Author Topic: Our Culture & Tradition - हमारे रीति-रिवाज एवं संस्कृति  (Read 35183 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
कर्मकर्ता को एक बार हविष्यान्न भोजन करके ब्रह्मणचर्य-पूर्वक रहना पड़ता है । पहले, तीसरे, पाँचवे, सातवें या नवें दिन से दस दिन तक प्रेत को अंजलि दी जाती है, तथा श्राद्ध होता है ।

मकान के एक कमरे में लीप-पोतकर गोबर की बाढ़ लगाकर दीपक जला देते हैं । कर्मकर्ता को उसमें रहना होता है । वह किसी को छू नहीं सकता । जलाशाय के समीप नित्य स्नान करके तिलाञ्जलि के बाद पिंडदान करके छिद्रयुक्त मिट्टी की हाँड़ी को पेड़ में बाँध देते हैं, उसमें जल व दूध मिलाकर एक दंतधावन (दतौन) रख दिया जाता है और एक मंत्र पढ़ा जाता है, जिसका आशय इस प्रकार है - "शंख-चक्र गदा-धारी नारायण प्रेतके मेक्ष देवें ।

आकाश में वायुभूत निराश्रय जो प्रेत है, यह जल मिश्रित दूध उसे प्राप्त होवे । चिता की अग्नि से भ किया हुआ, बांधवों से परिव्यक्त जो प्रेत है, उसे सुख-शान्ति मिले, प्रेतत्व से मुक्त होकर वह उत्तम लोक प्राप्त करे ।" सात पुश्तके भीतर के बांधव-वर्गों को क्षौर और मुंडन करके अञ्जलि देनी होती है । जिनके माता-पिता होते हैं, वे बांधव मुंडन नहीं करते, हजामत बनवाते हैं । दसवें दिन कुटुम्बी बांधव सबको घर की लीपा-पोती व शुद्धि करके सब वस्र धोने तथा बिस्तर सुखाने पड़ते हैं ।

 तब घाट में स्नान व अञ्जलिदान करने जाना पड़ता है । १० वें दिन प्रेत कर्म करने वाला हाँड़ी को फोड़ दंड व चूल्हे को भी तोड़ देता है, तथा दीपक को जलाशय में रख देता है । इस प्रकार दस दिन का क्रिया-कर्म पूर्ण होता है । कुछ लोग दस दिन तक नित्य दिन में गरुड़पुराण सुनते हैं ।

ग्यारहवें दिन का कर्म एकादशाह तथा बारहवें दिन का द्वादशाह कर्म कहलाता है । ग्यारहवें दिन दूसरे घाट में जाकर स्नान करके मृतशय्या पुन: नूतन शय्यादान की विधि पूर्ण करके वृषोत्सर्ग होता है, यानि एक बैल के चूतड़ को दाग देते हैं । बैल न हुआ, तो आटे गा बैल बनाते हैं । ३६५ दिन जलाये जाते हैं । ३६५ घड़े पानी से भरकर रखे जाते हैं । पश्चात् मासिक श्राद्ध तथा आद्य श्राद्ध का विधान है ।


http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/utrn0034.htm

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
द्वादशाह के दिन स्नान करके सपिंडी श्राद्ध किया जाता है । इससे प्रेत-मंडल से प्रेत का हटकर पितृमंडल में पितृगणों के साथ मिलकर प्रेत का बसु-स्वरुप होना माना जाता है । इसके न होने से प्रेत का निकृष्ट योनि से जीव नहीं छूट सकता, ऐसा विश्वास बहुसंख्यक हिन्दुओं का है ।

इसके बाद पीपल-वृक्ष की पूजा, वहाँ जल चढ़ाना, फिर हवन, गोदान या तिल पात्र-दान करना होता है । इसके अनन्तर शुक शान्ति तेरहवीं का कर्म ब्रह्मभोजनादि इसी दिन कुमाऊँ में करते हैं । देश में यह तेरहवीं को होता है ।

श्राद्ध - प्रतिमास मृत्यु-तिथि पर मृतक का मासिक श्राद्ध किया जाता है । शुभ कर्म करने के पूर्व मासिक श्राद्ध एकदम कर दिए जाते हैं, जिन्हें "मासिक चुकाना" कहते हैं ।

साल भर तक ब्रह्मचर्य पूर्वक-स्वयंपाकी रहकर वार्षिक नियम मृतक के पुत्र को करने होते हैं । बहुत सी चीजों को न खाने व न बरतने का आदेश है । साल भर में जो पहला श्राद्ध होता है, उसे 'वर्षा' कहते हैं ।

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
प्रतिवर्ष मृत्यु-तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है । आश्विन कृष्ण पक्ष में प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध किया जाता है । काशी, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में तीर्थ-श्राद्ध किया जाता है । तथा गयाधाम में गया-श्राद्ध करने की विधि है । गया में मृतक-श्राद्ध करने के बाद श्राद्ध न भी करे, तो कोई हर्ज नहीं माना जाता ।

 प्रत्येक संस्कार तथा शुभ कर्मों में आभ्युदयिक "नान्दी श्राद्ध" करना होता है । देव-पूजन के साथ पितृ-पूजन भी होना चाहिए । कर्मेष्ठी लोग नित्य तपंण, कोई-कोई नित्य श्राद्ध भी करते हैं । हर अमावस्या को भी तपंण करने की रीति है । घर का बड़ा ही प्राय: इन कामों को करता है ।

शिल्पकार हरिजन जो सनातनधर्मी हैं, वे अमंत्रक क्रिया-कर्म तथा मुंडन करते हैं, और श्राद्ध ज्यादातर आश्विन कृष्ण अमावस्या को करते है । जमाई या भांजे ही उनके पुरोहित होते हैं

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
ऐसे तो बचने से रही उत्तराखंड की कला-संस्कृति

उत्तराखंड की कला संस्कृति को संजोए रखने को जिम्मेदार महकमों का यही रवैया रहा तो आने वाले दिनों में इसे जीवित रखना मुश्किल हो जाएगा। यदि नुमाइंदों ने भुवनेश्वर (उड़ीसा) में हुए राष्ट्रीय युवा महोत्सव में यदि स्तरीय टीमों को भेजा होता तो निश्चित रूप से इसमें उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का डंका बजता। यह पीड़ा है राष्ट्रीय युवा महोत्सव में भाग लेकर लौटे हिमालयी संगीत शोध समिति की, जिसके सदस्यों ने युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल और संस्कृति विभाग के रवैये के विरोध में गांधीपार्क में धरना दिया।

भुवनेश्वर में आठ से दस जनवरी तक हुए नेशनल यूथ फेस्टिवल में उत्तराखंड के 51 सदस्यीय दल ने शिरकत की, मगर उपलब्धि के नाम पर सिफर ही हाथ लगा। हालांकि, हिमालय संगीत शोध समिति की प्रस्तुति 'कुमाऊं की होली' को वहां खूब पसंद किया गया। भुवनेश्वर से लौटे हिमालय संगीत शोध समिति के सदस्यों ने नेशनल यूथ फेस्टिवल में उत्तराखंड को कोई उपलब्धि हासिल न होने के लिए युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल और संस्कृति विभाग को जिम्मेदार ठहराते हुए इसके विरोध में गांधीपार्क स्थित शहीद स्थल पर धरना दिया।

इस मौके पर समिति के प्रमुख डा.पंकज उप्रेती ने आरोप लगाते हुए कहा कि बीती तीन -चार जनवरी को राजधानी में हुए युवा महोत्सव में नेशनल के लिए उत्तराखंड के दल का चयन सही ढंग से नहीं किया गया। यही नहीं, जब निर्णायकों के फैसलों पर आपत्ति जताई गई तो युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल विभाग ने निर्णायक संस्कृति विभाग की ओर से उपलब्ध कराए जाने की बात कहते हुए पल्ला झाड़ लिया।

 उन्होंने कहा कि दल के चयन में बरती गई लापरवाही का ही नतीजा रहा कि नेशनल यूथ फेस्टिवल में उत्तराखंड को निराशा हाथ लगी। उन्होंने कहा कि यदि लोकसंस्कृति को संजोए रखना है और इसकी चमक देश-विदेश में बिखरे तो इसके लिए ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।

 इस सिलसिले में वह शासन का ध्यान आकृष्ट कराएंगे। उन्होंने युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल अधिकारी देहरादून के कार्याें की जांच की मांग भी उठाई।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6108416_1.html

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
[justify]अग्नि नहीं भगवान बदरीनाथ के फेरों से होता है विवाह

हिंदू विवाह संस्कार की परंपरा लगभग पूरे देश में एक सी हैं, जिसके तहत वर- वधु के अग्निवेदी के फेरे लेने के बाद विवाह संपन्न माना जाता है, लेकिन रुद्रप्रयाग जिले का एक गांव ऐसा है, जहां वेदी के फेरे नहीं लिए जाते।

 मान्यता है कि निरवाली नामक इस गांव बदरीनाथ जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य ने विश्राम किया था। तब से गांव में विवाह के दौरान वर- वधु भगवान बदरीनाथ की मूर्ति के फेरे लेते हैं।

रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि विकासखंड की ग्रामसभा धारकोट के निरवाली गांव में शादी की परंपरा अनोखी है। यहां पर सती ब्राह्मण निवास करते हैं। जहां देशभर में बिना वेदी के विवाह संपन्न होने की कल्पना तक नहीं की जा सकती, वहीं इस गांव में वेदी के स्थान पर भगवान बदरीनाथ की मूर्ति रखी जाती है, जिसे साक्षी मानकर वर- वधु फेरे लेते हैं।

सदियों पुरानी यह परंपरा कब शुरू हुई इसका स्पष्ट पता तो नहीं चलता, लेकिन मान्यता है कि बदरीनाथ की ओर जाते हुए आद्यगुरु शंकराचार्य इस गांव में रुके थे। उन्हीं के निर्देशों के मुताबिक यह गांव भगवान बदरीनाथ की परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

गांव में आज भी भगवान बदरीनाथ का पौराणिक निशान मौजूद है। ग्रामीण टीकाप्रसाद सती बताते हैं कि विवाह समेत अन्य सभी समारोहों में इस निशान को भगवान बदरीनाथ के प्रतीक रूप में शामिल किया जाता है।

 उन्होंने बताया कि निशान की यात्रा भी आयोजित की जाती है, लेकिन इसे ले जाने वाले व्यक्ति को निशान के साथ रहने के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। इतना ही नहीं, पूजा संपन्न होने तक वह अन्न ग्रहण भी नहीं कर सकता।

 श्री सती ने बताया कि गांव में स्थित भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को कोई नहीं छू सकता। मूर्ति ले जाने वाले व्यक्ति को भी नहीं छुआ जाता।

 गांव के निवासी विजय प्रसाद सती, बलीराम सती, पारेश्वर दत्त सती बताते हैं कि ऋषिकेश से बदरीनाथ की ओर चले आद्यगुरु शंकराचार्य ने एक ही स्थान पर विश्राम किया था, वह है निरवाली गांव। यही वजह है कि इस गांव के लोग भगवान बदरीनाथ को अपना आदिदेव मानते हैं। वे बताते हैं कि आज भी गांव में शंकराचार्य के आगमन के निशान मौजूद हैं। उनके द्वारा स्थापित किया गया सूरजकुंड मंदिर भी गांव में है।

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1

           स्योंकार-स्योंनाई
       ================

जिस घर में या घर के लोगों द्वारा जागर आयोजित की जाती है, उस घर के मुखिया को स्योंकार या सोन्कार और उसकी पत्नी को स्योंनाई कहा जाता है। यह अपनी समस्या देवता को बताते हैं और देवता के सामने चावल के दाने (जिसे दाणी भी कहते) रखते हैं, देवता चावल के दानों को हाथ में लेकर उनकी समस्या के बारे में जान लेते हैं और उसकी समस्या का कारण तथा समाधान बताते हैं।

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की जरूरत
===========================

राज्यपाल श्रीमती माग्र्रेट आल्वा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत तथा नृत्य जैसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को युवाओं के माध्यम से संरक्षित व संव‌िर्द्धत करने की आवश्यकता बताई।

स्पिक मैके संस्था की उत्तराखंड राज्य सलाहकार परिषद समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए श्रीमती आल्वा ने कहा कि इस तरह की संस्थाओं को सक्रिय करने की जरूरत है। उन्होंने संस्था को विवेकाधीन कोष से 50 हजार रुपये देने की स्वीकृति भी दी।

संस्था के संस्थापक पदमश्री डा.किरन सेठ ने राज्यपाल के समक्ष संस्था के उद्देश्यों तथा गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया। उन्होंने भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा भी रखी। संस्था के माध्यम से शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत को प्रोत्साहित करने की रणनीति पर भी चर्चा की गई। राज्यपाल ने उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं उन्नयन में स्पिक मैके संस्था को सहयोग देने का सुझाव दिया।

बैठक में राज्यपाल के सचिव अशोक पई, अपर सचिव अरुण कुमार ढौडियाल, दून विवि के कुलपति डा.गिरिजेश पंत, सचिव सुश्री मनीषा पंवार, केंद्रीय विद्यालय संस्थान के जेएस रावत, एलबीएस अकेडमी के उपनिदेशक सुश्री रंजना चोपड़ा, लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी, निदेशक संस्कृति सुश्री बीना भट्ट आदि मौजूद थे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7279337.html

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
अपनी संसकिरती ही हमारी पहचान है

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
बदल गया होली मनाने का अंदाज

 

  नई टिहरी, जागरण कार्यालय : होली का त्यौहार सामाजिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता है और इसीलिए प्रेम, उमंग, उल्लास के सबसे ज्यादा गीत भी होली पर लिखे गए हैं, लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ इसकी परिभाषा भी बदलने लगी है। आज होली के हुड़दंग में यहां के मंडाण व लोक गीत दबकर रह गए हैं।


डेढ़-दो दशक पहले गांव में होली मनाने का अलग ही अंदाज था। गांव की होली तो एक सप्ताह पूर्व शुरू हो जाती। गांव में अब न होल्यारों की  टोली दिखाई देती है  न मंडाण और ना ही वह लोकगीत। तेजी से शहरों की संस्कृति अपना रहे गांवों में भी इस त्यौहार ने विकृत रूप ले लिया है।

गोना गांव के श्यामलाल जो पेशे से व्यवसायी हैं, का कहना है कि गांव में होली का कुछ अलग ही उत्साह था। होल्यारों की टोली स्वयं निर्मित बांस की पिचकारी पानी लेकर रास्तों में सुबह से ही खड़े हो जाते थे और राहगीरों से पानी न डालने की एवज में एक-दो रूपये लेते और बाद में उन पैसों की मिठाई खरीदकर खाते थे।

 मेड गांव के 46 वर्षीय विशन सिंह जो पेशे से किसान हैं कहते हैं कि पहले नशामुक्ति होली खेली जाती थी। होली में एक व्यक्ति को कंधे पर बिठाकर उसे पूरे गांव में घुमाया जाता और लोग उस पर रंग डालते। ग्रामीण भी एक दूसरे को पानी से भिगोते और उसके बाद मंडाण का आयोजन भी किया जाता था। अब छोटे-छोटे कस्बों में भी शराब की दुकानें खुल गई हैं और होली के उल्लास के स्थान पर अब हुड़दंग होनी लगी है।

 बूढ़ाकेदार के शेर सिंह अपने समय की बात करते हैं जब गांव में रंग उपलब्ध न होने पर लाल और सफेद मिट्टी एकत्रित की जाती थी और उसे पानी में भिगोकर रंग तैयार किया जाता और फिर एक दूसरे पर रंग डालते थे। 50 वर्षीय रामेश्वर भट्ट कहते हैं अब गांवों से लगातार बढ़ रहे पलायन से भी होली पर असर पड़ा है। गांव में होल्यारो की टोली, पंचायत चौकों पर ढोल-दमाऊ के साथ मंडाण बीते जमाने की बात हो गई है


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7455848.html

Devbhoomi,Uttarakhand

  • MeraPahad Team
  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 13,047
  • Karma: +59/-1
फूलों से सजाई देवी देवताओं की सेज
===================




    फूलों का पारंपरिक त्यौहार हारुणी रैथल गांव में पूरे उल्लास के साथ मनाया गया। खेती के काम से निपटने के बाद ग्रामीणों ने देवी देवताओं के लिये बुग्याल से चुनकर लाए गये फूलों की सेज सजाई और अच्छी फसल की कामना की। इसके साथ ही ग्रामीणों ने दयारा बुग्याल में अंडूढ़ी यानी बटर फेस्टिवल की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं।
खेतों में रोपाई के बाद बुधवार की शाम से ही रैथल गांव के लोग उल्लास में डूब गये थे। गुरुवार की दोपहर तक ग्रामीणों ने मां जगदंबा व सोमेश्वर देवता के मंदिर परिसर को बुग्याल से चुनकर लाए गये विभिन्न फूलों से सजाया। इस बार रानागीठ से सोमेश्वर देवता की डोली व पुजारी भी उत्सव में शामिल हुए।

विशेष पूजा अर्चना के बाद गांव के पुरुषों, महिलाओं व बच्चों ने ढोल की थाप पर रांसो व तांदी नृत्य किये। उल्लास बढ़ने के साथ ही अनुष्ठान में बदला और गांव की खुशहाली के लिये देवी देवताओं का अह्वान किया गया। इस दौरान देवी देवताओं के पश्वा ने नंगे पांव फरसे पर चलने जैसे करतब भी दिखाए। उत्सव में नटीण, बार्सू, क्यार्क व भटवाड़ी आदि गांवों के ग्रामीण भी बड़ी तादाद में शामिल हुए।

ग्राम प्रधान मनोज राणा ने बताया कि हारुणी पर्व पर अच्छी फसल की कामना की जाती है। इसके साथ ही दयारा बुग्याल में मनाए जाने वाले अंडूढ़ी (बटर फेस्टीवल) की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। पशुधन की बेहतरी की कामना वाले इस पर्व को इस बार भव्य रूप दिया जा रहा है।


jagran news

   

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22