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  • फूलदेई: March 14, 2010

Author Topic: Phool Deyi: Folk Festival Of Uttarakhand - फूल देई: एक लोक त्यौहार  (Read 62693 times)

पंकज सिंह महर

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फूल-देई पर देहरादून से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान में दिनेश जुयाल, सम्पादक का लेख।

साभार-http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/

पंकज सिंह महर

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बसंत के स्वागत में बच्चे लोकगीतों को गाते हुए बसंती फूलों को चुनकर लाते हैं. घर की देहरी पर ऐपण सजाकर इन फूलों से देहरी यानी घर के मुख्यद्वार की चौखट की पूजा की जाती है. समृद्धि के फूल लाने वाले इन बच्चों को शुभकामनाएँ देते हुए महिलाएँ उन्हें मुट्ठी भर चावल और गेंहू देती हैं.

MR. M.S. NEGI

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Sab Uttarakhandi bhai bahno ko mera namaskar,

Phool dei ke fastival ke din bahut he maja aata tha, sabse pahle hum saari mani se phool chunkar late the ghar main agar koi naya bacha hota tha to usaki kori tuperi (new tokari) lagate the, hum sabke darwaje per jate the aur bolte the "phool budhei phool phool, tab us ghar ki ladies hame 1 muthi chawal aur kori tuperi main haluya poori and paise dalete thi.

Devbhoomi,Uttarakhand

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दोस्तों जैसा कि हम जानते है हमारे उत्तराखंड मैं इतने त्यौहार है, कभी कभी तो हम भूल जाते हैं कि कौनसा त्यौहार कब आकर चला गया है, ऐसा मुख्या रूप से होता नहीं है! लेकिन कभी कभी दो तीन त्यौहार एक साथ मैं आने से पता भी नहीं चल ता है !

फूल संकरान्ति का त्यौहार भी उत्तराकहने मैं उतना ही प्रशिध और धूम धाम से मनाये जाने वाला त्यौहार है जितना कि उत्तरायणी का त्यौहार मनाया जाता है !
उत्तरायणी का त्यौहार जनवरी मैं मनाया जाता है तो फूल संक्रांति फागुण महीने के ख़त्म होते ही माने कि तैयारियां कि जाती है,ये त्यौहार भी उत्तराखंड मैं बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है !

इस लोक पर्व के सम्बन्ध मैं मान्यता है कि पर्वत राज हिमालय कि पुत्री पार्वती ने शिव को पतिरूप मैं प्राप्त करने के के लिए बारह वसंतों तक नाना प्रकार के पुष्पों से उनकी आराधना कि थी तथा चैत्र मॉस कि संक्राति  कि दिन शिव ने पार्वती को पत्नी रूप मैं स्वीकार किया था !
इसलिए यहाँ चैत्र मॉस कि संक्रांति ,फूल संग्रांत के रूप मैं उत्त्साह पूर्वक मनाई जाती है,इसी फूल संक्रांति से भारतीय संसकिरती का नया वर्ष भी शुरू होता है !

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फागुण मॉस के अंतिम दिनों फूल संगरांद के लिए रूडया(रिंगाल के कारीगर) हथकंडी/फूल कंडी और छोटी-छोटी टोकरियाँ बुनकर बेचने के लिए गाँव-गाँव जाते हैं !

लोग अपने बच्चों के लिए फूल कंडी और छोटी- छोटी टोकरियाँ खरीदते हैं !फागुण कि अंतिम शाम को बच्चे एवं कुंवारी कन्यायें खेतों के किनारों,बागीचों और वन पान्त्रों मैं उगे फ्यूंली ,बुरांस ,सरसों ,लय्या,पैयां,सेमल आदि विभिन्न परकार के फूलों को चुनकर फूल कंडी मैं लाते है !तथा उसमें पानी कि फुवार डालकर बहार खुले मैं टांग देते है !

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अगले दिन पौ फटते ही बच्चे गहरी नींद से जागते हैं ,और ख्खिले हुए पुष्पों को देखते हैं तो एक अदभुत उल्लास से उनका रोम-रोम सिहर उठता है !

जब बच्चों कि टोली फूल फूल दाल दे ,चौंल (चावल ) और आरू का फूल ,बुरांस का फूल गाती हुई देहरी (का मतलब दरवाजे ) और घर के अन्दर फूल बिखेरती हैं !


तो इस लोकपर्व की छटा देखते ही बनती है और लोक भाषा मैं गाते है !

फूल-फूल देई,बड़ी बड़ी पकवडी !
फूल-फूल माई ,दाल दे चौंल दे !!


बच्चों का मधुर गीत सुनकर गिर्हलक्ष्मी एक बर्तन मैं गेहूं ,चावल.(चौंल ) कौणी,झंगोरा आदि अनाज लाती है और बच्चों की टोकरियों मैं एक एक मुठी डालती हैं !

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एक परिवार मैं जितने कुंवारे सदस्य होते हैं उतने ही टोकरियाँ रखी होती हैं ,टोकरियाँ,गाय के गोबर से पुत्ति होती हैं और गोबर से पुतने के बाद इन टोकरियों को सफ़ेद मिटटी से (कमेडा) तथा हल्दी और पिठाई से अकंकिर्त किया जाता है इस तरह बच्चे एक देहरी से दूसरी देहरी (गढ़वाली मैं दरवाजे को देहरी या डेली कहते हैं ) पर फूल डालते हुए प्रत्येक चौक मैं बैठते हैं !

उत्तराखंड मैं किसी की देहरी पर फूल न डालना और चौक मैं बैठने को बडा अपशकुन माना जाता है,इसलिए हर गिर्हस्वामिनी को बड़ी उत्शुकता से बच्चों की टोली की प्रतीक्षा रहती है !

उत्तराखंड के प्राय समग्र पर्वतीय छेत्र मैं सात दिन तक और कहीं-कंही महीने भर तक भी फूल डाले जाते हैं फूल बदले जो सामग्री प्राप्त होती है,उसे पीसकर चैत्र मास के किसी दिन जंगल मन जाकर बच्चे सामूहिक हलुवा बनाते हैं !
और ध्वौगा पूज्ये (एक काल्पनिक देवता की पूजा ) करते हैं !

Devbhoomi,Uttarakhand

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फूल संगरांद को मदनोत्सव के रूप मैं भी मनाया जाता है,कहते हैं कि-रति ने रैमासी फूलों के साथ पैयाँ (को पदम् विर्क्ष) के फूलों से कामदेव को प्रसन्न किया था !मदनोत्सव के रूप मैं इस अवसर पर विवाहित महिलायें फूलों से सजकर बसंती गीत गाती हैं और निर्त्य करती हैं !

फूलदेई -फूल देई फूल संगरांद

सुफल करो-नयो साल तुमुक श्री भगवान् !

रंगीला सजीला फूल,ऐंगी डाला -बोट्ला हरया ह्वेग्येगी !

पौन-पंछी,दौडी गैना,डाल्युं फूल है सदा रैन !



अर्थात फूलों को देने वाली फूल संक्रांति आ गयी है इस्वर तुमारा नया वर्ष सफल करे,सुन्दर रंग-रंगीले फूल खिले गए हैं !पशु पक्षी ख़ुशी से विचरण करने लगे !पेडों पर फूल मुस्करा रहे हैं !

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फूल सक्रांति के दिन गाँव के औजि (ढोल दमाऊं बादक ) द्वार-द्वार जाकर (नौबत ) इसको शुव्कामना सन्देश कहते हैं गढ़वाली मैं इस सन्देश को नौबत कहते हैं !
और चैती गीत गाते हैं, पहले इसे यानी चैती ईटों को वादी यानि (बेडा) गाते थे और आजकल ओ़जी गाते हैं ढोल दामऊँ के साथ तथा समस्त ग्राम देवताओं ,भूमयाल,क्षेत्रपाल ,बजीर,नंदा नारैण,और खोली के गणेश का आह्वान कर उस परिवार की रिधि शिधि की कामना करते हैं !


तुमारा भंडार भरयान,

अन्न-ध्न्तल बरकत हवेन!

ओंद रओ ऋतू मास ,

ओंद रओ सबुक संगरांद !

फूलदेई -फूल देई फूल संगरांद !


अर्थात तुमारा भण्डार भरा रहे ,अन्न-धन की विर्धी हो,ऋतुएं महीने आते रहें और संक्रांति का पर्व मनाया जाता रहे ,पूल संक्रांति का पर्व विवाहिता महिलाओं के लिए आशा निराशा की संयुक्त अनुभूति का पर्व है !

Devbhoomi,Uttarakhand

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चैत के महीने में ध्याण(विवाहित बेटियाँ ) को आलू कल्यौ देने की परम्परा है !कुमाऊँ में इसे भिटोली कहते हैं आलू कल्यौ (सौगात )के साथ माइके की कुशल भी प्राप्त हो जाती है !

तथा ध्याण के जीवन में आशा का नया संचार होता है जिसका आलू कल्यौ आ जाता है वह बड़ी भग्यान समझी जाती है अच्छा आलू कल्यौ विवाहिता के मइके की प्रतिष्ठा का सूचक होता है !

बुरांस और फ्यूंली के फूल,कुक्कू ,हिलांस ,और घुघूती का विरह दुग्ध स्वर ससुराल का कष्ट्पूरण जीवन विवाहिता की वेदना को मुखरित करते हैं !


 

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