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  • देवीधूरा की बग्वाल: August 02, 2012

Author Topic: Stone Pelting: Devidhura Fair - देवीधूरा की बग्वाल: आधुनिक युग में पाषाण युद्ध  (Read 52005 times)

Pawan Pathak

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खुली आंखों से नहीं होते मां बाराही के दर्शन हर साल सिर्फ बग्वाल के दिन आंख बंद कर स्नान कराते हैं पुजारी
नवल जोशी
लोहाघाट (चंपावत)। देवीधुरा की ख्याति भले ही बग्वाल के लिए हो, लेकिन यहां की मां बाराही देवी मूर्ति और भीम शिला का रहस्य भी बेहद रोचक है। बाराही देवी मंदिर परिसर में एक ताम्रपेटिका में रखी मूर्ति को नहीं देखने की परंपरा रही है। इसके भीतर रखी मूर्ति को किसी भी श्रद्धालु ने अब तक नहीं देखा है। केवल मंदिर के पुजारी द्वारा मेले के दौरान नेत्रों को ढककर मूर्ति का स्नान कराने की परिपाटी रही है।
मंदिर में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम एक मूर्ति है, जिसे 52 पीठों में से एक माना जाता है। मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां बाराही देवी की मूर्ति है, मगर पेटिका में रखी इस देवी मूर्ति के दर्शन अभी तक किसी ने नहीं किए हैं। इस कारण यह भी साफ नहीं कि यह मूर्ति किस धातु की है। हर साल केवल भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को पंडित पुरोहित पुजारियों और बागड़ जाति के व्यक्ति द्वारा ताम्र पेटिका को मुख्य मंदिर से नंद घर में लाया जाता है, जहां आंखों में पट्टी बांध कर मां को स्नान कराने के बाद उनको आभूषण और नए परिधान पहनाए जाते हैं। इस पेटिका में मां वज्र बाराही के अलावा मां महाकाली और मां सरस्वती की मूर्तियां भी हैं।
अब बग्वाल का मतलब पत्थर युद्ध नहीं

भगवान विष्णु की शक्ति है मां बाराही देवी मूर्तियों में वज्र के समान तेज
मंदिर के पीठाचार्य कीर्ति शास्त्री का कहना है कि मां वज्र बाराही, मां सरस्वती एवं मां महाकाली में वज्र के समान तेज है, जिससे उन्हें खुली आंखों से नहीं देखा जाता है। यह भी कहा जाता है कि दिगंबरा होने के कारण मां की मूर्ति को बंद रखा जाता है। मां बाराही उग्र देवी हैं, वह अशुद्ध पाप कर्म और दुरात्माओं को सहन नहीं करती हैं। शायद पाप वृत्ति वालों से उन्हें दूर रखने का प्रयास किया गया होगा। मां बाराही धाम में मां वज्र बाराही की स्थापना का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है। अलबत्ता देवी यहां के लोगों की सदियों से ईष्ट है।
पुराणों के जानकार और संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य भुवन चंद्र जोशी का कहना है कि पुराणों में मां बाराही को भगवान विष्णु की शक्ति माना गया है। विष्णु भगवान जब बाराह, नर सिंह आदि रूप में अवतार लेते हैं तो महालक्ष्मी बाराही, नारसिंही आदि रूप में अवतरित होती हैं। श्रीविद्यार्णवतंत्र में बाराह मूर्तिर्वाराही नृसिंहा सिंहविक्रमा। मां बाराही को देवीभागवत तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में विष्णु के बाराह अवतार की पत्नी बताया गया है, जो काफी तेजस्वी हैं।
बग्वाल यानि पत्थर युद्ध, लेकिन अदालत के आदेश के बाद बीते दो वर्षो से बग्वाल में पत्थर के बजाय फल-फूल की बौछार होती रही है। बग्वाल में चार खाम (चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया) हिस्सा लेते हैं। परंपरा के अनुसार बग्वाल में एक व्यक्ति के रक्त के बराबर खून निकलने के बाद ही बग्वाल बंद की जाती है। इसका भान होते ही मां बाराही धाम के मंदिर के पुजारी बग्वाल रोकने का आदेश देते हैं। मान्यता के मुताबिक चम्याल खाम की एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न हो मां बाराही देवी ने महिला को आशीर्वाद दिया। जिसके बाद नर बलि बंद हो गई और बग्वाल शुरू हुई। बग्वाल की शुरुआत कब से हुई है, इसकी तिथि का प्रमाण नहीं मिलते हैं। अलबत्ता करीब तीसरी सदी से बग्वाल देवीधुरा में हो रही है।
बुजुर्ग हेमलता जोशी कई बार बग्वाल की साक्षी बन चुकी हैं। सबसे पहले 39 साल पूर्व और आखिरी बार दो साल पहले बग्वाल देखी। बताती हैं कि बग्वाल के तौर-तरीकों को खेलने में कोई खास बदलाव नहीं आया। बग्वाल के प्रति पवित्र भाव तब भी था और अब भी है। बस बदलाव पत्थरों से फल-फूलों का हो गया। हेमलता बताती है कि बग्वाल मेले में बाजार के स्वरूप में बदलाव हुआ है। पहले बाजार काफी छोटा था अब दूरदराज से भी दुकानें लगती है। अब सुरक्षा और प्रशासन की व्यवस्था पहले से अधिक अच्छी है।


Source- http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150824a_002115003&ileft=116&itop=129&zoomRatio=139&AN=20150824a_002115003

 

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