath ceremony’ is one of the unique customs of Garhwali Wedding. In this ceremony

beautiful traditional Nath is presented to the bride.


After that the Phera ceremony takes place. In succinct, they have to complete the seven rounds of the sacred fire. While returning the marriage procession is

led with the red flag along with the red 'Doli' of the bride as well as ��~Palki’ of the bridegroom. Now the last man of the marriage procession carries white

flag instead of red flag. Many rituals and 'Puja' takes place from beginning to last till the bride finally steps into bridegroom’s house. Gauna system is

not the part of Garhwali Wedding.


In addition, Garhwali

Dinesh Bijalwan

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शाको चारः


इस विधान में वर एवं वधु पक्ष के आचार्यो द्वारा अपने अपने(वर एवं वधु के) कुल का वर्णन किया जाता है|
पहले वधु पक्ष के आचार्य द्वारा प्रशन किया जाता है (कि वर्णं, कि शाखा, कि गोत्रस्य... ?)| फिर वर के आचार्य द्बारा अपने तीन पीडियों का वर्णन किया जाता है| वर्ण, वेद ध्यायी, शाखा अन्य बताया जाता है| फिर यही प्रश्न वर पक्ष के आचार्य द्वारा पुछा जाता है  और वधु पक्ष द्वारा उत्तर दिया जाता है|  गढ्वाली मे इसे  गोत्रोच्चार कहा जाता है

Dinesh Bijalwan

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बर को  नाराय्ण ( विशणु ) माना जाता है और  कन्या को  लक्छ्मी

हेम पन्त

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उत्तराखण्ड के सभी हिस्सों में शादी व अन्य आयोजनों पर बैठकर सामुहिक भोज किया जाता है. इस सामुहिक भोज को "लौर" में खाना कहा जाता है. कुछ हिस्सों में तो यह प्रथा है कि सभी लोगो के खाना समाप्त कर चुकने के बाद ही एक साथ खाने से उठते हैं, भोज के बीच से उठने को अभद्रता माना जाता है. हालांकि "लौर" में खाने की यह प्रथा अब सिर्फ कुछ इलाकों (गांवों) तक सिमट कर रह गई है.



हेम पन्त

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उत्तराखण्ड में शादी व अन्य शुभ कार्यों पर महिलाओं द्वारा मंगल गीत गाने का रिवाज है. इन गीतों को गढवाल मण्डल में मांगल कहा जाता है और कुमाऊं में शकुनांखर या फाग कहा जाता है. यज्ञोपवीत, नामकरण व विवाह के विभिन्न चरणों के लिये अलग-२ गीत निर्धारित हैं. सभी शकुनाखर या मांगल मुख्यतया कुलदेवताओं, भूमिदेवताओं और परिवार के पूर्वजों को समर्पित होते हैं.

पंकज महर जी द्वारा उपलब्ध कराया गया कुमाऊं का एक शकुनाखर..


शकूना दे, शकुना दे,
काज ये अती नींको सो रंगीलो,
पाटलो आंचली कमलौ को फूल।
सोही फूल मोलावंत, गणेश,
रामीचन्द्र, लछीमण, जीवा जन में,
जीवा जन में आद्या अमरु होय।
अमरु होय, सोही पांटो पैरी  रैना,
सिद्धि बुद्धि, सीता देही, बहुरानी,
आई वान्ती पुत्र वान्ती होय,
सोही फूल मोलवन्ती,
(परिवार के पुरुषों के नाम)जीवा जन में आद्या अमरु होय,
सोही पाटो पैरी रैना,
सिद्धि-बुद्धि (परिवार की स्त्रियों के नाम)


पंकज सिंह महर

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फोटो- हेम पंत

उत्तराखंड में विवाह के अवसर पर ब्योला (दुल्हे) और ब्योली (दुल्हन) को मुकुट पहनाया जाता है, दुल्हे के मुकुट पर गिर्जापति नंदन गणेश जी अंकित होते है और दुल्हन के मुकुट पर श्रीकृष्ण एवं राधा जी अंकित होते है, विवाह के अवसर पर दुल्हे को विष्णु जी और दुल्हन को लक्ष्मी जी का रूप माना जाता है|

पंकज सिंह महर

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इस वीडियो में सुआल-पथाई का दृश्य फिल्माया गया है।

http://www.youtube.com/watch?v=eK8g3BpTl7c

पंकज सिंह महर

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बारात वापसी के समय गृह प्रवेश तक ब्योली (दुल्हन) ब्योले (दूल्हे) से आगे ही चलती है, ब्योली डोली में लाई जाती है और ब्योला घोड़े पर सवार रहता है।

Mohan Bisht -Thet Pahadi/मोहन बिष्ट-ठेठ पहाडी

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भिटोली - शादी के दिन

हमारे यहाँ पर एक और प्रथा है जिस दिन लड़की की विदाई होती है उसी दिन बरात के बिदा होने के बाद शाम को लड़की की तरफ कुछ लोग दुल्हन के साथ जाते है !  जिसे भिटोली भी कहते है !


hum logo ke yaha barat ke saath matlab dulhan ke saath dulhan ka bhai ya phir koye bhi chacha tau mai jo bhi bhai bada ho ya chota o jaata hai unhe minayee kahte hai.. jo khas kar bhai hi jaata hai... aur wahah jaar kar chawal (bhaat)ka bhaujan nahi karta hai.. roti sabji ya phir puri sabji i bahan ke ghar jaa ke khata hai ..

bhai ka barat ke sath jane ka mtlb hota hi ki waha apne bahan ko sakusal sasural pahuchaye...baki badi lambi baate hai isme abhi ke liye itni hi..


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड में शादी के रीति रिवाज-प्रथम भाग
दोस्तो जैसे की आप लोग भली भांति जानते है कि हमारे यहा शादी-ब्याह का अपना एक अलग ही महत्व है. शादी का समय सबसे खुशी देने वाला समय होता है. छोटा हो या बड़ा, सभी लोग शादी के उत्सव को बड़े ही उत्साह और खुशी के साथ मनाते है. शादी के समय गाँव, घर परिवार में एक अलग ही माहोल देखने को मिलता है.

वैसे शादी तो हर समुदाय में बड़े ही धूम धाम से मनाई जाती है लेकिन उत्तराखंडी शादी की अपनी एक अलग ही विशेषता होती है जो इसको दूसरों से अलग करता है.

मेरे गाँव में शादी किस प्रकार से मनाई जाती है, शादी के दिन घर परिवार, गाँव का माहोल कैसा रहता है, इसके बारे में विस्तृत जानकारी लेकर आप लोगों के सामने आ रहा हूँ

मेंहदी का दिन

दोस्तो हमारे यह शादी की धूम धाम मेंहदी की रात से ही शुरू हो जाती है. अगर जो लोग आर्थिक रूप से सम्म्पन होते है तो मेंहदी की रात से ही पूरे गाँव के लिए सामूहिक भोज का प्रबंध शादी वाले परिवार द्वारा किया जाता है जो कि तब तक चलता है जब तक बरात की विदाई (यदि लड़की की शादी है ) और बरात की वापसी (यदि लड़के की शादी है ) न हो जाती है.

सबसे पहले मेंहदी के दिन की बात करता हूँ. मेंहदी का जश्न दोनों शादियों (लड़का और लड़की ) में एक ही प्रकार से मनाया जाता है. सबसे पहले शाम को ४ बजे के बाद सामूहिक भोज के लिए भोजन का प्रबंधन शुरू हो जाता है. गाँव के एक ब्यक्ति को राशन का घरबारी बनाया जाता है जो कि पूरे कार्य के लिए राशन देता है. उसको एक अलग कमरा दिया जाता है जहा पर सारी खाद्य सामग्री रखी जाती है और उस कमरे की चाबी उस मुख्य ब्यक्ति (घरबारी ) को दी जाती है. उसके बाद परिवार वाला कोई भी सदस्य उसके कार्य में हस्त्छेप नही कर सकता है. पूरी राशन-पाणी की जिम्मेदारी उसी ब्यक्ति के कन्धों पर सोंप दी जाती है.

फ़िर गाँव के नोजवान सब्जी काटते है और सब्जी -दाल बानाने की जिम्मेदारी गाँव के नाज्वान और बुजुर्गों(पुरूष समाज) की होती है. फ़िर रोटी बानाने के लिए गाँव की महिलाओं को आवाज (धो) लगाई जाती है. गाँव की सभी महिलाएं अपने अपने तवे, परात, चकला-बेलन, जानती के साथ रोटी बनाने के लिए एक चोक में एकत्त्रित हो जाती है. फ़िर घरबारी के द्वारा प्रत्येक महिला को १ पाथी आटा गूंदने के लिए दिया जाता है और साथ में ये भी ख़बर दार किया जाता है कि १ पाथी पर कम से कम ७० रोटियां बनानी चाहिए और जो सबसे ज्यादा रोटी बनाएगा उसको कुछ इनाम दिया जाएगा. ये इसलिए किया जाता है कि तब महिलाएं रोटियां अच्छी बनाये, ताल्बरई न करें.

रोटियां बनाते समय गाँव के नव युवक मंगल दल द्वारा सभी लोगों के लिए चाय का वितरण किया जाता है. रोटियां बनाने के बाद अब बारी आती है हलवा (सूजी) बनाने की. ये काम थोड़ा सा कठिन लगता है आज की युवा पीड़ी को लेकिन फ़िर भी सभी लोग सूजी भूनते है, बारी बारी से सभी लोग सूजी भूनने में अपना योगदान करते है. हलवा पकाने के बाद उसको घरबारी के कमरे में रख दिया जाता है और थोड़ा थोड़ा सा हलवा सबको बाँट दिया जाता है.

इस प्रकार भोजन का बंदोबस्त किया जाता है, भोजन बनाने की ये परिक्रिया लगभग सभी दिनों के लिए समान होती है.

रात को ८ बजे के बाद गाँव के सभी लोगों को आवाज लगाई जाती है कि अपने अपने परोशा (अपने अपने हिस्से का खाना (पूरे परिवार के लिए )) ले जाय. इस प्रकार सभी गाँव वालों को परोषा दिया जाता है, चोक पर केवल नव युवक मंगल दल और शादी वाले परिवार वाले भोजन करते है (केवल रात के भोज में ).

भोजन करने के बाद सभी लोग चोक में इकठ्ठा हो जाते है और मेंहदी की रस्म शुरू करते है, सभी सभी अपने अपने हाथों में मेंहदी लगाते है (जो इच्छुक होते है). मेंहदी की रस्म भी दोनों शादियों (लड़का और लड़की ) में समान होती है. जो लोग मेंहदी नही लगाते है वो नाच -गाने में मस्त रहते है. पहाडी , हिन्दी और पंजाबी गानों पर सभी युवा पीड़ी थिरकती है. लगभग रात के १२-१ बजे तक नाच गाने का ये कार्यक्रम चलता है जिसमे कि सभी लोग नाचते है, लड़के लड़कियां. यहा तक कि कभी कभी घर गाँव के बुजुर्ग पुरूष महिला भी पहाडी गानों में हामारे साथ नाचते है. इस प्रकार मेंहदी की रस्म पूरी होती है.

http://kandpalsubhash.blogspot.com/2008/06/blog-post.html

 

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