Author Topic: Uttarakhand Architecture - उत्तराखंडी वास्तुकला  (Read 23465 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: उत्तराखंडी वास्तुकला
« Reply #20 on: April 05, 2009, 12:43:40 PM »

hand kraft.



Devbhoomi,Uttarakhand

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Re: उत्तराखंडी वास्तुकला
« Reply #21 on: May 03, 2009, 06:44:52 AM »
दोस्तों आज,  हमारे उत्तराखंड की संस्कृति मे एक बहुत अहम् चीज है, लकड़ी के ऊपर वास्तुकला |
जो हर किसी के घर के दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर बहुत आसानी से देखने को मिल जाती थी
लेकिन जहाँ  लकड़ी के घरों  की जगह पक्के सीमेंट के घरों ने ले ली हैं वहीं आज हम इस महत्वपूर्ण कला  को भी खोते जा रहे हैं |



आज यदि आप उत्तरांचल के गावो मे भ्रमण करे तो आप पाएंगे की पुरानी शैली के मकान आज विलुप्त होते जा रहे है | पुराने जमाने की तिबार, डिन्डालया,मोरी छाज्जा, खम्ब और न जाने कितनी ही प्राचीन वास्तुकला विलुप्त हो गई है | दुःख की बात यह है  की आज के  इस आधुनिक युग मे इस प्राचीन वास्तुकला के कर्मकार और पारखी ढूडने से भी नही मिलते | लोगो के पास पैसा आ गया है जो अच्छी बात है परन्तु वे अपने पुरखो की निशानी और धरोहर को तोड़ कर नए मकानों का निर्माण कर मिटाते जा रहे है |
आज आपको केवल दूर दराज के पहाड़ी स्थानों मे ही कदाचित ऐसी प्राचीन वास्तुकला का दर्शन करने को मिल जाए, कई जगह अब गाँव आधुनिक और  शहरिकृत  होते जा रहे है |
यह एक सोचनीय विषय है !

पंकज सिंह महर

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Re: उत्तराखंडी वास्तुकला
« Reply #22 on: June 03, 2009, 04:25:55 PM »

Devbhoomi,Uttarakhand

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Re: उत्तराखंडी वास्तुकला
« Reply #23 on: August 08, 2009, 07:49:21 AM »

उत्तराखण्ड  में प्राचीन  वास्तु  शिल्पकला  शैली में  लकड़ी  के ढ़ाचों  की भरमार  है। साधारणतः  घर के  लकड़ी  के दरवाजों  और खिड़कियों  पर की  गई लकड़ी  की नक्काशी  उत्तराखण्ड  में एक  आश्चर्यजनक  कारीगरी  है। गांवों  में अधिकांश  घरों में  विभिन्न  पौराणिक  आकृतियों, धार्मिक  देवी-देवताओं  और प्रकृति  के मूलभावों  सहित अनेक  आकृतियां  पाई जाती  हैं।

परम्परानुसार, पुराने गढ़वाली मकानों की खुरदरे पत्थर की दीवारों को उड़द की दाल और चूने के घोल से जोड़ा जाता था। बहुतायत में लकड़ी का इस्तेमाल दरवाजों, खिड़कियों, बरामदों और बालकानियों के लिए किया जाता था। घर के मुख्य प्रवेशद्वार (जिसे खोली कहा जाता था) की चौखट पर बारीक नक्काशी होती थी और उसके ऊपर बीचो बीच गणेश की प्रतिमा उकेरी जाती थी (जिसे खोली के गणेश कहा जाता था)। अमीर घरों में भी मकान के अग्र भाग में गहन नक्काशी मुक्त खम्बे होते थे, जिनके निचले हिस्सों प्रायः कमल के फूल के आकार के होते थे जिन्हें 'तिबारी' कहा जाता था। दरवाजों और खिड़कियों की नक्काशी में एक खास भाव होता था और उसे चौखटों में भी दोहराया जाता था। घर के ऊपरी तल पर अगले हिस्से में बालकनी होती थी, जिसे निमदरी कहा जाता था। इसी हिस्से में लकड़ी की नक्काशी की गढ़वाली हस्तकला के कुछ बेहतरीन नमुने देखे जा सकते थे- दीवार के नीचे लगे खम्बों और अलकरणों पर कारीगरों को अपनी कला देखने का बहुत बढ़िया अवसर मिलता था।

हर गांव में परम्परागत रूप से लकड़ी की नक्काशी का काम निम्न जातियों के लोग किया करते थे- और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता था - तथा पंवार राजाओं ने इसे संरक्षण दिया था। दुर्भाग्यवश समयांतर में आजीविका कमाने के अवसरों में कमी तथा संरक्षण के अभाव में इक्का-दुक्का कारीगर अपने परम्परागत व्यवसाय में है।

उत्तराखण्ड में, लकड़ी के मंदिर टोन्स और यमुना के बीच उत्तरकाशी जिले के मख्यतः पहाड़ी इलाकों में देखे जाते हैं। देवराह में कर्ण मंदिर, कुपेरा में नाग देवता मंदिर, गुण्डियत गांव में कपिल मुनि मंदिर कुछेक उदाहरण हैं। इस इलाके में, लकड़ी की नक्काशी युक्त अग्रभाग वाले रिहायशी मकान भी आम बात है।

Devbhoomi,Uttarakhand

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Re: उत्तराखंडी वास्तुकला
« Reply #24 on: August 08, 2009, 07:50:49 AM »
उत्तराखण्ड  में अधिकांश  लकड़ी  के मंदिर  वास्तु  कला शैली  में बने  हैं जिन्हें  विद्वान  'छतरी युक्त  छत' की  संज्ञा  देते हैं।  यह एक  मंजिला, कुर्सी  क्षेत्र  पर लकड़ी  की फ्रेमवर्क  पर खड़ा  आयताकार  मंदिर  होता है  जिसकी  त्रियंकी  छत होती  है, गर्मगृह  के ऊपर  छतरी युक्त  स्वतंत्र  छत होती  है। परम्परागत  रूप से  ढ़ाचे  की बुनियाद  सामान्य  निर्माण  पद्धति  से विपरीत  भूमि पर  नहीं रखी  जाती, बल्कि  इसकी अधिरचना  ईट-पत्थर  से बने  उचित मंच  पर देवदार  के भारी  भरकम शहतीरों  पर टिकी  होती है।

पुराने समय में मंदिर हमेशा हिमालयी देवदार लकड़ी के बने होते थे। कहा जाता है कि देवदार 'देवताओं की लकड़ी' होती है। तथापि, इस समय पेट काटने संबंधी कठोर कानूनों के कारण मंदिर पुनर्निर्माण के लिए लकड़ी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है।

पंकज सिंह महर

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नए दौर में लुप्त हो रही है प्राचीन काष्ठ कला


पर्वतीय क्षेत्र के प्राचीन भवनों में दिखने वाली काष्ठ नक्काशी नये दौर में उपेक्षित सी हो गयी है। आधुनिकता व इमारती लकड़ी के अभाव से इस प्राचीन व परम्परागत कला के अस्तित्व संकट के बादल मंडरा रहे हैं। एक दौर था, जब नक्काशीदार भवनों की संख्या बहुतायत थी लेकिन अब यह संख्या अंगुली पर आ गई है। जिससे इस कला का दर्शनीय स्वरूप अब लुप्त सा हो गया है। पर्वतीय क्षेत्र की परम्परागत कलाओं में काष्ठ कला का स्थान भी प्रमुख है। संसाधनों पर प्रतिबंध, मैदानी क्षेत्रों से मकान बनाने की स्पद्र्धा व महंगाई की मार के कारण यह परम्परागत शैली अब लुप्त होने लगी है। पहले पर्वतीय क्षेत्र का शायद ही कोई गांव या शहर होगा, जहां भवन काष्ठ नक्काशी से सीधे साक्षात्कार न कराते हों लेकिन आज ऐसे भवन ढूंढने पर मिलते हैं। इसका एक कारण आधुनिकता की चकाचौंध भी है। भवनों में काष्ठ नक्काशी से परिपूर्ण प्रवेश द्वार व खिड़कियां भवन को सुन्दर तो बनाते ही है, साथ ही पहले माना जाता था कि नक्काशीदार भवन उसके स्वामी के सम्पन्नता का संकेत देते थे। इमारती लकड़ी की उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण भी काष्ठ कला की प्राचीन परम्परा खो रही है। मैदानी क्षेत्रों में भवन का सौन्दर्य निखारने के लिए आज पत्थर, कंकरीट व सीमेण्ट का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन पहले भवन की सुन्दरता लकड़ी पर नक्काशी से होता रहा है। नक्काशी के लिए देवदार व तुन की इमारती लकड़ी सस्ती व टिकाऊ मानी जाती थी। यह लकड़ी लोगों को अपनी ही नाप भूमि में आसानी से मिलती थी। वन संरक्षण अधिनियम के नियमों से आज इमारती लकड़ी मिलना कठिन हो गया है। फलस्वरूप काष्ठ कला की परम्परा मकानों से दूर होती चली गयी। इसका पेशेवर कारीगरों पर भी विपरीत असर पड़ा बल्कि इस कारीगरी को छोड़ना उनकी मजबूरी सी हो गयी है। अब नक्काशीदार भवन बनाना तो दूर ऐसे पुराने भवनों को तक कायम रखना तक कठिन हो गया है। अब नये फैशन में साल, शीशम की लकड़ी व लोहे के ग्रिल इत्यादि का दौर चल रहा है। जिससे भवनों में पर्वतीय क्षेत्र का शिल्प व सौन्दर्य गायब होने लगा है। संस्कृति व कला प्रेमी परम्परागत कलाओं के लुप्त होने से चिंतित हैं बल्कि कुछ संस्कृति व कला प्रेमी शासन व संस्कृति विभाग से परम्परागत काष्ठ कला के पुराने भवनों के संरक्षण पर जोर दे रहे है।

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रिंगाल की दस्तकारी


रिंगल  बांसुरी  जैसी बांस  की करीब  8 इंच लम्बी  पतली सी  शंकुरूप  लकड़ी  होती है  जिस पर  पोर बने  होते हैं।  इसका परम्परागत  इस्तेमाल  'सोल्टा', 'डाला', 'घसिया', 'टोकरी' चटाई जैसी  घरेलू  दस्तकारी  चीजें  बनाने  में होता  था। यह  परम्परागत  दस्तकारी  खासकर  चमोली  और उत्तरकाशी  जिलों  में रहने  वाले रूधिया  (नीच जाति) समुदाय  के लोग  किया करते  थे। इस  समय सरकारी  तथा गैर-सरकारी  संगठनों  द्वारा  दस्तकारों  को नये  विचारों  और प्रक्रियाओं  से रूबरू  कराने  के प्रयास  किये जा  रहे हैं।





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हथ-करघा




ऊनी कपड़े भोटिया समुदाय: जाध, तोलचा और मारचा द्वारा बनाये जाते हैं। ये खानाबदोश लोग अप्रैल से अगस्त तक भारत-तिब्बत सीमा के ऊंचे पठारों पर अपनी भेड़ें चराते हैं। अत्यन्त ठण्डे मौसम की वजह से भेड़ों पर उच्च कोटि की ऊन आती है, जिसे अगस्त और सितम्बर में काटा जाता है।
 ऊन को महिलाएं हाथ से साफ कर धोती और रंगती हैं और फिर निचले प्रदेश में भोटिया समुदाय के शीतकालीन पड़ाव पर पुरूष और महिलाएं मिलकर उसे हाथ से कातती और बुनती हैं। ऊन के रंग भेड़ों के स्वाभाविक फाइबर जैसे भूरे, काले और ऑफ व्हाइट होते हैं। भूरे और रंग के गहरे शेड बनाने के लिए अखरोट की छाल से बनी डाई का इस्तेमाल किया जाता है और डार्क और लाइट ग्रे रंग तैयार करने के लिए ब्लैक और ऑफ व्हाइट को मिलाया जाता है।
खुलिया नामक स्थानीय पौधों की जड़ों से भी ऊन की स्वाभाविक रंगाई की जाती है जिससे कॉपर सल्फेट या नमक जैसे विलिन पदार्थ मिलाने से अलग-अलग रंग आते हैं। भोटिया गांवों में हर घर में महिलाएं करघे पर व्यस्त देखी जा सकती हैं।

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Bhai Ji,

Thanks for sharing these photographs.

I remember my childhood days, many vendors used to in our village area to sell these Carpet which is called in local language "Daan" or Daani.

People in Danpur area of Bageshwar and Dharchula area (specially botia tribe) make these Daan.

हथ-करघा




ऊनी कपड़े भोटिया समुदाय: जाध, तोलचा और मारचा द्वारा बनाये जाते हैं। ये खानाबदोश लोग अप्रैल से अगस्त तक भारत-तिब्बत सीमा के ऊंचे पठारों पर अपनी भेड़ें चराते हैं। अत्यन्त ठण्डे मौसम की वजह से भेड़ों पर उच्च कोटि की ऊन आती है, जिसे अगस्त और सितम्बर में काटा जाता है।
 ऊन को महिलाएं हाथ से साफ कर धोती और रंगती हैं और फिर निचले प्रदेश में भोटिया समुदाय के शीतकालीन पड़ाव पर पुरूष और महिलाएं मिलकर उसे हाथ से कातती और बुनती हैं। ऊन के रंग भेड़ों के स्वाभाविक फाइबर जैसे भूरे, काले और ऑफ व्हाइट होते हैं। भूरे और रंग के गहरे शेड बनाने के लिए अखरोट की छाल से बनी डाई का इस्तेमाल किया जाता है और डार्क और लाइट ग्रे रंग तैयार करने के लिए ब्लैक और ऑफ व्हाइट को मिलाया जाता है।
खुलिया नामक स्थानीय पौधों की जड़ों से भी ऊन की स्वाभाविक रंगाई की जाती है जिससे कॉपर सल्फेट या नमक जैसे विलिन पदार्थ मिलाने से अलग-अलग रंग आते हैं। भोटिया गांवों में हर घर में महिलाएं करघे पर व्यस्त देखी जा सकती हैं।


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कास्ठ हस्तकला

मिटटी और धातु के बरतनों की बजाय लकड़ी के बरतनों का अधिक चलन था क्योंकि कास्ठ सहज सुलभ था। पओ के अनुसार कालीफत और मैखंदा लकड़ी से बने बरतनों के लिए प्रसिद्ध थे, जिन्हें तीर्थयात्री खरीदते थे। बरतनों पर प्राय पेड़, फूल और पक्षियों के चित्र होते थे। कास्ठ हस्त कला गढ़वाल की विकसित हस्त कला थी। बरतनों के अलावा, कास्ठ हस्तकला की रचनात्परता भवनों और मंदिरों में भी देखी जा सकती थी, जहां लकड़ी के दरवाजों और भीतरी छतों पर सजावट के लिए नक्काशी की जाती थी। कास्ठ हस्तकला में देवी-देवताओं की आकृतियां भी बनाई जाती थीं।

 

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