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  • देवीधूरा की बग्वाल: August 02, 2012

Author Topic: Stone Pelting: Devidhura Fair - देवीधूरा की बग्वाल: आधुनिक युग में पाषाण युद्ध  (Read 52144 times)

हेम पन्त

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चम्पावत के देवीधूरा नामक जगह पर मां वाराही का प्रसिद्ध मन्दिर है. हर साल रक्षाबन्धन के दिन यहां विशाल मेला लगता है. इस मेले का मुख्य आकर्षण दो गुटों के बीच होने वाला पाषाण युद्ध है. कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहां मानव बलि का प्रचलन था. एक बार किसी वृद्ध महिला के इकलौते पुत्र की बलि होनी थी तो महिला ने माता की आराधना करके उन्हें इस बात के लिये मना लिया कि हर साल पत्थर युद्ध के द्वारा माता को एक मानव के रक्त की मात्रा चढायी जायेगी. इस तरह यह परंपरा हर साल अनवरत रूप से चली आ रही है. इस युद्ध में शामिल होने वाले लोगों को कई दिन पहले से विशेष रूप से शुद्ध खान-पान और आचरण का पालन करना पङता है.

इस विषय पर अधिक जानकारी इस टापिक पर उपलब्ध करायी जायेगी.

पंकज सिंह महर

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बग्वाल मेला अपने पाषाण युद्ध के कारण प्रसिद्ध है, यह श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसी दिन रक्षाबंधन का भी त्यौहार होता है। इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, पहले हम मां वाराही देवी के बारे में जानते हैं-

मां वाराही देवी
(देवीधूरा)


देवीधूरा में वाराही देवी मंदिर शक्ति के उपासकों और श्रद्धालुओं के लिये वह पावन और पवित्र स्थान है, जहां पहुंचते ही अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। दैविक शक्ति से यहां पहुंचने वाले लोगों को रोग, दोष व विपदाओं से निजात मिल जाती है। यह क्षेत्र देवी का उग्र पीठ माना जाता है और इसे पूर्णागिरी की तरह ही माना जाता है। समुद्र की सतह से लगभग २००० फीट की ऊंचाई पर स्थित इस प्राचीन एवं ऎतिहासिक स्थल से कई पौराणिक कथायें भी जुड़ी हैं।
      चन्द राजाओं के शासन काल में इस सिद्ध पीठ में चम्पा देवी और ललत जिह्वा महाकाली की स्थापना की गई थी। तब लाल जीभ वाली महाकाली को महर और फर्त्यालो द्वारा बारी-बारी से प्रतिवर्ष नियमित रुप से नरबलि दी जाती थी। बताया जाता है कि रुहेलों के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा वाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक भवन में स्थापित कर दिया गया था। धीरे-धीरे इसके चारोम ओर गांव स्थापित हो गये और यह मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र बन गया। बताया जाता है कि पहाड़ी के छोर पर खेल-खेल में भीम ने शिलायें फेंकी थी, ग्रेनाइट की इन विशाल शिलाओं में से दो शिलायें आज भी मन्दिर के निकट मौजूद हैं। जिनमें से एक को राम शिला कहा जाता है, इस पर ’पचीसी’ नामक जुए के चिन्ह आज भी विद्यमान हैं। जन श्रुति है कि यहां पर पाण्डवों ने जुआ खेला था, उसी के समीप दूसरी शिला पर हाथों के भी निशान हैं।



पंकज सिंह महर

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इक्कीसवीं सदी में पाषाण युद्ध-बी०बी०सी० संवाददाता शालिनी जोशी की एक रिपोर्टदुनिया में जब इंसानी ज़िंदगी शुरू हुई तो इंसान के हाथ में एक पत्थर था. पेट भरने और अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष के दरम्यान इंसान ने उस पत्थर को हथियार बनाया और जल्द ही औज़ार भी. आदमी और पत्थर की ये दोस्ती सभ्यताओं के विभिन्न दौर से गुजरती हुई इक्कीसवीं सदी के इस मशीनी युग में भी क़ायम रह सकती है- इस बात पर यकीन नहीं आता.

लेकिन भारत के पहाड़ी राज्य उत्तरांचल के चंपावत ज़िले के देवीधुरा कस्बे में आज भी आदिम सभ्यता जीवंत हो उठती है जब लोग ‘पाषाण युद्ध’ का उत्सव मनाते हैं. एक-दूसरे पर निशाना साधकर पत्थर बरसाती वीरों की टोली, इन वीरों की जयकार और वीर रस के गीतों से गूंजता वातावरण, हवा में तैर रहे पत्थर ही पत्थर और उनकी मार से बचने के लिये हाथों में बांस के फर्रे लिये युद्ध करते वीर.  आस-पास के पेड़ों, पहाड़ों औऱ घर की छतों से हजारों लोग सांस रोके पाषाण युद्ध के इस रोमांचकारी दृश्य को देख रहे हैं. कभी कोई पत्थर की चोट से घायल हो जाता है तो फौरन उसे पास ही बने डॉक्टरी कैंप में ले जाया जाता है. युद्धभूमि में खून बहने लगता है, पत्थर की बौछार थोड़ी देर के लिये धीमी जरूर हो जाती है लेकिन ये सिलसिला थमता नहीं. हर साल हजारों लोग दूर-दूर से इस उत्सव में शामिल होने आते हैं.

        आस-पास के गांवों में हफ़्तों पहले से इसमें भाग लेने के लिये वीरों और उनके मुखिया का चुनाव शुरू हो जाता है. अपने-अपने पत्थर और बांस की ढालें तैयार कर लोग इसकी बाट जोहने लगते हैं. चमियाल टोली के मुखिया गंगा सिंह बिष्ट कहते हैं,"सब चाहते हैं कि उनकी टोली जीते लेकिन साथ ही जिसका जितना खून बहता है वो उतना ही ख़ुशक़िस्मत भी समझा जाता है. इसका मतलब है कि देवी ने उसकी पूजा स्वीकार कर ली."

बग्वाल यानी पाषाण युद्ध की ये परंपरा हजारों साल से देवीधूरा में चली आ रही है. मान्यता है कि बाराही देवी को मनाने के लिए ही ये खेल किया जाता है.   पहले यहाँ आदमी की बलि दी जाती थी. लेकिन जब एक वृद्धा के इकलौते पोते की बारी आई तो उसने उसे बचाने के लिये देवी से प्रार्थना की. देवी उसकी आराधना से खुश हुई और उसके पोते को जीवनदान दिया लेकिन साथ ही शर्त रखी कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून उसे चढ़ाया जाए. तभी से पाषाण युद्ध में खून बहाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है."   पुजारी जयदत्त

किंवदंती
मंदिर के पुजारी जयदत्त इसके महत्त्व के बारे में बताते हैं, "पहले यहाँ आदमी की बलि दी जाती थी. लेकिन जब एक वृद्धा के इकलौते पोते की बारी आई तो उसने उसे बचाने के लिये देवी से प्रार्थना की. देवी उसकी आराधना से खुश हुई और उसके पोते को जीवनदान दिया लेकिन साथ ही शर्त रखी कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून उसे चढ़ाया जाए. तभी से पाषाण युद्ध में खून बहाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है." आज भी जब पुजारी संतुष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून बह गया तभी बग्वाल का समापन होता है.  पुजारी के शँखनाद के साथ ही जैसे ही इस युद्ध का समापन होता है सभी टोलियों के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर खुशी मनाते हैं और घायलों की कुशलक्षेम पूछते हैं. सैलानियों के बीच भी बग्वाल का आकर्षण बढ़ता जा रहा है.दिल्ली,मुंबई,हरियाणा,पंजाब के साथ-साथ बड़ी संख्या में विदेशी भी इस अनोखे युद्ध को देखने इस समय यहां आते हैं.
यूरोप से आईं कैथलीन कहती हैं," पत्थरों की इस तूफ़ानी बरसात से डर भी लगता है लेकिन सबसे ज्यादा कौतूहल की बात ये है कि लोगों को चोट आती है, गिरते हैं लेकिन फिर इस खेल में शामिल हो जाते हैं".

 

पंकज सिंह महर

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बगवाल : देवीधुरा मेला

देवीधुरा में वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षावन्धन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को पत्थरों की वर्षा का एक विशाल मेला जुटता है । मेले को ऐतिहासिकता कितनी प्राचीन है इस विषय में मत-मतान्तर हैं । लेकिन आम सहमति है कि नह बलि की परम्परा के अवशेष के रुप में ही बगवाल का आयोजन होता है ।

लोक मान्यता है कि किसी समय देवीधुरा के सघन बन में बावन हजार वीर और चौंसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देकर स्थानीय जन से प्रतिफल के रुप में नर बलि की मांग की, जिसके लिए निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के खून के बराबर निकले रक्त से देवी को तृप्त किया जायेगा, पत्थरों की मार प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को आयोजित की जाएगी । इस प्रथा को आज भी निभाया जाता है । लोक विश्वास है कि क्रम से महर और फव्यार्ल जातियों द्वारा चंद शासन तक यहाँ श्रावणी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष नर बलि दी जाती थी ।

इतिहासकारों का मानना है कि महाभारत में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक ऐसी जाति का उल्लेख है जो अश्म युद्धमें प्रवीण थी तथा जिसने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था । ऐसी स्थिति में पत्थरों के युद्ध की परम्परा का समय काफी प्राचीन ठहरता है । कुछ इतिहासकार इसे आठवीं-नवीं शती ई. से प्रारम्भ मानते हैं । कुछ खास जाति से भी इसे सम्बिन्धित करते हैं ।

बगवाल को इस परम्परा को वर्तमान में महर और फव्यार्ल जाति के लोग ही अधिक सजीव करते हैं । इनकी टोलियाँ ढोल, नगाड़ो के साथ किंरगाल की बनी हुई छतरी जिसे छन्तोली कहते हैं, सहित अपने-अपने गाँवों से भारी उल्लास के साथ देवी मंदिर के प्रांगण में पहुँचती हैं । सिर पर कपड़ा बाँध हाथों में लट्ठ तथा फूलों से सजा फर्रा-छन्तोली लेकर मंदिर के सामने परिक्रमा करते हैं । इसमें बच्चे, बूढ़े, जवान सभी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं । बगवाल खेलने वाले द्यौके कहे जाते हैं । वे पहले दिन से सात्विक आचार व्यवहार रखते हैं । देवी की पूजा का दायित्व विभिन्न जातियों का है । फुलारा कोट के फुलारा मंदिर में पुष्पों की व्यवस्था करते हैं । मनटांडे और ढ़ोलीगाँव के ब्राह्मण श्रावण की एकादशी के अतिरिक्त सभी पर्वों� पर पूजन करवा सकते हैं । भैंसिरगाँव के गढ़वाल राजपूत बलि के भैंसों पर पहला प्रहार करते हैं ।

बगवाल का एक निश्चित विधान है । मेले के पूजन अर्चन के कार्यक्रम यद्यपि आषाढि कौतिक के रुप में एक माह तक लगभग चलते हैं लेकिन विशेष रुप से श्रावण माह की शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद कष्णपक्ष की द्वितीया तिथि तक परम्परागत पूजन होता है । बगवाल के लिए सांगी पूजन एक विशिष्ट प्रक्रिया के साथ सम्पन्न किया जाता है जिसे परम्परागत रुप से पूर्व से ही सम्बन्धित चारों खाम (ग्रामवासियों का समूह) गढ़वाल चम्याल, वालिक तथा लमगडिया के द्वारा सम्पन्न किया जाता है । मंदिर में रखा देवी विग्रह एक सन्दुक में बन्द रहता है । उसी के समक्ष पूजन सम्पन्न होता है । यही का भार लमगड़िया खाम के प्रमुख को सौंपा जाता है । जिनके पूर्वजों ने पूर्व में रोहिलों के हाथ से देवी विग्रह को बचाने में अपूर्व वीरता दिखाई थी । इस बीच अठ्वार का पूजन होता है । जिसमें सात बकरे और एक भैंस का बलिदान दिया जाता है ।

पूर्णिमा को भक्तजनों की जयजयकार के बीच डोला देवी मंदिर के प्रांगण में रखा जाता है । चारों खाम के मुखिया पूजन सम्पन्न करवाते है । गढ़वाल प्रमुख श्री गुरु पद से पूजन प्रारम्भ करते है । चारों खामों के प्रधान आत्मीयता, प्रतिद्वेंदिता, शौर्य के साथ बगवाल के लिए तैयार होते हैं ।

द्यीकों के अपने-अपने घरों से महिलाये आरती उतार, आशीर्वचन और तिलक चंदन लगाकर हाथ में पत्थर देकर ढोल-नगाड़ों के साथ बगवाल के लिए भेजती हैं । इन सबका मार्ग पूर्व में ही निर्धारित होता है । मैदान में पहँचने का स्थान व दिशा हर खाम की अलग होती है । उत्तर की ओर से लमगड़ीया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक और पूर्व की ओर से गहड़वाल मैदान में आते हैं । दोपहर तक चारों खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई परिक्रमा करके मंदिर के दक्षिण-पश्चिम द्वार से बाहर निकलती है । फिर वे देवी के मंदिर और बाजार के बीच के खुले मैदान में दो दलों में विभक्त होकर अपना स्थान घेरने लगते हैं ।

दोपहर में जब मैदान के चारों ओर भीड़ का समुद्र उमड़ पड़ता है तब मंदिर का पुजारी बगवाल प्रारम्भ होने की घोषणा शुरु करता है । इसके साथ ही खामों के प्रमुख की अगुवाई में पत्थरों की वर्षा दोनों ओर से प्रारम्भ होती है । ढ़ोल का स्वर ऊँचा होता जाता है, छन्तोली से रक्षा करते हुए दूसरे दल पर पत्थर फेंके जाते हैं । धीरे-धीरे बगवाली एक दूसरे पर प्रहार करते मैदान के बीचों बीच बने ओड़ (सीमा रेखा) तक पहुँचने का प्रयास करते हैं । फर्रों� की मजबूत रक्षा दीवार बनायी जाती है । जिसकी आड़ से वे प्रतिद्वन्दी दल पर पत्थरों की वर्षा करते हैं । पुजारी को जब अंत:करण से विश्वास हो जाता है कि एक मानव के रक्त के बराबर खून बह गया होगा तब वह ताँबें के छत्र और चँबर के साथ मैदान में आकर बगवाल सम्पन्न होने की घोषणा करता है ।

बगवाल का समापन शंखनाद से होता है । तब एक दूसरे के प्रति आत्मीयता दर्शित कर द्यौके धीरे-धीरे खोलीखाण दूबाचौड़ मैदान से बिदा होते हैं । मंदिर में अर्चन चलता है ।

कहा जाता है कि पहले जो बगवाल आयोजित होती थी उसमें फर का प्रयोग नहीं किया जाता था, परन्तु सन् १९४५ के बाद फर का प्रयोग किया जाने लगा । बगवाल में आज भी निशाना बनाकर पत्थर मारना निषेध है ।

रात्रि में मंदिर जागरण होता है । श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह की डोले के रुप में शोभा यात्रा भी सम्पन्न होती है । कई लोग देवी को बकरे के अतिरिक्त अठ्वार-सात बकरे तथा एक भैंस की बलि भी अर्पित करते हैं ।

वैसे देवीधुरा का वैसर्गिक सौन्दर्य भी मोहित करने वाला है, इसीलिए भी बगवाल को देखने दूर-दूर से सैलानी देवीधुरा पहँचते हैं ।


साभार- http://tdil.mit.gov.in/

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Ab to yeh mela Uttarakhand main kaafi mahatvapurna ho chuka hai aur hazaron paryatakon ki bheed is utsav ko dekhne aati hai.

पंकज सिंह महर

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चम्पावत से लगभग ५० कि०मी० दूर अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित है मां वाराही देवी का मंदिर और देवीधूरा कस्बा। यह शायद विश्व का एक मात्र ऎसा स्थान है, जहां श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मंदिर के प्रांगण में आज भी लोगों के बीच में पाषाण युद्ध होता है। 
       पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थान गुह्य काली की उपासना का केन्द्र था, जहां किसी समय में काली के गणों को प्रसन्न करने के लिये नरबलि की प्रथा थी। इस प्रथा को कालान्तर में स्थानीय लोगों द्वारा बन्द कर दिया गया , इससे पूर्व देवीधूरा के आस-पास निवास करने वाले लोगों जावालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहड़वाल खामों (वर्ग) के थे, इन्हीं खामों में से प्रत्येक वर्ष एक व्यक्ति की बारी-बारी से बलि दी जाती थी। एक बार चम्याल खाम की एक ऎसी वृद्धा के पौत्र की बारी आई, जो अपने वंश में इकलौता था। अपने कुल के इकलौते वंशज को बचाने के लिये वृद्धा ने देवी की आराधना की तो देवी ने वृद्धा से अपने गणों को खुश करने के लिये कहा। वृद्धा को इस संकट से उबारने के लिये नर बलि प्रथा बंद करवा कर चारों खामों ने इकट्ठे होकर पाषाण युद्ध शुरु करवाया, जिसे स्थानीय भाषा में “बग्वाल” कहा गया। बग्वाल शुरु करने के पीछे यह धारणा रही कि पत्थरों की चोट लगने से जो मानव रक्त बहेगा, उससे देवी और उसके गण प्रसन्न हो जायेगे। तभी से यह परम्परा चली और इस यु्द्ध का एक नियम यह भी है कि यह यु्द्ध तब तक चलता रहता है जब तक एक मानव के रक्त के बराबर रक्त ना निकल जाये।

पंकज सिंह महर

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पूर्णमासी के दिन पाषाण युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व श्रावण शुक्ल एकादशी के दिन वालिक, लमगडि़या, चम्याल और गहड़वाल खामो द्वारा सामूहिक पूजा-अर्चना, मंगलाचरण स्वास्तिवान, सिंहासन डोला पूजन और सांगी पूज किया जाता है। पूर्णमासी के दिन चारों खामों व सात तोकों के पधान बाराही देवी के मंदिर में एकत्र होते हैं, जहां पुजारी सामूहिक पूजा करवाते हैं| पूजा के बाद पाषाण युद्ध में भाग लेने वाले चारों खामों के योद्धा अपने घरों से परम्परागत वेश-भूषा में सुसज्जित होकर दुर्वाचौड़ में आते हैं, धोती-कुर्ता या पायजामा पहन कर सिर पर साफा व कपड़े से मुंह ढंके हुये योद्धा हाथ में बांस की फर्रा (ढाल) लेकर दो टीमों के रुप में मैदान में आते हैं। एक निश्चित समय पर पुजारी के निर्देश पर बग्वाल शुरु हो जारी है। एक पक्ष दूसरे पक्ष पर पत्थर फेंकता है और दूसरा पक्ष बांस की ढालों से अपना बचाव करता है। यही क्रम फिर दोहराया जाता है, जब पुजारी को लगता है कि एक मानव ए रक्त के बराबर रक्त निकल चुका है तो शंखनाद कर वह युद्ध समाप्ति की घोषणा करते हैं। जिसके बाद दोनो पक्षों के लोग आपस में गले मिलकर अपने क्षेत्र की समृद्धि की कामना करते हैं और श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरण किया जाता है।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Devidhura Fair

 


Devidhura Fair is organized on the day of Raksha Bandhan at the Barahi Temple in Devidhura.
During the fair, the image of the goddess kept in a locked brass casket is taken as a procession to a nearby mountain spring. The image is then ritually bathed by a blindfolded priest before replacing it in the casket. The goddess is then worshipped all night and the Bagwal Fair is celebrated in the morning amid much excitement

हेम पन्त

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