Author Topic: Existence of Crow & other birds at stake in Pahad- पक्षियों का अस्तितव खतरे में  (Read 7368 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,
 
I have just returned from devbhoomi Uttarakhand. My hometown comes in District Bageshwar and i visit twice in a year. I observed during my recent visit to my native place that existance of Crow, Sparrow and many other birds is at stake.
 
  मैंने अपने यात्रा के दौरान कही भी कोई कौवा नहीं देखा और न ही चील ! पिछले कुछ सालो में कौवे, गौरिया, चील आदि पक्षियों का पहाड़ो से विपुलत होने एक बहुत बड़ी चिंता का कारण है!   जैसे की स्थानीय लोग भी कहते है जब भी पहाड़ में कही भी कोई पूजा पाठ हो, कौवे या चील वहां पर जरुर मडराते थे, लेकिन आज येसा बिलकुल नहीं है ! कौवे बहुत ही कम दिखाई देते है ! मुझे तो एक भी कौवा कही भी नहीं दिखाई दिया !    क्या कारण हो सकता है, इन पक्षियों का पहाड़ से विपुलत होने का, आईये चर्चा करे इस विषय पर !    एम् एस मेहता

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

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This is really a serious matter. In my opinion, this could be due to global warming. 

Also might be that people are using many chemicals in fields these birds are getting victims of the same.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मुझे याद है बचपन के वो दिन :-

 -  कौवे सन्देश वाहक के रूप में जाना जाता था ! अगर किसी के घर के आगे कौवा काऊ काऊ कर रहा हो तो लोग इसे किसी मेहमान के आने की सूचना मानते थे !

 -  या परदेश से बच्चे की चिट्टी पत्री

 -  मकर संग्राती त्यौहार तो कौवे के लिए विशेष है ! इस दिन उत्तराखंड के कुमाऊ इलाके में कौवे को विशेष रूप से आह्वान करके बुलाया जाता है !

काले कौवा काले .
घुघूत क मौवा खा ले !

लेकिन कौवों के इस दशा को देखकर मेरा मन निश्चित रूप से दुखी !

पहाडो में लोगो के पलायन के साथ -2 पशु पक्षी भी प्ल्याँ कर रहे है यह बहुत है गंभीर बात है !

आंखिर क्या कारण हो सकता है पक्षी भी वहां से पलायन कर रहे है ?


Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

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This is quite true.


I think in great extent human interferance is responsible for the birds disappearing from pahad.  Climate change could be another reason behind this. I think efforts should be there to address this problem in time before life more dangerous for the birds.

One point i would like mention the changes have been quite of a sudden.


विनोद सिंह गढ़िया

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वास्तव में पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है। हमें इनके संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। पक्षियों के बिना हमारा अस्तित्व भी एक दिन खतरे में पड़ सकता है क्योंकि इनके बिना हमारा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है। पक्षियां हमारे लिए हानिकारक कीटों का भक्षण कर हमें उनसे बचाते हैं, हमारी फसल को भी वे हानिकारक कीटों से बचाते हैं। बहुत से पक्षियां जैसे चील, कौवे इत्यादि हमारे आस-पास पड़े मरे जीव-जन्तुवों का भक्षण कर हमें अनेकों बीमारियों से बचाते हैं। इस प्रकार वे हमारे इस तंत्र को चलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

१० वर्ष पूर्व ही मैंने देखा कि हमारे गाँव-घरों में अनेकों प्रकार के पक्षियां होती थी, लेकिन आज इन पक्षियों में कुछ ही दिखाई दे रही हैं और वे भी बहुत कम संख्या में। हमारे गाँव-घरों की प्रमुख पक्षियां जैसे गौरैया,सिंटोले, कौवे इत्यादि की संख्या इतनी तेजी से घट रही है; हमें आज आश्चर्य हो रहा है कि वास्तव में ये कहाँ चले गए। शायद हमें मालूम नहीं कि ये आज अल्पसंख्यक हो चुके हैं, जिसका कारण खुद हम हैं।  आज हमने जंगल नष्ट कर दिए, हमारे घर अब सीमेंट से सपाट हो चुके हैं; आखिर पंछी अपना घोंसला बनाये तो कहाँ ? इसी प्रकार कई ऐसे कारण हैं जो खुद हमने पैदा किये हैं और इसका असर किसी दूसरे प्राणी को भी हो रहा है और वे आज अपने अस्तित्व को खोने जा रहे हैं। हमें खुद मालूम नहीं है कि इनके बिना हमारा जीवन प्रभावित हो सकता है?

हमें यदि अपने पारिस्थितिकी तंत्र को सुचारू रूप से चलाये रखना है तो हमें पक्षियों के अस्तित्व के बारे में सोचना होगा और इनके संरक्षण के लिए हमें स्वयं अपने स्तर से प्रभावी कदम उठाने होंगे।     

पंकज सिंह महर

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पक्षी और पहाड़ी लोगों का पौराणिक काल से ही एक पारस्परिक समबन्ध रहा है। हमारे लोकगीतों और लोककथाओं में विशेष रुप से पक्षियों का उल्लेख रहा है, बच्चे की लोरी में भी पहली बार उसे पक्षी (घूघुती) से ही परिचित कराया जाता है, किसी विरहण को जब परदेश में गये पति की याद आये या अपने मायके की, तो वह भी अपनी उदासी को दूर करने के लिये पक्षियों से ही अनुरोध करती है कि मेरा सन्देशा उन तक पहुंचा दे। गौरेया तो पक्षी न होकर घर की एक छोटी सदस्य ही होती थी, बचपन में गौरेया फुदक-फुदक कर किचन तक भी चली जाती थी, किसी को उससे परेशानी नहीं थी, गौंतड़ा का घोंसला बनाना घर के लिये शुभ माना जाता था, कौवे की कांव-कांव घर में किसी मेहमान के आने का सन्देश देती थी।

तब हमारे वास्तुशाष्त्र में भी इन पक्षियों के घोंसले बनाने का स्थान तय हुआ करता था, छत और दीवार के बीच में लकड़ी के मोखले बनाये जाते थे, लेकिन समय बदला सीमेन्टेड मकान में रहने की परम्परा आ जन्मी, उन मकानों में पक्षियों ने अपना ठिकाना ढूढा, लेकिन उन्हें स्थान नहीं मिला, फिर घर के आस-पास पेड़ और झाड़ी लगाना भी बन्द हो गया, शहर का प्रतिरुप बनने की होड़ में गांव, गांव भी नही रह पाया और शहर भी नहीं बन पाया। इसके बाद विकास गांव-गांव पहुचने लगा, सबसे पहले आई बिजली की लाईनें, इनसे भी पक्षी असहज हुये। फिर गांव-गांव तक सड़क और जीपों की गुराट और उसके धुंये ने भी इनको हमसे दूर किया। उसके बाद घर-घर में डिश टी०वी० की छतरियों ने रेडियेशन शुरु किया और पक्षी गांव से दूर हुये। फिर आया दूरसंचार क्रान्ति का जमाना, जिसमें पहाड़ों में हाई फ्रीक्वेंसी के मोबाइल टावर लगे। शहरों में तो इनकी फिक्स फ्रीक्वेंसी होती है। लेकिन पहाड़ों में २०-३० गांवों के लिये एक ही मोबाइल टावर लगाया जा रहा है, इससे सबसे ज्यादा छोटे पक्षियों पर पड़ा, इसीलिये आज पहाड़ों में गौरेया, सिन्टोले, कलचुड़ि, सुवा (तोते), घुघुती जैसे पक्षी कम होते जा रहे हैं। ऐसा भी कहा जा सकता है कि हमारे विकास ने ही इनका विनाश किया है, तो अतिश्योक्ति न होगी।

हेम पन्त

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मेहता जी आपने एक गंभीर मुद्दे को उठाया है... हम लोग इस तरफ ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, लेकिन यह बात सही है कि पिछले लगभग बीस साल में पहाड़ों से पक्षियों की संख्या में चिंताजनक कमी आयी है...

मुझे याद है जब हम छोटे थे तो किसी मवेशी की लाश को गाँव से बाहर फेक दिया जाता था, जल्द ही उस पर गिद्ध टूट पड़ते थे, एक दो दिन में ही हड्डियों का ढेर बचा रह जाता था... अब गाँवों में गिद्ध भी नहीं दिखायी देते.. ये हमारे पारिस्थितिकी चक्र के गडबडाने का संकेत है... 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मैंने अपने सभी सहयोगियों की बातो से सहमत हूँ!

पक्षियों के साथ -२ कुछ जानवर भी वहां से विलुप्त के कगार पर है! जैसे लोमड़ी जिसे स्थानीय भाषा में स्यार  भी कहते है !

क्या global worming उसका मुख्य कारण है! ?

क्या पहाडो के जलवायु पक्षियों एव जानवरों के लिए उपयुक्त नहीं रहा ?


विनोद सिंह गढ़िया

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एक विशालकाय चील को कौओं ने घायल कर दिया.........? क्या ये हो सकता है ...........? जरा गौर कीजिये निम्नांकित समाचार पर । यदि चीलों की संख्या अधिक होती तो क्या कौवे इस चील पर हमला करते .........?
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जागरण कार्यालय,बागेश्वर:
                              लुप्त हो रही चील को आज नगर के कुछ समाजसेवी लोगों ने बचा लिया। चील को कौवों ने घायल किया था। पशु विभाग के कर्मचारियों द्वारा चील का इलाज किया जा रहा है।
गत दिवस कुछ कौवों ने एक चील पर हमला कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया जिससे वह नाले में गिर गई। पास से गुजर रहे समाजसेवी सुरेश खेतवाल ने उसे नाले से निकालकर उसका उपचार किया व इसकी सूचना सभासद राजू उपाध्याय ने पशु विभाग के फार्मेसिस्ट चंद्रशेखर पाठक को दी जिस पर श्री पाठक ने चील का इलाज कराया श्री पाठक ने बताया कि चील को दो तीन दिन और इलाज की आवश्यकता है जिसे स्वस्थ होने के बाद छोड़ दिया जाएगा। चील वर्तमान में समाजसेवी सुरेश खेतवाल ने अपने घर में रखा है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7965407.html


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरे हिसाब से चील कौवों पर आक्रमण नहीं करते! इसका कुछ और कारण हो सकता है !

एक विशालकाय चील को कौओं ने घायल कर दिया.........? क्या ये हो सकता है ...........? जरा गौर कीजिये निम्नांकित समाचार पर । यदि चीलों की संख्या अधिक होती तो क्या कौवे इस चील पर हमला करते .........?
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जागरण कार्यालय,बागेश्वर:
                              लुप्त हो रही चील को आज नगर के कुछ समाजसेवी लोगों ने बचा लिया। चील को कौवों ने घायल किया था। पशु विभाग के कर्मचारियों द्वारा चील का इलाज किया जा रहा है।
गत दिवस कुछ कौवों ने एक चील पर हमला कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया जिससे वह नाले में गिर गई। पास से गुजर रहे समाजसेवी सुरेश खेतवाल ने उसे नाले से निकालकर उसका उपचार किया व इसकी सूचना सभासद राजू उपाध्याय ने पशु विभाग के फार्मेसिस्ट चंद्रशेखर पाठक को दी जिस पर श्री पाठक ने चील का इलाज कराया श्री पाठक ने बताया कि चील को दो तीन दिन और इलाज की आवश्यकता है जिसे स्वस्थ होने के बाद छोड़ दिया जाएगा। चील वर्तमान में समाजसेवी सुरेश खेतवाल ने अपने घर में रखा है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7965407.html



 

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